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धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि क्रूस पर प्रभु यीशु का यह कहना कि “पूरा हुआ” यह सबूत है कि परमेश्वर का उद्धार का कार्य पहले ही पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। और फिर भी तुम यह प्रमाण देते हो कि परमेश्वर सत्य को व्यक्त करने के लिए और लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करने के लिए देह में लौटा है। तो मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य को वास्तव में कैसे समझना चाहिए? हम सच्चाई के इस पहलू पर स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए कृपया हमारे लिए इस पर सहभागिता करो।

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उत्तर:

धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग सोचते हैं: जब प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया और मृत्यु के पहले उसने कहा कि "पूरा हुआ" तो यह साबित करता है कि परमेश्वर द्वारा उद्धार का कार्य सम्पूर्णता से पूरा हुआ था, और अब और कोई कार्य नहीं होगा। इस प्रकार, यह सुनकर कि अंतिम दिनों में परमेश्वर कार्य का एक नया चरण कर रहा है, बहुत से लोगों ने इसे पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया है। उन्हें लगता है कि यह एक असंभव बात है। चलो, जब बात इस पर आई है, तो इस मामले की सच्चाई क्या है? जब प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था, क्या उसका यह मतलब हुआ या नहीं कि मानव जाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य सम्पूर्णता से "पूरा" हो गया था? क्या परमेश्वर द्वारा "पूरा हुआ" कहने का मतलब यह था कि परमेश्वर द्वारा मानव जाति के छुटकारे का सब कार्य पूरा हुआ था, या इसका मतलब यह था कि परमेश्वर द्वारा मानव जाति को बचाने का समस्त कार्य पूरा हो गया था?

आओ, हम कल्पना करें: अगर प्रभु यीशु द्वारा क्रूस पर "पूरा हुआ" कहने का मतलब यह था कि परमेश्वर का मानव जाति को बचाने से सम्बंधित समस्त कार्य पूरा हुआ, तो क्या परमेश्वर फिर भी हमसे उद्धार के परवर्ती कार्य की भविष्यवाणी करता? हरगिज नहीं! इस मुद्दे पर हर भाई और बहन को सहमत होना चाहिए। और यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि प्रकाशित वाक्य पुस्तक की सभी भविष्यवाणियां, अंतिम दिनों में परमेश्वर के उद्धार के कार्य से सम्बंधित हैं, जैसा कि प्रकाशित वाक्य, अध्याय 1 के छंद 1 से 3 के अनुसार, जिसमें लिखा है: "यह यीशु मसीह का दैवी-सन्देश है जो उसे परमेश्वर द्वारा इसलिए दिया गया था कि जो बातें शीघ्र ही घटने वाली हैं, उन्हें अपने दासों को दर्शा दिया जाए। अपना स्वर्गदूत भेजकर यीशु मसीह ने इसे अपने सेवक यूहन्ना को संकेत द्वारा बताया। यूहन्ना ने जो कुछ देखा था, उसके बारे में बताया। यह वह सत्य है जिसे उसे यीशु मसीह ने बताया था। यह वह सन्देश है जो परमेश्वर की ओर से है। वे धन्य हैं जो परमेश्वर के इस दैवी सुसन्देश के शब्दों को सुनते हैं और जो बातें इसमें लिखी हैं, उन पर चलते हैं। क्योंकि संकट की घड़ी निकट है।" प्रकाशित वाक्य की पुस्तक में, यीशु मसीह ने यूहन्ना को उन चीज़ों के बारे में बताया जो जल्द ही घटित होंगी और उसे इन बातों का आलेख बनाने दिया ताकि हम विश्वास कर सकें। प्रकाशित वाक्य में अध्याय 14 के 6 और 7 छंदों में भी अंतिम दिनों में परमेश्वर क्या करेगा, इसका विशेष रूप से आलेख है: "फिर मैंने आकाश में ऊँची उड़ान भरते एक और स्वर्गदूत को देखा। उसके पास धरती के निवासियों, प्रत्येक देश, जाति, भाषा और कुल के लोगों के लिए सुसमाचार का एक अनन्त सन्देश था। ऊँचे स्वर में वह बोला, 'परमेश्वर से डरो और उसकी स्तुति करो। क्योंकि उसके न्याय करने का समय आ गया है। उसकी उपासना करो, जिसने आकाश, पृथ्वी, सागर और जलस्रोतों की रचना की है'"। जब वह पृथ्वी पर था, तो प्रभु यीशु ने खुद ही भविष्यवाणी की: "मुझे अभी तुमसे बहुत सी बातें कहनी हैं किन्तु तुम अभी उन्हें सह नहीं सकते। 13 किन्तु जब सत्य का आत्मा आयेगा तो वह तुम्हें पूर्ण सत्य की राह दिखायेगा क्योंकि वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। वह जो कुछ सुनेगा वही बतायेगा। और जो कुछ होने वाला है उसको प्रकट करेगा" (यूहन्ना 16:12-13)। इन भविष्यवाणियों से, हम जानते हैं कि अंतिम दिनों में परमेश्वर द्वारा अभी भी उद्धार का कार्य करना बाकी है; अर्थात, अंतिम दिनों में, परमेश्वर न्याय का कार्य करेगा, और सच्चाई का आत्मा हमें सभी सच्चाइयों में मार्गदर्शन देगा। इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है: प्रभु यीशु का क्रूस पर चढ़ाये जाने का कार्य परमेश्वर के उद्धार के सभी कार्य का अंत नहीं था, और प्रभु यीशु का क्रूस पर "पूरा हुआ" कहने का अर्थ है कि उसका क्रूस पर चढ़ाये जाना मानव जाति के छुटकारे के कार्य को पूरा करता है; इसका अर्थ यह नहीं था कि मानव जाति को बचाने का समस्त कार्य ही पूरा हो गया था।

हम सभी जानते हैं, जब से मानव जाति शैतान द्वारा भ्रष्ट हुई थी, तब से परमेश्वर मानव जाति को बचाने का कार्य कर रहा है। वह मनुष्य को शैतान के क्षेत्र से बचाएगा और मनुष्य को को उसकी मूल पवित्रता को बहाल करने देगा। वह शैतान को पूर्ण रूप से पराजित करेगा, शैतान के भाग्य का फ़ैसला करेगा। जब मनुष्य पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाता है, पाप के बंधन से मुक्ति पाता है, परमेश्वर से शुद्ध किया जाता है, तो परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य सम्पूर्णता से पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे।

परमेश्वर इस कार्य को मानव जाति के विकास की ज़रूरतों के अनुसार चरणों में करेगा, उत्तरोत्तर और अपनी योजना के मुताबिक, निश्चित रूप से आँख मूँद कर या लापरवाही से नहीं। परमेश्वर मानवजाति को बचाने के अपने पूरे प्रबंधन कार्य को पूरा करने में युग और चरणों को अलग-अलग करता है। सबसे पहले, परमेश्वर ने मूसा के माध्यम से व्यवस्था का प्रावधान किया था, जिसमें व्यवस्था का पालन करना मनुष्य के लिए आवश्यक था, ताकि मनुष्य को पता चले कि पृथ्वी पर कैसे रहना है, साथ ही मनुष्य को यह दिखाया गया कि पाप क्या था। फिर परमेश्वर ने, मानव जाति की ज़रूरतों के अनुसार, अनुग्रह के युग को खोल दिया और व्यक्तिगत रूप से कार्य करने के लिए देहधारण किया, उसने बीमारों को ठीक किया और दुष्ट राक्षसों को बाहर निकाला, मनुष्य को अंतहीन अनुग्रह प्रदान किया, और अंत में वह मनुष्य के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया, अपने पवित्र शरीर की पापबलि देते हुए, ताकि मनुष्य को पाप से छुटकारा मिल सके। मनुष्य को केवल प्रभु में विश्वास करने की और अपने पाप को कबूल करने की ज़रूरत है, ताकि उसे पाप की क्षमा मिल सके। बहरहाल, हालांकि हमने प्रभु यीशु के छुटकारे को प्राप्त किया है और हमारे पापों को क्षमा किया गया है, हमारी पापी प्रकृति तो अभी भी मौजूद है; हम दिन में पाप करने और रात को कबूल करने के चक्रीय जीवन को जीते रहते हैं, और पाप के बंधनों को छोड़ने का कोई रास्ता नहीं होता, जैसा कि पौलुस ने कहा था: "नेकी करने के इच्छा तो मुझ में है पर नेक काम मुझ से नहीं होते" (रोमियों 7:18)। अगर पौलुस भी ऐसा ही था, तो आज हम क्या कर सकते हैं? इसके अलावा, बाइबल कहती है: "सभी के साथ शांति के साथ रहने और पवित्र होने के लिए हर प्रकार से प्रयत्नशील रहो; बिना पवित्रता के कोई भी प्रभु का दर्शन नहीं कर पाए" (इब्रा.12:14) यदि मामला यह है, तो हमारे बीच प्रभु को कौन देख सकता है? हम सभी जानते हैं, बाइबल में लिखा है: "जो विश्वास से सुरक्षित है, उन्हें वह उद्धार जो समय के अंतिम छोर पर प्रकट होने को है, प्राप्त हो" (1 पतरस 1:5)। "सो वैसे ही मसीह को, एक ही बार अनेक व्यक्तियों के पापों को उठाने के लिए बलिदान कर दिया गया। और वह पापों को वहन करने के लिए नहीं, बल्कि जो उसकी बाट जोह रहे हैं, उनके लिए उद्धार लाने को फिर दूसरी बार प्रकट होगा"( (इब्रा.9:28)। इन छंदों से हम देख सकते हैं: पतरस ने कहा कि उद्धार का अंतिम दिनों में प्रकट होना बाकी है, और इब्रानियों में भी स्पष्ट रूप से लिखा है कि मसीह हमें बचाने के लिए दूसरी बार प्रकट होगा, जिससे कि हम प्रभु के चेहरे को देखने के लिए पर्याप्त रूप से पवित्र बन सकें। यह दर्शाता है कि प्रभु यीशु द्वारा "पूरा हुआ" कहने का मतलब केवल यह था कि मानव जाति को छुड़ाने के लिए क्रूस पर चढ़ाये जाने का उसका काम पूरा हो गया था, यह नहीं कि परमेश्वर द्वारा उद्धार का समस्त कार्य पूरा हो गया था। इस प्रकार हम देखते हैं, मानव जाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है। हमें अभी भी परमेश्वर की ज़रूरत है कि वह कार्य के एक और चरण को पूरा कर हमें पूरी तरह से शुद्ध और परिवर्तित कर दे। अन्यथा, हम परमेश्वर के चेहरे को देखने के लिए अयोग्य हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है: "मनुष्य के लिए, परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने ने परमेश्वर के देहधारण के कार्य को संपन्न किया, समस्त मानव जाति को छुटकारा दिलाया, और परमेश्वर को अधोलोक की चाबी ज़ब्त करने की अनुमति दी। हर कोई सोचता है कि परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से निष्पादित हो चुका है। वास्तविकता में, परमेश्वर के लिए, उसके कार्य का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही निष्पादित हुआ है। उसने मानव जाति को केवल छुटकारा दिलाया है; उसने मानवजाति को जीता नहीं है, मनुष्य में शैतान की कुटिलता को बदलने की बात को तो छोड़ो। यही कारण है कि परमेश्वर कहता है, 'यद्यपि मेरी देहधारी देह मृत्यु की पीड़ा से गुज़री है, किन्तु वह मेरे देहधारण का पूर्ण लक्ष्य नहीं था। यीशु मेरा प्यारा पुत्र है और उसे मेरे लिए सलीब पर चढ़ाया गया था, किन्तु उसने मेरे कार्य का पूरी तरह से समापन नहीं किया। उसने केवल इसका एक अंश पूरा किया'"

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (6)"

"यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इसे केवल इतना ही माना जाता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। हालाँकि, जब मनुष्य देह में रहता है और उसे पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को अंतहीन रूप से प्रकट करते हुए, केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को स्वीकार कर सकें। वैसे तो, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदैव प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है ..."

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (4)"

"तुम सिर्फ यह जानते हो कि यीशु अन्तिम दिनों के दौरान आयेगा, परन्तु वास्तव में वह कैसे आयेगा? तुम जैसा पापी, जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, और परिवर्तित नहीं किया गया है, या परमेश्वर के द्वारा सिद् नहीं किया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो अभी भी पुराने मनुष्यत्व के हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और यह कि परमेश्वर के उद्धार के कारण तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुमने अपने आपको नहीं बदला है तो तुम संत के समान कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता के द्वारा घिरे हुए हो, स्वार्थी एवं कुटिल हो, फिर भी तुम चाहते हो कि यीशु के साथ आओ – तुम्हें बहुत ही भाग्यशाली होना चाहिए! तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में एक चरण में चूक गए हो: तुम्हें महज छुड़ाया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें बदलने एवं शुद्ध करने के कार्य को करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुड़ाया गया है, तो तुम शुद्धता को हासिल करने में असमर्थ होगे। इस रीति से तुम परमेश्वर की अच्छी आशिषों में भागी होने के लिए अयोग्य होगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंध करने के परमेश्वर के कार्य के एक चरण को पाने का ससुअवसर खो दिया है, जो बदलने एवं सिद्ध करने का मुख्य चरण है। और इस प्रकार तुम, एक पापी जिसे बस अभी अभी छुड़ाया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हैं"

"वचन देह में प्रकट होता है" से "पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में"

तो, हमें पाप करना बंद करने के लिए, हमारे पापी स्वभाव को पूरी तरह से त्याग देने के लिए, और इस तरह पवित्र हो जाने के लिए कि हम परमेश्वर का चेहरा देख सकें, क्या करना होगा? आज परमेश्वर के दूसरे देहधारण में व्यक्त किए गए जीवन के वचनों ने हमें पूरा उद्धार प्राप्त करने का मार्ग दिखाया है: "परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। वैसे तो, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अवश्य पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और फिर कभी विकसित न हो, इस प्रकार मनुष्य के स्वभाव को बदले जाने की अनुमति दी जाए। इसके लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और यह कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को कर सके, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। जब यीशु अपना काम कर रहा था, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान तब भी अज्ञात और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा यह विश्वास किया कि वह दाऊद का पुत्र है और उसके एक महान भविष्यद्वक्ता और उदार प्रभु होने की घोषणा की जिसने मनुष्य को पापों से छुटकारा दिया था। विश्वास के आधार पर मात्र उसके वस्त्र के छोर को छू कर ही कुछ लोग चंगे हो गए थे; अंधे देख सकते थे और यहाँ तक कि मृतक को जिलाया भी जा सकता था। हालाँकि, मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को नहीं समझ सका और न ही मनुष्य यह जानता था कि उसे कैसे दूर किया जाए। मनुष्य ने बहुतायत से अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति के विश्वास करने पर पूरे परिवार की आशीष, और बीमारियों से चंगाई के इत्यादि। शेष मनुष्य भले कर्म और उनका ईश्वरीय प्रकटन था; यदि मनुष्य इस तरह के आधार पर जीवन जी सकता था, तो उसे एक अच्छा विश्वासी माना जाता था। केवल ऐसे विश्वासी ही मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ है कि उन्हें बचा लिया गया था। परन्तु, अपने जीवन काल में, उन्होंने जीवन के मार्ग को बिलकुल भी नहीं समझा था। उन्होंने बस पाप किए थे, फिर परिवर्तित स्वभाव की ओर बिना किसी मार्ग वाले निरंतर चक्र में पाप-स्वीकारोक्ति की थी; अनुग्रह के युग में मनुष्य की दशा ऐसी ही थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया था? नहीं! इसलिए, उस चरण के पूरा हो जाने के पश्चात्, अभी भी न्याय और ताड़ना का काम है। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाता है ताकि मनुष्य को अनुसरण करने का एक मार्ग प्रदान किया जाए। यह चरण फलप्रद या अर्थपूर्ण नहीं होगा यदि यह दुष्टात्माओं को निकालना जारी रखता है, क्योंकि मनुष्य के पापी स्वभाव को दूर नहीं जाएगा और मनुष्य केवल पापों की क्षमा पर आकर रुक जाएगा। पापबलि के माध्यम से, मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले से ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर शैतान को जीत लिया है। परन्तु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उनके भीतर बना हुआ है और मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है; परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और मनुष्य से सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए कहता है। यह चरण पिछले चरण की अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक लाभदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन की आपूर्ति करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया बनाए जाने में सक्षम बनाता है; यह कार्य का ऐसा चरण है जो अधिक विस्तृत है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूरा किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है"

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (4)"

"इसलिए, बीमारियों की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने के द्वारा मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता है और चिन्हों और अद्भुत कामों के प्रदर्शन के द्वारा उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, परन्तु मनुष्य का देह तब भी शैतान से सम्बन्धित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव तब भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह जिसे शुद्ध नहीं किया गया है अभी भी पाप और गन्दगी से सम्बन्धित है। जब वचनों के माध्यम से मनुष्य को स्वच्छ कर दिया जाता है केवल उसके पश्चात् ही उसे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह पवित्र बनता है। यदि मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकालने और उसे छुटकारा देने से बढ़कर और कुछ नहीं किया जाता है, तो यह केवल मनुष्य को शैतान के हाथ से छीनना और उसे वापस परमेश्वर को लौटना है। हालाँकि, उसे परमेश्वर के द्वारा स्वच्छ या परिवर्तित नहीं किया गया है, और वह भ्रष्ट बना रहता है। मनुष्य के भीतर अब भी गन्दगी, विरोध, और विद्रोशीलता बनी हुई है; मनुष्य केवल छुटकारे के माध्यम से ही परमेश्वर के पास लौटा है, परन्तु मनुष्य को उसका कोई ज्ञान नहीं है और अभी भी परमेश्वर का विरोध और उसके साथ विश्वासघात करता है। मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों की शैतान की भ्रष्टता के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने में समर्थ हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार का दूसरा चरण है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (4)") सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से हम देखते हैं, प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य ने केवल मनुष्यों के पापों को माफ़ कर दिया, लेकिन मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को माफ़ नहीं किया। मनुष्य के भीतर शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया स्वभाव और पापी प्रकृति अभी भी मौजूद हैं। इसलिए, प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को आधार बनाकर, परमेश्वर अपने कार्य के एक उच्चतर, पूर्णतर चरण को पूरा करता है, जो वचनों के माध्यम से मानव जाति को शुद्ध करने का कार्य है। वचनों द्वारा न्याय के माध्यम से परमेश्वर हमारे भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह से दूर करेगा, ताकि हम पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त हो सकें। यह मानव जाति को बचाने और परमेश्वर की पूरी प्रबंधन योजना का समापन करने से सम्बंधित परमेश्वर के पूरे कार्य को समाप्त कर देगा। इस समय परमेश्वर का मानव जाति को बचाने से सम्बंधित समस्त कार्य पूरा हो जाएगा। जैसा कि प्रकाशित वाक्य में कहा गया है: "इस पर जो सिंहासन पर बैठा था, वह बोला, "देखो, मैं सब कुछ नया किए दे रहा हूँ। उसने फिर कहा, इसे लिख ले क्योंकि ये वचन विश्वास करने योग्य हैं और सत्य हैं। वह मुझसे फिर बोला, सब कुछ पूरा हो चुका है। मैं ही अल्फा हूँ और मैं ही ओमेगा हूँ। मैं ही आदि हूँ और मैं ही अन्त हूँ। जो भी प्यासा है मैं उसे जीवन-जल के स्रोत से सेंत-मेंत में मुक्त भाव से जल पिलाऊँगा" (प्रकशित वाक्य 21:5-6)। देखो, जब मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह से हटाकर एक नए मनुष्य को बनाया जाता है, तो मानव जाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य सचमुच पूरा हो जाता है। अंतिम युग में कार्य का यह चरण न्याय करने, ताड़ना देने और मनुष्य के पापी स्वभाव को पूरी तरह से दूर करने के लिए, वचनों का इस्तेमाल करेगा। केवल कार्य के इस चरण के माध्यम से, मनुष्य पवित्रता को प्राप्त कर सकता है और पाप से दूर रह सकता है, इस प्रकार वह परमेश्वर के चेहरे को देखने और परमेश्वर के साथ परम धन्यता का आनंद लेने के योग्य हो जाता है। इसलिए, अंतिम दिनों में न्याय और शुद्धिकरण के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करना ही एकमात्र पथ है, जिससे हम पूर्ण उद्धार प्राप्त कर सकते हैं।

राज्य के सुसमाचार की गवाही पर प्रश्न और उत्तर से

कुछ लोग हैं जो बताते हैं कि सलीब पर प्रभु यीशु ने कहा था कि "यह समाप्त हो गया।" और फिर वे कहते हैं कि: "जब प्रभु यीशु ने पापबलि के रूप में सेवा की थी, तो उसने उद्धार का परमेश्वर का कार्य पूरा किया था। हमें हमारे पापों से क्षमा कर दिया गया है क्योंकि हम प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं। हमें केवल विश्वास के माध्यम से भी न्यायोचित ठहराया गया है और इसलिए हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने में सक्षम होंगे। हमें बस परमेश्वर द्वारा स्वर्गारोहण की प्रतीक्षा करनी है।" अथवा वे कहते हैं: "सब कुछ तैयार है, हमें बस स्वर्गारोहण की आवश्यकता है।" क्या इसे सत्यापित किया जा सकता है? नहीं, इसे सत्यापित नहीं किया जा सकता है। हम केवल इतना ही सत्यापित कर सकते हैं कि हमारे पापों को क्षमा कर दिया गया है। हम इसे कैसे सत्यापित करते हैं ? इस बात की परवाह किए बिना कि आप किस तरह के पाप करते हैं, आपको केवल प्रार्थना करने और अपने पाप को स्वीकार करने की आवश्यकता है और आप आनंद, शांति का अनुभव करेंगे, और आपकी आत्मा पाप के बंधन से मुक्त हो जाएगी। जब किसी का कोई पाप नहीं होता है तो वह मुक्त महसूस करता है! इसलिए हम कह सकते हैं कि पाप बलि पूरी तरह से वास्तविक है और ऐसा कुछ है जिसकी प्रभु यीशु के सभी विश्वासी अपने अनुभवों के माध्यम से पुष्टि कर सकते हैं। लेकिन यह कहना किसी भी तरह से निर्विवाद नहीं है कि: "प्रभु यीशु में विश्वास करना परमेश्वर से उद्धार और पाप से पूर्ण पृथक्करण को लाएगा। यदि आप प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, तो आपकी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा की जाएगी और आप स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे।" प्रभु यीशु ने ऐसा नहीं कहा, और इसका कोई साक्ष्य नहीं है। कोई साक्ष्य क्यों नहीं है? मनुष्यों के पापों को क्षमा कर दिया गया है, लेकिन क्या उसके शैतानी स्वभाव, पापपूर्ण प्रकृति को क्षमा किया जा सकता है? नहीं। क्या प्रभु यीशु ने कभी कहा कि: "एक बार तुम्हारे पाप क्षमा कर दिए जाते हैं तो तुम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हो"? क्या प्रभु यीशु ने कभी कहा कि: "तुम्हें बस मुझ पर विश्वास करने की आवश्यकता है और तुम्हारे लिए स्वर्ग के राज्य में एक स्थान होगा"? परमेश्वर ने ऐसा कभी नहीं कहा है। बाइबल में प्रभु यीशु ने क्या कहा? "जो मुझ से, ‘हे प्रभु! हे प्रभु!’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। तो "मेरे पिता जो कि स्वर्ग में है की इच्छा को करता है" किस बात का संकेत करता है? इसका अर्थ है कि आपको परमेश्वर की इच्छा पूरी करनी है, परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना है, सत्य के मार्ग, अर्थात्, परमेश्वर के वचन को अभ्यास में लाना है। व्यक्ति को वह अवश्य करना चाहिए जो कुछ भी उससे करने की परमेश्वर अपेक्षा करता है और उसे अवश्य परमेश्वर के निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए, और केवल तभी वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है। किन्तु अनुग्रह के युग में परमेश्वर की आवश्यकताओं को पूरा करने में कितने लोग समर्थ थे? एक भी नहीं। तो हम कह सकते हैं कि अनुग्रह के युग का कार्य छुटकारे के कार्य का एक चरण है। बाइबिल में यह भविष्यवाणी की गयी है कि जब प्रभु वापस आएगा तो वह परमेश्वर के समक्ष आने वाले सभी को शुद्ध करने के लिए न्याय और ताड़ना के कार्य के चरण को करेगा। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अंत के दिनों में युग को समाप्त करने से पहले शुद्धिकरण के कार्य के एक चरण को शुरू करने जा रहा है। प्रभु यीशु ने जंगली दाने के पौधों में से गेहूँ को, बकरियों में से भेड़ों को, मूर्ख कुँवारिओं में से बुद्धिमान कुँवारियों को, और साथ ही जो सेवा नहीं करते हैं उनमें से जो परमेश्वर की सेवा करते हैं उनको, और बुरे सेवकों में से अच्छे सेवकों को अलग करने के बारे में जो कुछ भी कहा है—वह सब सच हो जाएगा। प्रभु यीशु की भविष्यवाणी के अनुसार, अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर लोगों का न्याय करने, लोगों को शुद्ध करने, सभी को उनके अपने-अपने प्रकार के अनुसार अलग करने के कार्य का एक चरण करेगा, जैसी कि बाइबल में स्पष्ट रूप से भविष्यवाणी की गई है। जैसा कि बाइबल में कहा गया है: "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17), और यह भी उल्लेख किया गया है कि "अंतिम समय में प्रकट किए जाने के लिएf उद्धार तैयार है" (1 पतरस 1:5), और कैसे उन लोगों को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर आएगा जो जीतते हैं (यूहन्ना 14:3 देखें), और कैसे खजाना चुराने के लिए परमेश्वर चोर की तरह आएगा (प्रकाशित वाक्य 16:15 देखें)। ये सभी भविष्यवाणियाँ हमारे प्रभु की वापसी के दौरान किए जाने वाले कार्यों की ओर संकेत करती हैं। इससे साबित होता है कि व्यवस्था के युग से लेकर युग का अंत करने के लिए प्रभु की वापसी के समय तक, कार्य के तीन चरण हैं। यह सत्य है, और इसे प्रकाशितवाक्य की किताब में, बाइबिल की भविष्यवाणियों में देखा जा सकता है। अनुग्रह के युग का कार्य छुटकारे का कार्य था—यह निश्चित रूप से मानवजाति की पापी प्रकृति को हटाने के लिए शुद्धिकरण का कार्य नहीं था। प्रभु यीशु के विश्वासियों में एक भी ऐसा नहीं रहा है जिसकी पापी प्रकृति पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है, एक भी ऐसा नहीं है जिसने माफ़ कर दिए जाने के बाद फिर से पाप नहीं किया है, एक भी ऐसा नहीं है जिसने अपने स्वभाव में पूर्ण रूपांतरण प्राप्त कर लिया है, एक भी ऐसा नहीं है जिसने परमेश्वर को वास्तव में जान लिया है। ये इस मामले के तथ्य हैं। अनुग्रह के युग के दौरान मानवजाति ने 2,000 वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया, लेकिन पाँच मूलभूत समस्याएँ अनसुलझी रहीं: सबसे पहली, पाप करने की ओर मानवजाति की शैतानी प्रकृति का समाधान नहीं हुआ; दूसरी, मानवजाति का शैतानी स्वभाव प्रकट करने का मुद्दा अनसुलझा रहा; तीसरी, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन स्वभाव के रूपांतरण के मुद्दे का समाधान नहीं हुआ; चौथी, इस समस्या का पूरी तरह से समाधान नहीं हुआ कि कैसे मानवजाति को परमेश्वर को जानना और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहिए; पाँचवीं, इस प्रश्न का भी पूरी तरह से समाधान नहीं हुआ कि कैसे मानवजाति शुद्धिकरण प्राप्त कर सकती है। ये पाँच मूलभूत समस्याएँ अनसुलझी बनी रही, जिससे यह साबित होता है कि अनुग्रह के युग का परमेश्वर का कार्य छुटकारे के कार्य का एक चरण था—न कि मानवजाति के उद्धार के कार्य का अंतिम चरण। अनुग्रह के युग का कार्य अंत के दिनों के उद्धार के कार्य के लिए, नींव का निर्माण करते हुए, मार्ग प्रशस्त कर रहा था।

ऊपर से सहभागिता में से

बचाये जाने का क्या मतलब है? धर्म के लोग मानते हैं कि चूँकि क्रूस पर "पूरा हुआ" प्रभु यीशु के अंतिम शब्द थे, जब तक तुम प्रभु यीशु में विश्वास करते हो और तुम्हारे पाप माफ किये जाते हैं, तो इसका मतलब है कि तुम बचा लिए गए हो। धर्म के लोग परमेश्वर के कथन को ग़लत ढंग से समझते हैं क्योंकि वे परमेश्वर का कार्य नहीं जानते हैं। प्रभु यीशु ने जब कहा था "पूरा हुआ", तो वह किस बात की ओर इशारा कर रहा था? वह परमेश्वर के छुटकारे के कार्य को पूरा करने की बात कर रहा था, और निश्चित रूप से परमेश्वर की प्रबंधन योजना के समाप्त होने का उल्लेख नहीं कर रहा था। इसलिए, यह एक तथ्य है कि परमेश्वर ने जो कहा है उसे ग़लत समझना और उसके कार्य के बारे में राय बना लेना उन लोगों कें लिए अत्यंत आसान है जो परमेश्वर के कार्य को जानते ही नहीं हैं। तो आखिर उद्धार क्या है? क्या पाप की माफ़ी उद्धार है? नहीं, यह केवल अंतिम दिनों में परमेश्वर के कार्य के लिए एक आधार निर्मित करता है, और एक नींव को स्थापित करता है। मनुष्यों को बचाने के लिए परमेश्वर का कार्य वास्तव में अंतिम दिनों का कार्य है। अनुग्रह के युग में पाप के चढ़ावे की बुनियाद पर अंतिम दिनों का कार्य स्थापित किया गया है। यह केवल पाप के चढ़ावे के कारण ही है कि मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया है और मानव जाति अपने कार्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के सामने आने के योग्य है। यह केवल आखिरी दिनों के न्याय और ताड़ना, परीक्षणों और शुद्धिकरण के कारण ही है कि वास्तव में मनुष्य को शैतान के प्रभाव से और अपनी शैतानी प्रकृति के नियंत्रण से मुक्त किया जा सकता है। शैतान के द्वारा भष्ट हुए मानव स्वभाव को बदलने में, शैतान के प्रभाव से मनुष्य को बचाने में, और मनुष्य को परमेश्वर की ओर पूरी तरह से मुड़ने के उद्देश्य तक पहुँचाने में केवल आखिरी दिनों का कार्य ही सक्षम है। इसलिए, यदि परमेश्वर पर विश्वास करने में मनुष्य आखिरी दिनों में परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं करता है, तो वह वास्तव में उद्धार तक नहीं पहुँच सकता है। ... परमेश्वर पवित्र और धर्मी है। मनुष्य के पापों को माफ़ कर दिए जाने के बाद भी, मनुष्य को पाप की जड़ से, अर्थात् उसकी शैतानिक प्रकृति से, छुटकारा नहीं दिया गया है। यदि मनुष्य हमेशा की तरह परमेश्वर का विरोध करता है और परमेश्वर को धोखा दिए जाता है, तो क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के खिलाफ अपराध नहीं है? यदि परमेश्वर अपने राज्य में एक ऐसी मानवता को उठा लेता है जो अभी भी विरोध करने और उसे धोखा देने में सक्षम है, तो यह क्या दर्शाएगा? क्या यह इसे इंगित नहीं करेगा कि परमेश्वर ने खुद को धोखा दिया है? यह भ्रष्ट मानव जाति अभी भी परमेश्वर का विरोध कर सकती है और एक बार फिर मसीह को क्रूस पर कीलों से जड़ने में सक्षम है। यदि एक ऐसी मानवजाति वो मानवजाति है जिसे बचा लिया जाता है, तो परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को समझाने का कोई तरीका नहीं है, इसका कोई अर्थ ही नहीं है। परमेश्वर का राज्य कैसे एक ऐसी मानव जाति के अस्तित्व की अनुमति दे सकता है जो परमेश्वर का विरोध करती हो? यह असंभव है क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के अपराध को बर्दाश्त नहीं करता है। इसलिए, यदि तुम कहते हो: "एक ऐसा व्यक्ति जिसे पाप का चढ़ावा मिला है, वह बचा लिया गया है, और वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है,"तो इन शब्दों से कोई बात नहीं बनेगी।

"सुसमाचार फैलाने के बारे में विभिन्न स्थानों से प्रश्नों के उत्तर" केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास के द्वारा ही कोई बचाया जा सकता है में

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