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2. परमेश्वर को लोगों का न्याय और उनकी ताड़ना क्यों करनी पड़ती है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, और मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके स्वभाव, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था, से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद, एक नये युग में मनुष्य की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर वापस देह में लौटा, और उसने ताड़ना एवं न्याय के कार्य को आरंभ किया, और इस कार्य ने मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में पहुँचा दिया। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़ी आशीषें प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में ज्योति में निवास करेंगे, और सत्य, मार्ग और जीवन को प्राप्त करेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" के लिए प्रस्तावना से उद्धृत

मनुष्य को छुटकारा दिये जाने से पहले, शैतान के बहुत से ज़हर उसमें पहले से ही गाड़ दिए गए थे। हज़ारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किये जाने के बाद, मनुष्य के भीतर पहले ही ऐसा स्वभाव है जो परमेश्वर का विरोध करता है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिया गया है, तो यह छुटकारे से बढ़कर और कुछ नहीं है, जहाँ मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, परन्तु भीतर का विषैला स्वभाव नहीं हटाया गया है। मनुष्य जो इतना अशुद्ध है उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर अवश्य गुज़रना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से, मनुष्य अपने भीतर के गन्दे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और स्वच्छ होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। वह सब कार्य जिसे आज किया गया है वह इसलिए है ताकि मनुष्य को स्वच्छ और परिवर्तित किया जा सके; न्याय और ताड़ना के वचन के द्वारा और साथ ही शुद्धिकरण के माध्यम से, मनुष्य अपनी भ्रष्टता को दूर फेंक सकता है और उसे शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाए, यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्ध करने का कार्य है। सच में, यह चरण विजय का और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारण का रहस्य (4)" से उद्धृत

तुम सिर्फ यह जानते हो कि यीशु अंत के दिनों के दौरान उतरेगा, परन्तु वास्तव में वह कैसे उतरेगा? तुम लोगों जैसा पापी, जिसे परमेश्वर के द्वारा अभी-अभी छुड़ाया गया है, और जो परिवर्तित नहीं किया गया है, या सिद्ध नहीं बनाया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी पुराने अहम् वाले हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और कि परमेश्वर द्वारा उद्धार की वजह से तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुम्हें बदला नहीं गया तो तुम संत जैसे कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता से घिरे हुए हो, स्वार्थी और कुटिल हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ आरोहण चाहते हो—तुम्हें बहुत भाग्यशाली होना चाहिए! तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो: तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित करने और शुद्ध करने के कार्य को करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुटकारा दिया जाता है, तो तुम पवित्रता को प्राप्त करने में असमर्थ होगे। इस तरह से तुम परमेश्वर के अच्छे आशीषों को साझा करने के लिए अयोग्य होगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य के एक कदम का सुअवसर खो दिया है, जो कि परिवर्तित करने और सिद्ध बनाने का मुख्य कदम है। और इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में" से उद्धृत

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है। कुछ लोग नहीं समझते, और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को सिद्ध बना सकता है। वे कहते हैं, "यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे सिद्ध बनाया जा सकता है?" ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शापित करता है, और वह मनुष्य के पापों को न्याय देता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय के द्वारा वह मनुष्य को शरीर के सार का गहरा ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आज्ञाकारिता के प्रति समर्पित होता है। मनुष्य का शरीर पाप का है, और शैतान का है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है—और इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों का उस पर पड़ना आवश्यक है और हर प्रकार का शोधन होना आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली हो सकता है।

परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों से यह देखा जा सकता है कि उसने मनुष्य के शरीर को पहले से ही दोषी ठहरा दिया है। क्या ये वचन फिर शाप के वचन हैं? परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचन मनुष्य के सच्चे स्वभाव को प्रकट करते हैं, और ऐसे प्रकाशनों के द्वारा उसका न्याय किया जाता है, और जब वह देखता है कि वो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ है, तो वो अपने भीतर शोक और ग्लानि को अनुभव करता है, वो महसूस करता है कि वो परमेश्वर का बहुत ऋणी है, और परमेश्वर की इच्छा के लिए अपर्याप्त है। ऐसे समय होते हैं जब पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से अनुशासित करता है, और यह अनुशासन परमेश्वर के न्याय से आता है; ऐसे समय होते हैं जब परमेश्वर तुम्हारा तिरस्कार करता है और अपना चेहरा तुमसे छुपा लेता है, जब वह कोई ध्यान नहीं देता, और तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करता, और तुम्हें शुद्ध करने के लिए बिना आवाज के तुम्हें ताड़ना देता है। मनुष्य में परमेश्वर का कार्य प्राथमिक रूप से अपने धर्मी स्वभाव को स्पष्ट करने के लिए होता है। मनुष्य अंततः कैसी गवाही परमेश्वर के बारे में देता है? वह गवाही देता है कि परमेश्वर धर्मी परमेश्वर है, कि उसके स्वभाव में धार्मिकता, क्रोध, ताड़ना और न्याय शामिल हैं; मनुष्य परमेश्वर के धर्मी स्वभाव की गवाही देता है। परमेश्वर अपने न्याय का प्रयोग मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए करता है, वह मनुष्य से प्रेम करता रहा है और उसे बचाता रहा है—परंतु उसके प्रेम में कितना कुछ शामिल है? उसमें न्याय, भव्यता, क्रोध, और शाप है। यद्यपि परमेश्वर ने मनुष्य को अतीत में शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को अथाह कुण्ड में नहीं फेंका था, बल्कि उसने उस माध्यम का प्रयोग मनुष्य के विश्वास को शुद्ध करने के लिए किया था; उसने मनुष्य को मार नहीं डाला था, उसने मनुष्य को सिद्ध बनाने का कार्य किया था। शरीर का सार वह है जो शैतान का है—परमेश्वर ने इसे बिलकुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर के द्वारा बताई गईं वास्तविकताएँ उसके वचनों के अनुसार पूरी नहीं हुई हैं। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम करो, ताकि तुम शरीर के सार को जान लो; वह तुम्हें इसलिए ताड़ना देता है ताकि तुम जागृत हो जाओ, कि वह तुम्हें अनुमति दे कि तुम अपने भीतर की कमियों को जान लो, और मनुष्य की संपूर्ण अयोग्यता को जान लो। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसकी भव्यता और क्रोध—वे सब मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए हैं। वह सब जो परमेश्वर आज करता है, और धर्मी स्वभाव जिसे वह तुम लोगों के भीतर स्पष्ट करता है—यह सब मनुष्य को सिद्ध बनाने के लिए है, और परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से उद्धृत

वास्तव में, जो कार्य अब किया जा रहा है वह लोगों से शैतान का त्याग करवाने, उनके पुराने पूर्वजों का त्याग करवाने के लिए किया जा रहा है। वचन के द्वारा सभी न्यायों का उद्देश्य मानवता के भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना है और लोगों को जीवन का सार समझने में समर्थ बनाना है। ये बार-बार के न्याय मनुष्य के हदयों को छेद देते हैं। प्रत्येक न्याय सीधे उनके भाग्य पर प्रभाव डालता है और उनके हृदयों को घायल करने के आशय से है ताकि वे उन सभी बातों को जाने दें और फलस्वरूप जीवन के बारे में जान जाएँ, इस गंदी दुनिया को जान जाएँ, और परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को जान जाएँ तथा इस शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई मानवजाति को जान जाएँ। जितना अधिक इस प्रकार की ताड़ना और न्याय होते हैं, उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय घायल किया जा सकता है और उतना ही अधिक उसकी आत्मा को जगाया जा सकता है। इन अत्यधिक भ्रष्ट और गहराई से धोखा देने वाले लोगों की आत्माओं को जगाना इस प्रकार के न्याय का लक्ष्य है। मनुष्य की कोई आत्मा नहीं है, अर्थात्, उसकी आत्मा बहुत समय पहले मर गई है और वह नहीं जानता है कि स्वर्ग है, नहीं जानता कि एक परमेश्वर है और निश्चित रूप से नहीं जानता कि वह मौत की खाई में संघर्ष कर रहा है; वह संभवतः किस प्रकार से जानने में समर्थ हो सकता है कि वह पृथ्वी पर इस दुष्ट नरक में जी रहा है? वह संभवतः कैसे जानने में समर्थ हो सकेगा कि उसका यह सड़ा हुआ शव, शैतान की भ्रष्टता के माध्यम से, मृत्यु के अधोलोक में गिर गया है? वह संभवतः कैसे जान सकेगा कि पृथ्वी पर प्रत्येक चीज़ मानवजाति के द्वारा काफी समय पहले ही सुधार किए जाने से परे तक बर्बाद कर दी गई है? और वह संभवतः कैसे जान सकेगा कि आज सृष्टा पृथ्वी पर आया है और भ्रष्ट लोगों के एक समूह को ढूँढ़ रहा है जिसे वह बचा सकता है? मनुष्य के द्वारा हर संभव शुद्धिकरण और न्याय का अनुभव करने के बाद भी, उसकी सुस्त चेतना नाममात्र को ही उत्तेजित होती है और लगभग पूरी तरह से उदासीन रहती है। मानवता इतनी पतित है! यद्यपि इस प्रकार का न्याय आसमान से गिरने वाले क्रूर ओलों के समान है, किन्तु यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ा फ़ायदा है। यदि इस तरह से मनुष्यों का न्याय ना हो, तो कोई भी परिणाम नहीं निकलेगा और मनुष्य को दुर्भाग्य की खाई से बचाना नितान्त असम्भव हो जाएगा। यदि यह कार्य न हो, तो लोगों का अधोलोक से बाहर निकलना बहुत ही कठिन हो जाएगा क्योंकि उनके हृदय बहुत पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्माओं को शैतान के द्वारा बहुत पहले ही कुचल दिया गया है। तुम लोगों को बचाने के लिए, जो कि पतन की गहराईयों में डूब चुके हो, तुम लोगों को सख़्ती से पुकारने, तुम्हारा सख़्ती से न्याय करने की आवश्यकता है, और केवल तभी तुम लोगों के बर्फ जैसे ठंडे हृदयों को जगाया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है" से उद्धृत

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सके और उसकी गवाही दे सके। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव का परमेश्वर के द्वारा न्याय के बिना, संभवतः मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, और न ही वह परमेश्वर के अपने पुराने ज्ञान को एक नए रूप में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है, इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के माध्यम से, मनुष्य को परमेश्वर के ज्ञान तक पहुँचने, उसको स्वभाव में रूपांतरित होने, और परमेश्वर की ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम बनाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल वे लोग ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं जो परमेश्वर को जानते हैं" से उद्धृत

अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सृष्टि की सभी चीज़ों को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, और उनकी प्रकृति के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाएगा। यही वह क्षण है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और उनकी मंज़िल को प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय से नहीं गुज़रते हैं, तो उनकी अवज्ञा और अधार्मिकता को प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होगा। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी सृजनों का अंत प्रकट हो सकता है। मनुष्य केवल तभी अपने वास्तविक रंगों को दिखाता है जब उसे ताड़ना दी जाती है और उसका न्याय किया जाता है। दुष्ट को दुष्ट के साथ, भले को भले के साथ रखा जाएगा, और समस्त मानव जाति को उनके प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से, सभी सृजनों का अंत प्रकट किया जाएगा, ताकि दुष्ट को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और सभी लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन हो जाएँगे। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की भ्रष्टता अपने चरम पर पहुँच गई है और उसकी अवज्ञा अत्यंत गंभीर हो गई है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यत: ताड़ना और न्याय से संयुक्त है और जो अंत के दिनों में प्रकट होता है, मनुष्य को रूपान्तरित और पूर्ण बना सकता है। केवल यह स्वभाव ही दुष्टता को उजागर कर सकता है और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दण्डित कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से उद्धृत

परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का सार मानवजाति को शुद्ध करना है, और यह अंतिम विश्राम के दिन के लिए है। अन्यथा, संपूर्ण मानवजाति अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करने या विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यह कार्य ही मानवजाति के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्ध करने का कार्य ही मानवजाति को उसकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा, और केवल उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव जाति की अवज्ञा की बातों को प्रकाश में लाएगा, फलस्वरूप, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें, और जो नहीं बचेंगे उनमें से जो बचेंगे उन्हें अलग करेगा। जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, तो जो शेष बचेंगे वे शुद्ध किए जाएँगे, और जब वे मानवजाति के उच्चतर राज्य में प्रवेश करेंगे तो एक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का पृथ्वी पर आनंद उठाएँगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ-साथ रहेंगे। जो नहीं बच सकते हैं उनके ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद, उनके मूल स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाएँगे; उसके बाद वे सबके सब नष्ट कर दिए जाएँगे और, शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवजाति में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ये लोग अंतिम विश्राम के देश में प्रवेश करने के योग्य नहीं है, न ही ये लोग उस विश्राम के दिन में प्रवेश करने के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दण्ड के लक्ष्य हैं और दुष्ट हैं, और वे धार्मिक लोग नहीं हैं। ...बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का उसका परम कार्य समस्त मानवजाति को सर्वथा शुद्ध करने के लिए है, ताकि वह पूर्णतः शुद्ध मानवजाति को अनंत विश्राम में ले जाए। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। यह उसके समस्त प्रबंधन कार्य का अंतिम चरण है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

परमेश्वर को क्यों भ्रष्ट मानवजाति का न्याय और उसकी ताड़ना करनी चाहिए, और परमेश्वर द्वारा भ्रष्ट मानवजाति के न्याय और उसकी ताड़ना का अर्थ क्या है? यह सत्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें परमेश्वर के कार्य के दर्शन के बारे में सच्चाई शामिल है। अगर परमेश्वर पर मनुष्य के विश्वास में दर्शन की कमी है, तो वह जान नहीं पाएगा कि परमेश्वर में विश्वास कैसे करना है; मनुष्य परमेश्वर पर विश्वास कर भी ले, तो वह सही मार्ग का चयन नहीं कर पाएगा। परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का भ्रष्ट मानवजाति के लिए क्या अर्थ है, इस भ्रष्ट मानवजाति के लिए जो उसका विरोध करती है और उसके साथ विश्वासघात करती है? हमें पहले स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि परमेश्वर ही सृष्टिकर्ता है। चूँकि वह सृष्टिकर्ता है, उसके पास सृष्टि पर शासन करने, उसका न्याय करने और ताड़ना देने का अधिकार है। इसके अलावा, परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक और पवित्र है। अपने स्वभाव के अनुसार, परमेश्वर उन मनुष्यों को उसकी उपस्थिति में रहने की अनुमति नहीं देता है जो उसके खिलाफ़ विरोध और विश्वासघात करते हैं। परमेश्वर गंदी और भ्रष्ट चीजों को अपनी उपस्थिति में रहने की अनुमति नहीं देता है। इसलिए, भ्रष्ट मानवजाति के प्रति परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना पूरी तरह से तर्कसंगत और उचित है, और यह सब परमेश्वर के स्वभाव से निर्धारित होता है। हम सभी जानते हैं कि परमेश्वर धर्मी है, और परमेश्वर सत्य है। परमेश्वर द्वारा प्रकट किये गए स्वभाव से हमने पहले ही देखा है कि परमेश्वर ही सत्य है। परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं। परमेश्वर ने अपने वचनों के माध्यम से आकाश और पृथ्वी और सब चीज़ों को बनाया। परमेश्वर के वचन सभी चीज़ों को बनाने में समर्थ हैं, और परमेश्वर के वचन वे सत्य हैं, जो सभी चीजों का न्याय करने में सक्षम होते हैं। अंत के दिनों में, परमेश्वर भ्रष्ट मानवजाति के न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है। कुछ लोग पूछ सकते हैं: क्या परमेश्वर ने पहले न्याय का कार्य किया है? परमेश्वर ने वास्तव में न्याय और ताड़ना का बहुत कार्य किया है, केवल लोगों ने इसे देखा नहीं है। मनुष्यों के अस्तित्व में आने के पहले, शैतान ने परमेश्वर का विरोध किया और उसके साथ विश्वासघात किया, तब परमेश्वर ने शैतान का न्याय कैसे किया? परमेश्वर ने शैतान को निष्कासित कर धरती पर भेज दिया, और शैतान के साथ ही उन सभी स्वर्गदूतों को भी निष्कासित कर धरती पर भेज दिया गया जो शैतान के अनुगामी थे। परमेश्वर ने उन्हें स्वर्ग से निष्कासित कर पृथ्वी पर भेज दिया। क्या यह शैतान के खिलाफ़ न्याय नहीं था? यह शैतान के खिलाफ़ एक न्याय था, साथ ही साथ यह उसकी ताड़ना भी थी। इसलिए, मनुष्यों के होने से पहले, परमेश्वर ने पहले ही शैतान का न्याय किया था और उसे ताड़ना दी थी। हमारे पास बाइबल में इसकी लिखित जानकारी मौजूद है। इस मानवजाति से पहले, क्या कोई अन्य मानव या अन्य जीव हुआ करते थे? क्या उन्हें परमेश्वर से न्याय और ताड़ना मिली थी? हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि जो लोग परमेश्वर द्वारा नष्ट किये जा चुके हैं, वे वो मनुष्य थे जिन्होंने परमेश्वर के खिलाफ़ विरोध और विद्रोह किया था, और उन सभी को परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना मिली थी। इसलिए, जब से परमेश्वर ने स्वर्ग तथा पृथ्वी और सभी चीज़ों को बनाया, तब से हमेशा परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना का अस्तित्व रहा है। सभी चीज़ों पर शासन करने के सम्बन्ध में परमेश्वर के कार्य का यह एक पहलू है, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव एक ही रहता है और वह कभी नहीं बदलेगा। हम देख सकते हैं कि जब से मनुष्य अस्तित्व में आया है, उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और शैतान का अनुसरण किया, वे सभी परमेश्वर के अभिशाप के बीच रहते थे। ऐसे कई लोग हैं जो अपने कुकर्मों की वजह से परमेश्वर की ताड़ना से मरे हैं, और कुछ तो पूरी तरह नष्ट भी हो गए थे। ऐसे कई लोग हुए हैं जिन्होंने परमेश्वर में विश्वास किया, फिर भी परमेश्वर का विरोध किया, और वे सब के सब अंत में मर गए हैं। कुछ को आध्यात्मिक क्षेत्र में दंडित किया गया था, जबकि कुछ ने अपने जीवन-काल में ही न्याय और ताड़ना को पाया है। इसलिए, मानवजाति एक निष्कर्ष पर आ गई है: "भलाई के बदले भलाई और बुराई के बदले बुराई दी जाएगी"। यह सब परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना है। अंत के दिनों में, परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवजाति को बचाने के लिए न्याय और ताड़ना का कार्य शुरू कर दिया है। परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने में, हम परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को भी स्वीकार कर रहे हैं। वे सभी लोग जो परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में परमेश्वर के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं और परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं, उन सभी लोगों को परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना मिलती है। ज्यादातर समय, लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के अधीन हैं, और कभी-कभी उन्हें तथ्यात्मक घटनाओं से भी न्याय और ताड़ना मिलती है, साथ ही साथ परमेश्वर की सजा भी प्राप्त होती है। हमने इन सभी चीज़ों को देखा है। कुछ लोग कहते हैं, "अविश्वासियों ने कभी भी परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य को स्वीकार नहीं किया है, तो क्या वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से बच निकलने में सक्षम होंगे?" लोग अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करें या न करें, उन सभी को फिर भी परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरना ही होगा, क्योंकि कोई भी परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से बच नहीं सकता है, और यह बात सच है। जिन धार्मिक व्यक्तियों ने परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार नहीं किया है, फिर भी वे इससे बच नहीं सकते। कोई भी उस ताड़ना से नहीं बच सकता हैजिसे परमेश्वर ने मनुष्य के लिए पूर्व-निर्धारित कर रखा है। यह सिर्फ समय का प्रश्न है, और हर किसी का एक अपना व्यक्तिगत परिणाम होता है। यह परिणाम भी परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाता है। हम उस न्याय और ताड़ना को देख सकते हैं जो उनमें से प्रत्येक को उनके परिणाम के रूप में प्राप्त होती है। कुछ लोग परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर से शुद्धता प्राप्त करते हैं, पूरी तरह से परमेश्वर के पास लौट आते हैं, और उनका परिणाम एक अच्छा गंतव्य होता है—जो राज्य में प्रवेश करना, अनंत जीवन को प्राप्त करना है। इस तरह के लोग उद्धार प्राप्त करते हैं। जो लोग परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार नहीं करते हैं, अर्थात, जो लोग परमेश्वर के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे अंततः नरकवास और विनाश का सामना करेंगे। उनके लिए यह न्याय और ताड़ना है जो परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित है, और उनके अंतिम परिणाम को भी परमेश्वर के न्याय और ताड़ना द्वारा तय किया जाता है। वर्तमान में धार्मिक समुदाय के कई अगुवा हैं जो परमेश्वर का विरोध कर रहे हैं, उनके लिए अंतिम परिणाम क्या है? यदि वे पश्चाताप नहीं करते हैं, तो अंततः वे निश्चित रूप से विनाश और नरकवास में डूब जाएंगे, क्योंकि कोई भी परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से बच नहीं सकता है। यह परम सिद्धांत है। हमने आज परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार कर लिया है, इसका मतलब है कि हमने मानवजाति के उद्धार से सम्बंधित परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है। हम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को एक सकारात्मक ढंग से स्वीकार कर रहे हैं और अंततः सच्चा पश्चाताप कर रहे हैं, अंततः परमेश्वर को जान रहे हैं और हमारे जीवन-स्वभाव में परिवर्तन हासिल कर रहे हैं। ऐसा न्याय और ऐसी ताड़ना हमारा उद्धार है। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है जो परमेश्वर के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, उनका परिणाम दंड है, वे अंततः नरकवास और विनाश को भोगेंगे। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से दूर भागने के कारण उनका यही नसीब है।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति से उद्धृत

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