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अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य का आवश्यक ज्ञान

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धर्मोपदेश और संगति

यदि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उन वचनों पर ईमानदारी से विचार कर पाएँ जो अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य के महत्व और सार को प्रकट करते हैं, तो हम पूरी तरह से यह स्वीकार कर पाएँगे कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु का कार्य छुटकारा दिलाने का कार्य था, और यह भ्रष्ट मानवजाति के लिए परिहार का कार्य था। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के सभी वचन और कार्य छुटकारे के कार्य के आसपास केन्द्रित थे, और यह सब कुछ लोगों से यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करवाने, अपने सभी पापों को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने आने, परमेश्वर की क्षमा प्राप्त करने, और परमेश्वर के सामने जीने के लिए उसके अनुग्रह पर भरोसा करने में सक्षम होने के लिए था। यह सब कुछ लोगों को परमेश्वर की ओर मुड़ने के बाद उसके द्वारा उन पर प्रदान किए गए समस्त अनुग्रह और आशीषों का आनंद लेने में समर्थ बनाने, यह समझने के लिए कि वह दया और प्रेम का परमेश्वर है, बार-बार उससे प्रार्थना करने, उसके द्वारा प्रदान किए गए अनुग्रह और आशीषों में रहने के लिए उसकी आराधना करने के लिए था। यह सब कुछ लोगों से सुसमाचार प्रसारित करवाने और यह पहचानने के बाद कि ईसा मसीह उद्धारकर्ता है परमेश्वर द्वारा उद्धार की गवाही दिलवाने के लिए, और यीशु के वादे को धारण करने और यह जानने में समर्थ बनाने के लिए था कि अंत के दिनों का उद्धार प्राप्त करने के लिए कैसे तैयारी करें। यह लोगों को इस बात को दिखाने के लिए पर्याप्त है कि प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग में जो किया वह पूरी तरह से मानवजाति को छुटकारा दिलाने का कार्य था। प्रभु यीशु को सलीब पर चढ़ाया जाना और पापबली बन जाना व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य से घनिष्ठता से जुड़ा है। व्यवस्था के युग में, इस्राएली परमेश्वर के नेतृत्व को जानते थे और जानते थे कि उसकी व्यवस्थाओं और आज्ञाओं का पालन कैसे करें, लेकिन मानवजाति की भ्रष्टता के कारण, वे तब भी, परमेश्वर के विरुद्ध पाप करते हुए और परमेश्वर का अपमान करते हुए, अक्सर व्यवस्थाओं और आदेशों का उल्लंघन करते थे। इससे लोगों को एहसास हुआ कि पाप क्या है, और पाप करना क्या है, ज्ञात हुआ कि लोग कौन से पाप करते हैं और पाप करने के बाद परमेश्वर की क्षमा प्राप्त करने के लिए बलिदान कैसे किया जाए। इस से, हम देख सकते हैं कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं और आदेशों से जो प्राथमिक परिणाम प्राप्त हुआ वह था लोगों को ज्ञात होना कि पाप क्या है, और पाप करने के बाद उन्हें बलिदान कैसे करने चाहिए ताकि उन्हें परमेश्वर द्वारा क्षमा किया जा सके। यही कारण है कि मानवजाति के लिए प्रायश्चित के कार्य को पूरा करने के लिए प्रभु यीशु अनुग्रह के युग में आया। यह वास्तव में बहुत ही सार्थक है। व्यवस्था के युग में, बलियाँ, होमबलियाँ, और मेल बलियाँ चढ़ाने से केवल एक पाप का समाधान होता था, और एक क्षमा प्रदान होती थी, किन्तु अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु एक शाश्वत, संपूर्ण पापबलि था, और उसने मानवजाति के सभी पापों को एक साथ अनंत काल के लिए क्षमा कर दिया। इसने लोगों को यह देखने दिया कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्यार कितना बड़ा है, और यह कि उसके स्वभाव में न केवल धार्मिकता, प्रताप और कोप शामिल है, बल्कि इसमें दया और प्रेम भी शामिल है, और विशेष रूप से जिस अनुग्रह को वह मनुष्य को प्रदान करता है वह विशाल और बहुतायत से है। एक बार जब लोगों के पापों को क्षमा कर दिया जाता है, तो वे उसके समस्त अनुग्रह का आनंद पहले के जैसे ही ले सकते हैं। यह देखा जा सकता है कि मानवजाति के लिए उसका प्रेम सच्चा है और उसका अनुग्रह वास्तव में महान और असीमित है। प्रभु यीशु न केवल भ्रष्ट मानवजाति के लिए एक पापबलि था और उस एक कार्य के साथ उसने मानवजाति के पापों को सदा के लिए क्षमा कर दिया, बल्कि उसने लोगों को एक दूसरे से प्यार करवाने, एक दूसरे के लिए सहिष्णुता रखने, दूसरों को सात गुणा सत्तर बार क्षमा करने, और साथ ही दूसरों को सदा के लिए क्षमा करने और अपने दुश्मनों के लिए प्रार्थना करने, और दूसरों से वैसा ही प्रेम करने जैसा स्वयं से करते हैं, के लिए अनुग्रह के युग की कई सच्चाइयों को सिखाया। उसने न केवल व्यवस्थाओं और आज्ञाओं को खत्म नहीं किया, बल्कि उसने व्यवस्था के युग के कार्य को पूर्ण बनाया, ताकि सभी लोग जो प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार करते थे ठीक से इकट्ठा हो सकें और परमेश्वर से प्रार्थना कर सकें, परमेश्वर की आराधना कर सकें, सुसमाचार को प्रसारित कर सकें और परमेश्वर की गवाही दे सकें—जो कि गवाही देना है। यह स्पष्ट है कि अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य का निर्माण पूरी तरह से व्यवस्था के युग में उसके कार्य की नींव पर किया गया था। प्रभु यीशु वास्तव में पापबलि बन गया और उसने मानवजाति के छुटकारे का कार्य प्राप्त कर लिया, और एक कार्यवाही में ही उन्हें परमेश्वर के सामने आने, उसकी प्रार्थना करने, और उसकी आराधना करने योग्य बनाते हुए, परमेश्वर का विरोध करने वाली भ्रष्ट मानवजाति के समस्त पापों को सदा के लिए क्षमा कर दिया। हालाँकि, प्रभु यीशु का एक पापबलि होना पूरी तरह से मानवजाति को बचाने और परमेश्वर की प्रबंधन योजना को पूरा करने के समान नहीं है। ईसाई धर्म में बहुत से लोग हैं जो विश्वास करते हैं कि सलीब पर प्रभु यीशु के “पूरा हुआ” कहने का अर्थ था कि उसने मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य पहले से ही पूरा कर लिया था। यह ग़लत है—यह एक मानवीय अवधारणा और कल्पना से अधिक कुछ नहीं है, जो यह दर्शाता है कि लोगों को परमेश्वर के कार्य की रत्ती भर भी समझ नहीं है। यदि छुटकारे के यीशु के कार्य ने मानवजाति को पूरी तरह से बचा लिया होता, तो आज के धार्मिक लोग लगातार प्रार्थना और अपने पापों को स्वीकार नहीं कर रहे होते, और प्रमुख संप्रदाय इतने उदास और वीरान नहीं होते जितना कि वर्तमान में है। प्रभु यीशु भी निश्चित रूप से “मैं शीघ्र आनेवाला हूँ” नहीं कहते। केवल प्रभु यीशु की वापसी, अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय और ताड़ना का कार्य ही मानवजाति को बचाने का पूरा कार्य है। न्याय और ताड़ना, काट-छाँट और व्यवहार, और परीक्षण और शुद्धिकरण के माध्यम से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति की भ्रष्टता के मुद्दे को हल कर रहा है ताकि वे शैतान के प्रभाव के बंधनों और बाधाओं को पूरी तरह से ख़त्म कर दें, और ऐसे लोग बन जाएँ जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन और आराधना करते हैं क्योंकि वे वास्तव में उसे जानते हैं। यह प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त तथ्य हैं कि छुटकारा दिलाने का प्रभु यीशु का कार्य अंत के दिनों में पूरी तरह से मानवजाति को बचाने के लिए सिर्फ परमेश्वर के लिए मार्ग प्रशस्त कर रहा था, और केवल अंत के दिनों में उसके कार्य को स्वीकार करके ही लोग पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। यह एक सर्वथा निर्विवाद तथ्य है।

छुटकारा दिलाने के प्रभु यीशु के कार्य ने इस्राएल में परमेश्वर के कार्य के दायरे का तेजी से विस्तार किया, और इसे पूरी तरह से अन्य जातियों की दुनिया और पृथ्वी के छोर तक विस्तारित कर दिया। इस तरह से परमेश्वर का कार्य अनुग्रह के युग में इस्रराएल से पूरी दुनिया तक फैला गया, और हर देश और हर क्षेत्र के कई लोग परमेश्वर के सामने आ गए, उन्होंने उससे प्रार्थना की और उसकी आराधना की। उसका नाम हर देश और हर क्षेत्र में फैल गया है। इससे यह स्पष्ट है कि मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की प्रबंधन योजना पहले से ही आधी पूरी की जा चुकी थी जबकि अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के लिए मार्ग भी प्रशस्त कर रही थी।

यदि अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य के सारभूत महत्व को एक वाक्य में संक्षिप्त किया जाना हो, तो यह होगा कि मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए देहधारी परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवजाति के लिए स्वयं की पापबलि चढ़ायी। अनुग्रह के युग के कार्य का सारभूत महत्व जो कि सबसे विशिष्ट है वह है "छुटकारा दिलाना।"

"धर्मोपदेशों का संग्रह—जीवन के लिए आपूर्"" से ""केवल परमेश्वर के कार्य के तीन चरण ही मानवजाति को बचाने के लिए उसका पूरा कार्य हैं" से

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