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आध्यात्मिक दुनिया क्या है?

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आध्यात्मिक दुनिया क्या है? मैं तुम्हें एक छोटा सा और सरल स्पष्टीकरण देता हूँ। आध्यात्मिक दुनिया एक महत्वपूर्ण स्थान है, एक ऐसा स्थान जो भौतिक संसार से भिन्न है। और मैं क्यों कहता हूँ कि यह महत्वपूर्ण है? हम इसके बारे में विस्तार से बात करने जा रहे हैं। आध्यात्मिक दुनिया का अस्तित्व मनुष्यजाति के भौतिक संसार से अभिन्‍न रूप से जुड़ा है। सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व में वह मानव जीवन और मृत्यु के चक्र में एक बड़ी भूमिका निभाता है; यह इसकी भूमिका है, और उन कारणों में से एक है कि क्यों इसका अस्तित्व महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जो पाँच इंद्रियों के लिये अगोचर है, इसलिए कोई भी इस बात का अनुमान नहीं लगा सकता कि इसका अस्तित्व है अथवा नहीं। आध्यात्मिक दुनिया की असामान्य घटनाएँ मनुष्यजाति के अस्तित्व के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं, जिसके परिणामस्वरूप जिस प्रकार से मनुष्यजाति रहती है, वह भी आध्यात्मिक दुनिया से बेहद प्रभावित होता है। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित है? यह संबंधित है। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो तुम लोग समझ जाओ कि क्यों मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा हूँ: क्योंकि यह परमेश्वर की संप्रभुता से, और उसके प्रशासन से संबंधित है। इस तरह के एक संसार में—जो लोगों के लिए अदृश्य है—इसकी हर स्वर्गिक आज्ञा, आदेश और प्रशासनिक प्रणाली भौतिक संसार के किसी भी देश की व्यवस्थाओं और प्रणालियों से बहुत उच्च है, और संसार में रहने वाला कोई भी प्राणी उनकी अवहेलना करने या उन्हें हथियाने का साहस नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता और प्रशासन से संबंधित है? इस संसार में, स्पष्ट प्रशासनिक आदेश, स्पष्ट स्वर्गिक आज्ञाएँ और स्पष्ट विधान हैं। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न क्षेत्रों में, न्यायालय अधिकारी पूर्णरुप से अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, और नियमों और विनियमों का पालन करते है, क्योंकि वे जानते हैं कि स्वर्गिक आज्ञा के उल्लंघन का परिणाम क्या होता है, वे स्पष्ट रूप से अवगत हैं कि किस प्रकार परमेश्वर दुष्टों को दण्ड और भले लोगों को इनाम देता है, और वह किस प्रकार सभी चीज़ों को चलाता है, वह किस प्रकार हर चीज़ पर शासन करता है, और, इसके अतिरिक्त, वे स्पष्ट रुप से देखते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर अपने स्वर्गिक आदेशों और विधानों को कार्यान्वित करता है। क्या ये उस भौतिक संसार से भिन्न हैं, जिसमें मनुष्यजाति रहती है? वे व्यापक रुप से भिन्न हैं। यह एक ऐसा संसार है जो भौतिक संसार से पूर्णतया भिन्न है। चूँकि यहाँ स्वर्गिक आदेश और विधान हैं, इसलिए यह परमेश्वर की संप्रभुता, प्रशासन, और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के स्वभाव तथा स्वरूप से संबंधित है। इसे सुनने के पश्चात्, क्या तुम लोगों को यह महसूस नहीं होता है कि इस विषय पर बोलना मेरे लिये अति आवश्यक है? क्या तुम लोग इसमें निहित रहस्यों को जानना नहीं चाहते हो? (हाँ, हम चाहते हैं।) आध्यात्मिक दुनिया की अवधारणा ऐसी है। यद्यपि यह भौतिक संसार के साथ सहअस्तित्व में है, और साथ-साथ परमेश्वर के प्रशासन और उसकी संप्रभुता के अधीन है, फिर भी इस दुनिया का परमेश्वर का प्रशासन और उसकी संप्रभुता भौतिक संसार की अपेक्षा बहुत सख्त है। जब विस्तार की बात आती है, तो हमें इस बात से आरम्भ करना चाहिए कि किस प्रकार आध्यात्मिक दुनिया मनुष्य के जीवन और म़ृत्यु के चक्र के कार्य के लिए उत्तरदायी है, क्योंकि यह कार्य आध्यात्मिक दुनिया के प्राणियों के कार्य का एक बड़ा भाग है।

मनुष्यजाति के बीच, मैं लोगों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत करता हूँ। पहले प्रकार के लोग अविश्वासी हैं, ये वे हैं जो धार्मिक विश्वासों से रहित हैं। वे अविश्वासी कहलाते हैं। अविश्वासियों की बहुत बड़ी संख्या केवल धन में विश्वास रखती है, वे केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, वे भौतिकवादी हैं और वे केवल भौतिक संसार में विश्वास करते है, जीवन और मृत्यु में और देवताओं और प्रेतों की लोकोक्तियों में विश्वास नहीं रखते हैं। मैं उन्हें अविश्वासियों के रुप में वर्गीकृत करता हूँ, और वे पहला प्रकार हैं। दूसरा प्रकार अविश्वासियों से अलग विभिन्न मतों को मानने वाले लोगों का है। मनुष्यजाति के बीच, मैं इन मतों के लोगों को अनेक मुख्य प्रकारों में विभाजित करता हूँ: पहला यहूदी हैं, दूसरा कैथोलिक हैं, तीसरा ईसाई हैं, चौथा मुस्लिम और पाँचवाँ बौद्ध हैं, ये पाँच प्रकार हैं। ये विभिन्न प्रकार के मतों वाले लोग हैं। तीसरा प्रकार उन लोगों का है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, जो तुम लोगों से संबंधित हैं। ऐसे विश्वासी वे लोग हैं जो आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। इन लोगों को दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है: परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवा करने वाले लोग। इन प्रमुख प्रकारों को स्पष्ट रुप से विभेदित किया गया है। तो अब, अपने मन में तुम लोग मनुष्यों के प्रकारों और क्रमों को स्पष्ट रुप से विभेदित करने में सक्षम हो। पहला अविश्वासी हैं। मैं कह चुका हूँ कि अविश्वासी कौन हैं। क्या वे लोग जो आकाश में वृद्ध मनुष्य में विश्वास करते हैं अविश्वासी गिने जाते हैं? कई विश्वासी केवल आकाश में वृद्ध मनुष्य में विश्वास करते हैं; वे मानते हैं कि वायु, वर्षा और आकाशीय बिजली आकाश में इस वृद्ध मनुष्य द्वारा नियंत्रित की जाती हैं, जिस पर वे फसल बोने और काटने के लिए निर्भर रहते हैं—फिर भी परमेश्वर पर विश्वास करने के उल्लेख पर वे अनिच्छुक बन जाते हैं। क्या इसे परमेश्वर में विश्वास कहा जा सकता है? ऐसे लोगों को अविश्वासियों में सम्मिलित किया जाता है। तुम इसे समझ गए, है न? इन श्रेणियों को समझने में ग़लती मत करना। दूसरा प्रकार है मतों वाले लोग। तीसरा प्रकार वे लोग हैं जो आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। और क्यों मैंने सभी मनुष्यों को इन प्रकारों में विभाजित किया है? (क्योंकि विभिन्न लोगों के अन्त और गंतव्य भिन्न-भिन्न हैं।) यह एक पहलु है। क्योंकि, जब इन विभिन्न प्रजातियों और प्रकारों के लोग आध्यात्मिक दुनिया में लौटते हैं, तो उनमें से प्रत्येक का जाने का भिन्न स्थान होगा, वे जीवन और मृत्यु के चक्र की भिन्न—भिन्न व्यवस्थाओं के अधीन किए जाएँगे, और यही कारण है कि क्यों मैंने मनुष्यों को इन मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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