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परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें

पहले, आओ हम एक भजन गाएं:

हर बार जब तुम लोग इस भजन को गाते हो तब तुम सब इसके विषय में क्या सोचते हो? (अत्याधिक रोमांचित; हर्षित; इसके विषय में सोचो कि परमेश्वर के राज्य का सौन्दर्य कितना महिमामय है, और मानवजाति एवं परमेश्वर सदा सर्वदा के लिए जुड़ जाएंगे।) क्या किसी ने उस रूप के विषय में सोचा है जिसे परमेश्वर के साथ रहने के लिए मनुष्य को धारण करना होगा? तुम लोगों की कल्पनाओं में, किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ जुड़ने और उस महिमामय जीवन का आनन्द लेने के लिए कैसा होना चाहिए जो राज्य के बाद आता है? (उनके पास एक परिवर्तित स्वभाव होना चाहिए।) उनके पास एक परिवर्तित स्वभाव होना चाहिए, परन्तु किस सीमा तक परिवर्तित होना है? जब इसे बदल दिया जाता है उसके बाद वे किसके समान होंगे? (वे पवित्र बन जाएंगे।) पवित्रता के लिए मानक क्या है? (उनके सभी विचार और सोच मसीह के अनुरूप हैं।) ऐसी अनुरूपता कैसे प्रदर्शित होती है? (वे परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते हैं, परमेश्वर से विश्वासघात नहीं करते हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता अर्पित करते हैं, और अपने अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते हैं।) तुम लोगों के कुछ उत्तर सही पटरी पर हैं। तुम सभी अपने अपने हृदय को खोलो, और जो कुछ तुम सब का हृदय कह रहा है उसे बांटो। (ऐसे लोग जो राज्य में परमेश्वर के साथ रहते हैं वे सत्य के अनुसरण के द्वारा और किसी व्यक्ति, घटना एवं वस्तु के द्वारा रोके बिना अपने कर्तव्य को निभा सकते हैं, और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। और अंधकार के प्रभाव से पूरी तरह अलग होना, अपने अपने हृदय को परमेश्वर के साथ एक मेल में लाना, और परमेश्वर का भय मानना एवं बुराई से दूर रहना संभव हो जाता है।) (हालातों की ओर देखने के हमारे दृष्टिकोण को परमेश्वर के साथ एक मेल में लाया जा सकता है, और हम अंधकार के प्रभाव से अलग हो सकते हैं। निम्नतम मानक यह है कि शैतान के द्वारा हमारा शोषण न किया जाए, किसी भी भ्रष्ट स्वभाव को दूर किया जाए, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को हासिल किया जाए। हम विश्वास करते हैं कि अंधकार के प्रभाव से अलग होना मुख्य बिन्दु है। यदि कोई अंधकार के प्रभाव से अलग नहीं हो सकता है, शैतान के बन्धनों को तोड़ कर आज़ाद नहीं हो सकता है, तो उसने परमेश्वर के उद्धार को अर्जित नहीं किया है।) (परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने का मानक यह है कि मनुष्य परमेश्वर के साथ एक हृदय एवं एक मन का हो। मनुष्य अब परमेश्वर का कोई प्रतिरोध नहीं करता है; वह स्वयं को जान सकता है, सत्य पर अमल करता है, परमेश्वर की समझ को अर्जित करता है, परमेश्वर से प्रेम करता है, और परमेश्वर के साथ एक मेल में आ जाता है। किसी व्यक्ति को यही सब करने की आवश्यकता है।)

लोगों के हृदय में परिणाम का बोझ

ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के हृदय में उस मार्ग के विषय में कुछ है जिसमें तुम सब को चलना चाहिए और तुम लोगों ने इसकी एक अच्छी पकड़ एवं समझ विकसित कर ली है। परन्तु जो कुछ तुम लोगों ने कहा था चाहे वह खोखले शब्द साबित हुए हों या असल वास्तविकता यह इस बात पर निर्भर होती है कि तुम सब दिन प्रतिदिन के अपने अभ्यास में किस पर ध्यान देते हो। तुम लोगों ने सिद्धान्तों में एवं सत्य की विषय वस्तु दोनों में सालों से सत्य के सभी पहलुओं की फसल काटी है। यह प्रमाणित करता है कि लोग आजकल सत्य के लिए प्रयास करने पर जोर देते हैं। और परिणामस्वरूप, सत्य के हर पहलु और हर मद ने यकीनन कुछ लोगों के दिलों में जड़ें जमा ली हैं। फिर भी, वह क्या है जिससे मैं सबसे अधिक डरता हूँ? यह कि यद्यपि सत्य के विषयों, एवं इन सिद्धान्तों ने अपनी जड़ें जमा ली हैं, फिर भी वह वास्तविक विषयवस्तु तुम लोगों के हृदय में ज़्यादा वज़न ही नहीं रखती है। जब तुम सब समस्याओं का सामना करते हो, परीक्षाओं से मुखातिब होते हो, विकल्पों से मुखातिब होते हो – तब तुम सब इन सच्चाईयों की वास्तविकता का लाभ उठाने हेतु कितने सक्षम होगे? परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के बाद क्या वे कठिनाईयों से होकर गुज़रने और तुम्हारी परीक्षाओं से उबरने में तुम लोगों की सहायता करेगा? क्या तुम सब अपनी परीक्षाओं में दृढ़ रहोगे और परमेश्वर के लिए ऊँचे स्वर से एवं साफ साफ गवाही दोगे? क्या पहले तुम सब इन मामलों में रुचि रखते थे? मुझे तुम सब से पूछने की अनुमति दो: अपने अपने हृदय में, प्रतिदिन की अपनी सोच एवं विचारों में, वह क्या है जो तुम सबों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या तुम लोग कभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचे हो? तुम सबको क्या लगता है सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह सत्य को अभ्यास में लाना है"; कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को पढ़ना है"; कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह स्वयं को परमेश्वर के सामने रखना है और प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना है" और तब ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं "निश्चित रूप से यह अपने कर्तव्य को प्रतिदिन उचित रीति से निभाना है"; फिर भी कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि वे सदैव इसके विषय में ही सोचते रहते हैं कि परमेश्वर को किस प्रकार संतुष्ट करें, सभी चीज़ों में किस प्रकार उसका पालन करें, और उसकी इच्छा के मेल में किस प्रकार कार्य करे। क्या यह ऐसा ही है? क्या बस इतना ही है? उदाहरण के लिए, कुछ लोग हैं जो कहते हैं: "मैं बस परमेश्वर की आज्ञा मानना चाहता हूँ। परन्तु जब कुछ घटित होता है तब मैं उसकी आज्ञा नहीं मान सकता।" कुछ लोग कहते हैं: "मैं बस परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ। भले ही मैं उसे बस एक बार ही संतुष्ट कर सकूँ, तो यह अच्छा होगा, किन्तु मैं उसे कभी संतुष्ट नहीं कर सकता हूँ।" और कुछ लोग कहते हैं, "मैं सिर्फ परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहता हूँ। परीक्षा के दिनों में बिना किसी शिकायत या निवेदनों के उसकी संप्रभुता एवं प्रबंधों का पालन करते हुए मैं केवल उसके आयोजनों के अधीन होना चाहता हूँ। फिर भी लगभग हर समय मैं आज्ञाकारी होने में असफल हो जाता हूँ।" कुछ अन्य कहते हैं "जब मुझे निर्णयों का सामना करना पड़ता है, तब मैं कभी सत्य को अभ्यास में लाने का चुनाव नहीं कर सकता हूँ। मैं हमेशा शरीर को संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं हमेशा अपनी व्यक्तिगत स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट करना चाहता हूँ।" इसका कारण क्या है? परमेश्वर की परीक्षा के आने से पहले, क्या तुम लोगों ने कई बार स्वयं को चुनौती दी है, और कई बार कोशिश की है और स्वयं को परखा है? देखो यदि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हो, वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो, और परमेश्वर से विश्वासघात न करने के लिए सुनिश्चित हो सकते हो। देखो कि तुम सब स्वयं को संतुष्ट नहीं कर सकते हो, अपनी स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट नहीं कर सकते हो, परन्तु सिर्फ परमेश्वर को ही संतुष्ट करते हो, और अपने व्यक्तिगत चुनावों से वंचित होते हो। क्या कोई ऐसा है? वास्तव में, केवल एक ही तथ्य है जिसे बिलकुल तुम लोगों की आंखों के सामने रखा गया है। यह वह है जिसमें तुम लोगों में से हर कोई अत्यधिक रूचि लेता है, जिसे तुम लोग सबसे अधिक जानना चाहते हो, और यह प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम एवं नियति का मामला है। तुम सब शायद इसका एहसास न करो, परन्तु यह कुछ ऐसा है जिसका कोई इंकार नहीं कर सकता है। जब मनुष्य के परिणाम की सच्चाई, मानवता के प्रति परमेश्वर की प्रतिज्ञा, और परमेश्वर मनुष्य को किस प्रकार की मंज़िल के पहुंचाने का इरादा करता है उसकी बात आती है, तो मैं जानता हूँ कि कुछ लोग हैं जिन्होंने पहले से ही इन मामलों पर कई बार परमेश्वर के वचनों का अध्ययन किया है। तब ऐसे लोग हैं जो बारम्बार इसकी खोज कर रहे हैं और अपने मनों में इस पर विचार कर रहे हैं, और उन्हें अभी भी कोई नतीजा नहीं मिला है, या शायद किसी निष्कर्ष तक पहुंच गए हैं। अंत में वे अभी भी इस बात के विषय में निश्चित नहीं हैं कि किस प्रकार का परिणाम उनका इंतज़ार करता है। सत्य के संवाद को स्वीकार करते समय, कलीसिया के जीवन को स्वीकार करते समय, अपने कर्तव्य को निभाते समय, अधिकांश लोग हमेशा इन निम्नलिखित प्रश्नों के निश्चित उत्तर को जानना चाहते हैं: मेरा परिणाम क्या होगा? क्या मैं उस पथ पर बिलकुल उसके अंत तक चल सकता हूँ? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? कुछ लोग यह चिंता भी करते हैं: मैं ने अतीत में कुछ किया है, मैं ने कुछ बातों को कहा है, मैं परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी रहा हूँ, मैं ने कुछ ऐसी चीज़ें की हैं जिसने परमेश्वर का विश्वासघात किया है, ऐसे कुछ मामले थे जहाँ मैं ने परमेश्वर को संतुष्ट नहीं किया था, परमेश्वर के हृदय को चोट पहुंचाया था, परमेश्वर को मुझ से निराश होने के लिए बाध्य किया था, परमेश्वर को मुझ से घृणा एवं नफरत करने के लिए बाध्य किया था, अतः शायद मेरा परिणाम अज्ञात है। यह कहना सही है कि अधिकतर लोग अपने स्वयं के परिणाम के विषय में असहज महसूस करते हैं। कोई भी यह कहने का साहस नहीं करता है: "मुझे सौ प्रतिशत निश्चितता के साथ महसूस होता है कि मैं ज़िन्दा बचा हुआ इंसान होऊंगा; मैं सौ प्रतिशत निश्चित हूँ कि मैं परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर सकता हूँ; मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो परमेश्वर के हृदय का अनुसरण करता है; मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसकी तारीफ परमेश्वर करता है।" कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना विशेष रूप से कठिन है, और यह कि सत्य को अभ्यास में लाना सबसे कठिन बात है। परिणामस्वरूप, ये लोग सोचते हैं कि वे सहायता से परे हैं, और वे एक अच्छे परिणाम के विषय में अपनी आशाओं को जगाने का साहस नहीं करते हैं। या शायद वे विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, और ज़िन्दा बचे हुए इंसान नहीं बन सकते हैं, और इस कारण कहेंगे कि उनके पास कोई परिणाम नहीं है, और एक अच्छी मंज़िल को हासिल नहीं कर सकते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि लोग कितनी सटीकता से सोचते हैं, हर कोई अपने परिणाम के विषय में कई बार आश्चर्य कर रहा है। उनके भविष्य के प्रश्नों पर, या उन प्रश्नों पर कि उन्हें क्या मिलेगा जब परमेश्वर अपने कार्य को समाप्त करता है, ये लोग सदैव गुणा भाग करते रहते हैं, एवं सदैव योजना बनाते रहते हैं। कुछ लोग दोगुनी कीमत चुकाते हैं; कुछ लोग अपने परिवारों एवं अपनी नौकरियों को छोड़ देते हैं; कुछ लोग अपने विवाह के विषय में हार मान लेते हैं; कुछ लोग परमेश्वर के लिए व्यय करने हेतु इस्तीफा दे देते हैं; कुछ लोग अपने कर्तव्य को निभाने के लिए घरों को छोड़ देते हैं; कुछ लोग कठिनाई का चुनाव करते हैं, और अत्यधिक कड़वे एवं थका देनेवाले काम को करना शुरू करते हैं; कुछ लोग धन का समर्पण करने, एवं अपना सर्वस्व समर्पित करने का चुनाव करते हैं; अभी भी कुछ लोग सत्य का अनुसरण करने, एवं परमेश्वर को जानने का अनुसरण करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग अभ्यास करने का चुनाव कैसे करते हो, क्या वह तरीका जिसके अंतर्गत तुम सब ऐसा करते हो महत्वपूर्ण है? (महत्वपूर्ण नहीं है।) तो हम कैसे समझाएं कि यह महत्वपूर्ण नहीं है? यदि यह तरीका महत्वपूर्ण नहीं है, तो क्या महत्वपूर्ण है? (बाहरी अच्छा व्यवहार सत्य को अभ्यास में लाने का नमूना नहीं है।) (जो हर कोई सोचता है वह महत्वपूर्ण नहीं है। यहाँ मुख्य बात यह है कि हमने सत्य को अभ्यास में लाया है या नहीं, और हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं या नहीं।) (मसीही विरोधियों एवं झूठे अगुवों का पतन यह समझने में हमारी सहायता करता है कि बाहरी व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण बात नहीं है। बाहरी तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने बहुत कुछ त्याग दिया है, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं, परन्तु विश्लेषण करने पर हम देख सकते हैं कि उनके पास सामान्यतः ऐसा हृदय ही नहीं है जो परमेश्वर का भय मानता है; सभी मायनों में वे उसका विरोध करते हैं। वे संकटपूर्ण समयों में हमेशा शैतान के साथ खड़े हो रहे हैं, और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप कर रहे हैं। इस प्रकार, यहाँ मुख्य विचार ये हैं कि जब समय आता है तो हम किस ओर खड़े होते हैं, और हमारे दृष्टिकोण क्या हैं।) तुम सब ने अच्छे से बोला है, और ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के पास पहले से ही सत्य को अभ्यास में लाने की, परमेश्वर के इरादों की, और जो कुछ परमेश्वर मनुष्य से मांग करता है उसकी एक मूल समझ एवं मानक है। यह कि तुम सब इस प्रकार से बोल सकते हो जो अत्यंत मर्मस्पर्शी है। यद्यपि यहाँ वहाँ कुछ अनुचित शब्द हैं, फिर भी तुम लोगों के कथन पहले से ही ऐसी व्याख्या के निकट आ रहे हैं जो सत्य के योग्य है। इससे प्रमाणित होता है कि तुम सभी ने लोगों, घटनाओं, एवं अपने चारों ओर की वस्तुओं, और अपने समस्त परिवेश जिसे परमेश्वर ने व्यवस्थित किया है, एवं हर एक चीज़ जिसे तुम सब देख सकते हो उनके विषय में अपने स्वयं की वास्तविक समझ को पहले ही विकसित कर लिया है। ये समझ सत्य के निकट आ रही है। यद्यपि जो कुछ तुम लोगों ने कहा था वह पूरी तरह से विस्तृत नहीं है, और कुछ शब्द बिलकुल भी उचित नहीं हैं, फिर भी तुम सब की समझ पहले से ही सत्य की वास्तविकता के निकट आ रही है। तुम लोगों को इस तरह बोलते हुए सुनने से मुझे खुशी होती है।

लोगों के विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं

कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिनाईयों को सह सकते हैं; वे दाम चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा है; वे बहुत ही आदरणीय हैं; और उनके पास अन्य लोगों की सराहना है। तुम सब क्या सोचते हो: क्या इस प्रकार के बाहरी आचरण को सत्य को अभ्यास में लाने के रूप में माना जा सकता है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहा है? ऐसा क्यों है कि बार-बार लोग इस प्रकार के व्यक्ति को देखते हैं और सोचते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, यह सोचते हैं कि वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और यह कि वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? कुछ लोग क्यों इस प्रकार सोचते हैं? इसके लिए केवल एक ही व्याख्या है। और वह व्याख्या क्या है? यह बहुत से लोगों के लिए ऐसा ही है, ऐसे प्रश्न जैसे सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और सत्य की यथार्थता का होना वास्तव में क्या है—ये प्रश्न बिलकुल स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग हैं जिन्हें अकसर ऐसे लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जो ऊपर से आत्मिक प्रतीत होते हैं, कुलीन प्रतीत होते हैं, ऐसे प्रतीत होते हैं कि उनके पास उत्कृष्ट स्वरूप है। जहाँ तक ऐसे लोगों की बात है जो पत्रियों एवं सिद्धान्तों के विषय में बोल सकते हैं, और जिनके सन्देश एवं कार्य सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, उनके प्रशंसकों ने उनके कार्यों के सार को, उनके कार्यों के पीछे के सिद्धान्तों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं उनको कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है। और उन्होंने कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं या नहीं, और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। उन्होंने इन लोगों की मानवता के मूल-तत्व को कभी नहीं परखा है। इसके बजाय, परिचित होने के पहले कदम से ही, थोड़ा थोड़ा करके, वे इन लोगों की तारीफ करने, और इन लोगों का परम आदर करने लग जाते हैं, और अन्त में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मनों में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं वे अपने परिवारों एवं नौकरियों को छोड़ सकते हैं, और ऊपर से देखने पर वे कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श लोग ऐसे हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और ऐसे लोग हैं जो वास्तव में एक अच्छा परिणाम एवं एक अच्छी मंज़िल को प्राप्त कर सकते हैं। उनके मनों में, ये आदर्श ऐसे लोग हैं जिनकी प्रशंसा परमेश्वर करता है। किस चीज़ ने लोगों को प्रेरित किया है कि इस प्रकार के विश्वास को रखें? इस मामले का सार क्या है? यह कौन कौन से परिणामों की ओर ले जा सकता है? आओ हम पहले इसके सार के विषय (सामग्री) की चर्चा करें।

लोगों के दृष्टिकोणों, लोगों के रीति व्यवहारों, जिन सिद्धान्तों को लोग अभ्यास करने के लिए चुनते हैं, और जिस पर लोग सामान्य तौर पर जोर देते हैं उनके सम्बन्ध में, अनिवार्य रूप से इन सब का मानवजाति से की गई परमेश्वर की मांगों का कोई लेना देना नहीं है। इसकी परवाह किए बगैर कि लोग सतही मसलों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं या गंभीर मसलों पर, पत्रियों एवं सिद्धान्तों या वास्तविकता पर, लोग उसके मुताबिक नहीं चलते हैं जैसे उन्हें पूरी तरह से चलना चाहिए, और वे उसे नहीं जानते हैं जिन्हें उन्हें पूरी तरह से जानना चाहिए। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिलकुल भी पसन्द नहीं करते हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धान्तों को खोजने एवं अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बदले, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिसे वे समझते हैं, जिसे वे जानते हैं, कि यह अच्छा अभ्यास एवं अच्छा व्यवहार है उसका सारांश निकालते हैं। तब यह सारांश अनुसरण करने के लिए उनका स्वयं का लक्ष्य, एवं अभ्यास करने हेतु सत्य बन जाता है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ऐसे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में लाने के स्थान पर अच्छे मानवीय व्यवहार को उपयोग में लाते हैं, जो परमेश्वर के अनुग्रह को पाने हेतु खुशामद करने के लिए लोगों की अभिलाषाओं को भी संतुष्ट करते हैं। यह सत्य के साथ संघर्ष करने के लिए, एवं परमेश्वर के साथ तर्क करने एवं विवाद करने के लिए घातक चीज़ें देता है। ठीक उसी समय, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और अपने हृदय के आदर्शों को परमेश्वर के स्थान में रख देते हैं। केवल एक ही मूल कारण है जिससे लोगों के पास ऐसे अज्ञानता भरे कार्य, अज्ञानता भरे दृष्टिकोण, या एकतरफा दृष्टिकोण एवं रीति व्यवहार होते हैं, और आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊंगा। कारण यह है कि यद्यपि हो सकता है कि लोग परमेश्वर के पीछे चलते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर का वचन पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर के इच्छा को वास्तव में नहीं समझते हैं। यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, यह समझता है कि परमेश्वर क्या पसन्द करता है, किस चीज़ से परमेश्वर घृणा करता है, परमेश्वर क्या चाहता है, किस चीज़ को परमेश्वर अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर नापसन्द करता है, मनुष्य से की गई अपनी मांगों के प्रति परमेश्वर किस प्रकार के मानकों (मानदंड) को लागू करता है, मनुष्य को सिद्ध करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति को अपनाता है, क्या तब भी उस व्यक्ति के पास अपने व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह बस यों ही जा सकता है तथा किसी और व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति उनका आदर्श बन सकता है? यदि कोई परमेश्वर के इरादों को समझता है, तो उनका दृष्टिकोण उसकी अपेक्षा थोड़ी बहुत न्यायसंगत होती है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति को आदर्श के रूप में लेने वाले नहीं है, न ही वे, सत्य को अमल में लाने के पथ पर चलते समय, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धान्तों के मुताबिक चलना ही सत्य को अमल में लाने के बराबर है।

उस मानक के सम्बन्ध में अनेक राय हैं जिसके तहत परमेश्वर किसी मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है

आओ हम इस विषय पर वापस आएं और परिणाम के विषय पर चर्चा करना निरन्तर जारी रखें।

चूँकि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिणाम को लेकर चिन्तित होता है, क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर किस प्रकार उस परिणाम को निर्धारित करता है? परमेश्वर किस रीति से किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करता है? और किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? और जब किसी मनुष्य का परिणाम अभी तक निर्धारित नहीं हुआ है, तो परमेश्वर इस परिणाम को प्रकट करने के लिए क्या करता है? क्या कोई इसे जानता है? जैसा मैं ने अभी अभी कहा था, कुछ लोग हैं जिन्होंने लम्बे समय पहले से ही परमेश्वर के वचन की खोजबीन की है। ये लोग मानवजाति के परिणाम के विषय में, उन श्रेणियों के विषय में जिस में यह परिणाम विभाजित होता है, और उन विभिन्न परिणामों के विषय में सुरागों की खोज कर रहे हैं जो विभिन्न प्रकार के लोगों का इंतज़ार कर रहे हैं। वे यह भी जानना चाहते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर का वचन मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है, उस प्रकार का मानक जिसे परमेश्वर उपयोग करता है, और वह रीति जिसके अंतर्गत वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है। फिर भी अन्त में ये लोग किसी भी चीज़ का पता नहीं लगा पाते हैं। वास्तविक तथ्य में, परमेश्वर के वचन के मध्य इस मामले पर बहुमूल्य रूप से थोड़ा बहुत ही कहा गया है। ऐसा क्यों है? अगर मनुष्य के परिणाम को अभी तक प्रकट नहीं किया गया है, परमेश्वर किसी को बताना नहीं चाहता है कि अन्त में क्या होने वाला है, और न ही वह किसी को समय से पहले उनकी नियति के विषय में सूचित करना चाहता है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के ऐसा करने से मनुष्य को कुछ लाभ नहीं होता। इस वक्त, मैं सिर्फ तुम लोगों को उस रीति के विषय में बताना चाहूंगा जिसके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है, उन सिद्धान्तों के विषय में बताना चाहूंगा जिन्हें वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए, और इस परिणाम को प्रदर्शित करने के लिए अपने कार्य में उपयोग में लाता है, साथ ही साथ उस मानक के विषय में भी बताना चाहूंगा जिसे वह यह निर्धारित करने के लिए इस्तेमाल करता है कि कोई व्यक्ति ज़िन्दा रह सकता है या नहीं। क्या यह वह बात नहीं है जिसके विषय में तुम सब अत्यंत चिन्तित हो? अतः फिर, लोग किस प्रकार उस मार्ग का एहसास करते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है? तुम लोगों ने इस मामले पर अभी अभी थोड़ा बहुत कहा था। तुम लोगों में से कुछ ने कहा था कि यह उनके कर्तव्य को विश्वासयोग्यता से निभाने, एवं परमेश्वर के लिए खर्च करने का एक प्रश्न है; कुछ ने कहा था कि यह परमेश्वर की आज्ञा मानना और परमेश्वर को संतुष्ट करना है; कुछ लोगों ने कहा था कि यह परमेश्वर की दया में रहना है; और कुछ लोगों ने कहा था कि यह शांत जीवन जीना है। जब तुम सब इन सच्चाईयों को अमल में लाते हो, जब तुम लोग अपनी कल्पना के सिद्धान्तों को अमल में लाते हो, तब क्या तुम सब जानते हो कि परमेश्वर क्या सोचता है? क्या तुम लोगों ने कभी विचार किया है कि इस प्रकार से आगे बढ़ना परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करता है या नहीं? यह परमेश्वर के मानक (स्टैण्डर्ड) को पूरा करता है या नहीं? यह परमेश्वर की मांग को पूरा करता है या नहीं? मेरा मानना है कि अधिकांश लोग इस पर वास्तव में विचार नहीं करते हैं। वे बस यंत्रवत् रूप से परमेश्वर के वचन के एक भाग को, या उपदेशों के एक भाग को, या कुछ निश्चित आत्मिक मनुष्यों के मानकों को लागू करते हैं जिन्हें वे पसन्द करते हैं, और इसे करने के लिए या उसे करने के लिए स्वयं को बाध्य करते हैं। वे मानते हैं कि यह सही तरीका है, अतः वे उसके मुताबिक चलते रहते हैं, उसे करते रहते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि अन्त में क्या होता है। कुछ लोग सोचते हैं: "मैं ने कुछ अनेक वर्षों से विश्वास किया है; मैं ने सदैव इस मार्ग का अभ्यास किया है; मैं महसूस करता हूँ कि मैं ने वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट किया है; मैं यह भी महसूस करता हूँ कि मैं ने इससे बहुत कुछ प्राप्त किया है। क्योंकि इस समय अवधि के दौरान मैं बहुत सारी सच्चाईयों को समझने लगा हूँ, और बहुत सी बातों को समझने लगा हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझता था—विशेष रूप में, मेरे कई विचार एवं दृष्टिकोण बदल चुके हैं, मेरे जीवन के मूल्य काफी कुछ बदल चुके हैं, और मेरे पास इस संसार की अच्छी खासी समझ है।" ऐसे लोग विश्वास करते हैं कि यह एक फसल है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य का अंतिम परिणाम है। तुम लोगों की राय में, इन मानकों और तुम सभी के रीति व्यवहारों (अभ्यास) को एक साथ लेकर, क्या तुम लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहे हो? कुछ लोग पूर्ण निश्चय के साथ कहेंगे: "निश्चित रूप से! हम परमेश्वर के वचन के अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; जो कुछ उस भाई ने प्रचार किया था और संगति में विचार विमर्श किया था हम उसके अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; हम हमेशा से अपने कर्तव्य को निभा रहे हैं, हमेशा से परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं, और हमने परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ा है। इसलिए हम पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि हम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम परमेश्वर के इरादों को कितना समझते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम परमेश्वर के वचन को कितना समझते हैं, क्योंकि हम हमेशा से ही परमेश्वर के अनुरूप होने के पथ की खोज करते रहे हैं। यदि हम सही रीति से कार्य करें, और सही रीति से अभ्यास करें, तो परिणाम सही होगा।" तुम लोग इस दृष्टिकोण के बारे में क्या सोचते हो? क्या यह सही है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हैं जो यह कहते हैं: "मैं ने इन चीज़ों के विषय में पहले कभी नहीं सोचा है। मैं केवल इतना सोचता हूँ कि यदि मैं लगातार अपने कर्तव्य को निभाता रहूं और परमेश्वर के वचन की अपेक्षाओं के अनुसार निरन्तर कार्य करता रहूं, तो मैं जीवित बच सकता हूँ। मैं ने कभी उस प्रश्न पर विचार नहीं किया है कि मैं परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता हूँ या नहीं, मैं ने कभी यह विचार नहीं किया है कि मैं उसके द्वारा अपेक्षित मानक को हासिल कर रहा हूँ या नहीं। चूँकि परमेश्वर ने मुझे कभी नहीं बताया है, और न ही किसी स्पष्ट निर्देश के साथ मेरी आपूर्ति की है, मैं विश्वास करता हूँ कि जब तक मैं बढ़ता जाता हूँ, परमेश्वर संतुष्ट होगा और उसके पास मेरे लिए कोई अतिरिक्त मांग नहीं होनी चाहिए।" क्या ये विश्वास सही हैं? जहाँ तक मेरी बात है, अभ्यास का यह तरीका, सोचने का यह तरीका, और ये दृष्टिकोण—वे सब अपने साथ कल्पनाओं एवं कुछ अंधत्व को लेकर आते हैं। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो कदाचित् तुम लोगों में से कुछ हैं जो थोड़ी बहुत निराशा महसूस करते हैं: "अंधापन? यदि यह अंधापन है, तो हमारे उद्धार की आशा, हमारे जीवित बचने की आशा बहुत ही छोटी है, और बहुत ही अनिश्चित है, है कि नहीं? क्या तुम्हारा ऐसा कहना हमारे ऊपर ठण्डा पानी डालने के समान नहीं है?" इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग क्या विश्वास करते हो, क्योंकि ऐसी बातें जो मैं कहता और करता हूँ उनका अभिप्राय यह नहीं है कि तुम सब को लगे मानो तुम लोगों के ऊपर ठण्डा पानी डाला जा रहा है। इसके बजाय, इसका अभिप्राय यह है कि परमेश्वर के इरादों के विषय में तुम सब की समझ को बेहतर किया जाए, और परमेश्वर क्या सोच रहा है उस पर तुम लोगों की पकड़ को बेहतर किया जाए, परमेश्वर क्या पूरा करना चाहता है, परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को पसन्द करता है, परमेश्वर किस से घृणा करता है, परमेश्वर किसे तुच्छ जानता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर पाना चाहता है, और किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर ठुकराता है। इसका अभिप्राय यह है कि तुम सब के मनों को स्पष्टता दी जाए, कि साफ साफ जानने में तुम सब की मदद की जाए कि तुम लोगों में से हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के कार्य एवं विचार उस मानक से कितनी दूर भटक गए हैं जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के द्वारा की गई है। क्या इन विषयों पर विचार विमर्श करना आवश्यक है? क्योंकि मैं जानता हूँ तुम सब ने लम्बे समय से विश्वास किया है, और बहुत अधिक प्रचार को ध्यान से सुना है, परन्तु ये बिलकुल ऐसी चीज़ें हैं जिनकी अत्यंत घटी है। शायद तुम लोगों ने अपनी नोटबुक में हर एक सत्य को लिख लिया है, शायद तुम सब ने उसे भी दर्ज कर लिया है जिस पर तुम लोग व्यक्तिगत रूप से अपने अपने मन में एवं अपने अपने हृदय में विश्वास करते हो कि यह महत्वपूर्ण है। जब तुम सब अभ्यास करते हो तब इसका उपयोग करने के लिए, एवं परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए योजना बनाओ; जब तुम लोग स्वयं को आवश्यकता में पाते हो तब इसका उपयोग करो; उन कठिन समयों से होकर गुज़रने के लिए इसका उपयोग करो जो तुम लोगों की आँखों के सामने होती हैं; या जब तुम सब अपनी अपनी ज़िन्दगी को जीते हो तब बस इन सच्चाईयों को तुम लोगों के साथ होने दो। जहाँ तक मेरी बात है, यदि तू केवल अभ्यास करता है, तो तू कितने सटीक रूप से अभ्यास कर रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं है। तब सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात क्या है? यह ऐसा है कि जब तू अभ्यास कर रहा है, तब तेरा हृदय पूरी निश्चयता के साथ जानता है कि हर एक कार्य जो तू कर रहा है, और प्रत्येक कार्य ऐसा कार्य है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, हर कार्य जिसे तू करता है, हर चीज़ जो तू सोचता है, और तेरे हृदय में जो परिणाम एवं लक्ष्य हैं वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करते हैं या नहीं, परमेश्वर की मांगों को पूरा करते हैं या नहीं, और परमेश्वर उनकी स्वीकृति देता है या नहीं, ये महत्वपूर्ण चीज़ें हैं।

परमेश्वर के मार्ग पर चलें: परमेश्वर का भय मानें और बुराई से दूर रहें

एक कहावत है जिस पर तुम सब को ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि यह कहावत अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मेरे मन में हर दिन अनगिनत बार आती है। ऐसा क्यों है? क्योंकि जब भी मैं किसी के सामने होता हूँ, जब भी मैं किसी की कहानी सुनता हूँ, जब भी मैं परमेश्वर पर विश्वास करने के विषय में किसी व्यक्ति का अनुभव या उनकी गवाही को सुनता हूँ, तब मैं हमेशा यह तौलने के लिए इस कहावत का उपयोग करता हूँ कि वह व्यक्ति उस प्रकार का इंसान है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, और उस प्रकार का इंसान है या नहीं जिसे परमेश्वर पसन्द करता है। अतः फिर वह कहावत क्या है? अब तुम सब पूरी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हो। जब मैं उस कहावत को प्रकट करता हूँ, कदाचित् तुम लोगों को निराशा महसूस हो क्योंकि ऐसे लोग हैं जो इसके प्रति अनेक वर्षों से दिखावटी प्रेम दिखा रहे हैं। परन्तु जहाँ तक मेरी बात है, मैने इसके प्रति कभी भी दिखावटी प्रेम नहीं दिखाया है। यह कहावत मेरे हृदय में बसी हुई है। अतः यह कहावत क्या है? यह "परमेश्वर के मार्ग में चलना: परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है।" क्या यह बहुत ही सरल वाक्यांश नहीं है? फिर भी हालाँकि यह कहावत सरल हो सकती है, कोई व्यक्ति जिसके पास असल में इसकी गहरी समझ है वह महसूस करेगा कि इसका बड़ा वज़न है; कि अभ्यास करने के लिए इसका बड़ा मूल्य है; कि सत्य की वास्तविकता के साथ यह जीवन की भाषा है; कि यह उनके लिए जीवनपर्यन्त उद्देश्य है जो परमेश्वर को संतुष्ट करने की खोज करते हैं; कि यह किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा अनुसरण करने हेतु जीवनपर्यन्त मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हैं। अतः तुम लोग क्या सोचते हो: क्या यह कहावत सत्य है? क्या इसका इस प्रकार का महत्व है? कदाचित् कुछ लोग हैं जो इस कहावत के बारे में ऐसा कहते हुए सोच रहे हैं, इसे समझने का प्रयास कर रहे हैं, और अभी भी ऐसे लोग हैं जो इसके विषय में सन्देहास्पद हैं: क्या यह कहावत अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या यह अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या यह इतना ज़रूरी है और और जोर देने लायक है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हैं जो इस कहावत को उतना पसन्द नहीं करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि परमेश्वर के मार्ग को लेना और उसे एक कहावत में सारभूत करना इसे बहुत ही सरल बनाना है। जो कुछ परमेश्वर ने कहा था वह सब लेना और एक कहावत में उसका संक्षेपण करना—क्या यह परमेश्वर को थोड़ा महत्वहीन नहीं बना रहा है? क्या यह ऐसा ही है? ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से अधिकांश जन इन वचनों के पीछे के गंभीर अर्थ को पूरी तरह से नहीं समझते हो। यद्यपि तुम लोगों ने इसे लिख लिया है, फिर भी तुम सब इस कहावत को अपने हृदय में स्थान देने का इरादा नहीं करते हो; तुम सब बस इसे लिख लेते हो, और अपने खाली समय में इसे फिर से पढ़ते हो और इस पर गहराई से विचार करते हो। कुछ अन्य लोग भी हैं जो इस कहावत को स्मरण करने की भी परवाह नहीं करते हैं, अच्छे उपयोग के लिए इसका अभ्यास करने की तो बात ही छोड़ ही दो। परन्तु मैं इस कहावत पर चर्चा क्यों करता हूँ? तुम लोगों के दृष्टिकोण, या जो कुछ तुम सब सोचोगे उनकी परवाह किए बगैर, मुझे इस कहावत पर चर्चा करनी है क्योंकि यह इस बात से अत्यंत प्रासंगिक है कि किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के परिणामों को निर्धारित करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इस कहावत के विषय में तुम लोगों की वर्तमान समझ क्या है, या तुम सब इससे कैसा व्यवहार करते हो, मैं अभी भी तुम लोगों को बताने जा रहा हूँ: यदि कोई व्यक्ति इस कहावत का उचित रीति से अभ्यास कर सकता है और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मानक को हासिल कर सकता है, तो उन्हें जीवित बचे हुए इंसान के रूप में आश्वस्त किया जाता है, तो उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में आश्वस्त किया जाता है जिसके पास एक अच्छा परिणाम होता है। यदि तुम उस मानक को प्राप्त नहीं कर सकते हो जिसे इस कहावत के द्वारा रखा गया है, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तेरा परिणाम अज्ञात है। इस प्रकार मैं तुम लोगों की मानसिक तैयारी के लिए इस कहावत के बारे में तुम सब से कहता हूँ, और जिससे तुम लोग जान लो कि तुम सब को मापने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है। जैसा मैं ने अभी अभी विचार विमर्श किया है, यह कहावत मनुष्य के विषय में परमेश्वर के उद्धार से, और वह किस प्रकार मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है उससे पूरी तरह से प्रासंगिक (विषय से जुड़ा हुआ) है। यह प्रासंगिकता कहाँ होती है? तुम सब वास्तव में जानना चाहोगे, अतः आज हम इस बारे में बात करेंगे।

परमेश्वर यह परखने के लिए विभिन्न परीक्षाओं का उपयोग करता है कि लोग परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं या नहीं

प्रत्येक युग में, जब परमेश्वर इस संसार में कार्य करता है तब वह मनुष्य को कुछ वचन प्रदान करता है, मनुष्य को कुछ सच्चाईयां बताता है। ये सच्चाईयां ऐसे मार्ग के रूप में कार्य करती हैं जिसके मुताबिक मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जिसमें मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के लिए सक्षम करता है, और ऐसा मार्ग जिसका मनुष्य को अभ्यास करना चाहिए और अपने जीवन में और अपने जीवन की यात्राओं के दौरान उसके मुताबिक चलना चाहिए। यह इन कारणों के लिए है कि परमेश्वर ने इन शब्दों को मनुष्य पर प्रदान किया है। ये वचन जो परमेश्वर से आते हैं उनके मुताबिक ही मनुष्य को चलना चाहिए, और उनके मुताबिक चलना ही जीवन पाना है। यदि कोई व्यक्ति उनके मुताबिक नहीं चलता है, उन्हें अभ्यास में नहीं लाता है, और अपने जीवन में परमेश्वर के वचनों को नहीं जीता है, तो वह व्यक्ति सत्य को अमल में नहीं ला रहा है। और यदि वे सत्य को अमल में नहीं ला रहे हैं, तो वे परमेश्वर का भय नहीं मान रहे हैं और बुराई से दूर नहीं रह रहे हैं, और न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यदि कोई परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता है, तो वे परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त नहीं कर सकते हैं; इस प्रकार के व्यक्ति के पास कोई परिणाम नहीं होता है। अतः तब परमेश्वर के कार्य के पथक्रम में वह किस प्रकार किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करता है? मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परमेश्वर किस पद्धति का उपयोग करता है? कदाचित् इस वक्त इस पर तुम लोग बहुत अधिक स्पष्ट नहीं हो, परन्तु जब मैं तुम सब को वह प्रक्रिया बताऊंगा तो यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा। यह इसलिए है क्योंकि बहुत सारे लोगों ने पहले से ही स्वयं इसका अनुभव कर लिया है।

परमेश्वर के कार्य के दौरान, आरम्भ से लेकर अब तक, परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए परीक्षाएं निर्धारित कर रखी हैं—या तुम लोग कह सकते हो, प्रत्येक व्यक्ति जो उसका अनुसरण करता है – और ये परीक्षाएं भिन्न भिन्न आकार में आती हैं। ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने परिवार के द्वारा तिरस्कृत होने की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग जिन्होंने विपरीत वातावरण की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग जिन्होंने गिरफ्तार होने एवं यातनाएं दिए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग जिन्होंने किसी एक विकल्प को चुनने की परीक्षा का सामना करने का अनुभव किया है; और ऐसे लोग जिन्होंने धन एवं रुतबे की परीक्षाओं का सामना करने का अनुभव किया है। सामान्य रूप से कहें, तो तुम लोगों में से प्रत्येक ने सभी प्रकार की परीक्षाओं का सामना किया है। परमेश्वर इस प्रकार से कार्य क्यों करता है? परमेश्वर हर किसी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करता है? वह किस प्रकार के परिणाम को देखना चाहता है? जो कुछ मैं तुम सब से कहना चाहता हूँ यह उसका महत्वपूर्ण बिन्दु है: परमेश्वर देखना चाहता है कि यह व्यक्ति उस प्रकार का है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। इसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर तुझे कोई परीक्षा दे रहा है, तुझ से किसी परिस्थिति का सामना करवा रहा है, तो वह परीक्षा लेना चाहता है कि तू ऐसा व्यक्ति है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है, और ऐसा व्यक्ति है या नहीं जो बुराई से दूर रहता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भेंट (दान राशी) को सुरक्षित रखने के कर्तव्य से मुखातिब होता है, और वे परमेश्वर की भेंट के सम्पर्क में आते हैं, तो क्या तू सोचता है कि यह ऐसी चीज़ है जिसका प्रबंध परमेश्वर ने किया है? कोई प्रश्न ही नहीं है! जिस किसी चीज़ का तू सामना करता है वह ऐसी चीज़ है जिसका प्रबंध परमेश्वर ने किया है। जब तेरा सामना ऐसे किसी मामले से होता है, तो परमेश्वर गुप्त रीति से तेरा अवलोकन करेगा, तुझे देखेगा कि तू कैसा चुनाव करता है, तू कैसा अभ्यास करता है, और तू किसके विषय में सोच रहा है। अंतिम परिणाम यही है जिसमें परमेश्वर सबसे अधिक रूचि लेता है, चूँकि यह ऐसा परिणाम है जो उसे यह मापने देगा कि इस परीक्षा में तूने परमेश्वर के मानक को हासिल किया है या नहीं। फिर भी, जब लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तो वे अकसर इसके विषय में नहीं सोचते है कि उनका सामना इस से, या परमेश्वर के द्वारा मांगी गई मानक (स्तर) से क्यों हो रहा है। वे इसके विषय में नहीं सोचते हैं कि परमेश्वर उनमें क्या देखना चाहता है, वह उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है। ऐसे मामले से सामना होने पर, इस प्रकार का व्यक्ति केवल यह सोच रहा है, "यह कुछ ऐसा है जिसका मैं सामना करता हूँ; मुझे सावधान रहना होगा, असावधान नहीं! चाहे कुछ भी हो, यह परमेश्वर की भेंट है और मैं इसे छू नहीं सकता हूँ।" ऐसा व्यक्ति विश्वास करता है कि वे ऐसे अत्यंत सरल सोच को धारण करके अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा कर सकते हैं। क्या परमेश्वर इस परीक्षा के परिणाम के द्वारा संतुष्ट होगा? या वह संतुष्ट नहीं होगा? तुम लोग इस पर चर्चा कर सकते हो। (यदि कोई अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानता है, तो जब उस कर्तव्य से सामना होता है जो उन्हें परमेश्वर को चढ़ाई भेंट से सम्पर्क करने की अनुमति देता है, तो वे विचार करेंगे कि परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुंचाना कितना आसान होगा, अतः वे सावधानी से आगे बढ़ने के लिए निश्चित होंगे।) तेरा प्रत्युत्तर सही पटरी पर है, परन्तु अभी तक वहाँ बिलकुल भी नहीं पहुंचा है। परमेश्वर के मार्ग पर चलना सतह पर नियमों का अवलोकन करने के विषय में नहीं है। इसके बजाय, इसका अर्थ यह है कि जब तेरा सामना किसी मामले से होता है, तो सबसे पहले, तू इसे ऐसी परिस्थिति के रूप में देख जिसका प्रबंध परमेश्वर के द्वारा किया गया है, ऐसी ज़िम्मेदारी के रूप में देख जिसे उसके द्वारा तुझे प्रदान किया गया है, या किसी ऐसी चीज़ के रूप में देख जिसे उसने तुझे सौंपा है, और यह कि जब तू इसका सामना कर रहा है, तो तुझे इसे परमेश्वर से आई किसी परीक्षा के रूप में भी देखना चाहिए। इस मामले का सामना करते समय, तेरे पास एक मानक अवश्य होना चाहिए, तुझे सोचना होगा कि यह परमेश्वर की ओर से आया है, तुझे इसके विषय में सोचना होगा कि किस प्रकार इस मामले से कुछ इस तरह निपटें कि तू अपनी ज़िम्मेदारी को निभा सके, और परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य रहे; इसे कैसे करे और परमेश्वर को क्रोधित न करे, या उसके स्वभाव को ठेस न पहुंचाए। हमने अभी अभी भेंटों (दान राशि) की सुरक्षा के विषय में बात की थी। इस मामले में भेंट शामिल हैं, और साथ ही इसमें तेरे कर्तव्य, एवं तेरी ज़िम्मेदारी भी शामिल है। तू इस ज़िम्मेदारी के प्रति कर्तव्य से बंधा हुआ है। फिर भी जब तेरा सामना इस मामले से होता है, तो क्या कोई प्रलोभन है? हाँ है! यह प्रलोभन कहाँ से आया है? यह प्रलोभन शैतान की ओर से आता है, और साथ ही यह मनुष्य की बुराई, एवं भ्रष्ट स्वभाव से भी आता है। चूँकि प्रलोभन है, इसमें स्थिर गवाही शामिल है; स्थिर गवाही भी तेरी ज़िम्मेदारी एवं कर्तव्य है। कुछ लोग कहते हैं: "यह तो इतना छोटा मसला है; क्या वास्तव में इससे बात का बतंगड़ बनाना ज़रूरी है?" हाँ यह ज़रूरी है! क्योंकि परमेश्वर के मार्ग पर चलने के लिए, हम किसी ऐसी चीज़ को जाने नहीं दे सकते हैं जिसका हमसे लेना देना है, या कोई ऐसी चीज़ जो हमारे आस पास घटित होती है, यहाँ तक कि छोटी छोटी चीज़ें भी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम सोचें कि हमें इस पर ध्यान देना चाहिए या नहीं, जब तक कोई मसला हमारा सामना कर रहा है तब तक हमें उसे जाने नहीं देना चाहिए। इन सभी चीज़ों को हमारे लिए परमेश्वर की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। इस प्रकार की मनोवृत्ति कैसी है? यदि तेरे पास इस प्रकार की मनोवृत्ति है, तो यह एक तथ्य को प्रमाणित करती है: तेरा हृदय परमेश्वर का भय मानता है, और तेरा हृदय बुराई से दूर रहने के लिए तैयार है। यदि तेरे पास परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए ऐसी इच्छा है, तो जिसे तू अभ्यास में लाता है वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मानक से दूर नहीं है।

प्रायः ऐसे लोग होते हैं जो मानते हैं कि ऐसे मामले जिन पर लोगों के द्वारा अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है, ऐसे मामले जिनका सामान्यतः उल्लेख नहीं किया जाता है – ये महज छोटी मोटी निरर्थक बातें होती हैं, और उनका सत्य के अभ्यास से को कोई लेना देना नहीं होता है। जब ऐसे लोगों का सामना ऐसे मामले से होता है, तो वे उस पर अधिक विचार नहीं करते हैं और उसे जाने देते हैं। परन्तु वास्तविक तथ्य में, यह मामला एक सबक है जिसके लिए तुझे अध्ययन करना चाहिए, और उसके विषय में एक सबक है कि किस प्रकार परमेश्वर का भय मानना है, एवं किस प्रकार बुराई से दूर रहना है। इसके अतिरिक्त, जिसके विषय में तुझे और भी अधिक चिंता करनी चाहिए वह यह जानना है कि जब यह मामला तेरा सामना करने के लिए उठ खड़ा होता है तब परमेश्वर क्या कर रहा है। परमेश्वर ठीक तेरे बगल में है, तेरे प्रत्येक शब्द एवं कार्य का अवलोकन कर रहा है, तेरे कार्यों, एवं तेरे मन में हुए परिवर्तनों का अवलोकन कर रहा है—यह परमेश्वर का कार्य है। कुछ लोग कहते हैं: "तो मुझे इसका एहसास क्यों नहीं होता है?" तूने इसका एहसास नहीं किया किया है क्योंकि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग तेरा अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग नहीं रहा है कि तू उसके मुताबिक चले। इसलिए, तू मनुष्य में परमेश्वर के सूक्ष्म कार्य को महसूस नहीं कर सकता है, जो लोगों के विभिन्न विचारों एवं विभिन्न कार्यों के अनुसार स्वयं को प्रदर्शित करते हैं। तू एक भुलक्कड़ है। इसमें कौन सी बड़ी बात है? छोटी बात क्या है? सभी मामलों को बड़े एवं छोटे मामलों में विभाजित नहीं किया गया है जिसमें परमेश्वर के मार्ग पर चलना शामिल है। क्या तुम लोग उसे स्वीकार कर सकते हो? (हम इसे स्वीकार कर सकते हैं।) प्रतिदिन के मामलों के सम्बन्ध में, कुछ मामले हैं जिन्हें लोग बहुत बड़े एवं महत्वपूर्ण मामले के रूप में देखते हैं, और अन्य मामलें हैं जिन्हें छोटी मोटी निरर्थक मामलों के रूप में देखा जाता है। लोग अकसर इन बड़े मामलों को अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों के रूप में देखते हैं, और वे विचार करते हैं कि उन्हें परमेश्वर के द्वारा भेजा गया है? फिर भी, इन बड़े मामलों के जारी होने के पथक्रम के दौरान, मनुष्य के अपरिपक्व कदकाठी के कारण, और मनुष्य की कम क्षमता के कारण, मनुष्य प्रायः परमेश्वर के इरादों के मुताबिक नहीं होता है, वह कोई प्रकाशन प्राप्त नहीं कर सकता है, और कोई वास्तविक ज्ञान हासिल नहीं कर सकता है जो किसी मूल्य का हो। जहाँ तक छोटे छोटे मामलों की बात है, लोगों के द्वारा बस इनकी अनदेखी की जाती है, और थोड़ा थोड़ा करके हाथ से फिसलने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार, उन्होंने परमेश्वर के सामने जांचे जाने, एवं उसके द्वारा परखे जाने के अनेक अवसरों को खो दिया है। क्या तुझे हमेशा लोगों, चीज़ों, एवं मामलों, एवं परिस्थितियों को अनदेखा करना चाहिए जिनका इंतज़ाम परमेश्वर ने तेरे लिए किया है, इसका क्या अर्थ होगा? इसका अर्थ है कि प्रतिदिन, यहाँ तक कि प्रत्येक क्षण, तू हमेशा से अपने विषय में परमेश्वर की सिद्धता का एवं परमेश्वर की अगुवाई का परित्याग कर रहा है। जब कभी परमेश्वर तेरे लिए किसी परिस्थिति का प्रबंध करता है, तो वह गुप्त रीति से देख रहा है, तेरे हृदय को देख रहा है, तेरी सोच एवं विचारों को देख रहा है, तू किस प्रकार सोचता है उसे देख रहा है, तू किस प्रकार कार्य करेगा उसे देख रहा है। यदि तू एक लापरवाह व्यक्ति है—ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के मार्ग, परमेश्वर के वचन, या उस सत्य के विषय में कभी भी गंभीर नहीं रहा है—तो तू सचेत नहीं होगा, तू उस पर ध्यान नहीं देगा जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता है, और उस पर ध्यान नहीं देगा जिसकी मांग परमेश्वर तुझसे उस समय करता है जब वह तेरे लिए परिस्थितियों का प्रबंध करता है। साथ ही तू यह भी नहीं जानेगा कि लोग, चीज़ें, एवं मामले जिनका तुम लोग सामना करते हो वे किस प्रकार उस सच्चाई से या परमेश्वर के इरादों से सम्बन्ध रखते हैं। जब तू इस प्रकार बार-बार परिस्थितियों एवं बार-बार परीक्षाओं का सामना करता है उसके पश्चात्, और जब परमेश्वर तेरे नाम में किसी उपलब्धि को नहीं देखता है, तो परमेश्वर कैसे आगे बढ़ेगा? बार-बार परीक्षाओं का सामना करने के बाद, तू अपने हृदय में परमेश्वर की महिमा का बखान नहीं करता है, और तू उन परिस्थितियों से जिन्हें परमेश्वर ने तेरे लिए व्यवस्थित किया है वैसा व्यवहार नहीं करता है जैसे उनसे किया जाना चाहिए—परमेश्वर की परीक्षाओं के रूप में या परमेश्वर की परख के रूप में। इसके बजाय तू उन अवसरों को अस्वीकार करता है जिन्हें परमेश्वर ने तुझे एक के बाद एक प्रदान किया है, और बार-बार उन्हें हाथ से जाने देता है। क्या यह मनुष्य के द्वारा बड़ी अनाज्ञाकारिता नहीं है? (यह है।) क्या इसके कारण परमेश्वर शोकित होगा? (वह शोकित होगा।)परमेश्वर शोकित नहीं होगा! मुझे इस प्रकार कहते हुए सुनकर तुम लोग एक बार फिर से अचम्भित हो गए हो। आखिरकार, क्या ऐसा पहले नहीं कहा गया था कि परमेश्वर हमेशा शोकित होता है? परमेश्वर शोकित नहीं होगा? तो परमेश्वर कब शोकित होगा? खैर, परमेश्वर इस स्थिति के द्वारा शोकित नहीं होगा। तो उस प्रकार के व्यवहार के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है जिसकी रूपरेखा ऊपर दी गई है? जब लोग प्रलोभनों एवं परीक्षाओं को अस्वीकार करते हैं जिन्हें परमेश्वर उन पर भेजता है, जब वे वहाँ से भाग जाते हैं, तो केवल एक ही मनोवृत्ति है जो इन लोगों के प्रति परमेश्वर के पास होती है। यह मनोवृत्ति क्या है? परमेश्वर अपने हृदय की गहराई से इस प्रकार के व्यक्ति को ठुकराता है। यहाँ "ठुकराने" शब्द के लिए अर्थ की दो परतें हैं। मैं उन्हें किस प्रकार समझाऊं? भीतर गहराई में, वह शब्द घृणा एवं नफरत के संकेत अर्थों को लिए हुए है। और जहाँ तक अर्थ की दूसरी परत की बात है? यह वह भाग है जो किसी चीज़ को छोड़ देने को सूचित करता है। तुम सभी जानते हो कि "छोड़ देने" का क्या अर्थ है, सही है? संक्षेप में, ठुकराने का अर्थ है ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की अंतिम प्रतिक्रिया एवं मनोवृत्ति जो इस रीति से व्यवहार कर रहे हैं। यह उनके प्रति चरम नफरत है, एवं चिढ़ है, और इस प्रकार उन्हें त्याग देने का निर्णय लिया गया। यह ऐसे व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का अंतिम निर्णय है जो परमेश्वर के मार्ग पर कभी नहीं चला है, जिसने कभी परमेश्वर का भय नहीं माना है और बुराई से दूर नहीं रहा है। क्या अब तुम सभी लोग इस कहावत के महत्व को देख सकते हो जिसे मैं ने कहा है?

अब क्या तू उस तरीके को समझता है जिसे परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए उपयोग करता है? (हर दिन विभिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना।) विभिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना—यह वह है जिसे लोग महसूस एवं स्पर्श कर सकते हैं। तो इसके लिए परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? वह उद्देश्य यह है कि परमेश्वर विभिन्न तरीकों से, विभिन्न समयों पर, और विभिन्न स्थानों में हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति को परीक्षाएं देना चाहता है। किसी परीक्षा में मनुष्य के किन पहलुओं को जांचा जाता है? चाहे तू उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जो हर उस मामले में परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है जिसका तू सामना करता है, जिसके विषय में तू सुनना है, जिसे तू देखता है, और जिसका तू व्यक्तिगत रीति से अनुभव करता है। हर कोई इस प्रकार की परीक्षा का सामना करेगा, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष है। कुछ लोग कहते हैं: "मैं ने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है; ऐसा क्यों है कि मैं ने किसी भी परीक्षा का सामना नहीं किया है?" तुझे लगता है कि तूने किसी परीक्षा का सामना नहीं किया है क्योंकि जब कभी परमेश्वर ने तेरे लिए परिस्थितियों को व्यवस्थित किया है, तो तूने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया है, और परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं चाहा है। अतः तेरे पास परमेश्वर की परीक्षाओं का कोई एहसास ही नहीं है। कुछ लोग कहते हैं: "मैं ने कुछ परीक्षाओं का सामना किया है, किन्तु मैं अभ्यास करने के उचित तरीके को नहीं जानता हूँ। यद्यपि मैं ने अभ्यास किया था, फिर भी मैं अभी भी नहीं जानता हूँ कि मैं परीक्षाओं के दौरान स्थिर खड़ा था या नहीं।" ऐसे लोग जिनके पास इस प्रकार की स्थिति होती है वे निश्चित रूप से कम संख्या में नहीं हैं। अतः तब वह मानक क्या है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को मापता है? यह ठीक ऐसा ही है जैसा मैं ने कुछ क्षण पहले कहा था: जो कुछ भी तू करता है, जो कुछ भी तू सोचता है, और जो कुछ भी तू व्यक्त करता है—क्या यह परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है? इसी प्रकार यह निर्धारित होता है कि तू ऐसा व्यक्ति है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है? क्या यह एक सरल अवधारणा है? इसे कहना काफी आसान है, परन्तु क्या इसका अभ्यास करना आसान है? (यह इतना आसान नहीं है।) यह इतना आसान क्यों नहीं है? (क्योंकि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, नहीं जानते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार मनुष्य को सिद्ध करता है, और इस प्रकार जब उनका सामना उन मामलों से होता है तब वे नहीं जानते हैं कि अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य की खोज कैसे करें; लोगों को विभिन्न परीक्षाओं, शुद्धिकरण, ताड़नाओं, एवं न्याय से होकर गुज़रना ही होगा, इससे पहले कि उनके पास परमेश्वर का भय मानने की वास्तविकता हो।) तुम लोग इसे इस प्रकार रखते हो, परन्तु जहाँ तक तुम सब की बात है, परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना इस वक्त आसानी से क्रियान्वित करने योग्य प्रतीत होता है। मैं क्यों ऐसा कहता हूँ? क्योंकि तुम लोगों ने बहुत सारे सन्देशों को सुना है, और सत्य की वास्तविकता के विषय में थोड़ी सी भी सिंचाई को प्राप्त नहीं किया है। इसने यह समझने में तुम सब की मदद की है कि किस प्रकार सिद्धान्त एवं सोच के सम्बन्ध में परमेश्वर का भय मानना है और बुराई से दूर रहना है। परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के विषय में तुम सब के अभ्यास के सम्बन्ध में, यह सब सहायक रहा है और तुम लोगों को ऐसी चीज़ का अनुभव कराता है जिसे आसानी से हासिल किया जा सकता है। तब क्यों वास्तविक तथ्य में लोग इसे कभी प्राप्त नहीं कर सकते हैं? यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य के स्वभाव का सार परमेश्वर का भय नहीं मानता है, और बुराई को पसन्द करता है। यही वास्तविक कारण है।

परमेश्वर का भय न मानना और बुराई से दूर न रहना परमेश्वर का विरोध करना है

आओ हम यह सम्बोधित करने के द्वारा आरम्भ करें कि यह कहावत "परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना" कहाँ से आया है। (अय्यूब की पुस्तक।) अब जबकि तुम लोगों ने अय्यूब का जिक्र किया है, तो आओ हम उसकी चर्चा करें। अय्यूब के समय में, क्या परमेश्वर मनुष्य को जीतने और उनका उद्धार करने के लिए कार्य कर रहा था? वह नहीं कर रहा था, क्या वह कर रहा था? और जहाँ तक अय्यूब की बात है, उस समय उसके पास परमेश्वर का कितना ज्ञान था? (बहुत अधिक ज्ञान नहीं।) और किस प्रकार परमेश्वर का वह ज्ञान उस ज्ञान से तुलना करता था जो इस वक्त तुम लोगों के पास है? ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम सब इसका उत्तर देने का साहस नहीं करते हो? क्या अय्यूब का ज्ञान उस ज्ञान की अपेक्षा ज़्यादा या कम था जो तुम लोगों के पास इस वक्त है? (कम।) यह उत्तर देने के लिए बड़ा आसान प्रश्न है। कम! यह निश्चित है! आज तुम सब परमेश्वर के आमने सामने हो, और परमेश्वर के वचन के आमने सामने हो। परमेश्वर के विषय में तुम सब का ज्ञान अय्यूब के ज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक है। मैं इसे सामने लेकर क्यों आया हूँ? मैं इस प्रकार क्यों बोलता हूँ? मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझाना चाहूंगा, परन्तु इससे पहले कि मैं समझाऊं, मैं तुम सब से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ: अय्यूब परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था, फिर भी वह परमेश्वर का भय मान सकता था और बुराई से दूर रह सकता था। अतः ऐसा क्यों है कि इन दिनों लोग ऐसा करने में असफल हो जाते हैं? (अत्यधिक भ्रष्टता।) अत्यधिक भ्रष्टता—यह प्रश्न का ऊपरी भाग है, परन्तु मैं कभी इसे इस प्रकार नहीं देखूंगा। तुम लोग अकसर ऐसे सिद्धान्तों एवं पत्रियों को लेते हो जिनके विषय में तुम सब सामान्यतः बात करते हो, जैसे "अत्यधिक भ्रष्टता," "परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करना," "परमेश्वर के प्रति विश्वासघात," "अनाज्ञाकारिता," "सत्य को पसन्द न करना," और तुम लोग हर एक प्रश्न के सार की व्याख्या करने के लिए इन वाक्यांशों का उपयोग करते हो। यह अभ्यास करने का एक त्रुटिपूर्ण तरीका है। विभिन्न स्वभावों के प्रश्नों को समझाने के लिए उसी उत्तर का उपयोग करना सत्य एवं परमेश्वर की निन्दा करने के विषय में अनिवार्य रूप से सन्देहों को उत्पन्न करता है। मुझे इस तरह का उत्तर सुनना पसन्द नहीं है। इसके बारे में सोचो! तुम लोगों में से किसी ने भी इस मुद्दे के विषय में नहीं सोचा है, परन्तु हर दिन मैं इसे देख सकता हूँ, और हर दिन मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। इस प्रकार, तुम सब इसे कर रहे हो, और मैं देख रहा हूँ। जब तुम लोग इसे कर रहे हो, तब तुम सब इस मुद्दे के सार का एहसास नहीं कर सकते हो। परन्तु जब मैं इसे देखता हूँ, तो मैं इसके सार को देख सकता हूँ, और साथ ही मैं इसके सार को भी महसूस कर सकता हूँ। अतः फिर सार क्या है? इन दिनों लोग परमेश्वर का भय क्यों नहीं मान सकते है और बुराई से दूर क्यों नहीं रह सकते हैं? तुम लोगों के उत्तर इस प्रश्न के सार की व्याख्या करने के योग्य होने से बहुत दूर हैं, और वे इस प्रश्न के सार का समाधान नहीं कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहाँ एक स्रोत है जिसके बारे में तू नहीं जानता है। यह स्रोत क्या है? मैं जानता हूँ कि तुम सब इसके बारे में सुनना चाहते हो, अतः मैं तुम लोगों को इस प्रश्न के स्रोत के बारे में बताऊंगा।

परमेश्वर के कार्य की बिलकुल शुरुआत में, वह मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर ने मनुष्यों को छुटकारा दिया था; वह मनुष्य को अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में मानता था, अपने कार्य के लक्ष्य के रूप में मानता था, उस रूप में मानता था जिसे वह जीतना चाहता था, जिसका उद्धार करना चाहता था, और उस रूप में मानता था जिसे वह सिद्ध बनाना चाहता था। अपने कार्य के आरम्भ में मनुष्य के प्रति यह परमेश्वर की मनोवृत्ति थी। परन्तु उस समय परमेश्वर के प्रति मनुष्य की मनोवृत्ति क्या थी? परमेश्वर मनुष्य के लिए अजीब था, और मनुष्य परमेश्वर को एक अजनबी मानता था। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की मनोवृत्ति सही नहीं थी, और मनुष्य इस विषय पर स्पष्ट नहीं था कि उसे किस प्रकार परमेश्वर से व्यवहार करना चाहिए। अतः उसने उससे वैसा व्यवहार किया जैसा वह चाहता था, और जो कुछ भी चाहता था वही किया। क्या मनुष्य के पास परमेश्वर के प्रति कोई दृष्टिकोण था? आरम्भ में, मनुष्य के पास परमेश्वर के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं था। मनुष्य का तथाकथित दृष्टिकोण परमेश्वर के सम्बन्ध में बस कुछ अवधारणाएं एवं कल्पनाएं ही थीं। जो कुछ लोगों की अवधारणाओं के अनुरूप था उसे स्वीकार किया गया; जो कुछ अनुरूप नहीं था उसका ऊपरी तौर पर पालन किया गया; परन्तु अपने अपने हृदय में लोग उसे कड़ाई से टक्कर देते थे और उसका विरोध करते थे। आरम्भ में यह मनुष्य एवं परमेश्वर का सम्बन्ध था: परमेश्वर मनुष्य को परिवार के एक सदस्य के रूप में देखता था, फिर भी मनुष्य परमेश्वर से एक अजनबी के रूप में व्यवहार करता था। परन्तु परमेश्वर के कार्य की एक समय अवधि के पश्चात्, मनुष्य यह समझने लगा कि परमेश्वर क्या हासिल करने का प्रयास कर रहा था। लोग जानने लगे थे कि परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर था, और वे जानने लगे थे कि मनुष्य परमेश्वर से क्या प्राप्त कर सकता था। इस समय मनुष्य परमेश्वर को किस रूप में मानता था? मनुष्य परमेश्वर को जीवनरेखा के रूप में मानता था, और अनुग्रह पाने, आशीषें पाने, एवं प्रतिज्ञाएं पाने की आशा करता था। और समय के इस मोड़ पर परमेश्वर मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर मनुष्य को अपने विजय के एक लक्ष्य के रूप में मानता था? परमेश्वर मनुष्य का न्याय करने के लिए, मनुष्य को परखने के लिए, मनुष्य को परीक्षाएं देने के लिए वचनों का उपयोग करना चाहता था। परन्तु समय के इस मुकाम पर जहाँ तक मानवजाति की बात थी, परमेश्वर एक विषय (साधन) था जिसे वह अपने स्वयं के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उपयोग कर सकता था। लोगों ने देखा कि वह सत्य जिसे परमेश्वर के द्वारा जारी किया गया था वह उन पर विजय पा सकता था और उनका उद्धार कर सकता था, और यह कि उनके पास उन चीज़ों को प्राप्त करने के लिए एक अवसर था जिन्हें वे परमेश्वर से चाहते थे, और ऐसी मंज़िल थी जिसे वे चाहते। इस कारण, उनके हृदयों में थोड़ी सी ईमानदारी ने आकार लिया था, और वे इस परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तैयार थे। कुछ समय बीत गया, और लोगों के पास परमेश्वर के विषय में कुछ सतही एवं सैद्धान्तिक ज्ञान था। यह कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर के साथ और भी अधिक "परिचित" होने लगे थे। परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों, उसके प्रचार, वह सच्चाई जिसे उसने जारी किया था, और उसके कार्य के साथ—लोग और भी अधिक परिचित होने लगे थे। अतः, लोगों ने गलती से सोच लिया था कि परमेश्वर अब आगे से अनजान नहीं है, और यह कि वे पहले से ही परमेश्वर की अनुरूपता के पथ पर चल रहे थे। तब से लेकर अब तक, लोगों ने सत्य पर बहुत सारे सन्देशों को सुना है, और परमेश्वर के बहुत सारे कार्यों का अनुभव किया है। फिर भी विभिन्न कारकों एवं परिस्थितियों के हस्तक्षेपों एवं अवरोधों के अंतर्गत, अधिकांश लोग सत्य के अभ्यास को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की संतुष्टि को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। लोग बहुत ही आलसी हो गए हैं, और उनके आत्मविश्वास में बहुत ही कमी है। वे लगातार महसूस करते हैं कि उनका स्वयं का परिणाम अज्ञात है। वे साहस नहीं करते हैं कि उनके पास कोई असाधारण विचार हो, और प्रगति करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं; वे बस अनमने ढंग से साथ में अनुसरण करते है, और कदम दर कदम आगे बढ़ते जाते हैं। मनुष्य की वर्तमान दशा के लिहाज से, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? परमेश्वर की एकमात्र इच्छा यह है कि वह मनुष्य को ये सच्चाईयां दे, और अपने मार्ग से मनुष्य को भरपूर कर दे, और तब वह अलग अलग तरीकों से मनुष्य को परखने के लिए विभिन्न परिस्थितियों का प्रबंध करता है। उसका लक्ष्य इन वचनों, इन सच्चाईयों, एवं अपने कार्य को लेना है, और ऐसे परिणाम को अंजाम देना है जहाँ मनुष्य परमेश्वर का भय मान सकता है और बुराई से दूर रह सकता है। मैं ने अधिकांश लोग को देखा है जो बस परमेश्वर के वचन को लेते हैं और उसे सिद्धान्त के रूप में मानते हैं, पत्रियों के रूप में मानते हैं, और उसे रीति विधियों के रूप में मानते हैं ताकि उनका पालन करें। जब वे कार्यों को करते हैं और बोलते हैं, या परीक्षाओं का सामना करते हैं, तब वे परमेश्वर के मार्ग को उस मार्ग के रूप में नहीं मानते हैं जिसका उनको पालन करना चाहिए। यह विशेष रूप से सत्य है जब लोगों का सामना बड़ी-बड़ी परीक्षाओं से होता है; मैं ने किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा है जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की दिशा में अभ्यास कर रहा था। इस कारण, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति अत्यधिक घृणा एवं अरुचि से भरी हुई है। जब परमेश्वर लोगों को बार-बार परीक्षाएं देता है उसके पश्चात्, यहाँ तक कि सैकड़ों बार, उनके पास तब भी अपने दृढ़ संकल्प को प्रदर्शित करने के लिए कोई स्पष्ट मनोवृत्ति नहीं होती है—मैं परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना चाहता हूँ! चूँकि लोगों के पास ऐसा दृढ़ संकल्प नहीं है, और वे इस प्रकार का प्रदर्शन नहीं करते हैं, तो उनके प्रति परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति अब आगे से वैसी नहीं है जैसी अतीत में थी, जब उसने दया प्रदान की थी, सहनशीलता प्रदान की थी, और सहिष्णुता एवं धीरज प्रदान किया था। इसके बजाय, वह मनुष्य में अत्यंत निराश हुआ है। किसने इस निराशा को पैदा किया था? जिस प्रकार की मनोवृत्ति परमेश्वर के पास मनुष्य के प्रति है, यह किस पर निर्भर है? यह हर उस व्यक्ति पर निर्भर है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। उसके अनेक वर्षों के कार्य के दौरान, परमेश्वर ने मनुष्य से अनेक मांग की है, और मनुष्य के लिए अनेक परिस्थितियों का प्रबंध किया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य ने कैसा प्रदर्शन किया है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की मनोवृत्ति क्या है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के लक्ष्य की स्पष्ट अनुरूपता में अभ्यास नहीं कर सकता है। इस प्रकार, मैं एक कहावत में इसका सार प्रस्तुत करूंगा, और हर उस चीज़ की व्याख्या करने के लिए इस कहावत का उपयोग करूंगा जिसके विषय में हमने अभी अभी कहा था कि क्यों लोग परमेश्वर के मार्ग पर चल नहीं सकते हैं—परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। यह कहावत क्या है! यह कहावत है: परमेश्वर मनुष्य को अपने उद्धार के विषय के रूप में, अपने कार्य के विषय के रूप में मानता है; मनुष्य परमेश्वर को अपने शत्रु एवं विरोधी के रूप में मानता है। क्या अब तू इस विषय पर स्पष्ट है? मनुष्य की मनोवृत्ति क्या है; परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है; मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच क्या रिश्ता है—ये सब बिलकुल स्पष्ट हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोगों ने कितना प्रचार सुना है, ऐसी चीज़ें जिनका सार तुम लोगों ने स्वयं के लिए निकला है—जैसे परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य होना, परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना, परमेश्वर की अनुरूपता के मार्ग को खोजना, परमेश्वर के लिए एक जीवनकाल बिताने की इच्छा करना, परमेश्वर के लिए जीवन जीना—मेरे विचार से ऐसी चीज़ें परमेश्वर के मार्ग पर चैतन्य रूप से चलना नहीं है, जो परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है! इसके बजाय, वे ऐसे माध्यम हैं जिनसे होकर तुम लोग कुछ लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हो। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, तुम सब अनमने ढंग से कुछ रीति विधियों का पालन करते हो। और ठीक-ठीक ये ऐसी रीति विधियां हैं जो लोगों को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग से और भी अधिक दूर ले जाती हैं, और एक बार फिर से परमेश्वर को मनुष्य के विरोध में लाकर खड़ा कर देती हैं।

वह प्रश्न थोड़ा गंभीर है जिस पर आज हम चर्चा कर रहे हैं, परन्तु चाहे जो भी हो, मुझे अब भी आशा है कि जब तुम लोग आने वाले अनुभवों, और आने वाले समयों से होकर गुज़रते हो, तो जो कुछ मैं ने तुम लोगों को अभी अभी कहा है उसे तुम सब कर सकते हो। परमेश्वर की उपेक्षा न करो और उसे खाली हवा न मानो, यह महसूस करते हुए कि वह उन समयों में मौजूद है जब वह तुम लोगों के लिए उपयोगी है, परन्तु जब उसकी कोई उपयोगिता नहीं है तब यह महसूस करते हुए कि वह मौजूद नहीं है। जब तू अवचेतन रूप से इस प्रकार की समझ रखता है, तो तूने परमेश्वर को पहले से ही क्रोधित कर दिया है। कदाचित् ऐसे लोग है जो कहें: "मैं परमेश्वर को खाली हवा नहीं मानता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर को संतुष्ट करता हूँ, और हर काम जो मैं करता हूँ वह उस दायरे एवं मानक एवं सिद्धान्तों के अंतर्गत आता है जिसकी मांग परमेश्वर के द्वारा की जाती है। मैं निश्चित रूप से अपने स्वयं के विचारों के अनुसार आगे नहीं बढ़ रहा हूँ।" जी हाँ, जिस रीति से तू काम कर रहा है वह सही है। परन्तु तू किस प्रकार सोचता है जब तू किसी मसले के आमने-सामने आता है? तू किस प्रकार अभ्यास करता है जब तेरा सामना किसी मसले से होता है! जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उससे निवेदन करते हैं तो कुछ लोग महसूस करते हैं कि वह मौजूद है, परन्तु जब उनका सामना किसी मसले से होता है, तो वे अपने स्वयं के विचारों के साथ सामने आते हैं और उनमें बने रहना चाहते हैं। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को खाली हवा मानता है। इस प्रकार की स्थिति परमेश्वर को अस्तित्वहीन ठहराती है। लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को तभी मौजूद होना चाहिए जब उन्हें उसकी ज़रूरत होती है, और जब उन्हें परमेश्वर की ज़रूरत नहीं होती है तब उसे मौजूद नहीं होना चाहिए। लोग सोचते हैं कि अभ्यास करने के लिए अपने स्वयं के विचारों के अनुसार चलना ही काफी है। वे विश्वास करते हैं कि जैसा उन्हें अच्छा लगता है वे वैसे कार्य कर सकते हैं। वे बस सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर के मार्ग को खोजने की कतई आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोग जो वर्तमान में इस प्रकार की स्थिति में हैं, एवं इस प्रकार की दशा में हैं—क्या वे खतरे के कगार पर नहीं हैं? कुछ लोग कहते हैं: "इसकी परवाह किए बगैर कि मैं खतरे की कगार पर हूँ या नहीं, मैं ने इतने वर्षों तक विश्वास किया है, और मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर मुझे नहीं छोड़ेगा क्योंकि वह मुझे छोड़ने की बात को सहन नहीं कर सकता है।" अन्य लोग कहते हैं: "यहाँ तक कि उस समय से जब मैं अपनी मां के गर्भ में था, तब से लेकर आज तक कुल मिलाकर 40 या 50 वर्ष मैं ने प्रभु पर विश्वास किया था। समय के सन्दर्भ में, मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए अत्यंत योग्य हूँ; मैं ज़िन्दा बचे रहने के लिए अत्यंत योग्य हूँ। चार या पांच दशकों की इस समय अवधि में, मैं ने अपने परिवार एवं अपने रोजगार को छोड़ दिया था। जो कुछ मेरे पास था मैं ने वह सब छोड़ दिया, जैसे कि धन, रुतबा, आनन्द, एवं पारिवारिक समय; मैं ने बहुत से स्वादिष्ट व्यंजनों को नहीं खाया है; मैं ने बहुत सी सुखदायक चीज़ों का आनन्द नहीं लिया है, मैं ने बहुत से मज़ेदार स्थानों का दौरा नहीं किया हैं, मैं ने उस कष्ट का भी अनुभव किया है जिसे साधारण लोग नहीं सह सकते हैं। यदि इन सब के कारण परमेश्वर मेरा उद्धार नहीं कर सकता है, तो मेरे साथ अन्यायपूर्ण तरीके से व्यवहार किया जा रहा है और मैं इस प्रकार के ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता हूँ।" क्या ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास इस प्रकार का दृष्टिकोण है? (हाँ उनमें से बहुत से हैं।) तो आज मैं एक तथ्य को समझने में तुम लोगों की सहायता करूंगा: उन में से हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति जो इस प्रकार का दृष्टिकोण रखता है वे अपने अपने पांव में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। यह इसलिए है क्योंकि वे अपनी आँखों को ढंकने के लिए अपनी स्वयं की कल्पनाओं का उपयोग कर रहे हैं। यह बिलकुल उनकी कल्पनाएं हैं, एवं उनके स्वयं के निष्कर्ष हैं जो उस मानक को बदलकर उसका स्थान ले लेते हैं जिसकी मांग परमेश्वर मनुष्य से करता है, परमेश्वर के सच्चे इरादों को स्वीकार करने से उन्हें रोकते हैं, और उसे ऐसा बना देते हैं कि वे परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का अनुभव नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर द्वारा सिद्ध किए जाने के अवसर को खोने के लिए उन्हें मजबूर कर देते हैं और परमेश्वर की प्रतिज्ञा में उनका कोई भाग या अंश नहीं है।

परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को एवं उस मानक को कैसे निर्धारित करता है जिसके द्वारा वह मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है

इससे पहले कि तेरे पास अपने स्वयं के कोई दृष्टिकोण या निष्कर्ष हो, तुझे पहले अपने प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति को समझना चाहिए, परमेश्वर क्या सोच रहा है, और तब निर्णय करना चाहिए कि तेरी अपनी सोच सही है या नहीं। परमेश्वर ने मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी समय की इकाईयों का उपयोग नहीं किया है, और उसने उनके परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी भी किसी व्यक्ति के द्वारा सहे गए कष्ट की मात्रा का उपयोग नहीं किया है। तब परमेश्वर किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए मानक (मानदण्ड) के रूप में किसका उपयोग करता है? किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए समय की ईकाईयों का उपयोग करना—यह वह है जो लोगों की धारणाओं से सबसे अधिक मेल खाता है। और साथ ही ऐसे व्यक्ति भी हैं जिन्हें तुम सब अकसर देखते हो, ऐसे लोग जिन्होंने समय के किसी मुकाम पर बहुत कुछ समर्पित किया था, बहुत कुछ खर्च किया था, बहुत कुछ चुकाया था, और बहुत कष्ट सहा था। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें, तुम लोगों की दृष्टि में, परमेश्वर के द्वारा बचाया जा सकता था। वह सब जिसे इन लोगों ने दिखाया है, वह सब जिसे इन लोगों ने जीया है, वह बिलकुल उस मानक के विषय में मानवजाति की अवधारणा है जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुम लोग क्या विश्वास करते हो, मैं एक एक करके इन उदाहरणों को सूचीबद्ध नहीं करूंगा। संक्षेप में, जब तक यह परमेश्वर के स्वयं की सोच का मानक नहीं है, यह मनुष्य की कल्पनाओं से आता है, और यह सब मनुष्य की अवधारणा है। अपनी स्वयं की अवधारणाओं एवं कल्पनाओं पर आँख बन्द करके जोर देने का क्या परिणाम होता है? स्पष्ट रूप से, वह परिणाम केवल परमेश्वर के द्वारा तुझे ठुकराना हो सकता है। यह इसलिए है क्योंकि तू हमेशा परमेश्वर के सामने अपनी योग्यताओं का झूठा दिखावा करता है, परमेश्वर से स्पर्धा करता है, और परमेश्वर से विवाद करता है, तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की सोच को समझने का प्रयास नहीं करते हो, और न ही तू मानवता के प्रति परमेश्वर के इरादों एवं परमेश्वर की मनोवृत्ति को समझने की कोशिश करता है। इस तरह से आगे बढ़ना सबसे बढ़कर स्वयं का सम्मान करना है, और परमेश्वर का सम्मान करना नहीं है। तू स्वयं में विश्वास करता है; तू परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है। परमेश्वर को इस प्रकार का व्यक्ति नहीं चाहिए, और परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति का उद्धार नहीं करेगा। यदि तू इस प्रकार के दृष्टिकोण का परित्याग कर सकता है, और फिर अतीत की इन गलत दृष्टिकोणों को सुधार सकता है; यदि तू परमेश्वर की मांगों के अनुसार आगे बढ़ सकता है; तो समय के इस मुकाम के आगे से परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का अभ्यास करना शुरू कर दो; परमेश्वर का सम्मान करो क्योंकि वह सभी चीज़ों में सबसे महान है; स्वयं को परिभाषित करने के लिए एवं परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत कल्पनाओं, दृष्टिकोण, या विश्वास का उपयोग मत करो। और इसके बजाय, तू सभी मायनों में परमेश्वर के इरादों की खोज कर, तू मानवता के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति के एहसास एवं समझ को हासिल कर, और तू परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के मानक का उपयोग कर—यह बहुत बढ़िया होगा! इसका अर्थ होगा कि तू परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग की शुरुआत करने वाला है।

चूँकि परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए एक मानक के रूप में इसका उपयोग नहीं करता है कि किस प्रकार लोग इस तरीके से या उस तरीके से, एवं अपने विचारों एवं दृष्टिकोण से सोचते हैं, तो वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परीक्षाओं का उपयोग करता है। मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने हेतु परीक्षाओं का उपयोग करने के लिए दो मानक हैं: पहला परीक्षाओं की संख्या है जिनसे होकर लोग गुज़रते हैं, और दूसरा इन परीक्षाओं में लोगों का नतीजा है। ये दो संकेत सूचक हैं जो मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करते हैं। अब हम इन दो मानकों पर विस्तार पूर्वक बात करेंगे।

सबसे पहले, जब तेरा सामना परमेश्वर की ओर से आई किसी परीक्षा से होता है, (नोट: यह संभव है कि तेरी नज़रों में यह परीक्षा एक छोटी परीक्षा है और जिक्र करने योग्य नहीं है), तो परमेश्वर तुझे स्पष्ट रूप से अवगत कराएगा कि यह तेरे ऊपर परमेश्वर का हाथ है, और यह कि वह परमेश्वर है जिसने तेरे लिए इस परिस्थिति का प्रबंध किया है। जब तेरी कद-काठी अपरिपक्व हो, परमेश्वर तेरी जांच करने के लिए परीक्षाओं का प्रबंध करेगा। ये परीक्षाएं तेरी कद-काठी के अनुरूप होंगी, जिसे तू समझने में सक्षम हो, और जिसका तू सामना करने में सक्षम है। तेरे जीवन के किस भाग की जांच करने के लिए? परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति की जांच करने के लिए। क्या यह मनोवृत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है? निश्चित रूप से यह महत्वपूर्ण है! इसके अतिरिक्त, यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है! क्योंकि मनुष्य की यह मनोवृत्ति वह परिणाम है जिसे परमेश्वर चाहता है, जहाँ तक परमेश्वर की बात है यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात है। अन्यथा इस प्रकार के कार्य में संलग्न होने के द्वारा परमेश्वर लोगों पर अपने प्रयासों को खर्च नहीं करता। इन परीक्षाओं की रीति के द्वारा परमेश्वर अपने प्रति तेरी मनोवृत्ति देखना चाहता है, वह देखना चाहता है कि तू सही पथ पर हैं या नहीं; और वह देखना चाहता है कि तू परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता है या नहीं। इसलिए, इसकी परवाह किए बगैर कि उस विशेष समय पर तू बहुत सारी सच्चाई समझता है या थोड़ी सी, तुझे अभी भी परमेश्वर की परीक्षा का सामना करना होगा, और सच्चाई की उस मात्रा में जिसे तू समझता है कोई वृद्धि होने के बाद, परमेश्वर तेरे लिए अनुरूप परीक्षाओं का प्रबंध करना निरन्तर जारी रखेगा। जब एक बार फिर से तेरा सामना किसी परीक्षा से होता है, तो इसी बीच परमेश्वर देखना चाहता है कि तेरा दृष्टिकोण, तेरे विचार, एवं परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति में कुछ प्रगति हुई है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं: परमेश्वर क्यों सदैव लोगों की मनोवृत्ति को देखना चाहता है? क्या परमेश्वर ने नहीं देखा है कि वे किस प्रकार सत्य को अमल में लाते हैं? वह क्यों अभी भी लोगों की मनोवृत्तियों को देखना चाहेगा? यह बुद्धिरहित प्रवृत्ति है! चूँकि परमेश्वर इस तरह से आगे बढ़ता है, तो परमेश्वर के इरादे ज़रूर उसमें निहित होंगे। परमेश्वर सदैव उनकी ओर से लोगों का अवलोकन करता है, उनके हर एक वचन एवं कार्य की, एवं उनके हर एक काम एवं गतिविधि की, यहाँ तक कि उनके हर एक सोच एवं विचार की निगरानी करता है। जो कुछ भी लोगों के साथ घटित होता है: उनके भले कार्य, उनकी गलतियां, उनके अपराध, और यहाँ तक कि उनके विद्रोह एवं विश्वासघात, परमेश्वर उनके परिणाम को निर्धारित करने में सबूत के रूप में उन सबका हिसाब रखेगा। जैसे-जैसे परमेश्वर का कार्य कदम दर कदम निर्मित होता जाता है, तू अधिक से अधिक सच्चाई को सुनता है, तू अधिक से अधिक सकारात्मक बातों को, सकारात्मक जानकारियों को, और सत्य की वास्तविकता को ग्रहण करता है। इस प्रक्रिया के क्रम के दौरान, तुझसे की गई परमेश्वर की अपेक्षाएं भी बढ़ेंगी। ठीक उसी समय, परमेश्वर तेरे लिए और अधिक भारी परीक्षाओं का प्रबंध करेगा। उसका लक्ष्य यह जांच करना है कि इस बीच परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति परिपक्व हुई है या नहीं। निश्चित रूप से, इस समय के दौरान, वह दृष्टिकोण जिसकी मांग परमेश्वर तुझसे करता है वह सत्य की वास्तविकता की तेरी समझ के अनुरूप होता है।

जैसे-जैसे तेरी कद-काठी धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे वह मानक भी धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा जिसकी मांग परमेश्वर तुझसे करता है। जब तू अपरिपक्व होता है, तब परमेश्वर तुझे एक बहुत ही छोटा मानक देगा; जब तेरी कद-काठी थोड़ी बड़ी होती है, तब परमेश्वर तुझे थोड़ा बड़ा मानक देगा। परन्तु जब तू सारी सच्चाईयों को समझ जाता है उसके पश्चात् परमेश्वर किसके समान होगा? परमेश्वर तुझसे और भी अधिक बड़ी परीक्षाओं का सामना करवाएगा। इन परीक्षाओं के मध्य, परमेश्वर जो कुछ पाना चाहता है, परमेश्वर जो कुछ देखना चाहता है वह परमेश्वर के विषय में तेरा गहरा ज्ञान और तेरा सच्चा भय है। इस समय, तुझसे की गई परमेश्वर की मांगें उस समय की अपेक्षा और अधिक ऊंची एवं "अधिक कठोर" होंगी जब तेरी कद-काठी और भी अधिक अपरिपक्व थी (टिप्पणी: लोग इसे कठोर रूप में देखते हैं, परन्तु परमेश्वर इसे तर्कसंगत रूप में देखता है)। जब परमेश्वर लोगों को परीक्षाएं दे रहा है, तो वह किस प्रकार की वास्तविकता की सृष्टि करना चाहता है? परमेश्वर लगातार मांग कर रहा है कि लोग अपना हृदय उसे दे दें। कुछ लोग कहेंगे: "कोई कैसे उसे दे सकता है? मैं अपना कर्तव्य निभाता हूँ, मैं ने अपना घर एवं आजीविका छोड़ दी है, मैं परमेश्वर के लिए खर्च करता हूँ! क्या ये सब परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? मैं और किस प्रकार से अपना हृदय परमेश्वर को दे सकता हूँ? क्या ऐसा हो सकता है कि ये परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? परमेश्वर की विशिष्ट अपेक्षा क्या है?" यह अपेक्षा अत्यधिक साधारण है। वास्तव में, कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपनी परीक्षाओं के विभिन्न चरणों में विभिन्न मात्राओं में अपना हृदय पहले से ही परमेश्वर को दे दिया है। परन्तु बड़ी मात्रा में लोगों ने अपना हृदय परमेश्वर को कभी नहीं दिया है। जब परमेश्वर आपको कोई परीक्षा देता है, तब परमेश्वर देखता है कि आपका हृदय परमेश्वर के साथ है, शरीर के साथ है, या शैतान के साथ है। जब परमेश्वर आपको कोई परीक्षा देता है, तब परमेश्वर देखता है कि तू परमेश्वर के विरोध में खड़ा है या तू ऐसी स्थिति में खड़ा है जो परमेश्वर के अनुरूप है, और वह यह देखता है कि तेरा हृदय उसके समान उसी ओर है या नहीं। जब तू अपरिपक्व होता है और परीक्षाओं का सामना कर रहा होता है, तब तेरा आत्मविश्वास बहुत ही कम होता है, और तू ठीक-ठीक यह नहीं जान सकता है कि परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के लिए तुझे क्या करने की आवश्यकता है क्योंकि तेरे पास सत्य की एक सीमित समझ होती है। इन सबके बावजूद, तू ईमानदारी से और सच्चाई से परमेश्वर से प्रार्थना कर सकता है, परमेश्वर को अपना हृदय देने के लिए तैयार हो सकता है, परमेश्वर को अपना सर्वोच्च परमेश्वर बना सकता है, और परमेश्वर को उन चीज़ों को अर्पित करने के लिए तैयार हो सकता है जिनके विषय में तू विश्वास करता है कि वे अत्यंत बहुमूल्य हैं। परमेश्वर को पहले से अपना हदय देना यही है। जब तू अधिक से अधिक प्रचार सुनता है, और तू अधिक से अधिक सत्य को समझता है, तो तेरी कद-काठी भी धीरे-धीरे परिपक्व होगी। वह मानक जिसकी मांग इस समय परमेश्वर तुझसे करता है वह उसके समान नहीं है जब तू अपरिपक्व था; वह उसकी अपेक्षा अधिक ऊँचे मानक की मांग करता है। जब धीरे-धीरे मनुष्य के हृदय को परमेश्वर को दे दिया जाता है, तो यह परमेश्वर के निकट और अधिक निकट आता जाता है; जब मनुष्य सचमुच में परमेश्वर के निकट आ सकता है, उनके पास लगातार ऐसा हदय होता है जो उसका भय मानता है। परमेश्वर को इस प्रकार का हदय चाहिए।

जब परमेश्वर किसी का हदय पाना चाहता है, तो वह उन्हें अनगिनित परीक्षाएं देता है। इन परीक्षाओं के दौरान, यदि परमेश्वर उस व्यक्ति के हदय को नहीं पाता है, और न ही वह यह देखता है कि इस व्यक्ति के पास कोई मनोवृत्ति है—कहने का अभिप्राय है कि वह यह नहीं देखता है कि यह व्यक्ति काम में लगा रहता रीति से व्यवहार करता है मानो परमेश्वर का भय मानता है, और वह उस मनोवृत्ति एवं दृढ़ संकल्प को नहीं देखता है जो इस व्यक्ति से बुराई को दूर करता है। यदि यह ऐसा है, तो अनगिनित परीक्षाओं के बाद, इस व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का धीरज हट जाएगा, और वह उस व्यक्ति को अब और बर्दाश्त नहीं करेगा। वह अब आगे से उन्हें परीक्षाएं नहीं देगा, और वह अब आगे से उनमें कार्य नहीं करेगा। तब उस व्यक्ति के परिणाम का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उनके पास कोई परिणाम नहीं होगा? यह संभव है कि ऐसे व्यक्ति ने कुछ बुरा न किया हो। यह भी संभव है कि उन्होंने बिगाड़ने या परेशान करने के लिए कुछ भी न किया हो। यह भी संभव है कि उन्होंने खुलकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया हो? फिर भी, ऐसे व्यक्ति का हदय परमेश्वर से छिपा हुआ है। उनके पास परमेश्वर के प्रति कभी कोई स्पष्ट मनोवृत्ति एवं दृष्टिकोण नहीं था, और परमेश्वर स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता है कि उनका हदय परमेश्वर को दिया गया है, और वह स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता है कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का प्रयास कर रहा है? परमेश्वर के पास इन लोगों के लिए आगे से और धीरज नहीं है, वह आगे से और कोई कीमत नहीं चुकाएगा, वह आगे से और दया नहीं करेगा, और वह आगे से उन पर कार्य नहीं करेगा। ऐसे व्यक्ति के विश्वास का जीवन परमेश्वर में पहले ही बीत चुका है। यह इसलिए है क्योंकि उन सभी परीक्षाओं में जिन्हें परमेश्वर ने इस व्यक्ति को दिया है, परमेश्वर ने उस परिणाम को प्राप्त नहीं किया है जिसे वह चाहता था। इस प्रकार, बहुत से लोग हैं जिनमें मैं ने कभी भी पवित्र आत्मा के प्रबुद्धता एवं रोशनी को नहीं देखा है। इसे देखना कैसे संभव है? शायद इस प्रकार के व्यक्ति ने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, और सतही तौर पर वे सक्रिय रहे हैं। उन्होंने बहुत सी पुस्तकें पढ़ी हैं, बहुत से मामलों को संभाला है, टिप्पणियों से 10 लेखन पुस्तकों को भर दिया है, और बहुत सारी पत्रियों एवं सिद्धान्तों पर महारत हासिल की है। फिर भी, कभी कोई देखने लायक प्रगति नहीं हुई, और इस व्यक्ति की ओर से परमेश्वर के प्रति कभी कोई देखने लायक दृष्टिकोण नहीं है, और न ही कोई स्पष्ट मनोवृत्ति है। कहने का तात्पर्य है कि तू इस व्यक्ति के हदय को नहीं देख सकता है। उनका हदय हमेशा लिपटा हुआ रहता है, उनका हृदय मुहरबंद है—यह परमेश्वर के लिए मुहरबंद है, अतः परमेश्वर ने इस व्यक्ति के असली हदय को नहीं देखा है, उसने परमेश्वर के प्रति इस व्यक्ति के असली भय को नहीं देखा है, और इससे भी बढ़कर, उसने नहीं देखा है कि किस प्रकार यह व्यक्ति परमेश्वर के मार्ग में चलता है। यदि अब तक परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को अर्जित नहीं किया है, तो क्या वह उन्हें भविष्य में अर्जित कर सकता है? वह अर्जित नहीं कर सकता है! क्या परमेश्वर उन चीज़ों के लिए लगातार प्रयास करता रहेगा जिन्हें पाया नहीं जा सकता है? वह नहीं करेगा! इन लोगों के प्रति परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति क्या है? (वह उन्हें ठुकरा देता है, वह उन पर ध्यान नहीं देता है।) वह उन पर ध्यान नहीं देता है! परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति पर ध्यान नहीं देता है, वह उन्हें ठुकरा देता है। तुम लोगों ने इन शब्दों को अतिशीघ्रता से एवं बहुत ही सटीकता से याद कर लिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ तुम सब ने सुना है उसे तुम लोगों ने समझ लिया है!

कुछ लोग हैं जो, परमेश्वर के अनुसरण के आरम्भ में, अपरिपक्व एवं अनभिज्ञ होते हैं; वे परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हैं; वे यह भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना क्या है, और परमेश्वर में विश्वास करने एवं परमेश्वर का अनुसरण करने के मानव-निर्मित एवं गलत मार्ग को स्वीकार कर लेते हैं। जब इस प्रकार के व्यक्ति का सामना किसी परीक्षा से होता है, तो वे इसके विषय में जागरूक नहीं होते हैं, और वे परमेश्वर के मार्गदर्शन एवं प्रबुद्धता के प्रति सुन्न होते हैं। वे नहीं जानते हैं कि परमेश्वर को अपना हृदय देना क्या होता है, और किसी परीक्षा के दौरान दृढ़ता से स्थिर खड़ा रहना क्या होता है? परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को समय की सीमित मात्रा देगा, और इस समय के दौरान, वह उन्हें समझने देता है कि परमेश्वर की परीक्षाएं क्या हैं, और परमेश्वर के इरादे क्या हैं। बाद में, ऐसे व्यक्ति को अपने दृष्टिकोण का प्रदर्शन करने की आवश्यकता होती है। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जो इस चरण में हैं, परमेश्वर अभी भी प्रतीक्षा कर रहा है। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जिनके पास कुछ दृष्टिकोण तो हैं फिर भी आगे पीछे डोलते रहते हैं, जो अपना हदय परमेश्वर को देना तो चाहते हैं किन्तु ऐसा करने के लिए उनका मेलमिलाप नहीं हुआ है, जब उनका सामना किसी बड़ी परीक्षा से होता है, यद्यपि उन्होंने कुछ मूल सच्चाईयों का अभ्यास किया है, फिर भी वे उससे जी चुराते हैं और छोड़ देना चाहते हैं—इन लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? परमेश्वर के पास अभी भी ऐसे लोगों के प्रति थोड़ी बहुत अपेक्षा है। परिणाम उनके दृष्टिकोणों एवं प्रदर्शनों पर निर्भर होते हैं। परमेश्वर किस प्रकार प्रत्युत्तर देता है यदि लोग उन्नति करने के लिए सक्रिय नहीं होते हैं? वह छोड़ देता है। यह इसलिए है क्योंकि इससे पहले कि परमेश्वर तुझे छोड़ दे, तू पहले ही स्वयं को छोड़ देता है। इस प्रकार, ऐसा करने के लिए तू परमेश्वर को दोष नहीं दे सकता है, क्या तू दोष दे सकता है? क्या यह सही है? (हाँ सही है।)

एक व्यावहारिक प्रश्न जो लोगों में सब प्रकार की शर्मिंदगी को लाता है

एक अन्य प्रकार का व्यक्ति है जिसका परिणाम सभी परिणामों से सबसे अधिक दुखदाई होता है? ये ऐसे लोग हैं जिनकी चर्चा मैं कम से कम करना चाहता हूँ। यह दुखदाई नहीं है क्योंकि यह व्यक्ति परमेश्वर के दण्ड को प्राप्त करता है, या यह कि उनसे की गई परमेश्वर की मांगें कठोर होती हैं और उनका दुखदायी परिणाम होता है। इसके बजाय, यह दुखदाई है क्योंकि वे इसे स्वयं के लिए करते हैं, जैसा अकसर कहा जाता है: वे अपनी स्वयं की कब्र खोदते हैं? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? यह व्यक्ति सही पथ पर नहीं चलता है, और उनका परिणाम पहले से ही प्रकट हो जाता है? परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को अपनी घृणा के चरम लक्ष्य के रूप में देखता है? जैसा लोग इसका वर्णन करते हैं, ऐसे लोग सभी मनुष्यों में सबसे अधिक दुखदाई होते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर का अनुसरण करने के आरम्भ में अत्यधिक उत्साहित रहता है; वे बहुत सी कीमतें चुकाते हैं, उनके पास परमेश्वर के कार्य के बाहरी दृष्टिकोण पर एक अच्छी राय होती है; वे अपने स्वयं के भविष्य के विषय में कल्पनाओं से भरपूर होते हैं; वे विशेष रूप से परमेश्वर में आत्मविश्वास रखते हैं, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण कर सकता है, और उसे एक महिमामय मंज़िल में ला सकता है। फिर भी किसी कारण से, तब ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के पथक्रम से दूर भाग जाता है। इसका क्या अभिप्राय है कि यह व्यक्ति दूर भाग जाता है? इसका अर्थ है कि वे बिना अलविदा कहे और बिना किसी आवाज़ के गायब हो जाते हैं। वे बिना कुछ कहे छोड़कर चले जाते हैं। यद्यपि इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करने का दावा करता है, फिर भी वे परमेश्वर पर विश्वास करने के पथ पर कोई जड़ नहीं पकड़ते हैं। इस प्रकार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन्होंने कितने लम्बे समय से विश्वास किया है, क्योंकि वे अभी भी परमेश्वर से दूर जा सकते हैं। कुछ लोग व्यापार में जाने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ अपने जीवन को जीने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ लोग धनवान बनने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ लोग विवाह करने के लिए, एवं संतान पाने के लिए छोड़कर चले जाते हैं। उन लोगों में से जो चले जाते हैं, कुछ ऐसे लोग हैं जिनका विवेक उन्हें कचोटता है और वे वापस आना चाहते हैं, और कुछ अन्य लोग गरीबी से कठिनाई में जीवन गुज़ारते है, एवं संसार में साल दर साल भटकते फिरते हैं। इन भटकने वाले लोगों ने बहुत से कष्टों का अनुभव किया है, और वे मानते हैं कि इस संसार में रहना अति दुखदाई है, और उन्हें परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है। वे राहत, शांति, एवं आनन्द पाने के लिए परमेश्वर के घर में लौटना चाहते हैं, और आपदाओं से बचने के लिए, या उद्धार पाने के लिए और एक खूबसूरत मंज़िल को पाने के लिए परमेश्वर में लगातार विश्वास करना चाहते हैं। यह इसलिए है क्योंकि ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, कि परमेश्वर का अनुग्रह अक्षय है और यह एकदम से समाप्त नहीं हो सकता है। वे विश्वास करते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किसी व्यक्ति ने क्या किया है, परमेश्वर को उन्हें क्षमा करना चाहिए और उनके अतीत के विषय में सहनशील होना चाहिए। ये लोग कहते हैं कि वे वापस आना और अपने कर्तव्य को निभाना चाहते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो अपनी सम्पत्ति के कुछ भाग को कलीसिया को दान कर देते हैं, यह आशा करते हुए कि यह परमेश्वर के घर की ओर वापस जाने के लिए उनका मार्ग है। इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? परमेश्वर को उनके परिणाम को कैसे निर्धारित करना चाहिए? कृपया खुलकर बोलो। (सोचा था कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार करेगा, पर अभी उसे सुनने के बाद, शायद उन्हें फिर से स्वीकार नहीं किया जाएगा।) और तेरा तर्क क्या है? (इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष आता है ताकि उनका परिणाम एक प्रकार से मृत्यु न हो। वे शुद्ध ईमानदारी से नहीं आते हैं। इसके बजाय, उस जानकारी से आते हैं कि परमेश्वर के कार्य को शीघ्र पूरा किया जाएगा, वे आशीषों को पाने के भ्रम में आते हैं।) तू कह रही है कि ऐसा व्यक्ति ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास नहीं करता है, अतः परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं कर सकता है? क्या ऐसा ही है? (हाँ।) (मेरा मानना है कि इस प्रकार का व्यक्ति अवसरवादी है, और वे ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं।) वे परमेश्वर में विश्वास करने के लिए नहीं आए हैं; वे एक अवसरवादी हैं? सही कहा! ये अवसरवादी इस प्रकार के इंसान है जिनसे हर कोई नफरत करता है। जिस किसी दिशा में हवा बहती है वे बस उस दिशा में बहते हैं, और तब तक किसी भी कार्य को करने की परवाह नहीं कर सकते हैं जब तक उन्हें उससे कुछ प्राप्त न हो जाए। निश्चित रूप से वे घृणित हैं! क्या किसी भाई या बहन के पास कोई दृष्टिकोण है? (परमेश्वर उन्हें अब और स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि परमेश्वर का कार्य समाप्त होने ही वाला है और अभी वह समय है जब लोगों के परिणामों को तय किया जाता है। यही वह समय है जब ये लोग वापस आना चाहते हैं। यह इसलिए नहीं है क्योंकि वे वास्तव में सत्य का अनुसरण करना चाहते हैं; वे वापस आना चाहते हैं क्योंकि वे आपदाओं को उतरते हुए देखते हैं, या उन्हें बाहरी कारकों के द्वारा प्रभावित किया जा रहा है। यदि उनके पास वास्तव में ऐसा हृदय होता जो सत्य की खोज करता, तो वे पथक्रम के बीच में ही छोड़कर कभी नहीं भागते।) क्या कोई अन्य राय हैं? (उन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा। परमेश्वर ने वाकई में उन्हें अवसर दिए थे, परन्तु परमेश्वर के प्रति उनकी मनोवृत्ति ऐसी थी कि वे उस पर हमेशा कोई ध्यान नहीं देते थे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि ऐसे व्यक्ति के इरादे क्या हैं, और भले ही वे वास्तव में पश्चाताप करें, परमेश्वर उन्हें अभी भी स्वीकार नहीं करेगा। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें पहले से ही बहुत सारे अवसर दिए थे, फिर भी उन्होंने अपनी मनोवृत्ति का प्रदर्शन पहले से ही किया था: वे परमेश्वर को छोड़ देना चाहते थे। इसलिए, अब जब वे वापस आते हैं, तो परमेश्वर उन्हे स्वीकार नहीं करेगा।) (मैं भी यह स्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति ने सच्चे मार्ग को देखा है, इतनी लम्बी समय अवधि तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, और अभी भी संसार में वापस लौट सकता है, और शैतान के आलिंगन में वापस लौट सकता है, तो यह परमेश्वर से बड़ा विश्वासघात है। इस तथ्य के बावजूद कि परमेश्वर का सार करुणा है एवं प्रेम है, यह उस प्रकार के व्यक्ति पर निर्भर करता है जिसकी ओर इसे निर्देशित किया जा रहा है। यदि ऐसा व्यक्ति राहत की खोज करने के लिए, एवं ऐसी चीज़ की खोज करने के लिए परमेश्वर के समक्ष आता है कि उस पर अपनी आशा को रख सके, तो इस प्रकार का व्यक्ति उस किस्म का नहीं है जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है, और उनके प्रति परमेश्वर की दया केवल इतनी दूर तक ही जाती है।) परमेश्वर का सार दया है, अतः वह इस प्रकार के व्यक्ति को थोड़ी और दया क्यों नहीं देता है? थोड़ी सी दया के साथ, क्या तब उन्हें एक अवसर नहीं मिलता है? इससे पहले, ऐसा अकसर कहा जाता: परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति उद्धार पाए, और नहीं चाहता है कि कोई भी नाश हो। यदि सौ में से एक भेड़ खो जाए, तो परमेश्वर उन निन्यानवे भेड़ों को छोड़ देगा और उस एक खोई हुई भेड़ को खोजेगा। आजकल, इस प्रकार के व्यक्ति के सम्बन्ध में, यदि यह परमेश्वर में उनके सच्चे विश्वास की खातिर है, तो क्या परमेश्वर को उन्हें स्वीकार करना और दूसरा अवसर देना चाहिए? यह वास्तव में एक कठिन प्रश्न नहीं है; यह बिलकुल सरल है! यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर को समझते हो, और तेरे पास परमेश्वर की एक वास्तविक समझ है, तो अधिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं है; और अधिक अनुमान लगाने की आवश्यकता भी नहीं है, सही है? तुम लोगों के उत्तर सही मार्ग पर हैं, परन्तु अभी भी उनमें और परमेश्वर की मनोवृत्ति के बीच में कुछ अन्तर है।

अभी इस वक्त तुम लोगों में से कुछ ऐसे थे जो इस बात से निश्चित थे कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार नहीं कर सकता है। अन्य लोग अधिक स्पष्ट नहीं थे, वे विश्वास करते थे कि शायद परमेश्वर उन्हें स्वीकार कर सकता है, और शायद उन्हें स्वीकार नहीं भी कर सकता है—यह मनोवृत्ति कहीं अधिक औसत दर्जे की है; और फिर ऐसे लोग थे जिनका दृष्टिकोण था कि वे आशा करते थे कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार करता है—यह अस्पष्ट मनोवृत्ति है। ऐसे लोग जिनके पास ऐसी निश्चित मनोवृत्ति है वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने अब तक कार्य किया है और उसका कार्य पूर्ण है, अतः परमेश्वर को इन लोगों के प्रति सहनशील होने की आवश्यकता नहीं है, और वह उन्हें दोबारा स्वीकार नहीं करेगा। औसत दर्जे के लोग विश्वास करते हैं कि इन मामलों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार संभाला जाना चाहिए: यदि इस व्यक्ति का हदय परमेश्वर से अविभाज्य है, और वे अभी भी ऐसे व्यक्ति हैं जो सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ऐसे व्यक्ति हैं जो सत्य की खोज करते हैं, तो परमेश्वर को उनकी पिछली निर्बलताओं एवं गलतियों को स्मरण नहीं करना चाहिए; उसे उन्हें क्षमा करना चाहिए, उन्हें एक और अवसर देना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के घर में वापस लौटने, और परमेश्वर के उद्धार को ग्रहण करने की अनुमति देनी चाहिए। फिर भी, यदि ऐसा व्यक्ति एक बार फिर से भाग जाता है, यह तब होता है जब परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को अब और नहीं चाहता है और इसे उनके प्रति अन्याय करना नहीं माना जा सकता है। एक और समूह है जो आशा करता है कि परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को स्वीकार कर सकता है। यह समूह स्पष्ट रूप से नहीं जानता है कि परमेश्वर उन्हें स्वीकार करेगा या नहीं। यदि वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को उन्हें स्वीकार करना चाहिए, किन्तु यदि परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं करता है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि वे परमेश्वर के दृष्टिकोण की अनुरूपता से थोड़ा बाहर हैं। यदि वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए, और यदि परमेश्वर कहे कि मनुष्य के प्रति उसका प्रेम अनिश्चित है और यह कि वह इस व्यक्ति को एक और अवसर देना चाहता है, तो क्या यह मानवीय अज्ञानता का ऐसा उदाहरण नहीं है जिसे प्रकट किया जा रहा है? किसी भी सूरत में, तुम सभी लोगों के पास अपने स्वयं के दृष्टिकोण होते हैं। तुम लोगों के अपने अपने विचारों में ये दृष्टिकोण एक ज्ञान है; साथ ही वे सत्य के विषय में तुम लोगों की समझ और परमेश्वर के इरादों के विषय में तुम लोगों की समझ की गहराई का प्रतिबिम्ब भी है। अच्छा कहा, नहीं? यह अद्भुत बात है कि तुम लोगों के पास इस मसले पर राय हैं! परन्तु इस सम्बन्ध में कि तुम सब के राय सही हैं या नहीं, अभी एक प्रश्न चिन्ह है। क्या तू थोड़ा चिन्तित नहीं है? "तो सही क्या है? मैं स्पष्ट रूप से देख नहीं सकता हूँ, और सटीक रूप से नहीं जानता हूँ कि परमेश्वर क्या सोच रहा है? परमेश्वर ने मुझे कुछ भी नहीं बताया था। मैं कैसे जान सकता हूँ कि परमेश्वर क्या सोच रहा है? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति प्रेम है। परमेश्वर की पिछली मनोवृत्ति के अनुसार, उसे इस व्यक्ति को स्वीकार करना चाहिए। किन्तु मैं परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति पर अधिक स्पष्ट नहीं हूँ—मैं केवल यह कह सकता हूँ कि शायद वह ऐसे व्यक्ति को स्वीकार करेगा, और शायद वह नहीं करेगा।" क्या यह बेतुका नहीं है? इसने तुम लोगों को वास्तव में चकरा दिया है। यदि इस मसले पर तुम सब के पास एक उचित नज़रिया नहीं है, तब तुम लोग क्या करोगे जब तुम सब की कलीसिया का सामना सचमुच में इस प्रकार के व्यक्ति से होता है? यदि तुम लोग इससे उचित रीति से नहीं निपटते हो, तो शायद तुम सब परमेश्वर को ठेस पहुंचाओगे। क्या यह एक खतरनाक मामला नहीं है?

जिस पर मैं अभी अभी चर्चा कर रहा था मैं उस पर तुम लोगों के दृष्टिकोण के विषय में क्यों पूछना चाहता हूँ? मैं तुम सब के दृष्टिकोण के बिन्दुओं को जांचना चाहता हूँ, यह जांचना चाहता हूँ कि तुम लोगों के पास परमेश्वर का कितना ज्ञान है, तुम सब के पास परमेश्वर के इरादों एवं परमेश्वर की मनोवृत्ति का कितना ज्ञान है। उत्तर क्या है? उत्तर तुम लोगों के दृष्टिकोण के बिन्दुओं में निहित है। तुम लोगों में से कुछ बहुत रूढ़िवादी हो, और तुम लोगों में से कुछ अन्दाज़ा लगाने के लिए अपनी कल्पनाओं का उपयोग कर रहे हो। "अन्दाज़ा लगाना क्या है"? यह तब होता है जब तुम लोगों के पास कोई विचार नहीं होता है कि परमेश्वर किस प्रकार सोचता है, अतः तुम सब निराधार विचारों के साथ सामने आते हो कि परमेश्वर को किस प्रकार इस रीति से या उस रीति से सोचना चाहिए। तुम लोगों को वास्तव में पता नहीं होता है कि तुम्हारा अनुमान सही है या गलत, अतः तुम सब अस्पष्ट दृष्टिकोण को व्यक्त करते हो। इस तथ्य के साथ सामना होने पर, तुम लोग क्या देखते हो? परमेश्वर का अनुसरण करते समय, लोग कभी कभार ही परमेश्वर के इरादों पर ध्यान देते हैं, और कभी कभार ही परमेश्वर के विचारों एवं मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति पर ध्यान देते हैं। तुम लोग परमेश्वर के विचारों को नहीं समझते हो, अतः जब ऐसे प्रश्नों को पूछा जाता है जिनमें परमेश्वर के इरादे शामिल होते हैं, एवं परमेश्वर का स्वभाव शामिल होता है, तो तुम लोग गड़बड़ा जाते हो; और अत्यंत अनिश्चित होते हो, और तुम लोग या तो अन्दाज़ा लगाते हो या दांव लगाते हो। यह मनोवृत्ति क्या है? यह इस तथ्य को साबित करता है: अधिकांश लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं वे उसे खाली हवा के रूप में एवं अस्पष्ट रूप में मानते हैं। मैं ने इसे इस प्रकार क्यों कहा है? क्योंकि जब भी तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तब तुम सब परमेश्वर के इरादों (अभिप्रायों) को नहीं जानते हो। तुम सब क्यों नहीं जानते हो? ऐसा नहीं है कि तुम लोग बस अभी इस समय नहीं जानते हो। इसके बजाय, आरम्भ से लेकर अंत तक तुम सब नहीं जानते हो कि इस मामले के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है। उन समयों में जब तू परमेश्वर की मनोवृत्ति को नहीं देख सकता है और नहीं जानता है, तो क्या तूने उस पर विचार किया है? क्या तूने उसकी खोज की है? क्या तूने उसके बारे में बताया है? नहीं! यह एक तथ्य को प्रमाणित करता है: तेरे विश्वास (जैसा तू मानता है) का परमेश्वर और सच्चा परमेश्वर आपस में सम्बन्धित नहीं हैं। तू, जो परमेश्वर पर विश्वास करता है, केवल अपनी स्वयं की इच्छा पर विचार करता है, एवं केवल अपने अपने अगुवों की इच्छा पर विचार करता है, और केवल परमेश्वर के वचन के सतही एवं सैद्धान्तिक अर्थ पर विचार करता है, परन्तु सचमुच में परमेश्वर की इच्छा को जानने एवं खोजने की कोशिश बिलकुल भी नहीं करता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? इस मामले का सार भयानक है! बहुत वर्षों से, मैं ने बहुत से लोगों को देखा है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यह विश्वास कौन सा आकार लेता है? कुछ लोग परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह खाली हवा है। इन लोगों के पास परमेश्वर के अस्तित्व के प्रश्नों के विषय में कोई उत्तर नहीं होता है क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थिति को महसूस नहीं कर सकते हैं या उससे अवगत नहीं होते हैं, साफ साफ देखने या समझने की तो बात ही छोड़ दो। अवचेतन रूप से, ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में नहीं है। कुछ अन्य परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह एक मनुष्य हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन सभी कार्यों को कार्य करने में असमर्थ होता है जिन्हें करने में वे असमर्थ होते हैं, और यह कि परमेश्वर को वैसा सोचना चाहिए जैसा वे सोचते हैं। इस व्यक्ति की परमेश्वर की परिभाषा यह है कि वह "एक अदृश्य एवं अस्पर्शनीय व्यक्ति" है। लोगों का एक समूह ऐसा भी है जो परमेश्वर में ऐसा विश्वास करता है मानो वह एक कठपुतली हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के पास कोई भावनाएं नहीं हैं, यह कि परमेश्वर एक मूरत है। जब किसी मसले से सामना होता है, तब परमेश्वर के पास कोई मनोवृत्ति, कोई दृष्टिकोण, एवं कोई विचार नहीं होता है; वह मनुष्य की दया पर निर्भर होता है। लोग बस वैसा ही विश्वास करते हैं जैसा वे विश्वास करना चाहते हैं। यदि वे उसे महान बनाते हैं, तो वह महान है, यदि वे उसे छोटा बना देते है, तो वह छोटा है। जब लोग पाप करते हैं और उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता होती है, परमेश्वर की सहनशीलता की आवश्यकता होती है, और परमेश्वर के प्रेम की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर को अपनी दया प्रदान करनी चहिए। इन लोगों ने अपने अपने मनों में एक परमेश्वर खोज लिया है, और इस परमेश्वर से अपनी मांगों को पूरा करवाया है और अपनी सारी अभिलाषाओं को संतुष्ट करवाया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कहाँ या कब, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह व्यक्ति क्या करता है, परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में एवं परमेश्वर में अपने विश्वास में वे इस कल्पना को स्वीकार करेंगे। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो विश्वास करते हैं कि जब वे परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर देते हैं उसके पश्चात् भी परमेश्वर उनका उद्धार कर सकता है। यह इसलिए है क्योंकि वे मानते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, परमेश्वर का स्वभाव धर्मी है, और यह कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग किस प्रकार परमेश्वर को चोट पहुंचाते हैं, परमेश्वर उनमें से किसी भी चोट का स्मरण नहीं करेगा। चूँकि मनुष्य की गलतियां, मनुष्य के अपराध, एवं मनुष्य की अनाज्ञाकारिता उस व्यक्ति के स्वभाव की क्षणिक अभिव्यक्तियां हैं, परमेश्वर लोगों को अवसर देगा, और उनके साथ सहनशील एवं धीरजवंत होगा। परमेश्वर उनसे अभी भी पहले के समान प्रेम करेगा। अतः उनके उद्धार की आशा अभी भी महान है। वास्तव में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति किस प्रकार परमेश्वर पर विश्वास करता है, जब तक वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, तब तक परमेश्वर उनके प्रति नकारात्मक मनोवृत्ति रखता है। यह इसलिए है क्योंकि जब तक तू परमेश्वर पर विश्वास कर रहा है, तो शायद तू परमेश्वर के वचन की पुस्तक को संजोकर रखता है, तू प्रतिदिन इसका अध्ययन करता है, तू हर दिन इसे पढ़ता है, परन्तु तू वास्तविक परमेश्वर को अलग रख देता है, तू उसे खाली हवा के रूप में मानता है, एक व्यक्ति के रूप में मानता है, और तुममें से कुछ लोग बस उसे एक कठपुतली के रूप में मानते हो। मैं इसे इस प्रकार क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि जिस प्रकार मैं इसे देखता हूँ, इसकी परवाह किये बगैर कि तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है या किसी परिस्थितियों से आमना-सामना करते हैं, क्योंकि वे बातें जो तुम सब के अवचेतन मन में मौजूद होती हैं, वे बातें जो भीतर ही भीतर विकसित होती हैं—उनमें से किसी का भी सम्बन्ध परमेश्वर के वचन से या सत्य की खोज से नहीं होता है? तू केवल उसे ही जानता है जो तू स्वयं सोच रहा है, और जो तेरे स्वयं के दृष्टिकोण हैं, और फिर तेरे स्वयं के विचार को, और तेरे स्वयं के दृष्टिकोण को परमेश्वर के ऊपर ज़बरदस्ती थोपा जाता है। वे परमेश्वर के दृष्टिकोण बन जाते हैं, जिन्हें मानकों के रूप में उपयोग किया जाता है ताकि बिना डांवाडोल हुए उनके मुताबिक चला जाए। समय के बीतने के साथ, इस प्रकार आगे बढ़ना तुझे परमेश्वर से दूर और दूर करता जाता है।

परमेश्वर की मनोवृत्ति को समझना और परमेश्वर के विषय में सभी गलत अवधारणाओं को छोड़ देना

यह परमेश्वर जिस पर तुम लोग वर्तमान में विश्वास करते हो, क्या तुम सब ने इसके विषय में कभी सोचा है कि यह किस प्रकार का परमेश्वर है? जब वह किसी बुरे व्यक्ति को बुरे कार्य करते हुए देखता है, तो क्या वह उससे घृणा करता है? (वह उससे घृणा करता है।) जब वह अज्ञानी लोगों की गलतियों को देखता है, तो उसकी मनोवृत्ति क्या होती है? (उदासी।) जब वह लोगों को अपनी भेटों को चुराते हुए देखता है, तो उसकी मनोवृत्ति क्या होती है? (वह उनसे घृणा करता है।) यह सब बिलकुल साफ है, सही है? जब वह किसी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति विश्वास में लापरवाह होते हुए, और किसी भी रीति से सत्य की खोज करते हुए नहीं देखता है, तो परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या होती है? तुम लोग इस पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो, सही है? लापरवाही ऐसी मनोवृत्ति है जो पाप नहीं है, और यह परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाती है। लोग मानते हैं कि इसे एक गहरी भूल नहीं मानना चाहिए। तब तू क्या सोचता है कि परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? (वह इसका प्रत्युत्तर देने के लिए तैयार नहीं है।) इसका प्रत्युत्तर देने के लिए तैयार नहीं है—यह मनोवृत्ति क्या है? यह ऐसा है कि परमेश्वर इन लोगों को तुच्छ मानता है, और इन लोगों का उपहास करता है! परमेश्वर जानबूझकर कोई ध्यान न देने के द्वारा ऐसे लोगों से निपटता है। उसका तरीका है कि उन्हें दरकिनार कर दे, उनके प्रति किसी भी कार्य में, जिसमें प्रबुद्धता, रोशनी, ताड़ना या अनुशासन शामिल है, संलग्न न हो। इस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर के कार्य में शुमार नहीं किया जाता है। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं, और उसके प्रशासनिक आदेशों को ठेस पहुंचाते हैं? अत्यंत घृणा! परमेश्वर ऐसे लोगों के द्वारा अत्यंत क्रोधित होता है जो उसके स्वभाव को क्रोधित करने के विषय में पश्चातापी नहीं हैं! "क्रोधित होना" बस एक एहसास है, एक मिजाज़ है; यह एक स्पष्ट मनोवृत्ति को प्रदर्शित नहीं कर सकता है। परन्तु यह एहसास, यह मिजाज़ इस व्यक्ति के लिए एक परिणाम को उत्पन्न करता है: यह परमेश्वर को अत्यंत घृणा से भर देगा। इस अत्यंत घृणा का परिणाम क्या है? यह ऐसा है कि परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को दरकिनार कर देगा, और कुछ समय के लिए उन्हें कोई प्रत्युत्तर नहीं देगा। वह उनके लिए इंतज़ार करेगा कि प्रतिशोध के दौरान उन्हें छांटकर अलग किया जाए। यह क्या सूचित करता है? क्या इस व्यक्ति के पास अभी भी कोई परिणाम है? परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को कभी कोई परिणाम देने का इरादा नहीं किया था! अतः तब क्या यह सामान्य बात नहीं है कि परमेश्वर वर्तमान में इस प्रकार के व्यक्ति को कोई प्रत्युत्तर नहीं देता है? (हाँ।) अब इस प्रकार के व्यक्ति को किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए? उन्हें उन नकारात्मक परिणामों को लेने के लिए तैयार रहना चाहिए जो उनके व्यवहार एवं उस बुराई के द्वारा उत्पन्न हुए हैं जिन्हें उन्होंने किया है। इस प्रकार के व्यक्ति के लिए यह परमेश्वर का प्रत्युत्तर है। अतः अब मैं इस प्रकार के व्यक्ति से साफ साफ कहता हूँ: भ्रान्तियों को अब और पकड़े न रहो, और ख्याली पुलाव पकाने में अब और लगे न रहो। परमेश्वर अनिश्चित काल तक लोगों के प्रति सहनशील नहीं होगा। वह अनिश्चित काल तक उनके अपराधों एवं अनाज्ञाकारिता को सहन नहीं करेगा। कुछ लोग कहेंगे: "मैं ने इस प्रकार के कुछ लोगों को भी देखा है। जब वे प्रार्थना करते हैं तो उन्हें विशेष रूप से परमेश्वर द्वारा स्पर्श किया जाता है, और वे फूट फूट कर रोते हैं? सामान्यतया वे बहुत खुश भी होते हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास परमेश्वर की उपस्थिति है और परमेश्वर का मार्गदर्शन है।" ऐसी बेतुकी बातें न करो! फूट फूट कर रोना आवश्यक रूप से परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किया जाना या परमेश्वर की उपस्थिति नहीं है, परमेश्वर के मार्गदर्शन की तो बात ही छोड़ दो। यदि लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उनका मार्गदर्शन करेगा? संक्षेप में, जब परमेश्वर ने किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करने के लिए, एवं उन्हें त्यागने के लिए निर्णय लिया है, तो उस व्यक्ति के पास पहले से ही कोई परिणाम नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जब वे प्रार्थना करते हैं तो वे स्वयं में कितनी आत्मसंतुष्टि का एहसास करते हैं, और उनके हृदय में परमेश्वर के प्रति कितना आत्मविश्वास है; यह पहले से ही महत्वहीन है। महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर को इस प्रकार के आत्मविश्वास की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने इस व्यक्ति को पहले से ही ठुकरा दिया है। उनके साथ बाद में कैसा व्यवहार करना है यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। जो महत्वपूर्ण है वह यह है कि जिस क्षण वह व्यक्ति परमेश्वर को क्रोध दिलाता है, उनका परिणाम पहले ही निर्धारित हो जाता है। यदि परमेश्वर ने तय कर लिया है कि इस प्रकार के व्यक्ति को नहीं बचाना है, तब दण्डित होने के लिए उन्हें पीछे छोड़ दिया जाएगा। यह परमेश्वर की मनोवृत्ति है।

यद्यपि परमेश्वर के सार का एक भाग प्रेम है, और वह हर एक को दया प्रदान करता है, फिर भी लोग उस बिन्दु (मुख्य बात) की अनदेखी करते हैं और भूल जाते हैं कि उसका सार प्रतिष्ठा भी है। यह कि उसके पास प्रेम है इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग उसे खुलकर ठेस पहुंचा सकते हैं और उसके पास कोई एहसास या कोई प्रतिक्रिया नहीं है। उसके पास दया है इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके पास कोई सिद्धान्त नहीं है कि किस प्रकार लोगों से व्यवहार करे। परमेश्वर जीवित है; वह सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई काल्पनिक कठपुतली या कुछ और नहीं है। अब चूँकि वह अस्तित्व में है, हमें सावधानीपूर्वक हर समय उसके हृदय की आवाज़ को सुनना चाहिए, उसकी मनोवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें लोगों की कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, और हमें लोगों के विचारों एवं इच्छाओं को परमेश्वर के ऊपर नहीं थोपना चाहिए, और जिस प्रकार परमेश्वर मानवजाति से व्यवहार करता है उसमें मनुष्य की शैली एवं सोच को काम में लाने के लिए परमेश्वर को बाध्य नहीं करना चाहिए। यदि तू ऐसा करता है, तो तू परमेश्वर को क्रोध दिला रहा है, तू परमेश्वर के प्रचण्ड क्रोध की परीक्षा ले रहा है, और तू परमेश्वर की प्रतिष्ठा को चुनौती दे रहा है! इस प्रकार, जब तुम सब ने इस मसले की गंभीरता को समझ लिया हो उसके पश्चात्, मैं तुम लोगों में से हर एक एवं प्रत्येक से आग्रह करता हूँ कि तुम सब अपने कार्यों में सावधान और बुद्धिमान हो। अपने बोलने में सावधान और बुद्धिमान हो। और जिस तरह तुम लोग परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो उसके सम्बन्ध में, तुम सब जितना अधिक सावधान और बुद्धिमान रहो, उतना ही बेहतर है! जब तू नहीं समझता है कि परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है, तो लापरवाही से बात न कर, अपने कामों में लापरवाह न हो, और लापरवाही से नाम पट्टी (लेबल) न लगा। इससे भी अधिक, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर न पहुंच। इसके बदले, तुझे प्रतीक्षा एवं खोज करनी चाहिए; यह भी परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का प्रकटीकरण है। यदि तू सब बातों से बढ़कर इस मुकाम को हासिल कर सकता है, और सब से बढ़कर इस मनोवृत्ति को धारण कर सकता है, तब परमेश्वर तेरी मूर्खता, तेरी अनभिज्ञता, और तर्कहीनता के लिए तुझे दोष नहीं देगा। इसके बदले, परमेश्वर को ठेस पहुंचाने के विषय में तेरे भय के कारण, परमेश्वर के इरादों के प्रति तेरे सम्मान के कारण, और परमेश्वर की आज्ञा मानने के विषय में तेरी सहमति की मनोवृत्ति कारण, परमेश्वर तुझे स्मरण करेगा, तुझे मार्गदर्शन एवं प्रबुद्धता देगा, या तेरी अपरिपक्वता एवं अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, क्या परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति को श्रद्धा विहीन होना चाहिए—मनमाने ढंग से परमेश्वर पर दोष लगाना, मनमाने ढंग से अनुमान लगाना और परमेश्वर के विचारों की परिभाषा करना—परमेश्वर तुझे दृढ़ विश्वास, अनुशासन, और यहाँ तक कि दण्ड भी देगा; या वह तुझे एक कथन देगा। कदाचित् यह कथन तेरे परिणाम को सम्मिलित करता हो। इसलिए, मैं एक बार फिर से इस पर जोर देना एवं उपस्थित हर एक व्यक्ति को सूचित करना चाहता हूँ कि हर वह चीज़ जो परमेश्वर की ओर से आती है उसके प्रति सावधान एवं बुद्धिमान रहें। लापरवाही से न बोलें, और अपने कामों में लापरवाह न हों। इससे पहले कि तू कुछ कहे, तुझे सोचना चाहिए: क्या ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर का भय मानना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों के लिए भी, तुझे वास्तव में अभी भी इन प्रश्नों का हिसाब लगाना चाहिए, और वास्तव में उन पर विचार करना चाहिए। यदि तू हर जगह, सभी हालातों एवं सभी समयों में इन सिद्धान्तों के अनुसार सचमुच में अभ्यास कर सकता है, विशेषकर उन मामलों के लिहाज से जिन्हें तू नहीं समझता है, तब परमेश्वर हमेशा तेरा मार्गदर्शन करेगा, और तुझे हमेशा अनुसरण करने के लिए एक पथ देगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या प्रदर्शित कर रहे हैं, परमेश्वर उसे बिलकुल स्पष्ट रूप से एवं सरल रूप से देखता है, और वह तुझे इन प्रदर्शनों का सटीक एवं समुचित मूल्यांकन प्रदान करेगा। जब तू अंतिम परीक्षा का अनुभव कर लेता है उसके पश्चात्, परमेश्वर तेरे समस्त आचरण को लेगा और तेरे परिणाम को निर्धारित करने के लिए पूरी तरह से इसका सार प्रस्तुत करेगा। यह परिणाम बिना किसी लेशमात्र सन्देह के हर एक को आश्वस्त करेगा। जो कुछ मैं तुम सब को बताना चाहता हूँ वह यह है कि तुम लोगों का प्रत्येक काम, तुम सब का प्रत्येक कार्य, और तुम लोगों का प्रत्येक विचार तुम लोगों की नियति को निर्धारित करेगा।

मनुष्य के परिणाम को कौन निर्धारित करता है

एक और अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है, और यह परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति है। यह मनोवृत्ति निर्णायक है! यह निर्धारित करती है कि अन्ततः तुम लोग विनाश की ओर जाओगे, या फिर एक सुन्दर मंज़िल की ओर जाओगे जिसे परमेश्वर ने तुम सब के लिए तैयार किया है। राज्य के युग में, परमेश्वर ने पहले से ही 20 से अधिक वर्षों से कार्य किया है, और इन 20 वर्षों के समयक्रम के दौरान कदाचित् तुम लोगों का हृदय अपने अपने प्रदर्शन को लेकर थोड़ा बहुत अनिश्चित रहा है। फिर भी, परमेश्वर के हृदय में, उसने तुम लोगों में से हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति का एक वास्तविक एवं सच्चा लिखित दस्तावेज़ बनाया है। शुरुआत में उस समय से लेकर जब हर एक व्यक्ति ने परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके प्रचार को ध्यान से सुनना शुरू किया था, अधिक से अधिक सच्चाई को समझना शुरू किया था, उस समय तक जब उन्होंने अपने कर्तव्य को निभाया था—परमेश्वर के पास इन प्रदर्शनों में से हर एक एवं प्रत्येक प्रदर्शन का हिसाब है। जब कोई अपने कर्तव्य को निभाता है, जब उनका सामना सभी प्रकार की परिस्थितियों एवं सभी प्रकार की परीक्षाओं से होता है, तो उस व्यक्ति की मनोवृत्ति क्या होती है? वे किस प्रकार प्रदर्शन करते हैं? वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति कैसा महसूस करते हैं? परमेश्वर के पास इन सभी का लेखा है और इन सबका हिसाब है? कदाचित् तुम लोगों के दृष्टिकोण से, ये मामले भ्रमित करनेवाले हैं। फिर भी, जहाँ परमेश्वर खड़ा है वहाँ से, वे सभी मामले बिलकुल स्पष्ट हैं, और लापरवाही का जरा सा भी संकेत नहीं है। यह ऐसा मामला है जो हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम को, और साथ ही उनकी नियति एवं भविष्य की संभावनाओं को सम्मिलित करता है। इससे भी बढ़कर, यह वह स्थान है जहाँ परमेश्वर अपने सभी श्रमसाध्य प्रयासों को खर्च करता है। इस प्रकार परमेश्वर हिम्मत नहीं करता है कि इसकी जरा सी भी उपेक्षा करे, और वह किसी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगा। शुरुआत से लेकर बिलकुल अन्त तक परमेश्वर मानवजाति के इस लेख को दर्ज कर रहा है, और मनुष्य जो परमेश्वर का अनुसरण कर रहा है उसके सम्पूर्ण पथक्रम के लेख को दर्ज कर रहा है। इस समय परमेश्वर के प्रति तेरी मनोवृत्ति तेरी नियति को तय करेगी। क्या यह सही नहीं है? अब, क्या तुम लोग विश्वास करते हो कि परमेश्वर धर्मी है? क्या परमेश्वर के कार्य उचित हैं? क्या तुम लोगों के दिमाग में अभी भी परमेश्वर की कोई दूसरी तस्वीर है? (नहीं।) फिर क्या तुम लोग कहते हो कि मनुष्य का परिणाम ऐसा है कि उसे परमेश्वर तय करता है या मनुष्य स्वयं तय करता है? (इसे परमेश्वर तय करता है।) वह कौन है जो उसे तय करता है? (परमेश्वर।) तुम लोग निश्चित नहीं हो, क्या तुम लोग हो? हांग कांग की कलीसियाओं के भाईयों एवं बहनों, बोलो—यह कौन तय करता है? (मनुष्य स्वयं इसे तय करता है।) मनुष्य स्वयं इसे तय करता है? तब क्या इस का अर्थ यह नहीं है कि इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना देना नहीं है? कोरिया की कलीसियाओं की ओर से कौन बोलना चाहता है? (परमेश्वर मनुष्य के सभी कामों एवं कार्यों के आधार पर, और उस पथ के आधार पर जिस पर वे चलते हैं उनके परिणाम को निर्धारित करना चाहता है।) यह बिलकुल वस्तुनिष्ठ प्रत्युत्तर है। यहाँ एक तथ्य है जिसे मैं तुम सब को सूचित करना चाहता हूँ: परमेश्वर के उद्धार के कार्य के पथक्रम में, वह मनुष्य के लिए एक मानक (मानदण्ड) निश्चित करता है। यह मानक ऐसा है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन का पालन कर सकता है, और परमेश्वर के मार्ग में चल सकता है? यही वह मानक है जिसे मनुष्य के परिणाम को तौलने के लिए उपयोग किया जाता है। यदि तू परमेश्वर के इस मानक के अनुसार अभ्यास करता है, तो तू एक अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है; यदि तू नहीं करता है, तो तू एक अच्छा परिणाम नहीं प्राप्त कर सकता है। तब वह कौन है जिसके लिए तू कहता है कि वह इस परिणाम को तय करता है? यह केवल परमेश्वर ही नहीं है जो इसे तय करता है, परन्तु इसके बजाय परमेश्वर एवं मनुष्य साथ मिलकर तय करते हैं। क्या यह सही है? (हाँ।) ऐसा क्यों है? क्योंकि यह परमेश्वर ही है जो मानवजाति के उद्धार के कार्य में सक्रियता से शामिल होना चाहता है, और उसके लिए एक खूबसूरत मंज़िल को तैयार करना चाहता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य है, और यह परिणाम एवं यह मंज़िल ऐसा है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है। यदि उसके कार्य का कोई लक्ष्य नहीं होता, तो परमेश्वर को इस कार्य को करने की कोई आवश्यकता नहीं होती; यदि परमेश्वर ने इस कार्य को नहीं किया होता, तो मनुष्य के पास उद्धार पाने के लिए कोई अवसर नहीं होता। मनुष्य ही उद्धार का लक्ष्य है, और यद्यपि इस प्रक्रिया में मनुष्य निष्क्रिय पक्ष है, फिर भी इस पक्ष की मनोवृत्ति ही है जो यह निर्धारित करती है कि मानवजाति का उद्धार करने के अपने कार्य में परमेश्वर सफल होगा या नहीं? यदि वह मार्गदर्शन नहीं होता जिसे परमेश्वर तुझे देता है, तो तू उसके मानक को नहीं जान पाता, और तेरे पास कोई उद्देश्य नहीं होता। यदि तेरे पास यह मानक एवं यह लक्ष्य है, फिर भी तू सहयोग नहीं करता है, तू इसका अभ्यास नहीं करता है, तू वह दाम नहीं चुकाता है, तो तू अभी भी इस परिणाम को प्राप्त नहीं करेगा। इसीलिए हम कहते हैं कि इस परिणाम को परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है, और इसे मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता है। और अब तुम लोग जानते हो कि मनुष्य के परिणाम को कौन तय करता है।

लोग अनुभव के आधार पर परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए प्रवृत्त होते हैं

परमेश्वर को जानने के विषय में वार्तालाप करते समय, क्या तुम लोगों ने किसी चीज़ पर ध्यान दिया है? क्या तुम सब ने ध्यान दिया है कि परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति एक परिवर्तन से होकर गुज़री है? क्या मानवजाति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति अपरिवर्तनीय है? क्या परमेश्वर हमेशा इसी तरह से सहता रहेगा, अनिश्चित काल तक मनुष्य को अपना सारा प्रेम एवं दया प्रदान करता रहेगा? यह मामला परमेश्वर के सार को भी शामिल करता है। इससे पहले आओ हम उस तथाकथित उड़ाऊ पुत्र के उस प्रश्न की ओर वापस लौटें। जब इस प्रश्न को पूछा गया था उसके पश्चात्, तुम सब के उत्तर बिलकुल स्पष्ट नहीं थे। दूसरे शब्दों में, तुम लोग अभी भी परमेश्वर के इरादों को अच्छी तरह से नहीं समझते हो। जब एक बार लोग यह जान जाते हैं कि परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, तो वे परमेश्वर को प्रेम के एक प्रतीक के रूप में परिभाषित करते हैं; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग किस प्रकार बर्ताव करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे परमेश्वर से कैसा व्यवहार करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है वे कितने अनाज्ञाकारी हैं, किसी भी चीज़ से फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि परमेश्वर के पास प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम असीमित एवं अथाह है। परमेश्वर के पास प्रेम है, अतः वह लोगों के साथ सहनशील हो सकता है; परमेश्वर के पास प्रेम है, अतः वह लोगों के प्रति दयावान हो सकता है, उनकी अपरिपक्वता के प्रति दयावान हो सकता है, उनकी अज्ञानता के प्रति दयावान हो सकता है, और उनकी अनाज्ञाकारिता के प्रति दयावान हो सकता है। क्या यह वास्तव में ऐसा ही है? कुछ लोगों के लिए, जब उन्होंने एक बार या कुछ बार परमेश्वर के धीरज का अनुभव कर लिया है, तो परमेश्वर के विषय में अपनी स्वयं की समझ में वे इसके साथ एक महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में बर्ताव करते हैं, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उनके प्रति सदैव धैर्यवान होगा, और उनके प्रति सदैव दयावान होगा, और उनके जीवन के पथक्रम के दौरान वे परमेश्वर के धीरज का ग्रहण करेंगे और उसे एक मानक के रूप में मानेंगे कि किस प्रकार परमेश्वर उनसे बर्ताव करता है। ऐसे भी लोग हैं जो, जब उन्होंने एक बार परमेश्वर की सहनशीलता का अनुभव कर लिया है, हमेशा परमेश्वर को सहनशीलता के रूप में परिभाषित करेंगे, और यह सहनशीलता अनिश्चित है, बिना किसी शर्त के है, और यहाँ तक कि पूरी तरह से असैद्धांतिक है। क्या ये विश्वास सही हैं? हर बार जब परमेश्वर के सार या परमेश्वर के स्वभाव के मामलों की चर्चा की जाती है, तुम सब परेशान दिखाई देते हो। तुम लोगों को इस प्रकार देखना मुझे कुछ कुछ क्रोधित करता है। तुम लोगों ने परमेश्वर के सार के बारे में बहुत सारी सच्चाईयों को सुना है; तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव से सम्बन्धित बहुत सारे विषयों को भी ध्यान से सुना है। फिर भी, तुम सब के मनों में ये मामले और इन पहलुओं की सच्चाई मात्र स्मृतियां हैं जो मत (थ्योरी) एवं लिखित वचनों पर आधारित हैं। तुम लोगों में से कोई भी यह अनुभव करने में सक्षम नहीं है कि तुम्हारे वास्तविक जीवन में परमेश्वर का स्वभाव क्या है, और न ही तुम सब यह देख सकते हो कि परमेश्वर का स्वभाव क्या है। इसलिए, तुम सभी अपने अपने विश्वास में गड़बड़ा गए हो, तुम सब आंखें मूंदकर विश्वास करते हो, उस बिन्दु तक जहाँ तुम लोगों के पास परमेश्वर के प्रति श्रद्धा विहीन मनोवृत्ति है, और तुम सब उसे एक ओर धकेल देते हो। तुम लोगों के पास परमेश्वर के प्रति जो इस प्रकार की मनोवृत्ति है वह तुम सब को किस ओर ले जाती है? यह उस ओर ले जाती है जहाँ तुम लोग हमेशा परमेश्वर के विषय में निष्कर्ष बनाते हो। जब एक बार तुम सब को थोड़ा सा ज्ञान मिल जाता है, तो तुम लोग अत्यंत संतुष्ट महसूस करते हो, तुम सब महसूस करते हो कि तुम लोगों ने परमेश्वर को उसकी सम्पूर्णता में पा लिया है। उसके बाद, तुम सब निष्कर्ष निकालते हो कि परमेश्वर ऐसा ही है, और तुम लोग उसे स्वतन्त्रता से बढ़ने नहीं देते हो। और जब कभी परमेश्वर कुछ नया करता है, तो तुम लोग स्वीकार ही नहीं करते हो कि वह परमेश्वर है। एक दिन, जब परमेश्वर कहता है: "मैं अब मनुष्य से प्रेम नहीं करता हूँ; मैं अब उसको अपनी दया प्रदान नहीं करता हूँ; मनुष्य के प्रति मेरे पास अब और सहनशीलता या धीरज नहीं है; मैं मनुष्य के प्रति अत्यंत घृणा एवं चिढ़ से भर गया हूँ," तो लोग अपने हृदय की गहराईयों से इस प्रकार के कथन से मुठभेड़ करेंगे। कुछ लोग तो यह भी कहेंगे: "तू अब मेरा परमेश्वर नहीं है, तू अब आगे से वह परमेश्वर नहीं है जिसका मैं अनुसरण करना चाहता हूँ। जो कुछ तू कहता है यदि यह वही है, तो तू अब आगे से मेरे परमेश्वर होने के योग्य नहीं है, और मुझे लगातार तेरा अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तू मुझे दया प्रदान नहीं करता है, मुझे प्रेम नहीं देता है, मुझे सहनशीलता नहीं देता है, तो मैं अब आगे से तेरा अनुसरण नहीं करूंगा। यदि तू अनिश्चित काल तक मेरे प्रति सहनशील बना रहता है, और हमेशा मेरे साथ धैर्यवान रहता है, और मुझे यह देखने देता है कि तू प्रेम है, कि तू धैर्यवान है, कि तू सहनशील है, केवल तभी मैं तेरा अनुसरण कर सकता हूँ, और केवल तभी मेरे पास वह आत्मविश्वास हो सकता है कि अन्त तक अनुसरण करूं। चूँकि तेरे पास तेरा धीरज एवं दया है, मेरी अनाज्ञाकारिता और मेरे अपराधों को अनिश्चित काल तक क्षमा किया जा सकता है, और अनिश्चित काल तक माफ किया जा सकता है, और मैं किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पाप कर सकता हूँ, किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पाप अंगीकार कर सकता हूँ और माफ किया जा सकता हूँ, और किसी भी समय और किसी भी स्थान पर तुझे क्रोध दिला सकता हूँ। तेरे पास मुझ से सम्बन्धित अपने स्वयं के कोई विचार एवं निष्कर्ष नहीं होने चाहिए।" यद्यपि शायद तू इस प्रकार के प्रश्न के विषय में ऐसे आत्मनिष्ठ रूप से एवं चैतन्य रूप से नहीं सोचता है, फिर भी जब कभी तू परमेश्वर का विचार करता है कि वह तेरे पापों की क्षमा के लिए एक यन्त्र है और एक वस्तु है कि उसे एक खूबसूरत मंज़िल को पाने के लिए उपयोग में लाया जाए, तो तूने पहले से ही अतिसूक्ष्म रूप से जीते परमेश्वर को अपने शत्रु के रूप में अपने विरुद्ध रख दिया है। यह वही है जो मैं देखता हूँ। तू शायद लगातार कह सकता है, "मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ" "मैं सत्य की खोज करता हूँ"; "मैं अपने स्वभाव को बदलना चाहता हूँ"; "मैं अंधकार के प्रभाव को तोड़कर स्वतन्त्र होना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य होना चाहता हूँ, और अपने कर्तव्य को अच्छे से निभाना चाहता हूँ"; एवं इत्यादि। फिर भी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तू जो कुछ भी कहता है वह कितना अच्छा सुनाई देता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तू कितने मत (थ्योरी) को जानता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह मत (थ्योरी) कितनी प्रभावशाली है, यह कितनी प्रतिष्ठित है, क्योंकि उस मामले की सच्चाई यह है कि तुम लोगों में से बहुत से लोग हैं जिन्होंने पहले से ही सीख लिया है कि किस प्रकार नियम, सिद्धान्त, और मत (थ्योरी) का उपयोग करें जिन पर तुम सब ने परमेश्वर के विषय में निष्कर्ष निकलने के लिए महारत हासिल की है, और पूरी तरह से स्वभाविक रीति से उसे स्वयं के विरुद्ध रख दिया है। यद्यपि तूने पत्रियों पर महारत हासिल कर ली है और सिद्धान्तों पर महारत हासिल कर ली है, फिर भी तूने असल में सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, अतः तेरे लिए परमेश्वर के करीब जाना, परमेश्वर को जानना, और परमेश्वर को समझना बहुत कठिन है। यह दयनीय है!

मैं ने एक वीडियो में यह दृश्य देखा था: कुछ बहनें वचन देह में प्रकट होता है (The Word Appears in the Flesh) पुस्तक को पकड़े हुए थीं, और उन्होंने उसे बहुत ऊंचाई पर रखा हुआ था। वे उस पुस्तक को अपने बीच में थामे हुए थीं, उनके सिरों से भी ऊपर। हालाँकि यह मात्र एक तस्वीर है, जो वह मेरे भीतर जागृत करता है वह एक तस्वीर नहीं है। इसके बजाय, यह मुझे सोचने के लिए बाध्य करता है कि जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपने हृदय में ऊँचा उठाए रखता है वह परमेश्वर का वचन नहीं है, परन्तु परमेश्वर के वचन की पुस्तक है। यह बहुत ही निराश करनेवाली बात है। अभ्यास करने का यह तरीका सामान्यतः परमेश्वर को ऊंचाई पर रखने की स्थिति नहीं है। यह इसलिए है क्योंकि तुम लोग उस तरह से परमेश्वर को नहीं समझते हो जैसे एक स्पष्ट प्रश्न, एवं बहुत ही छोटे प्रश्न को समझते हो, तुम सब अपनी स्वयं की धारणाओं के साथ सामने आते हो। जब मैं तुम लोगों से चीज़ों के विषय में पूछता हूँ, जब मैं तुम सब के साथ गंभीर होता हूँ, तो तुम सब अनुमान के साथ एवं अपनी स्वयं की कल्पनाओं के साथ प्रत्युत्तर देते हो, तुम लोगों में से कुछ सन्देहास्पद स्वर अपना लेते हो और पलट कर प्रश्न करते हो। यह इसे मेरे लिए और भी अधिक स्पष्ट रीति से पुष्ट करता है कि वह परमेश्वर जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो वह सच्चा परमेश्वर नहीं है। इतने सालों से परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, तुम सब एक बार फिर से परमेश्वर के विषय में निष्कर्षों को निकालने के लिए परमेश्वर के वचन का उपयोग करते हो, परमेश्वर के कार्य का उपयोग करते हो, तथा और अधिक सिद्धान्तों का उपयोग करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम लोग परमेश्वर को समझने के लिए कभी प्रयास नहीं करते हो; तुम सभी परमेश्वर के इरादों का पता लगाने की कभी कोशिश नहीं करते हो; तुम लोग यह समझने का प्रयास नहीं करते हो कि मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है; या परमेश्वर किस प्रकार सोचता है, वह दुखी क्यों है, वह क्रोधित क्यों है, और वह लोगों को क्यों ठुकराता है, और ऐसे ही कुछ अन्य प्रश्न। इससे अधिक और क्या, यहाँ तक कि अधिकतर लोग मानते हैं कि परमेश्वर हमेशा से खामोश रहा है क्योंकि वह बस मानवजाति के कामों को देख रहा है, क्योंकि उसके पास उनके प्रति कोई मनोवृत्ति नहीं है, और न ही उसके पास अपने स्वयं के विचार हैं। एक अन्य समूह इसे और भी आगे ले जाता है। ये लोग मानते हैं कि परमेश्वर जरा भी आवाज़ नहीं करता है क्योंकि उसने मौन स्वीकृति दी है, परमेश्वर जरा सी भी आवाज़ नहीं करता है क्योंकि वह इन्तज़ार कर रहा है, परमेश्वर जरा सी भी आवाज़ नहीं करता है क्योंकि उसके पास कोई मनोवृत्ति नहीं है, क्योंकि परमेश्वर की मनोवृत्ति को पहले से ही पुस्तक में विस्तार से समझाया जा चुका है, उसे उसकी सम्पूर्णता में पहले से ही मानवजाति पर अभिव्यक्त किया जा चुका है, और समय समय पर लोगों को बार-बार बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। यद्यपि परमेश्वर खामोश है, फिर भी उसके पास अभी भी एक मनोवृत्ति है, और उसके पास एक मानक है जिसकी मांग वह लोगों से करता है। यद्यपि लोग उसे समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं, और उसे खोजने का प्रयास नहीं करते हैं, फिर भी उसकी मनोवृत्ति बिलकुल साफ है। किसी ऐसे व्यक्ति का विचार करें जिसने किसी समय बड़े धुन के साथ परमेश्वर का अनुसरण किया था, परन्तु किसी मुकाम पर उसे छोड़ दिया और चला गया था। अगर अब यह व्यक्ति वापस आना चाहता है, तो अत्यंत आश्चर्यजनक रूप से, तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर का दृष्टिकोण क्या होगा, और परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या होगी। क्या यह दयनीय नहीं है? वास्तव में, यह असल में एक सतही मामला है, यदि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के हृदय को समझते हो, तो तुम सब इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति को समझोगे, और तुम लोग एक अस्पष्ट उत्तर नहीं दोगे। चूँकि तुम सब नहीं जानते हो, इसलिए मुझे उत्तर देने दो।

ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

तू इस प्रकार के व्यक्ति को हर जगह पाएगा: जब वे परमेश्वर के मार्ग के विषय में सुनिश्चित हो जाते हैं उसके पश्चात्, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप और बिना कुछ कहे छोड़कर चले जाते हैं और जो कुछ उनका हृदय चाहता है वही करते हैं। कुछ समय के लिए, हम इस बात पे नहीं जाएंगे कि यह व्यक्ति छोड़कर क्यों चला जाता है। पहले हम इस ओर देखेंगे कि इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस क्षण यह व्यक्ति छोड़कर चला जाता है, परमेश्वर की नज़रों में उनके विश्वास का दायरा समाप्त हो जाता है। यह वह व्यक्ति नहीं है जिसने इसे समाप्त किया है, परन्तु परमेश्वर है। यह कि इस व्यक्ति ने परमेश्वर को छोड़ दिया था, इसका अर्थ है उन्होंने पहले से ही परमेश्वर का तिरस्कार कर दिया है, यह कि वे पहले से ही परमेश्वर को नहीं चाहते हैं। इसका अर्थ है कि उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार नहीं किया है। चूँकि यह व्यक्ति परमेश्वर को नहीं चाहता है, क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाहता है? इसके अतिरिक्त, जब इस व्यक्ति के पास ऐसी मनोवृत्ति एवं ऐसा दृष्टिकोण है, और उसने परमेश्वर को छोड़ने का संकल्प किया है, तो उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। यद्यपि वे आवेश में नहीं आए थे और परमेश्वर को कोसते नहीं थे, यद्यपि वे किसी बुरे या चरम व्यवहार में संलग्न नहीं हुए थे, और यद्यपि ऐसा व्यक्ति सोच रहा है: यदि ऐसा दिन आता है जब मैं बाह्य रुप से आनन्द से तृप्त हो जाता हूँ, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है, तो मैं वापस लौट आऊंगा। या यदि परमेश्वर मुझे पुकारता है, तो मैं वापस लौट आऊंगा। या वे कहते हैं: जब मैं बाहर से चोट खाया हुआ हूँ, जब मैं देखता हूँ कि बाहरी संसार अत्यंत अंधकारमय और अत्यंत दुष्ट है और मैं अब आगे से बहाव के साथ बहना नहीं चाहता हूँ, तो मैं परमेश्वर के पास वापस लौट आऊंगा। यद्यपि इस व्यक्ति ने अपने मन में गणना कर ली है कि वे समय के किस बिन्दु पर वापस लौट रहे हैं, यद्यपि वे अपनी वापसी के लिए द्वार को खुला छोड़ देते हैं, फिर भी वे एहसास नहीं करते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे किस प्रकार सोचते हैं और किस प्रकार योजना बनाते हैं, क्योंकि ये सब बस ख्याली पुलाव है। उनकी सबसे बड़ी गलती यह है कि वे इस बात के विषय में अस्पष्ट हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा लगता है। उस क्षण की शुरूआत से जब यह व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करता है, परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया है; परमेश्वर ने पहले से ही अपने हृदय में उनके परिणाम को निर्धारित कर दिया है। वह परिणाम क्या है? यह व्यक्ति हैमस्टर (चूहे की एक प्रजाति) में से एक है, और वह उनके साथ ही नाश होगा। इस प्रकार, लोग अकसर इस प्रकार की स्थिति को देखते हैं: कोई व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ देता है, परन्तु वे दण्ड नहीं पाते हैं। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धान्तों के अनुसार संचालन करता है। लोग कुछ चीज़ों को ही देख सकते हैं, और कुछ चीज़ों का निष्कर्ष परमेश्वर के हृदय में निकाला जाता है, अतः लोग नतीजे को नहीं देख सकते हैं। वह चीज़ जिसे लोग देखते हैं वह आवश्यक रूप से चीज़ों का सच्चा पहलु नहीं है; परन्तु अन्य पहलु है, ऐसा पहलु जिसे तू नहीं देखता है—ये परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार एवं निष्कर्ष हैं।

लोग जो परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग खड़े होते हैं वे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को छोड़ देते हैं

अतः परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को ऐसा गंभीर दण्ड कैसे दे सकता है? परमेश्वर उनके प्रति इतना क्रोधित क्यों है? सबसे पहले हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव महाप्रतापी है, एवं रोष है। वह कोई भेड़ नहीं है कि कोई भी उसे घात कर दे; इससे भी बढ़कर, वह कोई कठपुतली नहीं है कि लोग जैसा चाहें वैसा उसे नियन्त्रित करें। साथ ही वह कोई खाली हवा नहीं है कि लोगों के द्वारा उस पर स्वामित्व जताया जाए। यदि तुम वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर मौजूद है, तो तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानता है, और तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के सार-तत्व को क्रोधित नहीं करना है। हो सकता है कि यह क्रोध किसी एक शब्द के द्वारा उत्पन्न हुआ हो; कदाचित् एक विचार; कदाचित् किसी प्रकार का बुरा व्यवहार; कदाचित् सादा व्यवहार, ऐसा व्यवहार जो मनुष्य की नज़रों में एवं नैतिकता में स्वीकार्य है; या कदाचित् किसी सिद्धान्त एवं मत (थ्योरी) के द्वारा उत्पन्न हुआ हो। फिर भी, जब एक बार तुम परमेश्वर को क्रोधित कर देते हो, तो तुम्हारा अवसर चला जाता है और तुम्हारे अन्त के दिन आ जाते हैं। यह एक भयानक बात है! यदि तुम नहीं समझते हो कि परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है, तो शायद तुम परमेश्वर से नहीं डरते हो, और शायद तुम उसे हर समय ठेस पहुंचाते हो। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का भय कैसे मानें, तो तुम परमेश्वर का भय मानने में असमर्थ होते हो, और तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर के मार्ग में चलने के पथ पर स्वयं को कैसे रखना है - परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। जब एक बार तुम जान जाते हो, तो तुम सचेत हो सकते हो कि परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है, तो तुम जान लोगे कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना क्या है।

परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलना आवश्यक रूप से इसके विषय में नहीं है कि तुम कितनी अधिक सच्चाई को जानते हो, तुमने कितनी अधिक परीक्षाओं का अनुभव किया है, या तुमको कितना अधिक अनुशासित किया गया है। इसके बजाए, यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के लिहाज से तुम्हारे हृदय का सार-तत्व क्या है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति क्या है। लोगों का सार-तत्व और उनकी आत्मनिष्ठ मनोवृत्ति - ये अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मुख्य बातें हैं। उन लोगों के लिहाज से जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गये हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी घृणित मनोवृत्ति ने और उनके हृदय ने जो सत्य को तुच्छ जानते हैं परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित किया है, इस प्रकार जहाँ तक परमेश्वर की बात है उन्हें कभी भी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में जाना है, उनके पास वह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का भी अनुभव किया है। उनका चला जाना भ्रमित होने की स्थिति नहीं है, और न ही ऐसी स्थिति है कि वे इसके विषय में अस्पष्ट हैं। यह ऐसी स्थिति तो बिलकुल भी नहीं है कि उन्हें जबरदस्ती इसमें धकेला जा रहा है। इसके बजाए उन्होंने सचेत रूप से, एवं स्पष्ट मस्तिष्क के साथ, परमेश्वर को छोड़कर जाने का चुनाव किया है। उनका चले जाना अपने मार्ग को खोना नहीं है; यह उन्हें फेंक दिया जाना नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे एक मेम्ने के समान नहीं हैं जो झुण्ड से भटक गया है, उड़ाऊ पुत्र की तो बात ही छोड़ दो जिसने अपने मार्ग को खो दिया था। वे दण्डमुक्ति के साथ चले गए, और ऐसी परिस्थिति, और ऐसी दशा परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और इस क्रोध के कारण ही है कि वह उन्हें एक आशाहीन परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? अतः यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो वे परमेश्वर को ठेस पहुंचा सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की मनोवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेता है, और तब भी मानता है कि परमेश्वर उनके लौटकर आने की प्रतीक्षा कर रहा है - क्योंकि वे परमेश्वर की भटकी हुई भेड़ों में से एक हैं और परमेश्वर अभी भी उनके हृदय के परिवर्तन का इंतज़ार कर रहा है – तो यह व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे उनके दण्ड के दिन से बहुत दूर किया गया है। परमेश्वर उन्हें स्वीकार करने से मना तो नहीं करेगा। यह दूसरी बार है जब उन्होंने उसके स्वभाव को क्रोधित किया है; यह तो और भी अधिक भयानक बात है! इस व्यक्ति की श्रद्धा विहीन मनोवृत्ति ने पहले से ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेश को ठेस पहुंचा दिया है। क्या परमेश्वर अब भी उन्हें स्वीकार करेगा? इस मामले के सम्बन्ध में परमेश्वर के सिद्धान्त हैं: यदि कोई व्यक्ति सच्चे मार्ग के विषय में निश्चित है फिर भी वह जानते बूझते एवं स्पष्ट मस्तिष्क के साथ परमेश्वर को ठुकरा सकता है, और स्वयं को परमेश्वर से दूर कर सकता है, तब परमेश्वर उनके उद्धार के मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, और इसके बाद राज्य में प्रवेश करने के उस दरवाजे को उनके लिए बन्द कर दिया जाएगा। जब यह व्यक्ति आकर एक बार फिर द्वार खटखटाता है, तो परमेश्वर उनके लिए दोबारा द्वार नहीं खोलेगा। इस व्यक्ति को सदा के लिए द्वार से बाहर रखा जाएगा। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ने बाईबिल में मूसा की कहानी को पढ़ा है। जब मूसा को परमेश्वर के द्वारा अभिषिक्त किया गया था उसके पश्चात्, 250 अगुवे मूसा के कार्यों एवं अन्य विभिन्न कारणों की वजह से उससे असंतुष्ट थे। उन्होंने किसकी आज्ञा मानने से मना किया था? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधों को मानने से इंकार किया था; उन्होंने इस मामले पर परमेश्वर के कार्य को मानने से मना किया। उन्होंने निम्नलिखित बातें कही थीं: "तू ने अपने ऊपर बहुत कुछ ले लिया है, देख सारी मंडली, और उनमें से हर एक जन पवित्र है, और यहोवा हमारे बीच में है....।" मनुष्य की नज़रों में, क्या ये शब्द बहुत गंभीर हैं? वे गंभीर नहीं हैं! कम से कम शब्दों का शाब्दिक अर्थ गंभीर नहीं है। वैधानिक अर्थ में, उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा है, क्योंकि सतही तौर पर यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, और इसमें ईश निन्दा सम्बन्धी कोई अर्थ तो बिलकुल भी नहीं है। यहाँ केवल एक साधारण सा वाक्य है, इससे अधिक और कुछ नहीं। फिर भी ऐसा क्यों है कि ये शब्द परमेश्वर के ऐसे कोप को भड़का सकते हैं? यह इसलिए है क्योंकि उन्हें लोगों से नहीं कहा गया है, परन्तु परमेश्वर से कहा गया है। उनके द्वारा अभिव्यक्त की गई मनोवृत्ति एवं स्वभाव बिलकुल वही है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करता है, विशेषकर परमेश्वर के उस स्वभाव को क्रोधित करता है जिसे ठेस नहीं पहुंचाय जा सकता है। हम सब जानते हैं कि अन्त में उनका परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जो परमेश्वर को छोड़ देते हैं, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी मनोवृत्ति क्या है? और क्यों उनका दृष्टिकोण एवं मनोवृत्ति ऐसा कारण बनता है कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से व्यवहार करता है? कारण यह है कि वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि वह परमेश्वर है फिर भी वे अभी भी परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने का चुनाव करते हैं। इसी लिए उद्धार के लिए उनके अवसर से उन्हें पूरी तरह से वंचित कर दिया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे बाईबिल कहती है: "क्योंकि सच्चाई की पहचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जानबूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिए फिर कोई बलिदान बाकी नहीं रहा।" क्या अब तुम लोग इस विषय पर स्पष्ट हो?

मनुष्य की नियति परमेश्वर के प्रति उसकी मनोवृत्ति के द्वारा निर्धारित होती है

परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और जैसे लोग अलग अलग स्थितियों में भिन्न भिन्न रूप में प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही इन प्रदर्शनों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति भी अलग अलग होती है क्योंकि वह एक कठपुतली नहीं है, और न ही वह खाली हवा है। परमेश्वर की मनोवृत्ति को जानना मानवजाति के लिए एक योग्य अनुसरण (उद्यम) है। परमेश्वर की मनोवृत्ति को जानने के द्वारा लोगों को सीखना चाहिए कि वे किस प्रकार परमेश्वर के स्वभाव को जान सकते हैं और थोड़ा थोड़ा करके उसके हृदय को समझ सकते हैं। जब तुम थोड़ा थोड़ा करके परमेश्वर के हृदय को समझने लगते हो, तो तुम्हें यह नहीं लगेगा कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को अंजाम देना एक कठिन कार्य है। इससे अधिक, जब तुम परमेश्वर को समझते हो, तो तुम्हारे लिए उसके विषय में निष्कर्षों को बनाना और अधिक कठिन होता है। जब तुम परमेश्वर के विषय में निष्कर्षों को बनाना बन्द कर देते हो, तो इसकी कम संभावना है कि तुम उसे ठेस पहुंचाओ, और अनजाने में परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करेगा कि तुम उसके ज्ञान को पाओ, और इसके द्वारा तुम अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानोगे। तुम उन सिद्धान्तों, पत्रियों, एवं मतों (थ्योरी) का उपयोग करते हुए परमेश्वर को परिभाषित करना बन्द करोगे जिनमें तुमने महारत हासिल की है। इसके बजाए, सभी चीज़ों में सदैव परमेश्वर के इरादों को खोजने के द्वारा, तुम अनजाने में ही ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार है।

परमेश्वर का कार्य अदृष्ट है और मानवजाति के द्वारा अस्पर्शनीय है, परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की बात है, और हर एक व्यक्ति के कार्य, साथ में उसके प्रति उनकी मनोवृत्ति की बात है – परमेश्वर के द्वारा मात्र इनका एहसास ही नहीं किया जाता है, बल्कि ये दृश्यमान भी हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे हर किसी को पहचानना चाहिए और उसके विषय में स्पष्ट होना चाहिए। तुम शायद स्वयं से हमेशा पूछते रहते हो: "क्या परमेश्वर जानता है कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर जानता है कि मैं ठीक इस समय क्या सोच रहा हूँ? शायद वह जानता है, शायद वह नहीं जानता है।" यदि तुम इस प्रकार के दृष्टिकोण को अपनाते हो, परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उस में विश्वास करते हो फिर भी उसके कार्य एवं उसके अस्तित्व पर सन्देह करते हो, तो उसके पश्चात् जल्द ही या देर से ही सही ऐसा दिन आएगा जब तुम परमेश्वर को क्रोधित करते हो, क्योंकि तुम पहले से ही एक खतरनाक खड़ी चट्टान की छोर पर डगमगा रहे हो। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने बहुत वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास किया है, परन्तु उन्होंने अभी तक सत्य की वास्तविकता को प्राप्त नहीं किया है, और यहाँ तक कि वे परमेश्वर की इच्छा को भी नहीं समझते हैं। उनके जीवन की महत्ता ने कोई उन्नति नहीं की है, केवल अत्यंत छिछले सिद्धान्तों के के मुताबिक चलते हैं। यह इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों ने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने स्वयं के जीवन के रूप में नहीं लिया है, और उन्होंने कभी परमेश्वर के अस्तित्व का सामना और उसे स्वीकार नहीं किया है। क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को देखता है और आनन्द से भर जाता है? क्या वे उसे राहत देते हैं? उस स्थिति में, यह परमेश्वर में विश्वास करने की लोगों की रीति है जो उनकी नियति को निर्धारित करती है। चाहे यह ऐसा प्रश्न हो कि तुम किस प्रकार परमेश्वर की खोज करते हो या तुम परमेश्वर से किस प्रकार व्यवहार करते हो, यह तुम्हारीस्वयं की मनोवृत्ति है जो अत्यंत महत्वपूर्ण बात है। परमेश्वर की ऐसी उपेक्षा न करो मानो वह तुम्हारे सिर के पीछे की खाली हवा है। अपने विश्वास के परमेश्वर को हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एवं एक वास्तविक परमेश्वर के रूप में सोचो। वह वहाँ ऊपर उस तीसरे स्वर्ग में नहीं है जहाँ उसके पास करने के लिए कुछ भी नहीं है। इसके बजाए, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करने वाले हो, हर एक छोटे संसार एवं हर एक छोटे कार्य को देख रहा है, यह देख है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति क्या है। चाहे तुम स्वयं को परमेश्वर को देने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे आंतरिक विचार एवं सोच परमेश्वर के सामने हैं, और उन्हें परमेश्वर के द्वारा देखा जा रहा है। यह तुम्हारे व्यवहार के अनुसार है, तुम्हारे कार्यों के अनुसार है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति के अनुसार है, कि तुम्हारे विषय में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी मनोवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं उन लोगों को कुछ परामर्श देना चाहूंगा जो अपने आपको छोटे बच्चों के समान परमेश्वर के हाथों में दे देते हैं, मानो उसे तुम से लाड़ प्यार करना चाहिए, मानो वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता है, मानो तुम्हारे प्रति उसकी मनोवृत्ति स्थिर है और कभी नहीं बदल सकती है: सपने देखना बन्द करो! परमेश्वर हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धर्मी है। वह ईमानदारी से मानवजाति को जीतने और उसके उद्धार के कार्य के प्रति व्यवहार करता है। यह उसका प्रबंधन है। वह प्रत्येक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़ दुलार करने वाला या बिगाड़ने वाला प्रेम नहीं है; मानवजाति के प्रति उसकी दया एवं सहनशीलता पक्षपातपूर्ण या बेपरवाह नहीं है। इसके विपरीत, मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम पोषण करने के लिए है, दया करने के लिए है, और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी दया एवं सहनशीलता मनुष्य के विषय में उसकी अपेक्षाओं को सूचित करती है; उसकी दया एवं सहनशीलता ऐसी चीज़ें हैं जो मानवता के ज़िन्दा बचे रहने के लिए ज़रूरी हैं। परमेश्वर जीवित है, और परमेश्वर वास्तव में मौजूद है; मानवजाति के प्रति उसकी मनोवृत्ति सैद्धान्तिक है, कट्टर नियम बिलकुल भी नहीं है, और यह बदल सकती है। मानवजाति के लिए उसकी इच्छा समय के साथ, परिस्थितियों के साथ, और प्रत्येक व्यक्ति की मनोवृत्ति के साथ धीरे धीरे परिवर्तित एवं रूपान्तरित हो रही है। अतः तुम्हें इस पर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए, और यह समझना चाहिए कि परमेश्वर का सार-तत्व अपरिवर्तनीय है, और उसका स्वभाव विभिन्न समयों पर, और विभिन्न सन्दर्भों में जारी होगा। शायद तुम न सोचो कि यह एक गंभीर मामला है, और तुम यह कल्पना करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करते हो कि परमेश्वर को किस प्रकार कार्यों को अंजाम देना चाहिए। परन्तु ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारे दृष्टिकोण के बिल्कुल विपरीत चीज़ें ही सही होती हैं, और यह कि अपनी व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करने के द्वारा तुम परमेश्वर को आंकने का प्रयास करते हो, तो तुमने पहले ही उसे क्रोधित कर दिया है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर वैसे संचालन नहीं करता है जैसे तुम सोचते हो कि वह करता है, और परमेश्वर इस मामले से उस तरह व्यवहार नहीं करेगा जैसा तुम सोचते हो कि वह करेगा। और इस प्रकार मैं तुम्हें स्मरण दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपनी पहुंच में सावधान एवं बुद्धिमान हो , और सीखो कि किस प्रकार सभी हालातों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धान्त का अनुसरण करते हैं - परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा एवं उसकी मनोवृत्ति के मामलों पर एक स्थिर समझ विकसित करनी होगी; अद्भुत प्रकाशन पानेवाले लोगों को खोजो ताकि वे इसका संवाद तुम से करें, और ईमानदारी से खोजो। अपने विश्वास के परमेश्वर को एक कठपुतली के रूप में न देखो – मनमाने ढंग से न्याय करना, मनमाने निष्कर्षों पर आना, उस सम्मान के साथ परमेश्वर से व्यवहार न करना जिसका वह हकदार है। परमेश्वर के उद्धार की प्रक्रिया में, जब वह तुम्हारे परिणाम को परिभाषित करता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है यदि वह तुम्हें दया प्रदान करता है, या सहनशीलता, या न्याय एवं ताड़ना, तुम्हारे प्रति उसकी मनोवृत्ति स्थिर नहीं है। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति, एवं परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर होता है। परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलु को यह अनुमति न दो कि वह परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित करे। एक मृत परमेश्वर में विश्वास न करो; एक जीवित परमेश्वर में विश्वास करो। इसे स्मरण रखो! यद्यपि मैंने यहाँ पर कुछ सच्चाईयों पर चर्चा की है, ऐसी सच्चाईयां जिन्हें तुम लोगों को सुनने की आवश्यकता थी, फिर भी तुम सबकी वर्तमान दशा एवं तुम लोगों के वर्तमान डीलडौल के प्रकाश में, मैं तुम्हारे उत्साह को खत्म करने के लिए कोई बड़ी मांग नहीं करूंगा। ऐसा करने से तुम लोगों का हृदय अत्यधिक वीरानेपन से भर सकता है, और परमेश्वर के प्रति तुम सब को बहुत अधिक निराशा महसूस करा सकता है। इसके बदले मुझे आशा है कि तुम अपने हृदय में परमेश्वर के प्रेम का उपयोग कर सकते हो, और जब आगे के पथ पर चलते हो तो तुम लोग उस मनोवृत्ति का उपयोग कर सकते हो जो परमेश्वर के प्रति सम्मानजनक है। उस मामले में न गड़बड़ा जाओ कि परमेश्वर के विश्वास के प्रति किस प्रकार व्यवहार करना है। इसके साथ ऐसा व्यवहार करो मानो कि यह बहुत बड़े प्रश्नों में से एक है। इसे अपने हृदय में रखो, इसका अभ्यास करो, और इसे वास्तविक जीवन के साथ जोड़ो - केवल होठों से इसका आदर न करो। क्योंकि यह ज़िन्दगी और मौत की बात है, और ऐसी बात है जो तुम्हारी नियति को निर्धारित करेगी। इससे एक मजाक के रूप में, या किसी बच्चे के खेल के रूप में व्यवहार न करो! आज तुम सब के साथ इन वचनों को बांटने के बाद, मैं जानने को उत्सुक हूँ कि तुम लोगों के मनों में समझ की फसल क्या है। जो कुछ आज मैं ने यहाँ पर कहा है क्या उसके विषय में कोई प्रश्न है जिसे तुम सब पूछना चाहते हो?

यद्यपि ये विषय थोड़े बहुत नए हैं, और तुम लोगों के दृष्टिकोण से और जो कुछ तुम लोग सामान्यतः अनुसरण करते हो और जिस पर ध्यान देते हो उससे थोड़ा बहुत दूर हट गए हैं, फिर भी मैं सोचता हूँ कि एक समय अवधि के लिए उनका संवाद किए जाने के पश्चात्, जो कुछ भी मैं ने कहा है उसके विषय में तुम सभी एक सामान्य समझ विकसित कर लोगे। चूँकि ये नए विषय हैं, ऐसे विषय हैं जिन पर तुम सब ने पहले कभी विचार नहीं किया था, तो मुझे आशा है कि ये तुम लोगों के बोझ को और नहीं बढ़ाएंगे। मैं आज इन वचनों को तुम लोगों को भयभीत करने के लिए नहीं बोलता हूँ, और न ही मैं तुम सब के साथ कोई सौदा करना चाहता हूँ; इसके बजाए, मेरा लक्ष्य यह है कि मैं तथ्य की सच्चाई को समझने में तुम लोगों की सहायता करूं। आखिरकार, मानवजाति एवं परमेश्वर के बीच में एक दूरी हैः यद्यपि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसने परमेश्वर को कभी समझा नहीं है; उसने परमेश्वर की मनोवृत्ति को कभी नहीं जाना है। मनुष्य परमेश्वर की मनोवृत्ति के लिए अपने उद्यमों में कभी उत्साही भी नहीं रहा है। इसके बजाए, उसने आंखें मूंदकर विश्वास किया है, वह आंखें मूंदकर आगे बढ़ा है, और वह परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान एवं समझ में लापरवाह रहा है। अतः इन मामलों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट करने हेतु, और यह समझने में तुम सब की सहायता करने हेतु मैं विवश महसूस करता हूँ कि वह परमेश्वर किस प्रकार का परमेश्वर है जिस में तुम लोग विश्वास करते हो; वह क्या सोच रहा है; विभिन्न प्रकार के लोगों के प्रति उसके व्यवहार में उसकी मनोवृत्ति क्या है; उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने से तुम सब कितनी दूर हो; और तूम लोगों के कार्य और उस मानक (स्तर) के बीच की असमानता क्या है जिसकी वह मांग करता है। तुम सब को जानकारी देने का लक्ष्य यह है कि तुम लोगों को तुम्हारे हृदय में नापने की एक छड़ी दी जाए जिसके साथ तुम सब यह नापो और जानो कि जिस मार्ग पर तुम लोग चलते हो वह किस प्रकार की फसल की ओर ले जाता है, तुम सब ने इस मार्ग पर क्या प्राप्त नहीं किया है, और तुम लोग किन क्षेत्रों में शामिल ही नहीं हुए हो। जब तुम सब आपस में वार्तालाप कर रहे हो, तो आप लोग आम तौर पर कुछ सामान्य रूप से चर्चित विषयों पर ही बोलते हो; दायरा संकरा है, और विषयवस्तु बिलकुल सतही है। जिस पर तुम लोग चर्चा करते हो और परमेश्वर के इरादों के बीच में, तथा आप सब की चर्चाओं और परमेश्वर की मांगों के दायरे एवं मानक के बीच में एक दूरी है एवं एक अंतर है। समय के बीतने के साथ साथ इस प्रकार से आगे बढ़ना तुम लोगों को परमेश्वर के मार्ग से दूर और दूर करता जाएगा। तुम सब बस परमेश्वर से मौजूद वचनों को ले रहे हो और उन्हें आराधना की वस्तुओं में, एवं रीति विधियों एवं नियमों में बदल रहे हो। जो है बस इतना ही है! वास्तव में, परमेश्वर का तुम लोगों के हृदय में कोई स्थान ही नहीं है, और परमेश्वर ने तुम सब के हृदय को कभी प्राप्त नहीं किया है। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को जानना बहुत कठिन है – यही सच्चाई है। यह कठिन है! यदि लोगों से अपने कर्तव्य को निभाने के लिए कहा जाए और कार्यों को बाहरी तौर पर करने को कहा जाए, यदि उनसे कठिन परिश्रम करने के लिए कहा जाए, तब लोग सोचेंगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना बहुत आसान है, क्योंकि यह सब मनुष्य की योग्यताओं के दायरे के भीतर आता है। फिर भी जिस क्षण यह विषय परमेश्वर के इरादों एवं मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति के क्षेत्रों की ओर हस्तांतरित होता है, तब जहाँ तक हर एक व्यक्ति की बात है चीज़ें और भी अधिक कठिन हो जाती हैं। यह इसलिए है क्योंकि यह सत्य के विषय में लोगों की समझ और वास्तविकता में उनके प्रवेश को शामिल करता है; निश्चित रूप से इसमें थोड़ी कठिनाई है! परन्तु जब तुम लोग पहले द्वार से होकर आगे निकल जाते हो उसके बाद, जब तुम इसके भीतर प्रवेश करना शुरू करते हो उसके बाद, यह धीरे धीरे और अधिक आसान होता जाता है।

उससे परमेश्वर के समान व्यवहार करना ही परमेश्वर का भय मानने का आरम्भिक बिन्दु है

किसी ने अभी-अभी एक प्रश्न उठाया था: ऐसा कैसे है कि हम अय्यूब की अपेक्षा परमेश्वर के बारे में अधिक जानते हैँ, फिर भी हम परमेश्वर का भय नहीं मान सकते हैं? हमने पहले ही इस विषय को स्पर्श किया था, सही है? वास्तव में, इस प्रश्न के सार पर भी पहले चर्चा की जा चुकी है, यह कि यद्यपि बीते समय में अय्यूब परमेश्वर को नहीं जानता था, फिर भी उसने उससे परमेश्वर के समान व्यवहार किया था, और उसे स्वर्ग एवं पृथ्वी की सभी चीज़ों के स्वामी के रूप में माना था। अय्यूब ने परमेश्वर को एक शत्रु नहीं माना था। इसके बजाय, उसने सभी चीज़ों के सृष्टिकर्ता के रूप में उसकी उपासना की थी। ऐसा क्यों है कि आजकल लोग परमेश्वर का इतना अधिक विरोध करते हैं? वे परमेश्वर का भय क्यों नहीं मान सकते हैं? एक कारण यह है कि उन्हें शैतान के द्वारा गहराई से भ्रष्ट कर दिया गया है। अपने शैतानी स्वभाव के साथ जो उनमें गहराई से बसा हुआ है, लोग परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं। इस प्रकार, यद्यपि वे परमेश्वर में विश्वास करते और परमेश्वर को मानते हैं, फिर भी वे अब भी परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं और स्वयं को उसके विरुद्ध रख सकते हैं। इसे मानव स्वभाव के द्वारा निर्धारित किया जाता है। दूसरा कारण यह है कि यद्यपि लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, फिर भी वे ईश्वर के रूप में उसके साथ व्यवहार करते ही नहीं हैं। इसके बजाय, वे विचार करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य का विरोधी है, उसे मनुष्य के शत्रु के रूप में मानते हैं, और उनका परमेश्वर के साथ मेलमिलाप नहीं हो सकता है। यह इतना आसान है। क्या इस मामले को पिछले सत्र में नहीं उठाया गया था? इसके बारे में सोचो: क्या यही वह कारण है? यद्यपि तेरे पास परमेश्वर का थोड़ा सा ज्ञान है, फिर भी यह ज्ञान क्या है? क्या यह ऐसी बात नहीं है जिसके बारे में हर कोई बात कर रहा है? क्या यह वह नहीं जिसे परमेश्वर ने तुझे बताया था? तू केवल मत (थ्योरि) सम्बन्धी एवं सैद्धान्तिक पहलुओं को जानता है; क्या तूने कभी परमेश्वर के वास्तविक पहलु का अनुभव किया है? क्या तेरे पास आत्मनिष्ठ (आत्मा या मन सम्बन्धी) ज्ञान है? क्या तेरे पास व्यावहारिक ज्ञान एवं अनुभव है? यदि परमेश्वर तुझे नहीं बताता, तो क्या तू इसे जान सकता था? मत (थ्योरी) के विषय में तेरा ज्ञान वास्तविक ज्ञान को नहीं दर्शाता है। संक्षेप में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तू कितना कुछ जानता है और तूने इसे कैसे जाना है, तेरे द्वारा परमेश्वर की वास्तविक समझ प्राप्त करने से पहले, परमेश्वर तेरा शत्रु है, और तेरे द्वारा परमेश्वर से इस प्रकार व्यवहार करने से पहले, उसे तेरे विरुद्ध रखा गया है, क्योंकि तू शैतान के मूर्त रूप हैं।

जब तू मसीह के साथ होता है, तो कदाचित् तू उसे दिन में तीन बार भोजन परोस सकता है। कदाचित् उसे चाय दे सकता है, उसके जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है, प्रकट रूप से मसीह से परमेश्वर के रूप में व्यवहार कर सकता है। जब भी कुछ होता है, तो लोगों के दृष्टिकोण हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण से विपरीत होते हैं। वे हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण को समझने में असफल होते हैं, उसे स्वीकार करने में असफल होते हैं। यद्यपि शायद लोग ऊपरी तौर पर परमेश्वर के साथ हों, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वे परमेश्वर के अनुरूप हैं। जैसे ही कुछ होता है, मुनष्य की अनाज्ञाकारिता की असलियत उभरती है, और उस शत्रुता की पुष्टि करती है जो मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच में मौजूद है। यह शत्रुता ऐसी नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य का विरोध करता है; यह परमेश्वर नहीं है जो मनुष्य का शत्रु होना चाहता है, और यह परमेश्वर नहीं है जो मनुष्य को अपने विरोध में रखता है और इस तरह से मनुष्य से व्यवहार करता है। इसके बजाय, यह परमेश्वर के प्रति ऐसी विरोधात्मक सार की स्थिति है जो मनुष्य की आत्मनिष्ठ इच्छा शक्ति में, एवं मनुष्य के अवचेतन मन में घात लगाती है। चूँकि मनुष्य उन सब को अपने अनुसंधान की वस्तु के रूप में मानता है जो परमेश्वर से आता है, किन्तु सबसे बढ़कर, जो कुछ परमेश्वर से आता है और जो कुछ परमेश्वर को शामिल करता है उसके प्रति उसका प्रयुत्तर अन्दाज़ा लगाना, और सन्देह करना, और उसके बाद शीघ्रता से ऐसी मनोवृत्ति को अपनाना है जो परमेश्वर से संघर्ष करता है, और परमेश्वर का विरोध करता है। उसके बाद, मनुष्य इन शिथिल मनोदशाओं को लेगा और परमेश्वर से विवाद करेगा या उससे स्पर्धा करेगा, यहाँ तक कि उस बिन्दु तक जहाँ वह सन्देह करेगा कि इस प्रकार का परमेश्वर उसके अनुसरण के योग्य है या नहीं। इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य का विवेक उसे बताता है कि उसे इस तरह से आगे नहीं बढ़ना चाहिए, वह स्वयं की सुनने के बजाय तब भी ऐसा ही करने का चुनाव करता है, कुछ इस तरह कि वह अन्त तक बिना किसी संकोच के बढ़ता जाएगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों की प्रथम प्रतिक्रिया क्या होती है जब वे परमेश्वर के बारे में कोई अफवाह या निन्दात्मक बात सुनते हैं? उनकी पहली प्रतिक्रिया है: मैं नहीं जानता हूँ कि यह अफवाह सही है या नहीं, इसका अस्तित्व है या नहीं, अतः मैं प्रतीक्षा करूंगा और देखूंगा। तब वे विचार करना आरम्भ कर देते हैं: इसे सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं है, क्या इसका अस्तित्व है? क्या यह अफवाह सच है या नहीं? यद्यपि यह व्यक्ति इसे ऊपरी तौर पर प्रदर्शित नहीं कर रहा है, फिर भी उसके हृदय ने पहले से ही सन्देह करना आरम्भ कर दिया है, पहले से ही परमेश्वर का इंकार करना शुरू कर दिया है। इस प्रकार की मनोवृत्ति, एवं इस प्रकार के दृष्टिकोण का सार क्या है? क्या यह विश्वासघात नहीं है? इसके पहले कि उनका सामना किसी मामले से होता है, तू नहीं देख सकता है कि इस व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है—ऐसा प्रतीत होता है कि वे परमेश्वर से संघर्ष नहीं करते हैं, मानो वे परमेश्वर को एक शत्रु के रूप में नहीं मानते हैं। फिर भी, जैसे ही उनका सामना इसके साथ होता है, वे तुरन्त शैतान के साथ खड़े हो जाते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। यह क्या बताता है? यह बताता है कि मनुष्य एवं परमेश्वर विरोधी हैं! ऐसा नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य को अपने शत्रु के रूप में मानता है, परन्तु मनुष्य का सार ही अपने आपमें परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है। इसकी परवाह किए बगैर कि किसी व्यक्ति ने कितने लम्बे समय से परमेश्वर का अनुसरण किया है, वे कितनी कीमत चुकाते हैं; इसकी परवाह किए बगैर कि कोई व्यक्ति किस प्रकार परमेश्वर की स्तुति करता है, किस प्रकार वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने से स्वयं को रोकते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए अपने आपको उकसाते भी हैं, फिर भी वे कभी भी परमेश्वर को परमेश्वर के रूप में मान नहीं सकते हैं। क्या इसे मनुष्य के सार के द्वारा निर्धारित नहीं किया जाता है? यदि तू उससे परमेश्वर के रूप में व्यवहार करता है, तू सचमुच में विश्वास करता है कि वह परमेश्वर है, तो क्या तेरे पास अब भी उसके प्रति कोई सन्देह है? क्या अब भी तेरे हृदय में उसके सम्बन्ध में कोई प्रश्न चिन्ह हो सकता है? नहीं हो सकता है। इस संसार की प्रवृत्तियां (चलन) बहुत ही बुरी हैं, यह मनुष्य जाति बहुत ही बुरी है—ऐसा कैसे है कि तेरे पास उसके विषय में कोई धारणाएं नहीं हैं? तू स्वयं ही बहुत दुष्ट हैं—ऐसा कैसे है कि तेरे पास उसके विषय में कोई धारणा नहीं है? फिर भी थोड़ी सी अफवाहें एवं कुछ निन्दा परमेश्वर के बारे में इतनी बड़ी बड़ी धारणाओं को उत्पन्न कर सकती हैं, इतने सारे विचारों को उत्पन्न कर सकते हैं, जो दर्शाते है कि तेरी कद-काठी कितनी अपरिपक्व है! बस थोड़े से मच्छरों की "भनभनाहट," और कुछ घिनौनी मक्खियां, बस इतना ही काफी है तुझे धोखा देने के लिए? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या तू जानता है कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति के विषय में क्या सोचता है? परमेश्वर इन लोगों से किस प्रकार व्यवहार करता है इस सम्बन्ध में उसकी मनोवृत्ति वास्तव में बिलकुल स्पष्ट है। यह केवल इतना है कि इन लोगों के प्रति परमेश्वर का बर्ताव ऐसा है कि वह उन पर जानबूझकर कोई ध्यान नहीं देता है—उसकी मनोवृत्ति यह है कि वह उन पर कोई ध्यान नहीं देता है, और इन अज्ञानी लोगों के साथ गंभीर नहीं होता है। ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने हृदय में उसने ऐसे लोगों को प्राप्त करने की कभी योजना नहीं बनाई है जिन्होंने बिलकुल अन्त तक उसके प्रतिकूल होने की शपथ खाई है, और जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के अनुरूप होने के मार्ग की खोज करने की योजना नहीं बनाई है। कदाचित् ये वचन जिन्हें मैं ने कहा है कुछ लोगों को चोट पहुंचाते हैं। अच्छा, क्या तुम लोग मुझे हमेशा अनुमति देने के लिए तैयार हो कि मैं तुम सब को इस तरह से चोट पहुंचाऊं? इसकी परवाह किए बगैर कि तुम लोग तैयार हो या नहीं, जो कुछ भी मैं कहता हूँ वह सच है! यदि मैं हमेशा इसी तरह से तुम सब को चोट पहुंचाऊं, हमेशा तुम लोगों के दागों को उजागर करूं, तो क्या यह तुम सब के हृदय में परमेश्वर की उत्कृष्ट तस्वीर को प्रभावित करेगा? (यह नहीं करेगा।) मैं सहमत हूँ कि यह प्रभावित नहीं करेगा। क्योंकि तुम लोगों के हृदय में कोई ईश्वर ही नहीं है। वह उत्कृष्ट परमेश्वर जो तुम सब के हृदय में निवास करता है, वह ईश्वर जिसका तुम लोग दृढ़ता से समर्थन करते हो और बचाते हो, वह परमेश्वर ही नहीं है। इसके बजाय यह मनुष्य की कल्पना की मनगढ़ंत बातें हैं; इसका अस्तित्व ही नहीं है। अतः यह और भी बेहतर है कि मैं इस पहेली के उत्तर का खुलासा करूं। क्या यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है? वास्तविक परमेश्वर मनुष्य की कल्पना नहीं है। मुझे आशा है कि तुम लोग इस वास्तविकता का सामना कर सकते हो, और यह परमेश्वर के विषय में तुम सब के ज्ञान में सहायता करेगा।

ऐसे लोग जिन्हें परमेश्वर के द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है

कुछ लोग हैं जिनके विश्वास को परमेश्वर के हृदय में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं पहचानता है कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता है। क्योंकि ये लोग, इसकी परवाह किए बगैर कि उन्होंने कितने वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण किया है, उनकी सोच एवं उनके विचार कभी नहीं बदले हैं। वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धान्तों और कार्यों को अंजाम देने के तरीके के मुताबिक चलते हैं, और ज़िन्दा बचे रहने के नियम एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में ग्रहण नहीं किया था, कभी विश्वास नहीं किया था कि परमेश्वर का वचन सत्य है, परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कभी इरादा नहीं किया था, और परमेश्वर को कभी अपने परमेश्वर के रूप में नहीं पहचाना था। वे परमेश्वर में विश्वास करने को किसी किस्म के शौकिया पसन्दीदा चीज़ के रूप में मानते हैं, और परमेश्वर से महज एक आत्मिक सहारे के रूप में व्यवहार करते हैं, अतः वे नहीं सोचते हैं कि यह इस लायक है कि इसके लिए कोशिश की जाए और परमेश्वर के स्वभाव या परमेश्वर के सार को समझा जाए। तू कह सकता है कि वह सब जो सत्य से सम्बन्धित होता है उसका इन लोगों के साथ कोई लेना देना नहीं है। उनमें कोई रूचि नहीं है, और वे प्रत्युत्तर देने की परेशानी नहीं उठा सकते हैं। यह इसलिए है क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है: परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, और उसका अस्तित्व नहीं है। वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; यह अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे बस शब्दों में परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कोई वास्तविक कदम नहीं उठाते हैं। साथ ही वे व्यावहारिक रूप से भी कुछ नहीं करते हैं, और सोचते हैं कि वे बहुत चतुर हैं। परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है। कुछ लोग पूछते हैं: "क्या अविश्वासी लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ सकते हैं? क्या वे अपने कर्तव्य को निभा सकते हैं? क्या वे इन शब्दों को कह सकते हैं: 'मैं परमेश्वर के लिए जीऊंगा'?" जो कुछ मनुष्य अकसर देखता है वे लोगों के ऊपरी प्रदर्शन होते हैं, और उनका सार नहीं। फिर भी परमेश्वर इन ऊपरी प्रदर्शनों को नहीं देखता है; वह केवल उनके भीतरी सार को देखता है। इस प्रकार, परमेश्वर के पास इन लोगों के प्रति इस प्रकार की मनोवृत्ति है, और इस प्रकार की परिभाषा है। जो कुछ ये लोग कहते हैं उसके लिहाज से: "परमेश्वर ऐसा क्यों करता है? परमेश्वर वैसा क्यों करता है? मैं इसे समझ नहीं सकता हूँ; मैं उसे समझ नहीं सकता हूँ; यह मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है; तुझे इसे मुझे समझाना होगा;...।" मेरा उत्तर है: क्या तुझे यह मामला समझाना आवश्यक है? क्या इस मामले का तुझसे कुछ लेना देना है? तू क्या सोचता है कि तू कौन है? तू कहाँ से आया है? क्या तू परमेश्वर के लिए इन संकेतों को देने के योग्य है? क्या तू उसमें विश्वास करता है? क्या वह तेरे विश्वास को स्वीकार करता है? चूँकि तेरे विश्वास का परमेश्वर से कोई लेना देना नहीं है, उसके कार्य का तुझ से क्या सम्बन्ध है? तू नहीं जानता है कि परमेश्वर के हृदय में तू कहाँ है, फिर भी तू परमेश्वर से संवाद करने के योग्य है?

चेतावनी के शब्द

क्या तुम लोग इन टिप्पणियों को सुनने के बाद असहज नहीं हो? यद्यपि हो सकता है कि तुम सब इन वचनों को सुनने के लिए तैयार नहीं हो, या उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो, फिर भी वे सब तथ्य हैं। क्योंकि कार्य का यह चरण परमेश्वर के कार्य करने के लिए है, यदि तू परमेश्वर के इरादों से सम्बन्धित नहीं हैं, परमेश्वर की मनोवृत्ति से सम्बन्धित नहीं हैं, और परमेश्वर के सार एवं स्वभाव को नहीं समझता है, तो अन्त में तू ऐसा व्यक्ति है जो अवसर को खो देगा। मेरे वचन सुनने में कठोर लगें तो मुझे दोष न दो, और तुम लोगों के उत्साह की हवा निकलने के लिए उन्हें दोष न दो। मैं सच बोलता हूँ; मेरा अभिप्राय तुम सब को निराश करना नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मैं तुम लोगों से क्या मांगता हूँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इसे करने के लिए किस प्रकार तुम सब से अपेक्षा की जाती है, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग सही पथ पर चलते हो, और आशा करता हूँ कि तुम सब परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हो और इस पथ से भटकते नहीं हो। यदि तू परमेश्वर के वचन के अनुसार आगे नहीं बढ़ता है, और उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करता है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता है कि तू परमेश्वर के विरुद्ध बलवा कर रहा है और सही पथ से भटक चुका है। इस प्रकार मुझे लगता है कि कुछ ऐसे मामले हैं जिन्हें मुझे तुम लोगों के लिए स्पष्ट करना होगा, और तुम सब से स्पष्ट रूप से, साफ साफ, और बिना जरा सी भी अनिश्चितता के विश्वास करवाना होगा, और परमेश्वर की मनोवृत्ति, परमेश्वर के इरादों, किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है, और वह किस रीति से मनुष्य के परिणाम को तय करता है उसे स्पष्ट रूप से जानने में तुम लोगों की सहायता करनी होगी। यदि ऐसा दिन आता है जब तू इस मार्ग की शुरुआत करने में असमर्थ होता है, तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, क्योंकि इन वचनों को पहले ही तुम सभी को बिलकुल साफ साफ बता दिया गया है। जहाँ तक यह बात है कि तू अपने स्वयं के परिणाम से किस प्रकार व्यवहार करता है—यह मामला पूरी तरह से तेरे ऊपर है। विभिन्न प्रकार के लोगों के परिणामों के सम्बन्ध में परमेश्वर के पास विभिन्न मनोवृत्तियां है। उसके पास मनुष्य को मापने के लिए अपने स्वयं के तरीके हैं, और अपेक्षाओं का अपना स्वयं का मानक है। लोगों के आंकलन का उसका मानक ऐसा है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए निष्पक्ष है—उसके विषय में कोई सन्देह नहीं है! अतः कुछ लोगों का भय अनावश्यक है। क्या अब तुम लोगों को राहत मिली है? आज के लिए इतना ही। अलविदा!

29 अप्रैल, 2014

मूल आयतें बी. एस. आई. हिन्दी बाईबिल संस्करण से ली गई हैं।

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