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प्रश्न: आपकी बातों से मुझे एक बात समझ में आई है कि प्रभु की वापसी और आरोहण की हमारी उम्मीदें वाकई इंसानी मान्यताओं और कल्पनाओं की देन हैं। हम पहले ही प्रभु के वचनों को धोखा दे चुके हैं। ख़ैर, अब हम प्रभु की वापसी और आरोहण का इंतज़ार कैसे करें? इस पर थोड़ा और विस्तार से चर्चा कर लें?

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उत्तर: आरोहित किए जाने की संतों की उम्मीदों का मुख्य आधार, स्वयं प्रभु यीशु के वचन हैं: "क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो" (यूहन्ना 14:2-3)। हम प्रभु यीशु के वचनों की व्याख्या अपनी कल्पनाओं के आधार पर करते हैं। हमें लगता है, चूँकि स्वर्ग में प्रभु यीशु का आरोहण एक बादल पर हुआ था, तो प्रभु ने मनुष्यों के लिये स्वर्ग में ही स्थान तैयार किया होगा। इसलिये हम लोग प्रभु यीशु की वापसी और स्वर्ग में उन्नत किये जाने का इंतज़ार कर रहे हैं। इसके अलावा, हम लोग खास तौर से पौलुस के वचनों में श्रद्धा रखते हैं: "तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें; और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे" (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)। इसीलिये हम लोगों ने उम्मीद करनी शुरु कर दी कि प्रभु लौटने पर हमें स्वर्ग में उन्नत कर देंगे। आरोहण को, लोग अलग-अलग तरीके से समझते हैं। अधिकतर लोग मानते हैं, जब प्रभु आएँगे तो वे संतों को स्वर्ग में उन्नत कर लेंगे। हम लोग बरसों से, इस तरह के आरोहण की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अच्छा तो, ये आरोहण दरअसल है क्या? ज़्यादातर लोग इस बारे में कुछ जानते नहीं हैं। संतों के आरोहण का राज़, तभी उजागर हुआ जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर का आगमन हुआ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "'स्वर्गारोहण' नीचे स्थानों से उँचे स्थानों पर उठाया जाना नहीं है जैसा कि लोग कल्पना करते हैं। यह एक बहुत बड़ी ग़लती है। स्वर्गारोहण मेरे द्वारा पूर्वनियत और चयनित किए जाने को संदर्भित करता है। यह उन सभी पर लक्षित है जिन्हें मैंने पूर्वनियत और चयनित किया है… सभी ऐसे लोग हैं जो मेरे सामने स्वर्गारोहित किये जा चुके हैं। यह पूर्णतः सत्य है, कभी भी नहीं बदलता है, और किसी के द्वारा भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यह शैतान के विरुद्ध जवाबी हमला है। जिस किसी को भी मैंने पूर्व नियत किया है वह मेरे सामने स्वर्गारोहित किया जाएगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "एक सौ चौथा कथन" से)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं। "उठा लिये जाने" का अर्थ वो नहीं है जो हम लोग समझते हैं-धरती से हवा में उठा लिया जाना और बादलों पर प्रभु से मिलना। न की इसका अर्थ स्वर्ग में ले जाया जाना है। इसका अर्थ है कि जब परमेश्वर धरती पर अपने वचन बोलने और अपना कार्य करने वापस आएँगे, तो हम लोग उनकी वाणी सुनेंगे और अंत के दिनों में उनका अनुसरण और उनके कार्य का पालन कर पाएँगे। परमेश्वर के सिंहासन के सामने उठाए जाने का यही सच्चा अर्थ है। जो लोग प्रभु की वाणी में भेद कर पाते हैं, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में, सत्य ढूंढ पाते हैं, सत्य को स्वीकार कर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ओर लौट पाते हैं, वे बुद्धिमान कुँवारियाँ हैं। वे लोग सोना, चाँदी और बेशकीमती पत्थर हैं, जिन्हें प्रभु ने "चुरा" कर परमेश्वर के भवन में लौटा दिया है क्योंकि उन सब की क्षमता अच्छी है, वे सत्य को समझ और स्वीकार करके परमेश्वर की वाणी को सुन सकते हैं। उन्हीं लोगों ने सही मायने में आरोहण पाया है। जब परमेश्वर अंत के दिनों में चुपचाप धरती पर उतरकर अपना कार्य करेंगे तो इन्हीं लोगों को विजेता बनाया जाएगा। जब से सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अंतिम दिनों का कार्य शुरू किया है, तब से, परमेश्वर के प्रकटन की प्यास से युक्त लोगों ने, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में उनकी वाणी को पहचाना है। एक एक करके, उन्होंने परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया है। उन्हें परमेश्वर से मिलने के लिए सिंहासन के सामने उठा लिया गया है और उनके वचनो के जीवन-जल और पोषण को स्वीकार कर लिया है उन्होंने परमेश्वर का सच्चा ज्ञान पा लिया है। उनका स्वभाव शुद्ध कर दिया गया है वे परमेश्वर के वचनों को समझ पाए हैं। उन्हें परमेश्वर का उद्धार प्राप्त हो गया है। इन लोगों को, महाविपदा आने, से पहले विजेता बना दिया गया है। वे परमेश्वर को प्रथम-फल के रूप में, प्राप्त हो गए हैं। जो लोग अपनी कल्पनाओं से चिपके हुए हैं आंखें मूंदे, स्वर्ग में ले जाये जाने के इंतज़ार में हैं, वो परमेश्वर के अंत के दिनों के न्याय को नकारते हैं वे मूर्ख कुँवारियाँ हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर त्याग देंगे। ऐसे लोगों की नियति है कि वे महाविपदा में तड़पें; वे रोएंगे और अपने दाँत पीसेंगे। ये सच है।

"स्वप्न से जागृति" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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