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शुद्धिकरण का मार्ग

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क्रिस्टोफर, फिलीपींस

मेरा नाम क्रिस्टोफर है और मैं फिलीपींस की एक गृह कलीसिया का पादरी हूँ। 1987 में, मैं बपतिस्मा ग्रहण कर प्रभु यीशु की शरण में आ गया। प्रभु की कृपा से, 1996 में, मैं स्थानीय कलीसिया का पादरी बन गया। उस समय, फिलीपींस के आस-पास कई जगहों पर कार्य और प्रचार करने के अलावा, मैं हांगकांग और मलेशिया जैसे स्थानों में भी प्रचार कर रहा था। पवित्र आत्मा के कार्य और मार्गदर्शन से, मुझे लगता था कि प्रभु के लिए किये गए मेरे काम के संबंध में मुझमें अकूत ऊर्जा थी और मेरे उपदेशों के लिए अंतहीन प्रेरणा थी। मैं अक्सर भाइयों और बहनों को उनकी नकारात्मकता और कमज़ोरी के समय सहारा देने जाया करता था। कभी-कभी उनके परिवार के सदस्य जो प्रभु पर विश्वास नहीं करते थे, मेरे प्रति रूखे होते थे, फिर भी मैं सहनशील और धैर्यवान बना रहता था, प्रभु पर विश्वास नहीं खोता था और मेरा मानना था कि प्रभु उन्हें बदल सकता है। इससे मुझे लगा कि जैसे प्रभु में विश्वास करने के बाद से, मैं काफ़ी बदल गया था। बहरहाल, 2011 से, मुझे पवित्र आत्मा का कार्य पहले जैसी दृढ़ता से महसूस नहीं हो पा रहा था। धीरे-धीरे मेरे उपदेशों के लिए मेरे पास कोई नया प्रबोधन नहीं रहा और न ही पाप में जीते रहने से मुक्त होने की शक्ति रही। जब भी मेरी पत्नी और बेटी मेरी इच्छा के अनुसार नहीं चलती थीं, मैं अपने आप को नाराज होने से नहीं रोक पाता था, और गुस्से में उन पर बरस पड़ता था। मुझे पता था कि यह प्रभु की इच्छा के अनुसार नहीं था, मैं अक्सर खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाता था। मैं इस बारे में विशेष रूप से परेशान महसूस किया करता था। पाप करने और उसे स्वीकारने के जीवन से खुद को मुक्त करने के लिए, मैंने बाइबल पढ़ने, उपवास रखने और प्रार्थना करने की दिशा में और अधिक प्रयास किया और हर जगह आध्यात्मिक पादरियों को ढूँढा ताकि इस बारे में मिलकर खोज की जाए और पता लगाया जाए। लेकिन मेरे सभी प्रयास बेकार रहे और मेरे पापमय जीवन और मेरी आत्मा के भीतर के अंधकार पर कोई भी फर्क नहीं पड़ा।

फिर 2016 में वसंत की एक शाम को मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा, "क्रिस्टोफर, मैंने देखा है कि तुम हाल में बहुत परेशान रहा करते हो। तुम्हारे मन में क्या चल रहा है?" मेरी पत्नी के यह पूछने पर, मैंने उसे बताया कि मुझे कौन-सी बात परेशान कर रही थी, "मैं पिछले कुछ सालों से सोच रहा हूँ कि क्यों मैं पादरी होने और प्रभु में कई सालों से विश्वास करने के बावजूद पाप में रहने से खुद को मुक्त नहीं कर पा रहा हूँ। मैं अब प्रभु को महसूस नहीं कर पाता हूँ। ऐसा लगता है जैसे प्रभु ने मुझे त्याग दिया है। हालाँकि मैं हर जगह प्रचार करता हूँ, फिर भी जैसे ही मेरे पास खाली समय होता है, खासकर देर रात में, मैं हमेशा एक तरह का खालीपन और घबराहट महसूस करता हूँ और यह भावना और मजबूत ही होती जा रही है। मैं सोचता हूँ कि कैसे मैंने कई वर्षों से प्रभु में विश्वास किया है, मैंने बाइबल को कितना पढ़ा है, मैंने प्रभु के बहुत से उपदेशों को सुना है, और अक्सर अपने क्रूस को उठाने का और खुद को जीतने का संकल्प किया है, लेकिन फिर भी मैं हमेशा पापों से बंधा रहता हूँ। अपने हितों और सम्मान को बचाने के लिए मैं झूठ बोलने में सक्षम हूँ, मैं, 'उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था' (प्रकाशितवाक्य 14:5)। पर खरा नहीं उतरता हूँ। परीक्षण और शुद्धिकरण का सामना करते समय, हालांकि मुझे पता है कि ये चीज़ें प्रभु की सहमति से होती हैं, मैं फिर भी खुद को प्रभु के बारे में शिकायत करने और उसे गलत समझने से रोक नहीं पाता और मैं स्वेच्छा से खुद को त्यागने में पूरी तरह से असमर्थ हूँ। मुझ डर है कि जब प्रभु आएगा, तो मैं इस तरह पाप में रहने के कारण स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाऊँगा!"

यह सुनकर, मेरी पत्नी ने कहा, "क्रिस्टोफर, तुम इस तरह कैसे सोच सकते हो? तुम्हें विश्वास करना चाहिए; तुम पादरी हो! भले ही हम पाप में रहते हैं और पाप के बंधनों से मुक्त नहीं हुए हैं, लेकिन बाइबल कहती है, 'कि यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्‍वास करे कि परमेश्‍वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्‍चय उद्धार पाएगा' (रोमियों 10:9), 'जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा' (रोमियों 10:13)। जब तक हम बाइबल पढ़ने, सभाओं में भाग लेने और प्रभु से प्रार्थना करने में बने रहते हैं, और अपने क्रूस को उठाते हैं और बिना चूके प्रभु के दूसरे आगमन तक उसका अनुसरण करते हैं, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने और प्रभु के आशीर्वाद को प्राप्त करने में सक्षम होंगे।"

तब मैंने अपनी पत्नी से कहा, "मैंने पहले ऐसा ही सोचा था, लेकिन पतरस 1:16 में यह कहा गया है: 'क्योंकि लिखा है, "पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ।"' मैंने तीस वर्षों से प्रभु में विश्वास किया है, फिर भी मैं प्रभु के मार्ग पर बना नहीं रह पाता हूँ, और पाप में रहते हुए, मैं अब भी अक्सर प्रभु का विरोध करने में सक्षम हूँ। यह प्रभु की अपेक्षा पर ज़रा भी खरा नहीं उतरता। ओह! मैंने प्रभु की शिक्षाओं का पालन करने के लिए कितनी बार संकल्प किया, फिर भी मैं प्रभु के वचन का अभ्यास में नहीं ला पाया हूँ। ऐसी परिस्थितियों में, मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य कैसे हो सकता हूँ? प्रभु यीशु ने कहा: 'जो मुझ से, "हे प्रभु! हे प्रभु!" कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है' (मत्ती 7:21)। प्रभु के वचनों के अनुसार, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना उतना आसान नहीं है जितना हम सोचते हैं। प्रभु पवित्र है, तो ऐसे लोग जो प्रभु के वचन का अभ्यास नहीं कर सकते और जो अक्सर उसका विरोध करते हैं, स्वर्ग के राज्य में कैसे उठाए जा सकते हैं? केवल वे लोग जो बदल गए हैं और जो प्रभु की इच्छा का पालन करते हैं, वे ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं!"

मेरी पत्नी ने एक पल के लिए सोचा और कहा, "तुम जो कह रहे हो उसमें दम तो है। प्रभु पवित्र है और हम अभी भी पापी हैं। हम प्रभु के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं। बस बात यह है ... मुझे अचानक याद आया ... क्या पादरी ल्यू ने कलीसिया में कोरियाई पादरी किम को आमंत्रित नहीं किया है? क्यों न इस बार हम इस मुद्दे पर खोज करें?" मैंने कहा: "ठीक है, वह भी सही है। प्रभु यीशु ने कहा: 'माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा' (मत्ती 7:7)। जब तक हम खोजते हैं, मुझे विश्वास है कि प्रभु हमारी अगुआई करेगा। एक पादरी होने के नाते, मुझे अपने भाइयों और बहनों के जीवन के बारे में सोचना होगा। अगर मैं अपने विश्वास में लापरवाह हो गया, तो उनके साथ-साथ अपना भी नुकसान कर बैठूँगा। तो चलो, हम कोरियाई पादरी किम के आने की प्रतीक्षा करें और फिर इस मुद्दे के बारे में उससे पूछें।"

क्योंकि मैं पादरी किम से मिलना चाहता था, मैंने पादरी किम के बारे में कुछ जानना चाहा। तो मैंने इंटरनेट पर उस कोरियाई कलीसिया की जाँच की जिससे वे जुड़े थे। जो पृष्ठ सामने आए उनमें, मैंने वेबसाइट https://www.holyspiritspeaks.org देखी। मैंने वेबसाइट खोली और इन वचनों ने मुझे आकर्षित किया: "मनुष्य ने बहुतायत से अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार की आशीष, और बीमारियों से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के भले कर्म और उसका ईश्वर के अनुरूप प्रकटन था; यदि मनुष्य इस तरह के आधार पर जीवन जी सकता था, तो उसे एक उपयुक्त विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ है कि उन्हें बचा लिया गया था। परन्तु, अपने जीवन काल में, उन्होंने जीवन के मार्ग को बिलकुल भी नहीं समझा था। वे बस एक निरंतर चक्र में पाप करते थे, फिर पाप-स्वीकारोक्ति करते थे और अपना स्वभाव बदलने के पथ पर कोई प्रगति नहीं करते थे: अनुग्रह के युग में मनुष्य की दशा ऐसी ही थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं!" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)")। ये वचन इतने अच्छे थे कि मैं आगे पढ़ना जारी रखने से खुद को रोक नहीं सका: "इसलिए, उस चरण के कार्य के पूरा हो जाने के पश्चात्, अभी भी न्याय और ताड़ना का काम बाकी है। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाने के लिए है ताकि मनुष्य को अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान किया जाए। यह चरण फलप्रद या अर्थपूर्ण नहीं होगा यदि यह दुष्टात्माओं को निकालना जारी रखता है, क्योंकि यह मनुष्य के पापी स्वभाव को दूर करने में असफल हो जाएगा और मनुष्य केवल पापों की क्षमा पर आकर रुक जाएगा। पापबलि के माध्यम से, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया बनाए जाने में सक्षम बनाता है; यह कार्य का ऐसा चरण है जो अधिक विस्तृत है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)")। इसे पढ़कर, मैं बेहद उत्साहित हुआ। हालांकि मैं इन वचनों को पूरी तरह से समझ नहीं पाया था और कुछ वचनों ने मुझे उलझन में भी डाल दिया, फिरे भी उन्होंने मुझे आशा दी। मुझे लगा कि यहाँ मुझे शुद्ध हने और खुद को बदलने का एक मार्ग मिल सकता है। मैंने अपनी प्रार्थना सुनने के लिए प्रभु का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया। पढ़ना जारी रखते हुए मैंने महसूस किया कि ये वचन वास्तव में बहुत शानदार थे और उन्होंने मेरी प्यासी आत्मा का सिंचन किया और इसकी चरवाही की। मैंने वेबसाइट पर यह लिखा हुआ देखा: "यदि आपको अपने देश या क्षेत्र में सुसमाचार हॉटलाइन नहीं मिल रही है, तो कृपया एक संदेश भेजें और हम जल्द से जल्द आपसे संपर्क करेंगे।" मैंने सरसरी निगाह से देखा, लेकिन फिलीपींस की कोई सुसमाचार हॉटलाइन नहीं थी, इसलिए मैंने तुरंत एक संदेश छोड़ा और अपना संपर्क नंबर और इमेल पता देने में संकोच नहीं किया।

उस शाम घर लौटने के बाद, मैंने अपनी पत्नी को यह समाचार बताया, और मैंने जो कहा उसे सुनने के बाद, मेरी पत्नी भी इसकी खोज करने को तैयार थी। मैं वास्तव में प्रभु का शुक्रिया अदा करता हूँ कि अगले दिन उन्होंने मेरे संदेश का जवाब दिया और उसी दोपहर को हमसे ऑनलाइन बात करने की व्यवस्था की। दोपहर को, हमने बहन ल्यू और बहन स्यू से बात की। वार्तालाप से, मुझे लगा कि उन्होंने सरलता, कुशलता, और अंतर्दृष्टि के साथ बात की थी। मेरी पत्नी मुझसे भी ज्यादा उत्साहित थी, वह बोली, "अगर मैं एक सवाल पूछूं तो आपको एतराज़ तो नहीं होगा?" उन्होंने उत्साहपूर्वक कहा, "बिल्कुल पूछिये।" मेरी पत्नी ने कहा, "आपकी कलीसिया की वेबसाइट पर यह लिखा है, 'अंत के दिनों के प्रभु ने न्याय और ताड़ना के कार्य का एक चरण किया है।' मेरे पति और मैं, हम यह जानते हैं कि कोई भी अपवित्र व्यक्ति प्रभु को नहीं देख पाएगा क्योंकि प्रभु पवित्र है, लेकिन रोमियों में यह कहा गया है, 'कि यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्‍वास करे कि परमेश्‍वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्‍चय उद्धार पाएगा' (रोमियों 10:9), 'जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा' (रोमियों 10:13)। अगर हम प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं तो हम पहले से ही बचाए जा चुके हैं और हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं, तो अंत के दिनों का परमेश्वर न्याय और ताड़ना के कार्य के एक चरण को क्यों कर रहा है? मैं इस मुद्दे को समझ नहीं पा रही हूँ और इस पर आपके विचार जानने की उम्मीद करती हूँ।"

बहन ल्यू ने जवाब दिया, "प्रभु को धन्यवाद हो! चलिए, हम मिलकर सहभागिता करते हैं और परमेश्वर को हमारा मार्गदर्शन करने देते हैं। आइये, पहले हम देखें कि यहाँ 'बचाए जाने' का अर्थ क्या है। व्यवस्था के युग के उत्तरार्ध में, सभी लोगों परमेश्वर से दूर हो गए थे, और उनके हृदय में परमेश्वर का भय नहीं था। वे अधिक से अधिक पापी हो गए थे और यहाँ तक कि वे अंधे, लंगड़े और रोगग्रस्त मवेशियों, भेड़ों और कबूतरों की बलि भी चढ़ाया करते थे। उस युग के लोग व्यवस्था को कायम नहीं रख पा रहे थे और वे सभी व्यवस्था तोड़ने के लिए मौत की सज़ा पाने के खतरे में थे। ऐसी परिस्थितियों में, लोगों को व्यवस्था के तहत निश्चित मौत से बचाने के लिए, परमेश्वर ने स्वयं देहधारण कर छुटकारे के कार्य को शुरू किया और अंत में, पूरी मानव जाति को पाप से छुड़ाने के लिए वह क्रूस पर चढ़ाया गया था। प्रभु यीशु में विश्वास करने के कारण लोगों को उनके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया था और इस प्रकार वे प्रभु के सामने आने, प्रभु से प्रार्थना करने और परमेश्वर की कृपा के आशीर्वाद का आनंद लेने के योग्य बन गए थे। अनुग्रह के युग में 'बचाए जाने' का यह वास्तविक अर्थ है। दूसरे शब्दों में, 'बचाए जाना' केवल मनुष्यों के पापों की क्षमा है। अर्थात, परमेश्वर लोगों को पापी नहीं मानता है, हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि लोग सहज रूप से पापी नहीं हैं। इसलिए, बचाए जाने का मतलब यह नहीं है कि हम पूरी तरह शुद्ध हो गए और बचा लिए गए हैं। अगर हम शुद्ध होना चाहते हैं, तो हमें अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना होगा।"

उनकी सहभागिता को सुनकर, मेरी पत्नी और मैं यह समझ गए कि "बचाया जाना", जिसका कि रोमियों के धर्म-पत्र में उल्लेख किया गया है, वो प्रभु यीशु द्वारा दिए गए उद्धार की स्वीकृति को और व्यवस्था तोड़ने के लिए अब मृत्यु की सज़ा न पाने को संदर्भित करता था। "बचाए जाने" का अर्थ पूरी तरह से शुद्ध हो जाना नहीं था, जैसा कि हमने कल्पना की थी। उन्होंने जो कहा, वह अर्थपूर्ण लगा। "बचाए जाने" की ये व्याख्या पाप करने और पापों को स्वीकार करने की हमारी स्थिति से मेल खाती थी। तो प्रभु यीशु ने जो किया वह केवल छुटकारे का कार्य था, यह इंसान को पूरी तरह से शुद्ध करने और बचाने का कार्य नहीं था। भले ही जब लोग प्रभु में विश्वास करते हैं तो वे बचाए जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे पूरी तरह से शुद्ध हो गए हैं। उनकी सहभागिता को सुनकर, मुझे लगा कि इसमें खोज करने के लिए सत्य मौजूद था, इसलिए मैंने उनकी सहभागिता को और आगे सुनने की मेरी इच्छा व्यक्त की। मैंने कहा, "प्रभु को धन्यवाद हो! आपकी बातें अद्भुत हैं। आपके साथ सहभागिता करने से, हम 'बचाए जाने' के वास्तविक अर्थ को समझ गए हैं। कृपया अपनी सहभागिता जारी रखेँ। प्रभु हमारा मार्गदर्शन करे।" बहन सू ने कहा, "बढ़िया, आइये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के कुछ अनुच्छेद पढ़ें और सब कुछ और-भी स्पष्ट हो जाएगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहत है: 'उस समय यीशु का कार्य समस्त मानव जाति के छुटकारा का था। उन सभी के पापों को क्षमा कर दिया गया था जो उसमें विश्वास करते थे; जितने समय तक तुम उस पर विश्वास करते थे, उतने समय तक वह तुम्हें छुटकारा देगा; यदि तुम उस पर विश्वास करते थे, तो तुम अब और पापी नहीं थे, तुम अपने पापों से मुक्त हो गए थे। यही है बचाए जाने, और विश्वास द्वारा उचित ठहराए जाने का अर्थ। फिर भी जो विश्वास करते थे उन लोगों के बीच, वह रह गया था जो विद्रोही था और परमेश्वर का विरोधी था, और जिसे अभी भी धीरे-धीरे हटाया जाना था। उद्धार का अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य पूरी तरह से यीशु द्वारा प्राप्त कर लिया गया था, लेकिन यह कि मनुष्य अब और पापी नहीं था, कि उसे उसके पापों से क्षमा कर दिया गया था: बशर्ते कि तुम विश्वास करते थे कि तुम कभी भी अब और पापी नहीं बनोगे' ("वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)")। 'मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पापों को क्षमा किया जाता था, परन्तु वह कार्य, कि आखिर किस प्रकार मनुष्य के भीतर से उन शैतानी स्वभावों को निकाला जाना है, अभी भी बाकी था। मनुष्य को केवल उसके विश्वास के कारण ही बचाया गया था और उसके पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु उसका पापी स्वभाव उसमें से निकाला नहीं गया था और वह तब भी उसके अंदर बना हुआ था। मनुष्य के पापों को देहधारी परमेश्वर के द्वारा क्षमा किया गया था, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं रह गया है। पाप बलि के माध्यम से मनुष्य के पापों को क्षमा किया जा सकता है, परन्तु मनुष्य इस मसले को हल करने में पूरी तरह असमर्थ रहा है कि वह कैसे आगे और पाप नहीं कर सकता है और कैसे उसके पापी स्वभाव को पूरी तरह से दूर किया जा सकता है और उसे रूपान्तरित किया जा सकता है। परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। ऐसा होने के कारण, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और वो फिर कभी विकसित न हो, जो मनुष्य के स्वभाव को बदलने में सक्षम बनाये। इसके लिए मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और वो जो कुछ भी करे वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वो अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा' ("वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)")। 'यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके स्वभाव, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था, से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे' ("वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना)। हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से देख सकते हैं कि यदि हम केवल अनुग्रह के युग से परमेश्वर के छुटकारे के कार्य से चिपके रहते हैं और परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, तो हमारे पाप की समस्या का समाधान नहीं होगा। अंत के दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर आ चुका है और वो छुटकारे की नींव पर इंसान का न्याय और शुद्धिकरण करते हुए कार्य के एक चरण को कार्यान्वित कर रहा है। वह इंसान की भ्रष्टता की सच्चाई को प्रकट करने और उसकी शैतानी प्रकृति का न्याय करने के लिए सत्य वचन बोल रहा है। वह लोगों के शैतानी स्वभाव को बदलने और शैतान के प्रभाव से लोगों को पूरी तरह से मुक्त करने और उन्हें बचाने के लिए आया है ताकि वे पूर्ण उद्धार पा सकें। यह स्पष्ट है कि अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय का कार्य लोगों को शुद्ध करने, बचाने और पूर्ण करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और बुनियादी कार्य है। इसलिए, केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार करके हम अपने भ्रष्ट सार और प्रभु के धार्मिक स्वभाव की सच्ची समझ पा सकते हैं, पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं, परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हैं और और ऐसे लोग बन सकते हैं जो परमेश्वर का आज्ञापालन, उसकी आराधना करते हों और परमेश्वर के साथ अनुकूल हों।"

इन सहभागिताओं को सुनकर, मेरा दिल उज्ज्वल हो गया और मुझे लगा जैसे लम्बे समय से चल रही मेरी उलझनों का अंततः समाधान हो गया है। तो अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने सिर्फ छुटकारे का कार्य किया था, न कि लोगों को उनके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से मुक्त करने का काम किया था। परमेश्वर के अंत के दिनों में देहधारण के द्वारा सत्य के प्रकाशन का न्याय का कार्य, इंसान के पूर्ण शुद्धिकरण और उद्धार का कार्य है। तो परमेश्वर वास्तव में कैसे लोगों को शुद्ध करता, बदलता और उन्हें पूरी तरह से बचाता है? मैं इस सवाल का जवाब जानने के लिए उत्सुक था। तो मैं तुरंत यह सवाल पूछ बैठा, "आपने अभी जो बात की है उसे मैं समझ गया हूँ और जानता हूँ कि केवल लौटे हुए प्रभु के द्वारा न्याय के कार्य के एक चरण को करने से ही हम शुद्धिकरण प्राप्त कर सकते हैं। यह वही है जिसके लिए मैं काफी समय से तरस रहा हूँ। अब मैं जो वास्तव में जानना चाहता हूँ वह यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कैसे लोगों को शुद्ध करने और बचाने के लिए न्याय का कार्य करता है? कृपया अपनी सहभागिता साझा करें।"

बहन सू ने आगे कहा, "यह सवाल कि लोगों को शुद्ध करने और बचाने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर कैसे न्याय का कार्य करता है, उस हर एक व्यक्ति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो परिवर्तन और शुद्धिकरण प्राप्त करना चाहता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य के इस पहलू पर विशेष स्पष्टता प्रदान करते हैं। मैं आपको सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन भेज दूँगी। भाई, कृपया उन्हें ज़रूर पढ़ें!"

मैंने उत्साहित होकर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ा: "अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को उजागर करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए, हर व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को करता है, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध दुश्मन की शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में, परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है; बल्कि वह लम्बे समय तक इसे उजागर करता है, इससे निपटता है, और इसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने की इन विधियों, निपटने, और काट-छाँट को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके की विधियाँ ही न्याय समझी जाती हैं; केवल इसी तरह के न्याय के माध्यम से ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इसके अलावा मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य जिस चीज़ को उत्पन्न करता है वह है परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है जो उसके लिए समझ से परे हैं। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसकी भ्रष्टता के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा पूरे होते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है")।

जब मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ लिया, बहन सू ने अपनी सहभागिता जारी रखी, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट रूप से बताते हैं कि परमेश्वर कैसे लोगों का न्याय करता है और उन्हें शुद्ध करता है। अंत के दिनों में परमेश्वर मुख्य रूप से इंसान के भ्रष्ट स्वभाव और परमेश्वर का विरोध करने वाली इंसान की शैतानी प्रकृति का समाधान करने के लिए सत्य वचन कह रहा है जिससे वह इंसान का न्याय और शुद्धिकरण कर सके एवं उसे बचा सके। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सत्य के कई पहलू व्यक्त किए हैं—कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, कैसे परमेश्वर लोगों को बचाता है, सिर्फ़ एक इंसान का अनुसरण करना क्या है, परमेश्वर का अनुपालन करना क्या है, हमारी आस्था में हमारा दृष्टिकोण क्या होना चाहिए, स्वभाव में परिवर्तन क्या होता है, परमेश्वर का भय मानना और बुराई का दूर रहना क्या होता है, परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करना क्या है, ईमानदार व्यक्ति कैसे बनें, आदि। ये सभी सत्य अधिकार और सामर्थ्य से भरे हैं और लोगों को जीवन की आपूर्ति दे सकते हैं। यह अनन्त जीवन का मार्ग है जिसे परमेश्वर मानवजाति को प्रदान करता है। जब तक लोग परमेश्वर के वचन को स्वीकार करते हैं और उसका अभ्यास करते हैं, वे शुद्धिकरण और उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। हमने अनेक वर्षों तक सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के कार्य का अनुभव करने के बाद इन बातों का व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। जब हम इंसान के न्याय, ताड़ना और प्रकाशन के बारे में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि परमेश्वर के वचन, एक दुधारी तलवार की तरह, हमारे विद्रोह, भ्रष्टता, प्रतिरोध, गलत इरादों, अवधारणाओं और कल्पनाओं और यहाँ तक कि हमारे दिलों की गहराई में छिपे शैतानी विषाक्त पदार्थों को उजागर करते हैं। वे हमें दिखाते हैं कि हम वास्तव में शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट किए गए हैं और हम घमंडी और आत्मतुष्ट, कुटिल और चालाक, स्वार्थी और नीच, और निज हितों को छोड़कर बाकी सभी के प्रति अंधे हैं, हममें परमेश्वर का कोई डर नहीं है। हम देखते हैं कि हमारे कार्य, दिल और दिमाग, गंदगी और भ्रष्टाचार से भरे हुए हैं, हम में इन्सानों जैसा कुछ है ही नहीं। हम सभी अपने चेहरे दिखाने में शर्मिंदा महसूस करते हैं। हमें एहसास होता है कि यदि हम शैतानी भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीना जारी रखते हैं, तो हम हमेशा ऐसे लोग होंगे जो परमेश्वर को घृणा से भर देते हैं, हम कभी भी परमेश्वर की सराहना हासिल करने में सक्षम नहीं होंगे और हम हटाये जाने और सज़ा पाने के लिए नियत कर दिये जाएंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का न्याय और प्रकाशन के कारण हम परमेश्वर के प्रतापी, क्रोधपूर्ण और धार्मिक स्वभाव को पहचान पते हैं, और हम धीरे-धीरे परमेश्वर का भय मानने वाला एक दिल विकसित करते हैं साथ ही हममें सच्चा पश्चाताप और परिवर्तन भी विकसित होते हैं। तब ऐसा लगता है कि हम कुछ-कुछ इंसान की समानता में जी रहे हैं और हम देखते हैं कि हमने वास्तव में परमेश्वर के महान उद्धार को प्राप्त कर लिया है। अगर परमेश्वर का न्याय हम पर नहीं आया होता, तो हम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को जो मनुष्य के अपराध को सहन नहीं करता है, और उसके पवित्र और अच्छे सार को, नहीं जान पाते। हम अपने विद्रोह और अपनी भ्रष्टता के लिए घृणा विकसित नहीं कर पाते, और न ही हम हमारी भ्रष्टता को दूर कर शुद्ध होने में सक्षम हो पाते। इसलिए हम जितना अधिक परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव करते हैं, उतना ही हम देखते हैं कि परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना ही हमारी सर्वोत्तम देखरेख है, हमारे लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद, और सबसे वास्तविक उद्धार है!"

बहन ल्यू ने भी सहभागिता की, "अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय और ताड़ना का कार्य, लोगों को पूरी तरह से शुद्ध करने, बचाने और पूर्ण करने का काम है। यदि हम अंतिम दिनों के मसीह के सिंहासन के सामने न्याय को स्वीकार नहीं करते हैं, तो हम शुद्धिकरण और हमारे जीवन स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे, और निश्चित रूप से इसका नतीजा परमेश्वर द्वारा अस्वीकार किया जाना और हटा दिया जाना होगा, हम विनाश का सामना करेंगे और नष्ट हो जाएँगे। हमें उद्धार और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का मौका कभी नहीं मिलेगा। यह सत्य है।"

मैंने खुशी से कहा, "परमेश्वर का धन्यवाद हो! आपकी सहभागिता को सुनने के बाद मैं अपने दिल में बहुत उज्ज्वल महसूस कर रहा हूँ। मैंने प्रभु में इतने सालों से विश्वास किया है, लेकिन वास्तव में मैं पाप में जीता रहा हूँ और इससे मुक्त होने में असमर्थ रहा हूँ। अब मैं समझता हूँ कि यदि मैं अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अनुभव नहीं करता हूँ, तो मैं पाप के बंधन और अंकुश से मुक्त नहीं हो पाऊंगा। अब मुझे शुद्धिकरण और पूर्ण उद्धार का मार्ग मिल गया है।" कई दिनों की सहभागिता के बाद, मेरी पत्नी ने और मैंने कुछ सत्य समझ लिये और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया।

मुझसे प्रेम करने और मुझे बचाने के लिए मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ! एक पादरी के रूप में यह मेरी ज़िम्मेदारी और मेरा दायित्व है कि मैं उन सभी पादरियों और भाइयों और बहनों को जिन्हें मैं जानता हूँ, परमेश्वर के सामने लाऊं। कुछ समय तक इन भाई-बहनों के साथ काम करने के बाद, न केवल बैठक मे भाग लेने वाले कलीसिया के दर्जनों भाइयों और बहनों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार किया, बल्कि मैं एक अन्य गृह कलीसिया के पादरी को भी परमेश्वर के परिवार में ले आया और उसकी कलीसिया के अधिकांश भाई-बहन भी परमेश्वर के सामने लौट आए। मुझे यह देखकर खुशी हुई कि उन भाई-बहनों ने अंत के दिनों में परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार कर लिया था और वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने उठाए गए थे। यह सब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य का सुफल है: सारी महिमा सर्वशक्तिमान परमेश्वर की हो!

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