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सूचीपत्र

परमेश्वर किन लोगों को बचाता है? वह किन लोगों को हटा देता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो शैतान से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं और जो परमेश्वर से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर की आवाज़ को सुन सकते हैं। वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को महसूस करते और समझते हैं ऐसे लोग हैं जो बचाए जाएँगे, और परमेश्वर की गवाही देंगे; वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को नहीं समझते हैं परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते हैं, तो वे ऐसे लोग हैं जो निकाल दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से उद्धृत

मृतक वे हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न और परमेश्वर विरोधी होते हैं। साथ ही, ये वे लोग होते हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते। इन लोगों में परमेश्वर की आज्ञा मानने की थोड़ी-सी भी इच्छा नहीं होती, वे केवल उससे विद्रोह कर उसका सामना करते हैं और इन में थोड़ी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा ने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर कि आज्ञा मानना जानते हैं, और जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं। ये लोग सत्य और गवाही धारण करते हैं और केवल यही हैं जो परमेश्वर के घर में उसे अच्छे लगते हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर के उद्धार को देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं और जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो परमेश्वर के अवतरण में विश्वास करते हैं और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो जाते हैं, कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका स्वभाव बचाया जा सकता है या नहीं। बहुत से लोगों ने परमेश्वर के वचनों को सुना है परंतु वे उसकी इच्छा को नहीं समझते, उन्होंने परमेश्वर के बहुत से वचनों को सुना परंतु तब भी उन्हें अपने आचरण में नहीं ला पाए। वे किसी भी सत्य को जीने में असमर्थ हैं और जानबूझकर परमेश्वर के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। वे परमेश्वर के लिए कोई भी कार्य नहीं कर सकते, वे उसे कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते, और वे गुप्त रूप से कलीसिया के पैसे खर्च करते और बिना दाम दिए परमेश्वर के घर में खाते हैं। ये लोग मरे हुए हैं, और बचाए नहीं जाएंगे। परमेश्वर उन सब को बचाता है, जो उसके लिए कार्यरत हैं। परंतु उनमें से कुछ हैं जो परमेश्वर के उद्धार को ग्रहण नहीं कर सकते, केवल कुछ ही उसके उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि बहुत से लोग बिल्कुल मरे हुए हैं, वे इतने मरे हुए हैं कि उनका उद्धार नहीं हो सकता, वे पूर्णतः शैतान द्वारा शोषित हैं, और स्वभाव में बहुत दुष्ट हैं। ना ही ये कम संख्या के लोग, परमेश्वर की आज्ञा मानने में पूर्ण रूप से सक्षम हैं। ये वो लोग नहीं हैं जो आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति पूर्णतः निष्ठावान थे, या जिनमें आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति परम प्रेम था, बल्कि ये वे हैं जो परमेश्वर के प्रति उसके विजय कार्यों के कारण आज्ञाकारी बने हैं, वे परमेश्वर को उसके उत्कृष्ट प्रेम के कारण देखते हैं, उनके स्वभाव में परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के कारण परिवर्तन होते हैं, और वे परमेश्वर को उसके वास्तविक व सामान्य कार्यों के कारण जानते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "क्या आप जाग उठे हैं?" से उद्धृत

परमेश्वर ने सदैव उन्हें पूर्ण बनाया है जो उसकी सेवा करते हैं। वह उन्हें अकारण ही बहिष्कृत नहीं करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना को सच में स्वीकार करते हो, यदि तुम अपने पुराने धार्मिक तौर-तरीकों और नियमों को एक ओर रख सकते हो, और पुरानी धार्मिक अवधारणाओं को आज परमेश्वर के वचन की माप के रूप में उपयोग करना बंद कर सकते हो, केवल तभी तुम्हारे लिए एक अच्छा भविष्य होगा। किन्तु यदि तुम पुरानी चीजों से चिपके रहते हो, यदि तुम उन्हें अभी भी सँजो कर रखते हो, तो ऐसा कोई तरीका नहीं है कि तुम्हें बचाया जा सके। परमेश्वर इस तरह के लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "धार्मिक सेवाओं को अवश्य शुद्ध करना चाहिए" से उद्धृत

जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं ये वे लोग हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं, और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग चालबाज़ियों और अन्याय का सहारा लेते हैं, उनमें सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर को लज्जित करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत द्वेषपूर्ण होते हैं। जिन लोगों में विवेक नहीं होता और सत्य के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्य नहीं होता वे सभी दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। ये लोग शैतान के सर्वोत्कृष्‍ट प्रतिनिधि हैं; ये छुटकारे से परे हैं, और वास्तव में, हटा दिए जाने वाली वस्तुएँ हैं। परमेश्वर का परिवार उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ उजागर किया जाएगा और अंत में हटा दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जिनका सम्बंध शैतान से है, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते हैं, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिये गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति का अंत प्रकट किया जाए, जो लोग करीसिया को परेशान करते हैं और परमेश्वर के कार्य में व्यवधान ड़ालते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले एक ओर छोड़ दिया जाएगा, और उनसे बाद में निपटा जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक के बाद एक करके उजागर किया जाएगा, और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मनुष्य जाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाता है, तो उन लोगों को हटा दिया जाना चाहिए; यही वह समय होगा जब लोगों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जागा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आणंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का अभ्यास में नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी" से उद्धृत

कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने-मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपने महत्वहीन तर्कों से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन व्यतीत करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाला और काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व खर्च करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे लोगों में से हो जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तीन चेतावनियाँ" से उद्धृत

कुछ लोग किसी तरह की नकारात्मकता आ जाने पर अपने कर्तव्य से पीछे हट जाते हैं, और हर एक झटके के बाद उठने में असमर्थ हो जाते हैं। ये सभी लोग बेवकूफ हैं, जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, वे सत्य को पाने में विफ़ल होंगे, भले ही वे अपना पूरा जीवन आस्था में बिता दें। ऐसे बेवकूफ लोग अंत तक अनुसरण कैसे करेंगे? बुद्धिमान लोग और वे लोग जिनके पास सच में आध्यात्मिक मामलों को समझने की आंतरिक गुणवत्ता है, वे सत्य के साधक हैं, और दस में से आठ बार वे शायद कुछ प्रेरणा, सबक, प्रबुद्धता और प्रगति हासिल करने में सक्षम हैं। जब एक ही चीज़ ऐसे बेवकूफ व्यक्ति के साथ दस बार होती है, जो आध्यात्मिक बातों को नहीं समझता है, तो वह एक बार भी कोई जीवन लाभ प्राप्त नहीं करेगा, वह एक बार भी कोई बदलाव नहीं करेगा और एक बार भी अपनी प्रकृति को नहीं समझेगा। वह दस बार नाकाम हो जाएगा, वह दस बार गिर जाएगा, लेकिन फिर भी सजग नहीं होगा, न ही वह समस्या की जड़ को ढूँढने के लिए सत्य की खोज करेगा। इस तरह का व्यक्ति चाहे कितना भी धर्मोपदेश सुन ले, वह से को कभी नहीं समझ पाएगा—वह एक हारा हुआ व्यक्ति होगा। हर बार जब वह गिरता है, तो वापस खड़ा होने के लिए किसी और व्यक्ति के सहारे की ज़रूरत होती है, जो उसे समझा सके। अगर ऐसे व्यक्ति को समझाया या सहारा नहीं दिया जाता है, तो वह फिर से खड़ा नहीं हो पाएगा। हर बार ऐसा होता है, जब गिरने का खतरा होता है, और हर बार उनके बिगड़ने का खतरा रहता है। क्या यह इनके लिए अंत नहीं है? इन निरर्थक लोगों को बचाने के लिए क्या अभी भी कोई आधार बाकी है? मानवजाति के लिए परमेश्वर का उद्धार ऐसे लोगों के उद्धार के लिए जो सत्य से प्रेम करते हैं। यह उन लोगों के लिए उद्धार है जिनके पास इच्छाशक्ति और संकल्प है, जो सत्य और धार्मिकता की आकाँक्षा रखते हैं। किसी व्यक्ति के पास संकल्प होने का अर्थ है कि वह धार्मिकता, अच्छाई और सत्य की लालसा रखता है और यह कि उसके पास विवेक है। परमेश्वर इन लोगों में कार्य करता है ताकि वे सत्य को समझ सकें और सत्य को पा सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता को शुद्ध किया जा सके और उनके जीवन स्वभाव को परिवर्तित किया जा सके। अगर आपके अंदर सत्य के लिए प्रेम नहीं है या धार्मिकता और प्रकाश की आकांक्षा नहीं है, तो जब कभी भी शैतान से आपका सामना होगा, आपके पास बुरी चीज़ों को छोड़ देने का साहस या कठिनाइयों को सहने का संकल्प नहीं होगा, और यदि आपका विवेक सुन्न है, तो सत्य प्राप्त करने के लिए आपकी क्षमता भी सुन्न है, सत्य या होनेवाली चीजों के प्रति आप संवेदनशील नहीं हैं, आप कुछ भी भेद समझ नहीं पा रहे हैं, और चीजों को संभालने या हल करने की आपके पास कोई क्षमता नहीं है, तो फिर बचाव का कोई रास्ता नहीं है। इस तरह के व्यक्ति को सुझाव देने के लिए कुछ भी नहीं होता, उसके साथ काम करने के लिए कुछ भी नहीं होता। परमेश्वर चाहे कितने भी स्पष्ट रूप से अथवा पारदर्शिता से सत्य के बारे में बात करते हैं, वे प्रतिक्रिया नहीं देते, जैसे कि वे पहले से ही मर चुके हैं। क्या उनके लिए सब खत्म नहीं हो चुका है? जिसके पास सांस है उसे कृत्रिम सांस देकर बचाया जा सकता है। लेकिन अगर वे पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्मा जा चुकी है, तो कृत्रिम सांस कुछ भी नहीं करेगा। एक बार जब आप पर कोई परेशानी आ गिरती है, तो आप सिकुड़ जाते हैं, और आप कोई गवाही नहीं देते, तो आपको कभी भी बचाया नहीं जा सकता और आपका पूरी तरह से काम तमाम हो चुका है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "भ्रमित लोगों का उद्धार नहीं हो सकता" से उद्धृत

ऐसे मनुष्यों को नए कार्य की कोई समझ नहीं होती है परन्तु वे अंतहीन अवधारणाओं से भरे हुए होते हैं। वे कलीसिया में किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं करते हैं; बल्कि, यहाँ तक कि कलीसिया में हर प्रकार के दुर्व्यवहार और अशांति में संलग्न होने की हद तक, वे अनिष्ट करते हैं और हर कहीं नकारात्मकता फैलाते हैं, और परिणामस्वरूप उन लोगों को भ्रम और अव्यवस्था में डाल देते हैं जिनमें विभेदन-क्षमता का अभाव होता है। इन जीवित दुष्ट आत्माओं, और इन बुरी आत्माओं को जितना जल्दी हो सके कलीसिया छोड़ देनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कारण कलीसिया को नुक़सान पहुँचे। हो सकता है कि तुम आज के कार्य से भयभीत न हो, किन्तु क्या तुम आने वाले कल के धार्मिक दण्ड से भयभीत नहीं हो? कलीसिया में बहुत से लोग हैं जो मुफ़्तखोर हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में भेड़िए हैं जो परमेश्वर के सामान्य कार्य को अस्तव्यस्त करने की कोशिश करते हैं। ये सभी चीज़ें दुष्ट आत्माएँ हैं जिन्हें शैतान के द्वारा भेजा गया है और दुष्ट भेड़िए हैं जो निर्दोष मेमनों को हड़पने का प्रयास करते हैं। यदि इन तथाकथित मनुष्यों को खदेड़ा नहीं जाता है, तो वे कलीसिया में परजीवी और चढ़ावों को हड़पने वाले कीट-पतंगे बन जाते हैं। इन कुत्सित, अज्ञानी, नीच, और अरुचिकर कीड़ों को एक दिन दण्डित किया जाएगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे" से उद्धृत

जो केवल अपनी देह के बारे में ही सोचते हैं और आराम पसंद करते हैं, जिनके विश्वास संदिग्ध हैं, जो दुष्टतापूर्ण दवाओं और जादूटोना में शामिल हैं, वे जो स्वच्छंद संभोगी हैं, जो फटेहाल और चीथड़ों में हैं, जो यहोवा को दी गई बलि और उसकी संपत्ति को चुराते हैं, जो रिश्वत से प्यार करते हैं, जो बैठे-ठाले स्वर्ग जाने का स्वप्न देखते हैं, जो अभिमानी और दम्भी हैं, और केवल व्यक्तिगत प्रसिद्धि और भाग्य के लिए प्रयास करते हैं, जो असंगत बातों को फैलाते हैं, जो स्वयं परमेश्वर की ही निंदा करते हैं, जो स्वयं परमेश्वर के खिलाफ निर्णय और निंदा करने के अलावा और कुछ भी नहीं करते हैं, जो औरों के साथ गिरोह बनाने और स्वतंत्र समूह बनाने की कोशिश करते हैं, जो खुद को परमेश्वर से अधिक ऊँचा उठाते हैं, वे छिछोरे युवा पुरुष और महिलाएँ, तथा मध्य-आयु के और वृद्ध पुरुष और महिलाएँ जो व्यभिचार में फँसे हुए हैं, वे पुरुष और महिलाएँ जो व्यक्तिगत प्रसिद्धि और भाग्य का आनंद लेते हैं और दूसरों के बीच व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की खोज करते हैं, वे पश्चाताप-रहित लोग जो पापों में फँसे हुए हैं—क्या वे सभी उद्धार से परे नहीं हैं? व्यभिचार, पाप, जादू-टोने की दवा, जादूटोना, अधर्मता, और असंगत बातें तुम लोगों के बीच आतंक मचाती हैं, जबकि सत्य और जीवन के वचन तुम लोगों के बीच कुचले जाते हैं, और पवित्र भाषा तुम लोगों के बीच दूषित की जाती है। गंदगी और अवज्ञा से फूले हुए तुम अन्य जातियों के लोग! तुम लोगों का अंत कहाँ होगा? जो देह से प्यार करते हैं, जो देह के बुरे काम करते हैं, और जो व्यभिचारी पापों में फँसे हुए हैं, उनकी हिम्मत कैसे होती है कि वे जीते रहें? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम जैसे लोग वो कीड़े हैं जो उद्धार से परे हैं? इसकी और उसकी माँग करने की योग्यता तुम लोगों को कहाँ से मिलती है? आज तक, उन लोगों में थोड़ा-सा भी बदलाव नहीं हुआ है जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं और केवल देह से प्यार करते हैं—तो ऐसे लोगों को कैसे बचाया जा सकता है? आज भी, जो लोग जीवन के मार्ग से प्रेम नहीं करते है, जो परमेश्वर को ऊँचा नहीं उठाते हैं और उनकी गवाही नहीं देते हैं, जो अपनी खुद की हैसियत के लिए योजना बनाते हैं, जो खुद की प्रशंसा करते हैं—क्या वे अभी भी वैसे ही नहीं हैं? उन्हें बचाने का मूल्य कहाँ है? तू बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस पर निर्भर नहीं करता है कि तू पढाई-लिखाई में कितना सुयोग्य है, या तू कितने साल से काम कर रहा है, इस पर तो बिल्कुल भी निर्भर नहीं करता है कि तेरे पास कितने प्रमाण-पत्र हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि तेरी खोज का कोई परिणाम मिला या नहीं। तुझे यह पता होना चाहिए कि जो बचाए जाते हैं वे ऐसे "पेड़" हैं जिनमें फल लगते हैं, न कि वो पेड़ जिनके कि प्रचुर मात्रा में हरे-भरे पत्ते और फूल तो होते हैं, लेकिन वे कोई फल नहीं देते हैं। भले ही तूने सड़कों पर कई साल भटक कर बिताएँ हों, तो उससे क्या होगा? तेरी गवाही कहाँ है? तेरा अपने आप से प्रेम और तेरी वासना वाली इच्छाओं की तुलना में परमेश्वर के लिए तेरा आदर बहुत कम है—क्या ऐसा कोई व्यक्ति पतित नहीं है? वे मुक्ति के उदाहरण और आदर्श कैसे हो सकते हैं? तेरी प्रकृति अपरिवर्तनीय है, तू बहुत अधिक विद्रोही है, तू बचाए जाने से परे है! क्या ऐसे लोगों का उन्मूलन नहीं किया जाएगा? क्या जिस समय मेरा कार्य समाप्त हो जाएगा, वही समय तेरे अंत के दिन का आगमन नहीं होगा? मैंने तुम लोगों के बीच बहुत कार्य किया है और बहुत सारे वचन कहे हैं—इनमें से कितना तुम लोगों के कानों के अन्दर गया है? इसमें से कितने का तुम लोगों ने कभी पालन किया है? जब मेरा कार्य समाप्त हो जाएगा तभी तू मेरा विरोध करना और मेरे खिलाफ खड़े होना भी बंद कर देगा। मेरे कार्य करने के दौरान तुम लोग हमेशा मेरे खिलाफ काम करते हो; तुम मेरे वचनों का कभी भी पालन नहीं करते हो। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तू अपना काम करता है, तू अपना खुद का एक छोटा सा राज्य बना लेता है—तुम लोमड़ियों और कुत्तों के झुंड, तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह मेरे खिलाफ होता है! तुम लोग हमेशा उन लोगों को अपने आगोश में लाने की कोशिश करते हो जो केवल तुम लोगों से प्यार करते हैं—तुम लोगों की श्रद्धा कहाँ है? तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह धोखेबाज़ी है! तुम लोगों के पास कोई आज्ञाकारिता या श्रद्धा नहीं है—तुम लोग जो भी करते हो वह धोखेबाज़ी और ईशनिन्दा है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? यौन में अनैतिक, कामुक पुरुष हमेशा उन नख़रेबाज़ वेश्याओं को अपने स्वयं के भोग के लिए अपनी ओर खींचना चाहते हैं। मैं ऐसे यौन रूप से अनैतिक राक्षसों को नहीं बचाऊँगा, मैं तुम सब गंदे राक्षसों से नफरत करता हूँ, तुम लोगों की व्यभिचारिता और नख़रेबाजी तुम सभी को नरक में गिरा देगी—तुम लोगों के पास अपने लिए कहने को क्या है? तुम गंदे राक्षसों और बुरी आत्माओ, तुम बहुत घृणास्पद हो! तुम लोग घिनौने हो! ऐसे कचरे को कैसे बचाया जा सकता है? क्या जो पाप में फँसे हैं उन्हें अभी भी बचाया जा सकता है? आज इस सत्य, इस मार्ग, और इस जीवन के प्रति तुम लोगों का कोई आकर्षण नहीं है; तुम लोग पाप करने के प्रति, धन के ओहदे, प्रसिद्धि और लाभ, देह के सुख, पुरुषों की सुंदरता और महिलाओं के नख़रों के प्रति आकर्षित हो। ऐसा क्या है जो मेरे राज्य में प्रवेश के लिए तुम लोगों को योग्य बनाता है? तुम लोगों की छवि परमेश्वर से भी कहीं अधिक बड़ी है, तुम लोगों की हैसियत परमेश्वर की हैसियत से अधिक ऊँची है, मनुष्यों के बीच तुम सभी की प्रतिष्ठा का तो कहना ही क्या—तुम लोग एक ऐसा आदर्श बन गए हो जिसकी लोग पूजा करते हैं। क्या तू महादूत नहीं बन गया है? जब लोगों का परिणाम प्रकट किया जाता है, जो तभी होता है जब उद्धार का कार्य समाप्त होने लगता है, तो तुम लोगों में से कई लाशें होंगी जो उद्धार से परे हैं और जिनका उन्मूलन अवश्य कर दिया जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (7)" से उद्धृत

जो लोग बाद में विश्राम के माध्यम से जीवित बचेंगे उन सबने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहते हैं। जो लोग केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के लिए सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, वे नहीं बच पाएँगे। परमेश्वर के पास सभी लोगों के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानदण्ड हैं; वह केवल किसी के वचनों या आचरण के अनुसार इन निर्णयों को नहीं लेता है, न ही वह इन्हें किसी एक समयावधि के दौरान उनके व्यवहार के अनुसार लेता है। वह अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गयी किसी सेवा की वजह से किसी के समस्त दुष्ट व्यवहार के प्रति सर्वथा उदार व्यवहार नहीं करेगा, न ही परमेश्वर के लिए एक बार के व्यय की वजह से किसी को मृत्यु से बचा लेगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए दण्ड से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि कोई वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है, तो इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर के प्रति अनंतकाल तक विश्वसनीय है, और पुरस्कार की तलाश नहीं करता है, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे उन्हें आशीषें मिले या वे दुर्भाग्य से पीड़ित हों। यदि आशीषों को देखते समय लोग विश्वसनीय रहते हैं किन्तु जब वे आशीषों को नहीं देख सकते हैं तो विश्वसनीयता खो देते हैं, और अभी भी अंत में वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं और अभी भी अपने उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जो उन्हें करने चाहिए, तो ये लोग जिन्होंने किसी समय विश्वसनीयता से परमेश्वर की सेवा की थी, तब भी नष्ट हो जाएँगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं बच सकते हैं, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से उद्धृत

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