सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

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प्रभु यीशु अब वापस आ गया है और उसका एक नया नाम है—सर्वशक्तिमान परमेश्वर। पुस्तक “वचन देह में प्रकट होता है” में सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने वचनों को व्यक्त किया है, और यह दूल्हे की वाणी है, फिर भी कई भाई-बहन अभी भी परमेश्वर की वाणी को पहचानने में असमर्थ हैं। और इसलिए, आज हमने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया से गवाहों को आमंत्रित किया है। हमने उन्हें इस बारे में हमारे साथ संगति करने के लिए आमंत्रित किया है कि परमेश्वर की वाणी को कैसे पहचानें। तो हम यह जानेंगे कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही प्रभु यीशु की वापसी है।

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उत्तर: यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है! अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने और परमेश्वर के प्रकटन को देखने के लिए, हमें यह अवश्य पता होना चाहिए कि परमेश्वर की वाणी को कैसे पहचानें। वास्तव में, परमेश्वर की वाणी को पहचानने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों और कथनों को मानना और सृष्टिकर्ता के वचनों की विशेषताओं को मानना। इस बात की परवाह किए बिना कि वे देहधारी परमेश्वर के वचन हैं, या परमेश्वर के आत्मा के कथन हैं, वे सभी परमेश्वर द्वारा स्वर्ग से मानवजाति के लिए बोले गए वचन हैं। परमेश्वर के वचनों का लहज़ा और उनकी विशेषताएँ ऐसी ही हैं। परमेश्वर का अधिकार और पहचान स्पष्ट रूप से व्यक्त होते हैं। इसे सृष्टिकर्ता के बोलने का अद्वितीय साधन भी कहा जा सकता है। हर बार जब भी परमेश्वर देहधारी होता है, तो उसके कथन निश्चित रूप से कई क्षेत्रों को समाहित करते हैं। उनका संबंध मुख्य रूप से मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसकी फटकार से, परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों और आज्ञाओं से, न्याय और ताड़ना के उसके वचनों से और भ्रष्ट मानवजाति के उसके प्रकाशन से होता है। भविष्यवाणियों के वचन और मानवजाति से किए गए परमेश्वर के वादे इत्यादि भी हैं। ये सभी वचन सत्य, मार्ग और जीवन की अभिव्यक्ति हैं। ये सभी परमेश्वर के जीवन के सार के प्रकाशन हैं। वे परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के अस्तित्व को दर्शाते हैं। हम परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों से देख पाते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, और उनमें अधिकार और सामर्थ्य है। इस प्रकार, यदि आप यह पता लगाना चाहते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन परमेश्वर की वाणी हैं या नहीं, तो आप प्रभु यीशु के वचनों और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को देख सकते हैं। आप उनकी तुलना कर सकते हैं, और देख सकते हैं कि क्या वे एक ही पवित्रात्मा द्वारा व्यक्त किए गए वचन हैं, और कि क्या वे एक ही परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य हैं। यदि उनका स्रोत एक ही है, तो इससे साबित होता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन परमेश्वर के कथन हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर, परमेश्वर का प्रकटन है। आइए, हम व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों और अनुग्रह के युग में बोले गए प्रभु यीशु के वचनों को देखें। वे दोनों ही पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति थे, और इतना ही नहीं, वे एक ही परमेश्वर के कार्य थे। इससे साबित होता है कि प्रभु यीशु, यहोवा परमेश्वर का प्रकटन था, सृष्टिकर्ता का प्रकटन था। जो लोग बाइबल पढ़ चुके हैं, वे सभी जानते हैं कि अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किए गए वचनों में, फटकार के वचन, मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाओं के वचन और ऐसे वचन शामिल थे जो परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों पर थोड़ी चर्चा करते थे। कई भविष्यवाणियों और वादों के वचन भी हैं। ये वचन अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों का एक पूरा चरण थे।

सबसे पहले, हम प्रभु यीशु की अपेक्षाओं और मनुष्यों के लिए उसकी फटकारों को देखेंगे। प्रभु यीशु ने कहा, "मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है" (मत्ती 4: 17)। "तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इसके कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए। तुम जगत की ज्योति हो। जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता" (मत्ती 5 : 13-14)। "तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।ये ही दो आज्ञाएँ सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्‍ताओं का आधार हैं" (मत्ती 22: 37-40)। "धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। … धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्‍त किए जाएँगे। … धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है। धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। तब आनन्दित और मगन होना, क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है। इसलिये कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्‍ताओं को जो तुम से पहले थे इसी रीति से सताया था" (मत्ती 5: 3, 6, 10-12)।

आइए, हम देखें कि प्रभु यीशु ने प्रशासनिक आदेशों के बारे में क्या कहा था। मत्ती 12:31-32, प्रभु यीशु ने कहा, "इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा" इसके अलावा, मत्ती 5:22 में प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा, और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे ‘अरे मूर्ख’ वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।"

प्रशासनिक आदेशों के इन वचनों के अलावा, फरीसियों का न्याय करने वाले और उन्हें उजागर करने वाले प्रभु यीशु के वचन भी:"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो" (मत्ती 23:13)। "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो" (मत्ती 23:15)। "हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो" (मत्ती 23: 27-28)।

भाइयो और बहनो, प्रभु यीशु ने भविष्यवाणियों और मनुष्यों से वादे के भी कुछ वचन बोले हैं। यूहन्ना 14:2-3 में, प्रभु यीशु ने कहा: "क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" यूहन्ना 12:47-48 भी है, प्रभु यीशु ने यह भी कहा है, "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" ऐसे ही, प्रकाशित वाक्य 21:3-4 भी है: "देख, परमेश्‍वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्‍वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्‍वर होगा। 4वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहींयशा।"

अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किए गए विभिन्न सत्यों से, हम देख सकते हैं कि प्रभु यीशु उद्धारकर्ता का प्रकटन था, और प्रभु यीशु के वचन समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर के कथन थे। उसने मानवजाति की अगुआई करने, मानवजाति का भरण-पोषण करने और मानवजाति को व्यक्तिगत रूप से छुटकारा देने के लिए, परमेश्वर के स्वभाव और उनकी इच्छा को मानवजाति के सामने प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त किया। यह पूरी तरह से परमेश्वर की पहचान और उनके अधिकार को दर्शाता है। उसके वचनों को पढ़ कर हमें तुरंत महसूस होता है कि ये वचन सत्य हैं, और उनमें अधिकार और सामर्थ्य है। ये वचन परमेश्वर की वाणी हैं, ये मानवजाति के लिए परमेश्वर के कथन हैं। अंत के दिनों में, प्रभु यीशु वापस आ गया है: सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों का न्याय का कार्य करने के लिए आया है। उसने राज्य के युग का शुभारंभ और अनुग्रह के युग का अंत कर दिया है। प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य के आधार पर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य का चरण पूरा किया है, उसने मानवजाति के शुद्धिकरण और उद्धार के लिए सभी सत्यों को व्यक्त किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन समृद्ध और पूरी तरह से व्यापक हैं। ठीक जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है: "यह कहना उचित है कि सृजन के बाद यह पहली बार है कि परमेश्वर ने समस्त मानव जाति को संबोधित किया था। इससे पहले परमेश्वर ने कभी भी इतने विस्तार से और इतने व्यवस्थित तरीके से निर्मित मानव जाति से बात नहीं की थी। निस्संदेह, यह भी पहली बार ही था कि उसने इतनी अधिक, और इतने लंबे समय तक, समस्त मानव जाति से बात की थी। यह पूर्णतः अभूतपूर्व था। इसके अलावा, ये कथन मानवता के बीच परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया पहला पाठ थे जिसमें उसने लोगों की बुराइयों को दिखाया, उनका मार्गदर्शन किया, उनका न्याय किया, और उनसे खुल कर बात की और इसलिए भी, वे पहले कथन थे जिनमें परमेश्वर ने अपने पदचिह्नों को, उस स्थान को जिसमें वह रहता है, परमेश्वर के स्वभाव को, परमेश्वर के स्वरूप को, परमेश्वर के विचारों को, और मानवता के लिए उसकी चिंता को लोगों को जानने दिया। यह कहा जा सकता है कि ये ही पहले कथन थे जो परमेश्वर ने सृष्टि के बाद तीसरे स्वर्ग से मानव जाति के लिए बोले थे, और पहली बार था कि परमेश्वर ने मानव जाति हेतु शब्दों के बीच अपनी आवाज प्रकट करने और व्यक्त करने के लिए अपनी अंतर्निहित पहचान का उपयोग किया" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "परिचय" से लिया गया)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन इतने व्यापक और समृद्ध हैं कि उनकी तुलना नहीं की जा सकती। उनमें, मुख्य रूप से न्याय, मनुष्य का प्रकाशन, राज्य के युग के प्रशासनिक आदेश एवं आज्ञाओं के साथ-साथ मनुष्यों के प्रति परमेश्वर की फटकार, अपेक्षाएँ, उसके वादे और भविष्यवाणियाँ भी समाहित हैं। आइए, हम सबसे पहले मनुष्य के लिए परमेश्वर की फटकार और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं और परमेश्वर के कार्य के बारे में परमेश्वर के वचनों के कुछ अंशों को पढ़ें।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "आज, जो मेरे लिए वास्तविक प्रेम रखते हैं, ऐसे लोग ही धन्य हैं; जो मुझे समर्पित रहते हैं वे धन्य हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में रहेंगे; जो मुझे जानते हैं वे धन्य हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य में शक्ति प्राप्त करेंगे; जो मेरा अनुसरण करते हैं वे धन्य हैं, वे निश्चय ही शैतान के बंधनों से स्वतंत्र होंगे और मेरी आशीषों का आनन्द लेंगे; वे लोग धन्य हैं जो अपने आप को मेरे लिए त्यागते हैं, वे निश्चय ही मेरे राज्य को प्राप्त करेंगे और मेरे राज्य का उपहार पाएंगे। जो लोग मेरे खातिर मेरे चारों ओर दौड़ते हैं उनके लिए मैं उत्सव मनाऊंगा, जो लोग मेरे लिए अपने आप को समर्पित करते हैं मैं उन्हें आनन्द से गले लगाऊंगा, जो लोग मुझे भेंट देते हैं मैं उन्हें आनन्द दूंगा। जो लोग मेरे शब्दों में आनन्द प्राप्त करते हैं उन्हें मैं आशीष दूंगा; वे निश्चय ही ऐसे खम्भे होंगे जो मेरे राज्य में शहतीर को थामने वाले होंगे, वे निश्चय ही अनेकों उपहारों को मेरे घर में प्राप्त करेंगे और उनके साथ कोई तुलना नहीं कर पाएगा" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "उन्नीसवाँ कथन" से लिया गया)।

"यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे।

यदि लोग अनुग्रह के युग में बने रहेंगे, तो वे कभी भी अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त नहीं होंगे, और परमेश्वर के अंर्तनिहित स्वभाव को जानने की बात को तो जाने ही दें। यदि लोग सदैव अनुग्रह की प्रचुरता में रहते हैं, परंतु वे जीवन के उस मार्ग के बिना हैं, जो उन्हें परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने देता है, तब वे उसे वास्तव में कभी भी प्राप्त नहीं करेंगे, यद्यपि वे उस पर विश्वास करते हैं। यह विश्वास का कैसा दयनीय स्वरूप है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रस्तावना" से)।

"मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों की शैतान की भ्रष्टता के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने में समर्थ हो सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रस्तावना" से)।

"कोई भी सक्रिय तौर पर परमेश्वर के नक्शेकदमों या उपस्थिति नहीं खोजता है और कोई भी परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण में नहीं रहना चाहता। परन्तु वे शैतान और दुष्टता की इच्छा पर भरोसा करने को तैयार रहते हैं ताकि इस संसार और दुष्ट मानवजाति के जीवन के नियमों का पालन करने के लिए अनुकूल बन जाएँ। इस बिन्दु पर, मनुष्य का हृदय और आत्मा शैतान के लिए बलिदान हो जाते हैं और वे उसके बने रहने का सहारा बन जाते हैं। इसके अलावा, मनुष्य का हृदय और आत्मा शैतान का निवास और उपयुक्त खेल का मैदान बन जाते हैं। इस प्रकार से, मनुष्य अनजाने में अपने मानव होने के नियमों की समझ, और मानव के मूल्य और उसके अस्तित्व के उद्देश्य को खो देता है। परमेश्वर से प्राप्त नियमों और परमेश्वर तथा मनुष्य के मध्य की वाचा धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय से क्षीण होती जाती है और मनुष्य परमेश्वर पर अपना ध्यान केन्द्रित करना या उसे खोजना बंद कर देता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, मनुष्य समझ नहीं पाता कि परमेश्वर ने मनुष्य को क्यों बनाया है, न ही वह परमेश्वर के मुख से निकलने वाले शब्दों को समझ पाता है या न ही जो कुछ परमेश्वर से होता है उसे महसूस कर पाता है। मनुष्य परमेश्वर के नियमों और आदेशों का विरोध करना प्रारम्भ कर देता है; मनुष्य का हृदय और आत्मा शक्तिहीन हो जाते हैं... परमेश्वर अपनी मूल रचना के मनुष्य को खो देता है, और मनुष्य अपने प्रारम्भ के मूल को खो देता है। यही इस मानवजाति का दुख है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है")।

"आज जहाँ पर मानवजाति है, वहाँ तक पहुँचने के लिए, उसे दसियों हज़ार साल लग गए। हालाँकि, मेरी मूल सृजन की मानवजाति बहुत पहले ही अधोगति में डूब गई है। वे पहले ही वैसे नहीं रहे हैं जैसा मैं चाहता हूँ, और इस प्रकार मानवजाति, जैसा वे मेरी आँखों में प्रतीत होते हैं, अब और मानव कहलाने योग्य नहीं हैं। बल्कि वे मानवजाति के मैल हैं, जिन्हें शैतान ने बंदी बना लिया है, चलती-फिरती सड़ी हुई लाशें हैं जिनमें शैतान रहता है और जिसमें वह आच्छादित रहता है। लोग मेरे अस्तित्व में थोड़ा सा भी विश्वास नहीं करते हैं, न ही वे मेरे आने का स्वागत करते हैं। मानवजाति मेरे अनुरोधों का, उन्हें अस्थायी रूप से स्वीकार करते हुए, केवल डाह के साथ उत्तर देती है, और जीवन के सुखों और दुःखों को मेरे साथ ईमानदारी से साझा नहीं करती है। चूँकि लोग मुझे अगम्य के रूप में देखते हैं, इसलिए वे मुझ पर, किसी सत्ताधारी का अनुग्रह प्राप्त करने का रवैया शुरू करते हुए, डाह से मुस्कुराने का दिखावा करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों को मेरे कार्य के बारे में ज्ञान नहीं है, वर्तमान में मेरी इच्छा को तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते हैं। मैं तुम लोगों के साथ ईमानदार रहूँगा: जब वह दिन आयेगा, तो हर वह व्यक्ति जो मेरी आराधना करता है उसका दुःख सहन करना तुम लोगों के दुःख सहन करने की अपेक्षा आसान होगा। मुझमें तुम्हारे विश्वास का अंश, वास्तव में, अय्यूब से अधिक नहीं है—यहाँ तक कि यहूदी फरीसियों का विश्वास भी तुम लोगों से कहीं बढ़कर है—और इसलिए, यदि आग का दिन उतरेगा, तो तुम लोगों के दुःख उन फरीसियों के दुःखों की अपेक्षा जब यीशु द्वारा डाँटे गए थे, उन 250 अगुओं के दुःखों की अपेक्षा जिन्होंने मूसा का विरोध किया था, और चिलचिलाती आग की लपटों के नीचे सदोम के दुःखों की अपेक्षा अधिक बढ़े हुए होंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है")।

"शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाने पर मनुष्य ने, परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी शत्रु बनते हुए, अपना धर्मभीरू हृदय गँवा दिया है और उस प्रकार्य को गँवा दिया जो परमेश्वर के सृजित प्राणियों में से एक के पास होना चाहिए। मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहा और उसने उसके आदेशों का पालन किया; इस प्रकार, अपने प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई मार्ग नहीं था, और तो और अपने प्राणियों से परमेश्वरका भय प्राप्त करने में असमर्थ था। मनुष्य परमेश्वर के द्वारा सृजित था, और उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, परंतु मनुष्य ने वास्तव में परमेश्वर की ओर पीठ फेर दी और शैतान की आराधना की। शैतान मनुष्य के हृदय में प्रतिमा बन गया। इस प्रकार, परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसने मनुष्य के सृजन के अपने अर्थ को खो दिया, और इसलिए मनुष्य के सृजन के अपने अर्थ को पुनर्स्थापित करने के लिए उसे अवश्य मनुष्य की मूल समानता को पुनर्स्थापित करना चाहिए, और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुड़ाना चाहिए। शैतान से मनुष्य को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे अवश्य मनुष्य को पाप से बचाना चाहिए। केवल इसी तरह से वह धीरे-धीरे मनुष्य की मूल समानता को पुनर्स्थापित कर सकता है और मनुष्य के मूल प्रकार्य को पुनर्स्थापित कर सकता है, और अंत में अपने राज्य को पुनर्स्थापित कर सकता है। अवज्ञा के उन पुत्रों को अंतिम रूप से इसलिए भी नष्ट किया जाएगा ताकि मनुष्य को बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना करने दी जाए और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से जीने दिया जाए। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया है, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; चूँकि वह मनुष्य के मूल प्रकार्य को पुनर्स्थापित करना चाहता है, इसलिए वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के पुनर्स्थापित करेगा। अपना अधिकार पुनर्स्थापित करने का अर्थ है, मनुष्य से अपनी आराधना करवाना और मनुष्य से अपना आज्ञापालन करवाना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्य को जीवित रखवाएगा, और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं को नष्ट करवाएगा; इसका अर्थ है कि वह अपने हर अंतिम भाग को मानवजाति के बीच और मनुष्य द्वारा किसी भी प्रतिरोध के बिना बनाए रखेगा। जो राज्य वह स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। जिस मानवजाति की वह इच्छा करता है वह है जो उसकी आराधना करती है, जो पूर्णतः उसकी आज्ञा का पालन करती है और उसकी महिमा रखती है। यदि वह भ्रष्ट मानवजाति को नहीं बचाता है, तो मनुष्य का सृजन करने का उसका अर्थ व्यर्थ हो जाएगा; मनुष्यों के बीच उसका अब और अधिकार नहीं रहेगा, और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि वह उन शत्रुओं का नाश नहीं करता है जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा को प्राप्त करने में असमर्थ होगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना करने में समर्थ होगा। ये परमेश्वर का कार्य पूरा होने के प्रतीक हैं और उसकी महान उपलब्धियों की पूर्णता के प्रतीक हैं: मानवजाति में से उन सबको सर्वथा नष्ट करना जो उसके प्रति अवज्ञाकारी हैं, और जो पूर्ण किए जा चुके हैं उन्हें विश्राम में लाना" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")।

"तुम सिर्फ यह जानते हो कि यीशु अन्तिम दिनों के दौरान आयेगा, परन्तु वास्तव में वह कैसे आयेगा? तुम जैसा पापी, जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, और परिवर्तित नहीं किया गया है, या परमेश्वर के द्वारा सिद् नहीं किया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो अभी भी पुराने मनुष्यत्व के हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और यह कि परमेश्वर के उद्धार के कारण तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुमने अपने आपको नहीं बदला है तो तुम संत के समान कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता के द्वारा घिरे हुए हो, स्वार्थी एवं कुटिल हो, फिर भी तुम चाहते हो कि यीशु के साथ आओ – तुम्हें बहुत ही भाग्यशाली होना चाहिए! तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में एक चरण में चूक गए हो: तुम्हें महज छुड़ाया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें बदलने एवं शुद्ध करने के कार्य को करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुड़ाया गया है, तो तुम शुद्धता को हासिल करने में असमर्थ होगे। इस रीति से तुम परमेश्वर की अच्छी आशिषों में भागी होने के लिए अयोग्य होगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंध करने के परमेश्वर के कार्य के एक चरण को पाने का ससुअवसर खो दिया है, जो बदलने एवं सिद्ध करने का मुख्य चरण है। और इस प्रकार तुम, एक पापी जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में")।

"तुझे जानना होगा कि मैं किस प्रकार के लोगों की इच्छा करता हूँ; ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गई है, ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को गंदा करने की अनुमति नहीं दी गई है। हालाँकि तूने शायद अधिक कार्य किया है, और कई सालों तक कार्य किया है, फिर भी अन्त में तू दुखदाई रूप से मैला है—यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तू मेरे राज्य में प्रवेश करने की कामना करता है! संसार की नींव से लेकर आज तक, मैं ने कभी भी उन लोगों को अपने राज्य के लिए आसान मार्ग का प्रस्ताव नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरी खुशामद करते हैं। यह स्वर्गीय नियम है, और इसे कोई तोड़ नहीं सकता है! तुझे जीवन की खोज करनी ही होगी। आज, ऐसे लोग जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा वे पतरस के ही समान हैं: वे ऐसे लोग हैं जो अपने स्वयं के स्वभाव में परिवर्तनों की कोशिश करते हैं, और वे परमेश्वर के लिए गवाही देने, और परमेश्वर के प्राणी के रुप में अपने कर्तव्य को निभाने के लिए तैयार हैं। केवल ऐसे ही लोगों को सिद्ध बनाया जाएगा। यदि तू केवल प्रतिफलों की ओर ही देखता है, और अपने स्वयं के जीवन स्वभाव को परिवर्तित करने की कोशिश नहीं करता है, तो तेरे सारे प्रयास व्यर्थ होंगे—और यह एक अटल सत्य है!" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है")।

राज्य के युग के दौरान सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के कार्य के संबंध में, आइए हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के कुछ अंशों को पढ़ें।

"अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार की सच्चाइयों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सच्चाइयों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरूद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

"परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य उसे जाने, और उसकी गवाही को जाने। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर परमेश्वर के न्याय के बिना, मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को नहीं जानेगा जो कोई भी अपराध की अनुमति नहीं देता है, और परमेश्वर के बारे में अपनी पुरानी जानकारी को नई जानकारी में बदल नहीं सकता है। परमेश्वर की गवाही के लिए, और परमेश्वर के प्रबंधन की ख़ातिर, परमेश्वर अपनी सम्पूर्णता को सार्वजनिक बनाता है, इस प्रकार से मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान हासिल करने, अपने स्वभाव को बदलने, और परमेश्वर के सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन परमेश्वर के विभिन्न कार्यों के द्वारा प्राप्त होता है; मनुष्य के स्वभाव में इस प्रकार के परिवर्तन के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होगा, और परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं बन सकता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधनों से मुक्त करा लिया है, अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और परमेश्वर के कार्य के लिए वास्तव में एक मॉडल और नमूना बन गया है, सचमुच परमेश्वर के लिए गवाह बन गया है और परमेश्वर के हृदय के अनुसार व्यक्ति बन गया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं")।

"युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में, परमेश्वर का ताड़ना और न्याय का एक स्वभाव है, जो वह सब कुछ प्रकट करता है जो अधर्मी है, सार्वजनिक रूप से सभी लोगों का न्याय करता है, और उन लोगों को पूर्ण करता है, जो वास्तव में उससे प्यार करते हैं। केवल इस तरह का एक स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। बुरा बुरे के साथ रखा जाएगा, अच्छा अच्छे के साथ रखा जाएगा, और लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी चीजों का अंत प्रकट होगा, ताकि बुराई को दंडित किया जाएग और अच्छे को पुरस्कृत किया जाएगा, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन नागरिक बन जाएँगे। सभी कार्य धर्मी ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर रही है, केवल परमेश्वर का धर्मी स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय का है और जो अंत के दिनों दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूरा कर सकता है। केवल यह स्वभाव ही बुराई को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधर्मियों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है। … अंत के दिनों के दौरान, केवल धर्मी न्याय ही मनुष्य का वर्गीकरण कर सकता है और मनुष्य को एक नए राज्य में ला सकता है। इस तरह, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धर्मी स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं")।

"क्या अब तुम समझ गए कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? यदि तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने हेतु आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ, अन्यथा तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा किए जाने या परमेश्वर द्वारा उसके राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं परन्तु कभी भी शुद्ध नहीं किए जा सकते हैं, अर्थात्, जो न्याय के कार्य के बीच ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा नफ़रत किए जाएँगे और अस्वीकार कर दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप बहुत अधिक हैं, और अधिक दारुण हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हैं। इस प्रकार के लोग जो सेवा करने के योग्य भी नहीं है अधिक कठोर दण्ड प्राप्त करेंगे, ऐसा दण्ड जो इसके अतिरिक्त चिरस्थायी है। परमेश्वर किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखायी मगर फिर परमेश्वर को धोखा दिया। इस तरह के लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दण्ड के माध्यम से प्रतिफल प्राप्त करेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को प्रकट नहीं करता है? क्या मनुष्य का न्याय करने, और उसे प्रकट करने में यह परमेश्वर का उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन सभी को जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करते हैं दुष्टात्माओं से पीड़ित स्थान में भेजता है, इन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीरों को नष्ट करने देता है। उनके शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है, और ऐसा ही उनके लिए उचित दण्ड है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों, और झूठे कार्यकर्ताओं के हर एक पाप को उनकी अभिलेख पुस्तकों में लिखता है; फिर, जब सही समय आता है, वह उन्हें इच्छानुसार गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है, इन अशुद्ध आत्माओं को अपनी इच्छानुसार उनके सम्पूर्ण शरीरों को दूषित करने देता है, ताकि वे कभी भी पुनः-देहधारण नहीं कर सकें और दोबारा कभी भी रोशनी को नहीं देख सकें। वे पाखण्डी जिन्होंने किसी समय सेवकाई की किन्तु अंत तक वफादार बने रहने में असमर्थ हैं परमेश्वर द्वारा दुष्टों में गिने जाते हैं, ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, और उनकी उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बन जाएँ; अंत में, परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता है जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे हैं या जिन्होंने कोई भी प्रयास समर्पित नहीं किया है, और युगों के बदलने पर उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे पृथ्वी पर अब और अस्तित्व में नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य में मार्ग तो बिल्कुल नहीं प्राप्त करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहे हैं किन्तु परमेश्वर के साथ बेपरवाह ढंग से व्यवहार करने के लिए परिस्थितिवश मजबूर किए जाते हैं उनकी गिनती ऐसे लोगों में होती है जो परमेश्वर के लोगों के लिए सेवा करते हैं। ऐसे लोगों की छोटी सी संख्या ही जीवित बचती है, जबकि बहुसंख्य उन लोगों के साथ तबाह हो जाएँगे जो सेवा करने के भी योग्य नहीं हैं। अंत में, परमेश्वर उन सभी को जिनका मन परमेश्वर के समान है, लोगों को और परमेश्वर के पुत्रों को और साथ ही पादरी बनाए जाने के लिए परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत लोगों को, अपने राज्य में ले आएगा। परमेश्वर द्वारा अपने कार्य के माध्यम से प्राप्त किया गया आसव ऐसा ही होता है। जहाँ तक उनका प्रश्न है जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में पड़ने में असमर्थ हैं, वे अविश्वासियों में गिने जाएँगे। और तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका परिणाम क्या होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ जो मुझे कहना चाहिए; जिस मार्ग को तुम लोग चुनते हो वह तुम लोगों का लिया हुआ निर्णय होगा। तुम लोगों को जो समझना चाहिए वह है किः परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी का भी इंतज़ार नहीं करता है जो उसके साथ तालमेल बनाए नहीं रख सकता है, और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

"मैं सारे विश्व में खुले तौर पर अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करते हुए, अपने प्रचण्ड प्रकोप को इनके राष्ट्रों के ऊपर तेजी से फेंकूँगा, और जो कोई उनका उल्लंघन करता है उनको ताड़ना दूँगा:

जैसे ही मैं बोलने के लिए विश्व की तरफ अपने चेहरे को घुमाता हूँ, सारी मानवजाति मेरी आवाज़ को सुनती है, और उसके बाद उन सभी कार्यों को देखती है जिसे मैंने समूचे ब्रह्माण्ड में गढ़ा है। वे जो मेरी इच्छा के विरूद्ध जाते हैं, अर्थात्, जो मनुष्य के कार्यों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के अधीन नीचे गिर जाएँगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को लूँगा और उन्हें फिर से नया कर दूँगा, और मेरे कारण सूर्य और चन्द्रमा को नया बना दिया जाएगा—आकाश अब और वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था; पृथ्वी पर बेशुमार चीज़ों को फिर से नया बना दिया जाएगा। मेरे वचनों के माध्यम से सभी पूर्ण हो जाएँगे। विश्व के भीतर अनेक राष्ट्रों को नए सिरे से विभक्त कर दिया जाएगा और मेरे राष्ट्र के द्वारा बदल दिया जाएगा, जिसकी वजह से पृथ्वी के राष्ट्र हमेशा हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे और एक राष्ट्र बन जाएँगे जो मेरी आराधना करता हो; पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को नष्ट कर दिया जाएगा, और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। विश्व के भीतर मनुष्यों में, वे सभी जो शैतान से संबंध रखते हैं उनका सर्वनाश कर दिया जाएगा; वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं उन्हें जलती हुई आग के द्वारा नीचा दिखाया जाएगा—अर्थात्, उनको छोड़कर जो अभी इस धारा के अन्तर्गत हैं, बाकियों को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं बहुत से लोगों को ताड़ना देता हूँ, तो वे जो, भिन्न-भिन्न अंशों में, धार्मिक संसार में हैं, मेरे कार्यों के द्वारा जीत लिए जा कर मेरे राज्य में लौट आएँगे, क्योंकि उन्होंने एक श्वेत बादल पर सवार पवित्र जन के आगमन को देख लिया होगा। समस्त मानवता अपने-अपने स्वभाव का अनुसरण करेगी, और जो कुछ उसने किया है उससे भिन्न-भिन्न ताड़नाएँ प्राप्त करेगी। वे जो मेरे विरूद्ध खड़े हुए हैं सभी नष्ट हो जाएँगे; जहाँ तक उनकी बात है जिन्होंने पृथ्वी पर अपने कार्यों में मुझे शामिल नहीं किया है, वे, क्योंकि उन्होंने जिस प्रकार अपने आपको दोषमुक्त किया है, पृथ्वी पर मेरे पुत्रों और मेरे लोगों के शासन के अधीन निरन्तर बने रहेंगे। मैं अपने महान कार्य की समाप्ति की घोषणा करने के लिए पृथ्वी पर अपनी ध्वनि आगे करते हुए अपने आपको असंख्य लोगों और असंख्य राष्ट्रों के सामने प्रकट करूँगा, ताकि समस्त मानवजाति अपनी आँखों से देखे" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "छब्बीसवाँ कथन" से लिया गया)।

हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की भविष्यवाणियों और मनुष्य के लिए परमेश्वर के वादे के कुछ और अंशों को पढ़ेंगे ।

"राज्य में, सृष्टि की असंख्य चीज़ें पुनः जीवित होना और अपनी जीवन शक्ति फिर से प्राप्त करना आरम्भ करती हैं। पृथ्वी की अवस्था में परिवर्तनों के कारण, एक भूमि और दूसरी भूमि के बीच की सीमाएँ भी खिसकना शुरू करती हैं। पूर्व काल में, मैं भविष्यवाणी कर चुका हूँ : जब भूमि से भूमि विभाजित हो जाती है, और भूमि से भूमि संयुक्त हो जाती है, तो यही वह समय होगा जब मैं राष्ट्र को तोड़-फोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। इस समय, मैं सारी सृष्टि को फिर से नया करूँगा और समस्त ब्रहमाण्ड को पुनः-विभक्त करूँगा, इस प्रकार पूरे विश्व को व्यवस्थित रूप से रखूँगा, और इसकी पुरानी अवस्था को नए में रूपान्तरित कर दूँगा। यह मेरी योजना है। ये मेरे कार्य हैं। जब संसार के सभी राष्ट्र और लोग मेरे सिंहासन के सामने लौटते हैं, तो उसके बाद मैं स्वर्ग के सारी उपहारों को लेकर उन्हें मानवीय संसार को दे दूँगा, ताकि, मेरे कारण, वह बेजोड़ उपहारों से लबालब भर जाएगा" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "छब्बीसवाँ कथन" से लिया गया)।

"मेरे वचनों के पूर्ण होने के बाद, राज्य धीरे-धीरे पृथ्वी पर आकार लेने लगता है और मनुष्य धीरे-धीरे सामान्य हो जाता, और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे हृदय में राज्य स्थापित हो जाता है। उस राज्य में, परमेश्वर के सभी लोगों को सामान्य मनुष्य का जीवन वापस मिल जाता है। बर्फीली शीत ऋतु चली गई है, उसका स्थान बहारों के संसार ने ले लिया है, जहाँ साल भर बहार बनी रहती है। लोग आगे से मनुष्य के उदास और अभागे संसार का सामना नहीं करते हैं, और न ही वे आगे से मनुष्य के शांत ठण्डे संसार को सहते हैं। लोग एक दूसरे से लड़ाई नहीं करते हैं। एक दूसरे के विरूद्ध युद्ध नहीं करते हैं, वहाँ अब कोई नरसंहार नहीं होता है और न ही नरसंहार से लहू बहता है; पूरी ज़मीं प्रसन्नता से भर जाती है, और यह हर जगह मनुष्यों के बीच उत्साह को बढ़ाता है" (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "बीसवाँ कथन" से लिया गया)।

"जब मनुष्यजाति को उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित कर दिया जाता है, जब मानवजाति अपने संबंधित कर्तव्यों को पूरा कर सकती है, अपने स्वयं के स्थान को सुरक्षित रख सकती है और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं का पालन कर सकती है, तो परमेश्वर पृथ्वी पर लोगों के एक समूह को प्राप्त कर चुका होगा जो उसकी आराधना करते हैं, वह पृथ्वी पर एक राज्य स्थापित कर चुका होगा जो उसकी आराधना करता है। उसके पास पृथ्वी पर अनंत विजय होगी, और जो उसके विरोध में है वे अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा; इससे सब चीजों के सृजन का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा, और इससे पृथ्वी पर उसका अधिकार, सभी चीजों के बीच उसका अधिकार और उसके शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी पुनर्स्थापित हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक हैं। इसके बाद से मानवजाति विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी जो सही मार्ग का अनुसरण करता है। मनुष्य के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा, और एक अनंत जीवन में प्रवेश करेगा जो परमेश्वर और मनुष्य द्वारा साझा किया जाता है। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, वैसे ही पृथ्वी पर से विलाप ग़ायब हो जाएगा। उन सभी का अस्तित्व पृथ्वी पर नहीं रहेगा जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। केवल परमेश्वर और वे जिन्हें उसने बचाया है ही शेष बचेंगे; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे")।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद, हमने देखा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर और प्रभु यीशु एक ही हैं। वे दोनों ऊँचे सिंहासन पर खड़े देहधारी परमेश्वर हैं और मानवजाति से बात कर रहे हैं। वे दोनों जो प्रकट करते हैं वह परमेश्वर का स्वभाव और उसका पवित्र सार है। और इसमें, वे पूरी तरह से परमेश्वर के अधिकार और पहचान को प्रदर्शित करते हैं। फरीसियों के न्याय और प्रकाशन के प्रभु यीशु के वचनों और भ्रष्ट मानवजाति के न्याय और प्रकाशन से जुड़े सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से, हम देखते हैं कि परमेश्वर बुराई से नफ़रत करता है और मानवजाति की भ्रष्टता से घृणा करता है। हम परमेश्वर के धार्मिक और पवित्र स्वभाव को देखते हैं, और इसके अलावा, यह भी देखते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराई को समझता है। मानवजाति की भ्रष्टता उसके लिए उतनी ही जानी-पहचानी है जितनी कि उसके अपने हाथ का पीछे का हिस्सा। मानवजाति के लिए प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की फटकार और उसकी अपेक्षाओं से, हम मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाओं को देखते हैं, परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो ईमानदार हैं, और वह विशेष रूप से उन लोगों को आशीष देता है जो वास्तव में स्वयं को उसके प्रति समर्पित करते हैं। यह हमें मानवजाति के लिए परमेश्वर की चिंता और उसके उद्धार को दिखाता है। मानवजाति के लिए प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वादों से, हम मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखते हैं, साथ ही, हम उस अधिकार और सामर्थ्य को भी देखते हैं जिससे परमेश्वर मानवजाति के भाग्य को नियंत्रित करता है और सभी चीज़ों पर शासन करता है। प्रभु यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन का लहज़ा और बोलने के तरीके दोनों एक समान हैं, वे दोनों परमेश्वर के स्वभाव की अभिव्यक्ति हैं। यह पूरी तरह से परमेश्वर की पहचान और उनके सार को प्रदर्शित करता है। भाइयो और बहनो, आओ हम विचार करें: सृष्टिकर्ता के अलावा कौन संपूर्ण मानवजाति के लिए वचनों को व्यक्त कर सकता है? कौन सीधे परमेश्वर की इच्छा को व्यक्त कर सकता है, और मानवजाति से माँग कर सकता है? कौन मनुष्यों का अंत तय कर सकता है? किसी इंसान के जीने या मरने को कौन नियंत्रित कर सकता है? कौन ब्रह्मांड के सितारों को नियंत्रित कर सकता है, और सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रख सकता है? परमेश्वर के अलावा, कौन भ्रष्ट मानवजाति के सार की सच्चाई की प्रकृति को जान सकता है? और कौन हमारे दिल की गहराइयों में छुपी शैतानी प्रकृति को प्रकट कर सकता है? कौन अंत के दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य को पूरा कर सकता है और हमें शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचा सकता है? केवल सृष्टिकर्ता के पास ही इस तरह का अधिकार और सामर्थ्य है! सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पूरी तरह से परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार और पहचान को प्रदर्शित करते हैं। भाइयो और बहनो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद, हम सभी को अपने दिलों में इस तरह की पुष्टि महसूस होती है: ये सभी वचन परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए हैं, ये परमेश्वर की वाणी हैं। ये सभी अंत के दिनों के न्याय के कार्य के दौरान मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता द्वारा व्यक्त किए गए सत्य हैं। हमारे दिलों में, तुरंत परमेश्वर के प्रति सच्चा सम्मान पैदा हो जाता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, क्या आपको भी वही अनुभूति होती है? यह पर्याप्त रूप से साबित करता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और प्रभु यीशु के वचन एक ही स्रोत से आये हैं। ये दोनों एक ही पवित्रात्मा की अभिव्यक्ति हैं। ये विभिन्न युगों में मानवजाति के लिए एक ही परमेश्वर के कथन हैं। अंत के दिनों के दौरान, सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य की नींव के आधार पर, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति के उद्धार और शुद्धिकरण के लिए सभी सत्यों को व्यक्त करता है, और मानवजाति के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना के सभी रहस्यों को प्रकट करता है। साथ ही, वह हमें सत्य के विभिन्न पहलुओं के सार के बारे में स्पष्ट रूप से बताता है। वह हमारी आँखें खोलता है, और हमें पूरी तरह से विश्वास दिलाता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन और कार्य ने प्रभु यीशु की सभी भविष्यवाणियों को पूरा और कार्यान्वित किया है। अंत के दिनों के न्याय के कार्य के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचनों में, हम परमेश्वर की वाणी को पहचानते हैं, और यह जान लेते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही प्रभु यीशु यानी एक सच्चे परमेश्वर की वापसी है, जिसने आकाश, पृथ्वी और सभी चीज़ों को बनाया है, जो अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए आता है। वह पृथ्वी पर शैतान के शासन यानी बुराई और अंधकार के युग का अंत करने, और पृथ्वी पर परमेश्वर के शासन यानी सहस्राब्दी राज्य के युग का शुभारंम करने के लिए आता है। और यह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की हमारी प्रिय इच्छा को सच करता है। भाइयो और बहनो, मुझे बताओ, क्या अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य ने प्रभु यीशु की सभी भविष्यवाणियों को पूरा किया है?

"प्रतीक्षा" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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