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धार्मिक संसार हमेशा क्‍यों इतने पागलपन के साथ परमेश्वर के नए कार्य का विरोध निंदा करता है?

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दो बार जब धरती पर चलने और मानव को बचाने का कार्य पूरा करने के लिए परमेश्वर ने देह धरी है, उन्‍हें धार्मिक दुनिया के अग्रणियों के अत्यधिक विरोध, तिरस्कार और उन्‍मादी निंदा का सामना करना पड़ा है, यह एक ऐसा सत्य जिससे लोग उलझन और संक्षोभ में पड़े है: ऐसा क्यों है कि हर बार जब परमेश्वर एक नए कार्य के चरण की शुरुआत करते हैं, तो उन्‍हें इस तरह के बर्ताव का सामना करना पड़ता है? ऐसा क्यों है कि वे जो सर्वाधिक उन्‍माद और उग्रता के साथ परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे धार्मिक अग्रणीगण हैं जो बार—बार बाइबल पढ़ते हैं और जिन्होंने कई सालों तक परमेश्वर की सेवा की है? ऐसा क्यों है कि वे धार्मिक अग्रणीगण जिन्हें लोग सर्वाधिक धर्मनिष्ठ, विश्‍वासी और परमेश्वर के आज्ञाकारी मानते हैं, वे असल में परमेश्वर के अनुकूल नहीं हैं, बल्कि वे हमेशा विकृतिपूर्वक उनके शत्रु बन जाते हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर ने अपने कार्य में गलती की है? क्या यह हो सकता है कि परमेश्वर के कार्य विवेकपूर्ण नहीं है? निश्चित रूप से यह बात नहीं है! इस बात के दो मूल कारण हैं कि विभिन्न जातियों व संप्रदायों में ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करने, परमेश्वर का शत्रु बनने की भूमिका निभाने में सक्षम हैं, और ये हैं: सर्वप्रथम कि इन लोगों को सत्य का पता न होने और पवित्र आत्मा के कार्य की जानकारी न होने के साथ ही, इन्हें परमेश्वर का ज्ञान भी नहीं है, वे हमेशा परमेश्वर के कार्य, जो नित नूतन व कभी पुराने नहीं होते, का निरूपण करने के लिए बाइबल के अपने सीमित ज्ञान, आध्‍यामिक सिद्धांतों और लोगों की अवधारणाओं व कल्पनाओं पर हमेशा ही निर्भर रहते हैं; दूसरा, चूंकि मानवता शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट हो गई है, इसलिए इसकी प्रवृत्ति अहंकारी व घमंडी हो गई है, यह सत्य का पालन करने में सक्षम नहीं है और ये प्रतिष्ठा को विशेषरूप से महत्‍व देती है। इन दो पहलुओं के संयोजन की वजह से पूरे इतिहास में बार—बार सत्य के मार्ग को त्यागने व इसका विरोध करने की मानवता की त्रासदी हुई है।

दो हजार साल पहले का देखिए, जब प्रभु यीशु यहूदी लोगों के मध्‍य थे, तो उन्होंने कई चमत्कार किए थे, बीमारों को चंगा करके और दुष्ट आत्माओं को बाहर निकाल कर लोगों की मदद की थी, उन्होंने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रचार किया, लोगों को पश्चाताप करना सिखाया, और उनके पापों से उन्हें मुक्ति दी। ये वे सब बातें हैं जिन्हें पुराने नियम में दर्ज नहीं किया गया था, और यह ऐसा भी काम था जिसका पालन पहले कभी भी किसी ने नहीं किया था। बिल्कुल, यह ऐसा कुछ था जिसका पालन कोई नहीं कर सकता था, क्योंकि परमेश्वर के अलावा किसी के पास भी ऐसा करने का अधिकार व ताकत नहीं हैं। प्रभु यीशु ने उस समय जो किया था वह सलीब पर लटककर मनुष्‍य के पापों को निजी तौर पर मान लिया था ताकि मानव को पापों से बचाया व छुटकारा दिया जा सके, मनुष्‍य पर प्रचुर मात्रा में और बहुलता से आशीष न्‍यौछावर कर नए युग के कार्य के माध्यम से व्यवस्था के नियमों से मनुष्‍य को बाहर लाया जा सके, जब मानव सिर्फ इसलिए दंडित न किया जाए क्योंकि वह व्यवस्था का पालन करने में असक्षम है। इस व्यवस्था के तहत ये लोग केवल तभी परमेश्वर का उद्धार पा सकते हैं और नष्‍ट न होंगे जब वे प्रभु यीशु के कार्य का अनुसरण करेंगे। लेकिन यहूदियों के प्रमुख पुजारी, धर्मशास्त्री और फरीसी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं पहचानते हैं, वे नहीं समझते हैं कि प्रभु यीशु किस प्रकार से कार्य करते हैं, अपने मन में वे विश्‍वास रखते हैं: व्यवस्था का पालन नहीं करना, यहोवा परमेश्वर के नाम से प्रार्थना नहीं करना, परमेश्वर को धोखा देने के समान है, जो बिल्कुल बेतुका है। इसके अलावा, वे बाइबल के उत्साही पाठक और कई सालों तक मंदिर में यहोवा परमेश्वर के सेवक के रूप में अकड़ दिखाते हैं, और वे मानते हैं कि वे जिसका अनुसरण कर रहे हैं वही सत्य और सर्वाधिक शुद्ध मार्ग है, और इसलिए जहां तक वे विचार करते हैं, प्रभु यीशु का कार्य बाइबल के विरुद्ध जाता है और व्यवस्था का उल्लंघन करता है, वह बाइबल से बहुत भिन्‍न है, और इस वजह से वे प्रभु यीशु द्वारा प्रसारित किए गए मार्ग को स्वीकार करने के स्थान पर मरना पसंद करेंगे। वे प्रभु यीशु के कार्य को भी ‘विधर्मी’, एक ‘दुष्‍ट कुपंथ’ और उन्‍हें ‘धोखेबाज मनुष्‍य’ मानते हैं। भले ही प्रभु यीशु के कार्य व वचन में अधिकार, शक्ति व प्रबुद्धता है, भले ही प्रभु यीशु ने जो चमत्कार दिखाए वे इतिहास में अभूतपूर्व हैं, भले ही ज्यादा से ज्यादा लोग प्रभु यीशु के कार्यों के गवाह बनने के लिए आते हैं और इस सत्य के गवाह बनते हैं कि प्रभु यीशु ही वे मसीहा हैं जो आएंगे, वे फिर भी जांच—पड़ताल करने व उच्‍चतर मार्ग खोजने की इच्छा नहीं रखते हैं, बल्कि वे अपने दृष्टिकोण से चिपके रहते हैं, और गरदन अकड़ा कर वे साफ तौर पर मना कर देते हैं कि प्रभु यीशु ही मसीहा हैं, कि प्रभु यीशु ही वह मुक्तिदाता हैं जो आएंगे। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने प्रकाशित किया है: “मनुष्य केवल एक ही प्रकार का कार्य या एक ही प्रकार का अभ्यास स्वीकार करने में समर्थ है। मनुष्य के लिए ऐसे कार्य या अभ्यास के तरीकों को स्वीकार करना कठिन होता है, जो उनके साथ विरोधाभास प्रकट करते हैं, या उनसे उच्चतर हैं—परन्तु पवित्र आत्मा हमेशा नया कार्य कर रही है और इसलिए धार्मिक विशेषज्ञों के समूह के बाद समूह दिखाई देते हैं जो परमेश्वर के नए कार्य का विरोध करते हैंहो। ये लोग ठीक तरीके से “विशेषज्ञ” बन गए हैं क्योंकि मनुष्य के पास ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर किस प्रकार हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और परमेश्वर के कार्य के सिद्धान्तों का कोई ज्ञान नहीं है और इसके अधिक क्या, कि उन विभिन्न मार्गों का ज्ञान नहीं है जिनमें परमेश्वर मनुष्य को बचाता है। वैसे तो, मनुष्य यह बताने में सर्वथा असमर्थ है कि क्या यह वह कार्य है जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है, क्या यह परमेश्वर का कार्य है। कई लोग इस प्रकार के दृष्टिकोण से चिपके रहते हैं जिसमें, यदि यह पहले आए हुए वचनों के अनुरूप है, तब वे इसे स्वीकार करते हैं, और यदि पहले किए गए कार्य में कोई अंतर हैं, तब वे इसका विरोध करते हैं और अस्वीकार करदेते हैं।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है” से)। परमेश्वर में विश्वासी व्‍यक्ति के रूप में व्‍यवहार करने के लिए सबसे पहले हमारे पास एक ऐसा हृदय होना चाहिए जिसमें परमेश्‍वर के लिए सम्‍मान और धार्मिकता के लिए प्रबल आकांक्षा हो, केवल इसी तरीके से हम पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता हासिल करने, परमेश्वर के नए कार्य को समझने और परमेश्वर के पदचिन्‍हों का ध्‍यानपूर्वक अनुकरण करने में सक्षम हो पाएंगे। हालांकि यहूदियों के प्रमुख पुजारी, धर्मशास्त्री और फरीसी प्रभु यीशु के संपर्क में कई बार आए हैं, लेकिन कभी भी सिर्फ सत्य की खोज के लिए नहीं। हर बार वे प्रभु यीशु की परीक्षा लेने के लिए कोई युक्ति बनाते रहते हैं, प्रभु यीशु और कोई ऐसी चीज या तरीका जानने की कोशिश करते रहते हैं जिसे वे प्रभु यीशु के विरूद्ध उपयोग कर सकें। वे सभी एक ही प्रकार के हैं जिनके पास परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं, और वे सभी परमेश्वर के नए कार्य के बारे में धारणायें बना चुके हैं, जबकि नतनएल और सामरी महिला व अनुयायी और सामान्य लोग जो प्रभु यीशु का अनुसरण करते हैं वे सत्य खोजने के लिए अपनी धारणाओं को खारिज करने के लिए तैयार हैं। इस प्रकार से वे प्रभु यीशु की पहचान जानने, परमेश्वर की आवाज पहचानने, सत्‍य का पालन व उसे स्वीकार करने, और परमेश्वर के मुख के सामने वापस आने में सक्षम हुए हैं। इस तुलना से, हम साफ तौर पर यह देख सकते हैं कि यहूदियों की धार्मिक दुनिया में उच्च स्तर के व्यक्ति न केवल अड़ियल ढंग से रूढ़िवादी हैं, बल्कि बदतमीज और घमंडी भी हैं, वे आधारभूत रूप से सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, और निश्चित रूप से सत्य का पालन नहीं करते हैं। यह उनके द्वारा परमेश्वर के विरोध के कारणों में से एक है।

इसके अलावा, जैसे जैसे ज्यादा से ज्‍यादा सामान्य यहूदी लोगों ने प्रभु यीशु का अनुसरण करना शुरू किया, प्रमुख पुजारी, धर्मशास्‍त्री व फरीसी लोग आम लोगों के दिलों में अपना स्थान खोने को लेकर चिंतित होने लगे। लोगों के अब उनकी पूजा न करने या उनका अनुसरण न करने की वजह से, वे उत्‍तरोत्‍तर चिंतित होने लगे, क्योंकि प्रभु यीशु के वचनों व कार्य का अधिकार व शक्ति उनकी पहुंच से बाहर की है, जिस वजह से वे तुलना में फीके हो गए, वे खुद से शर्मिंदा महसूस करने लगे, और इस प्रकार से उन्हें तेजी से संकट का बोध होने लगा: प्रभु यीशु अ्रगर एक और दिन भी जिंदा रह जाते तो और अधिक आम लोग उन्हें छोड़कर प्रभु यीशु का अनुसरण करने लगेंगे, फलत: मंदिर में कुछ ही लोग रह जाते और वे ऐसे जीवन का आनंद लेने में सक्षम नहीं होते, जो दूसरों के सहयोग से मुहैया की गर्इ है और जो अन्‍य लोगों से नायाब है। यह प्रभु यीशु को उनकी आंखों में सुई या उनकी देह में कांटे की तरह प्रतीत कराता है, और इसने उन्‍हें एक ऐसे शत्रु के रूप में परिवर्तित कर दिया जो उनके साथ एक ही दुनिया में नहीं रह सकते। अपने रूतबे को बचाने के लिए, उन्होंने वो सब सोचा जो वो कर सकते थे और प्रभु यीशु को गलत आरोपों में फंसाने के लिए हर प्रकार के घिनौने तरीकों का उपयोग किया।

उन्होंने प्रभु यीशु के कार्य की निंदा की और उसका विरोध किया, उन्होंने प्रभु यीशु को बदनाम किया और उन्‍हें कलंकित किया, यह कहा कि वे शैतानों को निकालने के लिए बालज़बूल पर भरोसा करते हैं, और उन्होंने प्रभु यीशु पर पवित्र स्थान और व्यवस्था के विरुद्ध बोलने के आरोप के झूठे गवाह भी पेश किए (प्रेरितों 6:10—14 देखें)। यहूदी लोगों के मध्‍य से प्रभु यीशु को मिटाने के लिए वे जो भी हो वो करने वाले थे, और अंत में उन्होंने निर्दयता के साथ उन्हें सलीब पर लटका दिया। जब प्रभु यीशु का पुनरूत्‍थान हुआ, तो वे अपने अनुयायियों के समक्ष प्रकट हुए, और सुसमाचार के अपने प्रसार के साथ वहां शक्ति व चमत्कार थे, तथ्य थे जो यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इस प्रकार से पवित्र आत्मा का कार्य होता है, कि यह पवित्र आत्मा द्वारा कायम रखा जाता है, और य​ह सत्य का मार्ग है! इन परिस्थितियों के तहत, वे प्रमुख पुजारी, धर्मशास्त्री व पाखंडी फिर इस पर विचार नहीं किए: प्रभु यीशु का सुसमाचार इतना अनुकूल कैसे हो सकता है? असल में, वे लोग जो बाइबल में दक्ष हैं और जो खुद को ‘सम्मानीय’ समझते हैं, वे बस यह महसूस करते हैं कि गांव के मछुआरों व सामान्य अज्ञानी लोगों, जिनके पास ज्ञान या प्रतिष्ठा नहीं है, उनके साथ ऐसी चीजों को खोजना व इनका अध्ययन करना उनके लिए योग्‍यता से कमतर है, और वे ‘व्यवस्था बनाए रखने और सच्चे मार्ग की रक्षा करने’ के नाम पर पाखंडपूर्वक काम भी करते हैं, जबकि वे प्रचारकों व प्रभु यीशु के अनुयायियों व सामान्य यहूदी लोगों को उग्रतापूर्वक दबाने, उनका उत्पीड़न करने व उनकी हत्‍या करने के उनके काम को तेज करने के लिए शासकों के साथ सांठ—गांठ करके अपनी उंगलियों की ताकत का दुरूपयोग जारी रखते हैं। वे प्रभु यीशु का अनुसरण करने से लोगों को रोकने के लिए अपनी शक्ति अनुसार सब कुछ करते हैं, यहां तक कि वे कठोरता के साथ प्रभु यीशु के नाम का प्रचार करने से हर किसी को प्रतिबंधित भी कर देते हैं। अपनी स्थिति और अपनी आजीविका को बचाने के लिए, ऐसा कोई अपराध नहीं है जो वे नहीं करेंगे, जो प्रभु यीशु को लेकर उनके उग्र विरोध व तिरस्कार का एक अन्य कारण भी है। निश्चित रूप से, उनके बुरे कर्मों ने परमेश्वर के भीषण क्रोध को उत्तेजित किया है, उन्होंने परमेश्वर के दंड को सहा है। पूरी यहूदी जाति लगभग 2,000 साल से एक पराजित राष्ट्र रही है, परमेश्वर का विरोध करने व उनका तिरस्कार करने के लिए यह एक दुखदायी मूल्‍य उन्‍होंने चुकाया है।

चलिए वर्तमान में वापस आते हैं जहां हम अंत के दिनों में हैं। परमेश्वर ने उन लोगों के लिए बृहत्तर उद्धार तैयार किया है जिन्हें उन्‍होंने मुक्ति दी है। इस उद्धार में परमेश्वर मानव जाति का फैसला करने और उन्‍हें स्वच्छ करने के लिए वचनों का प्रयोग कर रहे हैं। यह एक नया, उच्चतर कार्य है। इस स्तर का कार्य मनुष्‍य को उसकी शैतानी भ्रष्ट प्रवृत्ति से पूरी तरह मुक्ति दिलाएगा। यह मानव को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से स्वतंत्र करेगा और मानवता को उस जाति में बदलेगा जो परमेश्वर को जानती है, जो परमेश्वर के अनुकूल है और सच्चे मायने में परमेश्वर की है, जिसके बाद वह उद्धार हासिल करेगी और निपुण बनेगी। यह परमेश्वर की छ: हजार साल की प्रबंधन योजना में कार्य का अंतिम चरण है। परमेश्‍वर के अंत के दिनों के कार्य में, देहधारी मसीह ऐसे सभी प्रकार के सत्‍यों को व्‍यक्‍त करते हैं जो मनुष्‍य का शुद्धिकरण करते हैं व उसे बचाते हैं। वे मानव की भ्रष्ट सार और प्रकृति दिखाते हैं और उसका निर्णय करते हैं, और वे उस मार्ग को भी दिखाते हैं जिस पर मानव अपने भ्रष्टाचार को तोड़ने के लिए चल सकता है।

वह सब प्रकार के स्वर्गीय रहस्यों को भी प्रकट करते है। इसके अलावा, परमेश्वर दुनिया के सभी परिवारों तक अंत के दिनों के सुसमाचार का प्रचार करने के लिए अपनी प्रबुद्धता, ताकत व अधिकार का प्रयोग करते है, और वे लाखों लोग जो सत्य को खोजते हैं और उसके लिए लालायित हैं वे एक—एक करके विभिन्न धर्मों व पंथों से सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उ‍पस्थिति के समक्ष वापस आ गए हैं। इस पर्वत की ओर प्रवाहित हो रहे सभी देशों का एक अभूतपूर्व दृश्‍य उपस्थित हुआ है, और अंत के दिनों का सुसमाचार फिलहाल पूरी दुनिया के हर देश व हर स्थानों में विस्तार कर रहा है। हालांकि, इन सभी सत्यों, पवित्र आत्मा के कार्य के बड़े आश्चर्य व गवाही का सामना करते हुए, इस धार्मिक दुनिया के रहनुमाओं ने अपनी आंखें बंद कर ली है और उनसे थोड़े से भी प्रेरित नहीं हुए हैं, वे ध्यान से उनका अध्‍ययन नहीं कर रहे हैं, वे विनय के साथ उन्हें स्वीकार नहीं कर रहे हैं। ये लोग उन फरीसियों की तरह ही हैं, वे यह बात नहीं जानते हैं कि पवित्र आत्मा का कार्य लगातार आगे बढ़ता रहता है, वे यह नहीं जानते हैं कि पवित्र आत्मा के कार्य का सिद्धांत यह है कि यह हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, उन्हें अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत के बारे में थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं है, और यहां तक कि सख्त आत्मविश्वास के साथ वे यह मानते हैं कि: चूंकि वे पहले से ही एक ऐसे मार्ग का आनंद ले रहे हैं जो व्यवस्था के युग से ज्यादा ऊंचा है, चूंकि वे पूरी तरह से पुराने व नए विधान में दक्ष हैं और उन्होंने कई सालों तक धर्मोपदेश पर कार्य किया है और उसका प्रचार किया है, इसलिए वे सत्य व परमेश्वर का ज्ञान पा चुके हैं। इसके साथ ही, वे एक भ्रामक अवधारणा में अड़ियल ढंग से विश्वास करते हैं, जिसे वे सत्य मानते हैं: कि प्रभु के सभी वचन बाइबल में दर्ज हैं, यह कि अगर यह प्रभु यीशु के कार्य के कार्यक्षेत्र के बाहर जाता है, यह कि अगर वह बाइबल के परे जाता है, तो यह सही मार्ग नहीं है। अनुग्रह के युग में मानव का परमेश्वर की आवश्यकता से दूर हटना प्रभु यीशु की शिक्षा का उल्लंघन करना होगा, केवल वे बातें जो वे स्वीकार करते हैं, जिसकी उन्‍हें जानकारी है और जिस पर वे अवलंबित रहते हैं, इसके परे कुछ भी विधर्म या कुपंथ होगा। इन लोगों ने बाइबल के अंदर परमेश्वर को सुदृढ़ता के साथ चित्रित किया है, उन्होंने उन्‍हें धर्मों में और मानव की कल्पना के अंदर चित्रित किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ​चाहे कितना भी उच्च कार्य लेकर आए, पवित्र आत्मा का जितना भी कार्य उनके पास हो, वे अभ्यास के जितने भी तरीके लेकर आए, और उसे सत्यापित करने के लिए कितने भी तथ्य क्यों न हो, वे यह नहीं मानते हैं कि यह परमेश्वर की ओर से है, और इसलिए वे प्रभु यीशु की वापसी के लिए शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण व संदेहपूर्ण रवैया अपना रखते हैं, इस हद तक कि देहधारी परमेश्वर की निंदा करते हैं और अंत के दिनों में मसीहा के कार्य व वचन को नीचा दिखाते हैं। क्या ये उन पाखंडियों की तरह नहीं हैं, जो अपने समय में बेहद जिद्दी व रूढ़िवादी व अभिमानी और आत्म—अभिमानी थे, सत्य से मुख मोड़ लेते थे और पवित्र आत्मा की निंदा किया करते थे? यह वैसा ही है जैसा सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहा था: “यदि तुम्हें परमेश्वर के बारे में उसके कार्य के केवल एक चरण के द्वारा पता चलता है, तो तुम्हारा ज्ञान भी बहुत कम है। तुम्हारा ज्ञान समुद्र में मात्र एक बूँद की तरह है। यदि नहीं, तो कई पुराने धार्मिक रक्षकों ने परमेश्वर को जीवित सलीब पर क्यों चढ़ाया होता? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को निश्चित मापदण्डों के भीतर सीमित करता है? क्या कई लोग इसलिए परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं और पवित्र आत्मा के कार्य में बाधा नहीं डालते हैं क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल चुटकीभर ज्ञान और सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिके भीतर वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इस प्रकार के लोगों का अनुभव केवल सतही होता है, किन्तु वे घमण्डी और आसक्त प्रकृति के होते हैं, और वे पवित्र आत्मा के कार्य को अवमानना से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासनों की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्यों की “पुष्टि” करने के लिए अपने पुराने तुच्छ तर्कों का उपयोग करते हैं। वे एक नाटक भी करते हैं, और अपनी स्वयं की शिक्षा और पाण्डित्य पर पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और यह कि वे संसार भर में यात्रा करने में सक्षम होते हैं। क्या ये ऐसे लोग नहीं हैं जो पवित्र आत्मा के द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकार किए गए हैं और क्या ये नए युग के द्वारा हटा नहीं दिए जाएँगे? क्या ये वही अदूरदर्शी छोटे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुले आम उसका विरोध करते हैं, जो केवल यह दिखावा करने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने चालाक हैं? बाइबिल के अल्प ज्ञान के साथ, वे संसार के “शैक्षणिक समुदाय” में पैर पसारने की कोशिश करते हैं, लोगों को सिखाने के लिए केवल सतही सिद्धांतों के साथ, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पलटने का प्रयत्न करते हैं, और इसे अपने ही स्वयं के विचारों की प्रक्रिया के चारों ओर घूमाते रहने का प्रयास करते हैं, और अदूरदर्शी की तरह हैं, वे एक ही झलक में परमेश्वर के 6000 सालों के कार्यों को देखने की कोशिश करते हैं। क्या इन लोगों के पास बातचीत करने का कोई भी कारण है? वास्तव में, परमेश्वर के बारे में लोगों को जितना अधिक ज्ञान होता है, उतना ही धीमा वे उसके कार्य का आँकलन करने में होते हैं। इसके अलावा, आज वे परमेश्वर के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बहुत ही कम बातचीत करते हैं, बल्कि वे अपने निर्णय में जल्दबाज़ी नहीं करते हैं। लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतना ही अधिक वे घमण्डी और अतिआत्मविश्वासी होते हैं और उतना ही अधिक बेहूदगी से परमेश्वर के अस्तित्व की घोषणा करते हैंहो—फिर भी वे केवल सिद्धांत की बात ही करते हैं और कोई भी वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते हैं। इस प्रकार के लोगों का कोई मूल्य नहीं होता है। जो पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल की तरह देखते हैं वे ओछे होते हैं! जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं होते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, वे आलोचनात्मक होते हैं, जो पवित्र आत्मा के धर्मी कार्यों को इनकार करने की अपनी प्राकृतिक सहज प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाते हैं और उसका अपमान और ईशनिंदा करते हैं—क्या इस प्रकार के असभ्य लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में अनभिज्ञ नहीं रहते हैं? इसके अलावा, क्या वे अभिमानी, अंतर्निहित रूप से घमण्डी और अशासनीय नहीं हैं?” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है” से)।

जैसे जैसे वे लोग जो परमेश्वर में सच्चा विश्वास करते हैं वे परमेश्वर के घर बड़ी मात्रा में वापस आते हैं, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य का क्रमिक विस्तार अपने उत्‍कर्ष पर पहुंच गया है, लेकिन पवित्र आत्मा के कार्य की इतनी सफलता के उपरांत भी, वे धार्मिक अग्रणीगण जो पहले उच्च व शक्तिशाली हुआ करते थे और वे धार्मिक विशेषज्ञ जो दूसरों को निर्देशित करते हैं, वे खुद को नहीं बदल रहे हैं, न ही वे खोजने व अध्ययन करने के लिए अपने घमंडी सिर को नीचे करते हैं। इसके विपरीत, इन लोगों को यह अहसास होता है कि इनकी स्थिति ज्यादा से ज्यादा संदिग्ध होती जा रही है, कि ये हर समय अस्थिर हैं, और वे इस बात से डरना शुरू कर देते हैं कि हर कोई सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर मुड़ जाएगा और उन्‍हें बिल्कुल नजरअंदाज करके त्याग दिया जाएगा। परिणामस्वरूप, ‘वर्तमान स्थिति को फिर से बहाल’ करने के लिए, विभिन्न धर्मों व पंथों के पादरीगण, एल्डर्स, अग्रणीगण और सहयोगी कार्यकर्ता ‘परमेश्वर के लिए समुदाय की रक्षा करने और सही मार्ग पर कायम रहने’ के नाम पर काम करते हैं। उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निंदा करने व उन पर हमला करने की इच्छा से अफवाहों व अन्य नीच तरीकों को प्रसारित करने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए, प्रचार सामग्री के निर्माण और वितरण जैसे उपायों को अपनाना शुरू कर दिया है। वे अपमानित करने वाली अफवाहें फैलाते हैं, जिसमें दावा किया जाता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन, परमेश्वर का वचन नहीं है, कि वे मनुष्य द्वारा लिखे गए हैं, और वे यह बकवास भी करते हैं कि “यह किताब एक ऐसे मायाजाल की तरह है जो आप पर जादू कर देती है, अगर आप इसे पढ़ते हैं तो यह आपके दिमाग को भ्रमित कर देगी,” और अन्य चीजें जो तथ्यों को विकृत और ग़लत ढंग से प्रस्तुत करती हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया को “चमकती पूर्वी बिजली के पंथ” के रूप में पेश करते हैं, जो कि एक आपराधिक संगठन है। इस तरह से विश्‍वासियों को धोखा देकर व धमकाकर, वे सुनिश्चित करते हैं कि बेवकूफ और अज्ञानी लोग परमेश्वर के सुसमाचार तक पहुंचने और उनके संपर्क में आने की हिम्मत न करें, विभिन्न धर्मों और संप्रदायों में इस हद तक नाकाबंदी कर दी जाती है कि एक सुंई भी भीतर न जा सके, न ही पानी रिस सके। ये धार्मिक नेता अपने विश्‍‍वासियों को चमकती पूर्वी बिजली की पुस्तकों को पढ़ने या चमकती पूर्वी बिजली के उपदेशों को सुनने से मना कर देते हैं, ये अपने विश्‍वासियों को अंत के दिनों में परमेश्वर के उद्धार का प्रचार करने वाले लोगों या फिर किसी अजनबी से भी मिलने की अनुमति नहीं देते हैं, और वे पूरी तरह से अनुग्रह के युग में परमेश्वर की शिक्षाओं के खिलाफ जाते हैं जहां वे अपरिचितों को स्‍वीकार करने के लिए मनुष्य से कहते हैं। वह बात जो लोगों के लिए सर्वाधिक चौंकाने वाली है, वह यह है कि, परमेश्वर के विश्वासी होने के बावजूद, ये लोग सीसीपी के शैतानी शासन के साथ सांठ—गांठ रखते है, जो अंत के दिनों के सुसमाचार का प्रसार करने वाले भाइयों व बहनों को खोजकर, उन पर नज़र रखकर व उनकी सूचना देकर अपने संदेहपूर्ण व दुष्‍ट कामों को आगे बढ़ाते हैं, और वे ईसाइयों को सीसीपी द्वारा गुप्त रूप से पकड़ने के लिए जानकारी एकत्रित करने के लिए कलीसिया के अंदर से अनदेखे धोखेबाज़ों के रूप में काम भी करते हैं। ऐसा लगता है कि वे परमेश्वर की गवाही देने वालों को अलग करके और परमेश्वर के नए कार्य को समाप्त करके ही अपने दिल में मौजूद घृणा से राहत महसूस कर सकते हैं। ये लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने वाले लोग अच्छे स्वभाव के लोग हैं जिनका परमेश्वर में सच्चा विश्वास है, और वे यह बात और भी अच्छी तरह से जानते हैं कि अंत के दिनों में परमेश्वर का उद्धार पाने को लेकर प्रचार करने में इन लोगों के मन में कोई भी बुरी मंशा नहीं है, फिर भी ये असभ्य व क्रूर तरीके से उनका अपमान करते हैं, उन्हें दूर भगाते हैं और सुसमाचार का प्रचार करने वाले भाइयों व बहनों पर शारीरिक रूप से हमला भी करते हैं। यह साफ है कि इन धार्मिक रहनुमाओंने बहुत पहले ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करना बंद कर दिया था, और यह भी साफ है कि ये सत्य को स्वीकार नहीं करते, कि वे सत्य का विरोध करते हैं, ​और कि ये सत्य से स्वभावपूर्वक और सारभूत रूप से घृणा करते हैं। बाहर से, ये लोग कार्य को आगे ले जाने के लिए मेहनत करते हुए नजर आते हैं, लेकिन अंदर से ये जंगली आकांक्षाओं और अवज्ञा से उलझन में हैं। असल में, ये पद के लिए षडयंत्र करने की कोशिश कर रहे हैं, अपने खुद के फायदे के लिए प्रयासरत हैं, और अपनी स्वार्थी इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए जो भी कर सकते हैं कर रहे हैं।

यह साफ तौर पर देखा जाता है कि भले ही वह अपने समय की यहूदियों की धार्मिक दुनिया हो या फिर आज के विभिन्न धर्मों व संप्रदायों के धार्मिक व्‍यक्ति विशेष, उनका परमेश्‍वर, सत्य व सच्चे मार्ग का बार—बार विरोध, ‘स्वीकारने की जगह मर जाएंगे’ और ‘धैर्य के साथ मौत का सामना करेंगे’ आदि का मूलभूत कारण यह है कि वे इस सिद्धांत को स्‍वीकार नहीं करते हैं कि परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी पुराना नहीं होता, न ही उन्हें परमेश्वर के नए कार्य का ज्ञान है, और इससे भी बढ़कर वे सत्य का बिल्कुल अनुसरण नहीं करते हैं, वे जिद्दी व रूढ़िवादी हैं, वे घमंडी व आत्म—अभिमानी हैं। इस बात का उनके अपने पद को लेकर बेहद चिंतित रहने से संबंध है जो कि बहुत निम्‍न दर्जे का है। आजकल, नए युग द्वारा पुराने युग का स्थान लेने के इस महत्वपूर्ण समय में, आध्यात्मिक दुनिया में लड़ाई अपने चरम पर पहुंच गई है। यदि लोग फिर भी इन धार्मिक लोगों द्वारा फैलाई जाने वाली अफवाहों व गलत प्रचारों पर विश्वास करते हैं और उनके द्वारा भ्रमित होकर कष्‍ट उठाते हैं, अगर वे अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य और उनके द्वारा बोले गए वचनों पर ध्यान नहीं देते हैं या उनकी अवज्ञा और उनसे घृणा भी करते हैं, यदि वे अपनी खुद की जिंदगी की जिम्मेदारी नहीं लेते हैं और केवल भीड़ का अनुसरण करते हैं और उनके साथ ही अनियंत्रित अनादर के साथ पवित्र आत्मा के कार्य की बहुत ज्यादा आलोचना करते हैं, यदि वे अपने खुद के विवेक से मतलब नहीं रखते हैं और बस आंखें बंद करके पूजा करते हैं, सिर्फ पुरोहितों व एल्डर्स की अफवाहों व कपट को सुनते हैं और उनकी आज्ञा मानते हैं, यदि वे धार्मिकता की ओर मुड़ने और शैतान के बल के नियंत्रण से निकलने और सच्चे मार्ग को खोजने और परमेश्वर की आवाज को सुनने में सक्षम नहीं हैं, यदि वे ये सब काम नहीं कर सकते हैं, तो फिर वे कभी भी प्रभु की वापसी के लिए तैयार नहीं हो पाएंगे, वे कभी भी रचनाकार के अनुग्रह की गवाही नहीं कर पाएंगे, उन्हें कभी भी परमेश्वर को जानने का मौका नहीं मिलेगा, वे बस इतिहास में एक कठपुतली बन कर रह जाएंगे, शैतान के लिए के लिए बलि की एक वस्तु, और वे अंधकार में डूब जाएंगे जहां वे खत्म होने तक विलाप करेंगे और अपने दांत पीसेंगे, ठीक उस तरह जैसे धर्मग्रंथ में बताया गया है: “इस कारण यहोवा इस्राएल में से सिर और पूँछ को, खजूर की डालियों और सरकंडे को, एक ही दिन में काट डालेगा। पुरनिया और प्रतिष्‍ठित पुरुष तो सिर हैं, और झूठी बातें सिखानेवाला नबी पूँछ है; क्योंकि जो इन लोगों की अगुवाई करते हैं वे इनको भटका देते हैं, और जिनकी अगुवाई होती है वे नष्‍ट हो जाते हैं” (यशायाह 9:14-16)।

हमें यह पता होना चाहिए कि परमेश्वर किसी भी ऐसे को नहीं चुनेगा जिसमें सत्य की प्यास न हो, जो परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर स्पष्ट न हो, जिसके पास अपने विचारों पर कोई निर्धारित रवैया न हो, जो ताकत व प्रभाव को पूजता हो या परिस्थितियों का फायदा उठाता है। इसके विपरीत, परमेश्वर उन कुंवारो को खोजते, उन्हें निपुण और शुद्ध करते हैं और उन्हें सुविधा देते हैं जो परमेश्वर को महान मान कर सम्मान करते हैं, जिनका मन साफ है, जो शुद्ध आज्ञाकारिता रखते हैं, जो सच्चे मायनों में परमेश्वर के लिए इच्छा रखते हैं और उन्‍हें खोजते हैं। यह एक बहुविध तथ्य है! क्या यह हो सकता है कि इस्‍त्राएलियों द्वारा बहाया गया खून तुम्हें यह सबक देने के लिए काफी नहीं था?