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सूचीपत्र

जब अनुग्रह के युग में परमेश्वर देहधारी हुए, तो यह देहधारण एक यहूदी पुरुष के रूप में था, तो अंत के दिनों के परमेश्वर एक एशियाई व्यक्ति के रूप में क्यों प्रकट हुए हैं?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड में महानतम है, तो क्या वह देह की छवि का उपयोग करके स्वयं को पूरी तरह से समझा सकता है? परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करने के लिए देह धारण करता है। देह की छवि का कोई महत्व नहीं है, और इसका युगों की समाप्ति से कोई संबंध नहीं है, और इसका परमेश्वर के स्वभाव से कुछ मतलब नहीं है। यीशु ने अपनी छवि को क्यों नहीं रहने दिया? उसने अपनी छवि को मनुष्य को चित्रित क्यों नहीं करने दिया, ताकि इसे बाद की पीढ़ियों को आगे सौंपा जा सके? उसने लोगों को यह स्वीकार क्यों नहीं करने दिया कि उसकी छवि परमेश्वर की छवि है? …वह केवल इसलिए देहधारी बनता है ताकि पवित्रात्मा को अपना कार्य करते समय रहने के लिए कहीं उपयुक्त जगह हो, ताकि वह देह में अपना कार्य पूरा कर सके—ताकि लोग उसका कार्य देख सकें, उसके स्वभाव के संपर्क में आ सकें, उसके वचनों को सुन सकें, और उसके कार्य के चमत्कार को जान सकें। उसका नाम उसके स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है, उसका कार्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, किन्तु उसने कभी नहीं कहा है कि देह में उसका प्रकटन उसकी छवि का प्रतिनिधित्व करता है; यहकेवल मनुष्य की एक अवधारणा है। और इसलिए, परमेश्वर के देहधारण के मुख्य बिंदु उसका नाम, उसका कार्य, उसका स्वभाव, और उसका लिंग हैं। वह इस युग में अपने प्रबंधन का प्रतिनिधित्व करने के लिए इनका उपयोग करता है। देह में उसके प्रकटन का उसके प्रबंधन पर कोई असर नहीं पड़ता है, और यह केवल उस समय उसके कार्य के वास्ते है। फिर भी देहधारी परमेश्वर के लिए कोई विशेष रूप-रंग नहीं रखना असंभव है, और इसलिए वह अपना प्रकटन निर्धारित करने के लिए उपयुक्त परिवार चुनता है। यदि परमेश्वर के प्रकटन का प्रतिनिधिक महत्व है, तो उसके चेहरे के समान विशेषताओं से सम्पन्न सभी व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या यह एक घोर त्रुटि नहीं है? …परमेश्वर पवित्रात्मा है, और उसकी सटीक छवि कैसी है इसका सार प्रस्तुत करने में मनुष्य कभी भी सक्षम नहीं होगा। उसकी छवि केवल उसके स्वभाव द्वारा ही व्यक्त की जा सकती है। …तुम परमेश्वर की छवि को पूरी तरह से साकार रूप देने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग नहीं कर सकते हो, क्योंकि परमेश्वर अत्यधिक उत्कृष्ट, अत्यधिक महान, अत्यधिक चमत्कारिक और अथाह है!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से

यह अति महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर का देहधारी देह उस कार्य की समाप्ति पर पृथ्वी से चला जाए जिसे उसे करने की आवश्यकता है, क्योंकि वह केवल उस कार्य को करने आया है जिसे उसे अवश्य करना चाहिए, और वह लोगों को अपनी छवि दिखाने नहीं आया है। यद्यपि देहधारण के महत्व को परमेश्वर के द्वारा पहले से ही दो बार देहधारण करके पूरा किया जा चुका है, फिर भी वह किसी ऐसे देश पर अपने आपको खुलकर प्रकट नहीं करेगा जिसने उसे पहले कभी नहीं देखा है। यीशु फिर कभी स्वयं को धार्मिकता के सूर्य के रूप में यहूदियों को नहीं दिखाएगा, न ही वह जैतून पहाड़ पर चढ़ेगा और सभी लोगों के सामने प्रकट होगा; सभी यहूदी जो देखते हैं वह यहूदिया में उसके समय के दौरान की उसकी तस्वीर है। इसका कारण यह है कि यीशु के देहधारण का कार्य लंबे समय से अर्थात् दो हजार वर्ष पहले समाप्त हो गया; वह अपनी पिछली छवि में यहूदिया में वापस नहीं आएगा, उस समय की अपनी छवि को किसी भी गैरजाति राष्ट्र में तो बिल्कुल भी नहीं दिखाएगा, क्योंकि देहधारी यीशु केवल एक यहूदी की छवि है, न कि मनुष्य के पुत्र की छवि जिसे यूहन्ना ने देखा था। यद्यपि यीशु ने अपने अनुयायियों से वादा किया था कि वह फिर से आएगा, किन्तु वह अन्यजाति राष्ट्रों में स्वयं को मात्र यहूदी की छवि में नहीं दिखाएगा। …यह बिलकुल इसके समान है कि एक यहूदी के रूप में यीशु की छवि कैसे केवल परमेश्वर की छवि का प्रतिनिधित्व कर सकती है जब वह यहूदिया में कार्य करता था, और वह केवल सलीब पर चढ़ने का काम ही कर सकता था। उस समय के दौरान जब यीशु देह में था, वह किसी युग का अंत करने या मानवजाति का विनाश करने का कार्य नहीं कर सकता था। इसलिए, जब उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया और उसने अपना काम समाप्त कर लिया था तो उसके पश्चात्, वह स्वर्ग पर चढ़ गया और उसने सदा के लिए स्वयं को मनुष्य से छिपा लिया। उसके बाद से, अन्य जाति देशों के वे वफादार विश्वासी केवल उसकी तस्वीर को ही देख सकते थे जिसे उन्होंने दीवारों पर चिपकाया था, और प्रभु यीशु के प्रकटीकरण को नहीं देख सकते थे। यह तस्वीर सिर्फ एक ऐसी तस्वीर है जिसे मनुष्य के द्वारा बनाया गया है, और वह छवि नहीं है जिसे स्वयं परमेश्वर ने मनुष्य को दिखाया था। जब से परमेश्वर दो बार देह बना है वह अपने आपको उस छवि में भीड़ के सामने खुलकर प्रकट नहीं करेगा। जिस कार्य को वह मानवजाति के बीच करता है वह उन्हें अनुमति देने के लिए है कि वे उसके स्वभाव को समझें। यह सब कुछ, यीशु के प्रकटीकरण के माध्यम के बजाय, विभिन्न युगों के कार्य के माध्यम से मनुष्य को दिखाने के द्वारा, साथ ही साथ उस स्वभाव के माध्यम से जिसे उसने ज्ञात करवाया है और उस कार्य के माध्यम से जिसे उसने किया है, सम्पन्न किया जाता है। कहने का अभिप्राय है, कि परमेश्वर की छवि को देहधारी छवि के माध्यम से मनुष्य को ज्ञात नहीं करवाया जाता है, बल्कि छवि और स्वरूप के देहधारी परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य के माध्यम से ज्ञात करवाया जाता है; और उसके (स्त्री/पुरुष) कार्य के माध्यम से, उसकी छवि को दिखाया जाता है और उसके स्वभाव को ज्ञात करवाया जाता है। यही उस कार्य का महत्व है जिसे वह देह में करने की इच्छा करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (2)" से

यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देहों का कोई सम्बंध नहीं है, किन्तु हमारी पवित्रात्माएँ एक ही हैं; यद्यपि हम जो करते हैं और जिस कार्य को हम वहन करते हैं वे एक ही नहीं हैं, तब भी सार रूप में हम सदृश्य हैं; हमारी देहें भिन्न रूप धारण करती हैं, और यह ऐसा युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की आवश्यकता के कारण है; हमारी सेवकाईयाँ सदृश्य नहीं हैं, इसलिए जो कार्य हम लाते और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और प्राप्त करता है वह अतीत के असमान है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनकी देहों के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और यद्यपि वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे थे, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु उनकी पवित्रात्माएँ एक हैं। यद्यपि उनकी देहें किसी भी तरीके से रक्त या शारीरिक सम्बंध साझा नहीं करती हैं, किन्तु इससे यह इनकार नहीं होता है कि वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं। यह एक निर्विवाद सत्य है कि वे परमेश्वर के देहधारी शरीर हैं, यद्यपि वे एक ही व्यक्ति के वंशज या सामान्य मानव भाषा (एक पुरुष था जिसने यहूदियों की भाषा बोली और दूसरी स्त्री है जो सिर्फ चीनी भाषा बोलती है) को साझा नहीं करते हैं। यह इन्हीं कारणों से है कि उन्हें जो कार्य करना चाहिए उसे वे भिन्न-भिन्न देशों में, और साथ ही भिन्न-भिन्न समयावधियों में करते हैं। इस तथ्य के बावजूद भी वे एक ही पवित्रात्मा हैं, एक ही सार को धारण किए हुए हैं, उनकी देहों के बाहरी आवरणों के बीच बिल्कुल भी पूर्ण समानताएँ नहीं है। वे मात्र एक ही मानजाति को साझा करते हैं, परन्तु उनकी देहों का प्रकटन और जन्म सदृश्य नहीं हैं। इनका उनके अपने-अपने कार्य या मनुष्य के पास उनके बारे में जो ज्ञान है उस पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि, आखिरकार, वे एक ही पवित्रात्मा हैं और कोई भी उन्हें अलग नहीं कर सकता है। यद्यपि वे रक्त द्वारा सम्बंधित नहीं हैं, किन्तु उनका सम्पूर्ण अस्तित्व उनकी पवित्रात्माओं के द्वारा निर्देशित होता है, जिसकी वजह से, उनकी देह एक ही का वंशज साझा नहीं करने के साथ, वे भिन्न-भिन्न समयावधियों में भिन्न-भिन्न कार्य का उत्तरदायित्व लेते हैं। उसी तरह, यहोवा का पवित्रात्मा यीशु के पवित्रात्मा का पिता नहीं है, वैसे ही जैसे कि यीशु का पवित्रात्मा यहोवा के पवित्रात्मा का पुत्र नहीं है। वे एक ही आत्मा हैं। ठीक वैसे ही जैसे आज का देहधारी परमेश्वर और यीशु हैं। यद्यपि वे रक्त के द्वारा सम्बंधित नहीं हैं; वे एक ही हैं; ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी पवित्रात्माएँ एक ही हैं। वह दया और करुणा का, और साथ ही धर्मी न्याय का और मनुष्य की ताड़ना का, और मनुष्य पर श्राप लाने का कार्य कर सकता है। अंत में, वह संसार को नष्ट करने और दुष्टों को सज़ा देने का कार्य कर सकता है। क्या वह यह सब स्वयं नहीं करता है? क्या यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता नहीं है?

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं" से

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