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सूचीपत्र

भले ही धार्मिक दुनिया पर पादरियों और एल्डर्स का शासन हो, और वे ऐसे पाखंडी हों जो फरीसियों के रास्ते पर चलते हों, उनके पापों का हमसे क्या सरोकार है? हालांकि हम उनका अनुसरण कर उनकी बात सुनते हैं, परंतु हम जिनमें विश्वास करते हैं वे प्रभु यीशु हैं, पादरी और एल्डर्स नहीं। मुझे लगता है कि हम फरीसियों के रास्ते पर नहीं चल रहे हैं। ऐसे फ़रीसी कैसे बन सकते हैं?

उत्तर: धर्म में बहुत-से लोग हैं जो फरीसियों में अंधा विश्वास करते हैं, उनकी आराधना और अनुसरण करते हैं। इसलिए वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह फरीसियों का रास्ता है या नहीं, यह बात उस बारे में सोचने पर स्पष्ट हो जाती है। आप कैसे कह सकती हैं कि आप फरीसियों की आराधना और बचाव करती हैं, मगर उनके पापों से आपका कोई सरोकार नहीं है? आपने कहा आप पाखंडी फरीसियों का अनुसरण करती हैं, लेकिन उन जैसी नहीं हैं, जो परमेश्वर का विरोध करे? क्या हम ऐसे आसान सवाल को भी नहीं समझ सकते हैं? आप जैसे इंसान का अनुसरण करती हैं वैसे ही रास्ते पर चलती हैं। अगर आप फरीसियों का अनुसरण करती हैं, तो आप फरीसियों के रास्ते पर चल रही हैं। अगर आप फरीसियों के रास्ते पर चलती हैं, तो जाहिर है आप फरीसियों जैसी इंसान ही हैं। इंसान जिसका अनुसरण करता है, जो रास्ता चुनता है, वो उसके स्वभाव से जुड़ा होता है। जो भी फरीसियों का अनुसरण करता है, उसका स्वभाव और सार भी फरीसियों जैसा ही होता है। यह ऐसी सच्चाई है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता! फरीसियों का सार पाखंड है। वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परंतु सत्य से प्रेम या जीवन की खोज नहीं करते। वे सिर्फ स्वर्ग में बैठे एक धुंधले परमेश्वर में, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में विश्वास करते हैं, मगर देहधारी मसीह में विश्वास नहीं करते। सच तो यह है कि वे सभी अविश्वासी हैं। उनका परमेश्वर में विश्वास करना धर्मशास्त्र में शोध करना और परमेश्वर में आस्था को शोध के ज्ञान की तरह समझना है। उनकी आजीविका बाइबल और धर्मशास्त्र पर शोध करने से चलती है। उनके दिलों में, बाइबल उनकी आजीविका है। वे मानते हैं कि बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्र के सिद्धांत को समझाने में वे जितने बेहतर होंगे, उतने ही ज़्यादा लोग उनकी आराधना करेंगे वे उतनी ही मजबूती से ऊँचे मंच पर खड़े हो पाएंगे, और उनका ओहदा उतना ही ज़्यादा स्थिर होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि फरीसी ऐसे लोग हैं जो सिर्फ अपने ओहदे और आजीविका के लिए जीते हैं, जो सत्य से उकता चुके हैं और उससे नफ़रत करते हैं, ऐसे कि जब प्रभु यीशु देहधारी होकर कार्य करने आये तो वे अड़ियल ढंग से अपनी धारणाओं, कल्पनाओं और बाइबल के ज्ञान से चिपके रहे, सिर्फ़ अपने ओहदों और आजीविका को बचाने की खातिर, वे प्रभु यीशु का विरोध और निंदा करने और परमेश्वर का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से हम फरीसियों के सत्य से नफ़रत करनेवाले सार और परमेश्वर-विरोध की जड़ को पूरी तरह समझ सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। …उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा")। "अधिकांश लोग जो वास्तविकता की खोज नहीं करते हैं वे देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, मसीह विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक प्रकट सत्य नहीं है? अतीत में, जब परमेश्वर को अभी देहधारी बनना बाकी था, तो तुम कोई धार्मिक व्यक्ति, या कोई श्रद्धालु विश्वासी रहे होगे। परमेश्वर के देहधारी हो जाने के बाद, इस प्रकार के कई श्रद्धालु विश्वासी अनजाने में मसीह विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो कि यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तुम वास्तविकता पर ध्यान नहीं देते हो या सत्य की खोज नहीं करते हो, बल्कि इसके बजाय तुम झूठ से ग्रस्त हो जाते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है? देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तो क्या वे सभी जो देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं मसीह विरोधी नहीं हैं?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं")। इससे पता चलता है कि धार्मिक फरीसी सत्य से तंग आकर उससे नफ़रत करते हैं। वे सिर्फ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में विश्वास करते हैं। वे सिर्फ शोध से बने धर्मशास्त्र के सिद्धांतों में भरोसा करते हैं, लेकिन देहधारी मसीह या मसीह के द्वारा व्यक्त सत्य में विश्वास नहीं करते। वे सभी देहधारी परमेश्वर के दुश्मन हैं। वे सब देहधारी परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य से बेनकाब हुए मसीह-विरोधी हैं! उनका अनुसरण करनेवाले लोग उन जैसे ही हैं, वे अपनी धारणाओं, कल्पनाओं, बाइबल के ज्ञान और सिद्धांतों से जकड़े रहते हैं। वे मसीह को नकारने, उनका विरोध और निंदा करने में उन लोगों का अनुसरण करते हैं, वे सत्य को अस्वीकार करते हुए मसीह को दुश्मन मान लेते हैं! ये तथ्य इस बात को साबित करने के लिए काफी हैं कि स्वभाव और सार में जो भी फरीसियों का अनुसरण करता है वह सत्य से उकता चुका है। जिस रास्ते पर वे चलते हैं, वह ठीक फरीसियों का रास्ता है। वे फरीसियों की श्रेणी के लोग हैं और मसीह का विरोध करते हैं! इस सच्‍चाई को परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य ने पूरी तरह उजागर कर दिया है!

धर्म में, सारे लोग फरीसियों के मुताबिक परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सिर्फ़ उनकी बात मानते हैं। उन्हीं की तरह, वे भी सिर्फ बाइबल और धर्मशास्त्र का अध्ययन करते हैं, सिर्फ बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्र के सिद्धांत को समझने पर ध्यान देते हैं, और कभी भी सत्य को खोजने और प्रभु के वचनों पर अमल करने पर ध्यान नहीं देते। फरीसियों की तरह वे सिर्फ स्वर्ग में बैठे एक अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन अंत के दिनों के देहधारी मसीह—सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य चाहे जितने भी अधिकार और सामर्थ्य से भरे हों, फिर भी वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में बंधे रहकर सर्वशक्तिमान परमेश्वर का विरोध और निंदा करने में पादरियों और एल्डर्स का अनुसरण करते हैं। यह कहना बेकार है कि ऐसे लोग फरीसियों जैसे ही हैं, और फरीसियों के परमेश्वर-विरोधी रास्ते पर चल रहे हैं! भले ही ऐसे लोग फरीसियों का अनुसरण न करें, फिर भी वे फरीसियों जैसे लोग ही हैं, और फरीसियों के वंशज ही हैं क्योंकि उनका स्वभाव और सार वही है। वे सब नास्तिक हैं जिन्हें ख़ुद पर विश्वास है, मगर सत्य-प्रेमी नहीं हैं! वे मसीह-विरोधी हैं, जो सत्य से नफ़रत और परमेश्वर का विरोध करते हैं! जैसे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने बताया है: "ऐसे लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें विवेक की कमी होती है, जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे शैतान के साथ जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। और कोई कोई कह सकता है कि उनमें विवेक नहीं है, लेकिन वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहां सत्य नहीं है, ऐसा एक बार भी नहीं हुआ कि नाज़ुक समय पर वे कभी सत्य के पक्ष में खड़े हुए हों, ऐसा एक बार भी नहीं हुआ कि कभी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश की हो, तो क्या वाकई उनमें विवेक नहीं है? वे हमेशा शैतान के पक्ष में ही क्यों खड़े जाते हैं? वे कभी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते जो सत्य के पक्ष में सही और उचित हो? ऐसी स्थिति क्या वाकई उनकी क्षणिक दुविधा के कारण पैदा होती है? जिस व्यक्ति में विवेक की जितनी कमी होगी, वह सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पायेगा। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य व्यक्ति बुराई को गले लगाता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग शैतान की निष्ठावान संतान हैं? वे शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा क्यों बोलते हैं? उनका हर शब्द, हर कार्य, हर हाव-भाव पूरी तरह सिद्ध करता है कि वे कोई सत्य के प्रेमी नहीं हैं, बल्कि वे सत्य से घृणा करने वाले लोग हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जो सत्य का पालन नहीं करते, उनके लिये चेतावनी")। क्या यह सत्य नहीं है? जब धर्म में लोग पादरियों और एल्डर्स का अनुसरण करते हैं, तो वे न सिर्फ उनकी बात सुनते हैं, बल्कि उनकी रक्षा की भी कोशिश करते हैं; जैसे ही वे किसी को धार्मिक पादरियों और एल्डर्स को बेनकाब करते हुए सुनते हैं, ये लोग बेचैनी महसूस करते हैं, वे पादरियों और एल्डर्स के बचाव में सामने आ जाते हैं। फिर समस्या क्या है? क्या यह इस बात को साबित करने के लिए काफी नहीं है कि इनके दिलों में सिर्फ पादरी और एल्डर्स ही बसते हैं, परमेश्‍वर नहीं? इन लोगों के दिलों में, सभी धार्मिक पादरी और एल्डर्स का स्थान परमेश्वर से ऊँचा है। इससे किस समस्या का पता चलता है? जन मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है तो उनके बचाव में आनेवाले लोग ज्यादा नहीं होते। ऐसे लोग ज्यादा नहीं होते जो परमेश्वर के लिए खड़े होकर उनकी गवाही दे सकें! लेकिन जैसे ही धार्मिक पादरियों और एल्डर्स का फरीसी सार उजागर होता है, इतने सारे लोग क्यों उनकी ओर से नाइंसाफी का शोर मचाते हैं और उनके बचाव में सामने आ जाते हैं? इससे साबित होता है कि ये लोग फरीसियों के कर्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। वे मसीह-विरोधियों के अपराध में भागीदार हैं! यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे कोई नकार नहीं सकता!

"तोड़ डालो अफ़वाहों की ज़ंजीरें" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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