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धर्मोपदेश और संगति: परमेश्वर का विजेताओं को बनाने का सच्चा महत्व

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परमेश्वर मुख्य रूप से अपनी इच्छा को कार्यान्वित करने के लिए, आपसे परमेश्वर की सेवा करवाने के लिए लोगों को सिद्ध बनाता है। जिन लोगों को अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया गया था उन्हें सिद्ध नहीं बनाया गया था; यह राज्य के युग में है कि परमेश्वर लोगों के एक समूह को सिद्ध बनाएगा, और जब सहस्राब्दि राज्य सच में एक वास्तविकता बन जाएगा, तो वह पृथ्वी पर अपनी सेवा करवाने के लिए, याजक बनने के लिए, लोगों के इस समूह का उपयोग करेगा; इस प्रकार, भविष्य में, परमेश्वर उन लोगों का महान उपयोग करेगा जिन्हें सिद्ध बनाया जाता है। …पृथ्वी पर और परमेश्वर के राज्य में, ये लोग खंभे होंगे, ये वे लोग होंगे जो परमेश्वर की सेवा करेंगे, वे याजक होंगे, और इस प्रकार परमेश्वर का लोगों को सिद्ध बनाने का महान और दूरगामी अर्थ है।

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (I) में "कैसे किसी को सत्य की खोज करनी चाहिए" से

और इसलिए, जिन्हें परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाया जाता है वे अत्यंत मूल्यवान हैं। भ्रष्ट मानवजाति को इन लोगों की आवश्यकता है, और परमेश्वर को भी उनकी आवश्यकता है। परमेश्वर ने एक बार पतरस से कुछ कहा था, उसने कहा था: पतरस, तेरी परीक्षा ले ली गई है, और यद्यपि तू बहुत पीड़ित हुआ है, और तेरे दिल में बहुत दर्द है—इस बारे में मुझे पता है—मैं चाहता हूँ कि तू जाने कि इसमें, मैं तुझे सिद्ध बना रहा हूँ, मैं तुझे पहली उपज बना रहा हूँ, ताकि तू मेरी गवाही दे सके । मैं यही मांगता हूँ, मैं इस पहली उपज का आनंद लूँगा। मनुष्यों के बीच, परमेश्वर आनंद लेने के लिए किसी को नहीं पा सका, उसने देखा कि भ्रष्ट मानवजाति ने जो कुछ भी कहा और किया वह केवल झूठ और धोखा था, कि यह केवल उनके अपने लिए था, कि वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार कार्यकलाप करते थे, और उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी सी भी आज्ञाकारिता नहीं थी, ना ही परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम था; परमेश्वर के हृदय में कोई आनंद नहीं था, और इसलिए उसने अपने आनन्द के लिए लोगों के समूह को सिद्ध बनाने, और पहली उपज के एक समूह को बनाने का इरादा किया। और परमेश्वर ने उन लोगों के लिए भी मानवजाति की ओर देखा जिनमें परमेश्वर आनंद और प्रसन्नता प्राप्त कर सकता था, और इस प्रकार, इंसानों के लिए परमेश्वर की इच्छा का पालन करने और धरती पर रहने का कारण बनते हुए, उसने मानवजाति के बीच कुछ निश्चित चीजें की, क्योंकि वह लोगों के एक समूह को सिद्ध बनाना चाहता था... सिद्ध बनाए जाने की तलाश करने में: पहला, हम सार्थक जीवन बिताएँगे, हम एक असली इन्सान की सदृशता में जीवन बिताएँगे, और अपने हृदयों में, हम शांतिपूर्ण होंगे और आनंद लेंगे; दूसरा, हम परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति होने के योग्य होंगे, हम सृजित प्राणी हैं, और हम सृष्टि के प्रभु की अपेक्षाओं को पूरा करेंगे। सिद्ध बनाए जाने का ऐसा ही अर्थ है। यदि तुम सिद्ध बनाए जाने की तलाश नहीं करते हो, और अभी भी धरती पर राक्षसों के रूप में रहना चाहते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करोगे, तुम परमेश्वर के लिए हमेशा अप्रिय और घृणित रहोगे, और परमेश्वर द्वारा शापित किए जाओगे।

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (I) में "परमेश्वर द्वारा सिद्ध बनाए जाने का अर्थ और कैसे सिद्धता की तलाश करें" से

परमेश्वर कहता है कि जब हम अपना कर्तव्य करें, तो हम सत्य की खोज करें और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करें; अंततः, हमारी भ्रष्टता की शुद्धि हो जाएगी, हमारा शैतानी स्वभाव बदल जाएगा, और हम परमेश्वर की आज्ञा मानने और आराधना करने वाले लोग बन जाएँगे। जब परमेश्वर के चुने हुए लोग इस स्तर तक अनुभव कर लेते हैं, और यह प्रभाव प्राप्त कर लिया जाता है, तो आपदा से पहले विजेताओं का समूह बनाने की परमेश्वर की भविष्यवाणी—परमेश्वर की योजना—पूरी हो जाएगी। आज, क्या हम नहीं देखते कि यह तथ्य पहले ही पूरा हो चुका है? (हाँ)। कुछ लोग सत्य की खोज करते हुए दुर्दमनीय होते हैं; वे जानते हैं कि सत्य की खोज करना क्या है, वे जानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास जीवन पाने के लिए है, और यह जीवन क्या संदर्भित करता है, वे जानते हैं कि उनके स्वभाव में बदलाव लाने के लिए उन्हें किस तरह की प्रक्रिया से अवश्य गुज़रना होगा, और वे देखते हैं कि यह सत्य है कि लोगों की शुद्धि की जा सकती है, और उन्हें बचाया, और सिद्ध बनाया जा सकता है। आज, वे पहले से ही इसका बहुत सा अनुभव कर चुके हैं, वे धीरे-धीरे अपने आप को भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त कर रहे हैं, और उन्हें परमेश्वर के बारे में कुछ ज्ञान है, और परमेश्वर का डर है, और वे परमेश्वर के प्रति कुछ आज्ञाकारिता में सक्षम हैं। अपने आप में, क्या वे परमेश्वर द्वारा सिद्धता के मार्ग पर नहीं चलते हैं? शीघ्र ही वह दिन आएगा जब वे जीवन और सत्य प्राप्त करेंगे! जब हम, लोगों का यह समूह, परमेश्वर द्वारा पूर्ण किया जाता है, ऐसा तब होता जब हम सच में संपूर्णता में परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं, जब हम मृत्यु होने तक परमेश्वर के प्रति वफ़ादार हो सकते हैं। क्या यह जीवन प्राप्त करने का परिणाम नहीं है? यह है। जीवन प्राप्त करने का अर्थ है कि आप वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं, परमेश्वर में सच्चा विश्वास करते हैं, परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को फैलाने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा देते है, और अंततः अपने जीवन को अर्पित करने में नहीं ठिठकते हैं—ऐसा तब होता है जब आपने जीवन प्राप्त कर लिया है। यह जीवन को प्राप्त करने का प्रभाव, परिणाम है, यह कोई ऐसा है जिसके पास जीवन है।

परमेश्वर इस आधार पर लोगों का अंत निर्धारित करता है कि उनके पास सत्य है या नहीं। और यह किस सत्य पर आधारित है? इस बात पर कि क्या लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं, क्या उनके पास परमेश्वर का ज्ञान है या नहीं। यही सत्य को प्राप्त करना है; उन्हें महसूस होता है कि कुछ भी अधिक मूल्यवान नहीं है, किसी भी अस्तित्व का अधिक महत्व नहीं है। उन्हें महसूस होता है कि परमेश्वर को प्रेम करने से बड़ी कोई खुशी नहीं है। केवल वे लोग जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, सबसे अधिक खुश हैं, केवल जब आपके हृदय में परमेश्वर का प्रेम होता है तभी आप खुश रह सकते हैं, केवल तभी आपके हृदय में कोई पीड़ा नहीं हो सकती है—और इसमें, आप कोई ऐसे व्यक्ति हैं जिसने सत्य को प्राप्त कर लिया है। जब आप इन सत्यों को प्राप्त करते हैं और जीवन में इस परिणाम को प्राप्त करते हैं, तो कैसे इस तरह का परिणाम प्राप्त किया जाता है? यदि आप अपना कर्तव्य करते समय सत्य की तलाश और उसका अभ्यास करेंगे, तो ऐसा ही प्रभाव अंततः प्राप्त किया जाएगा। अपने आप के बारे में सच्चा ज्ञान प्राप्त करना पहला कदम है; अंततः, जब आप परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह वह चरण है जब आपके जीवन अनुभव करने में परिणाम प्राप्त होता है, और यह सभी चरणों में सबसे ऊँचा है।

जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से (श्रृंखला 156)

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