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मूर्ख कुँवारियाँ असल में क्या हैं?

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संदर्भ के लिए बाइबिल के पद:

"तब स्वर्ग का राज्य उन दस कुँवारियों के समान होगा जो अपनी मशालें लेकर दूल्हे से भेंट करने को निकलीं। उनमें पाँच मूर्ख और पाँच समझदार थीं। मूर्खों ने अपनी मशालें तो लीं, परन्तु अपने साथ तेल नहीं लिया; ... जब दूल्हे के आने में देर हुई, तो वे सब ऊँघने लगीं और सो गईं। आधी रात को धूम मची: 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो।' तब वे सब कुँवारियाँ उठकर अपनी मशालें ठीक करने लगीं। और मूर्खों ने समझदारों से कहा, 'अपने तेल में से कुछ हमें भी दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझी जा रही हैं।' परन्तु समझदारों ने उत्तर दिया, 'कदाचित् यह हमारे और तुम्हारे लिये पूरा न हो; भला तो यह है कि तुम बेचनेवालों के पास जाकर अपने लिये मोल ले लो।' जब वे मोल लेने को जा रही थीं तो दूल्हा आ पहुँचा, और जो तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह के घर में चली गईं और द्वार बन्द किया गया। इसके बाद वे दूसरी कुँवारियाँ भी आकर कहने लगीं, 'हे स्वामी, हे स्वामी, हमारे लिये द्वार खोल दे!' उसने उत्तर दिया, 'मैं तुम से सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता'" (मत्ती 25:1-3, 5-12)।

"उनके विषय में यशायाह की यह भविष्यद्वाणी पूरी होती है: 'तुम कानों से तो सुनोगे, पर समझोगे नहीं; और आँखों से तो देखोगे, पर तुम्हें न सूझेगा। क्योंकि इन लोगों का मन मोटा हो गया है, और वे कानों से ऊँचा सुनते हैं और उन्होंने अपनी आँखें मूंद ली हैं; कहीं ऐसा न हो कि वे आँखों से देखें, और कानों से सुनें और मन से समझें, और फिर जाएँ, और मैं उन्हें चंगा करूँ'" (मत्ती 13:14-15)।

परमेश्वर के अति-उत्कृष्ट वचन:

"वह जिसके कान हो, सुन ले कि आत्मा ने कलीसियाओं से क्या कहा।" क्या तुमने अब पवित्र आत्मा के वचन सुन लिए हैं? परमेश्वर के वचन तुम्हें अचानक मिले हैं। क्या तुम उन्हें सुनते हो? अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का कार्य करता है, और ऐसे वचन पवित्र आत्मा के वचन हैं, क्योंकि परमेश्वर पवित्र आत्मा है और देहधारी भी हो सकता है; इसलिए, पवित्र आत्मा के वचन, जैसे अतीत में बोले गए थे, आज देहधारी परमेश्वर के वचन हैं। कई विवेकहीन मनुष्य हैं जिनका मानना है कि पवित्र आत्मा के वचन मनुष्य के कान में सीधे स्वर्ग से उतर कर आने चाहिए। इस प्रकार सोचने वाला कोई भी परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है। ... जो परमेश्वर के देहधारी होने को इनकार करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो आत्मा को या उन सिद्धान्तों को नहीं जानते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। जो मानते हैं कि अब पवित्र आत्मा का युग है फिर भी उसके नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे अस्पष्ट विश्वास में जीने वाले लोग हैं। मनुष्यों का इस प्रकार का व्यवहार कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं करेगा। जो लोग चाहते हैं कि पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से उनसे बात करे और अपना कार्य करे, फिर भी वे देहधारी परमेश्वर के वचनों या कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कभी भी नए युग में प्रवेश या परमेश्वर से पूरी तरह से उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएँगे।

"वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?"से

जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है, और चाहे वे कितना भी काम करें, या उनकी पीड़ा कितनी भी बड़ी हो, या वे कितनी ही भाग-दौड़ करें, परमेश्वर के लिए इनमें से किसी बात का कोई महत्व नहीं है, और वह उनकी सराहना नहीं करेगा। आज, जो लोग परमेश्वर के वास्तविक वचनों का पालन करते हैं, वे पवित्र आत्मा की धारा में हैं; जो लोग परमेश्वर के वास्तविक वचनों से अनभिज्ञ हैं, वे पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं, और परमेश्वर की सराहना ऐसे लोगों के लिए नहीं है। वह सेवा जो पवित्र आत्मा की वास्तविक उक्तियों से विभाजित हो, वह देह की और धारणाओं की सेवा है, और यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होने में असमर्थ है। यदि लोग धार्मिक अवधारणाओं में रहते हैं, तो वे ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के लिए उपयुक्त हो, और भले ही वे परमेश्वर की सेवा करें, वे अपनी ""कल्पना और अवधारणाओं के घेरे में सेवा करते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं वे परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो उसके दिल के मुताबिक हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता है जो कि धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वे अवधारणाओं के बीच रहते हैं, और ऐसे लोगों की सेवा दखल देती है और परेशान करती है। ऐसी सेवा परमेश्वर के विरूद्ध चलती है, और इस प्रकार जो लोग परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिन्हों पर चलने में असमर्थ हैं, वे निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं, और वे परमेश्वर के साथ सुसंगत होने में असमर्थ हैं। … जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य से हटा दिए गए हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ऐसा लोग खुले आम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं कि परमेश्वर ने नया कार्य किया है, और परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर का खुले आम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिससे वे स्वयं के लिए परमेश्वर की घृणा और अस्वीकृति उत्पन्न करते हैं। परमेश्वर के नवीनतम कार्य का ज्ञान रखना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन अगर लोग स्वेच्छापूर्वक परमेश्वर के कार्य का अनुसरण कर पाते हैं और परमेश्वर के कार्य की तलाश कर सकते हैं, तो उन्हें परमेश्वर को देखने का मौका मिलेगा, और उन्हें पवित्र आत्मा का नवीनतम मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिलेगा। जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं, वे पवित्र आत्मा के प्रबोधन या परमेश्वर के मार्गदर्शन को प्राप्त नहीं कर सकते हैं; इस प्रकार, लोगों को परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त होता है या नहीं, यह परमेश्वर की कृपा पर निर्भर करता है, यह उनके अनुसरण पर निर्भर करता है, और यह उनके इरादों पर निर्भर करता है।

"परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो" से

किसी भी रूप में या देश की बाधाओं से मुक्त हो कर परमेश्वर के प्रकट होने का उद्देश्य उसे उसकी योजना का कार्य पूरा करने में सक्षम होने के लिए है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर यहूदिया में देहधारी हुआ, उसका लक्ष्य सूली पर चढ़ाये जाने के कार्य को पूरा करने के द्वारा सारी मानव जाति को पाप से मुक्त करना था। फिर भी यहूदियों का मानना था कि परमेश्वर के लिए ऐसा करना असंभव था, और उन्होंने सोचा कि परमेश्वर के लिए देहधारी होना और प्रभु यीशु के रूप में होना असंभव है। उनका “असंभव” एक ऐसा आधार बन गया जिसके द्वारा उन्होंने परमेश्वर को अपराधी ठहराया और विरोध किया, और अंत में इस्राएल को विनाश की ओर ले गए। आज, कई लोगों ने उसी प्रकार की गलती की है। वे परमेश्वर के किसी भी क्षण आ जाने का प्रचार बहुत हल्के रूप में करते हैं, साथ ही वे उसके प्रकट होने को गलत भी ठहराते हैं; उनका ""असंभव"" एक बार फिर परमेश्वर के प्रकट होने को उनकी कल्पना की सीमाओं के भीतर सीमित करता है। और इसलिये मैंने कई लोगों को परमेश्वर के शब्दों को सुनने के बाद उन पर हँसने की गलती करते हुए देखा है। क्या यह हँसी यहूदियों द्वारा अपराधी ठहराने और निन्दा करने से अलग है? तुम लोग सच का सामना करने में गम्भीर नहीं हो, उससे भी कम सच के लिए इच्छा और भी कम रखते हो। तुम लोग केवल आँख बंद करके अध्ययन करते हो और उदासीनता पूर्वक प्रतीक्षा करते हो। तुम लोग इस तरह पढ़कर और प्रतीक्षा करके क्या प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम लोग परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन पा सकते हो? यदि तू परमेश्वर के कथनों को ही नहीं पहचान सकता है, तो तू परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य कैसे हो सकता है? जहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य की अभिव्यक्ति है, और वहाँ परमेश्वर की वाणी है। केवल वे ही लोग, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य हैं।

"परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है" से

सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं फिर भी परमेश्वर के कार्य में हुए किसी भी बदलाव को सहने में असमर्थ है। जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और कि परमेश्वर का कार्य हमेशा एक ठहराव पर रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है वह है व्यवस्था को बनाए रखना, और जब तक वे पश्चाताप करते और अपने पापों को स्वीकार करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर का हृदय हमेशा संतुष्ट रहेगा। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर बाइबल से बढ़कर नही होना चाहिए और नही हो सकता है। ये ठीक इस प्रकार के विचार हैं जिन्होंने उन्हें पुरानी व्यवस्था में दृढ़ता से बाँध दिया है और कठोर नियमों में जकड़ कर रख दिया है। इससे भी अधिक लोग यह विश्वास करतें है कि जो कुछ भी परमेश्वर का नया कार्य है, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया ही जाना चाहिए और यह कि इस तरह के कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी उसका अनुसरण सच्चे हृदय से करते हैं उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए, अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता है। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के विवेकहीन हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं मिथ्याभिमान के विद्रोही स्वभाव को लें, तो परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य का सावधानीपूर्वक अध्ययन करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि, मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का दृष्टिकोण अपनाता है। क्या यह मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोध करता है और उसका विरोधी है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

"वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है?" से

आज, रचयिता व्यक्तिगत तौर पर एक बार फिर से सभी लोगों की अगुवाई करता है, और सभी लोगों को उसकी बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता, उद्धार और चमत्कारिकता को देखने देता है। फिर भी तुम नहीं समझते और महसूस करते हो—और इसलिए क्या तुम वह नहीं हो जिसे उद्धार प्राप्त नहीं होगा? जो शैतान से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं और जो परमेश्वर से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर की आवाज़ को सुन सकते हैं। वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को महसूस करते और समझते हैं ऐसे लोग हैं जो बचाए जाएँगे, और परमेश्वर की गवाही देंगे; वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को नहीं समझते हैं परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते हैं, और ऐसे लोग हैं जो निकाल दिए जाएँगे।

"परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

सम्पूर्ण संसार के मसीही जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है वे सभी उस विश्वास को थामे रहते हैं कि वे भाग्यशाली लोग हैं, और यह कि परमेश्वर उनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा करेगा। फिर भी वे निश्चय से यह नहीं कह सकते हैं कि परमेश्वर क्यों उन्हें तीसरे स्वर्ग पर ले जाएगा, न ही वे इसके विषय में निश्चित हैं कि किस प्रकार यीशु उन्हें इकट्टा करने के लिए श्वेत बादल पर सवार होकर आएगा, और वे पूर्ण निश्चयता के साथ यह तो बिलकुल भी नहीं कह सकते हैं कि यीशु सचमुच में उस दिन सफेद बदल पर सवार होकर आएगा या नहीं जिसकी वे कल्पना करते हैं। वे सब चिन्तित हैं, और वे घाटे में है; वे स्वयं भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े से मुट्टीभर लोग हैं, जो प्रत्येक समुदायों से उसकी जय जयकार करते हैं। वह कार्य जिसे परमेश्वर ने अब किया है, वर्तमान युग, और परमेश्वर की इच्छा - उनके पास इनमें से किसी भी चीज़ की कोई समझ नहीं है, और वे अपनी ऊंगलियों में दिनों को गिनने के आलावा और कुछ नहीं कर सकते हैं। ऐसे लोग जो अंत तक मेम्ने के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं केवल वे ही अन्तिम आशीष को प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे चतुर लोग, जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं फिर भी विश्वास करते हैं कि उन्हें सब कुछ प्राप्त हो चुका है, वे परमेश्वर के प्रगटीकरण की गवाही देने में असमर्थ हैं। वे सब विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे अकारण ही परमेश्वर के कार्य के लगातार विकास को छोटा करते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे पूर्ण निश्चयता के साथ विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग ले जाएगा, वे जिनके “पास परमेश्वर के प्रति अत्याधिक वफादारी है, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचन में बने रहते हैं।” यद्यपि उनके पास परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के प्रति “अत्याधिक वफादारी” है, फिर भी उनके वचन एवं कार्य अत्यंत घिनौने लगते हैं क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं, और छल एवं दुष्टता करते हैं। ऐसे लोग जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं करते हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिलाते हैं, और जो केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं और वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल नहीं हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे ऐसे लोग बन गए हैं जिन्हें नए युग के द्वारा ठुकरा दिया गया है, और जिन्हें दण्ड दिया जाएगा। क्या उनसे भी अधिक बेचारा और कोई है?

"परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार" से

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