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31. मैं मसीह को देखने के योग्य नहीं हूं

हुआनबाओ डैलिआन सिटी, लिआओनिंग प्रदेश

जब से मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया है, तब से मैंने उन भाइयों और बहनों की सराहना की है जो मसीह का वैयक्तिक प्रबंध हासिल कर सकते हैं, जो अपने कानों से उसके धर्मोपदेशों को सुन सकते हैं। अपने दिल में, मैंने सोचा कि अगर मैं भविष्य में एक दिन मसीह के धर्मोपदेशों को सुन सकूं तो यह कितना उत्तम होगा, बिल्कुल उसे देखना और भी ज्यादा उत्तम होगा। लेकिन बाद में, उसकी सहभागिता को सुनकर, मुझे मेरे दिल की गहराई से यह महसूस होने लगा है कि मैं मसीह को देखने के योग्य नहीं हूं।

इसी दौरान जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप किताब 1—3 जारी की गई। जब मैंने पहली किताब को सुना, तो मुझे लगा कि पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किए गए मनुष्य ने बहुत अच्छा कहा है। जब मैंने दूसरी किताब पर एक बहन की सहभागिता को सुना (इससे पहले मुझे किसी ने नहीं बताया कि ये मसीह की सहभागिता थी), तो मैंने सोचा कि यह बहन पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किए गए मनुष्य के अंदर एक अगुआ बस है, और जब उसने खासतौर पर ज्ञान को देखने के तरीके की समस्या के बारे में सहभागिता की, तो मुझे अपने भाइयों और बहनों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया देखने को नहीं​ मिली, तो मैं निश्चित हो गया कि मैं सही था, और चूंकि मैं यह सोचने लगा था कि यह बहन पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किए गए मनुष्य जितना अच्छी नहीं बोलती हैं, इसलिए मैं ध्यान से नहीं सुनता था। तीसरी किताब को सुनने के बाद, पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किए गए मनुष्य की सहभागिता के बाद, मैंने उसी बहन को यह कहते हुए सुना, “भाई की बिल्कुल अभी की सहभागिता के बारे में…,” और मैं और भी ज्यादा सुनिश्चित हो गया कि यह पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किए गए मनुष्य के अंदर एक अगुआ है, क्योंकि हमारी दुनिया में, अगुआ हमेशा सबसे पहले बोलते हैं, और उनके अधीनस्थ उसके बाद बोलते हैं। तो मैंने स्पीकर को बंद किया, और सोचने लगा, “बाद में जब मेरे पास समय होगा, तब मैं यह सुन लूंगा।” जिस दिन मैंने जाना कि वह बहन असल में मसीह थी तो मैं अचंभित रह गया, और अंतत: मैंने उस धर्मोपदेश के प्रत्येक वचन को गंभीरता से सुना।

इसके बाद, मैंने विचार करना शुरू किया: मैं खुद मसीह की सहभागिता सुनने के लिए इतना लालायित क्यों था, फिर भी जब उसने अंतत: हमसे बात की, तो मैं इसे पहचान नहीं पाया? मैंने अपनी उपस्थिति के विषय में परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना शुरू कर दिया, और देखा कि परमेश्वर ने कहा था कि, “सभी मनुष्य यीशु के सच्चे रूप को देखने और उसके साथ रहने की इच्छा करते हैं। मैं विश्वास करता हूँ कि भाईयों या बहनों में से एक भी ऐसा नहीं है जो कहेगा कि वह यीशु को देखने या उसके साथ रहने की इच्छा नहीं करता है। यीशु को देखने से पहले, अर्थात्, इस से पहले कि तुम लोग देहधारी परमेश्वर को देखो, तुमतुम्हारे भीतर अनेक विचार होंगे, उदाहरण के लिए, यीशु के रूप के बारे में, उसके बोलने का तरीका, उसके जीवन का तरीका, और इत्यादि। तथापि, जब तुम सब वास्तव में उसे देखते हो, तुम्हारे विचार तेजी से बदल जाएँगे। ऐसा क्यों है? क्या तुम लोग जानना चाहते हो? जबकि मनुष्य के सोच विचारों को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता है, यह मनुष्य के लिए बहुत अधिक असहनीय है कि वह मसीह के सार में परिवर्तन करे। तुम लोग मसीह को अविनाशी, एक संत मानते हो, लेकिन कोई मसीह को दिव्य सार के साथ नश्वर नहीं मानता है। इसलिए, अनेक लोग जो दिन रात परमेश्वर को देखने की लालसा करते हैं वास्तव में परमेश्वर के शत्रु हैं और परमेश्वर के अननुरूप हैं। क्या यह मनुष्य की ओर से की गई ग़लती नहीं है? तुम लोग अभी भी यह सोचते हो कि तुम्हारा विश्वास और तुम्हारी निष्ठा ऐसी है कि तुम सब मसीह के रूप को देखने के योग्य हो, परन्तु मैं तुमसे गुहार करता हूँ कि तुम अपने आपको और वास्तविक चीज़ों से सन्नद्ध कर लो! क्योंकि भूतकाल, वर्तमान, और भविष्य में बहुतेरे जो मसीह के सम्पर्क में आए वे असफल हो गए हैं और असफल हो जाएँगे; वे सभी फरीसियों की भूमिका निभाते हैं। तुम लोगों की असफलता का कारण क्या है? इसका सटीक कारण यह है कि तुम्हारे विचार में एक उदात्त, प्रशंसनीय परमेश्वर है। परन्तु सत्य ऐसा नहीं जिसकी मनुष्य कामना करता है। न केवल मसीह उदात्त नहीं है, बल्कि वह विषेश रूप से छोटा है; वह न केवल मनुष्य है बल्कि एक सामान्य मनुष्य है; … और इसलिए लोग उस के साथ सामान्य मनुष्य जैसा व्यवहार करते हैं; जब वे उसके साथ होते हैं तो जैसा उनको अच्छा लगे वैसा करते हैं, और उसके साथ लापरवाही से बोलते हैं, … जो मसीह पहले ही आ चुका है उसे तुम लोग ऐसा समझते हो कि वह एक साधारण मनुष्य है और उसके वचन को भी साधारण इंसान के वचन मानते हो। इसलिए, तुमने मसीह से कुछ भी प्राप्त नहीं किया है और उसके बजाए प्रकाश में अपनी कुरूपता को पूरी तरह प्रकट कर दिया है।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं” से) परमेश्वर के वचनों से तुलना की, और फिर मैंने सोचा कि अंतत: मसीह की सहभागिता सुनने पर किस तरह से मेरा खुद का भ्रष्ट स्वभाव जाहिर हुआ था। मैं अपने खुद के कानों से मसीह के धर्मोपदेश और सहभागिता सुनने की इच्छा की थी, फिर भी जब मैंने अंतत: मसीह की सहभागिता सुनी, तो मैंने उसकी परवाह नहीं की। मैं मसीह को बस एक आम मनुष्य की तरह देखता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं मसीह के सार को नहीं समझता था, यह बिल्कुल नहीं समझता था कि मसीह विनम्र और छिपा हुआ रहता है, और मसीह के बारे में मेरे कई सारे विचार और धारणाएं थी। मैं सोचा था कि, मसीह की सहभागिता केवल उन भाइयों और बहनों तक सीमित होगी जो तुरंत उसके पास पहुंच सकते हैं, जिसमें दूसरों को अपने कानों से उसकी सहभागिता सुनने की अनुमति नहीं होगी; मैंने सोचा था कि, मसीह की सहभागिता मसीह द्वारा सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान प्रकट करने के साथ होगी; मैंने सोचा था कि, मसीह की सहभागिता को निश्चित रूप से दूसरों से अलग आवाज और कहावतों के सभ्य लहजे में कहा जाएगा, किसी असाधारण मनुष्य की तरह; मैंने सोचा था कि, मसीह की सहभागिता को मेरे भाइयों और बहनों की उत्साहजनक, जोशपूर्ण सराहना मिलेगी; और यदि यह पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किया मनुष्य और मसीह एक के बाद एक बोल रहे हैं, तो मसीह सबसे पहले बोलेगा, और पवित्र आत्मा द्वारा प्रयोग किया गया मनुष्य अंत में बोलेगा...। मैंने मसीह के कार्य और वचनों को अपनी कल्पनाओं की सीमाओं में सीमित कर दिया था, क्योंकि मैं मसीह की कल्पना एक निश्चित तरीके से करता था। जब तथ्य, उन्हें लेकर की गई मेरी कल्पना के विपरीत होते थे, तो मैं मसीह को एक साधारण व्यक्ति के रूप में मानता था और मसीह के वचनों को एक साधारण व्यक्ति की कही गई बातें मानता था, जबकि अन्य ने इस सहभागिता से काफी कुछ हासिल किया था, लेकिन मैंने कुछ भी नहीं पाया था, और इसके स्थान पर मैंने पूरी तरह से अपने खुद की अहंकारी, दंभी, सत्य की उपेक्षा करने वाली, शैतानी प्रकृति को उजागर किया, और खुद को वह बना लिया जो मसीह को अस्वीकार करता और उसका विरोध करता है।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन देखें: “तुम सब हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं ज़ोर देकर तुम सबसे गुहार करता हूँ कि तुम अपने आपको इस तरह ऊँचा न उठाओ; हर कोई मसीह को देख सकता है, परन्तु मैं यह कहता हूँ कि कोई मसीह को देखने के लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बुराई, अहंकार और विद्रोह से भरा हुआ है, जब तुम मसीह को देखते हो, तुम्हारा स्वभाव तुम्हें बर्बाद करेगा और तुम्हें मृत्युदंड देगा।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं” से) “म लोग सच का सामना करने में गम्भीर नहीं हो, उससे भी कम सच के लिए तीव्र इच्छा रखते हो। तुम लोग केवल आँख बंद करके अध्ययन करते हो और उदासीनतापूर्वक रूप से प्रतीक्षा करते हो। तुम लोग इस तरह पढ़कर और प्रतीक्षा करके क्या प्राप्त कर सकते हो? क्या तुम लोग परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन पा सकते हो? यदि तू परमेश्वर के कथनों को ही नहीं पहचान सकता है, तो तू परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य कैसे हो सकता है? … केवल वे ही लोग, जो सत्य को स्वीकार कर सकते हैं परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं, और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के प्रकट होने को देखने के योग्य हैं।” (“वचन देह में प्रकट होता है” से “परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है” से) परमेश्वर ने मुझे यह समझाया कि मैं परमेश्वर की आवाज को नहीं पहचान पाया क्योंकि मैंने बहुत ज्यादा अहंकारी, बहुत विद्रोही, और बहुत दंभी था, ध्यानपूर्वक सुनने से बहुत जल्दी बहक जाता था और, स्थान और ओहदे वाले लोगों के साथ सहमत हो जाता था, जबकि उन लोगों को नीचा दिखाता था जिनके पास कोई स्थान या ओहदा नहीं है, इतना ज्यादा कि अगर वे सत्य भी कहेंगे तो मैं उसे नहीं सुनूंगा। जब मैं सहभागिता सुनता था, तो मेरा ध्यान सत्य पर नहीं होता था और सत्य हासिल करने की मेरी इच्छा भी नहीं थी, और इसके स्थान पर मेरे दिमाग विचार और जांच—पड़ताल पर लगा होता था। मैंने अहंकार और अक्खड़पन, धारणाएं और कल्पना के अलावा कुछ भी प्रकट नहीं किया था। मेरे जैसा अहंकारी, अक्खड़, और सत्य को अस्वीकार करने वाला, मेरे जैसा कोई जिसकी धर्मनिष्ठा सत्य में नहीं है या जो सत्य के लिए लालायित नहीं है, मैं कैसे परमेश्वर की आवाज को सुन और जान सकता हूं? मैं परमेश्वर को देखने के योग्य कैसे हो सकता हूं?

इस प्रकाशन के माध्यम से, मैं अंतत: समझ गया कि भले ही मैं मसीह को देखना चाहता था, लेकिन मैं मसीह को देखकर अयोग्य था क्योंकि मुझमें शैतान का भ्रष्टाचार बहुत गहरा है, मैं प्रकृति से अभिमानी और विद्रोही हूं, मुझमें कोई सत्य और सत्य का कोई प्रेम नहीं है। मैं मसीह के सार को नहीं समझता हूं, मैं अनावश्यक पूर्वाग्रहों के साथ न्याय करता हूं, मेरी बहुत अधिक धारणाएं और विचार हैं, और अभी भी अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास करता हूं, जो एक शक्तिशाली और भावपूर्ण आकृति का एक चित्र है। और जब मैं सचमुच मसीह देखता हूं, तो मेरी धारणाएं जड़ हो सकती है और मेरे घमण्ड किसी भी समय फूट सकता है, मेरी अपनी विद्रोही प्रकृति जिससे मुझे बर्बाद कर सकती है। अब मुझे सत्य से सुसज्जित होना चाहिए, परमेश्वर के वचनों में अपनी भ्रष्ट प्रकृति और मसीह के सार को समझना चाहिए, और ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जो मसीह को समझता और पूजा करता हो।

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