सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य का आवश्यक ज्ञान

51

धर्मोपदेश और संगति

अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य के महत्व के बारे में वचनों को पढ़ने के बाद, यदि तुम उन पर ईमानदारी से चिंतन कर सकते हो, तो तुम निश्चित रूप से अंत के दिनों में उसके कार्य के बारे में कुछ ज्ञान और समझ प्राप्त कर पाओगे। यदि तुम फिर वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक को पढ़ सकते हो, जिसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों में अपने कार्य के दौरान इसकी संपूर्णता में व्यक्त किया गया है और अंत के दिनों में उसके कार्य के कई वर्षों का अनुभव कर सकते हो, तो तुम निश्चित रूप से सचमुच समझने में समर्थ हो जाओगे कि मानवजाति को पूरी तरह से बचाने के लिए राज्य के युग में परमेश्वर का कार्य न्याय और ताड़ना है। इसके माध्यम से, तुम उद्धार प्राप्त कर सकते हो और पूर्ण बनाए जा सकते हो।

अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को समझने के लिए, तुम्हें सबसे पहले इस बात पर स्पष्ट अवश्य होना चाहिए कि वह अंत के दिनों में न्याय और ताड़ना का कार्य क्यों कर रहा है। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा छुटकारा दिलाने का कार्य पूरा करने के बाद, परमेश्वर के सभी चुने हुए लोग प्रभु यीशु के सामने आ सकते थे, अपने पापों को स्वीकार कर सकते थे और पश्चाताप कर सकते थे, और क्षमा किए जा सकते थे। वे परमेश्वर द्वारा उन्हें प्रदान किए गए बहुत से अनुग्रह का आनंद ले सकते थे, किन्तु एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो शैतान द्वारा मानवजाति की भ्रष्टता के बाद अपनी पापी प्रकृति की बाधाओं और बंधनों को ख़त्म करने में समर्थ था। यहाँ तक कि प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने और उनके पापों को क्षमा कर दिए जाने के बाद भी हर कोई पाप करता रहा। वे पाप करने और अपने पापों को स्वीकार करने के पुनरावर्ती चक्र में रहते थे। यही कारण है, कि भले ही उन सभी लोगों को जिन्हें प्रभु यीशु के द्वारा छुटकारा दिलाया गया था उनके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया था और उन्होंने परमेश्वर के द्वारा उन्हें प्रदान किए गए समस्त अनुग्रह का आनंद लिया था, किन्तु वे शैतानी प्रकृति की बाधाओं और बंधनों को ख़त्म करने में पूरी तरह से असमर्थ थे जो मानवजाति को पापीपन की ओर ले जाती है। यही कारण है कि सभी लोग दर्द में रोते हैं: ""मैं सच में अधम हूँ! मैं अपनी शैतानी प्रकृति की बाधाओं से अंतिम रूप से पीछा छुड़ाने और सच्चा उद्धार प्राप्त करने के लिए क्या कर सकता हूँ?"" यह स्पष्ट है कि भ्रष्ट मानवजाति के पास अपनी पापी प्रकृति का समाधान करने का कोई तरीका नहीं है, और कोई भी स्वयं को अपनी शैतानी पापी प्रकृति के नियंत्रण से मुक्त नहीं कर सकता है। वे सभी बारंबार पाप किए बिना और पाप के अंदर जिए बिना नहीं रह सकते हैं, यही कारण है कि यद्यपि भ्रष्ट मानवजाति के पापों को क्षमा कर दिया गया है, वे सामान्य मानवता जीने में असमर्थ हैं, इसलिए वे कैसे एक सच्चा मानव जीवन जी सकते हैं? यह परमेश्वर के सभी चुने हुए लोगों का वास्तविक अनुभव है जिन्होंने अनुग्रह के युग में परमेश्वर के छुटकारा दिलाने के कार्य को स्वीकार किया था। इसलिए न्याय और ताड़ना का कार्य जिसे देहधारी परमेश्वर अंत के दिनों में व्यक्तिगत रूप से करता है वह भ्रष्ट मानवजाति को उनकी शैतानी पापी प्रकृति से पूरी तरह से बचाने और उनके जीवन स्वभाव को रूपान्तरित करने का कार्य है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर मानवजाति को पूरी तरह से बचाने के लिए न्याय और ताड़ना के सभी सत्यों को व्यक्त करता है। वह न केवल भ्रष्ट मानवजाति की शैतानी प्रकृति और उनकी भ्रष्टता की सच्चाई के सार को उजागर करने और न्याय करने के लिए अपने वचनों में सच्चाई का उपयोग करता है, बल्कि वह लोगों के शैतानी स्वभाव का समाधान करने और उसे रूपान्तरित करने के लिए काट-छाँट और व्यवहार और परीक्षणों और शुद्धिकरण के तरीकों का भी उपयोग करता है। इससे भ्रष्ट मानवजाति को अपनी शैतानी प्रकृति और अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को वास्तव में पहचानने और असलियत में यह देखने की अनुमति मिलती है कि भ्रष्ट मानवजाति वास्तव में स्वार्थपरायणता और अधमता, धोखा और कुटिलता, लालच और बुराई और सत्य से ऊबा हुआ होना जैसे शैतानी स्वभावों से भरी है। काट-छाँट और व्यवहार किए जाने पर, और परीक्षणों और शुद्धिकरण के माध्यम से, लोग सत्य को समझ सकते हैं और परमेश्वर के कार्य को जान सकते हैं, जिससे मुद्दों पर उनके विचार, जीवन पर दृष्टिकोण, और मूल्य मूलभूत रूपान्तरण से गुजरते हैं, और उसके बाद उनके जीवन स्वभाव में परिवर्तन आएगा। ये सब अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के द्वारा लाये जाने वाले परिणाम हैं, और इसके द्वारा लाया जाने वाला रूपान्तरण उसकी अपेक्षा बहुत बड़ा है जो अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु में विश्वास करने के बाद पाप की क्षमा द्वारा लाया गया था। यह प्रमाणित करना पर्याप्त है कि यह अंत के दिनों में केवल परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना है जो पूरी तरह से मानवजाति को बचाने का कार्य है। इसके अतिरिक्त, भ्रष्ट मानवजाति के लिए शैतान के अंधेरे प्रभाव से पूरी तरह से अलग होने और सचमुच में परमेश्वर की ओर मुड़ने, उसका आज्ञापालन करने, और पूर्ण उद्धार प्राप्त करने के लिए उसके द्वारा प्राप्त किए जाने का कोई अन्य रास्ता नहीं है।

इससे पहले कि गहनता से भ्रष्ट मानवजाति को बचाया जा सके इन्हें परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से अवश्य गुज़रना चाहिए। इसका कारण यह है कि लोग बहुत गहराई तक भ्रष्ट हैं और वे पूरी तरह से शैतान के ज्ञान और दर्शनशास्त्रों के कब्ज़े में हैं और वे शैतानी स्वभावों से भरे हुए हैं। यह सिर्फ न्याय और ताड़ना पद्धति के माध्यम से है कि परमेश्वर मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने में समर्थ है, यही वजह है कि अंत के दिनों में न्याय के अपने कार्य को विकसित करने में, उसने सबसे पहले मानवजाति को जीतने के लिए सच्चाई व्यक्त की। जब परमेश्वर भ्रष्ट मानवजाति को पूरी तरह से जीतने के लिए सच्चाई का उपयोग करता है और वे सच में आश्वस्त हो जाते हैं, केवल तभी वे उसके सच्चे प्रकटन को देखेंगे, और केवल तभी वे परमेश्वर के सामने झुकने और पूरी तरह से पश्चाताप करने में समर्थ होंगे। उस समय, वे अंत में देखेंगे कि वे वास्तव में ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और इसकी वजह से वे अपने अहंकार और आत्म-अभिमान को जान लेंगे, जान लेंगे कि उनके हृदय में परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी जगह नहीं है, वे एक इंसान की समानता में बिल्कुल भी नहीं जी रहे हैं, और यह कि वे वास्तव में शैतान के द्वारा बहुत गहराई तक, बहुत दयनीय ढंग से भ्रष्ट किए गए हैं। यह केवल परमेश्वर के वचनों द्वारा मानवजाति पर विजय प्राप्त करने के बाद ही है कि वे वास्तव में शैतान के द्वारा उनकी भ्रष्टता की वास्तविकता और आवश्यक प्रकृति को समझ सकते हैं, और केवल तभी वे निष्कपटता से यह स्वीकार कर सकते हैं कि एक धर्म के भीतर उन सभी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, उन्हें बाइबिल में से कुछ ज्ञान और कुछ पत्रों और सिद्धांतों से अधिक समझ में नहीं आया, और यह कि उनके पास सच्चाई की वास्तविकता बिल्कुल भी नहीं है। वे वास्तव में गरीब, दयनीय, अंधे और नग्न हैं। केवल उस समय ही लोग परमेश्वर के सामने शांत रहना, औपचारिक रूप से उसके वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार और पालन करना शुरू कर सकते हैं, और परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर प्रवेश करना शुरू कर सकते हैं। यह परमेश्वर के न्याय और ताड़ना द्वारा प्राप्त विजय का पहला परिणाम है। यह ठीक व्यवस्था के युग के समान है, जब अय्यूब परीक्षणों से गुज़र रहा था और परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद, वह पूरी तरह से जीत लिया गया था। यदि लोग केवल परमेश्वर के वचनों द्वारा जीत लिए जाते हैं तो वे ऐसे लोग हैं जो सत्य को अंगीकार और स्वीकार करते हैं, और तब वे परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते में प्रवेश कर सकते हैं और ऐसे लोग बन सकते हैं जो बचाए जाने में सक्षम हैं। वे सभी जो अभी भी सत्य को नकार और सत्य से घृणा कर सकते हैं और परमेश्वर के कई वचनों को सुनने के बाद भी उसके शत्रु बन सकते हैं ईसा मसीह के शत्रुओं की श्रेणी से संबंधित हैं। उन्हें बचाए जाने का वास्तव में कोई मार्ग नहीं है, और वे लोग निष्कासन और दण्ड की वस्तुएँ होंगे। उद्धार परमेश्वर के वचनों द्वारा जीते जाने की नींव पर अवश्य निर्मित किया जाना चाहिए। ठीक जैसे कि परमेश्वर ने कहा है: "तुम लोगों को पता होना चाहिए कि मैं मानवजाति के अंदर से बुराई को पूरी तरह से समाप्त और नष्ट कर देना चाहता हूँ, ताकि वह मेरे कार्य में बाधा डालने की तो बात ही क्या, वह मेरा विरोध तक भी न कर सके। इस प्रकार, जहाँ तक कि लोगों का सवाल है, इसका अर्थ जीतना ही है।" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "एक वास्तविक मनुष्य का क्या अर्थ है" से)। "मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए यह वचनों के इस कार्य का प्रयोग किए जाने और उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, न्याय, ताड़ना और निर्दयी श्राप के प्रकटीकरण; और मनुष्य के विद्रोहीपन को ज़ाहिर करने और उसके विरोध का न्याय करने के द्वारा किया जाएगा; जिससे वह मनुष्य की अधार्मिकता और अशुद्धता को जान सके, जिसका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव पर विशेष ध्यान देने के लिए किया जाएगा। मुख्यतः, यह उन वचनों का प्रयोग होगा, जो मनुष्य को जीतते और उसे पूर्णत: कायल करते हैं।" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य (1)" से)।

ये परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के द्वारा प्राप्त प्रारंभिक परिणाम हैं, अर्थात्, उसके विजय के कार्य के परिणाम। परमेश्वर का लोगों को पूर्ण बनाना उन्हें जीतने की नींव पर बनाया जाता है, और यदि वे जिन्हें जीत लिया जाता है सत्य की खोज करने और न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के सभी कार्यों का पालन करने में समर्थ होते हैं, तो वे पहले से ही बचाए और पूर्ण बनाए जाने के रास्ते पर कदम उठा चुके होते हैं। हर एक को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि भ्रष्ट मानवजाति इतनी अहंकारी, आत्म-अभिमानी, स्वेच्छाचारी, और तर्क के अभाव वाली केवल इसलिए है क्योंकि उन्हें कभी भी जीता नहीं गया है। उनमें आत्म-ज्ञान का पूरी तरह से अभाव है और उन्होंने पागलपन के इस अंश तक परमेश्वर को इनकार किया है और उसका विरोध किया है, यही वजह है कि केवल परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुज़र कर ही भ्रष्ट मानवजाति शुद्धि और उद्धार प्राप्त कर सकती है। भ्रष्ट मानवजाति को बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने के लिए यही एकमात्र रास्ता भी है।

भ्रष्ट मानवजाति के लिए परमेश्वर का न्याय और ताड़ना पूरी तरह से उसके धार्मिक स्वभाव को प्रकट करता है, और यह उनके लिए परमेश्वर को जानने का एक अद्भूत अवसर लाता है। यदि वे उसके न्याय और ताड़ना से नहीं गुज़रते हैं, तो वे कभी भी उसके धार्मिक स्वभाव को जानने में समर्थ नहीं होंगे। एक बार जब वे उसकी धार्मिकता, प्रताप और कोप के न्याय और ताड़ना से गुज़र जाते हैं, तो वे केवल तभी इस सच्चाई को महसूस कर सकते हैं कि उसका स्वभाव किसी भी अपमान को सहन नहीं करेगा, और स्वयं अनुभव करेंगे कि परमेश्वर लोगों के अंतरतम हिस्सों की खोज करने और उन सभी के हृदयों पर नज़र रखने में वास्तव में समर्थ है, यह कि वह लोगों के भ्रष्ट सार और शैतानी प्रकृति से अच्छी तरह से परिचित हैं, और परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को भी समझता है। क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर सकते हैं, इसलिए वे परमेश्वर के स्वभाव और सार का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, इस प्रकार उसके द्वारा मुक्ति और पूर्णता प्राप्त करते हैं। यह स्पष्ट है कि भ्रष्ट मानवजाति को बचाए जाने की प्रक्रिया परमेश्वर के प्रकटन को अंगीकार करने की प्रक्रिया है, और यह उसके धार्मिक स्वभाव को जानने की प्रक्रिया है।

भ्रष्ट मानवजाति के उद्धार प्राप्त करने और उसे पूर्ण बनाए जाने, तथा परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव जिसे उसने अंत के दिनों में अपने कार्य में प्रकट किया है, के बीच एक सीधा संबंध है। यह पूर्णतः परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को जानने और परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को पहचानने की वजह से है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग परमेश्वर से डर गए हैं और बुराई से दूर हो गए हैं, और यह विशेष रूप से परमेश्वर के स्वभाव को और उसके पास जो है और वह जो है उसे जानने से है कि उन्होंने उन सभी सत्यों को समझ लिया है जो उसने व्यक्त किए हैं। यही कारण है कि, धीरे-धीरे अपने जीवन में स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करते हुए, लोगों के चीज़ों पर दृष्टिकोण, जीवन पर दृष्टिकोण, और उनके मूल्य एक मौलिक परिवर्तन से गुज़रे हैं। यह एक तथ्य है जिसे कोई इनकार नहीं कर सकता है, और बिल्कुल ऐसा ही है जैसा परमेश्वर ने कहा था:

"लोगों ने ताड़ना एवं न्याय के कार्य के कारण उसके स्वभाव को देखा है, और इसलिए वे अपने अपने हृदय से उसका आदर करते हैं। परमेश्वर श्रद्धा एवं नमन योग्य है, क्योंकि उसका अस्तित्व एवं उसका स्वभाव उन सृजे गए प्राणियों के समान नहीं है, और वह उन सृजे गए प्राणियों से ऊपर है। परमेश्वर सृजा गया प्राणी नहीं है, और केवल वही आदर एवं समर्पण के योग्य है; मनुष्य इसके योग्य नहीं है" ("परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम")।

"मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय सदा बना रहेगा। सबसे पहले, मैं प्रेममय और करुणामय था, किन्तु यह मेरी पूर्ण दिव्यता का स्वभाव नहीं है; धार्मिकता, प्रताप और न्याय बस मेरे—स्वयं परमेश्वरके—स्वभाव हैं" ("आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ")।

"धार्मिकता ही पवित्रता है, और वह एक स्वभाव है जो मनुष्य के अपराध को सहन नहीं कर सकता है, और वह सब कुछ जो अशुद्ध है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है वह परमेश्वर की घृणा का पात्र है। परमेश्वर का धर्मी स्वभाव एक व्यवस्था नहीं है, किन्तु प्रशासनिक आज्ञा है: यह राज्य के भीतर एक प्रशासनिक आज्ञा है, और यह प्रशासनिक आज्ञा उस व्यक्ति के लिए सच्चा दण्ड है जिसके पास सत्य नहीं है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, और उद्धार की कोई गंजाइश नहीं है" (पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)।

"परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है" ("केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो")।

"चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए है। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं" ("तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए")।

"परमेश्वर ने अब आधिकारिक तौर पर लोगों को पूर्ण करना शुरू कर दिया है। पूर्ण किये जाने के लिए, लोगों को परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन, न्याय और ताड़ना से गुज़रना होगा, और उसके वचनों के परीक्षण और शुद्धिकरण का अनुभव करना होगा (जैसे कि सेवा करने वालों की परीक्षा)। इसके अलावा, लोगों को मृत्यु की परीक्षा का सामना करने में सक्षम होना होगा। यानी, जो परमेश्वर की इच्छा को वाकई पूरा करे, परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षणों के बीच में अपने हृदय की गहराई से उसकी प्रशंसा कर सकता है, और पूरी तरह से परमेश्वर का आज्ञापालन कर पाए और स्वयं को त्यागने में सक्षम हो पाए। इस प्रकार परमेश्वर को सच्चे हृदय , एकल-विचार और निर्मलता से प्रेम करे; ऐसा व्यक्ति पूर्ण है, और यही वह कार्य भी है जो परमेश्वर करना चाहता है, उस कार्य को निष्पादित करना चाहता है" ("परमेश्वर के कार्य के चरणों पर")।

"स्वर्ग का परमेश्वर बुराई की इस सबसे गंदी भूमि में आया है, और कभी भी उसने अपने कष्टों के बारे में शिकायत नहीं की है, या मनुष्य के बारे में गिला नहीं किया है, बल्कि वह चुपचाप मनुष्य द्वारा किये गए विनाश [1] और अत्याचार को स्वीकार करता है। कभी भी उसने मनुष्य की अनुचित मांगों का प्रतिकार नहीं किया, कभी भी उसने मनुष्य से अत्यधिक मांगें नहीं की, और कभी भी उसने मनुष्य से ग़ैरवाजिब तकाज़े नहीं किये; वह केवल बिना किसी शिकायत के मनुष्य द्वारा अपेक्षित सभी कार्य करता है: शिक्षा देना, ज्ञान प्रदान करना, डाँटना-फटकारना, शब्दों का परिशोधन करना, याद दिलाना, प्रोत्साहन देना, सांत्वना देना, न्याय करना, और प्रकट करना। उसका कौन-सा कदम मनुष्य के जीवन की खातिर नहीं है? यद्यपि उसने मनुष्यों की संभावनाओं और प्रारब्ध को हटा दिया है, परमेश्वर द्वारा उठाया गया कौन-सा कदम मनुष्य के भाग्य के लिए नहीं रहा हैं? उनमें से कौन-सा मनुष्य के अस्तित्व के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा कदम रातों की तरह काली अँधेरी ताकतों के उत्पीड़न और अत्याचार से मनुष्य को मुक्त करने के लिए नहीं रहा है? उनमें से कौन-सा मनुष्य की खातिर नहीं है? परमेश्वर के हृदय को कौन समझ सकता है, जो एक प्रेमपूर्ण मां की तरह है? कौन परमेश्वर के उत्सुक हृदय को समझ सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है” से “कार्य और प्रवेश (9)")।

"परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसके सम्पूर्ण स्वभाव में निहित है, और जब परमेश्वर का सम्पूर्ण स्वभाव तेरे ऊपर प्रकट होता है, तो यह तेरे देह पर क्या लेकर आता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव तुझे दिखाया जाता है, तेरा देह अनिवार्य रूप से अत्याधिक कष्ट सहेगा। यदि तू इस पीड़ा को नहीं सहेगा, तो तुझे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है, न ही तू परमेश्वर को सच्चा प्रेम अर्पित कर पाएगा। यदि परमेश्वर तुझे पूर्ण बनाता है, तो वह तुझे निश्चय ही अपना सम्पूर्ण स्वभाव दिखाएगा" ("केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है")।

"यद्यपि अभी तुम न्याय के कारण कुछ कष्ट और शुद्ध किए जाने से पीड़ित हो, यह कष्ट बहुमूल्य और अर्थपूर्ण है। यद्यपि मनुष्य के लिए ताड़ना और न्याय, शुद्धिकरण और निर्दयी प्रकटीकरण हैं, जो उसके पापों का दण्ड देने और उसके शरीर को दण्ड देने के लिए हैं, परन्तु इस कार्य का कुछ भी उसके शरीर की निंदा करने और नष्ट कर देने की इच्छा से नहीं है। वचन के समस्त गम्भीर प्रकटीकरण सही मार्ग पर तुम्हारा सन्दर्शन करने के उद्देश्य से हैं। तुम सब इस कार्य का बहुत कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर चुके हो, और स्पष्टतः, इस ने तुम्हारा सन्दर्शन बुरे मार्ग पर नहीं किया है! इसका सब कुछ तुम्हें एक सामान्य जीवनयापन करने के योग्य करने के लिए है; इसका सब कुछ वह है जो तुम्हारी सामान्य मानवता ग्रहण कर सकती है। इस कार्य के लिए उठाया गया प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारी वास्तविक कद-काठी के अनुसार है, और तुम सब पर कोई भी असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यद्यपि तुम अभी इसे स्पष्ट रीति से देखने में अयोग्य हो, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हूँ, यद्यपि तुम विचार करते रहते हो कि मैं प्रतिदिन तुम्हें ताड़ना देता और तुम्हारा न्याय करता और प्रतिदिन तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुम से घृणा करता हूँ, और यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो वह ताड़ना और न्याय है, वास्तव में तो वह सब तुम्हारे लिए प्रेम है और तुम्हारे लिए एक बड़ी सुरक्षा भी है" ("विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)")।

"मेरी धार्मिकता, महिमा और न्याय शैतान के प्रति कोई दया नहीं दिखाते हैं। किन्तु तेरे लिए लिए, वे तुझे बचाने के लिए हैं, फिर भी तू मेरे स्वभाव को समझने में अक्षम है, न ही तू मेरे कार्यकलापों के पीछे के सिद्धांतों को जानता है" ("आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ")।

"अंत में, वह समस्त विश्व में मनुष्यों के अंदर जो कुछ भी अशुद्ध और अधर्मी है उसे जला कर दूर कर देगा, ताकि उन्हें यह दिखाए कि वह न सिर्फ दया, करुणा, बुद्धि, आश्चर्य और पवित्रता का परमेश्वर है, बल्कि इससे भी अधिक, वह एक ऐसा परमेश्वर है जो मनुष्य का न्याय करता है। मानवजाति के बीच बुरों के लिए, वह प्रज्वलन, न्याय करने वाला और दण्ड है; जिन्हें पूर्ण किया जाना है उनके लिए, वह क्लेश, शुद्धिकरण, और परीक्षण, और साथ ही आराम, संपोषण, वचनों की आपूर्ति, व्यवहार करने वाला और काँट-छाँट है। और जिन्हें अलग कर दिया जाता है उनके लिए, वह सजा, और साथ ही प्रतिशोध भी है" ("देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं")।

"केवल सबसे अधिक पिछड़ी और गंदी जगह में परमेश्वर देह बन कर वह अपने पवित्र और धर्मी स्वभाव को संपूर्णता से प्रकट कर सकता है। और किसके माध्यम से उसका धर्मी स्वभाव प्रकट होता है? लोगों के पापों के न्याय, शैतान के न्याय, पापों के प्रति घृणा और शत्रुओं से नफ़रत के माध्यम से जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं" ("विजय के कार्य का दूसरा कदम किस प्रकार से फल देता है")।

"अपना सारा कोप दिखाने, अपना महान सामर्थ्य दिखाने, और अपनी पूरी बुद्धि दिखाने के लिए मेरे से जन्मे उस हर एक को मैं ताड़ित करूँगा जो अभी तक मुझे नहीं जानता है। मुझ में सब कुछ धार्मिक है और वहाँ बिल्कुल भी कोई अधार्मिकता नहीं है, कोई कपट नहीं है, और कोई कुटिलता नहीं है; जो भी कुटिल और कपटी है वह अवश्य नरक का पुत्र होना चाहिए—अधोलोक में पैदा होना चाहिए। मुझ में सब कुछ प्रकट है; जो कुछ भी मैं पूरा करने के लिए कहता हूँ वह पूरा हो जाता है और जो कुछ भी मैं स्थापित करने के लिए कहता हूँ वह स्थापित हो जाता है, और कोई भी इन चीजों को बदल या इनका अनुकरण नहीं कर सकता है क्योंकि मैं ही स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ" ("आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ")।

"यह इन्हीं न्यायों के कारण है कि तुम लोग यह देखने में सक्षम हो कि परमेश्वर धर्मी परमेश्वर है, कि परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है। यह उसकी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से है कि उसने तुम लोगों का न्याय किया है और तुम लोगों ने उसका कोप भुगता है। क्योंकि मानव जाति की विद्रोहशीलता को देखते समय वह अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट कर सकता है, और क्योंकि वह मानवता की गंदगी को देखते समय अपनी पवित्रता को प्रकट कर सकता है, इतना दिखाना पर्याप्त है कि वह परमेश्वर स्वयं है जो पवित्र है और बिना कलंक का है, लेकिन गंदगी की भूमि में भी रहता है" ("विजय के कार्य का दूसरा कदम किस प्रकार से फल देता है")।

"मैं धार्मिक हूँ, मैं वफादार हूँ, मैं ही वह परमेश्वर हूँ जो मनुष्य के अंतरतम हृदय की जाँच करता है!" ("आरंभ में मसीह के कथन और गवाहियाँ")।

"कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु इस ताड़ना और न्याय को सहने से बच नहीं सकता और कोई भी व्यक्ति और कोई भी वस्तु स्वभाव के द्वारा इस वर्गीकरण को टाल नहीं सकती; प्रत्येक को श्रेणीबद्ध किया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि समस्त वस्तुओं का अन्त निकट है और समस्त स्वर्ग और पृथ्वी अपने निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं। मनुष्य अपने अस्तित्व के अन्त से कैसे बच सकता है?" ("विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)")।

"हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है उस मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकता है। वे जो परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते हैं और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर के द्वारा दण्डित किए जाएँगे। वह जो परमेश्वर के कार्य की अवज्ञा करता है नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी राष्ट्र जो परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी देश जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए उठता है, वह इस पृथ्वी पर से मिटा दिया जाएगा; और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा" ("परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है")।

"मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है; यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति का तो बिल्कुल नहीं है, जिसने मानवजाति को उत्पन्न किया है। इसके विपरीत, यह मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीवित प्राणी का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानव जाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दण्ड से गुज़रेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी का सामना करेगी" ("अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए")।

"कि परमेश्वर की छवि को देहधारी छवि के माध्यम से मनुष्य को ज्ञात नहीं करवाया जाता है, बल्कि छवि और स्वरूप के देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से ज्ञात करवाया जाता है; और उसके (स्त्री/पुरुष) कार्य के माध्यम से, उसकी छवि को दिखाया जाता है और उसके स्वभाव को ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य का महत्व है जिसे वह देह में करने की इच्छा करता है" ("देहधारण का रहस्य (2)" से)।

"जो कुछ वह भीड़ पर प्रकट करता है वह केवल उसका धर्मी स्वभाव और उसके सभी कर्म हैं, और उसकी देह की छवि नहीं है जब वह दूसरी बार देहधारण करता है, क्योंकि परमेश्वर की छवि को केवल उसके स्वभाव के माध्यम से ही प्रदर्शित किया जा सकता है, और उसे उसके देहधारी देह की छवि के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। …जो कुछ भीड़ को दिखाया जाता है वह परमेश्वर की धार्मिकता और उसकी सम्पूर्णता में उसका स्वभाव है, उसके स्वरूप के बजाए जब वह दूसरी बार देह बनता है। यह न तो इकलौती छवि है जो मनुष्य को दिखायी जाती है, और न ही दो छवियों को संयुक्त किया गया है" ("देहधारण का रहस्य (2)")।

अंत के दिनों में लोगों को पूरी तरह से बचाने और पूर्ण बनाने के लिए न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के कार्य करने के तरीकों से यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि उसके द्वारा लोगों का उद्धार और लोगों की पूर्णता पूरी तरह से उसके धार्मिक स्वभाव को प्रकट करने के माध्यम से प्राप्त की जाती है। एक बार उसका धार्मिकता का स्वभाव, प्रताप, न्याय और कोप पूर्ण रूप से प्रकट हो जाता है, तो भ्रष्ट मानवजाति स्वाभाविक रूप से अपनी ही तरह के अनुसार कार्य करेगी। वे सभी जो सच्चाई से प्यार करते हैं और इसे स्वीकार करने में समर्थ हैं, न्याय और ताड़ना के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार और पालन करने में समर्थ होंगे, और तब वे उद्धार प्राप्त करेंगे और पूर्ण बनाए जाएँगे। वे सभी जो सच्चाई से घृणा करते हैं, जो सत्य से नफ़रत करते हैं, आदतन मसीह का विरोध, इनकार करेंगे, और मसीह की निंदा करेंगे, और वे अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य को अस्वीकार करेंगे। विशेष रूप से, धार्मिक दुनिया के विभिन्न पंथों और संप्रदायों के अधिकांश अग्रणी और पादरी ईसा मसीह की शत्रु ताकते बन जाएँगे जो मसीह का प्रतिरोध और विरोध करती हैं। यही कारण है कि वे उजागर कर दिए जाएँगे और छोड़ दिए जाएँगे, और अंत में उन्हें दण्ड के अधीन कर दिया जाएगा। परमेश्वर के प्रकोप के चरम पर वे उसके न्याय के विषय होंगे। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से दर्शाता करता है कि जहाँ भ्रष्टता विद्यमान है, वहाँ न्याय अवश्य होना चाहिए, और जहाँ पाप है, वहाँ ताड़ना अवश्य होनी चाहिए। यह परमेश्वर द्वारा आज्ञा दिया गया स्वर्ग का नियम है और कोई भी इससे बच कर निकल नहीं सकता है। भ्रष्ट मानवजाति परमेश्वर का विरोध करती है और उसके साथ विश्वासघात करती है, और यदि वे उसके न्याय और ताड़ना से नहीं गुज़रते हैं, तो यह परमेश्वर द्वारा सहन नहीं किया जाएगा। यही कारण है कि यह स्वर्ग का एक अटल सिद्धांत और परमेश्वर की अनुल्लंघनीय इच्छा है कि अंत के दिनों में भ्रष्ट मानवजाति परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुज़रे। मानवजाति अत्यंत गहराई तक भ्रष्ट है। वे सभी शैतान की संतान हैं, जिन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया। यदि परमेश्वर के प्रताप और कोप का न्याय और ताड़ना उन पर नहीं पड़ता, तो वे परमेश्वर के सामने कैसे पूरे समर्पण के साथ स्वयं साष्टांग प्रणाम कर सकते थे? और वे कैसे वास्तविक शुद्धिकरण और उद्धार प्राप्त कर सकते थे? यही कारण है कि परमेश्वर का धार्मिकता का स्वभाव, न्याय, ताड़ना और कोप जो कि अंत के दिनों में प्रकट होता है भ्रष्ट मानवजाति के लिए सबसे बड़ा उद्धार बन गया है, और यह मानवजाति के लिए निश्चित रूप से परमेश्वर का आशीष है। परमेश्वर का मानवजाति के लिए अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करना मनुष्य के लिए उसका सच्चा प्रेम और उसका पूरा प्रेम है।

"धर्मोपदेशों का संग्रह—जीवन के लिए आपूर्"" से ""केवल परमेश्वर के कार्य के तीन चरण ही मानवजाति को बचाने के लिए उसका पूरा कार्य हैं" से

सम्बंधित मीडिया