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40. ईमानदारी में बहुत ज्यादा खुशी है

गैन एन हेफेई शहर, अनहुई प्रांत

अपने जीवन में, मैं हमेशा से ही सामाजिक वार्तालापों में "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" वाक्यांश के अनुसार चला हूँ। मैं बिना सोचे विचारे दूसरों पर कभी विश्वास नहीं करता हूँ। मुझे हमेशा यह महसूस हुआ है कि ऐसी परिस्थितियों में, जहाँ आप किसी के वास्तविक इरादों को नहीं जानते हों, वहाँ आपको बहुत जल्दी अपने पत्ते नहीं खोलने चाहिए। इसलिए, एक शांतिपूर्ण नज़रिया अपनाए रखना काफी है—इस तरह से तुम खुद की रक्षा करते हो और अपने सहयोगियों की दृष्टि में भी तुम एक "अच्छे व्यक्ति" बनोगे।

अंत के दिनों में मेरे परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर लेने के बाद भी, दूसरों के साथ व्यवहार में मेरा यही उसूल रहता था। जब मैंने देखा कि परमेश्वर हमें मासूम, सरल और ईमानदार बने रहने के लिए कहता है, तो मैं केवल उन छोटी-छोटी बातों के बारे में सरल रहता था, जिनमें मेरा कोई निजी हित नहीं होता था। मैं अपने स्वभाव के उन पहलुओं को इस डर से लगभग कभी भी साझा नहीं करता था जो मुझे वाकई भ्रष्ट लगते थे, कि मेरे भाई और बहv मुझे तुच्छ न समझेंगे। जब मेरे अगुआ ने मुझे मेरे कामों को बिना रुचि के करने के कारण चुना, तो मैं आशंका और संशय से भर गया और खुद सोचने लगा, "मेरा अगुआ हमेशा मुझे ही क्यों चुनता रहता है और मेरे सभी भाई-बहनों के समक्ष मेरी परिस्थितियों के विवरणों को गौर से देखता रहता रहा है? क्या यह स्पष्ट नहीं कि इससे हर किसी के समक्ष मेरा अपमान होगा और मैं शर्मिंदा हो जाऊँगा।? संभवत: मेरा अगुआ मुझमें बहुत उत्सुक नहीं है, इसलिए उसने मुझे चुनने का निर्णय लिया।" यह देखना विशेष रूप से दुःखदायी और असहनीय था कि अन्य भाई-बहनों को पदोन्नत किया जा रहा था जबकि मैं उसी पद पर रह गया था। मैंने मानता था कि मुझे प्रशिक्षण के योग्य न होने के कारण पदोन्नत नहीं किया जा रहा था। मेरा दिल ग़लतफ़हमियों और संदेहों से भर गया था; मुझे लगता था कि मेरा कोई भविष्य नहीं है, यह कि इस मार्ग को जारी रखने का कोई उपयोग नहीं है। चूँकि मैं हमेशा सतर्क और दूसरों के प्रति शंकालु था, इसलिए मैं परमेश्वर को अधिकाधिक ग़लत समझता था और उससे बहुत कम जुड़ा हुआ महसूस करता था। मेरी दशा उत्तरोत्तर असामान्य होती जा रही थी और अंतत: मैंने पवित्र आत्मा के कार्य के साथ संपर्क गँवा दिया और अंधकार में डूब गया।

इस पीड़ा की गहराई में, हैरान और दिशाहीन, मुझे अचानक परमेश्वर का यह वचन मिला: "यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम्हारे पास एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के विचार होंगे। इसी कारण से, मुझ में तुम्हारा विश्वास संदेह कि नींव पर बना है। इस प्रकार के विश्वास को मैं कभी भी स्वीकार नहीं करूँगा। सच्चे विश्वास का अभाव होने पर, तुम सच्चे प्रेम से और भी अधिक दूर होगे। और यदि तुम परमेश्वर पर भी संदेह करने और अपनी इच्छानुसार उसके बारे में अनुमान लगाने में समर्थ हो, तो तुम संदेह से परे मनुष्यों में सबसे अधिक धोखेबाज हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें" से)। जब मैंने परमेश्वर के वचन पर गहराई से विचार किया तो, अचानक ही मैंने दैनिक जीवन के अपने कार्यकलापों पर चिंतन किया। आरंभ करते हुए, मैंने सोचा: "क्या मैं 'एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के विचार होंगे' के साथ नहीं जी रहा था?" वैसे तो, क्या मैं परमेश्वर की नजरों में एक धूर्त मनुष्य नहीं था? उस पल, "धूर्त मनुष्य" वचन एक तीखी ब्लेड की तरह मेरे दिल को चीर कर निकल गए, जिससे मुझे असहनीय पीड़ा होने लगी। मैं हमेशा सोचता था कि अगर मैंने "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" के उसूल को अपनाए रखा, तो मेरे साथी मुझे एक अच्छा व्यक्ति मानेंगे, इसलिए मैंने अन्य लोगों के साथ अपने व्यवहार में और कारोबार करने में इन्हीं बातों के अनुसार जीता था। अपने सभी सालों में, मैंने कभी भी यह संदेह नहीं किया कि इस उसूल के अनुसार जीने से मैं एक धूर्त मनुष्य बन जाऊँगा। इसका अर्थ था कि मैंने जिस उसूल "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" को इतने लंबे समय तक अपनाया था, वह सत्य के अनुरूप नहीं था और वह परमेश्वर के वचन के सीधे विरोध में था। मुझे जान कर झटका लगा कि जीवन के जिस फ़लसफ़े का मैंने उतने समय तक समर्थन किया जितना में याद रख सकता था, वह परमेश्वर के वचनों द्वारा रातभर में गिरा और नकार दिया गया प्रतीत हुआ था। हालाँकि, चीज़ें जिस तरह से थीं, उसमें मेरे पास तथ्यों को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैंने खुद को शांत किया, थोड़ा सोचा और फिर से उस उसूल का पुनर्मूल्यांकन किया जिसे मैंने इतने समय से सँभाला हुआ था। समय के साथ, परमेश्वर से प्रबुद्धता के कारण, मैंने इस वाक्यांश में नई समझ और ज्ञान हासिल किया था। सतही तौर पर, "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" पर्याप्त समझदार विचार और ज्यादातर लोगों की सही और गलत की धारणा के समान प्रतीत होता है। पहले-पहल तो इस विचार में कुछ भी गलत नहीं लगता है क्योंकि यह केवल ऐसा बताता है कि हमें दूसरों से अपनी रक्षा करनी चाहिए, लेकिन दूसरों को नुकसान पहुँचाना निर्दिष्ट नहीं करता है। इसके अलावा, इस उसूल के अनुसार जीकर हम फन्दों में फँसने से बच सकते हैं, जबकि साथ ही यह भी सीख सकते हैं कि अच्छा इंसान कैसे बना जाए। हालाँकि, जब हम निकटता से इस वाक्यांश की जाँच करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह असल में विशेष रूप से एक कपटी तरीका है, जिसके द्वारा शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है। यह वाक्यांश चुपचाप हमसे कह रहा है कि तुम किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकते हो, कि कोई भी तुम्हें नुकसान पहुँचाने में समर्थ है, इसलिए दूसरों से अपने व्यवहार में, कभी भी सब कुछ दाँव पर मत लगाओ। इस तरह से, मैं तुमसे बचाव करता हूँ, तुम मुझ पर संदेह करते हो और हममें से कोई भी एक-दूसरे पर वाकई विश्वास नहीं करता है। यह हमें गलतफहमियों, दुश्मनी, और षड्यंत्रकारी के एक मार्ग में ले जाता है, जिस वजह से मानव जाति ज्यादा से ज्यादा भ्रष्ट, विश्वासघाती, धूर्त और कपटी हो जाती है। इससे भी बुरा, शैतान की इस सूक्ति की वजह से हम अपने प्यारे और दयालु परमेश्वर का सामना करने में भी सतर्क, संदेही और शंकालु बन जाते हैं। हम सोचने लगते हैं कि, परमेश्वर भी, अधर्मी, धूर्त और चालाकियों से भरा हुआ है—कि परमेश्वर हमारे सर्वोत्तम हित में कार्य नहीं कर रहा है। परिणाम स्वरूप, परमेश्वर हमें चाहे कितना भी प्यार और हमारी कितनी भी परवाह क्यों न करे, हम उसमें अपनी निष्ठा रखने के अनिच्छु रहते हैं, और यहाँ तक कि वह हमारे लिए जिस हद तक जाता है, उसकी भी प्रशंसा करने की हमारी कम संभावना है। इसके बजाय, हम एक अधर्मी दिल से उसके हर किए पर सवाल करते हैं, अपनी ग़लतफ़हमियों, अपने अविश्वासों, अपनी अनिष्ठा और अपने विरोध को उस पर थोपते हैं। इस तरह से, शैतान मानवजाति को भ्रष्ट और विषाक्त करने और हमें परमेश्वर से विमुख करने और उसके साथ विश्वासघात करवाने के अपने लक्ष्य को पूरा करता है। हालाँकि, मुझमें परिज्ञान का अभाव था और मैं शैतान की दुष्ट साज़िश की वास्तविक प्रकृति को समझने में असमर्थ था। मैंने सम्मान और समर्थन लेने हेतु एक दृढ़ जीवन के फ़लसफ़े के लिए इसके धोखे को अपना लिया और बाद में उत्तरोत्तर धूर्त, सवाली और सतर्क बन गया। परमेश्वर के पक्ष में खड़े होने, और चीजों को सकारात्मक नज़रिए से देखने के बजाय, मैं जिस भी परिस्थिति का सामना करता था, उसमें मैं हमेशा ही अपनी अधर्मी सोच का उपयोग करता था। मैंने परमेश्वर को ग़लत समझा और उसके इरादे पर सवाल उठाया। अंतत:, जैसे-जैसे परमेश्वर के बारे में मेरी ग़लतफ़हमी ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट होती गई, मैं पवित्र आत्मा के कार्य का साथ संपर्क को गँवाता गया और अंधकार में गिर गया। जैसा कि यह अब स्पष्ट है, कि "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" वाक्यांश मानवजाति को भ्रष्ट करने और उसे फन्दे में लेने के लिए शैतान द्वारा रचे गए धोखे से अधिक कुछ नहीं है। इस तथाकथित उसूल के अनुसार जीने से लोग केवल ज्यादा से कपटी और धूर्त बनेंगे, और अन्य सभी पर अन्यायपूर्ण ढंग से सवाल उठाते और सतर्क रहते हुए परमेश्वर को गलत समझेंगे और उससे दूर हो जाएँगे। इस तरह का जीवन जीने से केवल परमेश्वर की घृणा ही मिलेगी और व्यक्ति पवित्र आत्मा के कार्य का संपर्क गँवा देगा और अंधकार में गिर जाएगा। अंत में, इस उसूल के अनुयायी अपनी खुद की बेईमानी के शिकार बन जाएँगे—और उनके उज्जवल भविष्य नष्ट हो जाएँगे। इस समय, मुझे अंतत: समझ में आ गया कि "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" वाक्यांश एक तर्कसंगत जीवन का फ़लसफ़ा नहीं है, बल्कि मानवजाति को छलने और यंत्रणा देने के लिए शैतान की एक नीचतापूर्ण साज़िश है। यह वाक्यांश मनुष्य को भ्रष्ट करने, उन्हें अपनी मानवता खोने और उन्हें परमेश्वर से भटकने या उसके साथ विश्वासघात करवाने में सक्षम एक घातक ज़हर की तरह था।

उसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचन का निम्नलिखित अंश देखा: "परमेश्वर के पास निष्ठा का सार है, और इसलिए उसके वचन पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है। यही कारण है कि क्यों परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार हैं। ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उस से ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना। … यदि तुममें बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाईयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सच्चाई का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन निवास करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाले के रूप काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, तथा गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व व्यय करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ये लोग वे हैं जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "तीन चेतावनियाँ" से)। परमेश्वर के वचन से, मैं यह जान गया कि परमेश्वर ईमानदारों को प्रेम करता है और आशीष देता है। केवल ईमानदार होकर ही व्यक्ति सही मार्ग में, परमेश्वर के इरादे के सामंजस्य में जीता है। इसलिए, केवल ईमानदार ही परमेश्वर का उद्धार पाने के योग्य है। मैं यह भी समझ गया कि एक ईमानदार व्यक्ति की तरह कैसे कार्य किया जाए: ईमानदार व्यक्ति सरलता से, स्पष्ट रूप से और किसी धोखे के बिना बोलता है—वह अप्रिय या शर्मनाक मुद्दों से बचे बिना स्पष्ट रूप से बोलता है। ईमानदार व्यक्ति दूसरों को धोखा नहीं देता है, वह लापरवाही से कार्य नहीं करता है और वह कभी भी परमेश्वर को धोखा नहीं देता है या उससे झूठ नहीं बोलता है। ईमानदार व्यक्ति का दिल ईमानदार और किसी भी अधर्म या विकृति से रहित होता है। बोलने या कार्य करने में, वे इरादों या गुप्त अभिप्रायों को मन में नहीं रखते हैं; वे अपने खुद के फायदे या अपने शरीर को संतुष्ट करने के लिए कार्य नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाय वे एक सच्चा व्यक्ति बनने के लिए कार्य करते हैं। ईमानदार व्यक्ति का दिल उदार होता है, उसकी आत्मा ईमानदार होती है, और वे परमेश्वर को अपना दिल और जीवन देने के इच्छुक होते हैं। वे बदले में कुछ नहीं माँगते हैं, बल्कि केवल परमेश्वर की इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रयासरत रहते हैं। केवल ऐसे लोग जिनमें ये लक्षण मौजूद होते हैं, उन्हें ही ईमानदार व्यक्ति, रोशनी में जीने वाले व्यक्ति कहा जा सकता है।

एक बार जब मैं एक ईमानदार व्यक्ति बनने से संबंधित सिद्धांतों को समझ गया, तो मैंने उन सिद्धांतों को अभ्यास लाने की कोशिश करनी शुरू कर दी। दूसरों के साथ अपने व्यवहार में, मैंने जागरुक रूप से धूर्त न होने, या पूर्वानुमान न लगाने और सतर्क न रहने की कोशिश करता था। जब मैं सफल होता था, तो मैं विशेष रूप से मुक्त और स्वतंत्र महसूस करता था; इस तरह से जीना काफी ज्यादा आरामदेह महसूस होता था। जब मैं अपने कर्तव्यों को करते हुए भ्रष्टता का प्रदर्शन करता था, तो मैं पूरी अग्रसक्रियता से तलाश करता था कि मेरी साझेदार बहन समागम में खुद को लेकर मेरी नई समझ को प्रकट करे और वह बहन ऐसा ही किया करती। इस प्रक्रिया के दौरान, हममें एक दूसरे के प्रति न केवल पूर्वाग्रह विकसित नहीं हुए, बल्कि हम असल में अपने समन्वय में भी ज्यादा सामंजस्यपूर्ण हो गए थे। जब मैं सभाओं के दौरान अपनी भ्रष्टता को प्रकट करने में परमेश्वर के वचन का उल्लेख करता था, तो मेरे भाई—बहन मुझे तुच्छ नहीं समझते थे जैसा कि मैं शुरू-शुरू में सोचता था, बल्कि वे मेरे वृत्तांत को परमेश्वर के प्रिय उद्धार के एक उदाहरण के रूप में लेते थे। अपने कर्तव्यों को पूरा करने में, जब मैं अपनी खुद की प्रतिष्ठा और हैसियत के लिए नहीं बल्कि परमेश्वर की इच्छाओं को पूरा करने के लिए कार्य करता था, तो मैं पवित्र आत्मा को मेरे माध्यम से कार्य करते हुए और मुझे मार्गदर्शन देते हुए महसूस करता था, ताकि मैं अपने कर्तव्यों को पूरा करने में परमेश्वर के प्रयोजन को देख सकूँ। परिणामस्वरूप, मैं अपने कर्तव्यों को पूरा करने में बहुत प्रभावी था। प्रार्थना में, मैं होश-हवाश से परमेश्वर के साथ अपने अन्तर्तम विचारों को साझा करने और आत्मा से बोलने की कोशिश करता था। मैंने पाया कि जब मैं ऐसा करता था, तो मैं उत्तरोत्तर परमेश्वर के निकट हो गया था और महसूस करता था कि परमेश्वर बहुत प्यारा है। स्वभाविक रूप से, परमेश्वर के बारे में मेरी जो भी पुरानी ग़लतफ़हमियाँ थीं, वे सब इस प्रक्रिया में गायब हो गईं। ईमानदारी से अभ्यास करने की इस प्रक्रिया के माध्यम से, मैंने अनुभव किया कि ईमानदार होने से व्यक्ति को कैसे रोशनी में जीना और परमेश्वर का आशीष मिलता है। एक ईमानदार व्यक्ति होना वाकई अर्थपूर्ण और मूल्यवान है!

एक ईमानदार व्यक्ति होने के फायदों का अनुभव करने में, मैं और भी स्पष्ट हो गया था कि शैतान की "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" सूक्ति मानवजाति को भ्रष्ट करती और पीड़ा पहुँचाती है। अगर व्यक्ति इस उसूल का समर्थन करता है, तो वह हमेशा ही अंधकार, भ्रष्टता और पीड़ा में जीता रहेगा। केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही, हम रोशनी में जी सकते हैं, पोषित हो सकते हैं और परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त कर सकते हैं। अब से, मैं एक नई शुरुआत करने और शैतान के इस "व्यक्ति को दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाला हृदय नहीं रखना चाहिए, लेकिन इतना सतर्क भी रहना चाहिए कि उसे नुकसान न पहुँचे" उसूल को त्यागने की शपथ लेता हूँ। अब से, ईमानदार ही वह मानक होगा जिसके अनुसार मैं जीऊँगा और मैं अपनी ईमानदारी से परमेश्वर को हर्षित करने का प्रयास करूँगा।

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