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व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य की आवश्यक समझ

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यदि हम व्यवस्था के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य के महत्व और सार को प्रकट करने वाले उसके वचनों पर ईमानदारी से चिंतन कर सकें, तो हम पूरी तरह से यह पहचानने में सक्षम हो जाएँगे कि व्यवस्था के युग में परमेश्वर का कार्य मनुष्य के निर्माण के बाद मानवजाति के मार्गदर्शन का आरंभिक कार्य था। यहोवा व्यवस्था के युग में शाश्वत, अद्वितीय सच्चा परमेश्वर था, जो इस्राएलियों के सामने प्रकट हुआ, जिसने मिस्र के राजा के नियंत्रण की अधीनता और दासता से उन्हें बाहर निकाला था, और फिर उसने इस्राएलियों को व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ जारी की, इस प्रकार परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से मानवजाति के जीवन के मार्गदर्शन की शुरुआत की। व्यवस्था के युग में, परमेश्वर ने कई व्यवस्थाओं और आज्ञाओं को जारी किया जिन्हें मानवजाति को अवश्य पालन करना चाहिए, और उनमें से, तीन सबसे महत्वपूर्ण प्रकार थे: सबसे पहला दस आज्ञाएँ थी; दूसरा विश्रामदिन था; तीसरा बलिदान थे, जो मुख्यतः पाप बलियाँ, मेल बलियाँ और होम बलियाँ थीं। परमेश्वर द्वारा प्रस्तुत ये तीन अपेक्षाएँ व्यवस्था के युग में उसका प्राथमिक कार्य था, और उसकी तीन अपेक्षाओं के आवश्यक महत्त्व उस समय के इस्राएलियों के मार्गदर्शन के लिए प्राथमिक संकेत थे कि पृथ्वी पर कैसे जीया जाए। इसके बाद, हम व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर की इन तीन बुनियादी अपेक्षाओं के आवश्यक महत्व की कुछ समझ के बारे में बात करेंगे।

1. व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर द्वारा जारी दस आज्ञाओं का गहन महत्व था। उनकी विषय-वस्तु थी:

"तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्‍वर करके न मानना।

तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी की प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, या पृथ्वी पर, या पृथ्वी के जल में है। तू उनको दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्‍वर यहोवा जलन रखने वाला परमेश्‍वर हूँ, और जो मुझ से बैर रखते हैं, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ, और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हज़ारों पर करुणा किया करता हूँ।

तू अपने परमेश्‍वर का नाम व्यर्थ न लेना; क्योंकि जो यहोवा का नाम व्यर्थ* ले वह उसको निर्दोष न ठहराएगा।

तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना।  छ: दिन तो तू परिश्रम करके अपना सब काम-काज करना; परन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्‍वर यहोवा के लिये विश्रामदिन है। उसमें न तो तू किसी भाँति का काम-काज करना, और न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, न कोई परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो। क्योंकि छ: दिन में यहोवा ने आकाश, और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उनमें हैं, सब को बनाया, और सातवें दिन विश्राम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रामदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया।

तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिससे जो देश तेरा परमेश्‍वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन तक रहने पाए।

तू खून न करना।

तू व्यभिचार न करना।

तू चोरी न करना।

तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी न देना।

तू किसी के घर का लालच न करना; न तो किसी की स्त्री का लालच करना, और न किसी के दास-दासी या बैल-गदहे का, न किसी की किसी वस्तु का लालच करना।” (निर्गमन 20: 3-17)।

वे सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध दस आज्ञाएँ हैं जिससे परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में लोगों का मार्गदर्शन किया था। परमेश्वर की दस आज्ञाएँ जो उसने भ्रष्ट मानवजाति के लिए स्थापित की हैं, सरल और स्पष्ट हैं, पूरी तरह से उचित हैं, वे अच्छे और बुरे में स्पष्ट रूप से अंतर करती हैं, और वे निष्कपट और ईमानदार हैं। उसकी दस आज्ञाएँ पूरी तरह से निष्पक्षता और इंसाफ़ का मूर्त रूप, स्वर्ग और पृथ्वी के सिद्धांत हैं, जो कि विस्मयकारी और धार्मिक, और नैतिकता हैं। लोग इस बात से देख सकते हैं कि परमेश्वर ईमानदार, धार्मिक, पवित्र और ऐसा परमेश्वर है जो बुराई से नफ़रत करता है। दस आज्ञाएँ मानवजाति, जो कि उसकी रचना है, से परमेश्वर की अपेक्षाओँ और उसकी इच्छा का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करती हैं। वे संक्षिप्त, समृद्ध और व्यापक हैं, और ये सभी न्याय संगत और सम्माननीय, सकारात्मक चीजें हैं जो लोगों के विवेक और समझ के माध्यम से प्रमाणित की जा सकती हैं। दस आज्ञाओं का गहन महत्व है। हर एक आज्ञा बहुत ही सार्थक है, और वे सब लोगों को परमेश्वर के बारे में समझा सकती हैं, बुराई से दूर रखवा सकती हैं, यह ज्ञात करवा सकती हैं कि परमेश्वर किस चीज़ से नफ़रत करता है और वह किस चीज़ से प्यार करता है, और मानवजाति को किस चीज को बनाए रखना चाहिए। वे सभी जिन लोगों के पास विवेक है और समझ रखते हैं उन्हें परमेश्वर द्वारा जारी की गई दस आज्ञाओं की प्रशंसा करनी चाहिए और उनका गुणगान करना चाहिए, जिन्होंने लोगों को उनके मार्गदर्शन के तहत सामान्य मानवजाति की समानता में जीवित जीने की अनुमति दी है। जब तक लोग दस आज्ञाओं के अनुसार जीवन जीते हैं, तब तक वे परमेश्वर के आशीषों को पाने में पूरी तरह से समर्थ हैं। यह सत्य है। यदि दुनिया का हर देश अपनी संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करेगा और इन दस आज्ञाओं के अनुसार अपने देश का शासन करेगा, तो वे निश्चित रूप से परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त करेंगे और उनका देश और अधिक व्यवस्थित हो जाएगा। और यदि वे अपनी पाठ्यपुस्तकों में इन दस आज्ञाओं को शामिल कर सकें ताकि हर कोई उन्हें बचपन से ही स्वीकार करे, तो वे सभी परमेश्वर की आराधना करने में समर्थ होंगे। यह और भी अधिक सार्थक होगा। यदि सभी देशों के लोग दस आज्ञाओं के सिद्धांतों के अनुसार पृथ्वी पर रह रहे होते, तो मानवजाति इतनी भ्रष्ट बिल्कुल नहीं होती जितनी यह आज है। किन्तु शैतान के द्वारा मानवजाति की भ्रष्टता बहुत गहरी है, और यह केवल शैतान द्वारा मानवजाति को पूरी तरह से नियंत्रित किया जाना है जो पूरी दुनिया को भयावह अंधेरे के अधीन ले गया है। यही कारण है कि गहराई तक भ्रष्ट की गई मानवजाति के लिए व्यवस्था के युग में इन दस आज्ञाओं को स्वीकार करना और बनाए रखना बहुत कठिन था। एकमात्र परिणाम जो उन्होंने प्राप्त किया वह था लोगों द्वारा अपने पापों को पहचानना, किन्तु परमेश्वर का कार्य, धीरे-धीरे स्वयं पर निर्मित होते हुए, प्रत्येक चरण एक दूसरे का पूरक बनते हुए, उत्तरोत्तर जारी रहा। परमेश्वर द्वारा जारी की गई व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ अवश्य पूरी की जानी चाहिए।

2. विश्रामदिन का पालन करने के पीछे सिद्धांत भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर ने अपनी अपेक्षाओं को कई बार दोहराया कि मनुष्य विश्रामदिन का पालन करे, और यहोवा ने कहा: "तू इस्राएलियों से यह भी कहना, निश्‍चय तुम मेरे विश्रामदिनों को मानना, क्योंकि तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में मेरे और तुम लोगों के बीच यह एक चिह्न ठहरा है, जिससे तुम यह बात जान रखो कि यहोवा हमारा पवित्र करनेहारा है। इस कारण तुम विश्रामदिन को मानना, क्योंकि वह तुम्हारे लिये पवित्र ठहरा है; जो उसको अपवित्र करे वह निश्‍चय मार डाला जाए : जो कोई उस दिन में कुछ काम-काज करे वह प्राणी अपने लोगों के बीच से नष्‍ट किया जाए। छ: दिन तो काम-काज किया जाए, पर सातवाँ दिन परमविश्राम का दिन और यहोवा के लिये पवित्र है; इसलिये जो कोई विश्राम के दिन में कुछ काम-काज करे वह निश्‍चय मार डाला जाए। इसलिये इस्राएली विश्रामदिन को माना करें, वरन् पीढ़ी पीढ़ी में उसको सदा की वाचा का विषय जानकर माना करें। वह मेरे और इस्राएलियों के बीच सदा एक चिह्न रहेगा, क्योंकि छ: दिन में यहोवा ने आकाश और पृथ्वी को बनाया, और सातवें दिन विश्राम करके अपना जी ठण्डा किया" (निर्गमन 31: 13-17)। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को यह स्पष्ट अवश्य होना चाहिए कि विश्रामदिन का पालन करने की मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा का बहुत गहरा महत्व है। जब परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों को बनाया, तो उसने ऐसा छह दिनों में किया। उसने सातवें दिन विश्राम किया। यही कारण है कि परमेश्वर भी लोगों से छह दिन कार्य करने और सातवें दिन आराम करने की अपेक्षा करता है। इसमें न केवल परमेश्वर का प्रेम समाविष्ट है, बल्कि इसमें गहन महत्व का भी समावेश है। बिना किसी संशय के, परमेश्वर का मानवजाति से विश्रामदिन का पालन करने की अपेक्षा करना मानवजाति के जीवन के लिए परमेश्वर का मार्गदर्शन का प्रमाण है। यह पूरी तरह से उसकी देखभाल, विचारण, और उस प्यार को प्रकट करता है जिसकी मानवजाति के लिए कोई सीमा नहीं है। वह नहीं चाहता कि लोग हमेशा परेशान रहें, सूर्योदय से काम करते हुए केवल सूर्यास्त पर आराम करें, केवल पर्याप्त भोजन, कपड़े और आश्रय के उद्देश्य और अभिप्राय से जीवन निर्वाह करें, और अपने परिवारों का पालन पोषण करें। परमेश्वर का विश्राम का दिन मानवजाति को एक दिन का विश्राम देने के लिए भी था, इसी वजह से उसने यह आदेश दिया कि लोग विश्राम के दिन का पालन करें। यह वास्तव में महत्वपूर्ण है।

3. जहाँ तक पापबलियों, होमबलियों और मेल बलियों के सिद्धांत का संबंध है, इस बात की परवाह किए बिना कि इस्राएलियों में से किसने परमेश्वर यहोवा के द्वारा निषिद्ध पाप किया है, और इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें पता था कि उन्होंने पाप किया है या नहीं, उनके पाप को क्षमा किए जाने के लिए उन्हें परमेश्वर को एक पापबलि, होमबलि, या मेल बलि चढ़ाने के लिए याजक के पास जाना पड़ता था। इसने लोगों को यह देखने दिया कि परमेश्वर का स्वभाव न सिर्फ धार्मिकता और प्रताप से, बल्कि दया और प्रेम से भी युक्त है। क्योंकि लोगों को शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है, इसलिए पाप करना उनके लिए स्वाभाविक है, किन्तु परमेश्वर ने मानवजाति के लिए पापबलियाँ, होमबलियाँ और मेल बलियाँ स्थापित की हैं, और इस बात पर ध्यान दिए बिना कि लोग किस प्रकार का पाप करते हैं, जब तक वे परमेश्वर को पापबलि, होमबलि, या मेल बलि चढ़ाते हैं, उन्हें उसके द्वारा पूरी तरह से उसके क्षमा किया जा सकता है। यह लोगों को यह ज्ञात करवाने के लिए पर्याप्त है कि भ्रष्ट मानवजाति के प्रति परमेश्वर के स्वभाव में उसकी करुणा और दयालुता शामिल है। परमेश्वर लोगों की हल्के से निंदा नहीं करता है, और वह विशेष रूप से लोगों को हल्के ढंग से दंडित नहीं करता है। इस से, मानवजाति के लिए परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण, और उसका अनुग्रह और आशीष और भी अधिक स्पष्ट होते हैं। यह पूरी तरह से दर्शाता है कि भ्रष्ट मानवजाति के पापों के लिए परमेश्वर का बलियाँ स्थापित करने के पीछे का सिद्धांत लोगों के जीवन का मार्गदर्शन करने का उसका कार्य था।

परमेश्वर द्वारा व्यवस्था के युग में पूरा किया गया समस्त कार्य मानव जीवन के लिए उचित मार्ग में मानवजाति की अगुआई करना, सभी लोगों को उसके सामने रहने देना, उसकी आराधना करने, और उसके आशीष प्राप्त करने में समर्थ बनाना था। यह उसकी इच्छा है। व्यवस्था के युग में, परमेश्वर ने पृथ्वी पर इस्राएलियों के जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्थाओं और आज्ञाओं का उपयोग किया। आवश्यक रूप से, यह अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा छुटकारे के कार्य के लिए मार्ग प्रशस्त कर रहा था। सबसे पहले, इस्राएलियों का परमेश्वर के सामने आना और उसे स्वीकार करना, अर्थात, सृष्टि के परमेश्वर को स्वीकार करना, और यह जानना कि लोगों को उसके सामने कैसे जीना चाहिए, आवश्यक था। बिना शंका के, यह पृथ्वी पर लोगों के जीवन का मार्गदर्शन करने की परमेश्वर की सच्ची गवाही थी। न केवल इसने मानवजाति के लिए उसके प्यार को प्रकट किया, बल्कि इससे भी ज्यादा, इसने लोगों को यह समझने दिया कि परमेश्वर ने न केवल स्वर्ग, पृथ्वी, सब कुछ, और मानवजाति का सृजन किया है, बल्कि वह यह जानने में भी लोगों का मार्गदर्शन करता है कि कैसे जीना है, और कैसे परमेश्वर के सामने जीना है और उसके आशीषों को प्राप्त करना है। इस तरह, लोग जान जाते हैं कि परमेश्वर के सामने कैसे जीएँ, कैसे उसकी आराधना करें, कैसे उसके आशीषों को प्राप्त करें, और शांति, दीर्घायु, और खुशी प्राप्त करने के लिए कैसे जीएँ। यह भ्रष्ट मानवजाति के लिए वास्तव में बहुत ही सार्थक है। यदि समस्त मानवजाति परमेश्वर द्वारा जारी की गई व्यवस्थाओं और आज्ञाओं के अनुसार जी सकती, तो वे शैतान द्वारा इतना भ्रष्ट नहीं किए गए होते कि उनके पास कोई मानवीय समानता नहीं होती, और दुनिया इतनी अँधेरी और बुरी नहीं होती जैसी यह आज है। यदि लोग परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन जीवित रह सकते तो यह बहुत खुशी की बात होती! ठीक जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहा: "इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके, उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार स्थापित किया। इस आधार से, उसने अपने कार्य का विस्तार इस्राइल से बाहर किया, जिसका अर्थ है, कि इस्राएल से शुरू करके, उसने अपने कार्य का बाहर की ओर विस्तार किया, जिसकी वजह से बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और यह कि यहोवा ने ही स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का निर्माण किया था, सभी प्राणियों को बनाया था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्यको फैलाया।" ("परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से)। यह दर्शाता है कि परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से प्रत्येक को करने में, परमेश्वर धीरे-धीरे अपने कार्य क्षेत्र का विस्तार करता है, और अंत में पूरी तरह से परमेश्वर के सिंहासन की ओर मोड़ने हेतु शैतान के प्रभाव को पूरी तरह से ख़तम करने के लिए समस्त मानवजाति को बचाता है। यह मानवजाति को बचाने के लिए प्रबंधन योजना है।

यदि मैं कुछ शब्दों में व्यवस्था के युग में परमेश्वर के कार्य के प्रधान महत्व का सार प्रस्तुत करता, तो यह लोगों को इस बारे में मार्गदर्शन करने का कार्य होता कि परमेश्वर द्वारा सर्वप्रथम मानवजाति का सृजन किए जाने के बाद पृथ्वी पर कैसे रहा जाए। व्यवस्था के युग में उसके कार्य ने मुख्यतः "मार्गदर्शन" के आवश्यक महत्व पर जोर दिया।

"धर्मोपदेशों का संग्रह—जीवन के लिए आपूर्" से "केवल परमेश्वर के कार्य के तीन चरण ही मानवजाति को बचाने के लिए उसका पूरा कार्य हैं" से

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