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परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

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जब प्रभु प्रकट होंगे तो क्या यह निश्चित है कि वे धार्मिक जगत के सामने प्रकट होंगे? क्या कलीसिया में बने रहने का मतलब प्रभु का स्वागत कर पाना है?

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बाइबल के प्रासंगिक पद:

"क्या यह नहीं लिखा है कि मेरा घर सब जातियों के लिये प्रार्थना का घर कहलाएगा? पर तुम ने इसे डाकुओं की खोह बना दी है" (मरकुस 11:17)।

"ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं। ...उन को जाने दो; वे अंधे मार्गदर्शक हैं और अंधा यदि अंधे को मार्ग दिखाए, तो दोनों ही गड़हे में गिर पड़ेंगे" (मत्ती 15:8-9,14)।

"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो। हे अंधे अगुवो, तुम पर हाय!" (मत्ती 23:15-16)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

कई हज़ारों सालों से, मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता के आगमन को देखने में सक्षम होने की लालसा की है। मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता यीशु को देखने की इच्छा की है जब वह एक सफेद बादल पर सवार व्यक्तिगत रूप से उन लोगों के बीच में अवरोहण करता है जिन्होंने हज़ारों सालों से उसकी अभिलाषा की है और उसके लिए लालायित रहे हैं। मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता की वापसी और लोगों के साथ उसके फिर से जुड़ने की लालसा की है, अर्थात्, उद्धारकर्त्ता यीशु के उन लोगों के पास वापस आने की लालसा की है जिनसे वह हज़ारों सालों से अलग रहा है। ...मनुष्य इसे नहीं जानता हैः यद्यपि पवित्र उद्धारकर्त्ता यीशु मनुष्य के प्रति स्नेह और प्रेम से भरपूर है, फिर भी वह अशुद्ध और अपवित्र आत्माओं के द्वारा वास किए गए ""मन्दिरों"" में कैसे कार्य कर सकता है? यद्यपि मनुष्य उसके आगमन का इन्तज़ार करता आ रहा है, फिर भी वह उनके सामने कैसे प्रकट हो सकता है जो अधर्मी का मांस खाते हैं, अधर्मी का रक्त पीते हैं, एवं अधर्मी के वस्त्र पहनते हैं, जो उस पर विश्वास तो करते हैं परन्तु उसे जानते नहीं हैं, और लगातार उससे जबरदस्ती माँगते रहते हैं?

"उद्धारकर्त्ता पहले ही एक 'सफेद बादल' पर सवार होकर वापस आ चुका है" से

यहाँ अब किए जा रहे कार्य को उन्हें ज्ञात होने से सुरक्षित रखने के लिए कड़ाई से पृथक किया जाता है। उन्हें पता लग जाने पर, बस दण्ड और उत्पीड़न ही मिलता है। वे विश्वास नहीं करेंगे। उस बड़े लाल अजगर के देश में, जो सबसे अधिक पिछड़ा हुआ इलाका है, कार्य करना कोई आसान काम नहीं है। यदि इस कार्य की जानकारी हो गई होती, तब इसे जारी रखना असम्भव होता। कार्य का यह चरण मात्र इस स्थान में आगे नहीं बढ़ सकता है। यदि ऐसे कार्य को खुले तौर पर किया जाता, तो वे इसे कैसे सहन कर सकते थे? क्या यह और अधिक जोखिम नहीं लाता? यदि इस कार्य को गुप्त नहीं रखा जाता, और इसके बजाए यीशु के समय के समान ही निरन्तर जारी रखा जाता जब उसने असाधारण ढंग से बीमारों को चंगा किया और दुष्टात्माओं को निकाला था, तो क्या इसे बहुत पहले ही दुष्टात्माओं के द्वारा "कब्ज़े" में नहीं कर लिया गया होता? क्या वे परमेश्वर के अस्तित्व को बर्दाश्त कर सकते थे? यदि मुझे मनुष्य को उपदेश एवं व्याख्यान देने के लिए अभी बड़े कक्षों में प्रवेश करना होता, तो क्या मुझे बहुत पहले ही टुकड़े-टुकड़े नहीं कर दिया गया होता? यदि ऐसा होता, तो मेरा कार्य किया जाना कैसे जारी रखा जा सकता था? चिन्हों और अद्भुत कामों को खुले तौर पर प्रदर्शित नहीं किया जाता है इसका कारण प्रच्छन्नता के वास्ते। अतः मेरे कार्य को अविश्वासियों के द्वारा देखा, जाना या खोजा नहीं जा सकता है। यदि कार्य के इस चरण को अनुग्रह के युग में यीशु के तरीके के समान किया जाना होता, तो यह इतना सुस्थिर नहीं हो सकता था। अतः, कार्य को इसी रीति से प्रच्छन्न रखा जाना तुम लोगों के और समस्त कार्य के हित के लिए है। जब पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य समाप्त होता है, अर्थात्, जब इस गुप्त कार्य का समापन हो जाता है, तब कार्य का यह चरण झटके से पूरी तरह से खुल जाएगा। सब जान जाएँगे कि चीन में विजेताओं का एक समूह है; सब जान जाएँगे कि परमेश्वर ने चीन में देहधारण किया है और यह कि उसका कार्य समाप्ति पर आ गया है। केवल तभी मनुष्य पर प्रकटन होगा: ऐसा क्यों है कि चीन ने अभी तक क्षय या पतन का प्रदर्शन नहीं किया है? इससे पता चलता है कि परमेश्वर चीन में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है और उसने लोगों के एक समूह को विजाताओं के रूप में पूर्ण बना दिया है।

"देहधारण का रहस्य (2)" से

मनुष्य विश्वास करता है कि इस्राएली ग़लत थे क्योंकि उन्होंने "केवल यहोवा में विश्वास किया और यीशु में विश्वास नहीं किया," फिर भी अधिकांश लोग एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जिसके अंतर्गत वे "केवल यहोवा में विश्वास करते हैं तथा यीशु को ठुकराते हैं" और "मसीहा के वापस लौटने की लालसा करते हैं, किन्तु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।" तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताते हैं, और उन्होंने अभी भी परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त नहीं किया है। क्या यह मनुष्य के विद्रोहीपन का परिणाम नहीं है? सम्पूर्ण संसार के मसीही जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है वे सभी उस विश्वास को थामे रहते हैं कि वे भाग्यशाली लोग हैं, और यह कि परमेश्वर उनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा करेगा। फिर भी वे निश्चय से यह नहीं कह सकते हैं कि परमेश्वर क्यों उन्हें तीसरे स्वर्ग पर ले जाएगा, न ही वे इसके विषय में निश्चित हैं कि किस प्रकार यीशु उन्हें इकट्टा करने के लिए श्वेत बादल पर सवार होकर आएगा, और वे पूर्ण निश्चयता के साथ यह तो बिलकुल भी नहीं कह सकते हैं कि यीशु सचमुच में उस दिन सफेद बदल पर सवार होकर आएगा या नहीं जिसकी वे कल्पना करते हैं। वे सब चिन्तित हैं, और वे घाटे में है; वे स्वयं भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े से मुट्टीभर लोग हैं, जो प्रत्येक समुदायों से उसकी जय जयकार करते हैं। वह कार्य जिसे परमेश्वर ने अब किया है, वर्तमान युग, और परमेश्वर की इच्छा - उनके पास इनमें से किसी भी चीज़ की कोई समझ नहीं है, और वे अपनी ऊंगलियों में दिनों को गिनने के आलावा और कुछ नहीं कर सकते हैं। ऐसे लोग जो अंत तक मेम्ने के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं केवल वे ही अन्तिम आशीष को प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे "चतुर लोग", जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं फिर भी विश्वास करते हैं कि उन्हें सब कुछ प्राप्त हो चुका है, वे परमेश्वर के प्रगटीकरण की गवाही देने में असमर्थ हैं। वे सब विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे अकारण ही परमेश्वर के कार्य के लगातार विकास को छोटा करते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे पूर्ण निश्चयता के साथ विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग ले जाएगा, वे जिनके "पास परमेश्वर के प्रति अत्याधिक वफादारी है, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचन में बने रहते हैं।" यद्यपि उनके पास परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के प्रति "अत्याधिक वफादारी" है, फिर भी उनके वचन एवं कार्य अत्यंत घिनौने लगते हैं क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं, और छल एवं दुष्टता करते हैं। ऐसे लोग जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं करते हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिलाते हैं, और जो केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं और वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल नहीं हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे ऐसे लोग बन गए हैं जिन्हें नए युग के द्वारा ठुकरा दिया गया है, और जिन्हें दण्ड दिया जाएगा। क्या उनसे भी अधिक बेचारा और कोई है? अनेक लोग यह भी विश्वास करते हैं कि वे सब जो प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे विवेकहीन हैं। ये लोग, जो केवल विवेक की ही बात करते हैं, और पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं, अन्ततः उनके स्वयं के विवेक द्वारा उनके भविष्य की संभावनाओं को छोटा कर दिया जाएगा। परमेश्वर का कार्य सिद्धान्त के द्वारा बना नहीं रहता है, और यद्यपि यह उसका स्वयं का कार्य है, फिर भी परमेश्वर इससे अभी भी चिपका नहीं रहता है। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा गया है, जिसे हटाया जाना चाहिए उसे हटाया गया है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के सिर्फ एक छोटे से भाग को ही पकड़े रहने के द्वारा स्वयं को परमेश्वर से शत्रुता की स्थिति में रख देता है। क्या यह मनुष्य की मूर्खता नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? लोग जितना अधिक भयभीत एवं अति सतर्क होते हैं क्योंकि वे परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त न करने के विषय में डरते हैं, उतना ही अधिक वे और बड़ी आशीषों को हासिल करने, और अंतिम आशीष को पाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जो दासत्व से व्यवस्था में बने रहते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अत्यंत वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, और वे जितना अधिक व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। क्योंकि अब राज्य का युग है और व्यवस्था का युग नहीं है, और आज के कार्य को अतीत के कार्य के विरूद्ध रोका नहीं जा सकता है, और अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से नहीं की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, और मनुष्य का रीति व्यवहार भी बदल चुका है, उसे व्यवस्था को पकड़े रहना या क्रूस को उठाना नहीं है। अतः, व्यवस्था एवं क्रूस के प्रति लोगों की वफादारी परमेश्वर की स्वीकृति को प्राप्त नहीं करेगी।

"परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

पवित्र आत्मा का कार्य दिन ब दिन बदलता जाता है, हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है; आने वाले कल का प्रकाशन आज से भी कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है, कदम दर कदम और ऊपर चढ़ता जाता है। जिस कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है वह ऐसा ही है। यदि मनुष्य उस गति से चल न पाए, तो उसे किसी भी समय पीछे छोड़ा जा सकता है। यदि मनुष्य के पास आज्ञाकारी हृदय न हो, तो वह अंत तक अनुसरण नहीं कर सकता है। पूर्व का युग गुज़र गया है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना होगा। विशेषकर अंतिम युग में जिसमें मनुष्य को सिद्ध किया जाएगा, परमेश्वर पहले से ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा। इसलिए, अपने हृदय में आज्ञाकारिता को धारण किए बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता है, न ही वह अपने कार्य के किसी स्तर को अपरिवर्तनीय मानता है। बल्कि, वह जिस कार्य को करता है वह हमेशा नया और हमेशा ऊँचा होता है। उसका कार्य हर एक कदम के साथ और भी अधिक व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के और भी अधिक अनुरूप होता जाता है। जब मनुष्य इस प्रकार के कार्य का अनुभव करता है केवल तभी वह अपने स्वभाव के अंतिम रूपान्तरण को हासिल कर पाता है। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान और सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है, इसलिए इसी तरह से परमेश्वर का कार्य भी सर्वाधिक उच्च स्तरों तक पहुँच जाता है। केवल इसी तरह से मनुष्य को सिद्ध बनाया जा सकता है और परमेश्वर के उपयोग के योग्य हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की अवधारणाओं का सामना करने और उन्हें उलटने के लिए, और दूसरी ओर, उच्चतर तथा और अधिक वास्तविक स्थिति में, परमेश्वर पर विश्वास करने के उच्चतम आयाम में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए, इस तरह से कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। वे सभी जो अवज्ञाकारी प्रकृति के हैं जो जानबूझ कर विरोध करते हैं उन्हें परमेश्वर के इस द्रुतगामी और प्रचंडता से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा पीछे छोड़ दिया जाएगा; केवल जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और जो अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं वे ही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी अवधारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को उस हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए जो तुम उठाते हो। यदि तुम लोग लापरवाह हो, तो तुम लोग निश्चित रूप से उनमें से एक बन जाओगे जिसे पवित्र आत्मा द्वारा ठुकराया जाता है, और एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के कार्य में उसे बाधित करता है।

"जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे" से

ईश्वर का काम तेजी से विकसित हो रहा है, धर्मविदों के विभिन्न गुटों और "मशहूर हस्तियों" को, जो कलीसिया का कार्य करते हैं, उन्हें दूर कर रहा है और यहां तक ​​की तुम लोगों के बीच "विशेषज्ञों" को बिखेर रहा है जो विशेष रूप से नियमों का पालन करना पसंद करते हैं। परमेश्वर का काम इंतजार नहीं करता है, यह किसी पर निर्भर नहीं करता है और यह घिसटते हुए नहीं चलता। यह किसी को खींचता या ज़बरदस्ती अपने साथ नहीं ले जाता है; यदि तुम साथ नहीं चल सकते तो तुम को त्याग दिया जाएगा, इससे फर्क नहीं पड़ता की तुमने कितने साल अनुसरण किया है।

"एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में" से

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