सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया का ऐप

परमेश्वर की आवाज़ सुनें और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करें!

सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

मेमने ने पुस्तक को खोला

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

"विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से एक संकलन

1. मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती है कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करना भी समाप्त कर दिया है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, यहोवा का प्रताप और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस प्रताप और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया और उसका सम्मान करना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण प्रताप को पुनः प्राप्त करने, और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृष्ट वस्तुओं में साक्ष्य हो। कार्य के इस पड़ाव में यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए यह वचनों के इस कार्य का प्रयोग कया जायेगा; उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, न्याय, ताड़ना, निर्दयी श्राप और प्रकटीकरण का प्रयोग किया जायेगा; और मनुष्य के विद्रोहीपन को ज़ाहिर करने और उसके विरोध का न्याय करने के द्वारा किया जाएगा; जिससे वह मानवता की अधार्मिकता और अशुद्धता को जान सके, जिसका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विशिष्टता दर्शाने के लिए किया जाएगा। मुख्यतः, यह उन वचनों का प्रयोग होगा, जो मनुष्य को जीतते और उसे पूर्णत: कायल करते हैं। शब्द मनुष्यजाति को अन्तिम रूप से जीत लेने के साधन हैं, और वे सभी जो इस जीत लिए जाने को स्वीकार करते हैं, उन्हें इन वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना आवश्यक है। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की प्रक्रिया है। लोगों को किस प्रकार उपयुक्त सहयोग देना चाहिए? इन वचनों को प्रभावशाली रीति से खाने और पीने से और उन्हें समझने के द्वारा। लोगों को उन्हीं के द्वारा जीता नहीं जा सकता। तुम्‍हें इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अधार्मिकता को जानना है, और परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो जाना है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो और इसे अभ्यास में ला सकते हो, और आगे, दर्शन प्राप्त कर सकते हो, और यदि तुम इन वचनों का पूरी तरह से पालन कर सकते और अपनी ओर से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम्हें जीत लिया जाएगा। और ये वह शब्द होंगे, जिन्होंने तुम्हें जीता है। मनुष्यजाति ने वह साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि कोई भी अब परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता और परमेश्वर को अपने हृदय में कदाप नही रखता। मनुष्यजाति को जीतने का अर्थ लोगों में इस विश्वास को पुनर्स्थापित करना है। लोगों का ध्यान सर्वदा संसार, अनेक आशाएँ रखने, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहने और अनेक अनावश्यक मांग करने की ओर रहता है। वे सर्वदा अपने शरीर के विषय में सोचते और योजना बनाते रहते हैं और कभी परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग की खोज में रुचि नहीं रखते हैं। उनके हृदयों को शैतान के द्वारा कब्ज़े में कर लिया गया है, उन्होंने परमेश्वर के लिए अपने सम्मान को खो दिया है, और वे अपना हृदय शैतान को समर्पित कर रहे हैं। परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर के द्वारा की गई थी। मनुष्य परमेश्वर के साक्ष्य को खो चुका है, अर्थात वह परमेश्वर के प्रताप को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के सम्मान के प्रताप को पुनः प्राप्त करना है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से

2. वर्तमान जीतने वाला कार्य यह स्पष्ट करने के लिए अभीष्ट है, कि मनुष्य का अन्त क्या होगा। मैं क्यों कहता हूँ कि आज की ताड़ना और न्याय अन्तिम दिनों के श्वेत सिंहासन के सामने का महान न्याय है? क्या तुम यह नहीं देखते हो? जीतने वाला कार्य अन्तिम चरण क्यों है? क्या यह निश्चित रूप से वह प्रकट करने के लिए नहीं है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का अन्त कैसे होगा? क्या यह प्रत्येक व्यक्ति को, ताड़ना और न्याय के जीतने वाले कार्य के मार्ग में, अपना वास्तविक स्वभाव दिखाने और उसके पश्चात उसी स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत किया जाने के लिए नहीं है। यह कहने की बजाय, कि यह मनुष्यजाति को जीतना है, यह कहना बेहतर होगा कि यह उस बात को दर्शाना है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग का अन्त कैसे होगा। अर्थात, यह उनके पापों का न्याय करना और फिर मनुष्यों के विभिन्न वर्गों को प्रदर्शित करना और इस प्रकार निर्णय करना कि वे दुष्ट हैं या धर्मी। जीतने वाले कार्य के पश्चात धर्मी को प्रतिफल देने और दुष्ट को दण्ड देने का कार्य आता है: वे लोग जो पूर्णत: आज्ञापालन करते हैं अर्थात जो पूर्ण रूप से जीत लिए गए हैं, उन्हें सम्पूर्ण आकाशमण्डल में कार्य को फैलाने के अगले चरण में रखा जाएगा; जिन्हें जीता नहीं जा सका उन को अन्धकार में रखा जाएगा और उनकी भेंट महाविपत्ति से होगी, इस प्रकार मनुष्य को उसके स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, दुष्कर्म करने वालों को फिर कभी सूर्य का प्रकाश पुनः न देखने के लिए दुष्टों के साथ रखा जाएगा, और धर्मियों को ज्योति प्राप्त करने और सर्वदा ज्योति में रहने के लिए भले लोगों के साथ रखा जाएगा। सभी बातों का अन्त निकट है, मनुष्य का अन्त उसकी दृष्टि में स्पष्ट रीति से दिखा दिया गया है, और सभी वस्तुओं का वर्गीकरण उनके स्वभाव के अनुसार किया जाएगा। तब लोग इस प्रकार वर्गीकरण किए जाने में पीड़ा से किस प्रकार बच सकते हैं। जब सभी बातों का अन्त निकट हो तो मनुष्य के प्रत्येक वर्ग के अन्त को प्रकट कर दिया जाता है, और यह सम्पूर्ण आकाशमण्डल (इसमें समस्त जीतने वाला कार्य सम्मिलित है जो वर्तमान कार्य से आरम्भ होता है) को जीतने के कार्य के दौरान पूर्ण किया जाता है। समस्त मनुष्यजाति के अन्त का प्रकटीकरण, न्याय के सिंहासन के सामने, ताड़ना देने में और अन्तिम दिनों के जीतने वाले कार्य में किया जाता है। लोगों को उनके स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत करना, उन्हें उनके वास्तविक वर्ग में लौटाना नहीं है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि संसार की रचना के समय जब मनुष्य को बनाया गया था, तब वहाँ एक ही वर्ग के मनुष्य थे, पुरुष और स्त्री। वहाँ विभिन्न प्रकार के अनेक वर्ग नहीं थे। यह हज़ारों वर्षों की भ्रष्टता के पश्चात ही हुआ, कि मनुष्य के अनेक वर्ग उत्त्पन्न हुए, कुछ अशुद्ध दुष्टात्माओं के अधीन आते हैं, और कुछ, जो जीवन के मार्ग को खोजते हैं, सर्वशक्तिमान के अधीन आते हैं। इसी रीति से धीरे-धीरे लोगों के मध्य वर्ग अस्तित्व में आते हैं और लोग मनुष्य के विस्तृत परिवारों में से वर्गों में विभाजित होते हैं समस्त लोग विभिन्न "पिता" को स्वीकार करते हैं; ऐसा नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति सर्वशक्तिमान के अधिकार के पूर्णत: अधीन आता है, क्योंकि लोगों का विद्रोहीपन बहुत अधिक है। धर्मी न्याय प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को प्रकट करता है, और कुछ भी छिपा रहने नहीं देता है। ज्योति में प्रत्येक व्यक्ति अपना वास्तविक मुखमण्डल दिखाता है। इस बिन्दु पर, मनुष्य वैसा नहीं है जैसा वह वास्तविक रूप में था और उसके पूर्वजों की वास्तविक समानता बहुत पहले ही अन्तर्धान ह चुकी है, क्योंकि आदम और हव्वा के अनगिनत वंशज बहुत पहले से स्वर्ग-सूर्य को पुनः कभी न जानने के लिए शैतान के द्वारा वश में कर लिए गए हैं, और लोग हर प्रकार से शैतान के विष से भर दिए गए हैं। इसीलिए, लोगों के लिए उनकी उपयुक्त मंजिलें हैं। और तो और, उनके विभिन्न प्रकार के विषों पर आधार पर उन्हें उनके स्वभाव के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है, अर्थात आज उन्हे जिस हद तक जीता गया है उसके अनुसार अलग-अलग किया जाता है। मनुष्य का अन्त कुछ ऐसा नहीं है, जिसे संसार की सृष्टि से ही पूर्वनिर्धारित कर दिया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहले मात्र एक ही वर्ग था, जिसे सामूहिक रूप से "मनुष्यजाति" पुकारा जाता था, और मनुष्य पहले शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया था, और वे सभी परमेश्वर की ज्योति में जीवनयापन करते थे, और उन पर किसी भी प्रकार का अन्धकार नहीं था। परन्तु बाद में जब मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया, सभी प्रकार और स्वभाव के लोग सम्पूर्ण पृथ्वी पर फैल गए-सभी प्रकार और स्वभाव के लोग, जो उस परिवार से आए थे, जिसे सामूहिक रूप से "मनुष्यजाति" कहा जाता था, जो पुरुष और स्त्री से बनी थी। अपने सबसे पुराने पूर्वज—मनुष्यजाति, जो पुरुष और स्त्री से बनी थी (अर्थात मूल आदम और हव्वा, जो उनके सबसे पुराने पूर्वज थे) से भटकने के लिए उन सभी का मार्गदर्शन उनके पूर्वजों के द्वारा किया गया था। उस समय, एकमात्र लोग, जिनका मार्गदर्शन पृथ्वी पर जीवनयापन के लिए यहोवा के द्वारा किया जा रहा था, वे इस्राएली लोग थे। विभिन्न प्रकार के लोग, जो सम्पूर्ण इस्राएल (अर्थात वास्तविक पारिवारिक कुल से) से अस्तित्व में आए थे, बाद में उन्होंने यहोवा की अगुवाई को खो दिया। ये आरम्भिक लोग, जो मानव संसार के मामलों से पूरी तरह से अनभिज्ञ थे, वे उन क्षेत्रों में रहने के लिए अपने पूर्वजों के साथ हो लिए, जिन क्षेत्रों पर उन्होंने अधिकार किया, और आज तक वे ऐसा ही कर रहे हैं। इस प्रकार वे इस विषय में अभी भी अन्धकार में ही हैं, कि वे यहोवा से कैसे भटक गए और आज तक अशुद्ध प्रेतों और दुष्टात्माओं के द्वारा किस प्रकार भ्रष्ट किए गए हैं। वे जो अब तक अत्यधिक भ्रष्ट और विष से भरे गए हैं, अर्थात वे जिन्हें अन्तत: बचाया नहीं जा सकता, उनके पास अपने पूर्वजों के साथ-उन अशुद्ध प्रेतों के साथ, जिन्होंने उन्हें भ्रष्ट किया, जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होगा। वे लोग जिन्हें अन्तत: बचाया जा सकता है, वे मनुष्यजाति की उपयुक्त मंजिल पर पहुँच जाएँगे, अर्थात उस अन्त पर, जो बचाए गए और जीते गए लोगों के लिए संरक्षित रखा गया है। उन सभी को बचाने के लिए सब कुछ किया जाएगा, जिन्हें बचाया जा सकता है, परन्तु उन असम्वेदनशील, असाध्य लोगों के लिए उनका एकमात्र विकल्प अपने पूर्वजों के पीछे-पीछे ताड़ना के अथाह गड्ढ़े में जाना होगा। यह विचार न करो कि तुम्हारा अन्त, आरम्भ में ही पूर्वनिर्धारित कर दिया गया था और इसे अब प्रकट किया गया है। यदि तुम इस प्रकार विचार करते हो, तब क तुम भूल गए हो कि मनुष्य की आरम्भिक रचना के दौरान, किसी भी अलग शैतानी वर्ग की रचना नहीं की गई थी? क्या तुम भूल चुके हो कि आदम और हव्वा से मात्र एक ही मनुष्यजाति को रचा गया था (अर्थात मात्र पुरुष और स्त्री ही बनाए गए थे)? यदि तुम आरम्भ में ही शैतान के वंशज होते, तो क्या उसका अर्थ यह न होता कि जब यहोवा ने मनुष्य की रचना की, तब उसने एक शैतानी समूह को भी सम्मिलित किया? क्या वह ऐसा कुछ कर सकता था? उसने मनुष्य को अपने साक्ष्य के लिए बनाया; उसने मनुष्य को अपनी महिमा के लिए रचा। उसने जानबूझ कर अपने विरोध के लिए शैतान की सन्तान के एक वर्ग को स्वेच्छा से क्यों बनाया होता? क्या यहोवा यह कर सकता था? यदि हाँ, तो कौन यह कहने के योग्य होता कि वह एक धर्मी परमेश्वर है? यदि मैं अभी यह कहता हूँ कि तुम सब में से कुछ लोग अन्त में शैतान के साथ जाएँगे, इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम आरम्भ से ही शैतान के साथ थे; अपितु इसका अर्थ यह है कि तुम इतना गिर चुके हो, कि परमेश्वर तुम्हें बचाने का प्रयास किया है, तब भी तुम वह उद्धार पाने में असफल हो गए हो। तब तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत किए जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि तुम बचाए जाने योग्य नहीं हो, इसका कारण यह नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे प्रति अधर्मी है, अर्थात ऐसा नहीं है कि परमेश्वर ने स्वेच्छा से तुम्हारी नियति को शैतान की एक अभिव्यक्ति के रूप में रख दिया है, और फिर तुम्हें शैतान के साथ वर्गीकृत कर देता है और जानबूझ कर तुम्हें पीड़ित करना चाहता है। यह विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य नहीं है। यदि यही वह बात है जिस पर तुम विश्वास करते हो, तब तुम्हारी सोच बहुत ही एक पक्षीय है! जीते जाने के अन्तिम चरण का उद्देश्य लोगों को बचाना और लोगों के अन्त को भी प्रकट करना है। यह न्याय के द्वारा लोगों की विकृति को भी प्रकट करना है और इस प्रकार उन्हें पश्चाताप करवाना, उन्हें ऊपर उठाना और जीवन और मानवीय जीवन के सही मार्ग की खोज करवाना है। यह सुन्न और मन्दबुद्धि लोगों के हृदयों को जगाना और न्याय के द्वारा उनके भीतरी विद्रोहीपन को प्रदर्शित करना है। परन्तु, यदि लोग अभी भी पश्चाताप करने के लिए अयोग्य हैं, अभी भी मानवजीवन के सही मार्ग को खोजने में असमर्थ हैं और अपनी भ्रष्टताओं को उतार फेंकने में अयोग्य हैं, तब वे शैतान द्वारा निगल लिए जाने के लिए बचाई न जा सकने योग्य वस्तुएँ बन जाएँगे। लोगों को बचाना और उनका अन्त भी दिखाना-यह बचाए जाने की महत्त्वपूर्णता है। अच्छे अन्त, बुरे अन्त-वे सभी जीतने वाले कार्य के द्वारा प्रकट किए जाते हैं। लोग बचाए जाएँगे या शापित होंगे, यह सब जीतने वाले कार्य के दौरान प्रकट किया जाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से

3. जब मूसा ने चट्टान पर मारा, तो यहोवा द्वारा उण्डेला पानी फूट पड़ा, यह उसके विश्वास के कारण था। जब आनंद से भरे दिल के साथ दाऊद ने मेरी, यहोवा की स्तुति में वीणा बजायी, यह उसके विश्वास के कारण था। जब अय्यूब ने अपना पशुधन खो दिया जो पर्वतों को भर देते थे, और अकूत धन-सम्पत्ति खो दी, और उसका शरीर फफोलों से भर गया, यह उसके विश्वास के कारण था। जब वह मेरे, यहोवा के स्वर को सुन और मेरे, यहोवा, के प्रताप को देख सका, यह उसके विश्वास के कारण था। कि पतरस यीशु मसीह का अनुगमन कर सका, यह उसके विश्वास के कारण था। कि वह मेरे वास्ते क्रूस पर कीलों से ठोंका जा सका और प्रभावशाली साक्ष्य दे सका, यह उसके विश्वास के कारण था। जब यूहन्ना ने मनुष्य के पुत्र के महिमामय स्वरूप को देखा, यह उसके विश्वास के द्वारा था। जब उसने अन्तिम दिनों के दर्शन को देखा, यह पूर्ण रूप से उसके विश्वास के कारण था। तथाकथित बहुतेरे गैरयहूदी राष्ट्रों द्वारा मेरे प्रकाशन को प्राप्त करने का और मैं मनुष्य के मध्य अपना कार्य करने के लिए देह में लौट चुका हूँ, यह जानने का कारण भी उनका विश्वास ही है। वे सभी, जो मेरे कड़े वचनों के द्वारा दण्डित किए गये और फिर भी उससे सांत्वना पायी और जो बचाए गए, क्या उन्होंने ऐसा अपने विश्वास के कारण नहीं किया? लोग विश्वास के द्वारा अनेक वस्तुएँ प्राप्त कर चुके हैं। वे जो प्राप्त करते हैं, सर्वदा आशीष नहीं होती है-उस प्रकार की प्रसन्नता और आनन्द को अनुभव करना, जो दाऊद ने अनुभव किया था, या यहोवा के द्वारा उण्डेला गया पानी प्राप्त करना, जैसा मूसा ने किया था। उदाहरण के लिए, अय्यूब की घटना में, विश्वास के द्वारा उसे यहोवा की आशीष के साथ-साथ एक महामारी भी प्राप्त हुई थी। चाहे तुम्हें एक आशीष प्राप्त हो या तुम एक महामारी से पीड़ित हो, दोनों ही आशीषमय अवसर हैं। विश्वास के बिना, तुम यह जीतने वाला कार्य प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगे, आज अपनी दृष्टि के समक्ष यहोवा के कार्य देख पाना तो दूर की बात है। तुम देखने के योग्य नहीं होगे, और उससे भी कम प्राप्त करने के योग्य होगे। ये महामारियाँ, ये आपदाएँ, और ये समस्त न्यायदण्-यदि ये तुम पर न गिरते, क्या तुम आज यहोवा के कार्य देखने में समर्थ होते? यह विश्वास ही है, जो तुम्हें जीत लिए जाने देता है, और जीता जाना ही तुम्हें यहोवा के प्रत्येक कार्य पर विश्वास करने देता है। यह मात्र विश्वास के कारण ही है कि तुम इस प्रकार की ताड़ना और न्याय प्राप्त करते हो। इन ताड़नाओं और न्याय के द्वारा तुम जीत लिए और सिद्ध किए गए हो। आज, जिस प्रकार की ताड़ना और न्याय तुम प्राप्त कर रहे हो, उसके बिना तुम्हारा विश्वास व्यर्थ होगा, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते; इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम उसमें कितना विश्वास करते हो, तुम्हारा विश्वास फिर भी वास्तविकता म एक निराधार खाली अभिव्यक्ति ही होगी। यह उसके पश्चात ही है, जब तुम इस प्रकार के जीत लिए जाने के कार्य को प्राप्त करते हो, जो तुम्हें पूर्णत: आज्ञाकारी बनाता है, जिससे तुम्हारा विश्वास वास्तविक और विश्वसनीय बन जाता है और तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर फिर जाता है। चाहे तुम्हारा न्याय किया गया या तुम्हें शापित किया गया, यह एक अच्छी बात है, इस शब्द "विश्वास" के कारण तुम्हारा विश्वास वास्तविक है और तुम सबसे सच्ची, सबसे वास्तविक और सबसे बहुमूल्य वस्तु प्राप्त करते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्याय के इस मार्ग में ही तुम परमेश्वर की सृष्टि की अन्तिम मंजिल को देखते हो; इस न्याय में ही तुम देखते हो कि उस सृष्टिकर्ता से प्रेम करना है; इस प्रकार के जीत लिए जाने के कार्य में तुम परमेश्वर के हाथ को देखते हो; यह वह जीत लिया जाना ही है जिसमें तुम मानव जीवन को पूर्ण रीति से समझते हो; यह वह जीत लिया जाना ही है, जिसमें तुम मानवजीवन के सही मार्ग को प्राप्त करते हो, और "मनुष्य" के वास्तविक अर्थ को समझ जाते हो; मात्र इस जीत लिए जाने के कार्य में ही तुम सर्वशक्तिमान के धर्मी स्वभाव और उसके सुन्दर, महिमामय मुखमण्डल को देखते हो; इस जीत लिए जाने के कार्य में ही तुम मनुष्य की उत्पत्ति के विषय में सीखते और समस्त मनुष्यजाति के "अनश्वर इतिहास" को समझते हो; इस जीत लिए जाने के कार्य में तुम मनुष्यजाति के पूर्वजों और मनुष्यजाति के भ्रष्टाचार के उद्गम को पूर्ण रीति से समझते हो; इसी जीते जाने के कार्य में तुम आनन्द और आराम के साथ-साथ अनन्त ताड़ना, अनुशासन और उस मनुष्यजाति के लिए सृष्टिकर्त्ता की ओर से फटकार के शब्द प्राप्त करते हो, जिस मनुष्यजाति को उसने बनाया है; इसी जीते जाने वाले कार्य में तुम आशीष प्राप्त करते हो और तुम वे आपदाएँ प्राप्त करते हो, जो मनुष्य को प्राप्त होनी चाहिए...। क्या यह सब तुम्हारे थोड़े से विश्वास के कारण नहीं है? इन वस्तुओं को प्राप्त करने के पश्चात क्या तुम्हारा विश्वास बढ़ा नहीं है? क्या तुम ने बहुत अधिक मात्रा प्राप्त नहीं की है? तुम ने मात्र परमेश्वर के वचन को ही नहीं सुना और परमेश्वर की बुद्धि को ही नहीं देखा, अपितु तुम ने इस कार्य के प्रत्येक चरण को भी व्यक्तिगत रीति से अनुभव किया है। हो सकता है तुम कहोगे कि यदि तुम्हारे पास विश्वास नहीं होता, तो तुम इस प्रकार की ताड़ना और इस प्रकार के न्यायदण्ड से पीड़ित न होते। परन्तु तुम्हें जानना चाहिए कि बिना विश्वास, न केवल तुम इस प्रकार की ताड़ना और सर्वशक्तिमान से इस प्रकार की देखभाल प्राप्त करने में अयोग्य होते, अपितु तुम सृष्टिकर्ता को देखने के सुअवसर को भी सर्वदा के लिए खो देते। तुम मनुष्यजाति के उद्गम को कभी भी नहीं जान पाते और न ही मानवजीवन की महत्ता को कभी समझ पाते। चाहे तुम्हारे शरीर की मृत्यु हो जाती, और तुम्हारी आत्मा अलग हो जाती, फिर भी तुम सृष्टिकर्ता के समस्त कार्यों को नहीं समझ पाते। इससे भी कम तुम्हें इस बात का ज्ञान हो पाता कि मनुष्यजाति को बनाने के पश्चात सृष्टिकर्ता ने इस पृथ्वी पर कितने महान कार्य किए। उसके द्वारा बनाई गई इस मनुष्यजाति के एक सदस्य के रूप में, क्या तुम इस प्रकार बिना-सोचे समझे अन्धकार में गिरने और अनन्त दण्ड की पीड़ा उठाने के इच्छुक हो। यदि तुम स्वयं को आज की ताड़ना और न्यायदण्ड से अलग करते हो, तो वह क्या है, जो तुम्हें प्राप्त होगा? क्या तुम सोचते हो कि वर्तमान न्यायदण्ड से एक बार अलग हो कर, तुम इस कठिन जीवन से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या यह सत्य नहीं है कि यदि तुम "इस स्थान" को छोड़ते हो, तो जिस से तुम्हारा सामना होगा, वह शैतान के द्वारा दी जाने वाली पीड़ादायक यातना और क्रूर घाव हैं? तुम्हारा सामना असहनीय दिन और रात से हो सकता है? क्या तुम सोचते हो कि सिर्फ इसलिय कि आज तुम इस न्यायदण्ड से बच जाते हो, तो तुम भविष्य की उस यातना को सदा के लिए टाल सकते हो? वह क्या होगा जो तुम्हारे मार्ग में आएगा? क्या यह वास्तव में वही शांगरी-ला हो सकता है, जिसकी तुम आशा करते हो? क्या तुम सोचते हो कि वास्तविकता से तुम्हारे इस रीति से भागने के द्वारा तुम बाद में आने वाली उस अनन्त ताड़ना से बच सकते हो? आज के बाद, क्या तुम कभी इस प्रकार का सुअवसर और इस प्रकार की आशीष पुनः प्राप्त करने के योग्य हो पाओगे? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब घोर विपत्ति तुम पर आ पड़ेगी? क्या तुम उन्हें खोजने के योग्य होगे, जब सम्पूर्ण मनुष्यजाति विश्राम में प्रवेश करेगी? तुम्हारा वर्तमान प्रसन्न जीवन और तुम्हारा छोटा सा मिला-जुला परिवार-क्या वे तुम्हारी भविष्य की अनन्त मंजिल का प्रतिस्थापन कर सकते हैं? यदि तुम सच्चा विश्वास रखते हो, और तुम्हारे विश्वास के कारण यदि तुम्हें एक उत्तम सौदा प्राप्त होता है, तो यह वही सबकुछ है जो तुम्हें-एक सृष्ट प्राणी-को प्राप्त होना चाहिए और यही तुम्हें प्राप्त भी होना चाहिए था। इस रीति से जीता जाना तुम्हारे विश्वास और तुम्हारे जीवन के लिए अत्यन्त लाभकारी है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (1)" से

4. आज तुम्हें मालूम होना चाहिये कि तुम पर विजय कैसे हो, और लोग खुस पर विजय उपरांत अपना आचरण कैसा रखते हैं। तुम यह कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गयी है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रहोगे? संभावनाओं की परवाह किए बगैर तुम में पूरे अंत तक अनुसरण करने की क्षमता होनी चाहिए और तुम्हें किसी भी परिस्थितिवश परमेश्वर पर विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पक्ष प्राप्त करने हैं: अय्यूब की गवाही-मृत्यु तक आज्ञाकारिता और पतरस की गवाही—परमेश्वर का सर्वोच्च प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए, उसके पास कुछ भी सांसारिक संसाधन नहीं थे और शारीरिक पीड़ा से वह घिरा हुआ था, तब भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस ने मृत्यु तक परमेश्वर से प्रेम रखा। जब वह मरा—जब उस क्रूस पर चढ़ाया गया—तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपने हित या महिमामयी आशा की या अनावश्यक विचारों को स्थान नहीं दिया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्था को पूर्णतः मानने की ही इच्छा की। गवाही देने के लिए विचार किये जाने से पूर्व तुम्हें ऐसा स्तर हासिल करना होगा, इस से पहले कि तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओ जो विजय प्राप्त करने के बाद, पूर्ण बनाया गया है। आज लोग यदि अपने सार तत्व को और अपने स्तर को सचमुच जानते तो क्या वे तब भी संभावनाओं और आशा को खोजते? जो तुम्हें मालूम होना चाहिए वह यह है किः परमेश्वर मुझे पूर्ण करे या ना करे मैं परमेश्वर के पीछे चलूंगा, जो कुछ उसने अभी किया है, वह हमारे लिए किया है, और वह अच्छा है ताकि हमारा स्वभाव परिवर्तित हो और हम शैतान के चंगुल से छूट जाएं, यह कि, अपवित्र धरती पर रहने के बावजूद हम अशुद्धता से मुक्त हो जायें, गंदगी और शैतान के प्रभाव को झटक कर हम शैतान के प्रभाव को पीछे छोड़ने की क्षमता प्राप्त कर लें।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से

5. सचमुच, पूर्णता विजय के साथ ही प्रगट होती है, तुम्हारे विजयी होते ही, पूर्णता के प्रथम प्रभाव की भी प्राप्ति होती है। विजय पाने और पूर्णता पाने में अंतर लोगों में आए परिर्वतन पर आधारित होता है, विजय पाना पूर्णता पाने का प्रथम चरण है, परंतु यह साबित नहीं करता कि वे पूरी तरह पूर्ण बना दिए गए, ना ही यह साबित करता कि परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह हासिल कर लिया है। लोगों के विजयी होने के बाद, उनके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आते हैं परंतु ये परिवर्तन उन लोगों कि तुलना में बहुत कम है जिन्हें परमेश्वर ने ग्रहण कर लिए है। आज जो हो रहा है वह लोगों को पूर्ण बनाने का आरम्भिक कार्य है—उन पर विजय पाना—और अगर तुम पर विजय नहीं हो पाती है तो तुम्हारे पास पूर्ण होने और परमेश्वर द्वारा पूर्णतः ग्रहण किये जाने का कोई उपाय नहीं होगा। तुम सिर्फ ताड़ना और न्याय की कुछ बातें ही पाओगे, जो कि तुम्हारे पूरे हृदय के परिवर्तन में असमर्थ होगी। तो तुम उनमें से एक होगे जिन्हें त्याग दिया गया है, यह इस बात से अलग ना होगा कि मानो जैसे मेज पर स्वादिष्ट भोजन देखकर भी उसे खा नहीं सकें, क्या यह दुखदायी नहीं? और इसलिये तुम्हें बदलाव की खोजकरनी चाहिए, चाहे विजय पाने क चाहे पूर्ण बनाने को, दोनों का संबंध इस बात से है कि क्या तुममें बदलाव आये हैं या नहीं, तुम आज्ञाकारी हो या नहीं-और इससे यह निश्चित होगा कि क्या तुम परमेश्वर द्वारा ग्रहण किए जा सकते हो या नहीं। जान लो कि "विजय पाना" और "पूर्णता पाना" केवल तुम्हारे अंदर आए बदलाव और आज्ञाकारिता की हद पर निर्भर करता है। साथ ही इस पर कि तुम्हारा परमेश्वर के लिए प्रेम कितना सच्चा है। आज जिस बात की जरूरत है, वह यह है कि तुम पूरी तरह पूर्ण हो सकते हो, परंतु पहले तुम पर विजय पाना आवश्यक है, तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का पर्याप्त ज्ञान होना अनिवार्य है, अनुसरण करने का विश्वास होना चाहिए ऐसा बनना चाहिए जो बदलाव को खोजे ताकि प्रभाव को ग्रहण कर सके। तब तुम ऐसे होगे जो पूर्ण बनाये जाने की खोज करता है। तुम सबको यह समझना होगा कि पूर्ण किए जाने के दौरान य तुम लोगों को जीता जायेगा और जीते जाने के दौरान तुम सब पूर्ण होगे। आज, तुम पूर्ण होने का प्रयास कर सकते हो अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमताओं में विकास भी कर सकते हो, परंतु प्रमुख बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है वह सार्थक और लाभकारी हैः यह तुम्हें गंदगी की धरती पर जीने उस अपवित्रता से बाहर निकलने और उस गंदगी को झटकने की क्षमता प्रदान करता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने में और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने की क्षमता प्रदान करता है और इन बातों पर ध्यान देने से, तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक अपवित्र भूमि पर रहते हुए भी पवित्र बनने में समर्थ हो, और आगे फिर अपवित्र और अशुद्ध नहीं होगे, तुम शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेते हो, और शैतान द्वारा ग्रसित और सताए नहीं जाते, और तुम सर्वशक्तिमान के हाथों में रहते हो। यही गवाही है, और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, जो जीवन तुम जीते हो उसमें शैतान प्रकाशित नहीं होता, परंतु क्या यह वही है जो परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य इन्हें प्राप्त करे: सामान्य मानवता, सामान्य युक्तता, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर के प्रेम हेतु सामान्य संकल्पशीलता, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी मात्र की गवाही है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से

6. अंतिम समय के कार्य सारे नियम तोड़ते हैं, और यह मायने नहीं रखता कि तुम सजा पाए हुए हो या श्रापित हो, जब तक तुम मेरे कार्य में सहायक हो, और विजय के कार्य हेतु लाभकारी हो, और यह मायने नहीं रखता कि तुम मोआब के वंशज हो या बड़े लाल अजगर की संतान, जब तक तुम कार्य के इस चरण में परमेश्वर के प्राणी होने की जिम्मेदारी का निर्वाह करते हो और अपना सर्वोत्तम देते हो, तब ही निर्धारित प्रभाव प्राप्त होगा। तुम बड़े लाल अजगर की संतान और मोआब के वंशज हो; कुल मिलाकर, जो कोई लहू और मांस से बना है, वह परमेश्वर का प्राणी है, और उसे परमेश्वर ने ही बनाया है। तुम परमेश्वर के प्राणी हो, तुम्हारी अपनी कोई पसंद नहीं होनी चाहिये और यही तुम्हारा दायित्व है। आज सृजनहार के कार्य समस्त विश्व के लिये हैं। तुम किसी भी वंश के क्यों ना हो परंतु सबसे पहले तुम लोग परमेश्वर के प्राणियों में से एक हो, मोआब के वंशज—परमेश्वर के प्राणियों का एक हिस्सा हो, बस यह कि तुम सबका मूल्य निम्न है। चूंकि आज परमेश्वर के कार्य समस्त प्राण्यिों में संचालित हैं, और समस्त ब्रम्हांड उसका लक्ष्य है, सृजनहार किसी भी जन, तत्व या वस्तु का अपने कार्य करने हेतु चयन करने को स्वतंत्र है। वह तब तक इस बात की चिंता नहीं करता कि तुम किस के वंशज हो जब तक कि तुम उसके एक प्राणी हो, जब तक कि तुम उसके कार्य के लिये उपयोगी हो—उसकी विजय और गवाही के कार्य—बिना किसी संदेह के तुम में वह अपना कार्य करता है। यह लोगों की रूढ़िवादी सोच को कुचल देता है, जो यह है कि परमेश्वर कभी भी अन्य जातियों के मध्य कार्य नहीं करेगा, विशेषतः जो निम्न और श्रापित हैं, उनके लिए जो श्रापित हैं, उनकी आगामी पीढ़ियां सदाकाल श्रापित रहेंगी उन्हें कभी भी उद्धार का अवसर प्राप्त नहीं होगा, परमेश्वर कभी भी अन्य जाति की भूमि पर उतर कर कार्य नहीं करेगा और अपवित्र भूमि पर कभी अपने कदम नहीं रखेगा, क्योंकि वो पवित्र है। ये सभी अवधारणाएं, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य द्वारा चकनाचूर कर दी गईं हैं। जान लो कि परमेश्वर समस्त प्राणियों का परमेश्वर है, वह स्वर्ग, पृथ्वी और समस्त वस्तुओं पर अधिकार रखता है, और केवल इस्राएल के लोगों का परमेश्वर नहीं है। इसलिए, चीन में यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और क्या यह समस्त राष्ट्रों में नहीं फैलेगा? भविष्य की महान गवाही चीन तक सीमित ना रहेगी, यदि परमेश्वर केवल तुम लोगों को जीतता, तो क्या दुष्ट आत्माओं को मनाया जा सकता है? वे विजय किये जाने का अर्थ या परमेश्वर की सामर्थ को नहीं समझतीं, और केवल जब परमेश्वर के समस्त विश्व में चुने हुए लोग इस कार्य के चरम प्रभाव का अवलोकन करेंगे तब सब प्राणी जीत लिए जाएंगे; कोई भी मोआब के वंशजों से अधिक पिछड़ा और भ्रष्ट नहीं है। केवल यदि इन लोगों पर विजय पाई जा सकती है—जो कि सबसे अधिक भ्रष्ट हैं, जिन्होंने परमेश्वर को स्वीकार नहीं किया, या इस बात पर विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर है, वे जब जीत लिए जायेंगे, और अपने मुख से परमेश्वर को स्वीकार करेंगे, उसकी स्तुति करेंगे और उससे प्रेम करने में समर्थ होंगे—यह विजय की गवाही होगी? हालांकि तुम लोग पतरस नहीं, परंतु तुम सब में पतरस का चरित्र जीवंत है, तुम लोग पतरस की गवाही धारण करने योग्य हो, और अय्यूब की भी, और यही सबसे महान गवाही है। अंततः तुम कहोगें: "हम इस्राएली नहीं हैं, परंतु मोआब के त्यागे हुए वंशज हैं, हम पतरस नहीं, उसकी सी क्षमता हम में नहीं, या हम अय्यूब के समान नहीं, और हम पौलुस का परमेश्वर के लिए कष्ट सहने के संकल्प से तुलना भी नहीं कर सकते, उसकी तरह परमेश्वर को समर्पित नहीं हो सकते, हम इतने पिछड़े हुए हैं इसलिए हम परमेश्वर की आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य हैं। परमेश्वर ने फिर भी आज हमें उठाया है, इसलिए हम परमेश्वर को संतुष्ट करें—हालांकि न तो हम में क्षमता है और न ही पात्रता, लेकिन हम परमेश्वर को संतुष्ट करने को तैयार हैं—यही हमारा संकल्प है। हम मोआब के वंशज हैं, और हम श्रापित हैं। यह परमेश्वर की आज्ञा थी, और हम इसे बदलने में असमर्थ हैं, परंतु हमारा जीवन और हमारा ज्ञान बदल सकता है, और हम परमेश्वर को संतुष्ट करने हेतु संकल्पित हैं।" जब तुम के पास यह संकल्प हो, यह सिद्ध करेगा कि तुमने विजय किये जाने की गवाही दी है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" से

7. विजयी कार्य द्वारा मुख्य रूप से यह परिणाम हासिल करने का प्रयास किया जाता है कि मनुष्य की देह को विद्रोह से रोका जाए, अर्थात मनुष्य का मस्तिष्क परमेश्वर की नई समझ हासिल करे, उसका दिल पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, और वह परमेश्वर का होने के लिए संकल्प करे। मनुष्य का मिजाज़ या देह कैसे परिवर्तित होते हैं, यह निर्धारित नहीं करता कि उस पर विजय प्राप्त की गई है या नहीं। बल्कि, जब मनुष्य की सोच, उसकी चेतना और उसकी भावना बदलती है—अर्थात, जब उसकी पूरी मनोवृत्ति में बदलाव होता है—तब परमेश्वर उस पर विजय प्राप्त कर चुका होता है। जब तुम आज्ञा का पालन करने का संकल्प ले लेते हो और एक नई मानसिकता अपना लेते हो, जब तुम परमेश्वर के वचनों और कार्य के विषय में अपनी धारणाओं या इरादों को लाना बंद कर देते हो, और जब तुम्हारा मस्तिष्क सामान्य रूप से सोच सकता हो, यानी, जब तुम परमेश्वर के लिए तहेदिल से प्रयास करने में जुट सकते हो—तो इस प्रकार का व्यक्ति वह होता है जिस पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त की जा चुकी है। धर्म के दायरे में, बहुत से लोग सारा जीवन निरर्थकता से कष्ट भोगते हैं, अपने शरीर को नियंत्रित करते हुए या अपना बोझ उठाते हुए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम सांस तक पीड़ा सहते हुए! कुछ लोग अपनी मृत्यु की सुबह में भी उपवास रखते हैं। वे अपने पूर्ण जीवन के दौरान स्वयं को अच्छे भोजन और अच्छे कपड़े से दूर रखते हैं, और केवल पीड़ा पर ज़ोर देते हैं। वे अपने शरीर को वश में कर पाते हैं और अपने शरीर को त्याग पाते हैं। पीड़ा सहन करने की उनकी भावना सराहनीय है। लेकिन उनकी सोच, उनकी धारणाएं, उनका मानसिक रवैया, और वास्तव में उनका पुराना स्वभाव—इनमें से किसी के साथ बिल्कुल भी निपटा नहीं गया है। उनकी स्वयं के बारे में कोई सच्ची समझ नहीं है। परमेश्वर के बारे में उनकी मानसिक छवि एक निराकार, अज्ञात परमेश्वर की पारंपरिक छवि है। परमेश्वर के लिए पीड़ा सहने का उनका संकल्प उनके उत्साह और उनके सकारात्मक स्वभाव से आता है। हालांकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे न तो परमेश्वर को समझते हैं और न ही उसकी इच्छा जानते हैं। वे केवल अंधों की तरह परमेश्वर के लिए कार्य कर रहे हैं और पीड़ा सह रहे हैं। विवेकी बनने पर वे बिल्कुल महत्व नहीं देते और उन्हें इसकी भी बहुत परवाह नहीं कि वे सुनिश्चित करें कि उनकी सेवा वास्तव में परमेश्वर की इच्छा पूरी करती हो। उन्हें इसका ज्ञान उससे भी कम है कि परमेश्वर के विषय में समझ कैसे हासिल करें। जिस परमेश्वर की सेवा वे करते हैं वह परमेश्वर की अपनी मूल छवि नहीं है, बल्कि एक ऐसा परमेश्वर है जिसे उन्होंने स्वयं बनाया, जिसके बारे में उन्होंने सुना, या एक ऐसा पौराणिक परमेश्वर है जिसके बारे में उन्होंने लेखों में पढ़ा। फिर वे अपनी ज्वलंत कल्पनाओं और अपने परमेश्वरीय हृदयों का उपयोग परमेश्वर के लिए पीड़ित होने के लिए करते हैं और परमेश्वर के लिए उस कार्य को अपने ऊपर ले लेते हैं जो परमेश्वर करना चाहता है। उनकी सेवा बहुत ही अयथार्थ है, ऐसी कि व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो ऐसा कोई नहीं है जो वास्तव में परमेश्वर की सेवा एक ऐसे तरीके से कर रहा है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करता हो। इससे फर्क नहीं पड़ता कि वे पीड़ा भुगतने को कितने तैयार हों, उनकी सेवा का मूल परिप्रेक्ष्य और परमेश्वर की उनकी मानसिक छवि अपरिवर्तित रहती है क्योंकि वे परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना और उसके शुद्धिकरण और सिद्धता के माध्यम से नहीं गुज़रे हैं, और कोई उन्हें सत्य के साथ आगे नहीं ले गया है। यहां तक कि अगर वे उद्धारकर्ता यीशु पर विश्वास करते भी हैं, तो भी उनमें से किसी ने कभी उद्धारकर्ता को देखा नहीं है। वे केवल किंवदंती और अफ़वाहों के माध्यम से उसे जानते हैं। इसलिए, उनकी सेवा आँख बंद कर बेतरतीब ढंग से की जाने वाली सेवा से अधिक कुछ नहीं है, जैसे एक नेत्रहीन आदमी अपने पिता की सेवा कर रहा हो। इस प्रकार की सेवा के माध्यम से आखिरकार क्या हासिल किया जा सकता है? और इसे कौन स्वीकार करेगा? शुरुआत से लेकर अंत तक, उनकी सेवा कभी भी बदलती नहीं। वे केवल मानव निर्मित पाठ प्राप्त करते हैं और अपनी सेवा को अपनी स्वाभाविकता और वे स्वयं क्या पसंद करते हैं उस पर आधारित रखते हैं। इससे क्या इनाम प्राप्त हो सकता है? यहाँ तक कि पतरस, जिसने यीशु को देखा था, वह भी नहीं जानता था कि परमेश्वर की इच्छा पूरी करते हुए सेवा कैसे करनी है। अंत में, वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद ही, उसे समझ आया। यह उन नेत्रहीन लोगों के बारे में क्या कहता है जिन्होंने किसी भी तरह के निपटान या काँट-छाँट का अनुभव नहीं किया और जिनके पास मार्गदर्शन के लिए कोई भी नहीं रहा है? क्या आजकल तुम लोगों में से अधिकांश की सेवा उन नेत्रहीन लोगों की तरह नहीं? जिन सभी लोगों ने न्याय नहीं प्राप्त किया है, जिनकी काँट-छाँट और जिनका निपटारा नहीं किया गया है, जो नहीं बदले हैं—क्या ये वे नहीं जिन पर विजय प्राप्ति अधूरी है? ऐसे लोगों का क्या उपयोग? यदि तुम्हारी सोच, जीवन की तुम्हारी समझ और परमेश्वर की तुम्हारी समझ में कोई नया परिवर्तन नहीं दिखता है, और थोड़ा-सा भी लाभ नहीं मिलता है, तो तुम अपनी सेवा में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं प्राप्त करोगे! दर्शन के बिना और परमेश्वर के कार्य की एक नई समझ के बिना, तुम एक ऐसे व्यक्ति नहीं बन सकते जिस पर विजय प्राप्त की गई हो। परमेश्वर का अनुसरण करने का तुम्हारा तरीका फिर उन लोगों की तरह होगा जो पीड़ा सहते हैं और उपवास रखते हैं—इसका शायद ही कोई मूल्य हो! यह इसलिए है क्योंकि वे जो करते हैं उसकी शायद ही कोई गवाही हो और मैं कहता हूं कि उनकी सेवा व्यर्थ है! अपने जीवनकाल के दौरान, ये लोग कष्ट भोगते हैं, जेल में समय बिताते हैं, और हर पल वे कष्ट सहते हैं, प्यार और दयालुता पर ज़ोर देते हैं, और अपना क्रूस उठाते हैं। उन्हें दुनिया बदनाम और अस्वीकार करती है और वे हर कठिनाई का अनुभव करते हैं। वे अंत तक आज्ञा का पालन करते हैं, लेकिन फिर भी, उन पर विजय प्राप्त नहीं की जाती और वे विजय प्राप्ति का कोई भी साक्ष्य पेश नहीं कर पाते। वे कम कष्ट नहीं भोगते हैं, लेकिन अपने भीतर वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। उनकी पुरानी सोच, पुरानी विचारधारा, धार्मिक प्रथाओं, मानव निर्मित समझों और मानवीय विचारों में से किसी से भी निपटा नहीं गया। इनमें कोई नई समझ नहीं है। परमेश्वर की उनकी समझ का थोड़ा-सा हिस्सा भी सही या सटीक नहीं है। उन्होंने परमेश्वर की इच्छा को गलत समझा है। क्या यह परमेश्वर की सेवा के लिए हो सकता है? तुमने परमेश्वर के बारे में अतीत में जो भी समझा हो, मान लो कि यदि तुम उसे आज बनाए रखो और परमेश्वर के बारे में अपनी समझ को अपनी धारणाओं और विचारों पर आधारित रखना जारी रखो, चाहे परमेश्वर कुछ भी करे। अर्थात्, समझो कि तुम्हारे पास परमेश्वर की कोई नई, सच्ची समझ नहीं है और तुम परमेश्वर की वास्तविक छवि और सच्चे स्वभाव को जानने में विफल रहे हो। समझो कि सामंती, अंधविश्वासी सोच परमेश्वर की तुम्हारी समझ को अभी भी निर्देशित करती है और अब भी मानवीय कल्पनाओं और विचारों से पैदा होती है। यदि ऐसा है, तो तुम पर विजय प्राप्त नहीं की गई है। अभी, इन सभी वचनों को तुमसे कहने का मेरा लक्ष्य यह है कि तुम एक सटीक और नई समझ प्राप्त करने की राह पर पहुँचने के लिए इस ज्ञान का उपयोग करो और समझो। इनका, उन पुरानी धारणाओं और पुराने ज्ञान से छुटकारा पाने का भी उद्देश्य है, जो तुम अपने भीतर रखते हो, ताकि तुम एक नई समझ प्राप्त कर सको। अगर तुम सच में मेरे वचनों का भोजन करते हो और उन्हें पीते हो, तो तुम्हारी समझ में काफ़ी बदलाव आएगा। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों पर भोजन करते हुए और उन्हें पीते हुए, एक आज्ञाकारी हृदय को बनाए रखोगे, तब तक तुम्हारा परिप्रेक्ष्य में बदलाव आएगा। जब तक तुम बार-बार ताड़ना को स्वीकार करते रहोगे, तुम्हारी पुरानी मानसाकिता धीरे-धीरे बदलती रहेगी। जब तक तुम्हारी पुरानी मानसिकता पूरी तरह से नई के साथ बदल दी जाएगी, तब तक तुम्हारा व्यवहार भी तदनुसार बदलेगा। इस तरह से तुम्हारी सेवा अधिक से अधिक लक्षित हो जाएगी, और अधिक से अधिक परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में सक्षम हो जाएगी। यदि तुम अपना जीवन, जीवन की अपनी समझ, और परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं को बदल सकते हो, तो तुम्हारी स्वाभाविकता धीरे-धीरे कम होती जाएगी। यह, और इससे कुछ भी कम नहीं, परिणामस्वरूप तब होता है जब परमेश्वर मनुष्य पर विजय प्राप्त करता है; यह वह परिवर्तन है जो मनुष्य में देखा जाएगा। यदि परमेश्वर पर विश्वास करने में, तुम केवल अपने शरीर को नियंत्रित करना और कष्ट और पीड़ा भुगतना जानते हो, और तुम्हें यह स्पष्टता से नहीं पता कि तुम जो कर रहे हो वह सही है या गलत, ये तो तुम्हें पता ही नहीं कि किसके लिए कर रहे हो, तो इस तरह के अभ्यास द्वारा कैसे परिवर्तन लाया जा सकता है?

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (3)" से

8. लोगों को समझना चाहिए कि जो मैं तुम लोगों से मांग रहा हूं वह यह नहीं है कि तुम लोगों के शरीर को बंधन में रखा जाए या तुम लोगों के मस्तिष्क को नियंत्रित किया जाए और तुम लोगों को मनमाने रूप से विचारने से रोका जाए। यह न तो कार्य का लक्ष्य है और न ही यह वह कार्य है जिसे अभी किए जाने की आवश्यकता है। अभी, तुम लोगों को सकारात्मक रूप से समझ प्राप्त करने की आवश्यकता है, ताकि तुम लोग स्वयं को बदल सको। तुम लोगों के लिए सबसे आवश्यक है कि तुम लोग स्वयं को परमेश्वर के वचनों से तैयार करो, जिसका अर्थ है कि तुम लोग स्वयं को उस सत्य और दर्शन से तैयार करो जो अभी तुम लोगों के सामने है, और फिर आगे बढ़ो और उन्हें लागू करो। यह तुम लोगों की ज़िम्मेदारी है। मैं तुम लोगों से यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम अधिक प्रकाश की तलाश करो और उसे प्राप्त करो। फिलहाल, तुम लोगों की कद-काठी उतनी ऊँची नहीं है। तुम लोग बस वह सब करो जो परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के लिए आवश्यक है। यह आवश्यक है कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य को समझो और अपने स्वभाव, अपने सार, और अपने पुराने जीवन को जानो। तुम लोगों को विशेष रूप से अतीत की उन ग़लत प्रथाओं और मानवीय कृतियों को जानने की आवश्यकता है। बदलने के लिए, तुम लोगों को अपनी सोच बदलने से शुरुआत करनी होगी। पहले, अपनी पुरानी सोच को नई के साथ बदलो, और अपनी नई सोच को अपने वचनों और कार्यों और जीवन को नियंत्रित करने दो। अभी, तुम सभी लोगों से यही करने के लिए कहा जा रहा है। आँखें मूंदकर इसका अभ्यास या पालन न करो। तुम लोगों के पास एक आधार और एक लक्ष्य होना चाहिए। अपने आप को मूर्ख मत बनाओ। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास किस लिए है, इससे क्या हासिल किया जाना चाहिए, और अभी तुम लोगों को किसमें प्रवेश करना चाहिए। यह आवश्यक है कि तुम ये सब कुछ जानो।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (3)" से

9. जब परमेश्वर ने अपने दो चरणों का कार्य इज़राइल में किया, तो इज़राइलियों और गैर-यहूदी जातियों ने समान रूप से यह धारणा अपना ली: यद्यपि यह सत्य है कि परमेश्वर ने सभी चीज़ें बनाई हैं, वह केवल इज़राइलियों का परमेश्वर बनने को तैयार है, गैर-यहूदियों का परमेश्वर नहीं। इज़राइली निम्नलिखित पर विश्वास करते हैं: परमेश्वर केवल हमारा परमेश्वर हो सकता है, तुम सभी गैर-यहूदियों का परमेश्वर नहीं, और क्योंकि तुम लोग यहोवा को नहीं मानते हो, यहोवा—हमारा परमेश्वर—तुम लोगों से घृणा करता है। इसके अतिरिक्त, उन यहुदियों का यह भी मानना है: प्रभु यीशु ने हम यहूदियों की छवि ग्रहण की थी और यह एक ऐसा परमेश्वर है जिस पर यहूदियों का चिन्ह उपस्थित है। हमारे बीच ही परमेश्वर कार्य करता है। परमेश्वर की छवि और हमारी छवि समान हैं; हमारी छवि परमेश्वर के करीब है। प्रभु यीशु हम यहूदियों का राजा है; अन्य जातियाँ ऐसा महान उद्धार प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। प्रभु यीशु हम यहूदियों के लिए पापबलि है। कार्य के केवल इन दो चरणों के आधार पर ही इज़राइलियों और यहूदियों ने कई धारणाएं बना ली थीं। वे रोब से स्वयं के लिए परमेश्वर पर दावा करते हैं, और मानते नहीं हैं कि परमेश्वर गैर-यहूदी जातियों का भी परमेश्वर है। इस प्रकार, परमेश्वर गैर-यहूदी जातियों के दिल में एक रिक्त स्थान बन गया। यह इसलिए कि हर कोई यह मानने लगा था कि परमेश्वर गैर-यहूदी जातियों का परमेश्वर नहीं बनना चाहता है और वह केवल इज़राइलियों को ही पसंद करता है—उसके चुने हुए लोग—और वह यहूदियों को पसंद करता है, विशेषकर उन अनुयायियों को जो उसका अनुसरण करते हैं। क्या तुम नहीं जानते कि यहोवा और यीशु ने जो कार्य किया, वह सभी मानव जाति के अस्तित्व के लिए किया था? क्या तुम लोग अब स्वीकारते हो कि परमेश्वर उन सभी लोगों का परमेश्वर है जो इज़राइल से बाहर पैदा हुए? क्या आज परमेश्वर तुम्हारे बीच नहीं है? यह एक सपना नहीं हो सकता है, क्यों है न? क्या तुम लोग इस वास्तविकता को स्वीकारते नहीं हो? तुम लोग इस पर विश्वास करने की या इसके बारे में सोचने की हिम्मत नहीं करते। चाहे तुम लोग जैसे भी इसे देखो, क्या परमेश्वर तुम लोगों के बीच ठीक यहाँ नहीं है? क्या तुम लोग अभी भी इन शब्दों पर विश्वास करने से डरते हो? इस दिन से, क्या वे सभी जिन पर विजय प्राप्त की गई है और सभी जो परमेश्वर के अनुयायी बनना चाहते हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं? क्या तुम सभी, जो आज अनुयायी हो, इज़राइल के बाहर चुने हुए लोग नहीं हो? क्या तुम लोगों का पद इज़राइलियों के बराबर नहीं है? क्या यह सब वह नहीं है जिसे तुम लोगों को पहचानना चाहिए? क्या तुम पर विजय पाने के कार्य का यही उद्देश्य नहीं है? क्योंकि तुम लोग परमेश्वर को देख सकते हो, तो वह तुम लोगों का परमेश्वर हमेशा रहेगा, शुरू से लेकर भविष्य तक। जब तक कि तुम लोग उसके पीछे चलने के लिए और उसकी वफ़ादार और आज्ञाकारी रचनाएं बने रहने के लिए तैयार रहोगे, तब तक वह तुम लोगों को अकेला नहीं छोड़ेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (3)" से

10. सिद्ध बनाए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने के लिए एक व्यक्ति को किन मानदण्डों पर खरा उतरना अनिवार्य है? सिद्ध बनाए जाने के लिए एक व्यक्ति को किन मानदण्डों पर खरा उतरना अनिवार्य है? जीत लिया जाना और सिद्ध किया जाना दोनों मनुष्य में कार्य किए जाने के लिए हैं ताकि वह अपनी वास्तविक समानता में लौट सके और अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव और शैतान के प्रभाव से स्वतन्त्र हो जाए। यह जीत लिया जाना मनुष्य में कार्य किए जाने की प्रक्रिया में सबसे पहले आता है, अर्थात यह कार्य का पहला कदम है। सिद्ध किया जाना दूसरा कदम या पूरा करने का कार्य है। प्रत्येक मनुष्य को जीत लिए जाने से हो कर गुजरना आवश्यक है; अन्यथा वह परमेश्वर को जानने के योग्य नहीं होगा और नहीं जानेगा कि एक परमेश्वर है, अर्थात, वह परमेश्वर को स्वीकार करने के योग्य नहीं होगा। और यदि एक व्यक्ति परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता है, तो परमेश्वर के द्वारा उसे सम्पूर्ण किया जाना असम्भव होगा क्योंकि वह इस सम्पूर्णता के मानदण्ड पर खरा नहीं उतरेगा। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार ही नहीं करते, तो तुम उसे जानने के योग्य कैसे होगे? और तुम उसकी खोज कैसे करोगे? तुम उसके लिए साक्ष्य देने के लिए भी अयोग्य होगे, उसे सन्तुष्ट करने के लिए विश्वास रखने की तो बात ही दूर है। अतः कोई भी व्यक्ति जो सिद्ध बनाया जाना चाहता है, तो पहला कदम जीत लिए जाने के कार्य से हो कर गुजरना है। यह सर्वप्रथम शर्त है। परन्तु चाहे यह जीत लिया जाना हो या सिद्ध किया जाना, यह प्रत्येक मनुष्य में कार्य किए जाने और उसे परिवर्तित किए जाने के लक्ष्य से है और प्रत्येक मनुष्य के प्रबन्धन के कार्य में एक अंश है। यही दो कदम वे बातें हैं, जो किसी व्यक्ति को एक सम्पूर्ण व्यक्ति बनाने के लिए अपेक्षित हैं; किसी भी कदम को छोड़ा नहीं जा सकता है। यह सत्य है कि "जीत लिया जाना" सुनने में अधिक अच्छा नहीं लगता है, परन्तु वास्तव में किसी को जीत लिए जाने की प्रक्रिया उसे परिवर्तित किए जाने की प्रक्रिया है। जीत लिए जाने के पश्चात, हो सकता है तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव से पूर्णतः छुटकारा न पाओ, परन्तु तुम्हें इसका बोध अवश्य हो चुका होगा। जीतने वाले कार्य के द्वारा तुम अपनी निम्न मानवता को जान चुके होगे और अपनी अत्यधिक अनाज्ञाकारिता का बोध भी कर चुके होगे। यद्यपि तुम जीतने वाले कार्य के कम समयावधि में उन्हें त्याग देने या परिवर्तित कर देने में असमर्थ होगे, परन्तु तुम उन्हें जान चुके होगे। यह तुम्हारी सिद्धता के लिए नींव रखता है। इसलिए जीता जाना और सिद्ध किया जाना दोनों ही मनुष्य को बदलने के लिए किए जाते हैं, दोनों ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से छुटकारा दिलाने के लिए किए जाते हैं, ताकि वह स्वयं को पूर्ण रीति से परमेश्वर को प्रदान कर सके। बात बस ये है कि जीत लिया जाना मानवीय स्वभाव के परिवर्तन में पहला कदम है और मनुष्य द्वारा परमेश्वर को स्वयं के पूर्ण समर्पण का भी पहला कदम है, एक कदम जो सिद्ध किए जाने से निम्न है। एक जीत लिए गए व्यक्ति के जीवन का स्वभाव एक सिद्ध किए गए व्यक्ति के स्वभाव से बहुत कम परिवर्तित होता है। जीत लिया जाना और सिद्ध किया जाना धारणात्मक रीति से एक-दूसरे से भिन्न हैं, क्योंकि वे कार्य के भिन्न-भिन्न चरण हैं और क्योंकि वे लोगों को भिन्न मानदण्डों में परखते हैं, जीत लिया जाना उन्हें निम्न मानदण्डों में और सिद्ध किया जाना उन्हें उच्च मानदण्डों में परखता है। सिद्ध किए गए लोग धार्मिक जन हैं, लोग जिन्हें पवित्र और शुद्ध बनाया गया है; वे मानवता के प्रबन्धन के कार्य के निश्चित रूप, या अन्तिम उत्पाद हैं। यद्यपि वे सिद्ध किये गये मानव नहीं हैं, वे, वे लोग हैं, जो अर्थपूर्ण जीवन जीने को खोजते हैं। परन्तु जीते हुये मात्र शाब्दिक रूप से स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है; वे स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया, कि वचन देह में प्रकट होता है और यह कि पृथ्वी पर परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिए आया है। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का न्याय और ताड़ना और उसका प्रहार करना और शुद्धिकरण सब कुछ मनुष्य के लिए लाभप्रद है। अर्थात, उन्होंने अभी मनुष्य की समानता को प्राप्त करना आरम्भ ही किया है, और उनके पास जीवन की कुछ समझ है, परन्तु वे अभी भी इसके विषय में अस्पष्ट हैं। दूसरे शब्दों में, वे अभी मानवता को ग्रहण करना आरम्भ कर ही रहे हैं। ये जीत लिए जाने के परिणाम हैं। जब लोग सिद्धता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदला जा सकता है। इसके अतरिक्त, उनके जीवन निरन्तर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे उस सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से घृणा करने और उन सभी से घृणा करने के योग्य हैं, जो उस सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं। वे विशेष रूप से स्वयं से घृणा करते हैं, परन्तु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रीति से जानते हैं। वे उस सत्य के द्वारा जीवनयापन करने के इच्छुक हैं और वे उस सत्य के अनुसरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। वे उन विचारों में जीवन जीने के लिए अनिच्छुक हैं, जो उनके अपने मस्तिष्कों के द्वारा उपजाए जाते हैं, और वे मनुष्य की आत्म-उपयुक्तता, दम्भ, और आत्म-सन्तोष से घृणा करते हैं। वे औचित्य के सशक्त भाव से सम्भाषण करते हैं, वे विवेक और बुद्धि से बातों का निपटारा करते हैं, और परमेश्वर के प्रति निष्ठावान एवं आज्ञाकारी होते हैं। यदि उन पर ताड़ना और न्याय का अवसर आता है, वे न सिर्फ निष्क्रिय और दुर्बल नहीं बनते, अपितु वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के लिए आभारी होते हैं। वे विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना वे नहीं रह सकते हैं; इसके द्वारा वे उसकी सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं। वे शान्ति और आनन्द और क्षुधा को तृप्त करने की रोटी के एक विश्वास का अनुसरण नहीं करते हैं। न ही वे अस्थायी शारीरिक आनन्दों के पीछे भागते हैं। सिद्ध किए हुओं के पास यही होता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से

11. जो जीत लिए जाने का कार्य तुम सब लोगों में किया गया है वह गहनतम महत्त्व रखता है: एक ओर, इस कार्य का उद्देश्य लोगों के एक समूह को सिद्ध करना है, अर्थात उन्हें विजेताओं के समूह में सिद्ध करना, पूर्ण किए गए लोगों के प्रथम समूह में, अर्थात प्रथमफलों के रूप में। दूसरी ओर, यह सृष्ट प्राणियों को परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लेने देना है, परमेश्वर के महानतम उद्धार को, और परमेश्वर के पूर्ण उद्धार को प्राप्त करने देना है, यह मनुष्य को न केवल दया और प्रेमपूर्ण करुणा का आनन्द लेने देना है, परन्तु और अधिक महत्वपूर्ण रीति से ताड़ना और न्याय का अनुभव लेने देना है। संसार की सृष्टि से अब तक, परमेश्वर ने जो कुछ अपने कार्य में किया है, वह प्रेम ही है, जिसमें मनुष्य के लिए घृणा नहीं है। यहाँ तक कि ताड़ना और न्याय, जो तुम देख चुके हो, वे भी प्रेम ही हैं, अधिक सच्चा और अधिक वास्तविक प्रेम; यह प्रेम लोगों का मानवजीवन के सही मार्ग पर सन्दर्शन करता है। तीसरी ओर, यह शैतान के समक्ष साक्ष्य देना है। और चौथी ओर, यह भविष्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने के लिए एक आधार रखना है। जो समस्त कार्य वह कर चुका है, उसका उद्देश्य मानवीय जीवन के सही मार्ग पर लोगों का सन्दर्शन करना है, ताकि वे मनुष्यजाति का सामान्य जीवन प्राप्त कर सकें, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है। ऐसे सन्दर्शन के बिना तुम एक रिक्त जीवन जीने के योग्य ही होगे, मात्र एक मूल्यहीन और निरर्थक जीवन जीने के योग्य होगे और यह जानोगे ही नहीं कि एक सामान्य व्यक्ति कैसे बनना है यह मनुष्य को जीत लिए जाने का गहनतम महत्व है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से

12. तुम सब मोआब से उत्पन्न हुए हो। तुम में जीत लिए जाने का कार्य तुम्हारा महान उद्धार है। तुम सभी पाप और दुराचार के स्थान में रहते हो; तुम सभी दुराचारी और पापी लोग हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण, तुम सब ने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है, ऐसे गहनतम उद्धार को प्राप्त किया है, अर्थात परमेश्वर के महानतम प्रेम को प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, वह तुम्हारे लिए वास्तविक प्रेम है; वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता है। यह तुम्हारे पापों के कारण ही है कि वह तुम्हारा न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करोगे और यह अतिबृहत उद्धार प्राप्त करोगे। यह सब कुछ मनुष्य में कार्य करने के लिए किया गया है। आदि से लेकर अन्त तक, मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर जितना हो सके वो सब कुछ कर रहा है, और वह निश्चय ही उस मनुष्य को पूर्णतया विनष्ट करने का इच्छुक नहीं है, जिसे उसने अपने हाथों से रचा है। अब कार्य करने के लिए वह तुम्हारे मध्य आया है; क्या यह और अधिक उद्धार नहीं है? अगर वो तुमसे नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वो व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा संदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? उसे इस प्रकार दुःख क्यों उठाना चाहिए? परमेश्वर तुम सब से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम सब को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम ही सबसे सच्चा प्रेम है। यह लोगों की अनाज्ञाकारिता के कारण ही है कि उसे उन्हें न्याय के द्वारा बचाना पड़ता है, अन्यथा वे बचाए नहीं जाएँगे। चूंकि तुम नहीं जानते कि एक जीवन का सन्दर्शन कैसे करना है या कैसे जीना है, और तुम इस दुराचारी और पापमय स्थान में जीते हो और दुराचारी और अशुद्ध दानव हो, वह इतना दयाहीन नहीं कि तुम्हें और अधिक भ्रष्ट होने दे; न ही वह इतना दयाहीन है कि तुम्हें शैतान की इच्छानुसार कुचले जाते हुए इस प्रकार के अशुद्ध स्थान में रहने दे, या इतना दयाहीन है कि तुम्हें नरक में गिर जाने दे। वह मात्र तुम्हारे इस समूह को प्राप्त करना और तुम सब को पूर्णतः बचाना चाहता है। यही तुम में जीत लिए जाने के कार्य को करने का मुख्य उद्देश्य है-यह मात्र उद्धार के लिए है।

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से

13. यद्यपि मनुष्य के लिए ताड़ना और न्याय, शुद्धिकरण और निर्दयी प्रकटीकरण हैं, जो उसके पापों का दण्ड देने और उसके शरीर को दण्ड देने के लिए हैं, परन्तु इस कार्य का कुछ भी उसके शरीर की निंदा करने और नष्ट कर देने की इच्छा से नहीं है। वचन के समस्त गम्भीर प्रकटीकरण सही मार्ग पर तुम्हारा सन्दर्शन करने के उद्देश्य से हैं। तुम सब इस कार्य का बहुत कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव कर चुके हो, और स्पष्टतः, इस ने तुम्हारा सन्दर्शन बुरे मार्ग पर नहीं किया है! इसका सब कुछ तुम्हें एक सामान्य जीवनयापन करने के योग्य बनाने के लिए है; इसका सब कुछ वह है जो तुम्हारी सामान्य मानवता ग्रहण कर सकती है। इस कार्य के लिए उठाया गया प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारी वास्तविक कद-काठी के अनुसार है, और तुम सब पर कोई भी असहनीय बोझ नहीं डाला गया है। यद्यपि तुम अभी इसे स्पष्ट रीति से देखने में अयोग्य हो, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हूँ, यद्यपि तुम विचार करते रहते हो कि मैं प्रतिदिन तुम्हें ताड़ना देता और तुम्हारा न्याय करता और प्रतिदिन तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुम से घृणा करता हूँ, और यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो वह ताड़ना और न्याय है, वास्तव में तो वह सब तुम्हारे लिए प्रेम है और तुम्हारे लिए एक बड़ी सुरक्षा भी है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को समझ नहीं सकते हो, तब तुम्हारे लिए तुम्हारे अनुभव में चलते जाने के लिए कोई मार्ग ही नहीं है। ऐसे उद्धार से तुम्हें सान्त्वना प्राप्त होनी चाहिए। होश में आने से इन्कार मत करो। इतनी दूर आ कर, तुम्हें जीत लिए जाने के इस कार्य का महत्व सुस्पष्ट दिखाई देना चाहिए। तुम्हें ऐसे-वैसे दृष्टिकोण को और अधिक थामे नहीं रखना चाहिए!

"वचन देह में प्रकट होता है" में "विजयी कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" से

पिछला:"देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से एक संकलन

अगला:देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं

सम्बंधित मीडिया