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अय्यूब शैतान को हराता है और परमेश्वर की नज़रों में एक सच्चा मनुष्य बन जाता है

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जब अय्यूब पहली बार अपनी परीक्षाओं से होकर गुज़रा, तब उसकी सारी सम्पत्ति और उसके सभी बच्चों को उससे ले लिए गया था, परन्तु परिणामस्वरूप वह नीचे नहीं गिरा या उसने ऐसा कुछ नहीं कहा जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप था। उसने शैतान के प्रलोभनों पर विजय प्राप्त कर ली थी, और उसने अपनी भौतिक सम्पत्ति संतान पर, और अपनी समस्त सांसारिक सम्पत्तियों को गँवाने की परीक्षा पर भी विजय प्राप्त कर ली थी, कहने का तात्पर्य है कि वह परमेश्वर के इन्हें उससे ले लेने का आज्ञापालन करने और इसकी वजह से परमेश्वर को धन्यवाद देने और उसकी स्तुति करने में समर्थ था। शैतान के प्रथम प्रलोभन के दौरान अय्यूब का बर्ताव ऐसा ही था, और परमेश्वर के पहले परीक्षण के दौरान भी अय्यूब की गवाही ऐसी ही थी। दूसरी परीक्षा में, शैतान ने अय्यूब को पीड़ा पहुँचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, और हालाँकि अय्यूब ने ऐसा दर्द सहा जिसे उसने पहले कभी नहीं सहा था, तब भी उसकी गवाही लोगों को विस्मित करने के लिए काफी थी। उसने एक बार फिर से शैतान को हराने के लिए अपनी सहनशक्ति, दृढ़ता, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का, और साथ ही परमेश्वर के प्रति अपने भय का उपयोग किया, और उसके आचरण और उसकी गवाही को एक बार फिर से परमेश्वर के द्वारा स्वीकृत किया गया और उसका समर्थन किया गया। इस प्रलोभन के दौरान, अय्यूब ने शैतान पर इस बात की घोषणा करने के लिए अपने वास्तविक आचरण का उपयोग किया कि देह की पीड़ा परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास और आज्ञाकारिता को पलट नहीं सकती है या परमेश्वर के प्रति उसकी भक्ति और भय को छीन नहीं सकती है; वह मृत्यु का सामना करने के कारण परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या अपने सिद्धता और खराई को नहीं छोड़ेगा। अय्यूब के दृढ़ संकल्प ने शैतान को कायर बना दिया, उसके विश्वास ने शैतान को कातर और काँपता हुआ बना दिया, शैतान के साथ उसकी ज़िन्दगी और मौत की जंग ने शैतान के भीतर अत्यंत घृणा और रोष उत्पन्न किया, उसकी सिद्धता और खराई ने शैतान की वो हालत कर दी कि वह उसके साथ और कुछ नहीं कर सकता था, कुछ इस तरह कि शैतान ने उस पर अपने आक्रमणों को त्याग दिया और यहोवा परमेश्वर के सामने अय्यूब पर अपने आरोपों को त्याग दिया। इसका अर्थ था कि अय्यूब ने संसार पर विजय प्राप्त कर ली थी, उसने देह पर विजय प्राप्त कर ली थी, उसने शैतान पर विजय प्राप्त कर ली थी, और उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली थी; वह पूरी तरह से और सर्वथा ऐसा मनुष्य था जो परमेश्वर का ही था। इन दो परीक्षाओं के दौरान, अय्यूब अपनी गवाही में अडिग रहा, और उसने वास्तव में अपनी सिद्धता और खराई को जीया, और उसने परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के अपना जीवन जीने के सिद्धान्तों के दायरे को व्यापक किया। इन दोनों परीक्षाओं से गुज़रने के पश्चात्, अय्यूब के भीतर एक समृद्ध अनुभव उत्पन्न हुआ, और इस अनुभव ने उसे और भी अधिक परिपक्व तथा तपा हुआ बना दिया, इसने उसे और मज़बूत, और दृढ़ निश्चय वाला बना दिया था, और इसने उसे सत्यनिष्ठा की सच्चाई और योग्यता के बारे में अधिक आत्मविश्वासी बना दिया जिसके प्रति वह दृढ़ता से स्थिर रहा। यहोवा परमेश्वर के द्वारा अय्यूब की परीक्षाओं ने उसे मनुष्य के लिए परमेश्वर की चिंता की एक गहरी समझ और बोध प्रदान किया, और उसे परमेश्वर के प्रेम की बहुमूल्यता को समझने दिया, जहाँ से परमेश्वर के लिए उसके भय में परमेश्वर के प्रति सोच-विचार और प्रेम को जोड़ दिया गया था। यहोवा परमेश्वर की परीक्षाओं ने न केवल अय्यूब को उससे दूर नहीं किया, बल्कि वे उसके हृदय को परमेश्वर के और निकट ले आयीं। जब अय्यूब के द्वारा सही गई दैहिक पीड़ा अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई, तो वह चिंता जो उसने परमेश्वर यहोवा की ओर से महसूस की थी उसने उसे अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा और कोई विकल्प नहीं दिया। ऐसे आचरण की योजना बहुत पहले से नहीं बनाई गई थी, बल्कि यह उसके हृदय के भीतर से परमेश्वर के लिए उसके सोच-विचार और प्रेम का एक स्वाभाविक प्रकाशन था, यह एक स्वाभाविक प्रकाशन था जो परमेश्वर के लिए उसके सोच-विचार और प्रेम से आया था। कहने का तात्पर्य है कि, क्योंकि उसने स्वयं से घृणा की थी, और वह परमेश्वर को यंत्रणा देने के लिए तैयार नहीं था, और वह परमेश्वर को कष्ट देना सहन नहीं कर सकता था, इसलिए उसका सोच-विचार और प्रेम निःस्वार्थता के स्तर तक पहुँच गया था। इस समय, अय्यूब ने परमेश्वर के लिए अपनी चिरकालिक आराधना, लालसा और परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति को सोच-विचार और प्रेम करने के स्तर तक उठा दिया। उसके साथ-साथ, उसने परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास और आज्ञाकारिता तथा परमेश्वर के भय को भी सोच-विचार और प्रेम के स्तर तक उठा दिया। उसने स्वयं को कोई ऐसा कार्य नहीं करने दिया जो परमेश्वर को हानि पहुँचा सकता था, उसने अपने आपको ऐसा आचरण करने की अनुमति नहीं दी जो परमेश्वर को ठेस पहुँचाता, और उसने अपने कारण परमेश्वर पर कोई दुःख, संताप, या अप्रसन्नता भी लाने की अनुमति नहीं दी। परमेश्वर की नज़रों में, हालाँकि अय्यूब वही पहले वाला अय्यूब था, फिर भी अय्यूब के विश्वास, उसकी आज्ञाकारिता और परमेश्वर के प्रति उसके भय ने परमेश्वर को सम्पूर्ण संतुष्टि और आनन्द पहुँचाया था। इस समय, अय्यूब ने उस सिद्धता को प्राप्त कर लिया था जिसे प्राप्त करने की परमेश्वर ने उससे अपेक्षा की थी, वह एक ऐसा मनुष्य बन गया था जो परमेश्वर की नज़रों में "सिद्ध और खरा" कहलाने के योग्य था। उसके धार्मिक कार्यों ने उसे शैतान पर विजय प्राप्त करने दी, और परमेश्वर की उसकी गवाही में उसे डटे रहने दिया। इसलिए, उसके धार्मिक कार्यों ने भी उसे सिद्ध बनाया, और उसके जीवन के मूल्य को ऊँचा किए जाने दिया, और किसी भी समय की तुलना में बढ़ कर होने दिया, और उसे शैतान के द्वारा उस पर हमला न किए जाने तथा और परीक्षा न लिए जाने वाला सबसे पहला मनुष्य बनने दिया। क्योंकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए शैतान के द्वारा उस पर आरोप लगाया गया था और उसे प्रलोभित किया गया था; क्योंकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए उसे शैतान को सौंपा गया था; क्योंकि अय्यूब धार्मिक था, इसलिए उसने शैतान पर विजय प्राप्त की और उसे हराया था, और वह अपनी गवाही में डटा रहा। अब से, अय्यूब एक ऐसा पहला व्यक्ति बन गया था जिसे फिर कभी शैतान को नहीं सौंपा जाएगा, वह सचमुच में परमेश्वर के सिंहासन के सामने आया, और उसने, शैतान की जासूसी या तबाही के बिना, परमेश्वर की आशीषों के अधीन प्रकाश में जीवन बिताया...। वह परमेश्वर की नज़रों में एक सच्चा मनुष्य बन गया था, उसे स्वतन्त्र कर दिया गया था ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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