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अंत के दिनों का न्याय का परमेश्वर का कार्य अंततः विजेताओं का एक समूह बनाता है, इस प्रकार पूरी तरह बाइबल की प्रकाशितवाक्य की किताब की भविष्यवाणी को पूरा करता है। तो क्यों केवल अंत के दिनों का न्याय का परमेश्वर का कार्य ही सच्चे विजेताओं को बना सकता है?

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संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)।

"यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता... जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48)।

"जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है। जो जय पाए, मैं उसे उस जीवन के पेड़ में से जो परमेश्‍वर के स्वर्गलोक में है, फल खाने को दूँगा" (प्रकाशितवाक्य 2:7)।

"जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है। जो जय पाए, उस को दूसरी मृत्यु से हानि न पहुँचेगी" (प्रकाशितवाक्य 2:11)।

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन:

अंत के दिनों का कार्य, सभी को उनके स्वभाव के आधार पर पृथक करना, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को जिन्होंने उसके राज्य में प्रवेश कर लिया है अर्थात्, वे सभी लोग जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं, स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। हालाँकि, जब तक स्वयं परमेश्वर का युग नहीं आ जाता है तब तक परमेश्वर जो कार्य करेगा वह मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य जीवन के बारे में पूछताछ करना नहीं, बल्कि उनके विद्रोह का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी जिन्होंने आज के दिन तक परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण किया है वे हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आ गए हैं, इसलिए, हर एकेला व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है वह परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने की वस्तु है। दूसरे शब्दों में, हर कोई जो परमेश्वर के कार्य को इसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है वही परमेश्वर के न्याय की वस्तु है।

"मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से

अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार की सच्चाइयों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सच्चाइयों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरूद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए अबोधगम्य हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा निष्पादित होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है।

"मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य उसे जाने, और उसकी गवाही को जाने। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव पर परमेश्वर के न्याय के बिना, मनुष्य परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को नहीं जानेगा जो कोई भी अपराध की अनुमति नहीं देता है, और परमेश्वर के बारे में अपनी पुरानी जानकारी को नई जानकारी में बदल नहीं सकता है। परमेश्वर की गवाही के लिए, और परमेश्वर के प्रबंधन की ख़ातिर, परमेश्वर अपनी सम्पूर्णता को सार्वजनिक बनाता है, इस प्रकार से मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान हासिल करने, अपने स्वभाव को बदलने, और परमेश्वर के सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम बनाता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन परमेश्वर के विभिन्न कार्यों के द्वारा प्राप्त होता है; मनुष्य के स्वभाव में इस प्रकार के परिवर्तन के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होगा, और परमेश्वर के हृदय के अनुसार नहीं बन सकता है। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य ने स्वयं को शैतान के बंधनों से मुक्त करा लिया है, अंधकार के प्रभाव से मुक्त कर लिया है और परमेश्वर के कार्य के लिए वास्तव में एक मॉडल और नमूना बन गया है, सचमुच परमेश्वर के लिए गवाह बन गया है और परमेश्वर के हृदय के अनुसार व्यक्ति बन गया है।

"केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं" से

मैं पहले कह चुका हूँ कि पूर्व दिशा से जीतने वालों का एक समूह प्राप्त किया जाता है, ऐसे जीतने वाले जो महान क्लेश से गुजर कर आते हैं। ऐसे वचनों का क्या अर्थ है? उनका अर्थ है कि न्याय और ताड़ना, और व्यवहार और काँट-छाँट, और सभी प्रकार के शुद्धिकरण से गुजरने के बाद केवल ये प्राप्त कर लिए गए लोग ही वास्तव में आज्ञापालन करते थे। ऐसे व्यक्तियों का विश्वास अस्पष्ट और अमूर्त नहीं है, बल्कि वास्तविक है। उन्होंने किन्हीं भी संकेतों और चमत्कारों, या अचम्भों को नहीं देखा है; वे गूढ़ अक्षरों और सिद्धान्तों, या गहन अंर्तदृष्टि की बातें नहीं करते हैं; इसके बजाय उनके पास वास्तविकता और परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर की वास्तविकता का सच्चा ज्ञान है। क्या ऐसा समूह परमेश्वर की सामर्थ्य को स्पष्ट करने में अधिक सक्षम नहीं है?

"परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है" से

लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाने में एक दृष्टिकोण का होना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के काम के एक कदम पर भी शक नहीं करते हो, तो तुम मनुष्य के कर्तव्य को पूरा करते हो, तुम ईमानदारी के साथ उसे बनाए रखते हो जिसे परमेश्वर ने तुमसे अभ्यास में करवाया है, अर्थात्, तुम्हें परमेश्वर के उपदेश याद हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि वह अब क्या करता है तुम उसके उपदेशों को भूलते नहीं हो, , उसके काम के बारे में तुम्हें कोई संदेह नहीं है, तुम अपना दृष्टिकोण बनाए रखते हो, अपनी गवाही को बनाए रखते हो, और मार्ग के हर कदम में विजय प्राप्त करते हो, तो अंत में तुम परमेश्वर द्वारा एक जीतने वाले के रूप में पूर्ण कर दिए जाओगे। यदि तुम परमेश्वर द्वारा परीक्षणों के हर कदम में डटे रहने में सक्षम हो, और तुम तब भी बिल्कुल अंत तक डटे रह सकते हो, तो तुम एक जीतने वाले हो, और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

"तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए" से

राज्य के युग में मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण किया जाएगा। विजय के कार्य के पश्चात्, मनुष्य को परिष्करण एवं क्लेश के अधीन किया जाएगा। जो लोग विजय प्राप्त कर सकते हैं और इस क्लेश के दौरान गवाह के रूप में खड़े हो सकते हैं वे ऐसे मनुष्य हैं जिन्हें अन्ततः पूर्ण बनाया जाएगा; वे विजय प्राप्त करनेवाले लोग हैं। इस क्लेश के दौरान, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इस परिष्करण को स्वीकार करे, और यह परिष्करण परमेश्वर के कार्य की अन्तिम घटना है। यह वह अंतिम समय है जब परमेश्वर के प्रबंधन के समस्त कार्य के समापन से पहले मनुष्य को परिष्कृत किया जाएगा, और वे सब जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन्हें इस अंतिम परीक्षा को स्वीकार करना होगा, और इस अंतिम परिष्करण को स्वीकार करना होगा। ऐसे लोग जो क्लेश के द्वारा परेशान हो जाते हैं वे पवित्र आत्मा के कार्य एवं परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किन्तु ऐसे लोग जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर की खोज करते हैं वे अंततः दृढ़ता से स्थिर रहेंगे; वे ऐसे मनुष्य हैं जो विनम्रता एवं दीनता धारण करते हैं, और जो सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर क्या करता है, इन विजयी मनुष्यों को दर्शनों से वंचित नहीं किया जाएगा और वे अपनी गवाही में असफल हुए बिना अब भी सत्य को अभ्यास में लाएंगे। ये ऐसे मनुष्य हैं जो अंततः बड़े क्लेश से उभर कर निकलेंगे। यद्यपि वे जो अशांत समुद्र में मछली पकड़ते हैं वे आज भी भारमुक्त हो सकते हैं, फिर भी कोई भी मनुष्य अंतिम क्लेश से बचने के योग्य नहीं है, और कोई भी अंतिम परीक्षा से बच नहीं सकता है।

"परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

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