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अंत के दिनों में, परमेश्वर मुख्य रूप से सत्य व्यक्त करते हैं और परमेश्वर के घर से आरम्भ करके न्याय का कार्य करते हैंI केवल परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुज़रना, साथ ही साथ परमेश्वर द्वारा शुद्ध और पूर्ण किया जाना, आखिरकार सच्चाई को अपने वास्तविक जीवन के रूप में प्राप्त करना, वास्तव में प्रभु के साथ भोज में शामिल होना हैI

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संदर्भ के लिए बाइबिल के पद:

"यह लिख, कि धन्य वे हैं, जो मेम्ने के विवाह के भोज में बुलाए गए हैं" (प्रकाशितवाक्य 19:9)।

"आत्मा और दुल्हिन दोनों कहती हैं, "आ!" और सुननेवाला भी कहे, "आ!" जो प्यासा हो वह आए, और जो कोई चाहे वह जीवन का जल सेंतमेंत ले" (प्रकाशितवाक्य 22:17)।

"उस तिहाई को मैं आग में डालकर ऐसा निर्मल करूँगा, जैसा रूपा निर्मल किया जाता है, और ऐसा जाँचूँगा जैसा सोना जाँचा जाता है" (जकर्याह 13:9)।

"ये वे हैं, जो उस महाक्लेश में से निकलकर आए हैं; इन्होंने अपने-अपने वस्त्र मेम्ने के लहू में धोकर श्‍वेत किए हैं" (प्रकाशितवाक्य 7:14)।

"धन्य वे हैं, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे" (प्रकाशितवाक्य 22:14)।

"ये वे हैं जो स्त्रियों के साथ अशुद्ध नहीं हुए, पर कुँवारे हैं; ये वे ही हैं कि जहाँ कहीं मेम्ना जाता है, वे उसके पीछे हो लेते हैं; ये तो परमेश्‍वर के निमित्त पहले फल होने के लिये मनुष्यों में से मोल लिए गए हैं"(प्रकाशितवाक्य 14:4)।

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन:

इस युग में परमेश्वर इसे तुम्हारे बीच वास्तविकता बनाएगा कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जीयेगा, और सत्य पर अमल करने योग्य बनेगा, और ईमानदारीपूर्वक परमेश्वर से प्रेम करेगा; कि सभी लोग परमेश्वर के वचन को नींव के रूप में और उनकी वास्तविकता के रूप में ग्रहण करें, और उनके हृदयों में परमेश्वर के प्रति आदर हो, और परमेश्वर के वचन पर अमल करने के द्वारा मनुष्य तब परमेश्वर के साथ मिलकर राज्य करे। परमेश्वर अपने इस कार्य को संपन्न करेगा। क्या तुम परमेश्वर के वचन को पढ़े बिना रह सकते हो? अब, बहुत से लोग हैं, जो महसूस करते हैं कि वे एक दिन या दो दिन भी परमेश्वर के वचन को बिना पढ़े नहीं रह सकते। उन्हें परमेश्वर का वचन प्रतिदिन अवश्य पढ़ना चाहिये, और यदि समय न मिले तो वचन को सुनना ही काफी है। यही भाव मनुष्य को पवित्र आत्मा की ओर से मिलती है। और इस प्रकार वो मनुष्य को चालित करता है। अर्थात पवित्र आत्मा वचन के द्वारा मनुष्य को नियंत्रित करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश करे। यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पीए बिना बस एक ही दिन में तुम्हें अंधकार और प्यास का अनुभव हो, और तम्हें यह अस्वीकार्य लगता है, तब ये बातें दर्शाती हैं कि पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित कर रहा है और वह तुमसे अलग नहीं हुआ है। तब तुम वह हो जो इस धारा में हो। किंतु यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पीए बिना एक या दो दिन के बाद, तुम में कोई अवधारणा न हो या तुम्हें भूख-प्यास न लगे, और तुम द्रवित महसूस न करो, तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा तुम से दूर जा चुका है। इसका अर्थ है कि तुम्हारी भीतरी दशा सही नहीं है; तुमने वचन के युग में प्रवेश नहीं किया है, और तुम वह हो जो पीछे छूट गये हो। परमेश्वर मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिये वचन का उपयोग करता है; तुम जब वचन को खाते-पीते हो, तुम्हें अच्छा महसूस होता है, यदि अच्छा महसूस नहीं होता, तब तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर का वचन मनुष्यों का भोजन और उन्हें संचालित करने वाली शक्ति बन जाता है। बाइबिल में लिखा है, "मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं परन्तु हर एक वचन से जीवित रहेगा जो परमेश्वर के मुख से निकलता है" यही वह कार्य है जो परमेश्वर इस दिन में संपन्न करेगा। वह तुम लोगों को इस सत्य का अनुभव करायेगा। यह कैसे होता था कि प्राचीन दिनों में लोग परमेश्वर का वचन बिना पढ़े बहुत दिन रहते थे, पर खाते-पीते और काम करते थे? और अब ऐसा क्यों नहीं होता? इस युग में परमेश्वर सब मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य परखा, और पूर्ण बनाया जाता है, और तब अंत में राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्यों को जीवन दे सकता है, और केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्यों को ज्योति और अमल करने का मार्ग दे सकता है विशेषकर राज्य के युग में। जब तब तुम परमेश्वर के वचन को खाते-पीते हो, और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं छोड़ते, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने का कार्य कर पाएगा।

"राज्य का युग वचन का युग है" से

परमेश्वर के वचनों के प्रति सम्पूर्ण निष्ठा का मुख्य अर्थ सत्य की खोज करना, परमेश्वर के वचनों के द्वारा उनके इरादे की खोज करना, परमेश्वर की इच्छा को समझने पर ध्यान केन्द्रित करना, और परमेश्वर के वचनों के द्वारा सच्चाई को और अधिक समझना और प्राप्त करना हैI उनके वचनों को पढ़ते हुए, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केन्द्रित नहीं किया और उसने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने पर और भी कम ध्यान दिया; इसके बजाय, उसने सत्य और परमेश्वर की इच्छा को समझने और उनके स्वभाव और मनोरमता की समझ हासिल करने पर ध्यान दियाI साथ ही उसने परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मानव की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं और मानव के भ्रष्ट स्वभाव और मानव की वास्तविक कमियों को समझने की, परमेश्वर की अपेक्षाओं के उन सभी पहलुओं को प्राप्त करने की भी कोशिश की जो परमेश्वर स्वयं को सन्तुष्ट करने हेतु मानव से करता हैI परमेश्वर के वचनों के भीतर उसके पास बहुत सारे सही अभ्यास थे; यह परमेश्वर की इच्छा के सबसे अधिक अनुरूप है, और यह परमेश्वर के कार्य के अपने अनुभव में यह मानव का सबसे अच्छा सहयोग हैI परमेश्वर के सैंकड़ों परीक्षणों का सामना करते समय, उसने परमेश्वर के मानव के न्याय के हर एक वचन, परमेश्वर के मानव के प्रकटीकरण के हर एक वचन, और मानव से उसकी माँगों के प्रत्येक वचन के अनुसार स्वयं का सख्ती से परिक्षण किया, और परमेश्वर के वचनों के अर्थ तक पहुँचने की कोशिश कीI उसने हर वो वचन जो यीशु ने उससे कहे, उन पर ईमानदारी से विचार करने और उन्हें याद रखने की कोशिश की, और बहुत अच्छे नतीजे हासिल कियेI इस तरह के अभ्यास के माध्यम से वह परमेश्वर के वचनों के द्वारा खुद की समझ हासिल करने के काबिल हो सका, और वह न सिर्फ मानव की विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं को समझ पाया, बल्कि वह मानव के सार, मानव की प्रकृति, और मानव की विभिन्न तरह की कमियों को भी समझ पाया—यह एक व्यक्ति की स्वयं वास्तविक समझ हैI परमेश्वर के वचनों के द्वारा, वह न केवल खुद की वास्तविक समझ हासिल कर पाया, बल्कि परमेश्वर के वचन में व्यक्त चीज़ों से—परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, परमेश्वर जो है, अपने कार्य के लिए परमेश्वर की इच्छा, मानवजाति से उसकी माँगे—इन वचनों के ज़रिये वह परमेश्वर को पूरी तरह जान पायाI वह परमेश्वर के स्वभाव, और उसके सार को जान पाया; वह परमेश्वर जो है, परमेश्वर की मनोरमता और मानव के लिए परमेश्वर की माँगों के बारे में जान पायाI हालाँकि उस समय परमेश्वर आज जितना नहीं बोलता था, फिर भी इन पहलुओं में पतरस में फल प्राप्त हुआI यह अनूठी और अनमोल चीज़ थीI पतरस सैंकड़ों परीक्षणों से गुज़रा लेकिन उसने बेकार में दुख नहीं उठायाI वह न सिर्फ परमेश्वर के कार्य और वचनों से स्वयं को समझ पाया, बल्कि वह परमेश्वर को भी समझ पायाI उसने ख़ास तौर पर परमेश्वर के वचनों के अंतर्गत मानवजाति से परमेश्वर की आवश्यकताओं और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनने के लिए जिन पहलुओं में मानव को परमेश्वर को सन्तुष्ट करना चाहिए, उस पर भी ध्यान केन्द्रित कियाI उसने इस परिप्रेक्ष्य में बहुत प्रयास किया और पूर्ण स्पष्टता प्राप्त की; यह स्वयं उसके प्रवेश के लिए बहुत लाभप्रद थाI चाहे परमेश्वर जिस भी बारे में कहता, जब तक वे वचन उसकी ज़िन्दगी बन सकते थे और सत्य के थे, तब तक वह अक्सर उन पर विचार करने और उनका अनुसरण करने के लिए उन्हें अपने हृदय में उतारने में सक्षम थाI यीशु के वचनों को सुनने के बाद वो उन्हें हृदय में उतारने में सक्षम था, जो यह दर्शाता है कि वह ख़ास तौर पर परमेश्वर के वचनों पर केन्द्रित था, और उसने अंत में वास्तिवक नतीज़े हासिल कियेI अर्थात, वह स्वतंत्र रूप से परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम था, वह सत्य का सटीक अभ्यास और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनने में, पूरी तरह से परमेश्वर के इरादे के अनुसार कार्य करने में, और अपने व्यक्तिगत विचारों और कल्पनाओं को छोड़ने में सक्षम थाI इस तरह से उसने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कियाI

"परतस का मार्ग कैसे अपनायें" से

मनुष्य की दशा और परमेश्वर के प्रति मनुष्य के व्यवहार को देखने पर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, उसने मनुष्य को अनुमति दी है कि वह उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता रखे, और प्रेम और गवाही दोनों रखे। इस प्रकार, मनुष्य को परमेश्वर के शोधन, और साथ ही उसके दंड, उसके व्यवहार और काँट-छाँट का अनुभव करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शोधन केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुतरफा प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी रीति से परमेश्वर उनमें शोधन का कार्य करता है जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि मनुष्य का दृढ़ निश्चय और प्रेम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किया जाए। जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, और जो परमेश्वर की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शोधन से अधिक अर्थपूर्ण, या अधिक सहयोगपूर्ण कुछ नहीं हैं। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के द्वारा सरलता से जाना या समझा नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है। अंततः, परमेश्वर के लिए मनुष्य जैसे स्वभाव को रखना असंभव है, और इस प्रकार मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को जानना सरल नहीं है। मनुष्य के द्वारा सहजता से सत्य को प्राप्त नहीं किया जाता, और यह सरलता से उनके द्वारा समझा नहीं जाता जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से रहित है, और सत्य को अभ्यास में लाने के दृढ़ निश्चय से रहित है, और यदि वह दुःख नहीं उठाता, और उसका शोधन नहीं किया जाता या उसे दंड नहीं दिया जाता, तो उसका दृढ़ निश्चय कभी सिद्ध नहीं किया जाएगा। सब लोगों के लिए शोधन कष्टदायी होता है, और स्वीकार करने के लिए बहुत कठिन होता है - परंतु फिर भी, परमेश्वर शोधन के समय में ही मनुष्य के समक्ष अपने धर्मी स्वभाव को स्पष्ट करता है, और मनुष्य के लिए अपनी मांगों को सार्वजनिक करता है, तथा और अधिक प्रबुद्धता प्रदान करता है, और इसके साथ-साथ और अधिक वास्तविक कांट-छांट और व्यवहार को भी; तथ्यों और सत्यों के बीच की तुलना के द्वारा वह स्वयं के बारे में और सत्य के बारे में मनुष्य को और अधिक ज्ञान प्रदान करता है, और मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा के विषय में अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर के सच्चे और शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने की अनुमति देता है। शोधन का कार्य करने में परमेश्वर के लक्ष्य ये हैं। वह सारा कार्य जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, उसके अपने लक्ष्य और उसका अपना महत्व होता है; परमेश्वर व्यर्थ कार्य नहीं करता है, और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ परमेश्वर के सामने से लोगों को हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में डालकर नाश कर देना है। इसका अर्थ शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना है, उसकी प्रेरणाओं, उसके पुराने दृष्टिकोणों को बदलना है, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना है, और उसके पूरे जीवन को बदलना है। शोधन मनुष्य की वास्तविक परख है, और एक वास्तविक प्रशिक्षण का रूप है, और केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम उसके अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है।

"केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम कर सकता है" से

संभवतः तुम सबको ये वचन स्मरण होंगे: "क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।" अतीत में तुम सबने यह बात सुनी है तो भी किसी ने इन वचनों का सही अर्थ नहीं समझा। आज, तुम सभी अच्छे से जानते हो कि उनका वास्तविक महत्व क्या है। ये वह वचन है जिन्हें परमेश्वर अंतिम दिनों में पूरा करेगा। और ये वचन उन में पूरे होंगे जो विशाल लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक पीड़ित किये गए हैं, उस देश में जहां वह रहता है। यह बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसलिए इस देश में, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं उन्हें अपमानित किया जाता और सताया जाता है। इस कारण ये शब्द तुम्हारे समूह के लोगों में वास्तविकता बन जाएंगे। जब उस देश में परमेश्वर का कार्य किया जाता है जहाँ परमेश्वर का विरोध होता है, उसके सारे कामों में अत्यधिक बाधा आती है, और उसके बहुत से वचन सही समय पर पूरे नहीं किये जा सकते; अतः, परमेश्वर के वचनों के कारण लोग शुद्ध किये जाते हैं। यह भी पीड़ा का एक तत्व है। परमेश्वर के लिए विशाल लाल अजगर के देश में अपना कार्य करना बहुत कठिन है, परन्तु ऐसी कठिनाईयों के बीच में अपनी बुद्धि और अद्भुत कामों को प्रकट करने के लिए परमेश्वर अपने काम का मंचन करता है। परमेश्वर इस अवसर के द्वारा इस जनसमूह के लोगों को पूर्ण करता है। इस अशुद्ध देश में लोगों के सताये जाने के कारण, उनकी क्षमता और उनके पूरे शैतानी स्वभाव का परमेश्वर शुद्धिकरण करता और जीतता है ताकि, इससे, वह महिमा प्राप्त करे और उन्हें भी जो उसके कामों के गवाह बनते हैं। परमेश्वर ने इस जनसूमह के लोगों के लिए जो बलिदान किये हैं यह उन सभी का संपूर्ण महत्व है।

"क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है?" से

परमेश्वर अपने न्याय का प्रयोग मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए करता है, वह मनुष्य से प्रेम करता रहा है और उसे बचाता रहा है - परंतु उसके प्रेम में कितना कुछ शामिल है? उसमें न्याय, भव्यता, क्रोध, और शाप है। यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्य को अतीत में शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को अथाह कुण्ड में नहीं फेंका था, बल्कि उसने उस माध्यम का प्रयोग मनुष्य के विश्वास को शुद्ध करने के लिए किया था; उसने मनुष्य को मार नहीं डाला था, उसने मनुष्य को सिद्ध बनाने का कार्य किया था। शरीर का सार वह है जो शैतान का है - परमेश्वर ने इसे बिलकुल सही कहा है - परंतु परमेश्वर के द्वारा बताई गईं वास्तविकताएँ उसके वचनों के अनुसार पूरी नहीं हुई हैं। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम करो, ताकि तुम शरीर के सार को जान लो; वह तुम्हें इसलिए ताड़ना देता है ताकि तुम जागृत हो जाओ, कि वह तुम्हें अनुमति दे कि तुम अपने भीतर की कमियों को जान लो, और मनुष्य की संपूर्ण अयोग्यता को जान लो। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसकी भव्यता और क्रोध - वे सब मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए हैं। वह सब जो परमेश्वर आज करता है, और धर्मी स्वभाव जिसे वह तुम लोगों के भीतर स्पष्ट करता है - यह सब मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए है, और परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है।

"केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से

परमेश्वर के द्वारा शोधन जितना बड़ा होता है, लोगों के हृदय उतने अधिक परमेश्वर से प्रेम करने के योग्य हो जाते हैं। उनके हृदयों की यातना उनके जीवनों के लिए लाभदायक होती है, वे परमेश्वर के समक्ष अधिक शांत रह सकते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध और अधिक निकटता का हो जाता है, और वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को और अच्छी तरह से देख पाते हैं। पतरस ने सैंकड़ों बार शोधन का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षाओं से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किया जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैंकड़ों बार शोधन से होकर गुजरना होगा; केवल इस प्रक्रिया से होकर जाने और इस कदम पर निर्भर रहने के द्वारा ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर पाओगे और परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाओगे। शोधन वह सर्वोत्तम माध्यम है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को सिद्ध बनाता है, केवल शोधन और कड़वी परीक्षाएँ ही लोगों के हृदयों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम को उत्पन्न सकती हैं। कठिनाइयों के बिना, लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच्चाई के साथ शोधन के अधीन नहीं होते, तो उनके हृदय बाहरी संसार में भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शोधन किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताओं और कठिनाइयों को देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी घटी है और कि तुम उन बहुत सी समस्याओं पर विजय पाने में असमर्थ हो जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञाकारिता कितनी बड़ी है। केवल परीक्षाओं के द्वारा ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच देख पाएँगे, और परीक्षाएँ लोगों को सिद्ध किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाती हैं।

"केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम कर सकता है" से

परमेश्वर पर विश्वास के लिए उसका आज्ञापालन करने और उसके काम का अनुभव करने की आवश्यकता है। परमेश्वर ने बहुत काम किया है—यह कहा जा सकता है कि लोगों के लिए यह सब पूर्ण बनाना है, यह सब शुद्धिकरण है, और इससे भी ज्यादा, यह सब ताड़ना है। परमेश्वर के काम का एक भी कदम ऐसा नहीं रहा है जो मानवीय धारणाओं के अनुरूप रहा हो; लोगों ने जिस चीज का आनंद लिया वह है परमेश्वर के कठोर वचन हैं। जब परमेश्वर आता है, तो लोगों को उसके प्रताप और उसके कोप का आनंद लेना चाहिए, लेकिन उसके वचन चाहे कितने ही कठोर क्यों न हों, वह मानव जाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए आता है। प्राणियों के रूप में, लोग उन कर्तव्यों को पूरा करें जो उन्हें करने चाहिए, और शुद्धिकरण के बीच परमेश्वर के लिए गवाह बनना चाहिए। हर परीक्षण में वे गवाही का समर्थन करें जो उन्हें देनी चाहिए, और परमेश्वर के लिए एक शानदार गवाही देनी चाहिए। यह जीतने वाला है। इसके कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर तुम्हारा कैसे शुद्धिकरण करता है, तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो और परमेश्वर पर विश्वास कभी नहीं खोते हो। तुम वह करते हो जो मनुष्य को करना चाहिए। यह वही है जो परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा करता है, और मनुष्य का दिल हर पल पूरी तरह से उसकी ओर लौटने और उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होना चाहिए। यह जीतने वाला है।

"तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति अवश्य बनाए रखनी चाहिए" से

अगर कोई मामलों और उसके द्वारा अपेक्षित शब्दों से परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में वास्तव में प्रवेश कर सकता है, तो वह परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाने वाला व्यक्ति होगाI यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य और वचन इस व्यक्ति के लिए पूरी तरह से प्रभावी हैं, कि परमेश्वर के वचन उसकी ज़िन्दगी बन जाते हैं, वह सत्य को प्राप्त करता है, और वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जी सकता हैI इसके बाद उसकी देह की प्रकृति, यानी, उसके मूल अस्तित्व की नींव, कंपकंपाकर ढह जायेगीI परमेश्वर के वचन एक व्यक्ति की ज़िन्दगी बनने के बाद वह एक नया व्यक्ति बन जाता है। जब परमेश्वर के वचन उसकी ज़िन्दगी बन जाते हैं, परमेश्वर के कार्य का दर्शन, मानव की उसकी आवश्यकताएँ, मानव का उसका प्रकटीकरण, और एक सच्चे जीवन के लिए मापदंड जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि मानव हासिल करे, उसका जीवन बन जाते हैं—वह इन वचनों और इन सच्चाईयों के अनुसार जीता है, और यह व्यक्ति परमेश्वर के वचनों द्वारा पूर्ण बन जाता है। वह पुनर्जन्म का अनुभव करता है और परमेश्वर के वचनों के माध्यम से एक नया व्यक्ति बन जाता है।

"परतस का मार्ग कैसे अपनायें" से

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