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क्यों परमेश्वर के कार्य का हर नया चरण धार्मिक दुनिया की प्रचंड अवज्ञा और निंदा का सामना करता है? इसका मूल कारण क्या है?

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3. क्यों परमेश्वर के कार्य का हर नया चरण धार्मिक दुनिया की प्रचंड अवज्ञा और निंदा का सामना करता है? इसका मूल कारण क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"फिर वह दृष्‍टान्तों में उनसे बातें करने लगा: किसी मनुष्य ने दाख की बारी लगाई, और उसके चारों ओर बाड़ा बाँधा, और रस का कुण्ड खोदा, और गुम्मट बनाया; और किसानों को उसका ठेका देकर परदेश चला गया। फिर फल के मौसम में उसने किसानों के पास एक दास को भेजा कि किसानों से दाख की बारी के फलों का भाग ले। पर उन्होंने उसे पकड़कर पीटा और छूछे हाथ लौटा दिया। फिर उसने एक और दास को उनके पास भेजा; उन्होंने उसका सिर फोड़ डाला और उसका अपमान किया। फिर उसने एक और को भेजा; उन्होंने उसे मार डाला। तब उसने और बहुतों को भेजा; उनमें से उन्होंने कुछ को पीटा, और कुछ को मार डाला। अब एक ही रह गया था, जो उसका प्रिय पुत्र था; अन्त में उसने उसे भी उनके पास यह सोचकर भेजा कि वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे। पर उन किसानों ने आपस में कहा, 'यही तो वारिस है; आओ, हम इसे मार डालें, तब मीरास हमारी हो जाएगी।' और उन्होंने उसे पकड़कर मार डाला, और दाख की बारी के बाहर फेंक दिया। इसलिये दाख की बारी का स्वामी क्या करेगा? वह आकर उन किसानों का नाश करेगा, और दाख की बारी दूसरों को दे देगा" (मरकुस 12:1-9)।

"इस पर प्रधान याजकों और फरीसियों ने महासभा बुलाई, और कहा, 'हम करते क्या हैं? यह मनुष्य तो बहुत चिह्न दिखाता है। यदि हम उसे यों ही छोड़ दें, तो सब उस पर विश्‍वास ले आएँगे, और रोमी आकर हमारी जगह और जाति दोनों पर अधिकार कर लेंगे।' ...अत: उसी दिन से वे उसे मार डालने का षड्‍यन्त्र रचने लगे" (यूहन्ना 11:47-53)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

मनुष्य के द्वारा परमेश्वर का विरोध करने का कारण, एक ओर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से, और दूसरी ओर, परमेश्वर के प्रति अज्ञानता और परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों की और मनुष्य के प्रति उनकी इच्छा की समझ की कमी से उत्पन्न होता है। इन दोनों पहलुओं का, परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध के इतिहास में समावेश होता है। नौसिखिए विश्वासी परमेश्वर का विरोध करते हैं क्योंकि ऐसा विरोध उनकी प्रकृति में होता है, जबकि कई वर्षों से विश्वास वाले लोगों में परमेश्वर का विरोध, उनके भ्रष्ट स्वभाव के अलावा, परमेश्वर के प्रति उनकी अज्ञानता का परिणाम है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं" से उद्धृत

परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है, और यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता है, जिन तरीकों से वह कार्य करता है वे निरंतर बदलते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे लोग भी बदलते रहते हैं जो उसका अनुसरण करते हैं। जितना अधिक परमेश्वर का कार्य होगा, उतना ही अधिक मनुष्य परमेश्वर को जानेगा, और मनुष्य का स्वभाव भी परमेश्वर के कार्य के साथ बदलेगा। हालाँकि, परमेश्वर का कार्य इस कारण से हमेशा बदलता रहता है कि पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में नहीं जानने वाले और सत्य को न जानने वाले विवेकहीन लोग परमेश्वर के विरोधी बन जाते हैं। कभी भी परमेश्वर का कार्य मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है। न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ जाता है। जिस प्रकार परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर निरपवाद रूप से उसके आज के कार्य का निर्णय करता है, नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना परमेश्वर के लिए अत्यंत कठिन है। मनुष्य बहुत अधिक बाधाएँ प्रस्तुत करता है! मनुष्य की सोच बहुत ही ओछी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है, फिर भी वह ऐसे कार्य की व्याख्या करता है। परमेश्वर से दूर होकर, मनुष्य जीवन, सत्य और परमेश्वर की आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को ग्रहण करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जा रहे आशीषों को तो और भी कम ग्रहण करता है। सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, फिर भी परमेश्वर के कार्य में हुए किसी भी बदलाव को सहने में असमर्थ है। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और कि परमेश्वर का कार्य हमेशा एक ठहराव पर रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है वह है व्यवस्था को बनाए रखना, और जब तक वे पश्चाताप करते और अपने पापों को स्वीकार करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर की इच्छा हमेशा संतुष्ट रहेगी। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर बाइबल से बढ़कर नही होना चाहिए और नही हो सकता है। ये ठीक इस प्रकार के विचार हैं जिन्होंने उन्हें पुरानी व्यवस्था में दृढ़ता से बाँध दिया है और कठोर नियमों में जकड़ कर रख दिया है। इससे भी अधिक लोग यह विश्वास करतें है कि जो कुछ भी परमेश्वर का नया कार्य है, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया ही जाना चाहिए और यह कि इस तरह के कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी उसका अनुसरण सच्चे हृदय से करते हैं, उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए, अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के विवेकहीन हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं आत्म-अभिमान के विद्रोही स्वभाव को लें, तो परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वह किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?" से उद्धृत

क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई-नई प्रगति होती है, इसलिए यहां पर नया कार्य है, और इसलिए अप्रचलित और पुराना कार्य भी है। यह पुराना और नया कार्य परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक है; प्रत्येक कदम पिछले कदम के बाद आता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें निस्संदेह समाप्त कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, मनुष्य की लम्बे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभवों और शिक्षाओं के साथ मिलकर, मनुष्य के दिमाग में सभी प्रकार की अवधारणाएं बना दी हैं। फिर भी मनुष्यों के द्वारा इस प्रकार की अवधारणाएं बनाने की और भी अधिक अनुकूल बात यह है कि परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है, और साथ ही प्राचीन समय के पारंपरिक सिद्धांतों का बहुत सालों से विस्तार हुआ है। इस प्रकार यह कहना सही होगा कि परमेश्वर में मनुष्यों के विश्वास में, विभिन्न अवधारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण मनुष्य के ज्ञान में निरंतर उत्पत्ति और विकास हुआ है जिसमें उसके पास परमेश्वर के प्रति सभी प्रकार की धारणाएं हैं—इस परिणाम के साथ कि परमेश्वर की सेवा करने वाले कई धार्मिक लोग उसके शत्रु बन बैठे हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक अवधारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और वह कभी भी सिद्धांत नहीं बनता, इसके बजाय, निरंतर बदलता रहता है और कमोवेश परिवर्तित होता रहता है। यह कार्य स्वयं परमेश्वर के निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यही परमेश्वर के कार्य का निहित सिद्धांत और अनेक उपायों में से एक है जिससे परमेश्वर अपने प्रबंधन को पूर्ण करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य बदल नहीं पाएगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा, और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में ये समय-समय पर होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर पर विश्वास करता है, वह बहुत भिन्न है। वह पुराने, परिचित सिद्धांतों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और जितने अधिक वे पुराने होते हैं उतने ही अधिक उसे प्रिय होते हैं। मनुष्य का मूर्ख दिमाग, एक ऐसा दिमाग जो पत्थर के समान दुराग्रही है, परमेश्वर के इतने सारे अथाह नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? मनुष्य हमेशा नए रहने वाले और कभी भी पुराने न होने वाले परमेश्वर से घृणा करता है; वह हमेशा ही प्राचीन सफेद बाल वाले और स्थिर परमेश्वर को पसंद करता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी पसंद है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छः हजार सालों से नया कार्य कर रहा है। तब, वे किसी भी इलाज से परे हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं" से उद्धृत

क्या बहुत से लोग इसलिए परमेश्वर का विरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में बाधा नहीं डालते हैं क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल चुटकीभर ज्ञान और सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिसके भीतर वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इस प्रकार के लोगों का अनुभव केवल सतही होता है, किन्तु वे घमण्डी और आसक्त प्रकृति के होते हैं, और वे पवित्र आत्मा के कार्य को अवमानना से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्यों की "पुष्टि" करने के लिए अपने पुराने तुच्छ तर्कों का उपयोग करते हैं। वे एक नाटक भी करते हैं, और अपनी शिक्षा और पाण्डित्य पर पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और यह कि वे संसार भर में यात्रा करने में सक्षम होते हैं। क्या ये ऐसे लोग नहीं हैं जो पवित्र आत्मा के द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकार किए गए हैं और क्या ये नए युग के द्वारा हटा नहीं दिए जाएँगे? क्या ये वही अदूरदर्शी छोटे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुले आम उसका विरोध करते हैं, जो केवल यह दिखावा करने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने चालाक हैं? बाइबिल के अल्प ज्ञान के साथ, वे संसार के "शैक्षणिक समुदाय" में पैर पसारने की कोशिश करते हैं, लोगों को सिखाने के लिए केवल सतही सिद्धांतों के साथ, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पलटने का प्रयत्न करते हैं, और इसे अपने ही विचारों की प्रक्रिया के चारों ओर घूमाते रहने का प्रयास करते हैं, और अदूरदर्शी की तरह हैं, वे एक ही झलक में परमेश्वर के 6,000 सालों के कार्यों को देखने की कोशिश करते हैं। इन लोगों के पास कोई उल्लेखनीयकारण नहीं है! वास्तव में, परमेश्वर के बारे में लोगों को जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य का आँकलन करने में उतने ही धीमे होते हैं। इसके अलावा, आज वे परमेश्वर के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बहुत ही कम बातचीत करते हैं, बल्कि वे अपने निर्णय में जल्दबाज़ी नहीं करते हैं। लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतना ही अधिक वे घमण्डी और अतिआत्मविश्वासी होते हैं और उतना ही अधिक बेहूदगी से परमेश्वर के अस्तित्व की घोषणा करते हैं—फिर भी वे केवल सिद्धांत की बात ही करते हैं और कोई भी वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। इस प्रकार के लोगों का कोई मूल्य नहीं होता है। जो पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल की तरह देखते हैं वे ओछे होते हैं! जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं होते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, वे आलोचनात्मक होते हैं, जो पवित्र आत्मा के धार्मिक कार्यों को नकारने की अपनी प्राकृतिक सहज प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाते और उसका अपमान और ईशनिंदा करते हैं—क्या इस प्रकार के असभ्य लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में अनभिज्ञ नहीं रहते हैं? इसके अलावा, क्या वे अभिमानी, अंतर्निहित रूप से घमण्डी और अशासनीय नहीं हैं? भले ही ऐसा दिन आए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार करें, तब भी परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। न केवल वे उन्हें तुच्छ समझते हैं जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, बल्कि स्वयं भी परमेश्वर के विरुद्ध, ईशनिंदा करते हैं। इस प्रकार के उजड्ड लोग, न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में, क्षमा किए जाएँगे, और वे हमेशा के लिए नरक में सड़ेंगे! इस प्रकार के असभ्य, आसक्त लोग परमेश्वर में भरोसा करने का दिखावा करते हैं और जितना अधिक वे ऐसा करते हैं, उतना ही अधिक उनकी परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों का उल्लंघन करने की संभावना होती है। क्या वे सभी घमण्डी ऐसे लोग नहीं हैं जो स्वाभाविक रूप से उच्छृंखल हैं, और जिन्होंने कभी भी किसी का भी आज्ञापालन नहीं किया है, जो सभी इसी मार्ग पर चलते हैं? क्या वे दिन प्रतिदिन परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, वह जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से उद्धृत

कार्य के तीनों चरणों में से प्रत्येक चरण पूर्ववर्ती चरण की बुनियाद पर पूरा किया जाता है; इसे स्वतंत्र रूप से, उद्धार के कार्य से पृथक नहीं किया जाता है। यद्यपि युग और किए गए कार्य के प्रकार में बहुत बड़े अंतर हैं, इसके मूल में अभी भी मानवजाति का उद्धार ही है, और उद्धार के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले ज्यादा गहरा होता है। कार्य का प्रत्येक चरण पिछले की बुनियाद पर आगे बढ़ता है, जिसका उन्मूलन नहीं किया जाता है। इस प्रकार से, अपने कार्य में जो हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं पड़ता है, वह परमेश्वर निरंतर अपने स्वभाव का एक पहलू व्यक्त करता रहता है जिसे कभी भी मनुष्य के लिए व्यक्त नहीं किया गया है और हमेशा मनुष्यों को अपना नया कार्य और अपना नया अस्तित्व व्यक्त करता रहता है, और भले ही पुराना धार्मिक रक्षक इसका प्रतिरोध करने के लिए अपनी अधिकतम सामर्थ्य लगाता है और इसका खुलेआम विरोध करता है, तब भी परमेश्वर हमेशा नया कार्य करता है जिसे करने का वह इरादा रखता है। उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और इस कारण से, यह हमेशा मनुष्य के विरोध का सामना करता रहता है। इसलिए, उसका स्वभाव भी युगों और उसके कार्यों को ग्रहण करने वालों के अनुसार सदैव बदलता रहता है। इसके अलावा, वह हमेशा उस काम को करता है जो पहले कभी नहीं किया गया था, यहाँ तक कि उस कार्य को भी करता है जो मनुष्यों को पहले किए गए काम का विरोधाभासी, उसका विरोध करने वाला, दिखाई देता है। मनुष्य केवल एक ही प्रकार का कार्य या एक ही प्रकार का अभ्यास स्वीकार करने में समर्थ है। मनुष्य के लिए ऐसे कार्य या अभ्यास के तरीकों को स्वीकार करना कठिन होता है, जो उनके साथ विरोधाभास प्रकट करते हैं, या उनसे उच्चतर हैं—परन्तु पवित्र आत्मा हमेशा नया कार्य कर रहा है और इसलिए धार्मिक विशेषज्ञों के समूह के समूह दिखाई देते हैं जो परमेश्वर के नए कार्य का विरोध करते है। ये लोग इसलिए "विशेषज्ञ" बन गए हैं क्योंकि मनुष्य के पास ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर किस प्रकार हमेशा नया रहता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और परमेश्वर के कार्य के सिद्धान्तों का कोई ज्ञान नहीं है और इससे अधिक क्या, कि उन विभिन्न मार्गों का ज्ञान नहीं है जिनमें परमेश्वर मनुष्य को बचाता है। वैसे तो, मनुष्य यह बताने में सर्वथा असमर्थ है कि क्या यह वह कार्य है जो पवित्र आत्मा की ओर से आता है, क्या यह परमेश्वर का कार्य है। कई लोग इस प्रकार के दृष्टिकोण से चिपके रहते हैं जिसमें, यदि यह पहले आए हुए वचनों के अनुरूप है, तब वे इसे स्वीकार करते हैं, और यदि पहले किए गए कार्य में कोई अंतर है, तब वे इसका विरोध करते हैं और अस्वीकार कर देते हैं। आज, क्या तुम लोग इस प्रकार के नियमों से बँधे हुए नहीं हो? ...ज्ञात हो कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हो, या आज कार्य को मापने के लिए अपनी धारणा का उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धान्तों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पर्याप्त गम्भीरता से नहीं लेते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणा और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं कि परमेश्वर का कार्य ग़लत है, बल्कि इसलिए कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से बहुत ही ज्यादा अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। और वे यहाँ तक कि प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेसमय बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही कम होती है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा जलाए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य परमेश्वर को खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान परमेश्वर को जान जाता है; यह नहीं कि वह अपनी सनक में उसकी आलोचना करने से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान जाएगा है। जितना अधिक परिशुद्ध परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान होता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग जितना कम परमेश्वर के बारे में जानते हैं, उतना ही ज्यादा परमात्मा का विरोध करने की उनकी संभावना होती है। तुम्हारी धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह "पूँजी" है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और तुम जितना अधिक भ्रष्ट, तुच्छ और निम्न होगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग गम्भीर धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के हैं वे और भी अधिक देहधारी परमेश्वर के साथ शत्रुता में हैं और इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार नहीं आता है, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं होगे, और सदैव उससे दूर रहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से उद्धृत

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने सिर्फ़ मसीहा के नाम को खोखली श्रद्धांजलि देने की गलती की, जबकि किसी न किसी ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे, ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा" से उद्धृत

मसीह की दिव्यता सभी मनुष्यों से ऊपर है, इसलिए सभी सृजे गए प्राणियों में वह सर्वोच्च अधिकारी है। यह अधिकार उसकी दिव्यता, अर्थात्, परमेश्वर स्वयं का स्वभाव तथा अस्तित्व है, जो उसकी पहचान निर्धारित करता है। इसलिए, चाहे उसकी मानवता कितनी ही साधारण हो, यह बात अखंडनीय है कि उसके पास स्वयं परमेश्वर की पहचान है; चाहे वह किसी भी दृष्टिकोण से बोले तथा वह किसी भी प्रकार से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करें, किन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वयं परमेश्वर नहीं है, मूर्ख और नासमझ लोग मसीह की सामान्य मानवता को प्रायः एक खोट मानते हैं। चाहे वह कैसे भी अपनी दिव्यता के अस्तित्व को प्रकट करे, मनुष्य यह स्वीकार करने में असमर्थ है कि वह मसीह है। और मसीह जितना अधिक अपनी आज्ञाकारिता और नम्रता प्रदर्शित करता है, मूर्ख लोग उतना ही हल्के ढंग से मसीह का सम्मान करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी है जो उसके प्रति बहिष्कार तथा तिरस्कार की प्रवृत्ति अपनाते हैं, मगर उन "महान लोगों" की ऊँची प्रतिमाओं को आराधना करने के लिए मेज पर रखते हैं। परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा परमेश्वर की अवज्ञा इस तथ्य से आते हैं कि देहधारी परमेश्वर का सार परमेश्वर की इच्छा के प्रति और साथ ही मसीह की सामान्य मानवता से समर्पण करता है; इसमें परमेश्वर के प्रति मनुष्य का विरोध तथा उसकी अवज्ञा का स्रोत निहित है। यदि मसीह के पास न तो उसकी मानवता का भेष होता और न ही सृजन किए गए प्राणी के दृष्टिकोण से परमपिता परमेश्वर की इच्छा की खोज की होती, बल्कि इसके बजाए अति मानवता से सम्पन्न होता, तब किसी भी मनुष्य में अवज्ञा न होने की संभावना होती। मनुष्य की सदैव स्वर्ग में एक अदृश्य परमेश्वर में विश्वास करने की इच्छा का कारण इस वजह से है कि स्वर्ग में परमेश्वर के पास कोई मानवता नहीं है तथा उसके पास सृजन किए गए प्राणी की कोई भी विशेषता नहीं है। अतः मनुष्य उसका सदैव सर्वोच्च सम्मान के साथ आदर करता है, किन्तु मसीह के प्रति अपमान करने की प्रवृत्ति बनाए रखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है" से उद्धृत

एक अदृश्य और अस्पृश्य परमेश्वर का सभी के द्वारा प्रेम और स्वागत किया जाता है। यदि परमेश्वर बस एक पवित्रात्मा हो जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, तो परमेश्वर पर विश्वास करना मनुष्य के लिए बहुत आसान है। मनुष्य अपनी कल्पना को बेलगाम कर सकता है, और अपने आपको प्रसन्न करने तथा अपने आपको खुश करने के लिए किसी भी आकृति को परमेश्वर की आकृति के रूप में चुन सकता है। इस तरह से, मनुष्य बिना किसी शक के ऐसा कुछ भी कर सकता है जो उसका स्वयं का परमेश्वर उससे करवाना चाहता है, और जो वो अत्यधिक पसंद करता है। इसके अलावा, मनुष्य मानता है कि उसकी अपेक्षा परमेश्वर के प्रति कोई भी उससे अधिक भरोसेमंद और भक्त नहीं है, और यह कि बाकी सब अन्य जातियों के कुत्ते हैं, तथा परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि यही वह है जो उन लोगों के द्वारा खोजा जाता है जिनका विश्वास परमेश्वर में अस्पष्ट है और सिद्धान्तों पर आधारित है; जो कुछ वे खोजते हैं वह सब थोड़ी बहुत विभिन्नता के साथ करीब-करीब एक जैसा ही है। मात्र इतना ही है कि उनकी कल्पनाओं में परमेश्वर की छवियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं, मगर उनका सार वास्तव में एक ही होता है।

मनुष्य परमेश्वर में अपने लापरवाह विश्वास से परेशान नहीं होता है, और जैसा उसे भाता है उसी तरह से परमेश्वर में विश्वास करता है। यह मनुष्य के "अधिकार और आज़ादी" में से एक है, जिसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है, क्योंकि मनुष्य अपने स्वयं के परमेश्वर में विश्वास करता है तथा किसी अन्य के परमेश्वर पर नहीं; यह उसकी अपनी निजी सम्पत्ति है, और लगभग हर कोई इस तरह की निजी सम्पत्ति रखता है। मनुष्य इस सम्पत्ति को एक बहुमूल्य ख़ज़ाने के रूप में मानता है, किन्तु परमेश्वर के लिए इससे अधिक अधम या मूल्यहीन चीज़ और कोई नहीं है, क्योंकि मनुष्य की इस निजी सम्पत्ति की तुलना में परमेश्वर के विरोध का इससे और अधिक स्पष्ट संकेत नहीं है। यह देहधारी परमेश्वर के कार्य की वजह से है कि परमेश्वर देह धारण करता है जिसका एक स्पर्श-गम्य आकार है, और जिसे मनुष्य के द्वारा देखा और स्पर्श किया जा सकता है। वह एक निराकार पवित्रात्मा नहीं है, बल्कि एक देह है जिससे मनुष्य द्वारा सम्पर्क किया जा सकता है और जिसे देखा जा सकता है। हालाँकि, अधिकांश परमेश्वर जिन पर लोग विश्वास करते हैं देहरहित देवता हैं जो निराकार हैं, जो आकार मुक्त हैं। इस तरह से, देहधारी परमेश्वर उनमें से अधिकांश लोगों का शत्रु बन गया है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और जो लोग परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं वे, उसी प्रकार से, परमेश्वर के विरोधी बन गए हैं। मनुष्य सोचने के अपने तरीके की वजह से नहीं, या अपनी विद्रोहशीलता की वजह से नहीं, बल्कि मनुष्य की इस निजी सम्पत्ति की वजह से धारणाओं को धारण किए हुए है। यह इस निजी सम्पत्ति की वजह से ही है कि अधिकांश लोग मरते हैं, और यह वह अस्पष्ट परमेश्वर ही है जिसे स्पर्श नहीं किया जा सकता है, देखा नहीं जा सकता है, और जो अस्तित्व में नहीं है वास्तव में जो मनुष्य के जीवन को बर्बाद करता है। मनुष्य के जीवन को देहधारी परमेश्वर के द्वारा नहीं, स्वर्ग के परमेश्वर के द्वारा तो बिलकुल भी नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वयं की कल्पना के परमेश्वर द्वारा ज़ब्त किया जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की अधिक आवश्यकता है" से उद्धृत

सभी मनुष्य यीशु के सच्चे रूप को देखने और उसके साथ रहने की इच्छा करते हैं। मैं विश्वास करता हूँ कि भाइयों या बहनों में से एक भी ऐसा नहीं है जो कहेगा कि वह यीशु को देखने या उसके साथ रहने की इच्छा नहीं करता है। यीशु को देखने से पहले, अर्थात, देहधारी परमेश्वर को देखने से पहले, संभवत: तुम्हारे भीतर अनेक विचार होंगे, उदाहरण के लिए, यीशु के रूप के बारे में, उसके बोलने के तरीका, उसके जीवन-शैली के बारे में इत्यादि। लेकिन एक बार वास्तव में उसे देख लेने के बाद, तुम्हारे विचार तेजी से बदल जाएँगे। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोग जानना चाहते हो? जबकि मनुष्य की सोच और विचारों को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन यह मनुष्य के लिए और बहुत अधिक असहनीय है कि वह मसीह के सार में परिवर्तन करे। तुम लोग मसीह को अविनाशी, एक संत मानते हो, लेकिन कोई उसे एक सामान्य मानव नहीं मानता जो दिव्य सार धारण किये हुए है। इसलिए, अनेक लोग जो दिन-रात परमेश्वर को देखने की लालसा करते हैं, वास्तव में परमेश्वर के शत्रु हैं और परमेश्वर के अनुरूप नहीं हैं। क्या यह मनुष्य की ओर से की गई ग़लती नहीं है? तुम लोग अभी भी यह सोचते हो कि तुम्हारा विश्वास और तुम्हारी निष्ठा ऐसी है कि तुम सब मसीह के रूप को देखने के योग्य हो, परन्तु मैं तुमसे गुहार लगाता हूँ कि तुम अपने आपको और भी अधिक व्यवहारिक चीज़ों से सन्नद्ध कर लो! क्योंकि भूतकाल, वर्तमान, और भविष्य में बहुतेरे जो मसीह के सम्पर्क में आए, वे असफल हो गए हैं और असफल हो जाएँगे; वे सभी फरीसियों की भूमिका निभाते हैं। तुम लोगों की असफलता का कारण क्या है? इसका सटीक कारण यह है कि तुम्हारे विचार में एक प्रशंसनीय परमेश्वर है। परन्तु सत्य ऐसा नहीं जिसकी मनुष्य कामना करता है। न केवल मसीह ऊँचा-विशाल नहीं है, बल्कि वह विषेश रूप से छोटा है; वह न केवल मनुष्य है बल्कि एक सामान्य मनुष्य है; वह न केवल स्वर्ग पर नहीं चढ़ सकता, बल्कि वह पृथ्वी पर भी स्वतन्त्रता से घूम नहीं सकता है। और इसलिए लोग उस के साथ सामान्य मनुष्य जैसा व्यवहार करते हैं; जब वे उसके साथ होते हैं तो बेतकल्लुफ़ी भरा व्यवहार करते हैं, और उसके साथ लापरवाही से बोलते हैं, और तब भी पूरे समय "सच्चे मसीह" के आने का इन्तज़ार करते रहते हैं। जो मसीह पहले ही आ चुका है उसे तुम लोग ऐसा समझते हो कि वह एक साधारण मनुष्य है और उसके वचन को भी साधारण इंसान के वचन मानते हो। इसलिए, तुमने मसीह से कुछ भी प्राप्त नहीं किया है और उसके बजाए प्रकाश में अपनी कुरूपता को पूरी तरह प्रकट कर दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" से उद्धृत

परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और सामान्य मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ धर्मपथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और विवेक का प्रकटीकरण है, और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका विवेक अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। ...

मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकटीकरण का स्रोत उसका मंद विवेक, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसकी विकृत समझ से बढ़कर और कुछ भी नहीं है; यदि मनुष्य का विवेक और समझ सामान्य होने के योग्य हो पाएँ, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने के योग्य बन जायेगा। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि मनुष्य का विवेक हमेशा बेसुध रहा है, मनुष्य की समझ कभी भी सही नहीं रही, और लगातार मंद होती गई है कि मनुष्य लगातार परमेश्वर के प्रति विद्रोही बना रहा, इस हद तक कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और अंतिम दिनों के देहधारी परमेश्वर को अपने घर में प्रवेश देने से इंकार कर दिया, और परमेश्वर के देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर का देह उसे घृणित और नीच दिखता है। यदि मनुष्य में थोड़ी-सी भी मानवता होती, तो वह देहधारी परमेश्वर के शरीर के साथ इतना निर्दयी व्यवहार न करता। यदि उसे थोड़ी-सी भी समझ होती, तो वह देहधारी परमेश्वर के शरीर के साथ अपने व्यवहार में इतना शातिर न होता; यदि उसमें थोड़ा-सा भी विवेक होता, तो वह देहधारी परमेश्वर के साथ इस ढंग से इतना "आभारी" न होता। मनुष्य परमेश्वर के देह बनने के युग में जीता है, फिर भी वह एक अच्छा अवसर दिये जाने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने की बजाय परमेश्वर के आगमन को कोसता है, या परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, और प्रकट रूप से इसके विरोध में होता है और इससे ऊबा हुआ है। इसकी परवाह किये बिना कि मनुष्य परमेश्वर के आने के प्रति कैसा व्यवहार करता है, परमेश्वर ने, संक्षेप में, बिना इसकी परवाह किये अपने कार्य को जारी रखा है—भले ही मनुष्य ने परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी स्वागत करने वाला रुख़ नहीं रखा है, और अंधाधुंध उससे निवेदन करता रहता है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत शातिर बन गया है, उसकी समझ अत्यंत मंद हो गई है, और उसका विवेक दुष्ट के द्वारा पूरी तरह से रौंद दिया गया है और मनुष्य के मौलिक विवेक का अस्तित्व बहुत पहले ही समाप्त हो गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" से उद्धृत

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