सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

प्रभु ने स्पष्ट रूप से भविष्यवाणी की: "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। ये स्पष्ट है कि जब प्रभु लौटेंगे वे अपने वचन बोलेंगे और उच्चारित करेंगे, और वे सभी जो परमेश्वर की आवाज़ सुनते हैं और प्रभु का स्वागत करते हैं परमेश्वर के सामने स्वर्गारोहित होंगे और आपदा से पहले प्रभु के साथ भोज में शामिल होंगेI

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संदर्भ के लिए बाइबिल के पद:

"तुम भी तैयार रहो; क्योंकि जिस घड़ी तुम सोचते भी नहीं, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा" (लूका 12:40)।

"मैं चोर के समान आता हूँ" (प्रकाशितवाक्य 16:15)।

"देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)।

"जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)।

"मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं" (यूहन्ना 10:27)।

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन:

"स्वर्गारोहण" नीचे स्थानों से उँचे स्थानों पर उठाया जाना नहीं है जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। यह एक बहुत बड़ी ग़लती है। स्वर्गारोहण मेरे द्वारा पूर्वनियत और चयनित किए जाने को संदर्भित करता है। यह उन सभी पर लक्षित है जिन्हें मैंने पूर्वनियत और चयनित किया है। जिन लोगों ने ज्येष्ठ पुत्रों की, मेरे पुत्रों की, या मेरे लोग की हैसियत प्राप्त कर ली है, वे सभी ऐसे लोग हैं जो स्वर्गारोहित किये जा चुके हैं। यह लोगों की अवधारणाओं के साथ सर्वाधिक असंगत है। जिन लोगों का भविष्य में मेरे घर में हिस्सा है वे सभी ऐसे लोग हैं जो मेरे सामने स्वर्गारोहित किये जा चुके हैं। यह पूर्णतः सत्य है, कभी भी नहीं बदलता है, और किसी के द्वारा भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह शैतान के विरुद्ध जवाबी हमला है। जिस किसी को भी मैंने पूर्व नियत किया है वह मेरे सामने स्वर्गारोहित किया जाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "एक सौ चौथा कथन" से

मनुष्य विश्वास करता है कि सलीब पर चढ़ने और पुनरूत्थान के बाद, यीशु सफेद बादल पर स्वर्ग में वापस चला गया, और उसने सर्वोच्च महान के दाएँ हाथ पर अपना स्थान ग्रहण किया।उसी प्रकार, मनुष्य कल्पना करता है कि यीशु फिर से सफेद बादल पर सवार होकर (यह बादल उस बादल की ओर संकेत करता है जिस पर यीशु तब सवार हुआ था जब वह स्वर्ग में वापस गया था), उन लोगों के बीच वापस आएगा जिन्होंने हज़ारों सालों से उसके लिए बहुत अधिक लालसा रखी है, और यह कि वह यहूदियों का स्वरूप और उनके कपड़े धारण करेगा। मनुष्य के सामने प्रकट होने के बाद, वह उन्हें भोजन प्रदान करेगा, और उनके लिए जीवन के जल की बौछार करवाएगा, और मनुष्य के बीच में रहेगा, अनुग्रह और प्रेम से भरपूर, जीवन्त और वास्तविक, इत्यादि। फिर भी उद्धारकर्त्ता यीशु ने ऐसा नहीं किया; उसने मनुष्य की कल्पना के विपरीत किया। वह उनके बीच में नहीं आया जिन्होंने उसकी वापसी की लालसा की थी, और वह सफेद बादल पर सवारी करते हुए सभी मनुष्यों के सामने प्रकट नहीं हुआ। वह तो पहले से ही आ चुका है, किन्तु मनुष्य उसे नहीं जानता है, और उसके आगमन से अनजान बना हुआ है। मनुष्य केवल निरुद्देश्यता से उसका इन्तज़ार कर रहा है, इस बात से अनभिज्ञ कि वह तो पहले ही सफेद बादल (वह बादल जो उसका आत्मा, उसके वचन, और उसका सम्पूर्ण स्वभाव है और स्वरूप है) पर अवरोहण कर चुका है, और वह अब उन विजेताओं के समूह के बीच में है जिसे वह अंत के दिनों के दौरान बनाएगा।

"उद्धारकर्त्ता पहले ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है" से

"वह जिसके कान हो, सुन ले कि आत्मा ने कलीसियाओं से क्या कहा।" क्या तुमने अब पवित्र आत्मा के वचन सुन लिए हैं? परमेश्वर के वचन तुम्हें अचानक मिले हैं। क्या तुम उन्हें सुनते हो? अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का कार्य करता है, और ऐसे वचन पवित्र आत्मा के वचन हैं, क्योंकि परमेश्वर पवित्र आत्मा है और देहधारी भी हो सकता है; इसलिए, पवित्र आत्मा के वचन, जैसे अतीत में बोले गए थे, आज देहधारी परमेश्वर के वचन हैं। कई विवेकहीन मनुष्य हैं जिनका मानना है कि पवित्र आत्मा के वचन मनुष्य के कान में सीधे स्वर्ग से उतर कर आने चाहिए। इस प्रकार सोचने वाला कोई भी परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है। वास्तव में, पवित्र आत्मा के द्वारा कहे गए कथन वे ही हैं जो परमेश्वर ने देहधारी होकर कहे। पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य से बात नहीं कर सकता है, और यहाँ तक कि व्यवस्था के युग में भी, यहोवा ने प्रत्यक्ष रूप से लोगों से बात नहीं की। क्या इस बात की बहुत कम सम्भावना नहीं होगी है कि वह आज के युग में भी ऐसा ही करेगा? कार्य को करने के लिए परमेश्वर को कथनों को बोलने के लिए, उसे अवश्य देहधारण करना चाहिए, अन्यथा उसका कार्य उसके उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता है। जो परमेश्वर के देहधारी होने को इनकार करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो आत्मा को या उन सिद्धान्तों को नहीं जानते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। जो मानते हैं कि अब पवित्र आत्मा का युग है फिर भी उसके नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे अस्पष्ट विश्वास में जीने वाले लोग हैं। मनुष्यों का इस प्रकार का व्यवहार कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं करेगा। जो लोग चाहते हैं कि पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से उनसे बात करे और अपना कार्य करे, फिर भी वे देहधारी परमेश्वर के वचनों या कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कभी भी नए युग में प्रवेश या परमेश्वर से पूरी तरह से उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएँगे।

"वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?" से

परमेश्वर मौन है, और हमारे सामने कभी प्रकट नहीं हुआ, फिर भी उसका काम कभी नहीं रूका है। वह सभी भूमियों पर देखता है, सभी का नियंत्रण करता है, और मनुष्य के सभी वचनों और कर्मों को देखता है। उसका प्रबंधन चरणबद्ध है और उसकी योजना के अनुसार है। यह चुपचाप, नाटकीय प्रभाव के बिना आगे बढ़ता है, मगर उसके चरण मनुष्यों के निकटतम बढ़ते रहते हैं, और उसका न्याय का आसन बिजली की रफ्तार से ब्रह्माण्ड में तैनात होता है, और उसके तुरंत बाद हमारे बीच उसके सिंहासन का अवरोहण होता है। वह कैसा आलीशान दृश्य है, कितनी भव्य और गंभीर झाँकी! कपोत के समान, गरजते हुए सिंह के समान, पवित्र आत्मा हम सब के बीच में पहुँचता है। वह बुद्धिमान है, वह धर्मी और आलीशान है, वह अधिकार से युक्त और प्रेम एवं करुणा से भरा हुआ, चुपचाप हमारे बीच में पहुँचता है। ...

...

और तब भी यही वह साधारण मनुष्य है जो लोगों के बीच में छुपा हुआ है जो हमें बचाने के नये काम को कर रहा है। वह हमें कोई सफाई नहीं देता है, और न बताता है कि वह क्यों आया है। वह केवल उस काम को करता है जिसे वह चरणों में, और अपनी योजना के अनुसार, करने का इरादा रखता है। उनके वचन और कथन अब बार-बार सुनाई देते हैं। सांत्वना देने, उत्साह बढ़ाने, स्मरण कराने, चेतावनी देने, से लेकर डॉटने-फटकारने, और अनुशासित करने तक; ऐसे स्वर जो नरम और दयालु हैं से ले कर, ऐसे वचनों तक जो भयंकर और राजसी हैं—वे सब मनुष्य में तरस और कँपकँपी दोनों भरते हैं। हर बात जो वह कहते हैं हमारे अंदर गहरे छिपे रहस्यों पर सीधे चोट करती है, उसके वचन हमारे हृदयों में डंक मारते हैं, हमारी आत्माओं पर डंक मारते हैं, हमें लज्जित और अपमानित कर देते हैं। ...

हमारी जानकारी के बिना, इस महत्वहीन व्यक्ति ने, परमेश्वर के कार्य में एक के बाद एक कदम में हमारी अगुवाई की है। हम अनगिनत परीक्षाओं से गुजरते हैं, अनगिनत ताड़नाओं के अधीन किये जाते हैं और मृत्यु द्वारा हमारी परीक्षा ली जाती है। हम परमेश्वर के धर्मी और आलीशान स्वभाव के बारे में सीखते हैं, उसके प्रेम और करुणा का आनंद भी लेते हैं; परमेश्वर के महान सामर्थ्य और विवेक की सराहना करते हैं, परमेश्वर की सुंदरता के गवाह बनते हैं, और मनुष्य को बचाने की परमेश्वर की उत्कट इच्छा को देखते हैं। इस साधारण मनुष्य के वचनों में, हमें परमेश्वर का स्वभाव और सार ज्ञात हो जाता है; परमेश्वर की इच्छा समझ जाते है, मनुष्य की प्रकृति और उसका सार ज्ञात हो जाता है, हम उद्धार और पूर्ण होने का मार्ग जान जाते हैँ।

"परमेश्वर के प्रकटन को उनके न्याय और ताड़ना में देखना" से

परमेश्वर का प्रत्येक वचन हमारे मर्मस्थल पर चोट करता है, और हमें दुःखी एवं भयभीत कर देता है। वह हमारे विचारों को प्रकट करता है, हमारी कल्पनाओं को प्रकट करता है, और हमारे भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करता है। वह सब जो हम कहते और करते हैं, और हमारे प्रत्येक विचार और सोच, हमारा स्वभाव और सार उसके वचनों के द्वारा प्रकट होता है, हमें अपमानित करता हुआ और भय से काँपता हुआ छोड़ देता है। हमें यह महसूस कराते हुए कि हम पूरी तरह उजागर कर दिए गए हैं, और यहाँ तक कि पूरी तरह से राजी महसूस कर करवाते हुए, वह हमें हमारे सभी कार्यों, हमारे लक्ष्यों और अभिप्रायों को, और यहाँ तक कि हमारे भ्रष्ट स्वभाव जिसे हमने कभी खोजा नहीं है, के बारे में भी बताता है। परमेश्वर अपने प्रति हमारे विरोध के लिए हमारा न्याय करता है, अपनी ईशनिंदा और तिरस्कार के कारण हमारी ताड़ना करता है, और हमें यह अनुभव करवाता है कि उसकी दृष्टि में हम मूल्यहीन हैं, और हम ही जीवित शैतान हैं। हमारी आशाएँ चूर-चूर हो जाती हैं, हम उससे अविवेकपूर्ण माँगें करने और उसके सामने ऐसा प्रयास करने का साहस अब और नहीं करते हैं, और यहाँ तक कि रात भर में हमारे स्वप्न गायब हो जाते हैं। यह ऐसा तथ्य है जिसकी कल्पना हममें से कोई नहीं कर सकता है और जिसे हममें से कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता है। एक क्षण के लिए, हमारे मन असंतुलित हो जाते हैं, और हम नहीं जानते हैं कि मार्ग पर आगे कैसे बढ़ें, नहीं जानते हैं कि अपना विश्वास कैसे जारी रखें। ऐसा लगता है कि हमारा विश्वास जहाँ था वहीं वापस लौट गया है, और यह कि हम कभी प्रभु यीशु से मिले और परिचित हुए नहीं हैं। हमारी आँखों के सामने हर बात हमें हक्का-बक्का कर देती है, और हमें महसूस करवाती है मानो हमें बाहर कर दिया गया है। फिर हम हताश होते हैं, हम हतोत्साहित होते हैं, और हमारे हृदयों की गहराई में अदम्य क्रोध और निरादर होता है। हम उसे बाहर निकालने का प्रयास करते हैं, कोई तरीका ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं, और, उससे भी अधिक, हम अपने उद्धारकर्ता यीशु की प्रतीक्षा करना जारी रखने का प्रयास करते हैं और अपने हृदयों को उसके सामने उड़ेलते हैं। यद्यपि ऐसे अवसर भी आते हैं जब हम बाहर से न तो घमंडी होते हैं और न विनम्र, तब भी अपने हृदयों में हम नुकसान की ऐसी भावना से व्यथित हो जाते हैं जैसी पहले कभी नहीं हुई। यद्यपि कभी-कभी हम बाहरी तौर पर असामन्य रूप से शांत दिखाई दे सकते हैं, किंतु भीतर हम समुद्र की गर्जना जैसी यातना का अनुभव करते हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें हमारी सभी आशाओँ और स्वप्नों से वंचित कर दिया है, और हमारी अनावश्यक इच्छाओं से रहित कर दिया है, हम यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि वह हमारा उद्धारकर्ता है और हमारा उद्धार करने में सक्षम हैं। उसके न्याय एवं ताड़ना ने हमारे और उसके बीच एक गहरी खाई पैदा कर दी है और यहाँ तक कि कोई उसे पार करने की इच्छा भी नहीं कर रहा है। उसके न्याय और ताड़ना के कारण पहली बार हम इतना अधिक नुकसान और इतना बड़ा अपमान झेलते हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें परमेश्वर के आदर और मनुष्य के अपराध के बारे में सहनशीलता की वास्तव में सराहना करने दी है, जिसकी तुलना में हम बहुत अधम और अशुद्ध हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने पहली बार हमें अनुभव कराया कि हम कितने अभिमानी और आडंबरपूर्ण हैं, और कैसे मनुष्य कभी परमेश्वर की बराबरी नहीं कर सकता है, और उसके समान नहीं बन सकता है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे भीतर यह उत्कंठा उत्पन्न की है कि हम ऐसे स्वभाव में अब और न रहें, और हमारे भीतर ऐसे स्वभाव तथा सार से जितना जल्दी हो सके छुटकारा पाने की, और आगे उसके द्वारा तिरस्कृत और उसके लिए घृणित न होने की इच्छा उत्पन्न की है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे लिए उसके वचनों का आज्ञापालन करना, और अब उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के विरुद्ध विद्रोह न करना सुखद बनाया। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें एक बार फिर जीवन की खोज करने की इच्छा दी है, और उसे हमारे उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने की प्रसन्नता दी है.... हम विजय के कार्य से बाहर निकल गए हैं, नरक से बाहर आ गए हैं, मृत्यु की छाया की घाटी से बाहर आ गए हैं.... सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें, लोगों के इस समूह को जीत लिया है! उसने शैतान पर विजय पाई है, और अपने सभी शत्रुओं को पराजित कर दिया है!

"परमेश्वर के प्रकटन को उनके न्याय और ताड़ना में देखना" से

जब तुम राज्य के युग में देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक कदम का अनुभव प्राप्त कर लोगे, तब तुम अनुभव करोगे कि अनेक वर्षों की तुम्हारी आशाएँ अंततः साकार हो गयी हैं। तुम अनुभव करोगे कि केवल अब तुमने परमेश्वर को वास्तव में आमने-सामने देखा है, केवल अब ही तुमने परमेश्वर के चेहरे को निहारा है, परमेश्वर व्यक्तिगत कथन को सुना है, परमेश्वर के कार्य की बुद्धि की सराहना की है, और वास्तव में महसूस किया है कि परमेश्वर कितना वास्तविक और सर्वशक्तिमान है। तुम महसूस करोगे कि तुमने ऐसी बहुत सी चीजों को पाया है जिन्हें अतीत में लोगों ने कभी देखा या धारण नहीं किया था। इस समय, तुम संतुष्ट रूप में जान लोगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या है, और परमेश्वर के हृदय के अनुसरण में होना क्या है। निस्संदेह, यदि तुम अतीत के विचारों से जुड़े रहते हो और परमेश्वर के दूसरे देहधारण को अस्वीकार या इनकार करते हो, तब तुम खाली-हाथ रहोगे और कुछ नहीं पाओगे, और अंततः परमेश्वर का विरोध करने के दोषी होगे। वे जो सत्य का पालन करते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करते हैं, वे दूसरे देहधारी परमेश्वर – सर्वशक्तिमान—के नाम के अधीन आएँगे। वे परमेश्वर से व्यक्तिगत मार्गदर्शन पाने में सक्षम होंगे, वे अधिक उच्चतर सत्य को प्राप्त करेंगे और वास्तविक मानव जीवन ग्रहण करेंगे।

"केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है" से

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