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सूचीपत्र

अपने कर्तव्य को करने का क्या अर्थ है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

अपना कर्तव्य पूरा करना ही सत्य है। परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य पूरा करना केवल कुछ दायित्वों को पूरा करना या कुछ ऐसा करना नहीं है जो तुझे करना चाहिए। यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच रहने वाले एक सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करना है! यह सृष्टि के प्रभु के समक्ष अपने दायित्वों और जिम्मेदारियों को पूरा करना है। ये जिम्मेदारियाँ ही तेरी सच्ची जिम्मेदारियाँ हैं। सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करने की अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित होने के साथ तुलना कर—कौन सा सत्य है? सृजित प्राणी के कर्तव्य को पूरा करना ही सत्य है; यह तेरा बाध्यकारी कर्तव्य है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य की वास्तविकता क्या है?" से उद्धृत

तेरा कर्तव्य तेरे द्वारा प्रबंधित नहीं है; यह तेरा अपना उद्यम या तेरा अपना कार्य नहीं है। यह परमेश्वर का कार्य है जिसके लिए तेरे सहयोग की आवश्यकता है, इस प्रकार तेरा कर्तव्य उत्पन्न होता है। परमेश्वर के प्रबंधन का कार्य आज के दिन तक किया गया है, और जिस हिस्से में लोगों को उसके कार्य में सहयोग करना है, वह मनुष्य का कर्तव्य है। चाहे तू किसी भी प्रकार का कर्तव्य क्यों न निभाये, यह तेरा अपना उद्यम या तेरा निजी व्यवसाय नहीं है। यह परमेश्वर के घर का कार्य है, यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के एक हिस्से का निर्माण करता है, और यही वह आदेश है जो परमेश्वर ने तुझे दिया है। तो फिर तुझे अपने कर्तव्य के साथ कैसे पेश आना चाहिए? ...

भले ही तू किसी भी कर्तव्य को निभाये, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि परमेश्वर तेरे कर्तव्य से क्या अपेक्षा करता है, और केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार नहीं जा सकता है या तू जो चाहे वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज है, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या अपनी प्राथमिकताओं का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही तू अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा सकता है" से उद्धृत

6. तुम्हें वही करना चाहिए जो मनुष्य द्वारा किया जाना चाहिए, और अपने दायित्वों का पालन करना चाहिए, अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना चाहिए, और अपने कर्तव्य को धारण करना चाहिए। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के कार्य में अपना योगदान देना चाहिए; यदि तुम नहीं देते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अयोग्य हो, और परमेश्वर के घर में रहने के अयोग्य हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए" से उद्धृत

मनुष्य का अपना कर्तव्य निभाना, वास्तव में, उस सबका निष्पादन है जो मनुष्य के भीतर अन्तर्निहित है, अर्थात् जो मनुष्य के लिए सम्भव है, उसका निष्पादन है। यह इसके बाद ही है कि उसका कर्तव्य पूरा होता है। मनुष्य की सेवा के दौरान मनुष्य के दोष उसके प्रगतिशील अनुभवों और न्याय के अनुभव की उसकी प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा हैं या प्रभाव नहीं डालते हैं। वे लोग जो सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मान लेते हैं और ऐसे दोषों के भय से पीछे हट जाते हैं जो सेवा में विद्यमान हो सकते हैं, सभी मनुष्यों में सबसे कायर होते हैं। यदि मनुष्य वह व्यक्त नहीं कर सकता है जो उसे सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह प्राप्त नहीं कर सकता है जो मनुष्य के लिए अंतर्निहित रूप से संभव है, और इसके बजाय वह समय गँवाता है और बिना रुचि के कार्य करता है, तो उसने अपने उस प्रकार्य को खो दिया है जो एक सृजन किए गए प्राणी में होना चाहिए। इस प्रकार का मनुष्य साधारण दर्जे का तुच्छ मनुष्य और स्थान घेरने वाला निरर्थक कचरा समझा जाता है; इस तरह के किसी व्यक्ति को कैसे सृजन किए गए प्राणी की उपाधि से सम्मानित किया जा सकता है? क्या वे भ्रष्टता के अस्तित्व नहीं हैं जो बाहर से तो चमकते हैं परन्तु भीतर से सड़े हुए हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से उद्धृत

मनुष्य के कर्तव्य और क्या वह धन्य या श्रापित है के बीच कोई सह सम्बंध-नहीं है। कर्तव्य वह है जो मनुष्य को पूरा करना चाहिए; यह उसका आवश्यक कर्तव्य है और प्रतिफल, परिस्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह कर्तव्य कर रहा है। ऐसा मनुष्य जिसे धन्य किया जाता है वह न्याय के बाद सिद्ध बनाए जाने पर भलाई का आनन्द लेता है। ऐसा मनुष्य जिसे श्रापित किया जाता है तब दण्ड प्राप्त करता है जब ताड़ना और न्याय के बाद उसका स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, अर्थात्, उसे सिद्ध नहीं बनाया गया है। एक सृजन किए गए प्राणी के रूप में, मनुष्य को, इस बात की परवाह किए बिना कि क्या उसे धन्य या श्रापित किया जाएगा, अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, वह करना चाहिए जो उसे करना चाहिए, और वह करना चाहिए जो वह करने के योग्य है। यही किसी ऐसे मनुष्य के लिए सबसे आधारभूत शर्त है, जो परमेश्वर की तलाश करता है। तुम्हें केवल धन्य होने के लिए अपने कर्तव्य को नहीं करना चाहिए, और श्रापित होने के भय से अपना कृत्य करने से इनकार नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को एक बात बता दूँ: करने में समर्थ है यदि मनुष्य अपना कार्य, तो इसका अर्थ है कि वह उसे करता है जो उसे करना चाहिए। यदि मनुष्य अपना कर्तव्य करने में असमर्थ है, तो यह मनुष्य की विद्रोहशीलता को दर्शाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

तो फिर, प्रत्येक व्यक्ति को किन कर्तव्यों को करना चाहिए? प्रत्येक व्यक्ति को जो कर्तव्य करना चाहिए, वही वह सत्य है जिसका उस व्यक्ति को अभ्यास करना चाहिए, और जिस सत्य का तुम्हें अभ्यास करना चाहिए वही वह कर्तव्य है जिसे तुम्हें करना चाहिए, वह दायित्व है जिसे तुम्हें पूरा करना चाहिए। यदि तुम उस सत्य का अभ्यास करते हो जिससे तुम अवगत हो और जिसका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए, तो तुमने अपने कर्तव्य को ठीक से पूरा कर लिया होगा। यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम अपने कर्तव्य को पूरा नहीं कर रहे हो। मूर्खों जैसा बर्ताव कर रहे हो, और तुम परमेश्वर के साथ बस लापरवाही कर रहे हो। इसलिए, तुम्हारा कर्तव्यों को करना अवश्य ही सत्य के साथ संयोजित होना चाहिए, यह सत्य के साथ निकटता से अवश्य जुड़ा होना चाहिए। तुम्हें उन सभी सत्यों को अभ्यास में लाना चाहिए जिन्हें तुम समझते हो और सत्य की वास्तविकता को जीना चाहिए। सत्य की वास्तविकता को जीना मनुष्य की सच्ची छवि का प्रतिनिधित्व है। जब परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, तो यह इस छवि पर आधारित था, इसलिए यदि तुम सत्य की छवि को जीते हो तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करोगे। जब परमेश्वर तुम पर दृष्टि डालेगा तो वह प्रसन्न होगा, वह तुम्हें आशीष देगा, वह तुम्हें शाश्वत जीवन देगा, वह तुम्हें हमेशा के लिए जीवित रहने देगा। लेकिन यदि तुम सत्य की छवि को नहीं जीते हो, तो तुम एक मनुष्य कहे जाने के योग्य नहीं हो, और जब परमेश्वर तुम पर दृष्टि डालेगा, तो वह सोचेगा कि तुम्हारे पास कोई आध्यात्मिक प्रभामण्डल नहीं है, और तुम्हारे पास परमेश्वर की दी हुई जीवन श्वास ज़रा भी नहीं है। वह आदेश देगा कि इस तरह के कचरे को हटा दिया जाए। इसलिए, कर्तव्यों को करना स्वयं में सत्य का अभ्यास करना है। यदि तुम अपने कर्तव्यों को करते समय सत्य का अभ्यास नहीं करते हो, तो तुम वास्तव में अपने कर्तव्यों को नहीं कर रहे हो। तुम मूर्खों जैसा बर्ताव कर रहे हो, तुम परमेश्वर को बेवकूफ़ बना रहे हो, और तुम परमेश्वर के साथ बस लापरवाही कर रहे हो। तुम केवल प्रक्रिया का पालन कर रहे हो। इसलिए, यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम्हें उस सत्य का अनुभव और अभ्यास करना चाहिए जो परमेश्वर ने मानवता को प्रदान किया है, और अंततः तुम्हें परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को जीना चाहिए। यह अपने कर्तव्यों को करना है। ...यदि कर्तव्यों को करते समय सत्य शामिल नहीं है, तो यह झूठ है, यह लापरवाही है, यह ग़लत और धोखा देने वाला है; तुम सिर्फ औपचारिकताओं को पूरा कर रहे हो, तुम केवल प्रक्रिया का पालन कर रहे हो। अपने कर्तव्यों को सच्चे ढंग से करने के लिए, तुम्हें उन्हें करते समय सत्य का अभ्यास अवश्य करना चाहिए, केवल यही तुम्हारे कर्तव्यों को मानक के अनुसार करने का एकमात्र तरीका है, यही वास्तव में एक मनुष्य होने का एकमात्र तरीका है। तुम जो कोई भी काम कर रहे हो, इसमें सत्य का अभ्यास शामिल होता है, और जब तुम सत्य का अभ्यास कर रहे होते हो, तो तुम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे होते हो। यह तुम्हारा दायित्व और कर्तव्य है, इसलिए तुम्हें इसे अच्छी तरह से अवश्य करना चाहिए। सत्य का अभ्यास करने से हमारा यही तात्पर्य है। तो तुम्हारे कर्तव्यों को करने और सत्य का अभ्यास करने के बीच वास्तविक संबंध क्या है? ये एक ही बात की व्याख्या करने के दो अलग-अलग तरीके हैं। बाहर से, ऐसा लगता है कि एक कर्तव्य किया जा रहा है, लेकिन सार रूप में सत्य का अभ्यास किया जा रहा है। इसलिए, यदि तुम अपने कर्तव्यों को करते समय सत्य को नहीं समझते हो, तो क्या तुम अपना कार्य ठीक से कर पाओगे? तुम नहीं कर पाओगे। सबसे पहले, तुम्हारे पास इस बात की स्पष्ट समझ नहीं होगी कि अपने कर्तव्यों को करने का अर्थ क्या है, या अपने कर्तव्यों को ठीक से कैसे करें। तुम्हें इन चीजों की स्पष्ट समझ नहीं होगी। दूसरा, एक दिन आएगा जब तुम्हारे पास इसकी स्पष्ट समझ तो होगी लेकिन तुम फिर भी अपने कर्तव्यों को ठीक से करने में विफल होगे, वे अभी भी ग़लतियों से भरे होंगे। इस समय, तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारी मानवता दोषपूर्ण है, कि तुम जिन चीज़ों को करते हो उसमें बहुत ग़लतियाँ करते हो, कि तुम भ्रष्टता से भरे हो। उस समय तुम इस भ्रष्टता से छुटकारा पाने के लिए सत्य की तलाश करना शुरू कर दोगे, और एक बार जब तुम इससे छुटकारा पा लेते हो, तो तुम अपने कर्तव्यों को प्रभावी रूप से पूरा करना शुरू कर दोगे। एक बार जब तुम अपनी भ्रष्टता से छुटकारा पा लेते हो और सत्य के प्रति जागरूक हो जाओगे, तो उस समय तुम अपने कर्तव्यों को सही तरीके और उचित ढंग से, सिर्फ नाम मात्र के लिए नहीं, बल्कि वास्तविकता में भी करोगे। जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तब यदि तुममें सत्य है, इसे करते समय यदि भ्रष्टता का एक भी अंश व्यक्त नहीं होता है, तो तुम्हारे कार्य-निष्पादन में यथोचित परिणाम प्राप्त होंगे। तुमने मानक के अनुसार सत्य का अभ्यास भी कर लिया होगा। यह बिल्कुल सत्य है। इसलिए, जब भी तुम अपने कर्तव्यों को कर रहे हो, तो तुम सत्य की तलाश कैसे करते हो, यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि तुम सत्य की तलाश नहीं करते हो, तो यह निश्चित है कि तुम्हारे कर्तव्यों का निष्पादन मानक के अनुसार नहीं होगा।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (V) में "कर्तव्यों का पालन करने में सत्य का अभ्यास करने से ही वह परमेश्वर का आशीष मिलता है" से उद्धृत

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