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परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना और साथ ही सभी तरह के उत्पीड़न और पीड़ा का अनुभव करने के बाद, अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा बनाए गए विजेता ज़बरदस्त गवाही देते हैं। तो यह गवाही किस चीज़ का उल्लेख करती है?

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संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"फिर मैं ने स्वर्ग से यह बड़ा शब्द आते हुए सुना, अब हमारे परमेश्‍वर का उद्धार और सामर्थ्य और राज्य और उसके मसीह का अधिकार प्रगट हुआ है, क्योंकि हमारे भाइयों पर दोष लगानेवाला, जो रात दिन हमारे परमेश्‍वर के सामने उन पर दोष लगाया करता था, गिरा दिया गया है। वे मेम्ने के लहू के कारण और अपनी गवाही के वचन के कारण उस पर जयवन्त हुए, और उन्होंने अपने प्राणों को प्रिय न जाना, यहाँ तक कि मृत्यु भी सह ली" (प्रकाशितवाक्य 12:10-11)।

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन:

पहले यह कहा गया था कि परमेश्वर इस समूह को चयनित और प्राप्त करेगा। वह तुम लोगों के भीतर जितना बड़ा काम करता है, उतना ही ज़्यादा तुम लोगों का प्रेम गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का काम जितना अधिक विशाल होता है, उतना ही अधिक उसकी बुद्धिमत्ता का स्वाद लेने में तुम लोग समर्थ होते हैं और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है। अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर की 6000 साल की प्रबंधन योजना का अंत हो जाएगा। क्या यह संभवतः ऐसे ही समाप्त हो सकती है, इतनी आसानी से? एक बार जब वह मानवजाति पर विजय प्राप्त कर लेगा, तो क्या उसका कार्य पूरा हो जाएगा? क्या यह इतना आसान हो सकता है? लोग कल्पना करते हैं कि यह बहुत ही साधारण है, परन्तु परमेश्वर जो करता है वह इतना आसान नहीं है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह परमेश्वर के कार्य का कौन सा भाग है, मनुष्य के लिए सब कुछ अथाह है। यदि तुम इसे मापने के योग्य होते, तो परमेश्वर के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाता। परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अथाह है, यह तुम्हारी अवधारणाओं से बहुत अधिक अनोखा भी है, और यह तुम्हारी अवधारणाओं से जितना ज़्यादा असंगत होता है, उतना ही ज़्यादा यह दर्शाता है कि परमेश्वर का कार्य अर्थपूर्ण है; यदि यह तुम्हारी अवधारणाओं के अनुरूप होता, तो यह अर्थहीन होता। आज, तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का कार्य अत्यंत अद्भुत है, और यह जितना अधिक अद्भुत होता है, उतना ही अधिक तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर अथाह है, और तुम देखते हो कि परमेश्वर के कर्म कितने महान हैं। यदि उसने मनुष्य को जीतने के लिए केवल सतही और बेपरवाह कार्य किए होते, और तब इतना ही किया होता, तो मनुष्य परमेश्वर के कार्य के महत्व को देखने में असमर्थ होता। यद्यपि आज तुम आज थोड़ा सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए बहुत लाभदायक है—और इसलिए ऐसी कठिनाईयाँ तुम लोगों के लिए सर्वथा आवश्यक है। आज, तुम थोड़ा सा शुद्धिकरण प्राप्त कर रहे हो, किन्तु बाद में तुम सचमुच में परमेश्वर के कार्यों को देखने में सक्षम होगे, और अंततः तुम कहोगेः 'परमेश्वर के कर्म बहुत ही अद्भुत हैं!' तुम्हारे हृदय में ये वचन होंगे। पल भर के लिए परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण (सेवा करने वालों की परीक्षा[ए] और ताड़ना के समय) का अनुभव करने के बाद, अंततः कुछ लोगों ने कहाः 'परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में कठिन है!' यह “कठिन” दर्शाता है कि परमेश्वर के कर्म अथाह हैं, कि परमेश्वर का कार्य अत्यधिक महत्व और मूल्य से सम्पन्न है, और मनुष्य के द्वारा संजोकर रखे जाने के बहुत ही योग्य है। यदि, मेरे इतना अधिक काम करने के बाद, तुम्हें थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं हुआ, तो क्या तब भी मेरे कार्य का कोई मूल्य हो सकता है? यह तुम से कहवाएगा: 'परमेश्वर की सेवा करना वास्तव में कठिन है, परमेश्वर के कर्म बहुत अद्भुत हैं, परमेश्वर सचमुच में विवेकी है!' वह बहुत प्यारा है! यदि, अनुभव की एक अवधि से गुज़रन के बाद, तुम ऐसे वचनों को कहने में समर्थ हो, तो इससे साबित होता है कि तुमने अपने में परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर लिया है। एक दिन, जब तुम सुसमाचार का प्रचार करने के लिए विदेश में हो और कोई तुमसे पूछता है: 'परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास कैसा है?' तो तुम यह कहने में सक्षम होगे: 'परमेश्वर के कार्य बहुत ही अद्भुत हैं!' जैसे ही वे तुम्हें यह कहते हुए देखेंगे, वे महसूस करेंगे कि तुम्हारे भीतर कुछ न कुछ है और यह कि परमेश्वर के कार्य वास्तव में अथाह हैं। यही वास्तव में गवाही धारण करना है। तुम कहोगे कि परमेश्वर का कार्य बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण है, और तुम में उसके कार्य ने वास्तव में तुम्हें आश्वस्त कर दिया है और तुम्हारे हृदय को जीत लिया है। तुम हमेशा उससे प्रेम करोगे क्योंकि वह मानवजाति के प्रेम से कहीं अधिक योग्य है! यदि तुम इन चीजों से बातचीत कर सकते को, तो तुम मनुष्यों के हृदयों को द्रवित कर सकते हो। यह सब कुछ गवाही धारण करना है। यदि तुम एक ज़बरदस्त गवाह होने में सक्षम हो, लोगों की आँखों में आँसू लाने में सक्षम हो, तो यह दर्शाता है कि तुम वास्तव में ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर से प्रेम करता है। यह इसलिए कि तुम परमेश्वर के प्रेम के लिए प्रेम के गवाह के तौर पर कार्य करने में सक्षम हो और परमेश्वर के कार्य तुम्हारे माध्यम से व्यक्त किया जा सकते हैं। और तुम्हारी अभिव्यक्ति के द्वारा, अन्य लोग उसके कार्यों की खोज कर सकते हैं, परमेश्वर का अनुभव कर सकते हैं, और वे अपने आप को किसी भी माहौल में क्यों ना पाएँ, उसमें वे अडिग रहने में समर्थ होंगे। केवल इस प्रकार से गवाही धारण करना ही वास्तविक रूप से गवाही धारण करना है, और यही अभी तुम से अपेक्षित है। तुम्हें कहना चाहिए कि परमेश्वर के कार्य बहुत ही अधिक मूल्यवान हैं और लोगों के द्वारा सँजो कर रखे जाने योग्य हैं, कि परमेश्वर बहुत ही बहुमूल्य है और अत्यधिक भरपूर है, वह न केवल बात कर सकता है, बल्कि इससे भी अधिक वह लोगों के हृदयों को शुद्ध कर सकता है, उनमें आनंद ला सकता है और उन्हें प्राप्त कर सकता है, उन्हें जीत सकता है, और उन्हें पूर्ण बना सकता है। अपने अनुभव के द्वारा तुम देखोगे कि परमेश्वर बहुत ही प्यार करने लायक हैं। तो अब तुम परमेश्वर को कितना प्रेम करते हो? क्या तुम अपने हृदय से इन बातों को वास्तव में कह सकते हो? जब तुम अपने हृदय की गहराईयों से इन वचनों को व्यक्त करने में सक्षम होगे तो तुम गवाही धारण करने में सक्षम हों जाओगे। एक बार तुम्हारा अनुभव इस स्तर तक पहुँच जाए, तो तुम ईश्वर के लिए गवाह होने में समर्थ हो जाओगे, और इसके योग्य हो जाओगे। यदि तुम अपने अनुभव में इस स्तर तक नहीं पहुँचते हो, तो तुम तब भी बहुत दूर होगे। शुद्धिकरण में तुममें कमजोरियाँ होना सामान्य बात है, परन्तु शुद्धिकरण के पश्चात् तुम्हें यह कहने में समर्थ होने चाहिएः 'परमेश्वर अपने कार्य में बहुत बुद्धिमान है!' यदि तुम वास्तव में इसकी व्यवहारिक पहचान को समझने में सक्षम हो, तो यह बहुमूल्य है, और तुम्हारा अनुभव मूल्यवान है।

"पूर्ण बनाए जाने वालों को शुद्धिकरण से अवश्य गुज़रना चाहिए" से

मनुष्य के भीतर परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य परस्पर क्रिया के समान प्रतीत होता है, जैसे कि यह मानव प्रबंधों के द्वारा उत्पन्न हुआ हो, या मानविक हस्तक्षेप के माध्यम से। परन्तु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाला सब कुछ, शैतान के द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी होती है और परमेश्वर के लिए एक दृढ़ गवाह बने रहने के लिए लोगों से अपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब की परीक्षा ली जा रही थी: पर्दे के पीछे, शैतान परमेश्वर के सामने शर्त लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कार्य थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। हर कदम के पीछे जो परमेश्वर ने शैतान के साथ बाज़ी में परमेश्वर ने तेरे लिए उठाए—उन सभी के पीछे एक युद्ध था। उदाहरण के लिए, यदि तू अपने भाइयों और बहनों के प्रति पक्षपातपूर्ण भावना रखता है, तो तेरे पास वे शब्द होंगे जो तू कहना चाहता है—वे शब्द जो परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाले हो सकते हैं—परन्तु यह तेरे लिए भीतरी तौर पर कठिन होगा, और इस क्षण में, तेरे भीतर एक युद्ध आरंभ होगा: क्या मैं बोलूँ या नहीं? यही एक युद्ध है। इस प्रकार से, सभी बातों में एक युद्ध होता है, और जब तेरे भीतर एक युद्ध चल रहा हो, तो भला हो तेरे वास्तविक सहयोग और पीड़ा का, परमेश्वर तेरे भीतर कार्य करता है। अंत में, अंदर तू मामले को एक तरफ रख पाता है और क्रोध स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाता है। परमेश्वर के साथ तेरे सहयोग का यही प्रभाव होता है। हर एक चीज़ जो तू करता है उसके प्रयासों के लिए तुझे एक कीमत चुकानी होती है। बिना वास्तविक कठिनाई के, तू परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता है, यह परमेश्वर को संतुष्ट करने के कुछ करीब तक भी नहीं पहुंचता है, और तुम केवल खोखले नारे लगा रहे हो! क्या ये खोखली बातें परमेश्वर को संतुष्ट कर सकती है? जब परमेश्वर और शैतान आत्मिक क्षेत्र में युद्ध करते हैं, तुझे परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए गवाही में तुझे किस प्रकार से दृढ़ खड़े रहना चाहिए? तुझे यह जानना चाहिए कि जो कुछ भी तेरे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर चाहता है तू उसके लिए एक गवाह बन। बाहरी तौर पर, ये एक बड़ी बात जैसी न दिखाई दें, परन्तु जब ये बातें होती हैं तब यह प्रकट होता है कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है या नहीं। यदि तू करता है, तो तू उसके लिए गवाही देते समय दृढ़ खड़ा रह पाएगा, और यदि तूने उसके लिए प्रेम को अभ्यास में नहीं लाया है, तो यह दिखाता है कि तू वह नहीं है जो सत्य को अभ्यास में लाता है, यह कि तू बिना सत्य के है, और बिना जीवन के भी है, कि तू भूसे के समान है! लोगों के साथ जो कुछ भी होता है यह तब होता है जब परमेश्वर लोगों से अपेक्षा रखता है कि वे उसके लिए गवाही के लिए दृढ़ बने रहें। इस क्षण में तेरे साथ कुछ भी बड़ा नहीं घटा है, और तू महान गवाही नहीं दे रहा है, परन्तु तेरे जीवन का प्रत्येक विस्तार परमेश्वर के लिए गवाही से सम्बन्ध रखता है। यदि तू अपने भाइयों और बहनों, परिवार के सदस्यों और अपने आसपास के प्रत्येक लोगों की प्रशंसा को जीत सके; यदि एक दिन, अविश्वासी आएं और जो कुछ तू करता है उसकी तारीफ करें, और देखें कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह अद्भुत होता है, तो तूने गवाही दे दी होगी। हालांकि तेरे पास कोई परिज्ञान नहीं है और तेरी क्षमता बहुत कम है, परमेश्वर द्वारा तुझे पूर्ण किए जाने के माध्यम से, तू उसे संतुष्ट करने के योग्य होता है और उसकी इच्छा को ध्यान में रखता है। अन्य लोग देखेंगे कि सबसे कम क्षमता के लोगों में उसने कितना महान कार्य किया है। लोग परमेश्वर को जानेंगे, और शैतान पर विजय प्राप्त करेंगे और एक हद तक परमेश्वर के प्रति वफादार बने रहेंगे। इसलिए इस समूह के लोगों के समान किसी और के पास इतना अधिक आधार नहीं होगा। यही सबसे महान गवाही होगी।

"केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से

आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक अपवित्र भूमि पर रहते हुए भी पवित्र बनने में समर्थ हो, और आगे फिर अपवित्र और अशुद्ध नहीं होगे , तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेते हो, और शैतान द्वारा ग्रसित और सताए नहीं जाते, और तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहते हो। यही गवाही है, और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, जो जीवन तुम जीते हो उसमें शैतान प्रकाशित नहीं होता, परंतु क्या यह वही है जो परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य इन्हें प्राप्त करे: सामान्य मानवता, सामान्य युक्तता, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर के प्रेम हेतु सामान्य संकल्पशीलता, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी मात्र की गवाही है। तुम कहते हो कि “हम अपवित्र भूमि पर रहते हैं, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुवाई के कारण क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है, हमने शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाई है। कि हम आज आज्ञा मान पाते हैं यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिये नहीं कि हम अच्छे हैं, या हम सहज भाव से परमेश्वर से प्रेम करते हैं। यह इसलिये है कि परमेश्वर ने हमें चुना, और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसलिए हम पर आज विजय पाई गई है, हम उसकी गवाही देने में समर्थ हुए हैं, और उसकी सेवा कर सकते हैं, ऐसा इसलिये भी कि उसने हमें चुना, और हमारी रक्षा की, इस कारण हमें शैतान के अधिकार से बचाया और छुड़ाया गया और हम गंदगी को पीछे छोड़ लाल अजगर के देश में शुद्ध हो सक हैं।

"विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से

मनुष्य के लिए अपने स्थायी प्रावधान एवं आपूर्ति के कार्य के दौरान, परमेश्वर मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण इच्छा एवं अपेक्षाओं को बताता है, और अपने कार्य, स्वभाव, एवं जो उसके पास है एवं जो वह है उन्हें मनुष्य को दिखता है। उद्देश्य यह है कि मनुष्य के डीलडौल को सुसज्जित किया जाए, और मनुष्य को अनुमति दिया जाए कि वह उसका अनुसरण करते हुए परमेश्वर से विभिन्न सच्चाईयों को हासिल करे— ऐसी सच्चाईयां जो हथियार हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिया गया है जिससे वह शैतान से लड़े। इस प्रकार से सुसज्जित होकर, मनुष्य को परमेश्वर की परीक्षाओं का सामना करना होगा। परमेश्वर के पास मनुष्य को परखने के लिए कई माध्यम एवं बढ़िया मार्ग हैं, परन्तु उनमें से प्रत्येक को परमेश्वर के शत्रु अर्थात् शैतान के “सहयोग” की आवश्यकता है। कहने का तात्पर्य है, मनुष्य को हथियार देने के बाद जिससे वह शैतान से युद्ध करे, परमेश्वर मनुष्य को शैतान को सौंप देता है और शैतान को अनुमति देता है कि वह मनुष्य के डीलडौल को “परखे।” यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचना को तोड़कर आज़ाद हो सकता है, यदि वह शैतान की घेराबंदी से बचकर निकल सकता है और तब भी जीवित रह सकता है, तो मनुष्य ने उस परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया होगा होगा। परन्तु यदि मनुष्य शैतान की युद्ध संरचना को छोड़कर जाने में असफल हो जाता है, और शैतान के आधीन हो जाता है, तो उसने उस परीक्षण को उत्तीर्ण नहीं किया होगा। परमेश्वर मनुष्य के किसी भी पहलु की जांच कर ले, उसकी जांच का मापदंड है कि मनुष्य अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर रहता है या नहीं जब शैतान के द्वारा उस पर आक्रमण किया जाता है, और उसने परमेश्वर को छोड़ा है या नहीं और शैतान की घेराबंदी के समय शैतान के प्रति समर्पित एवं अधीन हुआ है या नहीं। ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य को बचाया जा सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर होता है कि वह शैतान पर विजय प्राप्त करके उसे हरा सकता है या नहीं, और वह स्वतन्त्रता हासिल कर सकता है या नहीं यह इस बात पर निर्भर होता है कि वह शैतान के बन्धनों पर विजय प्राप्त करने के लिए, एवं शैतान से आशा का त्याग करवाने एवं उसे अकेला छोड़ने के लिए मजबूर करने हेतु अपने स्वयं के हथियारों को उठा सकता है या नहीं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा उसे दिया गया था। यदि शैतान आशा को त्याग देता है और किसी को छोड़ देता है, तो इसका अर्थ है कि शैतान इस व्यक्ति को परमेश्वर से लेने के लिए फिर कभी कोशिश नहीं करेगा, वह इस व्यक्ति पर फिर कभी दोष नहीं लगाएगा और हस्तक्षेप नहीं करेगा, वह फिर कभी मनमर्जी तरीके से उसको प्रताड़ित नहीं करेगा या उस पर आक्रमण नहीं करेगा; केवल इस प्रकार के व्यक्ति को ही सचमुच में परमेश्वर के द्वारा हासिल किया जाएगा। यही वह सम्पूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को हासिल करता है।

"परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से

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