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जीवन एक पतली सी डोर से लटका हुआ था, बचाव के लिए परमेश्वर का हाथ आया

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लिंग वू, जापान

"अगर मुझे परमेश्वर ने बचाया नहीं होता, तो मैं अभी भी इस संसार में भटक रहा होता,

पाप से घोर संघर्ष करता हुआ और दर्द में; प्रत्येक दिन अंधकारमय और आशाहीन होता हुआ।

अगर मुझे परमेश्वर ने बचाया नहीं होता, मैं अभी भी शैतान के पैरों के नीचे दबा होता,

पाप और उसके आनंद में लिप्त, मेरा जीवन क्या होगा, इस बात से बेखबर।

अगर मुझे परमेश्वर ने बचाया नहीं होता, मैं आज बिना आशीर्वाद के यहाँ होता,

बहुत कम जानकारी होती कि हमें क्यों जीना चाहिए या हमारे जीवन का अर्थ।

अगर मुझे परमेश्वर ने बचाया नहीं होता, मुझे अभी भी मैं विश्वास के बारे में भ्रमित रहता,

अभी भी गुजरते दिनों के खालीपन इस बात से बेखबर कि किस में विश्वास करूँ।

मुझे अब समझ में आ गया है, जैसे जैसे हम चलते हैं परमेश्वर के प्यारे हाथ मेरे हाथ पकड़ लेते हैं।

मैं कभी जाऊँगा नहीं और अपने मार्ग से हटूँगा नहीं क्योंकि मैं इस शानदार मार्ग पर ठहरने के लिए आया हूँ" ("मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना) अगर मुझे परमेश्वर ने बचाया नहीं होता") जब भी मैं इस अनुभव के भजन को सुनता हूँ तो यह मेरे मन को छू जाता है। अगर यह परमेश्वर के द्वारा मुझे बचाने के लिए नहीं होता, जैसा कि भजन में वर्णन किया गया है, मैं शायद अभी भी संसार में बिना किसी लक्ष्य के भटक रहा होता, धन के पीछे भागकर खुद को थकाता, इस हद तक कि मैंने अपने प्राण गँवा दिये होते और विदेशी भूमि पर मर गया होता...

मैं अस्सी के दशक का बालक हूँ, और मैं एक साधारण से किसान परिवार में जन्मा हूँ। मेरा छोटा भाई बचपन से ही हमेशा बीमार रहता था। जब मैं 10 वर्ष का था तब मेरे पिता एक दुर्घटना में घायल हो गए थे; उसके दो वर्ष बाद उन्हें लकवा मार गया था। पहले से ही हमारे परिवार की वित्तीय हालत बहुत खराब थी, और पिता के उपचार के कारण हम बुरी तरह से कर्जे में डूब गए। हमारे मित्र और रिश्तेदार डरते थे कि हम कभी भी कर्ज़ चुका नहीं पायेंगे, और वे हमें कर्ज़ में पैसे देने के लिए तैयार नहीं थे। असहाय होकर मुझे घर से दूर काम करने के लिए, 16 वर्ष की आयु में स्कूल छोड़ना पड़ा। गहरी और शांत रात में, मैं अक्सर सोचता था: जब वे युवा थे, मेरी आयु के बराबर की आयु के, वे स्कूल के बाद मस्त होकर खेलते थे, जबकि मुझे खेतों में खेती का काम करना पड़ता था; अब वो मेरी तरह बड़े हो गए हैं, और वे अभी भी स्कूल जा रहे थे, वे अपने माता-पिता के साथ बिगड़ैल बच्चों की तरह हरकते करते हुए, परंतु मुझे अपने परिवार की सहायता करने के लिए कम उम्र में ही काम करना पड़ा और सभी प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ा .... उस समय मैंने अपने माता-पिता से कहा कि उन्होंने मुझे जन्म क्यों दिया, और पूछा कि ऐसा क्यों है कि मैं इस संसार में बस कष्ट उठाने और कड़ी मेहनत करने के लिए आया हूँ। परंतु उसके बारे में मैं कुछ नहीं कर सकता था और मैं तो बस इस सच्चाई को केवल स्वीकार कर सकता था। उस समय मेरी सबसे बड़ी इच्छा मेहनत करना, पैसे कमाना, और अपने माता-पिता को आराम पहुँचाना था तथा दूसरों द्वारा नीचा दिखाना स्वीकार नहीं था।

सबसे पहले मैंने एक निजी एल्यूमीनियम मिश्र धातु कारखाने में काम किया। चूंकि मैं एक बाल मज़दूर था, बॉस हमेशा मेरे भोजन और रहने के बारे में अच्छा ध्यान रखते थे। एक वर्ष के बाद, मुझे महसूस हुआ कि मेरा वेतन बहुत कम था, और मैंने फर्नीचर फैक्ट्री में लैकर स्प्रे का काम करने का फैसला किया जहाँ अन्य लोग नहीं जाना चाहते थे। उस समय, जब तक मैं कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा था, मुझे इस बात कि कोई परवाह नहीं थी कि मैं क्या काम कर रहा हूँ, अगर मैं उस काम से ज्यादा पैसा कमा सकता था। मेरा लक्ष्य केवल पैसे वाला व्यक्ति बनना था, ताकि मैं दोबारा एक गरीब व्यक्ति का जीवन व्यतीत नहीं करूँ। उसके बाद, मेरे रिश्तेदारों ने मेरा परिचय एक कंपनी से कराया जिसने मुझे काम के लिए देश के बाहर जाने का अवसर प्रदान किया। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि कुछ वर्षों बाद मैं विदेश जाऊँगा।

2012 की वसंत में, मेरी इच्छा पूरी हुई जब मैं जापान आया और अपना नया जीवन शुरू किया। मैं जलपोत बनाने के उद्योग में लग गया था, और प्रशिक्षुता के द्वारा मैंने कंपनी के साथ तीन वर्षों का करार तय किया। जब मैंने काम शुरू किया, तो मैं थका हुआ और परेशान था। चूंकि मुझे खाना पकाना नहीं आता था, मैंने एक महीने तक इंस्टेंट नूडल खाये, जब तक कि मुझे ऐसा नहीं लगने लगा कि मैं अब इन्हें और नहीं खा सकता और यह अब बाहर आ जाएँगे तथा मुझे जबरदस्ती भोजन पकाना सीखना पड़ा। मुझे कुछ याद नहीं कि कितने दिनों तक मैंने अधपके चावल खाये। जापान में हम विदेशी थे, इसलिए कंपनी के कर्मचारी हमसे जल्दी ही बुरा व्यवहार करने लगे। वे हमसे बहुत से गंदे, थका देने वाले और खतरनाक काम कराते थे। जब मैं लेककर स्प्रे कर रहा होता था, मुझे बहुत डर लगता था, क्योंकि अगर गैस आग के संपर्क में आती तो वह जल उठती, और अगर मैं उस पर एक क्षण के लिए ध्यान नहीं देता तो वह मेरे जीवन को ख़तरे में डाल सकती थी। परंतु कोई बात नहीं अगर मेरे जीवन में कष्ट हो या मेरे काम में ख़तरा हो, जब तक मैंने अपने परिवार के पास और अधिक धन कमाकर भेजने की सोच रखी है, और खुद के लिए एक कार और एक घर नहीं खरीद लेता, जब मैं वापिस घर जाऊँ और खुद को दूसरों से ऊपर बना लूँ और गरीब न रहूँ, मैं महसूस करता हूँ की मेरे कष्ट वास्तव में तब तक मेरे लिए बुरे नहीं हैं। पलक झपकते ही मेरे जीवन के तीन साल बीत गए, और मेरे वीजे की समयावधि लगभग समाप्त हो चुकी है। कंपनी की करारों के नवीनीकरण की नीति थी, इसलिए और अधिक धन कमाने के लिए, मैंने अपने करार का नवीनीकरण करा कर जापान में काम करने को जारी रखने का निर्णय लिया। मेरे द्वारा करार के नवीनीकरण के कुछ दिनों बाद ही मैं जिस बात ने मुझे आश्चर्यचकित किया वह थी कि मेरा सामना सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार से हुआ।

सितंबर 2015 में, जापान में मिले मेरे एक मित्र ने मुझे, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्यों के बारे में बताया। जब वह मुझे परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में बता रही थी, और मुझे वह रोचक नहीं लग रहा था। मुझे लगा कि परमेश्वर में विश्वास करने से मेरा भाग्य नहीं बदल पाएगा। उसके शीघ्र बाद, मैंने अपने मित्र को अपने सोचने के ढंग के बारे में और मेरे द्वारा झेले गए कष्टों के बारे में बताया और फिर उससे पूछा "क्या परमेश्वर में विश्वास करने से मेरा भाग्य बदल सकता है? मैंने इतने कष्ट उठाएँ हैं, मैं तो बस एक बदकिस्मत व्यक्ति हूँ। अगर मेरे पास धन होता तो मुझे इतने कष्ट नहीं उठाने पड़ते, और अभी मेरे लिए सबसे वास्तविक चीज़ है धन कमाना। मेरे लिए, परमेश्वर में विश्वास करना कुछ दूर की बात है।" जब मेरे मित्र ने मुझे इस प्रकार बोलते हुए सुना, तो मेरी मित्र ने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक भाग पढ़ कर सुनाया: "तू प्रतिदिन कहाँ जाएगा, तू क्या करेगा, तू किसका या क्या सामना करेगा, तू क्या कहेगा, साथ क्या होगा - क्या इसमें से किसी की भी भविष्यवाणी की जा सकती है? लोग इन सभी घटनाओं को पहले से नहीं देख सकते हैं, और जिस प्रकार वे विकसित होते हैं उसको तो बिलकुल भी नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं। जीवन में, पहले से देखी न जा सकनेवाली ये घटनाएं हर समय घटित होती हैं, और ये प्रतिदिन घटित होनेवाली घटनाएं हैं। ये दैनिक उतार-चढ़ाव और तरीके जिन्हें वे प्रकट करते हैं, या ऐसे नमूने जिसके परिणामस्वरूप वे घटित होते हैं, वे मानवता को निरन्तर स्मरण दिलानेवाले हैं कि कुछ भी बस यों ही बिना सोचे समझे नहीं होता है, यह कि इन चीज़ों की शाखाओं में विस्तार को, और उनकी अनिवार्यता को मनुष्य की इच्छा के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। हर एक घटना सृष्टिकर्ता की ओर से मानवजाति को दी गई झिड़की को सूचित करती है, और साथ ही यह सन्देश भी देती है कि मानव प्राणी अपनी नियति को नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं, और ठीक उसी समय हर एक घटना अपनी नियति को अपने ही हाथों में लेने के लिए मानवता की निरर्थक, व्यर्थ महत्वाकांक्षा एवं इच्छा का खण्डन है। ये मानवजाति के कान के पास एक के बाद एक मारे गए जोरदार थप्पड़ों के समान हैं, जो लोगों को पुनःविचार करने के लिए बाध्य करते हैं कि अंत में कौन उनकी नियति पर शासन एवं नियन्त्रण करता है। और चूंकि उनकी महत्वाकांक्षाएं एवं इच्छाएं लगातार नाकाम होती हैं और बिखर जाती हैं, तो मनुष्य स्वाभाविक रूप से एक अचैतन्य स्वीकृति की ओर आ जाते हैं कि नियति ने क्या संजोकर रखा है, और स्वर्ग की इच्छा और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता की वास्तविकता की स्वीकृति की ओर आ जाते हैं। सम्पूर्ण मानवजीवन की नियति के इन दैनिक उतार-चढ़ावों से, ऐसा कुछ भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की योजना और उसकी संप्रभुता को प्रकट नहीं करता है; ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह सन्देश नहीं देता है कि 'सृष्टिकर्ता के अधिकार से आगे बढ़ा नहीं जा सकता है,' जो इस अनन्त सत्य को सूचित नहीं करता है कि 'सृष्टिकर्ता का अधिकार ही सर्वोच्च है।'" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से) इसे सुनने के बाद, मुझे महसूस हुआ की ये शब्द मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं, और मैं यह सोचने से खुद को रोक नहीं पाया की अपने करार का नवीनीकरण कर पाना भी ऐसा लगता था जैसे कि परमेश्वर ने ही इन सभी चीज़ों की व्यवस्था की हो। इसने मुझे जन्म के घर के बारे में भी सोचने के बारे में मजबूर किया और कि मेरा परिवार वह चीज़ है जिसके बारे में मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि कहीं पर वहाँ परमेश्वर का ही नियंत्रण है।

मेरे मित्र ने मुझे परमेश्वर के वचनों के इस भाग को मुझे पढ़कर सुनाया "स्वयं परमेश्वर जो अद्वितीय है वचन देह में प्रकट होता है आगे जारी है" जो छह मोड़ों के बारे में बात करता है जिसमें से किसी व्यक्ति को भी जीवन में: जन्म में: पहले मोड़ पर; बढ़ने पर: पार करना पड़ता है: दूसरा मोड़; स्वतंत्रता: तीसरा मोड़; विवाह: चौथा मोड़; सन्तति जब मैंने परमेश्वर के वचनों को सुना था। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि परमेश्वर ने इंसान के भाग्य के बारे में इतने स्पष्ट शब्दों में कहा है, और तथ्य बिल्कुल वैसे ही हैं जैसा उनका वर्णन किया गया था। सामान्य हालातों में व्यक्ति अपने जीवन में इन छह मोड़ों का अनुभव होगा। मैंने सोचा कि धरती पर कितने लोग कष्ट उठा रहे हैं, और यह कैसे हो सकता है कि बस मैं ही कष्ट उठा रहा हूँ। वास्तव में अगर भाग्य व्यक्ति की इच्छा के अनुसार होता और वह उसे नियंत्रित कर पाता, तो प्रत्येक व्यक्ति एक बड़े, फैंसी घर में रहने का चयन करता, और तो क्या कोई भी गरीबी और कठिनाइयों से परेशान होता हुए दिखाई देता? वास्तव में, व्यक्ति जिस परिवार में जन्म लेता है वह उसे भी चुन नहीं सकता, और वे इसे भी नहीं चुन सकता कि उसे किस प्रकार के माता-पिता चाहिए। जब वे बड़े हो जाते हैं, किस प्रकार का पति या पत्नी उन्हें मिलते हैं, यह भी उनके हाथ में नहीं हैं... इनके बारे में जब मैंने जितना अधिक सोचा, उतना अधिक ही मैंने पाया कि ये शब्द वास्तविक हैं, और जो कुछ सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहा था मैंने अपने दिल में उसे मानना शुरू कर दिया। किस्मत कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो किसी व्यक्ति के द्वारा स्वयं बदली जा सके। तभी से, परमेश्वर को मानने में मेरी रुचि और अधिक बढ़ती गयी, और मैंने माना कि परमेश्वर मौजूद है, और माना कि किसी व्यक्ति की किस्मत उसके खुद के नियंत्रण में नहीं होती है। परंतु मुझे परमेश्वर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, मैं यह सोचता था कि परमेश्वर मुझसे बहुत दूर था। यद्यपि, इसके कुछ समय बाद, एक अनुभव से मुझे सच में लगा कि परमेश्वर मेरे साथ है और वह मुझे देख रहा है और मेरा बचाव कर रहा है।

उस दिन बारिश हो रही थी, और मैं रोज़ की तरह काम पर निकल पड़ा, परंतु मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरे ऊपर आपदा आने वाली थी। सुबह के 10:00 बजे, मैं कार्य स्थल पर काम कर रहा था, तभी अचानक मैंने एक "शोर" की आवाज़ सुनी। मुझे मालूम नहीं था कि वह क्या वस्तु थी जो जमीन पर आकार गिरी थी, और उस से मैं दहशत के मारे कांप उठा। जब मैंने मुड़कर देखा, मैं हक्का-बक्का रह गया, और देखा कि एक 40 सेंटीमीटर व्यास और 4 मीटर लंबी लोहे की पाइप जिसका वजन लगभग आधा टन था, वह क्रेन से गिरी है। मैं जहाँ खड़ा था, वह जमीन पर मुझ से आधा मीटर की दूरी पर गिरी। मैं इतना डर गया था कि उस क्षण मैं स्तब्ध रह गया, और मुझे उस झटके से वापिस अपना होश संभालने में कुछ पल का समय लगा। अपने मन में मैं लगातार चिल्ला रहा था "परमेश्वर आपका धन्यवाद! परमेश्वर आपका धन्यवाद!" अगर परमेश्वर वहाँ पर ना होता और मुझे न देख रहा होता और मुझे बचा न रहा होता, तो वह लोहे की पाइप सीधे ही मुझ पर आ गिरती, और मेरा अमहत्वपूर्ण जीवन समाप्त हो चुका होता।

काम समाप्त करने के बाद जब मैं भाइयों और बहनों के साथ उस दिन की घटना के बारे में वार्तालाप कर रहा था, उन्होंने सहचर्य किया कि वह परमेश्वर के द्वारा किया गया बचाव था। उन्होंने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर सुनाया: "अपने लम्बे जीवन में, मूलत: प्रत्येक व्यक्ति ने अनेक खतरनाक परिस्थितियों का सामना किया है और वह अनेक प्रलोभनों से होकर गुज़र चुका है। यह इसलिए है क्योंकि शैतान बिलकुल तुम्हारे बगल में है, उसकी आंखें निरन्तर तुम्हारे ऊपर जमी होती हैं। वह इसे पसन्द करता है जब तुम पर आपदा आती है, विपदाएँ हैं, जब तुम्हारे लिए कुछ भी सही नहीं होता है तो उसे अच्छा लगता है, और जब तुम शैतान के जाल में फँस जाते तो तो उसे अच्छा लगता है। जहाँ तक परमेश्वर की बात है, वह निरन्तर तुम्हारी सुरक्षा कर रहा है, एक के बाद एक दुर्भाग्य से और एक के बाद एक आपदा से तुम्हें बचा रहा है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो कुछ शान्ति एवं आनन्द, आशीषें एवं व्यक्तिगत सुरक्षा-मनुष्य के पास है, वह सब-कुछ वास्तव में परमेश्वर के अधीन है, और वह प्रत्येक प्राणी के जीवन एवं उसकी नियति का मार्गदर्शन एवं निर्धारण करता है।" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वयं परमेश्वर, अद्वितीय VI" से) परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मैं समझ गया कि लोग प्रतिदिन शैतान के जाल में जी रहे हैं और उन्हें क्रूरतापूर्वक हानि पहुँचाया जाती है। अगर परमेश्वर लोगों को देख न रहा हो और वह उनकी रक्षा न कर रहा हो, तो बहुत समय पहले ही शैतान लोगों को निगल चुका होता। इतने वर्षों में, मुझे मालूम नहीं कि कितनी बार मैंने परमेश्वर को मुझे देखते हुए और मुझे बचाते हुए आनंद उठाया होगा, पर अभी तक मुझे परमेश्वर के बारे में पता नहीं था या मैं उसकी आराधना के बारे में नहीं जानता था; सच मेरा कोई अन्तःकरण नहीं था। उस क्षण से शुरू होकर, मुझे मुक्ति में परमेश्वर का आशीर्वाद बेहतर समझ आने लगा। कि मैं आज तक जीवित रहा इस सबके लिए मैंने मेरी रक्षा करने वाले परमेश्वर के प्रीतिपूर्ण हाथ का धन्यवाद किया और मैंने यह धन्यवाद दिल से किया। आने वाले दिनों में, मैंने अनेक बार भाइयों और बहनों के साथ बैठकों में शामिल हुआ, और नियमिततौर पर कलीसिया में उपस्थित होने लगा, और धीरे धीरे मेरे जीवन में परिवर्तन आने लगे। अब मुझे किसी प्रकार की उत्तेजना, कष्ट, तथा खालीपन नहीं था, जो पहले कभी होता था। हम भाई और बहन मिलकर एक साथ परमेश्वर के वचनों को पढ़ते थे और परमेश्वर के वचनों का सहचर्य करते थे, परमेश्वर की प्रशंसा में गीत गाते, अपने दिलों में मुक्त और स्वतंत्र, एक दूसरे की सहायता करते हुए तथा आध्यात्मिक जीवन में एक दूसरे की मदद करते हुए। किसी ने भी मुझे निम्न नहीं समझा, न ही किसी के मन में निर्धन के लिए घृणा थी और न ही कोई अमीरों की चापलूसी करता था, और मुझे महसूस हुआ कि मैं स्वाभिमान के साथ जीवन जी सकता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इतने बड़े, सम्मानजनक, और आशीर्वादयुक्त गृह कलीसिया में रहने से मुझे पहले की तुलना में बहुत खुशी और संतोष मिला।

एक दिन, हमारी कंपनी के एक जापानी व्यक्ति को कुछ हो गया। वह वहाँ बहुत लंबे समय से था और पहले ही वह वहाँ कंपनी में दस वर्ष से अधिक का अनुभव ले चुका था। वह इस बात में बहुत विश्वास रखता था कि क्या वह सुरक्षा जागरूकता है या टेक्नोलॉजी है। उस दिन, जब वह काम पर था, वह एक लिफ्टिंग ट्रक चला रहा था और जब 20 मीटर हवा में उठाए हुए वह कुछ काम कर रहा था। उसके संचालन के दौरान, ध्यान की कमी के कारण उससे अपने ऊपर ट्रक की लिकुईफाईड़ गैस लीक हो गयी। उसी समय उसके ऊपर का अन्य कर्मी कुछ वैल्डिंग का काम कर रहा था, और अचानक एक चिंगारी नीचे गिरी और उसके कपड़ों पर पड़ी। जब लीक हुई गैस उस चिंगारी के संपर्क में आई, वह तेज़ी से लपटों में बदल गयी, और आग लग गयी। बहुत से लोग उस बूढ़े कर्मी की तरफ बस यूँ ही घूरते रहे, जो कि उस जगह पर लपटों से घिरा था, परंतु वे बिल्कुल असहाय थे और कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे। पहले ही बहुत देर हो चुकी थी कि उसे बचाने के लिए किसी को खोजा जाये, और कुछ ही मिनटों में वह जलकर मर गया। जब हमने यह दुर्घटना होते हुए देखी, तो बहुत से लोगों ने उसके लिए अफसोस जताया, और मदद नहीं कर पाये परंतु अपने जीवन की बारे में सोचते रहे: आखिरकार यह क्या है, जिसके लिए लोग जीवित हैं? क्योंकि इस प्रकार की घटना बस मेरे पास ही हुई, मैंने सच में यह महसूस किया कि अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर से आया है और उस पर परमेश्वर की नज़र नहीं है और वह उसका बचाव नहीं कर रहा है, तो उनका जीवन हर समय असुरक्षित है। आपदा के समय लोग इतने अमहत्वपूर्ण होते हैं और वे आसानी से ढेर हो सकते हैं, और चाहे वह व्यक्ति कितना भी निपुण क्यों न हो या उसके पास कितना भी अधिक धन ना हो, वे स्वयं को बचा नहीं सकते।

इसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अनुच्छेद पढ़ा : "सृष्टिकर्ता की संप्रभुता एवं पूर्वनिर्धारण के कारण, एक अकेला आत्मा जिसने शून्य से आरम्भ किया था वह परिवार एवं माता पिता को प्राप्त करता है, मानव जाति का एक सदस्य बनने का मौका प्राप्त करता है, मानव जीवन का अनुभव करने एवं इस संसार को देखने का मौका प्राप्त करता है; और साथ ही यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का भी अनुभव करने का मौका प्राप्त करता है,जिससे सृष्टिकर्ता के द्वारा सृष्टि की अद्भुतता को जान सके, और सबसे बढ़कर, सृष्टिकर्ता के अधिकार को जान सके एवं उसके अधीन हो सके। परन्तु अधिकांश लोग वास्तव में इस दुर्लभ एवं क्षणिक अवसर को लपक नहीं पाते हैं। कोई व्यक्ति नियति के विरुद्ध लड़ते हुए जीवन भर की ऊर्जा को गवां देता है, अपने परिवार को खिलाने पिलाने की कोशिश करते हुए और धन-सम्पत्ति एवं हैसियत के बीच झूलते हुए अपना सारा समय बिता देता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें लोग संजोकर रखते हैं वह परिवार, पैसा एवं प्रसिद्धि है; वे इन्हें जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों के रूप में देखते हैं। सभी लोग अपनी नियति के विषय में शिकायत करते हैं, फिर भी वे अपने दिमाग में इन प्रश्नों को पीछे धकेल देते हैं कि इसे जांचना एवं समझना अति महत्वपूर्ण हैः मनुष्य जीवित क्यों है, मनुष्य को कैसे जीवनयापन करना चाहिए, जीवन का मूल्य एवं अर्थ क्या है। उनका सम्पूर्ण जीवन, चाहे कितने ही वर्षों का क्यों न हो, वहसिर्फ़ प्रसिद्धि एवं सौभाग्य को तलाशते हुए शीघ्रता से गुज़र जाता है, तब तक जब तक कि उनकी युवा अवस्था चली नहीं जाती है, उनके बाल सफेद नहीं हो जाते एवं उनकी त्वचा में झुर्रियां नहीं पड़ जाती हैं; जब तक वे यह नहीं देख लेते हैं कि प्रसिद्धि एवं सौभाग्य किसी को बुढ़ापे की ओर सरकने से रोक नहीं सकते हैं, यह कि धन हृदय के खालीपन को भर नहीं सकता है; जब तक वे यह नहीं समझ लेते हैं कि कोई भी व्यक्ति जन्म, उम्र के बढ़ने, बीमारी एवं मृत्यु के नियम से बच नहीं सकता है, और यह कि जो कुछ नियति ने संजोकर रखा हैं कोई उससे बच नहीं सकता है। जब उन्हें जीवन के अंतिम घटनाक्रम का सामना करने के लिए मजबूर किया जाता है केवल तभी वे सचमुच में समझ पाते हैं कि यदि कोई करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति का मालिक हो जाता है, भले ही किसी को विशेष अधिकार प्राप्त है एवं वह ऊंचे पद पर रहा है, फिर भी कोई भी व्यक्ति मृत्यु से नहीं बच सकता है, प्रत्येक मनुष्य अपनी मूल स्थिति में वापस लौटेगा : एक अकेला आत्मा, जिसके नाम कुछ भी नहीं है।" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" से) परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, मैं पूरी तरह से हिल चुका था: लोगों की आत्माएं परमेश्वर से आती हैं, और वे परमेश्वर द्वारा संसार में ही भेजी जाती हैं। परंतु लोग फिर भी परमेश्वर में विश्वास रखना और उसकी आराधना करना नहीं चाहते, और वे परमेश्वर के प्राधिकारिता को अनुभव करने के अवसर के खजाने को भुनाना नहीं चाहते, बस वे तो केवल धन, प्रसिद्धि और रिश्तों के लिए जीना जानते हैं। पर वे सभी ज़ोर जबरदस्ती से अपने भाग्य की व्यवस्था को हटाने का प्रयास करने में व्यस्त हैं, पर लोगों को इन चीज़ों के पीछे भागकर क्या मिलेगा? क्या कभी किसी ने सोचा है इनमें से कौन सी चीज़ – रिश्ते, प्रसिद्धि, या धन – घटित होने वाली मृत्यु से कैसे बचा सकती हैं? मेरे पुराने सहकर्मी की मृत्यु की ओर देखिए – क्या वह इस तथ्य का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं है? जिन बातों को मैंने पहले चाहा, उन चीज़ों के बारे में सोचना, क्या एक जैसी बात नहीं है? जब मैं विदेश में काम करने गया, मैं बस कुछ और अधिक पैसे कमाने के लिए कोई भी गंदा, थकाने वाला, या खतरनाक काम ले लेता था, जिससे लोग मुझे सम्मान से देखें, और इससे मैं गरीबी की जिल्लत सहने से बच जाऊँगा। जबकि मैं सभी प्रकार के कष्टों से गुजर चुका हूँ, मैंने कभी भी अपने जीवन जीने के तरीके को बदलने के बारे में नहीं सोचा। मैंने तो हमेशा बस उसी रास्ते का अनुसरण किया। मेरे दिल में, मुझे नहीं मालूम कि परमेश्वर है, या मुझे ज्ञात हो कि इंसान की किस्मत परमेश्वर के हाथों में होती है। अपने भाग्य को बदलने के लिए मैंने खुद पर भरोसा किया, और मैंने परमेश्वर के आयोजन से बचने के लिए संघर्ष किया। जिस मार्ग पर मैं चल रहा था, क्या वह तबाही की ओर जाने वाला नहीं था? अगर वह परमेश्वर की मुक्ति के लिए नहीं था, या परमेश्वर मुझे देख रहा है और मुझे बचा रहा है, मुझे बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मेरा छोटा सा जीवन बहुत समय पहले ही शैतान द्वारा छीन लिया गया होता। इसके बाद भी, मेरा जीवन अब जैसा, कैसे खुशहाल और सार्थक बन सकता था? अंत में मैंने देखा कि जीवन का अर्थ धन या प्रसिद्धि कमाना नहीं था, इसका अर्थ दूसरों से आगे निकलना ताकि वे लोग तुम्हें बड़ा माने, भी नहीं है, परंतु इसका अर्थ परमेश्वर की मौजूदगी में आना, परमेश्वर की आराधना करना और उससे मुक्ति पाना, और शैतान की हानि से बच निकालना। मैं जितना अधिक इस प्रकार से सोचता हूँ, मैं उतना अधिक प्रभावित होता हूँ। मैं देखता हूँ कि मैं परमेश्वर में विश्वास रख पाता हूँ, और यही परमेश्वर द्वारा विशेष आशीर्वाद सहित मेरे साथ व्यवहार है। मुझे मालूम नहीं कि मैं किस प्रकार परमेश्वर की ओर मेरे दिल में मौजूद कृतज्ञता की भावना व्यक्त करूँ, और इसलिए मैंने, परमेश्वर की प्रशंसा प्रदर्शित करने और मुझे बचाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करने के लिए एक भजन सीखा "अगर मुझे परमेश्वर ने नहीं बचाया होता"!