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परमेश्वर ने द्वितीय युग को अनुग्रह का युग का नाम क्यों दिया?

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यीशु अनुग्रह के युग के समस्त कार्य का प्रतिनिधित्व करता है; वह देह में देहधारी हुआ और उसे सलीब पर चढ़ाया गया, और उसने भी अनुग्रह के युग का उद्घाटन किया। छुटकारे के कार्य को पूरा करने, व्यवस्था के युग का अंत करने और अनुग्रह के युग का आरम्भ करने के लिए उसे सलीब पर चढ़ाया गया था, और इसलिए उसे “सर्वोच्च सेनापति,” “पाप बलि,” और “छुटकारा दिलाने वाला” कहा गया। इस प्रकार यीशु के कार्य की विषय सूची यहोवा के कार्य से अलग थी, यद्यपि वे सैद्धान्तिक रूप से एकही थे। यहोवा ने व्यवस्था का युग आरम्भ किया, गृह आधार स्थापित किया, अर्थात्, पृथ्वी पर अपने कार्य का उद्गम स्थल, और आज्ञाओं को जारी किया; ये उसकी उपलब्धियों में से दो थीं, जो व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। जिस कार्य को यीशु ने अनुग्रह के युग में किया वह आज्ञाओं को जारी करना नहीं था बल्कि आज्ञाओं को पूरा करना था, परिणामस्वरूप अनुग्रह के युग का सूत्रपात करना और व्यवस्था के युग को समाप्त करना था जो दो हज़ार सालों तक रहा था। वह अग्रणी था, जो अनुग्रह के युग को शुरू करने के लिए आया, उसके कार्य का मुख्य भाग छुटकारे में रहता है। और इसलिए उसकी उपलब्धियाँ भी दोगुनी थीं: एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करना, और अपने सलीब पर चढ़ने के माध्यम से छुटकारे के कार्य को पूरा करना। तब वह चला गया। उस स्तर पर, व्यवस्था का युग समाप्त हो गया और मानवजाति ने अनुग्रह के युग में प्रवेश किया।

जो कार्य यीशु ने किया वह उस युग में मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार था। उसका कार्य मानवजाति को छुटकारा दिलाना, उन्हें उनके पापों के लिए क्षमा करना था, और इसलिए उसका स्वभाव पूरी तरह से विनम्रता, धैर्य, प्रेम, धर्मपरायणता, सहनशीलता, दया और करूणामय-प्यार था। उसने मानवजाति को प्रचुरता से धन्य किया और वह उनके लिए ढेर सारा अनुग्रह लाया, और वे सभी चीज़ें जिनका वे संभवतः आनन्द ले सकते थे, उसने उन्हें उनके आनंद के लिए दी: शांति और प्रसन्नता, अपनी सहनशीलता और प्रेम, अपनी दया और अपना करूणामय-प्यार। उन दिनों, वह सब जिससे मनुष्य का सामना होता था वह थीं उसके आनन्द की ढेर सारी चीज़ें: उनके हृदय शांत और आश्वस्त थे, उनकी आत्माओं को सान्त्वना थी, और उन्हें उद्धारकर्ता यीशु द्वारा जीवित रखा गया था। यह कि वे इन चीज़ों को प्राप्त कर सके यह उस युग का एक परिणाम था जिसमें वे रहते थे। अनुग्रह के युग में, मनुष्य पहले से ही शैतान की भ्रष्टता से गुज़र चुका था, और इसलिए समस्त मानवजाति को छुटकारा देने के कार्य हेतु, अनुग्रह की भरमार, अनन्त सहनशीलता और धैर्य, और उससे भी बढ़कर, मानवजाति के पापों का प्रयाश्चित करने के लिए पर्याप्त बलिदान की आवश्यकता थी ताकि इसके प्रभाव तक पहुँचा जा सके। अनुग्रह के युग में मानवजाति ने जो देखा वह मानवजाति के पापों के प्रायश्चित के लिए मेरी भेंट मात्र था, अर्थात्, यीशु। वे केवल इतना ही जानते थे कि परमेश्वर दयावान और सहनशील हो सकता है, और उन्होंने केवल यीशु की दया और करूणामय-प्रेम को देखा था। ऐसा पूरी तरह से इसलिए था क्योंकि वे अनुग्रह के युग में रहते थे।

"छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी" से

अपने पहले देहधारण के दौरान, बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना परमेश्वर के लिए आवश्यक था क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। सम्पूर्ण मानव जाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसे दयालु और क्षमाशील होने की आवश्यकता थी। सलीब पर चढ़ने से पहले उसने जो कार्य किया वह बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना था, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और गंदगी से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। क्योंकि यह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करना, उसके द्वारा संकेतों और चमत्कारों को दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे; क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था, जिसका प्रतीक शान्ति, आनन्द और भौतिक आशीष थे, जो कि सभी यीशु में लोगों के विश्वास की निशानियाँ थी।

"परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार" से

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