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परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें

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परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें

सबसे पहले, आइए हम एक भजन गाएँ: राज्य का गीत (I) राज्य दुनिया पर उतर गया है।

संगत: लोग परमेश्वर की जय-जयकार करते हैं, लोग परमेश्वर की स्तुति करते हैं;

सभी अपने मुख से एकमात्र सच्चे परमेश्वर का नाम लेते हैं।

राज्य जगत में अवतरित होता है।

I. लोग परमेश्वर की जय-जयकार करते हैं, लोग परमेश्वर की स्तुति करते हैं; सभी अपने मुख से एकमात्र सच्चे परमेश्वर का नाम लेते हैं, सभी लोगों की दृष्टि परमेश्वर के कर्मों को देखने के लिए उठती है। राज्य जगत में अवतरित होता है, परमेश्वर का मानव समृद्ध और उदार है। (समृद्ध और उदार) इसका उत्सव कौन न मनाएगा? (इसका उत्सव कौन न मनाएगा?) कौन है जो इसके लिए आनंदित हो, नृत्य न करेगा? (कौन है जो इसके लिए आनंदित हो, नृत्य न करेगा?) ओह, सिय्योन! (ओह, सिय्योन!) ओह, सिय्योन! (ओह, सिय्योन!) परमेश्वर का जश्न मनाने के लिए अपनी विजयी-पताका उठाओ! जीत का अपना विजय-गीत गाओ और परमेश्वर का पवित्र नाम फैलाओ!

II. पृथ्वी की समस्त वस्तुओ! परमेश्वर को अर्पण करने के लिए स्वयं को शुद्ध करो! आसमान के तारो! अब अपने स्थानों पर लौट जाओ और नभ-मंडल में परमेश्वर की महानता दिखाओ! परमेश्वर पृथ्वी पर लोगों की उन आवाज़ों को सुन रहा हूं, जो अपने गायन में परमेश्वर के लिए असीम प्रेम और श्रद्धा प्रकट कर रही हैं! इस दिन, जबकि सभी चीजों में ऊर्जा का संचार हो रहा है, परमेश्वर पृथ्वी पर अपने कदम रख रहा है। इस पल, फूल खिल रहे हैं, पक्षी गा रहे हैं, हर चीज़ पूरे उल्लास से भरी हुई है! पक्षी गा रहे हैं, हर चीज़ पूरे उल्लास से भरी हुई है! राज्य के अभिनंदन की ध्वनि में, शैतान का राज्य ध्वस्त हो गया है, राज्य-गान के प्रतिध्वनित होते समूह-गान में नष्ट हो गया है। और ये अब फिर कभी सिर नहीं उठाएगा!

III. पृथ्वी पर कौन है जो सिर उठाने और विरोध करने का साहस करे? जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है तो ज्वलन, क्रोध, और तमाम विपदाएं लाता है, और तमाम विपदाएं लाता है। पृथ्वी के सारे राज्य अब परमेश्वर के राज्य हैं! ऊपर आकाश में बादल अस्त-व्यस्त और तरंगित होते हैं; आकाश के नीचे (आकाश के नीचे) आकाश के नीचे (आकाश के नीचे) झीलें और नदियाँ हिलोरे मारती हैं और उनमें मंथन होता है, जिससे मधुर संगीत निकलता है। अपनी मांद में विश्राम करते जीव-जंतु बाहर निकलते हैं और जो लोग उनींदी अवस्था में थे, उन्हें भी परमेश्वर जगा देता है। जिस दिन का सभी लोगों को इंतजार था, आखिरकार आ गया है! वे परमेश्वर को सर्वाधिक सुंदर गीत भेंट करते हैं! परमेश्वर को! परमेश्वर को!

हर बार जब तुम लोग इस भजन को गाते हो तब तुम लोग इसके बारे में क्या सोचते हो? (अत्यधिक रोमांचित; हर्षित; इस बारे में सोचते हो कि राज्य का सौन्दर्य कितना महिमामय है, और मनुष्यजाति तथा परमेश्वर सदैव के लिए जुड़ जाएँगे)। क्या किसी ने उस आकार के बारे में सोचा है जिसे परमेश्वर के साथ रहने के लिए मनुष्य को अवश्य धारण करना चाहिए? तुम लोगों की कल्पनाओं में, किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ जुड़ने और उस महिमामय जीवन का आनन्द लेने के लिए कैसा होना चाहिए जो राज्य के बाद आता है? (उनके पास एक परिवर्तित स्वभाव होना चाहिए)। उनके पास एक परिवर्तित स्वभाव होना चाहिए, परन्तु किस सीमा तक परिवर्तित? इसे बदल दिए जाने के बाद वे किसके समान होंगे? (वे पवित्र बन जाएँगे)। पवित्रता के लिए मानक क्या है? (उनके सभी विचार और सोच मसीह के अनुकूल होते हैं)। ऐसी अनुकूलता कैसे प्रदर्शित होती है? (वे परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते हैं, परमेश्वर से विश्वासघात नहीं करते हैं, बल्कि परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता अर्पित करते हैं, और अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानते हैं)। तुम लोगों के कुछ उत्तर सही रास्ते पर हैं। तुम सभी लोग अपने हृदयों को खोलो, और जो कुछ तुम लोगों का हृदय कह रहा है उसे साझा करो। (जो लोग राज्य में परमेश्वर के साथ रहते हैं वे सत्य का अनुसरण करके और किसी व्यक्ति, घटना एवं वस्तु के द्वारा रोके गए बिना अपने कर्तव्य को कर सकते हैं, और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक कर सकते हैं। और अंधकार के प्रभाव से पूरी तरह अलग होना, अपने हृदयों को परमेश्वर के साथ संरेखित करना, और परमेश्वर से डरना एवं बुराई से दूर रहना संभव हो जाता है)। (चीज़ों की ओर देखने के हमारे दृष्टिकोण को परमेश्वर के साथ संरेखित किया जा सकता है, और हम अंधकार के प्रभाव से अलग हो सकते हैं। शैतान के द्वारा हमारा शोषण न किया जाना, किसी भी भ्रष्ट स्वभाव को दूर करना, और परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता प्राप्त करना, निम्नतम मानक है। हम मानते हैं कि अंधकार के प्रभाव से अलग होना मुख्य बिन्दु है। यदि कोई अंधकार के प्रभाव से अलग नहीं हो सकता है, शैतान के बन्धनों को तोड़ कर आज़ाद नहीं हो सकता है, तो उसने परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त नहीं किया है)। (परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने का मानक है मनुष्य का परमेश्वर के साथ हृदय एवं मन से एक होना। मनुष्य परमेश्वर का अब और कोई प्रतिरोध नहीं करता है; वह स्वयं को जान सकता है, सत्य को अभ्यास में ला सकता है, परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है, परमेश्वर से प्रेम कर सकता है, और परमेश्वर के साथ संरेखित हो सकता है। किसी व्यक्ति को यही सब करने की आवश्यकता है)।

लोगों के हृदय में परिणाम का बोझ

ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के हृदयों में उस मार्ग के बारे में कुछ मिल गया है जिसमें तुम लोगों को चलना चाहिए और तुम लोगों ने इसकी एक अच्छी पकड़ और समझ विकसित कर ली है। किन्तु जो कुछ तुम लोगों ने कहा चाहे वह खोखले शब्द हों या वास्तविकता यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम लोग दिन प्रतिदिन के अपने अभ्यास में किस पर ध्यान देते हो। तुम लोगों ने सिद्धान्तों में और सत्य की विषय वस्तु दोनों में वर्षों से सत्य के सभी पहलुओं का बड़ा लाभ उठाया है। यह प्रमाणित करता है कि लोग आजकल सत्य के लिए प्रयास करने पर जोर देते हैं। और परिणामस्वरूप, सत्य के हर पहलू और हर मद ने निश्चित रूप से कुछ लोगों के हृदयों में जड़ें जमा ली हैं। हालाँकि, वह क्या है जिससे मैं सबसे अधिक डरता हूँ? यह कि यद्यपि सत्य के विषयों, और इन सिद्धान्तों ने अपनी जड़ें जमा ली हैं, फिर भी वास्तविक विषयवस्तु तुम लोगों के हृदयों में अधिक महत्व नहीं रखती है। जब तुम लोग समस्याओं का सामना करते हो, तुम्हारा परीक्षणों से सामना होता है, विकल्पों से सामना होता है—तब तुम लोग इन सच्चाईयों की वास्तविकता का अच्छा उपयोग कर पाओगे? क्या वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के बाद कठिनाईयों से होकर गुज़रने और तुम्हारी परीक्षाओं से उबरने में तुम लोगों की सहायता करेंगी? क्या तुम लोग अपनी परीक्षाओं में अडिग रहोगे और परमेश्वर के लिए ऊँचे स्वर से और स्पष्ट गवाही दोगे? क्या पहले तुम लोग इन मामलों में रुचि रखते थे? मुझे तुम लोग से पूछने दो: अपने हृदयों में, प्रतिदिन के अपने विचारों और चिंतनों में, वह क्या है जो तुम लोगों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है? क्या तुम लोग कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचे हो? तुम लोगों को क्या लगता है कि सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह सत्य को अभ्यास में लाना है"; कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को पढ़ना है"; कुछ लोग कहते हैं "निश्चित रूप से, यह स्वयं को परमेश्वर के सामने रखना है और प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना करना है" और तब ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं "निश्चित रूप से यह हर दिन अपने कर्तव्य को उचित प्रकार से करना है"; फिर भी कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि वे सदैव इस बारे में सोचते रहते हैं कि परमेश्वर को किस प्रकार से संतुष्ट किया जाए, कैसे सभी चीज़ों में उसका आज्ञापालन किया जाए, और कैसे उसकी इच्छा के सामंजस्य में कार्यकलाप किया जाए। क्या यह ऐसा ही है? क्या यह बस इतना ही है? उदाहरण के लिए, कुछ लोग हैं जो कहते हैं: "मैं केवल परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहता हूँ, किन्तु जब कुछ घटित होता है तब मैं उसकी आज्ञा नहीं मान सकता हूँ।" कुछ लोग कहते हैं: "मैं केवल परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ। भले ही मैं उसे बस एक बार ही संतुष्ट कर सकूँ, तो यह अच्छा होगा, किन्तु मैं उसे कभी संतुष्ट नहीं कर सकता हूँ।" और कुछ लोग कहते हैं, "मैं केवल परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहता हूँ। परीक्षण के समयों में, बिना किसी शिकायत या निवेदनों के, उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं का पालन करते हुए, मैं केवल उसके आयोजनों के अधीन होना चाहता हूँ। फिर भी लगभग हर बार मैं आज्ञाकारी होने में असफल हो जाता हूँ।" कुछ अन्य लोग कहते हैं "जब मेरा निर्णयों से सामना होता है, तब मैं कभी सत्य को अभ्यास में लाने का चुनाव नहीं कर सकता हूँ। मैं हमेशा देह को संतुष्ट करना चाहता हूँ, हमेशा अपनी व्यक्तिगत स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट करना चाहता हूँ।" इसका क्या कारण है? परमेश्वर के परीक्षणों के आने से पहले, क्या तुम लोगों ने स्वयं को कई बार चुनौती दी है, और स्वयं को कई बार आजमाया और जाँचा है? विचार करो कि क्या तुम लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञा पालन कर सकते हो, वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो, और परमेश्वर से विश्वासघात नही करना सुनिश्चित कर सकते हो। विचार करो कि क्या तुम लोग स्वयं को संतुष्ट नहीं कर सकते हो, अपनी स्वार्थी अभिलाषाओं को संतुष्ट नहीं कर सकते हो, अपनी व्यक्तिगत पसंदों से रहित, बल्कि केवल परमेश्वर को ही संतुष्ट करते हो। क्या कोई ऐसा है? वास्तव में, केवल एक ही तथ्य है जिसे बिलकुल तुम लोगों की आँखों के सामने रख दिया गया है। यही वह है जिसमें तुम लोगों में से हर एक अत्यधिक रूचि रखता है, जिसे तुम लोग सबसे अधिक जानना चाहते हो, और यह प्रत्येक व्यक्ति के परिणाम और नियति का मामला है। तुम लोग शायद इसका अनुभव न करो, परन्तु यह कुछ ऐसा है जिसे कोई इनकार नहीं कर सकता है। मैं जानता हूँ कि कुछ लोग हैं जिन्होंने, जब मनुष्य के परिणाम की सच्चाई की, मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की प्रतिज्ञा की, और परमेश्वर मनुष्य को किस प्रकार की मंज़िल के पहुँचाने का इरादा करता है इसकी बात आती है, तो पहले से ही इन मामलों पर कई बार परमेश्वर के वचनों का अध्ययन किया हुआ है। फिर ऐसे लोग हैं जो बारम्बार इसकी खोज कर रहे होते हैं और अपने मन में इस पर विचार कर रहे होते हैं, और उन्हें तब भी कोई परिणाम नहीं मिलता है, या शायद किसी अस्पष्ट निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। अंत में वे अभी भी इस बारे में निश्चित नहीं होते हैं कि किस प्रकार का परिणाम उनका इंतज़ार करता है। सत्य के संवाद को स्वीकार करते समय, कलीसिया के जीवन को स्वीकार करते समय, अपने कर्तव्य को करते समय, अधिकांश लोग हमेशा निम्नलिखित प्रश्नों के निश्चित उत्तर जानना चाहते हैं: मेरा परिणाम क्या होगा? क्या मैं मार्ग पर बिल्कुल इसके अंत तक चल सकता हूँ? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? कुछ लोग यहाँ तक भी चिंता करते हैं: मैंने अतीत में कुछ चीज़ों को किया है, मैंने कुछ बातों को कहा है, मैं परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी रहा हूँ, मैंने कुछ ऐसी चीज़ें की हैं जिन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है, ऐसे कुछ मामले थे जहाँ मैंने परमेश्वर को संतुष्ट नहीं किया था, परमेश्वर के हृदय को ठेस पहुँचायी थी, परमेश्वर को मुझ से निराश करवाया था, परमेश्वर को मुझ से घृणा और नफरत करवाई थी, इसलिए शायद मेरा परिणाम अज्ञात है। यह कहना ठीक है कि अधिकतर लोग अपने स्वयं के परिणाम के बारे में असहज महसूस करते हैं। कोई यह कहने का साहस नहीं करता है: "मुझे सौ प्रतिशत निश्चितता के साथ महसूस होता है कि मैं एक उत्तरजीवी होऊँगा; मैं सौ प्रतिशत निश्चित हूँ कि मैं परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर सकता हूँ; मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो परमेश्वर के हृदय के अनुरूप है; मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसकी परमेश्वर प्रशंसा करता है।" कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करना विशेष रूप से कठिन है, और यह कि सत्य को अभ्यास में लाना सबसे कठिन बात है। परिणामस्वरूप, ये लोग सोचते हैं कि वे सहायता से परे हैं, और वे एक अच्छे परिणाम के बारे में अपनी आशाओं को जगाने का साहस नहीं करते हैं। या हो सकता है कि वे मानते हों कि वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट नहीं कर सकते हैं, और एक उत्तरजीवी नहीं बन सकते हैं, और इस वजह से कहेंगे कि उनके पास कोई परिणाम नहीं है, और वे एक अच्छी मंज़िल को हासिल नहीं कर सकते हैं। इसकी परवाह किए बिना कि लोग कितनी सटीकता से सोचते हैं, हर कोई अपने परिणाम के बारे में कई बार आश्चर्य कर रहा होता है। उनके भविष्य के प्रश्नों पर, या उन प्रश्नों पर कि जब परमेश्वर अपने कार्य को समाप्त करेगा तो उन्हें क्या मिलेगा, ये लोग सदैव गुणा भाग करते रहते हैं, और सदैव योजना बनाते रहते हैं। कुछ लोग दोगुनी कीमत चुकाते हैं; कुछ लोग अपने परिवारों और अपनी नौकरियों को छोड़ देते हैं; कुछ लोग विवाह होने पर त्याग देते हैं; कुछ लोग परमेश्वर के लिए व्यय करने के लिए त्याग देते हैं; कुछ लोग अपना कर्तव्य करने के लिए घरों को छोड़ देते हैं; कुछ लोग कठिनाई का चुनाव करते हैं, और अत्यधिक कड़वे और थका देनेवाले काम को हाथ में लेना शुरू करते हैं; कुछ लोग धन समर्पित करने, अपना सर्वस्व समर्पित करने का चुनाव करते हैं; फिर भी कुछ लोग सत्य की, और परमेश्वर को जानने की खोज करते हैं। तुम लोग चाहे अभ्यास करने का चुनाव कैसे भी क्यों न करो, क्या वह तरीका जिससे तुम लोग ऐसा करते हो महत्वपूर्ण है? (महत्वपूर्ण नहीं है)। तो हम कैसे समझाएँ कि यह महत्वपूर्ण नहीं है? यदि तरीका महत्वपूर्ण नहीं है, तो क्या महत्वपूर्ण है? (बाहरी अच्छा व्यवहार सत्य को अभ्यास में लाने का द्योतक नहीं है)। (जो हर कोई सोचता है वह महत्वपूर्ण नहीं है। यहाँ मुख्य बात यह है कि हमने सत्य को अभ्यास में लाया है या नहीं, और हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं या नहीं)। (ईसा-विरोधियों और झूठे अगुवाओं का पतन यह समझने में हमारी सहायता करता है कि बाहरी व्यवहार अत्यंत महत्वपूर्ण बात नहीं है। बाहरी तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने बहुत कुछ त्याग दिया है, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं, परन्तु विश्लेषण करने पर हम देख सकते हैं कि उनके पास मात्र ऐसा हृदय ही नहीं है जो परमेश्वर का भय मानता है; वे हर प्रकार से उसका विरोध करते हैं। नाज़ुक समयों में वे हमेशा शैतान के साथ खड़े रहे हैं, और परमेश्वर के कार्य में हस्तक्षेप कर रहे होते हैं। इस प्रकार, यहाँ मुख्य सोच-विचार ये हैं कि जब समय आता है तो हम किस ओर खड़े होते हैं, और हमारे दृष्टिकोण क्या हैं)। तुम सभी लोग अच्छा बालते हो, और ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोगों के पास पहले से ही सत्य को अभ्यास में लाने की, परमेश्वर के इरादों की, और जो कुछ परमेश्वर मनुष्य से माँग करता है उसकी एक बुनियादी समझ और मानक है। यह कि तुम लोग इस प्रकार से बोल पाते हो यह अत्यंत मर्मस्पर्शी है। यद्यपि यहाँ-वहाँ कुछ अनुचित शब्द होते हैं, फिर भी तुम लोगों के कथन पहले से ही ऐसी व्याख्या के निकट पहुँच रहे हैं जो सत्य के योग्य है। इससे प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने लोगों, घटनाओं, और अपने चारों ओर की वस्तुओं, और अपने समस्त परिवेश जिसे परमेश्वर ने व्यवस्थित किया है, और हर एक चीज़ जिसे तुम लोग देख सकते हो उनके बारे में अपनी स्वयं की वास्तविक समझ को पहले ही विकसित कर लिया है। ये समझ सत्य के निकट आ रही हैं। यद्यपि जो कुछ तुम लोगों ने कहा वह पूरी तरह से विस्तृत नहीं है, और कुछ शब्द बहुत उचित नहीं हैं, फिर भी तुम लोगों की समझ पहले से ही सत्य की वास्तविकता के निकट पहुँच रही है। तुम लोगों को इस तरह बोलते हुए सुनना मुझे अच्छा महसूस करवाता है।

लोगों के विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं

कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिनाईयों को सह सकते हैं; वे क़ीमत चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा होता है; वे बहुत आदरणीय होते हैं; और उनके पास अन्य लोगों की सराहना होती है। तुम लोग क्या सोचते हो: क्या इस प्रकार के बाहरी आचरण को सत्य को अभ्यास में लाने के रूप में माना जा सकता है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहा है? ऐसा क्यों है कि बार-बार लोग इस प्रकार के व्यक्तियों को देखते हैं और सोचते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, यह सोचते हैं कि वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और यह कि वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्यों कुछ लोग इस प्रकार सोचते हैं? इसके लिए केवल एक ही स्पष्टीकरण है। और वह स्पष्टीकरण क्या है? यह बहुत से लोगों के लिए ऐसा ही है, ऐसे प्रश्न जैसे कि सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और सत्य की यथार्थता का होना वास्तव में क्या है—ये प्रश्न बहुत स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग हैं जिन्हें अक्सर ऐसे लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जो बाहर से आध्यात्मिक प्रतीत होते हैं, कुलीन प्रतीत होते हैं, उत्कृष्ट छवि वाले प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो पत्रों एवं सिद्धान्तों के बारे में बोल सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो उनके प्रशंसकों ने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धान्तों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं इसे कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है। और उन्होंने कभी भी अच्छी तरह से नहीं देखा है कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानते हैं और दुष्टता से दूर रहते हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना है। इसके बजाय, परिचित होने के पहले कदम से ही, थोड़ा-थोड़ा करके, वे इन लोगों की तारीफ करने, और इन लोगों का आदर करने लगते हैं, और अन्त में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं कि वे अपने परिवारों एवं नौकरियों को छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर वे क़ीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और ऐसे लोग हैं जो वास्तव में एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल को प्राप्त कर सकते हैं। उनके मन में, ये आदर्श ऐसे लोग हैं जिनकी प्रशंसा परमेश्वर करता है। किस कारण से लोग इस प्रकार का विश्वास रखें? इस मुद्दे का सार क्या है? यह कौन से परिणामों की ओर ले जा सकता है? आइए हम सबसे पहले इसके सार के मामले में चर्चा करें।

लोगों के दृष्टिकोणों, लोगों के अभ्यासों, लोग अभ्यास करने के लिए किन सिद्धान्तों को चुनते हैं, और हर कोई सामान्य तौर पर किस चीज़ पर जोर देता है के ये मुद्दे, अनिवार्य रूप से इन सब का मनुष्यजाति से परमेश्वर की माँगों से कोई लेना देना नहीं है। इस बात की परवाह किए बिना कि लोग उथले मसलों पर या गंभीर मसलों पर, पत्रों एवं सिद्धान्तों पर या वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं या नहीं, लोग उसके मुताबिक नहीं चलते हैं जिस के मुताबिक उन्हें अधिकांशतः चलना चाहिए, और वे उसे नहीं जानते हैं जो उन्हें अधिकांशतः जानना चाहिए। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिल्कुल भी पसन्द नहीं करते हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धान्तों को खोजने और उनका अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिन्हें वे समझते हैं, जिन्हें वे जानते हैं, उसे अच्छा अभ्यास और अच्छा व्यवहार सारांशित करते हैं। तब यह सारांश, खोज करने के लिए उनका स्वयं का लक्ष्य बन जाता है, अभ्यास किए जाने वाला सत्य बन जाता है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ऐसे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में लाने के स्थान पर अच्छे मानवीय व्यवहार को उपयोग में लाते हैं, जो परमेश्वर का अनुग्रह पाने हेतु खुशामद करने की लोगों की अभिलाषाओं को भी संतुष्ट करता है। यह सत्य के साथ संघर्ष करने के लिए, और परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा विवाद करने के लिए पूँजी देता है। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और अपने हृदय के आदर्शों को परमेश्वर के स्थान में रख देते हैं। केवल एक ही मूल कारण है जो लोगों से ऐसे अज्ञानता भरे कार्य, अज्ञानता भरे दृष्टिकोण, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास करवाता है, और आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा। कारण यह है कि यद्यपि हो सकता है कि लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर की इच्छा को वास्तव में नहीं समझते हैं। यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, यह समझता है कि परमेश्वर क्या पसन्द करता है, किस चीज़ से परमेश्वर घृणा करता है, परमेश्वर क्या चाहता है, किस चीज़ को परमेश्वर अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर नापसन्द करता है, मनुष्य पर अपनी माँगों के प्रति परमेश्वर किस प्रकार का मानक लागू करता है, मनुष्य को सिद्ध करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति को अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति के पास अपना व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति उनका आदर्श बन सकता है? यदि कोई परमेश्वर की इच्छा को समझता है, तो उनका दृष्टिकोण उसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्क-संगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करते है, न ही वे, सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धान्तों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

उस मानक के सम्बन्ध में अनेक राय हैं जिससे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम स्थापित करता है

आइए हम इस विषय पर वापस आएँ और परिणाम के मामले पर चर्चा करना जारी रखें।

चूँकि प्रत्येक व्यक्ति अपने परिणाम को लेकर चिन्तित होता है, इसलिए क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर किस प्रकार उस परिणाम को निर्धारित करता है? परमेश्वर किस तरीके से किसी व्यक्ति का परिणाम स्थापित करता है? और किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? और जब किसी मनुष्य का परिणाम अभी तक निर्धारित नहीं हुआ है, तो परमेश्वर इस परिणाम को प्रकट करने के लिए क्या करता है? क्या कोई इसे जानता है? जैसा मैंने अभी-अभी कहा था, कुछ लोग हैं जिन्होंने पहले ही लम्बे समय तक परमेश्वर के वचन पर खोज की है। ये लोग मनुष्यजाति के परिणाम के बारे में, उन श्रेणियों के बारे में जिसमें इस परिणाम को विभाजित किया जाता है, और उन विभिन्न परिणामों के बारे में जो विभिन्न प्रकार के लोगों का इंतज़ार कर रहे हैं, सुरागों की खोज कर रहे हैं। वे यह भी जानना चाहते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर का वचन मनुष्य के परिणाम को स्थापित करता है, किस प्रकार के मानक का परमेश्वर उपयोग करता है, और किस तरीके से वह मनुष्य के परिणाम को स्थापित करता है। फिर भी अन्त में ये लोग किसी भी चीज़ का पता नहीं लगा पाते हैं। वास्तविक तथ्य में, परमेश्वर के वचन के बीच इस मामले पर बहुमूल्य रूप से थोड़ा सा ही कहा गया है। ऐसा क्यों है? अगर मनुष्य का परिणाम अभी तक प्रकट नहीं किया गया है, तो परमेश्वर किसी को बताना नहीं चाहता है कि अन्त में क्या होने जा रहा है, न ही वह किसी को समय से पहले उसकी नियति के बारे में सूचित करना चाहता है। इसका कारण यह है कि परमेश्वर के ऐसा करने का मनुष्य को कुछ लाभ नहीं होगा। अभी, मैं तुम लोगों को केवल उस तरीके के बारे में जिससे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है, उन सिद्धान्तों के बारे में जिन्हें वह मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने के लिए, और इस परिणाम को प्रदर्शित करने के लिए अपने कार्य में उपयोग में लाता है, और साथ ही उस मानक के बारे में भी बताना चाहता हूँ जिसे वह यह स्थापित करने के लिए उपयोग में लाता है कि कोई व्यक्ति जीवित बच सकता है या नहीं। क्या यह वह बात नहीं है जिसके बारे में तुम लोग सर्वाधिक चिन्तित हो? तो फिर, लोग किस प्रकार उस मार्ग की कल्पना करते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है? तुम लोगों ने इस मामले पर अभी-अभी थोड़ा सा कहा था। तुम लोगों में से कुछ ने कहा था कि यह उनके कर्तव्य को निष्ठापूर्वक करने, परमेश्वर के लिए व्यय करने का एक प्रश्न है; कुछ ने कहा था कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन करना और परमेश्वर को संतुष्ट करना है; कुछ लोगों ने कहा था कि यह परमेश्वर की करुणा में रहना है; और कुछ लोगों ने कहा था कि यह कम महत्वपूर्ण जीवन जीना है।... जब तुम लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाते हो, जब तुम लोग अपनी कल्पना के सिद्धान्तों को अभ्यास में लाते हो, तब क्या तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर क्या सोचता है? क्या तुम लोगों ने विचार किया है कि इस प्रकार से आगे बढ़ना परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करता है या नहीं? क्या यह परमेश्वर के मानक को पूरा करता है या नहीं? क्या यह परमेश्वर की माँग को पूरा करता है या नहीं? मेरा मानना है कि अधिकांश लोग इस पर वास्तव में विचार नहीं करते हैं। वे बस परमेश्वर के वचन के एक भाग को, या धर्मोपदेशों के एक भाग को, या उन कुछ आध्यात्मिक मनुष्यों के मानकों को यंत्रवत् लागू करते हैं जिनका वे आदर करते हैं, और इसे या उसे करने के लिए स्वयं को बाध्य करते हैं। वे मानते हैं कि यही सही तरीका है, अतः वे उसके मुताबिक चलते रहते हैं, उसे करते रहते हैं, चाहे अन्त में कुछ भी क्यों न हो। कुछ लोग सोचते हैं: "मैंने कुछेक वर्षों तक विश्वास किया है; मैंने सदैव इस मार्ग का अभ्यास किया है; मैं ऐसा महसूस करता हूँ कि मैंने वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट किया है; मैं ऐसा भी महसूस करता हूँ कि मैंने इससे बहुत सा प्राप्त किया है। क्योंकि इस समयावधि के दौरान मैं बहुत सी सच्चाईयों को समझने लगा हूँ, और बहुत सी बातों को समझने लगा हूँ जिन्हें मैं पहले नहीं समझता था—विशेष रूप में, मेरे कई विचार और दृष्टिकोण बदल चुके हैं, मेरे जीवन के मूल्य काफी बदल चुके हैं, और मुझे इस संसार की अच्छी खासी समझ हो गई है।" ऐसे लोग मानते हैं कि यह एक उपज है, और यह मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य का अंतिम परिणाम है। तुम लोगों की राय में, इन मानकों और तुम लोगों के सभी अभ्यासों को एक साथ लेकर, क्या तुम लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहे हो? कुछ लोग पूर्ण निश्चयपूर्वक कहेंगे: "निस्संदेह! हम परमेश्वर के वचन के अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; जो कुछ उस भाई ने उपदेश दिया था और संगति की थी हम उसके अनुसार अभ्यास कर रहे हैं; हम हमेशा अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, हमेशा परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं, और हमने परमेश्वर को कभी नहीं छोड़ा है। इसलिए हम पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि हम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं। चाहे हम परमेश्वर के इरादों को कितना ही क्यों न समझते हों, चाहे हम परमेश्वर के वचन को कितना ही क्यों न समझते हों, हम हमेशा परमेश्वर के अनुकूल होने के मार्ग की खोज करते रहे हैं। यदि हम सही तरीके से कार्य करते हैं, और सही तरीके से अभ्यास करते हैं, तो परिणाम सही होगा।" इस दृष्टिकोण के बारे में तुम लोग क्या सोचते हो? क्या यह सही है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हों जो यह कहते हों: "मैंने इन चीज़ों के बारे में पहले कभी नहीं सोचा है। मैं केवल इतना सोचता हूँ कि यदि मैं अपने कर्तव्य को करता रहूँ और परमेश्वर के वचन की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता रहूँ, तो मैं जीवित बचा रह सकता हूँ। मैंने कभी इस प्रश्न पर विचार नहीं किया है कि मैं परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता हूँ या नहीं, मैंने कभी यह विचार नहीं किया है कि मैं उसके द्वारा अपेक्षित मानक को प्राप्त कर रहा हूँ या नहीं। चूँकि परमेश्वर ने मुझे कभी नहीं बताया है, और न ही मुझे कोई स्पष्ट निर्देश प्रदान किए हैं, इसलिए मैं मानता हूँ कि जब तक मैं करता रहता हूँ, परमेश्वर संतुष्ट रहेगा और मुझसे उसकी कोई अतिरिक्त माँग नहीं होनी चाहिए।" क्या ये विश्वास सही हैं? जहाँ तक मेरी बात है, अभ्यास करने का यह तरीका, सोचने का यह तरीका, और ये दृष्टिकोण—वे सब अपने साथ कल्पनाओं और कुछ अंधेपन को लेकर आते हैं। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ऐसे हों जो थोड़ी निराशा महसूस करते हों: "अंधापन? यदि यह 'अंधापन' है, तो हमारे उद्धार की आशा, हमारे जीवित बचे रहने की आशा बहुत कम, और बहुत अनिश्चित है, है कि नहीं? क्या तुम्हारा इसे इस तरह से कहना हमारे ऊपर ठण्डा पानी डालने के समान नहीं है? "चाहे तुम लोग कुछ भी क्यों न मानते हो, जो बातें मैं कहता और करता हूँ उनका आशय तुम लोगों को यह महसूस करवाना नहीं है कि मानो कि तुम लोगों के ऊपर ठण्डा पानी डाला जा रहा है। इसके बजाय, यह परमेश्वर के इरादों के बारे में तुम लोग की समझ को बेहतर करने, और परमेश्वर क्या सोच रहा है, परमेश्वर क्या निष्पादित करना चाहता है, परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को पसन्द करता है, परमेश्वर किस से घृणा करता है, परमेश्वर किसे तुच्छ समझता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर पाना चाहता है, और किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर ठुकराता है, इस पर तुम लोगों की समझ को बेहतर करने के आशय से है। यह तुम लोगों के मन को स्पष्टता देने, तुम लोगों को स्पष्ट रूप से यह जानने में सहायता करने के आशय से है कि तुम लोगों में से हर एक व्यक्ति के कार्य और विचार उस मानक से कितनी दूर भटक गए हैं जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के द्वारा की गई है। क्या इन विषयों पर विचार विमर्श करना आवश्यक है? क्योंकि मैं जानता हूँ तुम लोगों ने लम्बे समय तक विश्वास किया है, और बहुत अधिक उपदेश सुना है, परन्तु ये निश्चित रूप से ऐसी चीज़ें हैं जिनका अत्यंत अभाव है। तुम लोगों ने अपनी नोटबुक में हर सत्य को लिख लिया है, तुम लोगों ने उसे भी दर्ज कर लिया है जिसे तुम लोग व्यक्तिगत रूप से अपने मन में और अपने हृदय में महत्वपूर्ण मानते हो। और तुम लोग अभ्यास करते समय परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए इसका उपयोग करने; जब तुम लोगों स्वयं के लिए आवश्यकता होती है तब इसका उपयोग करने, या तुम उन कठिन समयों से होकर गुज़रने के लिए इसका उपयोग करने की योजना बनाते हो जो तुम लोगों की आँखों के सामने होते हैं; या जब तुम लोग अपनी-अपनी ज़िन्दगी जीते हो तब बस इन सच्चाईयों को अपने साथ होने देते हो। किन्तु जहाँ तक मेरी बात है, यदि तुम केवल अभ्यास कर रहे हो, तो तुम कितने सटीक रूप से अभ्यास कर रहे हो यह महत्वपूर्ण नहीं है। तब सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात क्या है? यह ऐसा है कि जब तुम अभ्यास कर रहे होते हो, तब तुम्हारा हृदय पूरी निश्चितता के साथ जानता है कि हर एक कार्य जो तुम कर रहे हो, और हर कर्म, वह है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है; हर कार्य जिसे तुम करते हो, हर चीज़ जो तुम सोचते हो, और तुम्हारे हृदय में जो परिणाम एवं लक्ष्य हैं वे परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करते हैं या नहीं, परमेश्वर की माँगों को पूरा करते हैं या नहीं, और परमेश्वर उन्हें अनुमोदित करता है या नहीं। ये ही महत्वपूर्ण चीज़ें हैं।

परमेश्वर के मार्ग पर चलें: परमेश्वर का भय मानें और दुष्टता से दूर रहें

एक कहावत है जिस पर तुम लोगों को ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि यह कहावत अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मेरे मन में हर दिन अनगिनत बार आती है। ऐसा क्यों है? क्योंकि हर बार जब मेरा किसी से सामना होता है, हर बार जब किसी की कहानी को सुनता हूँ, हर बार जब मैं किसी के अनुभव को या परमेश्वर में विश्वास करने की उनकी गवाही को सुनता हूँ, तो मैं इस बात का अंदाज़ा लगाने के लिए इस कहावत का उपयोग करता हूँ कि यह व्यक्ति उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जिसे परमेश्वर पसंद करता है। तो फिर वह कहावत क्या है? तुम सभी लोग पूरी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हो। जब मैं उस कहावत को प्रकट करूँगा, तो कदाचित् तुम लोग निराश महसूस करोगे क्योंकि ऐसे लोग हैं जो इसके प्रति कई वर्षों से दिखावटी प्रेम दिखाते आ रहे हैं। किन्तु जहाँ तक मेरी बात है, मैंने इसके प्रति कभी भी दिखावटी प्रेम नहीं दिखाया है। यह कहावत मेरे हृदय में बसी हुई है। तो यह कहावत क्या है? यह है "परमेश्वर के मार्ग में चलें: परमेश्वर का भय मानें और दुष्टता से दूर रहें।" क्या यह अत्यंत सरल वाक्यांश नहीं है? हालाँकि यह कहावत सरल हो सकती है, तब भी कोई व्यक्ति जिसके पास असल में इसकी गहरी समझ है वह महसूस करेगा कि इसका बड़ा महत्व है; कि अभ्यास करने के लिए इसका बड़ा मूल्य है; कि सत्य की वास्तविकता के साथ यह जीवन की भाषा है; कि यह उनके लिए प्रयास करने हेतु जीवनपर्यन्त उद्देश्य है जो परमेश्वर को संतुष्ट करने की खोज करते हैं; कि यह किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा अनुसरण करने हेतु जीवनपर्यन्त मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हैं। तो तुम लोग क्या सोचते हो: क्या यह कहावत सही है? क्या इसका इस प्रकार का महत्व है? कदाचित् कुछ लोग हों जो इस कहावत के बारे में सोच रहे हों, इसे समझने का प्रयास कर रहे हों, और कुछ अभी भी ऐसे हों जो इसके बारे में शंकित हों: क्या यह कहावत अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या यह अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या यह इतनी ज़रूरी और जोर देने लायक है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हों जो इस कहावत को अधिक पसन्द नहीं करते हों, क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर के मार्ग को लेना और उसे एक कहावत में सारभूत करना इसका अत्यधिक सरलीकरण है। जो कुछ परमेश्वर ने कहा था वह सब लेना और एक कहावत में उसका संक्षेपण करना—क्या यह परमेश्वर को बहुत कम महत्वहीन बनाना नहीं है? क्या यह ऐसा ही है? ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से अधिकांश इन वचनों के पीछे के गंहन अर्थ को पूरी तरह से नहीं समझते हो। यद्यपि तुम लोगों ने इसे लिख लिया है, फिर भी तुम सब इस कहावत को अपने हृदय में स्थान देने का इरादा नहीं करते हो; तुम लोग बस इसे लिख लेते हो, और अपने खाली समय में इसे फिर से पढ़ते हो और इस पर विचार करते हो। कुछ अन्य लोग हैं जो इस कहावत को याद रखने की भी परवाह नहीं करते हैं, अच्छे उपयोग के लिए इसका अभ्यास करने की तो बात ही छोड़ ही दो। परन्तु मैं इस कहावत पर चर्चा क्यों करता हूँ? तुम लोगों के दृष्टिकोण, या जो तुम लोग क्या सोचोगे इसकी परवाह किए बिना, मुझे इस कहावत पर चर्चा करनी है क्योंकि यह इस बात के अत्यंत प्रासंगिक है कि किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के परिणामों को निर्धारित करता है। इस कहावत के बारे में तुम लोगों की वर्तमान समझ चाहे कुछ भी क्यों न हो, या तुम सब इससे कैसा भी व्यवहार क्यों न करते हो, मैं तब भी तुम लोगों को बताने जा रहा हूँ: यदि कोई व्यक्ति इस कहावत का उचित तराके से अभ्यास कर सकता है और परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मानक को प्राप्त कर सकता है, तो उसे जीवित बचे हुए इंसान के रूप में आश्वस्त किया जाता है, तो उसे किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में आश्वस्त किया जाता है जिसके पास एक अच्छा परिणाम होता है। यदि तुम उस मानक को प्राप्त नहीं कर सकते हो जिसे इस कहावत के द्वारा रखा गया है, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तुम्हारा परिणाम अज्ञात है। इस प्रकार मैं तुम लोगों की स्वयं की मानसिक तैयारी के लिए इस कहावत के बारे में तुम लोगों से कहता हूँ, और जिससे तुम लोग जान लो कि तुम लोगों को मापने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है। जैसे कि मैंने अभी-अभी चर्चा की है, यह कहावत मनुष्य के बारे में परमेश्वर के उद्धार के, और वह किस प्रकार मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करता है उसके पूरी तरह से प्रासंगिक है। यह प्रासंगिकता कहाँ रहती है? तुम लोग वास्तव में जानना चाहोगे, इसलिए आज हम इस बारे में बात करेंगे।

परमेश्वर इस बात का परीक्षण करने के लिए विभिन्न परीक्षाओं का उपयोग करता है कि लोग परमेश्वर का भय मानते और दुष्टता से दूर रहते हैं या नहीं

हर युग में, जब परमेश्वर संसार में कार्य करता है तब वह मनुष्य को कुछ वचन प्रदान करता है, मनुष्य को कुछ सच्चाईयाँ बताता है। ये सच्चाईयाँ ऐसे मार्ग के रूप में कार्य करती हैं जिसके मुताबिक मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जिसमें मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में सक्षम बनाता है, और ऐसा मार्ग जिसे मनुष्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने जीवन में और अपनी जीवन यात्राओं के दौरान उसके मुताबिक चलना चाहिए। यह इन्हीं कारणों से है कि परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य को प्रदान करता है। ये वचन जो परमेश्वर से आते हैं उनके मुताबिक ही मनुष्य को चलना चाहिए, और उनके मुताबिक चलना ही जीवन पाना है। यदि कोई व्यक्ति उनके मुताबिक नहीं चलता है, उन्हें अभ्यास में नहीं लाता है, और अपने जीवन में परमेश्वर के वचनों को नहीं जीता है, तो वह व्यक्ति सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा है। और यदि वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं, तो वे परमेश्वर का भय नहीं मान रहे हैं और दुष्टता से दूर नहीं रह रहे हैं, और न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यदि कोई परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता है, तो वह परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है; इस प्रकार के व्यक्ति के पास कोई परिणाम नहीं होता है। इसलिए तब परमेश्वर के कार्य के दौरान वह किस प्रकार किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करता है? मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परमेश्वर किस पद्धति का उपयोग करता है? कदाचित् इस वक्त इस बारे में तुम लोग बहुत अधिक स्पष्ट नहीं हो, परन्तु जब मैं तुम लोगों को वह प्रक्रिया बताऊँगा तो यह बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत से लोगों ने पहले से ही स्वयं इसका अनुभव कर लिया है।

परमेश्वर के कार्य के दौरान, आरम्भ से लेकर अब तक, परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए—या तुम लोग कह सकते हो, उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए जो उसका अनुसरण करता है—परीक्षाएँ निर्धारित कर रखी हैं और ये परीक्षाएँ भिन्न-भिन्न आकारों में आती हैं। ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने परिवार के द्वारा तिरस्कृत किए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग हैं जिन्होंने विपरीत परिवेश की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग हैं जिन्होंने गिरफ्तार किए जाने और यातनाएँ दिए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; ऐसे लोग हैं जिन्होंने किसी विकल्प का सामना किए जाने की परीक्षा का अनुभव किया है; और ऐसे लोग हैं जिन्होंने धन एवं हैसियत की परीक्षाओं का सामना करने का अनुभव किया है। सामान्य रूप से कहें, तो तुम लोगों में से प्रत्येक ने सभी प्रकार की परीक्षाओं का सामना किया है। परमेश्वर इस प्रकार से कार्य क्यों करता है? परमेश्वर हर किसी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करता है? वह किस प्रकार के परिणाम को देखना चाहता है? जो कुछ मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ यह उसका महत्वपूर्ण बिन्दु है: परमेश्वर देखना चाहता है कि यह व्यक्ति उस प्रकार का है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता को दूर रखता है। इसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा ले रहा होता है, तुमसे किसी परिस्थिति का सामना करवा रहा होता है, तो वह परीक्षा लेना चाहता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है, ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो दुष्टता से दूर रहता है। यदि किसी व्यक्ति का किसी भेंट को सुरक्षित रखने के कर्तव्य से सामना होता है, और वह परमेश्वर की भेंट के सम्पर्क में आता है, तो क्या तुम्हें लगता है कि यह कुछ ऐसी चीज़ है जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने की है? कोई प्रश्न ही नहीं है! जिस किसी भी चीज़ का तुम सामना करते हो वह कुछ ऐसी चीज़ है जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने की है। जब तुम्हारा सामना ऐसे मामले से होगा, तो परमेश्वर गुप्त रूप से तुम्हारा अवलोकन करेगा, तुम्हें देखेगा कि तुम किस प्रकार से चुनाव करते हो, तुम किस प्रकार से अभ्यास करते हो, तुम किसके बारे में सोच रहे हो। अंतिम परिणाम वह है जिससे परमेश्वर सबसे अधिक चिंतित है, चूँकि यह ऐसा परिणाम है जो उसे यह मापने देगा कि इस परीक्षा में तुमने परमेश्वर के मानक को हासिल किया है या नहीं। हालाँकि, जब लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तो वे प्रायः इस बारे में नहीं सोचते है कि उनका सामना इससे, या परमेश्वर के द्वारा माँग किए गए मानक से क्यों हो रहा है। वे इस बारे में नहीं सोचते हैं कि परमेश्वर उनके बारे में क्या देखना चाहता है, वह उनसे क्या प्राप्त करना चाहता है। ऐसे मामले से सामना होने पर, इस प्रकार का व्यक्ति केवल यह सोच रहा होता है: "यह कुछ ऐसा है जिसका मैं सामना करता हूँ; मुझे अवश्य सावधान रहना चाहिए, लापरवाह नहीं! चाहे कुछ भी हो, यह परमेश्वर की भेंट है और मैं इसे छू नहीं सकता हूँ।" ऐसे व्यक्ति विश्वास करते हैं कि वे ऐसी अत्यंत सरल सोच को धारण करके अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर सकते हैं। क्या परमेश्वर इस परीक्षा के परिणाम के द्वारा संतुष्ट होगा? या वह संतुष्ट नहीं होगा? तुम लोग इस पर चर्चा कर सकते हो। (यदि कोई अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानता है, तो जब उस कर्तव्य से सामना होता है जो उसे परमेश्वर को चढ़ाई गई भेंट को स्पर्श करने की अनुमति देता है, तो वह विचार करेगा कि परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करना कितना आसान होगा, अतः वह सावधानी से आगे बढ़ना निश्चित करेगा)। तुम्हारा उत्तर सही राह पर है, परन्तु यह अभी तक वहाँ बिल्कुल नहीं पहुँचा है। परमेश्वर के मार्ग पर चलना सतही तौर पर नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है। इसके बजाय, इसका अर्थ है कि जब तुम्हारा सामना किसी मामले से होता है, तो सबसे पहले, तुम इसे ऐसी परिस्थिति के रूप में देखो जिसकी व्यवस्था परमेश्वर के द्वारा की गई है, ऐसे उत्तरदायित्व के रूप में देखो जिसे उसके द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया है, या किसी ऐसी चीज़ के रूप में देखो जो उसने तुम्हें सौंपी है, और यह कि जब तुम इस मामले का सामना कर रहे होते हो, तो तुम्हें इसे भी परमेश्वर से आयी किसी परीक्षा के रूप में देखना चाहिए। इस मामले का सामना करते समय, तुम्हारे पास एक मानक अवश्य होना चाहिए, तुम्हें अवश्य सोचना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आया है। तुम्हें इस बारे में अवश्य सोचना चाहिए कि कैसे इस मामले से इस तरह निपटो कि तुम अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर सको, और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार रह सको; इसे कैसे करें और परमेश्वर को क्रोधित न करें, या उसके स्वभाव को अपमानित न करें। हमने अभी-अभी भेंटों की सुरक्षा के बारे में बात की। इस मामले में भेंटें शामिल हैं, और इसमें तुम्हारा कर्तव्य, एवं तुम्हारा उत्तरदायित्व भी शामिल है। तुम इस उत्तरदायित्व के प्रति कर्तव्य से बँधे हुए हो। फिर भी जब तुम्हारा सामना इस मामले से होता है, तो क्या कोई प्रलोभन है? हाँ है! यह प्रलोभन कहाँ से आता है? यह प्रलोभन शैतान की ओर से आता है, और यह मनुष्य की दुष्टता, और उसके भ्रष्ट स्वभाव से भी आता है। चूँकि यहाँ प्रलोभन है, इसमें स्थायी गवाही शामिल है; स्थायी गवाही भी तुम्हारा उत्तरदायित्व एवं कर्तव्य है। कुछ लोग कहते हैं: "यह तो इतना छोटा सा मसला है; क्या वास्तव में इसे बात का बतंगड़ बनाना ज़रूरी है?" हाँ यह ज़रूरी है! क्योंकि परमेश्वर के मार्ग पर चलने के लिए, हम किसी भी ऐसी चीज़ को जाने नहीं दे सकते हैं जिसका हमसे लेना देना है, या कोई ऐसी चीज़ जो हमारे आस पास घटित होती है, यहाँ तक कि छोटी-छोटी चीज़ें भी। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे हमें लगता है कि हमें इस पर ध्यान देना चाहिए या नहीं, जब तक कोई मसला हमारा सामना कर रहा है तब तक हमें उसे जाने नहीं देना चाहिए। इस सबको हमारे लिए परमेश्वर की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। इस प्रकार की प्रवृत्ति कैसी है? यदि तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति है, तो यह एक तथ्य की पुष्टि करती है: तुम्हारा हृदय परमेश्वर का भय मानता है, और तुम्हारा हृदय दुष्टता से दूर रहने के लिए तैयार है। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए ऐसी इच्छा है, तो जिसे तुम अभ्यास में लाते हो वह परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मानक से दूर नहीं है।

प्रायः ऐसे लोग होते हैं जो मानते हैं कि ऐसे मामले जिन पर लोगों के द्वारा अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है, ऐसे मामले जिनका सामान्यतः उल्लेख नहीं किया जाता है—ये महज छोटी-मोटी निरर्थक बातें होती हैं, और उनका सत्य को अभ्यास में लाने से को कोई लेना देना नहीं है। जब ऐसे लोगों का सामना ऐसे मामले से होता है, तो वे उस पर अधिक विचार नहीं करते हैं और उसे जाने देते हैं। परन्तु वास्तविकता में, यह मामला एक सबक है जिसका तुम्हें अध्ययन करना चाहिए, और इस बारे में एक सबक है कि किस प्रकार परमेश्वर का भय मानना है, और किस प्रकार दुष्टता से दूर रहना है। इसके अतिरिक्त, जिस बारे में तुम्हें और भी अधिक चिंता करनी चाहिए वह यह जानना है कि जब यह मामला तुम्हारा सामना करने के लिए उठ खड़ा होता है तब परमेश्वर क्या कर रहा होता है। परमेश्वर ठीक तुम्हारे बगल में है, तुम्हारे प्रत्येक वचन और कर्म का अवलोकन कर रहा है, तुम्हारी करतूतों, तुम्हारे मन में हुए परिवर्तनों का अवलोकन कर रहा है—यह परमेश्वर का कार्य है। कुछ लोग कहते हैं: "तो मुझे यह महसूस क्यों नहीं होता है? तुमने इसका एहसास नहीं किया है क्योंकि परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का मार्ग तुम्हारा अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग नहीं रहा है कि तुम उसके मुताबिक चलो। इसलिए, तुम मनुष्य में परमेश्वर के सूक्ष्म कार्य को महसूस नहीं कर सकते हो, जो लोगों के भिन्न-भिन्न विचारों और भिन्न-भिन्न कार्यकलापों के अनुसार स्वयं को प्रदर्शित करता है। तुम एक चंचलचित्त वाले व्यक्ति हो। बड़ा मामला क्या है? छोटा मामला क्या है? उन सभी मामलों को बड़े और छोटे मामलों में विभाजित नहीं किया जाता है जिसमें परमेश्वर के मार्ग पर चलना शामिल है। क्या तुम लोग उसे स्वीकार कर सकते हो? (हम इसे स्वीकार कर सकते हैं)। प्रतिदिन के मामलों के सम्बन्ध में, कुछ मामले हैं जिन्हें लोग बहुत बड़े और महत्वपूर्ण मामले के रूप में देखते हैं, और अन्य मामलें हैं जिन्हें छोटे-मोटे निरर्थक मामलों के रूप में देखा जाता है। लोग प्रायः इन बड़े मामलों को अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों के रूप में देखते हैं, और वे उन्हें परमेश्वर के द्वारा भेजा गया मानते हैं? हालाँकि, इन बड़े मामलों के चलते रहने के दौरान, मनुष्य की अपरिपक्व कद-काठी के कारण, और मनुष्य की कम क्षमता के कारण, मनुष्य प्रायः परमेश्वर के इरादों के मुताबिक नहीं होता है, कोई प्रकाशन प्राप्त नहीं कर सकता है, और ऐसा कोई वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है जो किसी मूल्य का हो। जहाँ तक छोटे-छोटे मामलों की बात है, लोगों के द्वारा बस इनकी अनदेखी की जाती है, और थोड़ा-थोड़ा करके हाथ से फिसलने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार, उन्होंने परमेश्वर के सामने जाँचे जाने, और उसके द्वारा परीक्षण किए जाने के अनेक अवसरों को गँवा दिया है। यदि तुम हमेशा लोगों, चीज़ों, और मामलों, और परिस्थितियों को अनदेखा करते हो जिनकी व्यवस्था परमेश्वर ने तुम्हारे लिए करता है, तो इसका क्या अर्थ होगा? इसका अर्थ है कि हर दिन, यहाँ तक कि हर क्षण, तुम हमेशा अपने बारे में परमेश्वर की सिद्धता का और परमेश्वर की अगुवाई का परित्याग कर रहे हो। जब कभी भी परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिस्थिति की व्यवस्था करता है, तो वह गुप्त रीति से देख रहा होता है, तुम्हारे हृदय को देख रहा होता है, तुम्हारी सोच और विचारों को देख रहा होता है, देख रहा होता है कि तुम किस प्रकार सोचते हो, देख रहा होता है कि तुम किस प्रकार कार्य करोगे। यदि तुम एक लापरवाह व्यक्ति हो—ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के मार्ग, परमेश्वर के वचन, या सत्य के बारे में कभी भी गंभीर नहीं रहा है—तो तुम सचेत नहीं होगे, तुम उस पर ध्यान नहीं दोगे जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता है, और जिसकी माँग परमेश्वर तुमसे उस समय करता है जब वह तुम्हारे लिए परिस्थितियों की व्यवस्था करता है। तुम यह भी नहीं जानोगे कि लोग, चीज़ें, और मामले जिनका तुम लोग सामना करते हो वे किस प्रकार सच्चाई से या परमेश्वर के इरादों से सम्बन्ध रखते हैं। तुम्हारे इस प्रकार बार-बार परिस्थितियों और बार-बार परीक्षणों का सामना करने के पश्चात्, जब परमेश्वर तुम्हारे नाम में किसी उपलब्धि को नहीं देखता है, तो परमेश्वर कैसे आगे बढ़ेगा? बार-बार परीक्षणों का सामना करने के बाद, तुम अपने हृदय में परमेश्वर को महिमान्वित नहीं करते हो, और तुम उन परिस्थितियों के साथ जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए व्यवस्थित की हैं वैसा व्यवहार नहीं करते हो जैसा उनके साथ किया जाना चाहिए—परमेश्वर के परीक्षणों या परमेश्वर की परीक्षाओं के रूप में। इसके बजाय तुम उन अवसरों को अस्वीकार करते हो जिन्हें परमेश्वर तुम्हें एक के बाद एक प्रदान करता है, और बार-बार उन्हें हाथ से जाने देते हो। क्या यह मनुष्य के द्वारा बहुत बड़ी अवज्ञा नहीं है? (यह है)। क्या इसकी वजह से परमेश्वर दुःखित होगा? (वह दुःखित होगा)। परमेश्वर दुःखित नहीं होगा! मुझे इस प्रकार कहते हुए सुनकर तुम लोगों को एक बार फिर से झटका लगा है। आखिरकार, क्या ऐसा पहले नहीं कहा गया था कि परमेश्वर हमेशा दुःखित होता है? परमेश्वर दुःखित नहीं होगा? तो परमेश्वर कब दुःखित होगा? खैर, परमेश्वर इस स्थिति से दुःखित नहीं होगा। तो उस प्रकार के व्यवहार के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है जिसकी रूपरेखा ऊपर दी गई है? जब लोग उन परीक्षणों, परीक्षाओं को अस्वीकार करते हैं जिन्हें परमेश्वर उन पर भेजता है, जब वे उनसे बच कर भागते हैं, तो केवल एक ही प्रवृत्ति होती है जो इन लोगों के प्रति परमेश्वर की होती है। यह प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को अपने हृदय की गहराई से ठुकरा देता है। यहाँ "ठुकराने" शब्द के लिए अर्थ की दो परतें हैं। मैं उन्हें किस प्रकार समझाऊँ? भीतर गहराई में, यह शब्द घृणा का, नफ़रत का संकेतार्थ लिए हुए है। और जहाँ तक अर्थ की दूसरी परत की बात है? यह वह भाग है जो जिसका तात्पर्य है किसी चीज़ को त्याग देना। तुम सभी लोग जानते हो कि "त्याग देने" का क्या अर्थ है, ठीक है न? संक्षेप में, ठुकराने का अर्थ है ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की अंतिम प्रतिक्रिया और प्रवृत्ति जो इस तरह से व्यवहार कर रहे हैं। यह उनके प्रति चरम घृणा है, और चिढ़ है, और इसलिए उनका परित्याग करने का निर्णय लिया गया है। यह ऐसे व्यक्ति के प्रति परमेश्वर का अंतिम निर्णय है जो परमेश्वर के मार्ग पर कभी नहीं चला है, जिसने कभी भी परमेश्वर का भय नहीं माना है और जो कभी भी दुष्टता से दूर नहीं रहा है। क्या अब तुम सभी लोग इस कहावत के महत्व को देख सकते हो जो मैंने कही है?

क्या अब वह तरीका तुम्हारी समझ में आ गया है जिसे परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करने के लिए उपयोग करता है? (हर दिन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना)। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना—यह वह है जिसे लोग महसूस और स्पर्श कर सकते हैं। तो इसके लिए परमेश्वर की मंशा क्या है? मंशा यह है कि परमेश्वर हर एक व्यक्ति की भिन्न-भिन्न तरीकों से, भिन्न-भिन्न समयों पर, और भिन्न-भिन्न स्थानों में परीक्षाएँ लेना चाहता है। किसी परीक्षा में मनुष्य के किन पहलुओं को जाँचा जाता है? तुम उस प्रकार के व्यक्ति हो या नहीं जो हर उस मामले में परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता हो जिसका तुम सामना करते हो, जिसके बारे में तुम सुनते हो, जिसे तुम देखते हो, और जिसका तुम व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो। हर कोई इस प्रकार के परीक्षण का सामना करेगा, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष है। कुछ लोग कहते हैं: "मैंने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है; ऐसा कैसे है कि मैंने किसी परीक्षण का सामना नहीं किया है? तुम्हें लगता है कि तुमने किसी परीक्षण का सामना नहीं किया है क्योंकि जब कभी भी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए परिस्थितियों को व्यवस्थित किया है, तो तुमने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया है, और परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं चाहा है। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के परीक्षण का कोई बोध नहीं है। कुछ लोग कहते हैं: "मैंने कुछ परीक्षणों का सामना किया है, किन्तु मैं अभ्यास करने के उचित तरीके को नहीं जानता हूँ। यद्यपि मैंने अभ्यास किया था, तब भी मैं नहीं जानता हूँ कि मैं परीक्षण के दौरान डटा रहा था या नहीं।" इस प्रकार की स्थिति वाले लोग निश्चित रूप से अल्पसंख्या में नहीं हैं। अतः तब वह मानक क्या है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को मापता है? यह ठीक ऐसा ही है जैसा मैंने कुछ क्षण पहले कहा था: जो कुछ भी तुम करते हो, जो कुछ भी तुम सोचते हो, और जो कुछ भी तुम व्यक्त करते हो—क्या यह परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना है? इसी प्रकार यह निर्धारित होता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और दुष्टता से दूर रहता है? क्या यह एक सरल धारणा है? इसे कहना काफी आसान है, किन्तु क्या इसे अभ्यास में लाना आसान है? (यह इतना आसान नहीं है)। यह इतना आसान क्यों नहीं है? (क्योंकि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, नहीं जानते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार मनुष्य को सिद्ध बनाता है, और इस प्रकार जब उनका सामना मामलों से होता है तब वे नहीं जानते हैं कि अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य की खोज कैसे करें; लोगों को भिन्न-भिन्न परीक्षणों, शुद्धिकरणों, ताड़नाओं, और न्यायों से होकर गुज़रना ही होगा, इससे पहले कि उनके पास परमेश्वर का भय मानने की वास्तविकता हो)। तुम लोग इसे इस प्रकार रखते हो, परन्तु जहाँ तक तुम लोगों का संबंध है, परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना इस वक्त आसानी से करने योग्य प्रतीत होता है। मैं क्यों ऐसा कहता हूँ? क्योंकि तुम लोगों ने बहुत से धर्मोपदेशों को सुना है, और सत्य की वास्तविकता की सिंचाई को थोड़ी मात्रा में नहीं प्राप्त किया है। इसने तुम्हें यह समझने दिया है कि किस प्रकार सिद्धान्त और सोच के सम्बन्ध में परमेश्वर का भय मानना है और दुष्टता से दूर रहना है। परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के तुम लोगों के अभ्यास के सम्बन्ध में, यह सब सहायक रहा है और इसने तुम लोगों को महसूस करवाया है कि ऐसी चीज़ आसानी से प्राप्त करने योग्य है। तब क्यों लोग वास्तव में इसे कभी प्राप्त नहीं कर सकते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य के स्वभाव का सार परमेश्वर का भय नहीं मानता है, और दुष्टता को पसन्द करता है। यही वास्तविक कारण है।

परमेश्वर का भय न मानना और दुष्टता से दूर न रहना परमेश्वर का विरोध करना है

आइए हम यह सम्बोधित करने के द्वारा आरम्भ करें कि यह कहावत "परमेश्वर का भय मानें और दुष्टता से दूर रहें" कहाँ से आई है। (अय्यूब की पुस्तक से)। अब जबकि तुम लोगों ने अय्यूब का उल्लेख किया है, तो आइए हम उसकी चर्चा करें। अय्यूब के समय में, क्या परमेश्वर मनुष्य को जीतने और उसका उद्धार करने के लिए कार्य कर रहा था? वह नहीं कर रहा था, क्या वह कर रहा था? और जहाँ तक अय्यूब का संबंध है, उस समय उसे परमेश्वर का कितना ज्ञान था? (बहुत अधिक ज्ञान नहीं था)। और किस प्रकार परमेश्वर के बारे में उस ज्ञान की तुलना उस ज्ञान से की जाती जो इस वक्त तुम लोगों के पास है? ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम लोग इसका उत्तर देने का साहस नहीं करते हो? क्या अय्यूब का ज्ञान उस ज्ञान की अपेक्षा ज़्यादा या कम था जो तुम लोगों के पास इस वक्त है? (कम था)। इस प्रश्न का उत्तर देना बड़ा आसान है। कम! यह निश्चित है! आज तुम लोग परमेश्वर के आमने-सामने हो, और परमेश्वर के वचन के आमने-सामने हो। परमेश्वर के बारे में तुम लोगों का ज्ञान अय्यूब के ज्ञान की तुलना में बहुत अधिक है। मैं इसे सामने लेकर क्यों आया हूँ? मैं इस प्रकार क्यों बोलता हूँ? मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझाना चाहूँगा, किन्तु इससे पहले कि मैं समझाऊँ, मैं तुम लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ: अय्यूब परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था, फिर भी वह परमेश्वर का भय मान सकता था और दुष्टता से दूर रह सकता था। तो ऐसा क्यों है कि इन दिनों लोग ऐसा करने में असफल हैं? (गहन भ्रष्टता)। गहन भ्रष्टता—यह प्रश्न का ऊपरी भाग है, परन्तु मैं कभी भी इसे इस प्रकार से नहीं देखूँगा। तुम लोग प्रायः ऐसे सिद्धान्तों और पत्रों को अपनाते हो जिनके बारे में तुम लोग आम तौर पार बात करते हो, जैसे कि "गहन भ्रष्टता," "परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना," "परमेश्वर के प्रति विश्वासघात," "अवज्ञा," "सत्य को पसन्द नहीं करना", और हर एक प्रश्न के सार की व्याख्या करने के लिए तुम लोग इन वाक्यांशों का उपयोग करते हो। यह अभ्यास करने का एक दोषपूर्ण तरीका है। भिन्न-भिन्न प्रकृतियों के प्रश्नों को समझाने के लिए एकही उत्तर का उपयोग करना सत्य और परमेश्वर की निन्दा करने के सन्देहों को अनिवार्य रूप से उत्पन्न करता है। मुझे इस तरह का उत्तर सुनना पसन्द नहीं है। इसके बारे में सोचो! तुम लोगों में से किसी ने भी इस मामले के बारे में नहीं सोचा है, परन्तु हर एक दिन मैं इसे देख सकता हूँ, और हर एक दिन मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। इस प्रकार, तुम लोग कर रहे हो, और मैं देख रहा हूँ। जब तुम लोग इसे कर रहे होते हो, तब तुम लोग इस मामले के सार को महसूस नहीं कर सकते हो। किन्तु जब मैं इसे देखता हूँ, तो मैं इसके सार को भी देख सकता हूँ, और मैं इसके सार को भी महसूस कर सकता हूँ। तो फिर यह सार क्या है? क्यों इन दिनों लोग परमेश्वर का भय नहीं मान सकते है और दुष्टता से दूर नहीं रह सकते हैं? तुम लोगों के उत्तर इस प्रश्न के सार की व्याख्या करने के योग्य होने से बहुत दूर हैं, और वे इस प्रश्न के सार का समाधान नहीं कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहाँ एक स्रोत है जिसके बारे में तुम लोग नहीं जानते हो। यह स्रोत क्या है? मैं जानता हूँ कि तुम सब इसके बारे में सुनना चाहते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को इस प्रश्न के स्रोत के बारे में बताऊँगा।

परमेश्वर के कार्य की बिलकुल शुरुआत में, वह मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर ने मनुष्य को बचाया; वह मनुष्य को अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में, अपने कार्य के लक्ष्य के रूप में, उस रूप में मानता था जिसे वह जीतना, बचाना चाहता था, और उस रूप में चाहता था जिसे वह सिद्ध करना चाहता था। अपने कार्य के आरम्भ में मनुष्य के प्रति यह परमेश्वर की प्रवृत्ति थी। परन्तु उस समय परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति क्या थी? परमेश्वर मनुष्य के लिए अजीब था, और मनुष्य परमेश्वर को एक अजनबी मानता था। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति ग़लत थी, और मनुष्य इस बारे स्पष्ट नहीं था कि उसे किस प्रकार परमेश्वर से व्यवहार करना चाहिए। इसलिए उसने उससे वैसा ही व्यवहार किया जैसा वह चाहता था, और जो कुछ भी चाहता था वही किया। क्या परमेश्वर के प्रति मनुष्य का कोई दृष्टिकोण था? आरम्भ में, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का कोई दृष्टिकोण नहीं था। परमेश्वर के सम्बन्ध में मनुष्य का तथाकथित दृष्टिकोण बस कुछ अवधारणाएँ और कल्पनाएँ ही थीं। जो कुछ लोगों की अवधारणाओं के अनुरूप था उसे स्वीकार किया गया; जो कुछ अनुरूप नहीं था उसका ऊपरी तौर पर पालन किया गया; परन्तु अपने हृदय में लोग उसे कड़ाई से टक्कर देते थे और उसका विरोध करते थे। आरम्भ में यह मनुष्य और परमेश्वर का सम्बन्ध था: परमेश्वर मनुष्य को परिवार के एक सदस्य के रूप में देखता था, फिर भी मनुष्य परमेश्वर से एक अजनबी के रूप में व्यवहार करता था। परन्तु परमेश्वर के कार्य की एक समयावधि के पश्चात्, मनुष्य की समझ में आ गया कि परमेश्वर क्या प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था। लोग जानने लगे थे कि परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर है, और वे जानने लगे थे कि मनुष्य परमेश्वर से क्या प्राप्त कर सकता है। इस समय मनुष्य परमेश्वर को किस रूप में मानता था? मनुष्य अनुग्रह पाने, आशीषें पाने, एवं प्रतिज्ञाएँ पाने की आशा करते हुए परमेश्वर को जीवनरेखा के रूप में मानता था। और इस परिस्थिति में परमेश्वर मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर मनुष्य को अपने विजय के एक लक्ष्य के रूप में मानता था? परमेश्वर मनुष्य का न्याय करने के लिए, मनुष्य की परीक्षा लेने, मनुष्य के परीक्षण करने के लिए वचनों का उपयोग करना चाहता था। किन्तु इस समय जहाँ तक मनुष्यजाति का संबंध था, परमेश्वर एक वस्तु था जिसे वह अपने स्वयं के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उपयोग कर सकती थी। लोगों ने देखा कि परमेश्वर के द्वारा जारी किया गया सत्य उन पर विजय पा सकता था और उन्हें बचा सकता था, और यह कि उनके पास उन चीज़ों को जिन्हें वे परमेश्वर से चाहते थे और उस मंज़िल को जिसे वे चाहते थे प्राप्त करने का एक अवसर था। इस कारण, उनके हृदयों में थोड़ी सी ईमानदारी ने रूप ले लिया था, और वे इस परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तैयार थे। कुछ समय बीत गया, और लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ सतही और सैद्धान्तिक ज्ञान हो गया था। ऐसा कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर के साथ अधिकाधिक "परिचित" हो रहे थे। परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों, उसके उपदेश के साथ, उस सत्य के साथ जिसे उसने जारी किया था, और उसके कार्य के साथ—लोग अधिकाधिक परिचित होने लगे थे। इसलिए, लोगों ने ग़लती से सोच लिया था कि परमेश्वर अब और अजनबी नहीं है, और यह कि वे पहले से ही परमेश्वर की संगतता के पथ पर चल रहे हैं। तब से लेकर अब तक, लोगों ने सत्य पर बहुत से धर्मोपदेशों को सुना है, और परमेश्वर के बहुत से कार्यों का अनुभव किया है। फिर भी भिन्न-भिन्न कारकों एवं परिस्थितियों के हस्तक्षेपों एवं अवरोधों के अंतर्गत, अधिकांश लोग सत्य को अभ्यास लाना प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर को संतुष्टि करना प्राप्त नहीं कर सकते हैं। लोग उत्तरोत्तर आलसी हो रहे हैं, और उनके आत्मविश्वास में उत्तरोत्तर कमी हो रही है। वे उत्तरोत्तर महसूस करते हैं मानो कि उनका स्वयं का परिणाम अज्ञात है। वे साहस नहीं करते हैं कि उनके पास कोई असाधारण विचार हो, और कोई प्रगति करने का प्रयास नहीं करते हैं; वे बस अनमने ढंग से अनुसरण करते है, और कदम दर कदम आगे बढ़ते जाते हैं। मनुष्य की वर्तमान अवस्था के संबंध में, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर की एकमात्र इच्छा है कि वह मनुष्य को इन सच्चाईयों को दे, और अपने मार्ग से मनुष्य को भरपूर कर दे, और तब भिन्न-भिन्न तरीकों से मनुष्य को जाँचने के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों व्यवस्था करे। उसका लक्ष्य इन वचनों, इन सच्चाईयों, और अपने कार्य को लेना, और ऐसा परिणाम उत्पन्न करना है जहाँ मनुष्य परमेश्वर का भय मान सके और दुष्टता से दूर रह सके। मैंने देखा है कि अधिकांश लोग बस परमेश्वर के वचन को लेते हैं और उसे सिद्धान्तों के रूप में मानते हैं, उसे पत्रों के रूप में मानते हैं, और उसे पालन किए जाने वाले विनियमों के रूप में मानते हैं। जब वे कार्यों को करते हैं और बोलते हैं, या परीक्षणों का सामना करते हैं, तब वे परमेश्वर के मार्ग को उस मार्ग के रूप में नहीं मानते हैं जिसका उनको पालन करना चाहिए। यह विशेष रूप से सत्य है जब लोगों का बड़े परीक्षणों से सामना होता है; मैंने किसी एक भी व्यक्ति को नहीं देखा है जो परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की दिशा में अभ्यास कर रहा हो। इस वजह से, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति अत्यधिक घृणा एवं अरुचि से भरी हुई है। परमेश्वर द्वारा लोगों का बार-बार, यहाँ तक कि सैकड़ों बार, परीक्षण कर लेने के पश्चात् उनके पास अभी भी अपने दृढ़ संकल्प को प्रदर्शित करने की कोई स्पष्ट प्रवृत्ति नहीं है—मैं परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना चाहता हूँ! चूँकि लोगों का ऐसा दृढ़ संकल्प नहीं है, और वे इस प्रकार का प्रदर्शन नहीं करते हैं, इसलिए उनके प्रति परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति अब और वैसी नहीं है जैसी अतीत में थी, जब उसने दया प्रदान की थी, सहनशीलता प्रदान की थी, और सहिष्णुता और धैर्य प्रदान किया था। इसके बजाय, वह मनुष्य से अत्यंत निराश है। किसने इस निराशा को पैदा किया? जिस प्रकार की प्रवृत्ति मनुष्य के प्रति परमेश्वर की है, यह किस पर निर्भर है? यह हर उस व्यक्ति पर निर्भर है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अपने अनेक वर्षों के कार्य के दौरान, परमेश्वर ने मनुष्य से अनेक माँगें की है, और मनुष्य के लिए अनेक परिस्थितियाँ व्यवस्थित की हैं। किन्तु चाहे मनुष्य ने कैसा ही प्रदर्शन क्यों न किया हो, और चाहे परमेश्वर के प्रति मनुष्य की प्रवृत्ति कुछ भी क्यों न हो, मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के लक्ष्य की स्पष्ट अनुरूपता में अभ्यास नहीं कर सकता है। इस प्रकार, मैं एक कहावत में इसे सारांशित करूँगा, और हर उस चीज़ की व्याख्या करने के लिए इस कहावत का उपयोग करूँगा जिसके बारे में हमने अभी-अभी बात की थी कि क्यों लोग परमेश्वर के मार्ग—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना—पर नहीं चल सकते हैं। यह कहावत क्या है! यह कहावत है: परमेश्वर मनुष्य को अपने उद्धार की वस्तु के रूप में, अपने कार्य की वस्तु के रूप में मानता है; मनुष्य परमेश्वर को अपने शत्रु के रूप में, विरोधी के रूप में मानता है। क्या अब तुम इस विषय पर स्पष्ट हो? मनुष्य की प्रवृत्ति क्या है; परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है; मनुष्य और परमेश्वर के बीच क्या रिश्ता है—ये सब बिलकुल स्पष्ट हैं। चाहे तुम लोगों ने कितने ही धर्मोपदेशों को क्यों न सुना हो, जिन चीज़ों को तुम लोगों ने स्वयं सारांशित किया है—जैसे कि परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना, परमेश्वर का आज्ञा पालन करना, परमेश्वर के साथ संगतता का मार्ग खोजना, आजीवन परमेश्वर के लिए बिताने की इच्छा रखना, परमेश्वर के लिए जीना—मेरे विचार से वे चीज़ें परमेश्वर के मार्ग पर होश-हवाश में चलना नहीं है, जो कि परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना है! इसके बजाय, वे ऐसे माध्यम हैं जिनके द्वारा तुम लोग कुछ लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हो। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, तुम लोग अनिच्छा से कुछ विनियमों का पालन करते हो। और निश्चित रूप से ये ऐसी विधियाँ हैं जो लोगों को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग से और भी अधिक दूर ले जाती हैं, और एक बार फिर से परमेश्वर को मनुष्य के विरोध में लाकर रख देती हैं।

आज जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं वह थोड़ा गंभीर है, परन्तु चाहे जो भी हो, मुझे अभी भी आशा है कि जब तुम लोग आने वाले अनुभवों, और आने वाले समयों से होकर गुज़रते हो, तो तुम लोग वह कर सकते हो जो मैंने अभी-अभी तुम लोगों को कहा है। यह महसूस करते हुए कि जैसे वह उन समयों में मौजूद होता है जब वह तुम लोगों के लिए उपयोगी है, परन्तु जब उसका कोई उपयोग नहीं होता है तब ऐसा महसूस करते हुए कि वह मौजूद नहीं है, परमेश्वर की उपेक्षा न करो और उसे खाली हवा मत मानो। जब तुम अवचेतन रूप से इस प्रकार की समझ रखते हो, तो तुमने परमेश्वर को पहले से ही क्रोधित कर दिया है। कदाचित् ऐसे लोग हैं जो कहते हैं: "मैं परमेश्वर को खाली हवा के रूप में नहीं मानता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर को संतुष्ट करता हूँ, और हर काम जो मैं करता हूँ वह उस दायरे और मानक और सिद्धान्तों के अंतर्गत आता है जिसकी परमेश्वर के द्वारा माँग की जाती है। मैं निश्चित रूप से अपने स्वयं के विचारों के अनुसार आगे नहीं बढ़ रहा हूँ। हाँ, जिस ढंग से तुम काम कर रहे हो वह सही है। किन्तु जब तुम किसी मसले के आमने-सामने होते हो तो तुम किस प्रकार सोचते हो? जब तुम्हारा सामना किसी मसले से होता है तो तुम किस प्रकार अभ्यास करते हो! कुछ लोग महसूस करते हैं कि जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उससे आग्रह करते हैं तो वह मौजूद होता है। किन्तु जब उनका सामना किसी मसले से होता है, तो वे अपने स्वयं के विचारों के साथ सामने आते हैं और उन पर अटल रहना चाहते हैं। यह परमेश्वर को खाली हवा मानना है। इस प्रकार की स्थिति परमेश्वर को अस्तित्वहीन ठहराती है। लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को तभी मौजूद होना चाहिए जब उन्हें उसकी ज़रूरत होती है, और जब उन्हें परमेश्वर की ज़रूरत नहीं होती है तब उसे मौजूद नहीं होना चाहिए। लोग सोचते हैं कि अभ्यास करने के लिए अपने स्वयं के विचारों के अनुसार चलना काफी है। वे मानते हैं कि वे चीज़ों को वैसे ही कर सकते हैं जैसी उन्हें अच्छी लगें। वे बस सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर के मार्ग को खोजने की आवश्यकता नहीं है। जो लोग वर्तमान में इस प्रकार की स्थिति में हैं, और इस प्रकार की अवस्था में हैं—क्या वे खतरे के कगार पर नहीं हैं? कुछ लोग कहते हैं: "इस बात की परवाह किए बिना कि मैं खतरे की कगार पर हूँ या नहीं, मैंने इतने वर्षों से विश्वास किया है, और मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर मेरा परित्याग नहीं करेगा क्योंकि मुझे परित्याग करना वह सहन नहीं कर सकता है।" अन्य लोग कहते हैं: "यहाँ तक कि उस समय से जब मैं अपनी माँ के गर्भ में था, अब तक, कुल मिलाकर 40 या 50 वर्ष तक, मैंने प्रभु पर विश्वास किया। समय के सन्दर्भ में, मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए अत्यंत योग्य हूँ; मैं ज़िन्दा बचे रहने के लिए अत्यंत योग्य हूँ। चार या पाँच दशकों की इस समय अवधि में, मैंने अपने परिवार और अपनी नौकरी का परित्याग कर दिया। जो कुछ मेरे पास था मैंने वह सब त्याग दिया, जैसे कि धन, हैसियत, उपभोग, और पारिवारिक समय; मैंने बहुत से स्वादिष्ट व्यंजनों को नहीं खाया है; मैंने बहुत सी उपभोग की चीज़ों का आनन्द नहीं लिया है; मैंने बहुत से मनभावन स्थानों का दौरा नहीं किया हैं, मैंने यहाँ तकि कि उस कष्ट का भी अनुभव किया है जिसे साधारण लोग नहीं सह सकते हैं। यदि इन सब के कारण परमेश्वर मुझे नहीं बचा सकता है, तो मेरे साथ अन्यायपूर्ण तरीके से व्यवहार किया जा रहा है और मैं इस प्रकार के ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता हूँ।" क्या ऐसे बहुत से लोग हैं जिनका दृष्टिकोण इस प्रकार का है? (ऐसे से बहुत से हैं)। तो आज मैं एक तथ्य को समझने में तुम लोगों की सहायता करूँगा: उन में से हर एक व्यक्ति जो इस प्रकार का दृष्टिकोण रखता है वह अपने अपने पाँव में कुल्हाड़ी मार रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी आँखों को ढकने के लिए अपनी स्वयं की कल्पनाओं का उपयोग कर रहे हैं। यह निश्चित रूप से उनकी कल्पनाएँ हैं, और उनके स्वयं के निष्कर्ष हैं जो उस मानक का स्थान लेते हैं जिसकी माँग परमेश्वर मनुष्य से करता है, परमेश्वर के सच्चे इरादों को स्वीकार करने से उन्हें रोकते हैं, उसे ऐसा बना देते हैं कि वे परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का अनुभव नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर द्वारा सिद्ध किए जाने के उनके अवसर की हानि करवा देते हैं और परमेश्वर की प्रतिज्ञा में उनका कोई भाग या अंश नहीं है।

परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को और उस मानक को कैसे निर्धारित करता है जिसके द्वारा वह मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है

इससे पहले कि तुम्हारे पास अपना स्वयं का कोई दृष्टिकोण या निष्कर्ष हो, तुम्हें सबसे पहले अपने प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझना चाहिए, परमेश्वर क्या सोच रहा है, और तब निर्णय लेना चाहिए कि तुम्हारी अपनी सोच सही है या नहीं। परमेश्वर ने मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी भी समय की इकाईयों का उपयोग नहीं किया है, और उसने उनके परिणाम को निर्धारित करने के लिए कभी भी किसी व्यक्ति के द्वारा सहे गए कष्ट की मात्रा का उपयोग नहीं किया है। तब परमेश्वर किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए मानक के रूप में किसका उपयोग करता है? किसी व्यक्ति के परिणाम को निर्धारित करने के लिए समय की इकाईयों का उपयोग करना—यही लोगों की धारणाओं से सर्वाधिक अनुरूप है। और ऐसे व्यक्ति भी हैं जिन्हें तुम लोग प्रायः देखते हो, ऐसे लोग जिन्होंने किसी समय बहुत कुछ समर्पित किया था, बहुत कुछ व्यय किया था, बहुत कुछ चुकाया था, और बहुत कष्ट सहा था। ये वे लोग हैं जिन्हें, तुम लोगों की दृष्टि में, परमेश्वर के द्वारा बचाया जा सकता था। वह सब जो ये लोग दिखाते हैं, वह सब जिसे ये लोग जीते हैं, वह निश्चित रूप से उस मानक की मनष्यजाति की धारणा है जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य का परिणाम निर्धारित करता है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोग क्या विश्वास करते हो, मैं एक-एक करके इन उदाहरणों को सूचीबद्ध नहीं करूँगा। संक्षेप में, जब तक यह परमेश्वर की स्वयं की सोच का मानक नहीं है, तब तक यह मनुष्य की कल्पनाओं से आता है, और यह सब मनुष्य की धारणा है। अपनी स्वयं की अवधारणाओं और कल्पनाओं पर आँख बन्द करके जोर देने का क्या परिणाम होता है? स्पष्ट रूप से, वह परिणाम केवल परमेश्वर के द्वारा तुम्हें ठुकराना हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम हमेशा परमेश्वर के सामने अपनी योग्यताओं पर इतराते हो, परमेश्वर से स्पर्धा करते हो, और परमेश्वर से विवाद करते हो, तुम लोग सचमुच में परमेश्वर की सोच को समझने का प्रयास नहीं करते हो, न ही तुम मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर के इरादों और परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझने की कोशिश करते हो। इस तरह से आगे बढ़ना स्वयं को सबसे ऊपर सम्मानित करना है, परमेश्वर को सम्मानित करना नहीं है। तुम स्वयं में विश्वास करते हो; तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हो। परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को नहीं चाहता है, और परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को नहीं बचाएगा। यदि तुम इस प्रकार के दृष्टिकोण को जाने दे सकते हो, और फिर अतीत के इन गलत दृष्टिकोणों को सुधार सकते हो; यदि तुम परमेश्वर की माँगों के अनुसार आगे बढ़ सकते हो; तो अब से आगे परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का अभ्यास करना शुरू कर दो; सभी चीज़ों में परमेश्वर का सबसे महान के रूप में सम्मान करने का उपाय करो; स्वयं को परिभाषित करने के लिए, परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत कल्पनाओं, दृष्टिकोणों, या विश्वासों का उपयोग मत करो। और इसके बजाय, तुम सभी मायनों में परमेश्वर के इरादों की खोज करो, तुम मानवता के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति का अहसास और समझ प्राप्त करो, और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए परमेश्वर के मानक का उपयोग करो—यह अद्भुत रहेगा! इसका अर्थ होगा कि तुम परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग की शुरुआत करने ही वाले हो।

चूँकि परमेश्वर इस बात का कि लोग किस प्रकार इस तरीके से या उस तरीके से सोचते हैं, उनके विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए एक मानक के रूप में नहीं करता है, तो वह किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है? परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए परीक्षणों का उपयोग करता है। मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने हेतु परीक्षणों का उपयोग करने के दो मानक हैं: पहला परीक्षणों की संख्या जिनसे होकर लोग गुज़रते हैं, और दूसरा इन परीक्षणों में लोगों का परिणाम है। ये दो संकेतक हैं जो मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करते हैं। अब हम इन दो मानकों पर सविस्तार कहेंगे।

सबसे पहले, जब तुम्हारा सामना परमेश्वर की ओर से किसी परीक्षण से होता है (ध्यान दें: यह संभव है कि तुम्हारी नज़रों में यह परीक्षण एक छोटा सा हो और उल्लेख करने लायक नहीं हो), तो परमेश्वर तुम्हें स्पष्ट रूप से अवगत कराएगा कि यह तुम्हारे ऊपर परमेश्वर का हाथ है, और यह कि यह परमेश्वर है जिसने तुम्हारे लिए इस परिस्थिति की व्यवस्था की है। जब तुम्हारी कद-काठी अपरिपक्व होती है, तब परमेश्वर तुम्हारी जाँच करने के लिए परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। ये परीक्षण तुम्हारी कद-काठी के अनुरूप होंगे, वे हैं जिन्हें समझने में तुम सक्षम हो, और वे हैं जिन्हें तुम सहन करने में सक्षम हो। तुम्हारे किस भाग की जाँच करने के लिए? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति की जाँच करने के लिए। क्या यह प्रवृत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है? निश्चित रूप से यह महत्वपूर्ण है! इसके अतिरिक्त, यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है! क्योंकि मनुष्य की यह प्रवृत्ति वह परिणाम है जो परमेश्वर चाहता है, जहाँ तक परमेश्वर की बात है यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात है। अन्यथा इस प्रकार के कार्य में संलग्न होने के द्वारा परमेश्वर लोगों पर अपने प्रयासों को व्यय नहीं करता। इन परीक्षणों के माध्यम से परमेश्वर अपने प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति को देखना चाहता है; वह देखना चाहता है कि तुम सही पथ पर हो या नहीं; और वह देखना चाहता है कि तुम परमेश्वर का भय मान रहे और दुष्टता से दूर रह रहे हो या नहीं। इसलिए, इसकी परवाह किए बिना कि उस विशेष समय पर तुम बहुत सी सच्चाई समझते हो या थोड़ी सी, तब भी तुम्हारा सामना परमेश्वर के परीक्षण से होगा, और सच्चाई की उस मात्रा में जिसे तुम समझते हो कोई वृद्धि होने के बाद, परमेश्वर तुम्हारे अनुरूप परीक्षणों की व्यवस्था करना निरन्तर जारी रखेगा। जब एक बार फिर से तुम्हारा सामना किसी परीक्षण से होता है, तो परमेश्वर देखना चाहता है कि इसी बीच तुम्हारे दृष्टिकोण, तुम्हारे विचार, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति में कोई विकास हुआ है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं: क्यों परमेश्वर सदैव लोगों की प्रवृत्ति को देखना चाहता है? क्या परमेश्वर ने नहीं देखा है कि वे किस प्रकार सत्य को अभ्यास में लाते हैं? क्यों वह अभी भी लोगों की प्रवृत्तियों को देखना चाहता है? यह बुद्धिहीन बकवास है! चूँकि परमेश्वर इस तरह से आगे बढ़ता है, तो परमेश्वर के इरादे ज़रूर उसमें निहित होंगे। परमेश्वर सदैव लोगों को उनकी तरफ से देखता है, उनके हर वचन और कर्म की, उनकी हर एक करतूत और हरकत की, यहाँ तक कि उनकी हर सोच और विचार की निगरानी करता है। जो कुछ भी लोगों के साथ घटित होता है: उनके भले कर्म, उनके दोष, उनके अपराध, और यहाँ तक कि उनके विद्रोह और विश्वासघात भी, परमेश्वर उनके परिणाम को निर्धारित करने में सबूत के रूप में उन सबको दर्ज करेगा। जैसे-जैसे परमेश्वर का कार्य कदम दर कदम निर्मित होता जाता है, तुम अधिकाधिक सच्चाई को सुनते हो, तुम अधिकाधिक सकारात्मक बातों को, सकारात्मक जानकारियों को, और सत्य की वास्तविकता को स्वीकार करते हो। इस प्रक्रिया के दौरान, तुमसे परमेश्वर की अपेक्षाएँ भी बढ़ेंगी। उसके साथ-साथ, परमेश्वर तुम्हारे लिए और अधिक भारी परीक्षणों की व्यवस्था करेगा। उसका लक्ष्य यह जाँच करना है कि इस बीच परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति परिपक्व हुई है या नहीं। निश्चित रूप से, इस समय के दौरान, जिस दृष्टिकोण की माँग परमेश्वर तुमसे करता है वह सत्य की वास्तविकता की तुम्हारी समझ के अनुरूप होता है।

जैसे-जैसे तुम्हारी कद-काठी धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे वह मानक भी धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा जिसकी माँग परमेश्वर तुमसे करता है। जब तुम अपरिपक्व होगे, तब परमेश्वर तुम्हें एक बहुत ही निम्न मानक देगा; जब तुम्हारी कद-काठी थोड़ी बड़ी होगी, तब परमेश्वर तुम्हें थोड़ा ऊँचा मानक देगा। परन्तु जब तुम सामस्त सच्चाईयों को समझ जाओगे तो उसके पश्चात् परमेश्वर किसके समान होगा? परमेश्वर तुमसे और भी अधिक बड़े परीक्षणों का सामना करवाएगा। इन परीक्षणों के बीच, परमेश्वर जो कुछ पाना चाहता है, परमेश्वर जो कुछ देखना चाहता है वह परमेश्वर के बारे में तुम्हारा गहरा ज्ञान और तुम्हारा सच्चा भय है। इस समय, तुमसे परमेश्वर की माँगें उस समय की अपेक्षा और अधिक ऊँची और "अधिक कठोर" होंगी जब तुम्हारी कद-काठी अधिक अपरिपक्व थी (ध्यान दें: लोग इसे कठोर के रूप में देखते हैं, परन्तु परमेश्वर इसे तर्कसंगत के रूप में देखता है)। जब परमेश्वर लोगों के परीक्षण कर रहा है, तो परमेश्वर किस प्रकार की वास्तविकता की रचना करना चाहता है? परमेश्वर लगातार माँग कर रहा है कि लोग अपना हृदय उसे दें। कुछ लोग कहेंगे: "कोई कैसे उसे देता है? मैं अपना कर्तव्य निभाता हूँ, मैंने अपने घर और आजीविका का परित्याग किया है, मैंने परमेश्वर के लिए व्यय किया है! क्या ये सब परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? मैं और किस प्रकार से अपना हृदय परमेश्वर को दे सकता हूँ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये परमेश्वर को अपना हृदय देने के उदाहरण नहीं हैं? परमेश्वर की विशिष्ट अपेक्षा क्या है?" यह अपेक्षा बहुत साधारण है। वास्तव में, कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने परीक्षणों के विभिन्न चरणों में विभिन्न अंशों में अपना हृदय पहले से ही परमेश्वर को दे दिया है। परन्तु बड़ी मात्रा में लोग अपना हृदय परमेश्वर को कभी नहीं देते है। जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के साथ है, शरीर के साथ है, या शैतान के साथ है। जब परमेश्वर तुम्हारी कोई परीक्षा लेता है, तब परमेश्वर देखता है कि क्या तुम परमेश्वर के विरोध में खड़े हो या तुम ऐसी स्थिति में खड़े हो जो परमेश्वर के अनुरूप है, और वह यह देखता है कि तुम्हारा हृदय उसकी तरफ है या नहीं। जब तुम अपरिपक्व होते हो और परीक्षणों का सामना कर रहे होते हो, तब तुम्हारा आत्मविश्वास बहुत ही निम्न होता है, और तुम ठीक-ठीक नहीं जान सकते हो कि वह क्या है जिसकी परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें करने की आवश्यकता है क्योंकि तुम्हें सत्य की एक सीमित समझ है। इन सबके बावजूद, तुम तब भी ईमानदारी से और सच्चाई से परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हो, परमेश्वर को अपना हृदय देने के लिए तैयार हो सकते हो,, परमेश्वर को अपना अधिपति बना सकते हो, और परमेश्वर को उन चीज़ों को अर्पित करने के लिए तैयार हो सकते हो जिन्हें तुम अत्यंत बहुमूल्य मानते हो। यही परमेश्वर को पहले से ही अपना हदय देना है। जब तुम अधिकाधिक धर्मोपदेश को सुनोगे, और तुम अधिकाधिक सत्य को समझोगे, तो तुम्हारी कद-काठी भी धीरे-धीरे परिपक्व हो जाएगी। वह मानक जिसकी माँग इस समय परमेश्वर तुमसे करता है वही नहीं रहती है जो तब थी जब तुम अपरिपक्व थे; वह उसकी अपेक्षा अधिक ऊँचे मानक की माँग करता है। जब धीरे-धीरे मनुष्य का हृदय परमेश्वर को दे दिया जाता है, तो यह परमेश्वर के निकटतर और निकटतर आ जाता है; जब मनुष्य सचमुच में परमेश्वर के निकट आ सकते हैं, तो उनके पास उत्तरोत्तर ऐसा हदय होता है जो उसका भय मानता है। परमेश्वर को इस प्रकार का हदय चाहिए।

जब परमेश्वर किसी का हदय पाना चाहता है, तो वह उन्हें अनगिनित परीक्षण देता है। इन परीक्षणों के दौरान, यदि परमेश्वर उस व्यक्ति के हदय को नहीं पाता है, और न ही वह यह देखता है कि इस व्यक्ति में कोई प्रवृत्ति है—कहने का अभिप्राय है कि वह यह नहीं देखता है कि यह व्यक्ति काम में लगा रहता है या उस तरह से व्यवहार करता है जो परमेश्वर का भय मानता है, और वह उस प्रवृत्ति तथा दृढ़ संकल्प को नहीं देखता है जो इस व्यक्ति से दुष्टता को दूर करता है। यदि यह ऐसा ही है, तो अनगिनित परीक्षणों के बाद, ऐसे व्यक्तियों के प्रति परमेश्वर का धैर्य टूट जाएगा, और वह ऐसे व्यक्तियों को अब और बर्दाश्त नहीं करेगा। वह उनके अब और परीक्षण नहीं करेगा, तथा वह उनमें अब और कार्य नहीं करेगा। तब उस व्यक्ति के परिणाम का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उनके पास कोई परिणाम नहीं होगा? यह संभव है कि ऐसे व्यक्तियों ने कुछ बुरा न किया हो। यह भी संभव है कि उन्होंने बाधित या परेशान करने के लिए कुछ न किया हो। यह भी संभव है कि उन्होंने खुलकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया हो? हालाँकि, ऐसे व्यक्तियों का हदय परमेश्वर से छिपा हुआ होता है। उनकी परमेश्वर के प्रति कभी भी कोई स्पष्ट प्रवृत्ति और दृष्टिकोण नहीं रहा है, और परमेश्वर स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता है कि उनका हदय परमेश्वर को दे दिया गया है, और वह स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता है कि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने का प्रयास कर रहा है? परमेश्वर के पास इन लोगों के लिए अब और धैर्य नहीं है, वह अब और कोई कीमत नहीं चुकाएगा, वह अब और दया नहीं करेगा, और वह उन पर अब और कार्य नहीं करेगा। ऐसे व्यक्ति के परमेश्वर में विश्वास का जीवन पहले ही बीत चुका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन सभी परीक्षणों में जो परमेश्वर ने इस व्यक्ति को दिए हैं, परमेश्वर ने उस परिणाम को प्राप्त नहीं किया है जो वह चाहता है। इस प्रकार, बहुत से लोग हैं जिनमें मैंने कभी भी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी को नहीं देखा है। इसे देखना कैसे संभव है? हो सकता है कि इस प्रकार के व्यक्तियों ने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया हो, और सतही तौर पर वे बहुत सक्रिय रहे हों। उन्होंने बहुत सी पुस्तकें पढ़ी हों, बहुत से मामलों को सँभाला हो, टिप्पणियों से 10 नोटबुक भर ली हों, और बहुत से पत्रों और सिद्धान्तों पर महारत हासिल कर ली हो। तथापि, इस व्यक्ति की ओर से कभी भी कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई, और कभी भी परमेश्वर के प्रति कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं रहा है, और न ही कोई स्पष्ट प्रवृत्ति रही है। अर्थात् तुम ऐसे व्यक्तियों के हदय को नहीं देख सकते हो। उनका हदय हमेशा लपेटा हुआ रहता है, उनका हृदय मुहरबंद होता है—यह परमेश्वर के प्रति मुहरबंद होता है, इसलिए परमेश्वर ने इस व्यक्ति के सच्चे हदय को नहीं देखा है, उसने परमेश्वर के प्रति इस व्यक्ति के सच्चे भय को नहीं देखा है, और इससे भी बढ़कर, उसने नहीं देखा है कि किस प्रकार यह व्यक्ति परमेश्वर के मार्ग में चलता है। यदि अब तक परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को प्राप्त नहीं किया है, तो क्या वह उन्हें भविष्य में प्राप्त कर सकता है? वह प्राप्त नहीं कर सकता है! क्या परमेश्वर उन चीज़ों के लिए प्रयास करता रहेगा जिन्हें प्राप्त नहीं किया जा सकता है? वह नहीं करेगा! तब इन लोगों के प्रति परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति क्या है? (वह उन्हें ठुकरा देता है, वह उन पर ध्यान नहीं देता है)। वह उन पर ध्यान नहीं देता है! परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति पर ध्यान नहीं देता है; वह उन्हें ठुकरा देता है। तुम लोगों ने इन वचनों को बहुत शीघ्रता से, बहुत सटीकता से याद कर लिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ तुम लोगों ने सुना है वह तुम लोगोंकी समझ में आ गया है!

कुछ लोग हैं जो, परमेश्वर के अनुसरण के आरम्भ में, अपरिपक्व और अज्ञानी होते हैं; वे परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हैं; वे परमेश्वर में विश्वास करने, परमेश्वर का अनुसरण करने के मानव-निर्मित और ग़लत मार्ग को अपनाते हुए, यह भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना क्या होता है। जब इस प्रकार के व्यक्ति का सामना किसी परीक्षण से होता है, तो वे इसके विषय में अवगत नहीं होते हैं, और वे परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के प्रति सुन्न होते हैं। वे नहीं जानते हैं कि परमेश्वर को अपना हृदय देना क्या होता है, और किसी परीक्षण के दौरान दृढ़ता से खड़ा रहना क्या होता है? परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को सीमित मात्रा में समय देगा, और इस समय के दौरान, वह उन्हें समझने देगा कि परमेश्वर का परीक्षण क्या है, और परमेश्वर के इरादे क्या हैं। बाद में, ऐसे व्यक्ति को अपना दृष्टिकोण प्रदर्शित करने की आवश्यकता होती है। ऐसे लोगों के बारे में जो इस चरण में हैं, परमेश्वर अभी भी प्रतीक्षा कर रहा है। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जिनके कुछ दृष्टिकोण तो हैं फिर भी आगे पीछे डगमगाते रहते हैं, जो अपना हदय परमेश्वर को देना तो चाहते हैं किन्तु ऐसा करने के लिए सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए हैं, जिन्होंने, यद्यपि कुछ मूल सच्चाईयों को अभ्यास में लगा लिया है, फिर भी किसी बड़े परीक्षण से सामने होने पर, वे उससे जी चुराते हैं और छोड़ देना चाहते हैं—इन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? परमेश्वर को ऐसे लोगों के प्रति अभी भी थोड़ी बहुत अपेक्षा है। परिणाम उनके दृष्टिकोणों एवं प्रदर्शनों पर निर्भर करता है। परमेश्वर किस प्रकार उत्तर देता है यदि लोग प्रगति करने के लिए सक्रिय नहीं होते हैं? वह त्याग देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे पहले कि परमेश्वर तुम्हें त्यागे, तुमने पहले ही स्वयं को त्याग दिया है। इस प्रकार, ऐसा करने के लिए तुम परमेश्वर को दोष नहीं दे सकते हो, क्या तुम दोष दे सकते हो? क्या यह उचित है? (हाँ उचित है)।

एक व्यावहारिक प्रश्न लोगों में सब प्रकार की शर्मिंदगियाँ लाता है

एक अन्य प्रकार के व्यक्ति हैं जिनके परिणाम सभी परिणामों से सबसे अधिक दुःखद होते हैं? ये ऐसे लोग हैं जिनकी चर्चा मैं कम से कम करना चाहता हूँ। यह दुःखद नहीं है क्योंकि ऐसे व्यक्ति परमेश्वर से दण्ड प्राप्त करते हैं, या यह कि उनसे की गई परमेश्वर की माँगें कठोर होती हैं और उनका दुःखद परिणाम होता है। बल्कि, यह दुःखद है क्योंकि वे इसे स्वयं के लिए करते हैं, जैसा कि प्रायः कहा जाता है: वे अपनी स्वयं की कब्र खोदते हैं? ये किस प्रकार के व्यक्ति हैं? ऐसे व्यक्ति सही पथ पर नहीं चलते हैं, और उनका परिणाम पहले से ही प्रकट हो जाता है? परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को अपनी घृणा के चरम लक्ष्य के रूप में देखता है? जैसा लोग इसका वर्णन करते हैं, ऐसे लोग सभी मनुष्यों में सबसे अधिक दुःखी होते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर का अनुसरण करने के आरम्भ में अत्यधिक उत्साहित रहते हैं; वे बहुत सी कीमतें चुकाते हैं, परमेश्वर के कार्य को देखने के नज़रिये पर उनकी एक अच्छी राय होती है; वे अपने स्वयं के भविष्य के बारे में कल्पनाओं से भरपूर होते हैं; वे विशेष रूप से परमेश्वर में आत्मविश्वास रखते हैं, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण कर सकता है, और मनुष्य को एक महिमामय मंज़िल में ले जा सकता है। फिर भी जिस किसी भी कारण से, ऐसे व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग जाते हैं। इसका क्या अभिप्राय है कि ऐसे व्यक्ति भाग जाते हैं? इसका अर्थ है कि वे बिना अलविदा कहे, बिना किसी आवाज़ के गायब हो जाते हैं। वे बिना कुछ कहे छोड़कर चले जाते हैं। यद्यपि इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करने का दावा करते हैं, फिर भी वे परमेश्वर पर विश्वास करने के पथ पर दृढ़ नहीं होते हैं। इस प्रकार, चाहे उन्होंने कितने लम्बे समय तक विश्वास क्यों न किया हो, क्योंकि वे अभी भी परमेश्वर से दूर जा सकते हैं। कुछ लोग व्यापार में जाने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ अपना जीवन जीने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ लोग धनवान बनने के लिए छोड़कर चले जाते हैं, कुछ लोग विवाह करने के लिए, संतान पाने के लिए छोड़कर चले जाते हैं।... जो चले जाते हैं उनमें से, कुछ ऐसे होते हैं जिनका विवेक उन्हें कचोटता है और वे वापस आना चाहते हैं, और कुछ अन्य होते हैं जो बहुत गरीबी में जीवन गुज़ारते है, और संसार में साल दर साल भटकते रहते हैं। इन भटकने वाले लोगों ने बहुत से कष्टों का अनुभव किया है, और वे मानते हैं कि इस संसार में रहना अति कष्टदायी है, और यह कि उन्हें परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है। वे आराम, शांति, एवं आनन्द पाने के लिए परमेश्वर के घर में लौटना चाहते हैं, और आपदाओं से बच निकलने, या बचाए जाने के लिए और एक खूबसूरत मंज़िल को पाने के लिए परमेश्वर में लगातार विश्वास करना चाहते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, कि परमेश्वर का अनुग्रह अक्षय है और यह कि इसे समाप्त नहीं किया जा सकता है। वे विश्वास करते हैं कि चाहे किसी व्यक्ति ने कुछ भी क्यों न किया हो, परमेश्वर को उन्हें क्षमा कर देना चाहिए और उनके अतीत के बारे में सहनशील होना चाहिए। ये लोग कहते हैं कि वे वापस आना और अपने कर्तव्य को करना चाहते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो अपनी सम्पत्ति के कुछ भाग कलीसिया को दान कर देते हैं, यह आशा करते हुए कि यह परमेश्वर के घर की ओर वापसी का उनका मार्ग है। इस प्रकार के व्यक्तियों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है? परमेश्वर को उनका परिणाम कैसे निर्धारित करना चाहिए? कृपया खुलकर बोलो। (सोचता था कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार करेगा, पर अभी-अभी इसे सुनने के बाद, हो सकता है वे फिर से स्वीकार नहीं किए जाएँगे)। और तुम्हारा तर्क क्या है? (इस प्रकार के व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष आते हैं ताकि उनका परिणाम मृत्यु का नहीं हो। वे सच्ची ईमानदारी से नहीं आते हैं। इसके बजाय, उस जानकारी से आते हैं कि परमेश्वर का कार्य शीघ्र पूरा हो जाएगा, वे आशीषों को पाने के भ्रम में रहते हैं।) तुम कह रहे हो कि ऐसे व्यक्ति ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, अतः परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं कर सकता है? क्या ऐसा है? (हाँ)। (मेरी समझ से इस प्रकार के व्यक्ति अवसरवादी होते हैं, और वे ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं)। वे परमेश्वर में विश्वास करने के लिए नहीं आए हैं; वे एक अवसरवादी हैं? सही कहा! ये अवसरवादी उस प्रकार के लोग है जिनसे हर कोई नफ़रत करता है। जिस किसी दिशा में हवा बहती है वे बस उस दिशा में बहते हैं, और तब तक किसी भी कार्य को करने की परवाह नहीं कर सकते हैं जब तक कि उन्हें उससे कुछ प्राप्त नहीं होता है। निश्चित रूप से वे घृणित हैं! क्या किसी अन्य भाई या बहन का कोई दृष्टिकोण है? (परमेश्वर उन्हें अब और स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि परमेश्वर का कार्य समाप्त होने ही वाला है और अब वह समय है जब लोगों के परिणाम तय किए जा रहे हैं। यही समय है कि ये लोग वापस आना चाहते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि वे वास्तव में सत्य की खोज करना चाहते हैं; वे इसलिए वापस आना चाहते हैं क्योंकि वे आपदाओं को उतरते हुए देखते हैं, या वे बाहरी कारकों के द्वारा प्रभावित हो रहे हैं। यदि उनके पास वास्तव में ऐसा हृदय होता जो सत्य की खोज करता, तो वे मार्ग के बीच में ही छोड़कर कभी नहीं भागे होते)। क्या कोई अन्य राय हैं? (उन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा। परमेश्वर ने वाकई उन्हें अवसर दिए, किन्तु परमेश्वर के प्रति उनकी प्रवृत्ति ऐसी थी कि वे उस पर हमेशा कोई ध्यान नहीं देते थे। ऐसे व्यक्तियों के इरादे चाहे कुछ भी क्यों न हों, और भले ही वे वास्तव में पश्चाताप क्यों न करें, परमेश्वर उन्हें तब भी स्वीकार नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें पहले से ही बहुत सारे अवसर दिए थे, फिर भी उन्होंने पहले ही अपनी प्रवृत्ति का प्रदर्शन कर दिया था: वे परमेश्वर को छोड़ देना चाहते थे। इसलिए, जब वे अब वापस आएँगे, तो परमेश्वर उन्हे स्वीकार नहीं करेगा)। (मैं भी यह स्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति ने सच्चे मार्ग को देख लिया है, इतनी लम्बी समयावधि तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लिया है, और तब भी संसार में वापस लौट सकता है, और शैतान के आलिंगन में वापस लौट सकता है, तो यह परमेश्वर के साथ एक बड़ा विश्वासघात है। इस तथ्य के बावजूद कि परमेश्वर का सार करुणा है, प्रेम है, यह उस बात पर निर्भर करता है इसे किस प्रकार के व्यक्ति पर निर्देशित किया जा रहा है। यदि ऐसा व्यक्ति आराम की खोज करने के लिए, किसी ऐसी चीज़ की खोज करने के लिए परमेश्वर के समक्ष आता है जिस पर अपनी आशा को रख सके, तो इस प्रकार का व्यक्ति बस उस किस्म का नहीं है जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है, और उनके प्रति परमेश्वर की दया केवल इतनी ही दूर तक ही जाती है)। परमेश्वर का सार करुणा है, अतः वह इस प्रकार के व्यक्ति को थोड़ी और करुणा क्यों नहीं देता है? थोड़ी सी करुणा के साथ, क्या तब उन्हें एक अवसर नहीं मिलता है? इससे पहले, प्रायः ऐसा कहा जाता था: परमेश्वर चाहता है कि प्रत्येक व्यक्ति उद्धार पाए, और नहीं चाहता है कि कोई भी तबाही को भुगते। यदि सौ में से एक भेड़ खो जाए, तो परमेश्वर निन्यानवे भेड़ों को छोड़ देगा और उस खोई हुई एक को खोजेगा। आजकल, इस प्रकार के व्यक्तियों के सम्बन्ध में, यदि यह परमेश्वर में उनके सच्चे विश्वास के वास्ते है, तो क्या परमेश्वर को उन्हें स्वीकार करना और उन्हें एक दूसरा अवसर देना चाहिए? यह वास्तव में एक कठिन प्रश्न नहीं है; यह बिलकुल सरल है! यदि तुम लोग सचमुच में परमेश्वर को समझते हो और तुम्हें परमेश्वर की वास्तविक समझ है, तो अधिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं है; और अधिक अनुमान लगाने की भी आवश्यकता भी नहीं है, ठीक है न? तुम लोगों के उत्तर सही मार्ग पर हैं, किन्तु अभी भी उनमें और परमेश्वर की प्रवृत्ति के बीच कुछ अन्तर है।

अभी-अभी तुम लोगों में से कुछ ऐसे थे जो इस बात से निश्चित थे कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्तियों को स्वीकार नहीं कर सकता है। अन्य लोग अधिक स्पष्ट नहीं थे, वे विश्वास करते थे कि हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें स्वीकार कर सकता है, और हो सकता है कि उन्हें स्वीकार नहीं भी कर सकता है—यह प्रवृत्ति कहीं अधिक मध्यम है; और फिर ऐसे लोग थे जिनका दृष्टिकोण था कि वे आशा करते थे कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को स्वीकार करता है—यह अस्पष्ट प्रवृत्ति है। निश्चित प्रवृत्ति वाले लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ने अब तक कार्य किया है और उसका कार्य पूर्ण है, अतः परमेश्वर को इन लोगों के बारे में सहिष्णु होने की आवश्यकता नहीं है, और वह उन्हें दोबारा स्वीकार नहीं करेगा। संयत लोग विश्वास करते हैं कि इन मामलों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार सँभाला जाना चाहिए: यदि ऐसे व्यक्तियों के हदय परमेश्वर से अविभाज्य हैं, और वे अभी भी ऐसे व्यक्ति हैं जो सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ऐसे व्यक्ति हैं जो सत्य की खोज करते हैं, तो परमेश्वर को उनकी पिछली दुर्बलताओं और दोषों को स्मरण नहीं करना चाहिए; उसे उन्हें क्षमा कर देना चाहिए, उन्हें एक अन्य अवसर देना चाहिए, उन्हें परमेश्वर के घर में वापस लौटने देना चाहिए, और परमेश्वर से उद्धार को ग्रहण करने देना चाहिए। हालाँकि, यदि ऐसा व्यक्ति एक बार फिर से भाग जाता है, तब परमेश्वर ऐसे व्यक्ति को अब और नहीं चाहता है और इसे उनके प्रति अन्याय करना नहीं माना जा सकता है। एक और समूह है जो आशा करता है कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को स्वीकार कर सकता है। यह समूह स्पष्ट रूप से नहीं जानता है कि परमेश्वर उन्हें स्वीकार कर रहा है या नहीं। यदि वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को उन्हें स्वीकार करना चाहिए, किन्तु परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं करता है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि वे परमेश्वर के दृष्टिकोण की अनुरूपता से थोड़ा बाहर हैं। यदि वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर को उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए, और परमेश्वर कहने लगता है कि मनुष्य के प्रति उसका प्रेम असीम है और यह कि वह इस व्यक्ति को एक और अवसर देने का इच्छुक है, तो क्या यह मानवीय अज्ञानता का ऐसा उदाहरण नहीं है जिसे प्रकट किया जा रहा है? किसी भी स्थिति में, तुम लोगों के अपने स्वयं के दृष्टिकोण होते हैं। तुम लोगों के अपने विचारों में ये दृष्टिकोण एक ज्ञान है; साथ ही वे सत्य की तुम लोगों की समझ और परमेश्वर के इरादों की तुम लोगों की समझ की गहराई का एक प्रतिबिम्ब भी हैं। अच्छा कहा, है न? यह अद्भुत है कि तुम लोगों के पास इस मसले पर राय हैं! परन्तु तुम लोगों की राय सही हैं या नहीं, इसमें अभी भी एक प्रश्न चिन्ह है। क्या तुम सभी लोग थोड़ा चिन्तित नहीं हो? "तो सही क्या है? मैं स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता हूँ, और वास्तव में नहीं जानता हूँ कि परमेश्वर क्या सोच रहा है? परमेश्वर ने मुझे कुछ भी नहीं बताया। मैं कैसे जान सकता हूँ कि परमेश्वर क्या सोच रहा है? मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति प्रेम है। अतीत की परमेश्वर की प्रवृत्ति के अनुसार, उसे इस व्यक्ति को स्वीकार करना चाहिए। किन्तु मैं परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति पर अधिक स्पष्ट नहीं हूँ—मैं केवल यह कह सकता हूँ कि हो सकता है कि वह ऐसे व्यक्ति को स्वीकार करेगा, और हो सकता है कि वह नहीं करेगा।" क्या यह बेतुका नहीं है? इसने तुम लोगों को वास्तव में चकरा दिया है। यदि इस मसले पर तुम लोगों के पास एक उचित नज़रिया नहीं है, तब तुम लोग क्या करोगे जब तुम लोगों की कलीसिया का सचमुच में इस प्रकार के व्यक्ति से सामना होगा? यदि तुम लोग इससे उचित तरीके से नहीं निपटोगे, तो हो सकता है कि तुम सब परमेश्वर का अपमान करोगे। क्या यह एक ख़तरनाक मामला नहीं है?

मैं अभी-अभी जिस पर चर्चा कर रहा था मैं क्यों उस पर तुम लोगों के दृष्टिकोण के बारे में पूछना चाहता हूँ? मैं तुम लोगों के दृष्टिकोणों को जाँचना चाहता हूँ, जाँचना चाहता हूँ कि तुम लोगों को परमेश्वर का कितना ज्ञान है, तुम लोगों को पास परमेश्वर के इरादों और परमेश्वर की प्रवृत्ति का कितना ज्ञान है। उत्तर क्या है? उत्तर तुम लोगों के दृष्टिकोणों में निहित है। तुम लोगों में से कुछ बहुत रूढ़िवादी हैं, और तुम लोगों में से कुछ लोग अन्दाज़ा लगाने के लिए अपनी कल्पनाओं का उपयोग कर रहे हैं। "अन्दाज़ा लगाना" क्या है? यह तब होता है जब तुम लोगों के पास कोई विचार नहीं होता है कि किस प्रकार परमेश्वर सोचता है, अतः तुम सब निराधार विचारों के साथ सामने आते हो कि परमेश्वर को किस प्रकार इस तरह से या उस तरह से सोचना चाहिए। तुम लोगों को वास्तव में पता नहीं होता है कि तुम्हारा अनुमान सही है या ग़लत, अतः तुम सब अस्पष्ट दृष्टिकोण को प्रकट करते हो। इस तथ्य का सामना होने पर, तुम लोग क्या देखते हो? परमेश्वर का अनुसरण करते समय, लोग कभी कभार ही परमेश्वर के इरादों पर ध्यान देते हैं, और कभी कभार ही परमेश्वर के विचारों और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति पर ध्यान देते हैं। तुम लोग परमेश्वर के विचारों को नहीं समझते हो, अतः जब ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनमें परमेश्वर के इरादे शामिल होते हैं, और परमेश्वर का स्वभाव शामिल होता है, तो तुम लोग गड़बड़ा जाते हो; और अत्यंत अनिश्चित हो जाते हो, और तुम लोग या तो अन्दाज़ा लगाते हो या दाँव लगाते हो। यह प्रवृत्ति क्या है? यह इस तथ्य को साबित करता है: परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोग उसे खाली हवा के रूप में, अव्यक्त के रूप में मानते हैं। मैं इसे इस प्रकार से क्यों कहता हूँ? क्योंकि जब भी तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है, तब तुम लोग परमेश्वर के इरादों को नहीं जानते हो। तुम लोग क्यों नहीं जानते हो? ऐसा नहीं है कि तुम लोग बस अभी नहीं जानते हो। इसके बजाय, आरम्भ से लेकर अंत तक तुम लोग नहीं जानते हो कि इस मामले के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है। उन समयों में जब तुम परमेश्वर की प्रवृत्ति को नहीं देख सकते और नहीं जान सकते हो, क्या तुमने उस पर विचार किया है? क्या तुमने इसकी खोज की है? क्या तुमने उसका संवाद किया है? नहीं! यह एक तथ्य की पुष्टि करता है: तुम्हारे विश्वास का परमेश्वर और सच्चा परमेश्वर आपस में सम्बद्ध नहीं हैं। तुम, जो परमेश्वर पर विश्वास करते हो, केवल अपनी स्वयं की इच्छा पर विचार करते हो, केवल अपने अगुवों की इच्छा का विचार करते हो, और परमेश्वर के वचन के केवल सतही एवं सैद्धान्तिक अर्थ पर विचार करते हो, किन्तु सचमुच में परमेश्वर की इच्छा को जानने और खोजने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं करते हो। क्या ऐसा ही नहीं होता है? इस मामले का सार डरावना है! बहुत वर्षों से, मैंने बहुत से लोगों को देखा है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यह विश्वास कौन सा आकार लेता है? कुछ लोग परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह खाली हवा हो। इन लोगों के पास परमेश्वर के अस्तित्व के प्रश्नों के बारे में कोई उत्तर नहीं होता है क्योंकि वे परमेश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थिति को महसूस नहीं कर सकते हैं या उससे अवगत नहीं होते हैं, इसे साफ-साफ देखने या समझने की तो बात ही छोड़ दो। अवचेतन रूप से, ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर अस्तित्व में नहीं है। कुछ अन्य परमेश्वर में ऐसा विश्वास करते हैं मानो वह एक मनुष्य हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन सभी कार्यों को कार्य करने में असमर्थ है जिन्हें करने में वे असमर्थ हैं, और यह कि परमेश्वर को वैसा ही सोचना चाहिए जैसा वे सोचते हैं। इस व्यक्ति की परमेश्वर की परिभाषा यह है कि वह "एक अदृश्य और अस्पर्शनीय व्यक्ति" है। लोगों का एक समूह ऐसा भी है जो परमेश्वर में ऐसे विश्वास करता है मानो वह एक कठपुतली हो। ये लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के पास कोई भावनाएँ नहीं हैं, यह कि परमेश्वर एक मूर्ति है। जब किसी मसले से सामना होता है, तो परमेश्वर के पास कोई प्रवृत्ति, कोई दृष्टिकोण, कोई विचार नहीं होता है; वह मनुष्य की दया पर निर्भर है। लोग बस वैसा ही विश्वास करते हैं जैसा वे विश्वास करना चाहते हैं। यदि वे उसे महान बनाते हैं, तो वह महान है; यदि वे उसे छोटा बना देते है, तो वह छोटा है। जब लोग पाप करते हैं और उन्हें परमेश्वर की दया की आवश्यकता होती है, परमेश्वर की सहिष्णुता की आवश्यकता होती है, परमेश्वर के प्रेम की आवश्यकता होती है, तो परमेश्वर को अपनी दया प्रदान करनी चहिए। इन लोगों ने अपने स्वयं के मन में एक परमेश्वर को गढ़ लिया है, और इस परमेश्वर से अपनी माँगों को पूरा करवाते हैं और अपनी सभी अभिलाषाओं को संतुष्ट करवाते हैं। चाहे यह व्यक्ति कभी भी या कहीं भी क्यों न करे, और चाहे कुछ भी क्यों न करे, वे परमेश्वर के प्रति अपने व्यवहार में, और परमेश्वर में अपने विश्वास में इस कल्पना को अपनाएँगे। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि जब वे परमेश्वर के स्वभाव को भड़का देते हैं उसके पश्चात् परमेश्वर उनका उद्धार कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे मानते हैं कि परमेश्वर का प्रेम असीम है, परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, और चाहे लोग परमेश्वर का कैसे भी अपमान क्यों न करें, परमेश्वर उनमें से किसी का भी स्मरण नहीं करेगा। चूँकि मनुष्य के दोष, मनुष्य के अपराध, और मनुष्य की अवज्ञा उस व्यक्ति के स्वभाव की क्षणिक अभिव्यक्तियाँ हैं, इसलिए परमेश्वर लोगों को अवसर देगा, और उनके साथ सहिष्णु एवं धैर्यवान रहेगा। परमेश्वर तब भी उनसे पहले के समान ही प्रेम करेगा। अतः उनके उद्धार की आशा अभी भी महान है। वास्तव में, चाहे कोई व्यक्ति परमेश्वर पर किसी भी प्रकार से विश्वास क्यों न करें, अगर वे सत्य की खोज नहीं कर रहे हैं, तो परमेश्वर उनके प्रति नकारात्मक प्रवृत्ति रखता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जब तुम परमेश्वर पर विश्वास कर रहे होत हो उस समय, हो सकता है कि तुम परमेश्वर के वचन की पुस्तक को संजोकर रखते हो, तुम प्रतिदिन उसका अध्ययन कर रहे होते हो, तुम हर दिन इसे पढ़ते हो, किन्तु तुम वास्तविक परमेश्वर को अलग रख देते हो, तुम उसे खाली हवा के रूप में मानते हो, उसे एक व्यक्ति के रूप में मानते हो, और तुममें से कुछ लोग उसे केवल एक कठपुतली के रूप में मानते हों। मैं इसे इस प्रकार क्यों कहता हूँ? क्योंकि जिस प्रकार से मैं इसे देखता हूँ, तो इसकी परवाह किए बिना कि तुम लोगों का सामना किसी मसले से होता है या आमना-सामना किसी परिस्थितियों से होता है, वे बातें जो तुम लोगों के अवचेतन मन में मौजूद होती हैं, वे बातें जो भीतर ही भीतर विकसित होती हैं—उनमें से किसी का भी सम्बन्ध परमेश्वर के वचन से या सत्य की खोज करने से नहीं होता है? तुम केवल वही जानते हो जो तुम स्वयं सोच रहे हो, और जो तुम्हारे स्वयं के दृष्टिकोण हैं, और फिर तुम्हारे स्वयं के विचारों, और तुम्हारे स्वयं के दृष्टिकोणों को परमेश्वर के ऊपर ज़बरदस्ती थोप दिया जाता है। वे परमेश्वर के दृष्टिकोण बन जाते हैं, जिन्हें ऐसे मानकों के रूप में उपयोग किया जाता है जिनके मुताबिक बिना डाँवाडोल हुए चला जाता है। समय के साथ, इस प्रकार आगे बढ़ना तुम्हें परमेश्वर से दूर और दूर करता जाता है।

परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझें और परमेश्वर के बारे में सभी गलत धारणाओं को छोड़ दें

यह परमेश्वर जिस पर तुम लोग वर्तमान में विश्वास करते हो, क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है कि यह किस प्रकार का परमेश्वर है? जब वह किसी दुष्ट व्यक्ति को दुष्ट कार्य करते हुए देखता है, तो क्या वह उससे घृणा करता है? (वह उससे घृणा करता है)। जब वह अज्ञानी लोगों की ग़लतियों को देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (उदासी)। जब वह लोगों को उसकी भेटों को चुराते हुए देखता है, तो उसकी प्रवृत्ति क्या होती है? (वह उनसे घृणा करता है)। यह सब बिलकुल साफ है, है न? जब वह किसी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास में लापरवाह होते हुए, और किसी भी तरह से सत्य की खोज नहीं करते हुए देखता है, तो परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है? तुम लोग इस पर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो, है न? लापरवाही ऐसी प्रवृत्ति है जो पाप नहीं है, और यह परमेश्वर का अपमान करना नहीं है। लोग मानते हैं कि इसे एक गहरी भूल नहीं मानना चाहिए। तब तुम्हें क्या लगता है कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है? (वह इसका उत्तर देने के लिए तैयार नहीं है)। इसका उत्तर देने के लिए तैयार नहीं है—यह कैसी प्रवृत्ति है? यह ऐसी है कि परमेश्वर इन लोगों को तुच्छ मानता है, और इन लोगों का तिरस्कार करता है! परमेश्वर जानबूझकर कोई ध्यान न देने के द्वारा ऐसे लोगों से निपटता है। उसका तरीका है उन्हें दरकिनार करना, उन पर ऐसे किसी कार्य में संलग्न नहीं होना, जिसमें प्रबुद्धता, रोशनी, ताड़ना या अनुशासन शामिल है। इस प्रकार के व्यक्ति की परमेश्वर के कार्य में गिनती नहीं की जाती है। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होती है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करते हैं, और उसके प्रशासनिक आदेशों का अपमान करते हैं? चरम घृणा! परमेश्वर ऐसे लोगों से अत्यंत क्रोधित होता है जो उसके स्वभाव को क्रोधित करने के बारे में पश्चातापी नहीं हैं! "क्रोधित होना" मात्र एक अनुभूति, एक मनोदशा है; यह एक स्पष्ट प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है। परन्तु यह अनुभूति, यह मनोदशा, इस व्यक्ति के लिए एक परिणाम उत्पन्न करती है: यह परमेश्वर को चरम घृणा से भर देगा! इस अत्यंत चरम का परिणाम क्या है? यह ऐसा है कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को दरकिनार कर देगा, और फिलहाल उन्हें कोई उत्तर नहीं देगा। वह प्रतिफल के दौरान उन्हें छाँटकर अलग कर दिए जाने के लिए उनकी प्रतीक्षा करेगा। इसका क्या तात्पर्य है? क्या इस व्यक्ति का अभी भी कोई परिणाम है? परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्ति को कभी भी कोई परिणाम देने का इरादा नहीं किया था! तो तब क्या यह सामान्य बात नहीं है कि परमेश्वर वर्तमान में इस प्रकार के व्यक्ति को कोई उत्तर नहीं देता है? (हाँ)। अब इस प्रकार के व्यक्ति को किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए? उन्हें उन नकारात्मक परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो उनके व्यवहार एवं उनके द्वारा की गई दुष्टता के द्वारा उत्पन्न हुए हैं। इस प्रकार के व्यक्ति के लिए यह परमेश्वर का उत्तर है। इसलिए अब मैं इस प्रकार के व्यक्ति से साफ-साफ कहता हूँ: भ्रान्तियों को अब और पकड़े न रहो, और ख्याली पुलाव पकाने में अब और मत लगे रहो। परमेश्वर अनिश्चित काल तक लोगों के प्रति सहिष्णु नहीं रहेगा। वह अनिश्चित काल तक उनके अपराधों और अवज्ञा को सहन नहीं करेगा। कुछ लोग कहेंगे: "मैंने भी इस प्रकार के कुछ लोगों को देखा है। जब वे प्रार्थना करते हैं तो उन्हें विशेष रूप से परमेश्वर द्वारा स्पर्श किया जाता है, और वे फूट-फूट कर रोते हैं? सामान्यतया वे खुश भी बहुत रहते हैं; ऐसा प्रतीत होता है कि उनके पास परमेश्वर की उपस्थिति, और परमेश्वर का मार्गदर्शन है।" ऐसी बेतुकी बातें मत करो! फूट-फूट कर रोना आवश्यक रूप से परमेश्वर के द्वारा स्पर्श किया जाना या परमेश्वर की उपस्थिति होना नहीं है, परमेश्वर के मार्गदर्शन की तो बात ही छोड़ दो। यदि लोग परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उनका मार्गदर्शन करेगा? संक्षेप में, जब परमेश्वर ने किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करने, उनका परित्याग करने का निर्धारण कर लिया है, तो उस व्यक्ति के पास पहले से ही कोई परिणाम नहीं होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जब वे प्रार्थना करते हैं तो वे स्वयं के बारे में कितना आत्मसंतुष्ट महसूस करते हैं, और उनके हृदय में परमेश्वर के प्रति कितना आत्मविश्वास है; यह पहले से ही महत्वहीन है। महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर को इस प्रकार के आत्मविश्वास की आवश्यकता नहीं है, कि परमेश्वर ने पहले से ही ऐसे व्यक्तियों को ठुकरा दिया है। उनके साथ बाद में कैसे निपटा जाए यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। जो महत्वपूर्ण है वह है कि जिस क्षण वह व्यक्ति परमेश्वर को क्रोधित करता है, उसका परिणाम पहले ही निर्धारित हो जाता है। यदि परमेश्वर ने इस प्रकार के व्यक्तियों को नहीं बचाना निर्धारित कर दिया है, तब उन्हें दण्डित होने के लिए पीछे छोड़ दिया जाएगा। यह परमेश्वर की प्रवृत्ति है।

यद्यपि परमेश्वर के सार का एक हिस्सा प्रेम है, और वह हर एक के प्रति दयावान है, फिर भी लोग उस बात की अनदेखी करते हैं और उसे भूल जाते हैं कि उसका सार महिमा भी है। यह कि उसके पास प्रेम है इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग मुक्तभाव से उसका अपमान कर सकते हैं और उसे कोई अनुभूति या कोई प्रतिक्रियाएँ नहीं होती है। यह कि उसके पास करुणा है इसका अर्थ यह नहीं है कि जिस प्रकार लोगों से व्यवहार करता है उसमें उसके कोई सिद्धान्त नहीं है। परमेश्वर जीवित है; वह सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई कल्पना की गई कठपुतली या कुछ और नहीं है। चूँकि वह अस्तित्व में है, इसलिए हमें हर समय सावधानीपूर्वक उसके हृदय की आवाज़ सुननी चाहिए, उसकी प्रवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें लोगों की कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, और हमें लोगों के विचारों और इच्छाओं को परमेश्वर के ऊपर नहीं थोपना चाहिए, और जिस प्रकार परमेश्वर मनुष्यजाति से व्यवहार करता है उसमें परमेश्वर से मनुष्य की शैली और सोच को काम में नहीं लगवाना चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम परमेश्वर को क्रोधित कर रहे हो, तुम परमेश्वर के कोप को फुसला रहे हो, और तुम परमेश्वर की महिमा को चुनौती दे रहे हो! इस प्रकार, तुम लोगों के इस मसले की गंभीरता को समझ लेने के पश्चात्, मैं यहाँ तुम लोगों में से हर एक से उसके कार्यकलापों में सावधान और विवेकी होने का आग्रह करता हूँ। अपने बोलने में सावधान और विवेकी रहो। और जिस तरह तुम लोग परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो उसके बारे में, तुम लोग जितना अधिक सावधान और विवेकी रहते हो, उतना ही बेहतर है! जब तुम्हारी समझता में नहीं आता है कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है, तो लापरवाही से बात मत करो, अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत बनो, और लापरवाही से उपनाम मत रखो। इससे भी अधिक, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर मत पहुँचो। इसके बजाय, तुम्हें प्रतीक्षा और खोज करनी चाहिए; यह भी परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की अभिव्यक्ति है। यदि तुम सब बातों से बढ़कर इस स्थिति को प्राप्त कर सकते हो, और सब से बढ़कर इस प्रवृत्ति को धारण कर सकते हो, तब परमेश्वर तुम्हारी मूर्खता, तुम्हारी अज्ञानता, और तर्कहीनता के लिए तुम्हें दोष नहीं देगा। इसके बजाय, परमेश्वर को अपमानित करने के तुम्हारे भय, परमेश्वर के इरादों के प्रति तुम्हारे सम्मान, और परमेश्वर का आज्ञापालन करने की तुम्हारी तत्परता की प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर तुम्हें स्मरण करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा और तुम्हें प्रबुद्धता देगा, या तुम्हारी अपरिपक्वता और अज्ञानता को सहन करेगा। इसके विपरीत, यदि उसके प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति श्रद्धा विहीन होती है—मनमाने ढंग से परमेश्वर की आलोचना करना, मनमाने ढंग से परमेश्वर के विचारों का अनुमान लगाना और उन्हें परिभाषा करना—तो परमेश्वर तुम्हें अपराधी ठहराएगा, अनुशासित करेगा, और यहाँ तक कि दण्ड भी देगा; या वह तुम्हें कोई कथन कहेगा। कदाचित् यह कथन तुम्हारे परिणाम को सम्मिलित करता हो। इसलिए, मैं एक बार फिर से इस पर जोर देना, और उपस्थित हर एक व्यक्ति को सूचित करना चाहता हूँ कि हर वह चीज़ जो परमेश्वर की ओर से आती है उसके प्रति सावधान और विवेकी रहो। लापरवाही से मत बोलो, और अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत रहो। इससे पहले कि तुम कुछ कहो, तुम्हें सोचना चाहिए: क्या ऐसा करना परमेश्वर को क्रोधित करेगा? क्या ऐसा करना परमेश्वर का भय मानना है? यहाँ तक कि साधारण मामलों में भी, तुम्हें वास्तव में तब भी इन प्रश्नों को समझना चाहिए, और वास्तव में उन पर विचार करना चाहिए। यदि तुम हर जगह, सभी चीज़ों में, और हर समय, इन सिद्धान्तों के अनुसार सचमुच में अभ्यास कर सकते हो, विशेषरूप से उन मामलों के संबंध से जो तुम्हारी समझ में नहीं आते हैं, तो परमेश्वर हमेशा तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें हमेशा अनुसरण करने के लिए एक मार्ग देगा। चाहे लोग कुछ भी प्रदर्शित क्यों न कर रहे हों, परमेश्वर इस सब को स्पष्ट रूप से और सरल रूप से देखता है, और वह तुम्हें इन प्रदर्शनों का सटीक और उपयुक्त मूल्यांकन प्रदान करेगा। जब तुम अंतिम परीक्षण का अनुभव कर लेते हो उसके पश्चात्, परमेश्वर तुम्हारे समस्त व्यवहार को लेगा और तुम्हारा परिणाम निर्धारित करने के लिए इसे पूरी तरह से सारांशित करेगा। यह परिणाम बिना किसी लेशमात्र सन्देह के हर एक को आश्वस्त करेगा। जो कुछ मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ वह है कि तुम लोगों का हर कर्म, तुम लोगों का हर कार्यकलाप, और तुम लोगों का हर विचार तुम लोगों के भाग्य को निर्धारित करेगा।

मनुष्य के परिणाम को कौन निर्धारित करता है

एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है, और वह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति निर्णायक है! यह निर्धारित करती है कि तुम लोग विनाश की ओर जाओगे, या उस सुन्दर मंज़िल की ओर जाओगे जिसे परमेश्वर ने तुम लोगों के लिए तैयार किया है। राज्य के युग में, परमेश्वर ने पहले से ही 20 से अधिक वर्षों तक कार्य किया है, और इन 20 वर्षों के दौरान कदाचित् तुम लोगों का हृदय तुम्हारे प्रदर्शन के बारे में थोड़ा बहुत अनिश्चित रहा हो। हालाँकि, परमेश्वर के हृदय में, उसने तुम लोगों में से हर एक व्यक्ति का एक वास्तविक एवं सच्चा अभिलेख बनाया है। शुरुआत में उस समय से लेकर जब हर एक व्यक्ति ने परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके उपदेश को सुनना, अधिक से अधिक सच्चाई को समझना शुरू किया था, उस समय तक जब वे अपने कर्तव्य को निभाते हैं—परमेश्वर के पास इन प्रदर्शनों में से हर एक का अभिलेख है। जब कोई अपने कर्तव्य को निभाता है, जब उनका सामना सभी प्रकार की परिस्थितियों, सभी प्रकार के परीक्षणों से होता है, तो ऐसे व्यक्तियों की प्रवृत्ति क्या होती है? वे किस प्रकार प्रदर्शन करते हैं? वे अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति कैसा महसूस करते हैं? ... परमेश्वर के पास इन सभी चीज़ों का लेखा, इन सबका अभिलेख है? कदाचित् तुम लोगों के दृष्टिकोण से, ये मामले भ्रमित करने वाले हों। हालाँकि, जहाँ परमेश्वर खड़ा है वहाँ से, वे सभी मामले बिलकुल स्पष्ट हैं, और लापरवाही का जरा सा भी संकेत नहीं है। यह ऐसा मामला है जो हर एक व्यक्ति के परिणाम को, और साथ ही उसके भाग्य और भविष्य की संभावनाओं को सम्मिलित करता है। इससे भी बढ़कर, यह वह स्थान है जहाँ परमेश्वर अपने सभी श्रमसाध्य प्रयासों को व्यय करता है। इस प्रकार परमेश्वर इसकी जरा सी भी उपेक्षा करने का साहस नहीं करता है, और किसी भी लापरवाही को बर्दाश्त नहीं करेगा। शुरुआत से लेकर बिलकुल अन्त तक परमेश्वर मनुष्यजाति के इस हिसाब-किताब को अभिलिखित कर रहा है, मनुष्य के परमेश्वर का अनुसरण करने के पूरे मार्ग को अभिलिखित कर रहा है। ऐसे समय में परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति तुम्हारा भाग्य तय करेगी। क्या यह सही नहीं है? अब, क्या तुम लोग विश्वास करते हो कि परमेश्वर धार्मिक है? क्या परमेश्वर के कार्य उचित हैं? क्या तुम लोगों के दिमाग में अभी भी परमेश्वर की कोई दूसरी तस्वीर है? (नहीं)। फिर क्या तुम लोग कहते हो कि मनुष्य का परिणाम वह है जो परमेश्वर तय करता है या मनुष्य स्वयं तय करता है? (इसे परमेश्वर तय करता है)। वह कौन है जो उसे तय करता है? (परमेश्वर)। तुम लोग निश्चित नहीं हो, क्या तुम लोग हो? हांग कांग की कलीसियाओं के भाईयों और बहनों, बोलो—इसे कौन तय करता है? (मनुष्य स्वयं इसे तय करता है)। मनुष्य स्वयं इसे तय करता है? तब क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका परमेश्वर के साथ कोई लेना देना नहीं है? कोरियाई कलीसियाओं की ओर से कौन बोलना चाहता है? (परमेश्वर मनुष्य के सभी कार्यकलापों और कर्मों के आधार पर, और उस मार्ग के आधार पर जिस पर वे चलते हैं उनके परिणाम निर्धारित करता है)। यह बिलकुल वस्तुनिष्ठ प्रत्युत्तर है। यहाँ एक तथ्य है जिसे मुझे तुम सब लोगों को सूचित अवश्य करना चाहिए: परमेश्वर के उद्धार के कार्य के दौरान, वह मनुष्य के लिए एक मानक निर्धारित करता है। यह मानक ऐसा है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन का पालन कर सकता है, और परमेश्वर के मार्ग में चल सकता है? यही वह मानक है जिसे मनुष्य के परिणाम को तौलने के लिए उपयोग किया जाता है। यदि तुम परमेश्वर के इस मानक के अनुसार अभ्यास करते हो, तो तुम एक अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकते हो; यदि तुम नहीं करते हो, तो तुम एक अच्छा परिणाम नहीं प्राप्त कर सकते हो। तब वह कौन है जिसके लिए तुम कहते हो कि वह इस परिणाम को तय करता है? यह केवल परमेश्वर ही नहीं है जो इसे तय करता है, बल्कि इसके बजाय परमेश्वर और मनुष्य साथ मिलकर तय करते हैं। क्या यह सही है? (हाँ)। ऐसा क्यों है? क्योंकि यह परमेश्वर ही है जो सक्रिय रूप से मनुष्यजाति के उद्धार के कार्य में शामिल होना चाहता है, और मनुष्य के लिए एक खूबसूरत मंज़िल तैयार करना चाहता है; मनुष्य परमेश्वर के कार्य का लक्ष्य है, और यह परिणाम, यह मंज़िल ऐसी है जिसे परमेश्वर मनुष्य के लिए तैयार करता है। यदि उसके कार्य का कोई लक्ष्य नहीं होता, तो परमेश्वर को इस कार्य को करने की कोई आवश्यकता नहीं होती; यदि परमेश्वर ने इस कार्य को नहीं किया होता, तो मनुष्य के पास उद्धार पाने का कोई अवसर नहीं होता। मनुष्य ही उद्धार का लक्ष्य है, और यद्यपि इस प्रक्रिया में मनुष्य निष्क्रिय पक्ष है, फिर भी इस पक्ष की प्रवृत्ति ही है जो यह निर्धारित करती है कि मनुष्यजाति का उद्धार करने के अपने कार्य में परमेश्वर सफल होगा या नहीं? यदि वह मार्गदर्शन नहीं होता जिसे परमेश्वर तुम्हें देता है, तो तुम उसके मानक को नहीं जान पाते, और तुम्हारे पास कोई उद्देश्य नहीं होता। यदि तुम्हारे पास यह मानक, यह उद्देश्य है, फिर भी तुम सहयोग नहीं करते हो, तुम इसे अभ्यास में नहीं लाते हो, तुम क़ीमत नहीं चुकाते हो, तो तब भी तुम इस परिणाम को प्राप्त नहीं करोगे। इसीलिए हम कहते हैं कि इस परिणाम को परमेश्वर से अलग नहीं किया जा सकता है, और इसे मनुष्य से अलग नहीं किया जा सकता है। और अब तुम लोग जानते हो कि मनुष्य के परिणाम को कौन तय करता है।

लोग अनुभव के आधार पर परमेश्वर को परिभाषित करने की ओर प्रवृत्त होते हैं

परमेश्वर को जानने के विषय में वार्तालाप करते समय, क्या तुम लोगों ने किसी चीज़ पर ध्यान दिया है? क्या तुम लोगों ने ध्यान दिया है कि परमेश्वर की वर्तमान प्रवृत्ति एक परिवर्तन से होकर गुज़री है? क्या मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति अपरिवर्तनीय है? क्या परमेश्वर हमेशा इसी तरह से सहता रहेगा, अनिश्चित काल तक मनुष्य को अपना समस्त प्रेम और करुणा प्रदान करता रहेगा? इस मामले में परमेश्वर का सार भी शामिल होता है। आइए हम पहले से तथाकथित फजूल-खर्च पुत्र के प्रश्न की ओर वापस लौटें। जब इस प्रश्न को पूछा गया था उसके पश्चात्, तुम लोगों के उत्तर बहुत स्पष्ट नहीं थे। दूसरे शब्दों में, तुम लोग अभी भी परमेश्वर के इरादों को अच्छी तरह से नहीं समझते हो। जब एक बार लोग यह जान जाते हैं कि परमेश्वर मनुष्यजाति से प्रेम करता है, तो वे परमेश्वर को प्रेम के एक प्रतीक के रूप में परिभाषित करते हैं: चाहे लोग कुछ भी क्यों न करें, चाहे वे किसी भी प्रकार से व्यवहार करें, चाहे वे परमेश्वर से कैसा ही व्यवहार क्यों न करें, चाहे वे कितने ही अवज्ञाकारी क्यों न हों, इनमें से किसी भी चीज़ से फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि परमेश्वर के पास प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम असीमित और अथाह है। परमेश्वर के पास प्रेम है, इसलिए वह लोगों के साथ सहिष्णु हो सकता है; परमेश्वर के पास प्रेम है, इसलिए वह लोगों के प्रति करुणावान हो सकता है, उनकी अपरिपक्वता के प्रति करुणावान हो सकता है, उनकी अज्ञानता के प्रति करुणावान हो सकता है। और उनकी अवज्ञा के प्रति करुणावान हो सकता है। क्या यह वास्तव में इसी तरह से है? कुछ लोगों के लिए, जब वे एक बार, या कुछ बार, परमेश्वर के धैर्य का अनुभव कर लेते हैं, तो वे, यह विश्वास करते हुए कि परमेश्वर उनके प्रति सदैव धैर्यवान रहेगा, उनके प्रति सदैव दयावान रहेगा, परमेश्वर के बारे में अपनी स्वयं की समझ में उसके साथ एक पूँजी के रूप में बर्ताव करते हैं, और वे अपने जीवन के दौरान परमेश्वर के धैर्य को अपनाएँगे और उसे एक मानक के रूप में मानेंगे कि किस प्रकार परमेश्वर उनके साथ बर्ताव करता है। ऐसे भी लोग हैं जो, जब वे एक बार परमेश्वर की सहिष्णुता का अनुभव कर लेते हैं, तो हमेशा परमेश्वर को सहिष्णुता के रूप में परिभाषित करेंगे, और यह सहिष्णुता अनिश्चित है, बिना किसी शर्त के है, और यहाँ तक कि पूरी तरह से असैद्धांतिक है। क्या ये विश्वास सही हैं? हर बार जब परमेश्वर के सार या परमेश्वर के स्वभाव के मामलों की चर्चा की जाती है, तो तुम लोग घबराए हुए दिखाई देते हो। तुम लोगों को इस प्रकार देखना मुझे थोड़ा क्रोधित करता है। तुम लोगों ने परमेश्वर के सार के बारे में बहुत सी सच्चाईयों को सुना है; तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव से सम्बन्धित बहुत से विषयों को भी सुना है। हालाँकि, तुम लोगों के मन में ये मामले और इन पहलुओं की सच्चाई, सिद्धांत और लिखित वचनों पर आधारित मात्र स्मृतियाँ हैं। तुम लोगों में से कोई भी यह अनुभव करने में सक्षम नहीं है कि तुम लोगों के वास्तविक जीवन में परमेश्वर का स्वभाव क्या है, और न ही तुम लोग बस यह देख सकते हो कि परमेश्वर का स्वभाव क्या है। इसलिए, तुम सभी लोग अपने-अपने विश्वास में गड़बड़ा गए हो, तुम सब लोग आँखें मूँदकर उस हद तक विश्वास करते हो, कि तुम लोगों की परमेश्वर के प्रति श्रद्धाहीन प्रवृत्ति है, कि तुम लोग उसे एक ओर धकेल देते हो। तुम लोगों की परमेश्वर के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति किस ओर ले जाती है? यह उस ओर ले जाती है जहाँ तुम लोग हमेशा परमेश्वर के बारे में निष्कर्ष बनाते हो। एक बार जब तुम लोगों को थोड़ा सा ज्ञान मिल जाता है, तो तुम लोग अत्यंत संतुष्ट महसूस करते हो, तुम लोग महसूस करते हो कि तुम लोगों ने परमेश्वर को उसकी सम्पूर्णता में पा लिया है। उसके बाद, तुम लोग निष्कर्ष निकालते हो कि परमेश्वर ऐसा ही है, और तुम लोग उसे स्वतन्त्र रूप से चलने नहीं देते हो। और जब कभी भी परमेश्वर कुछ नया करता है, तो तुम लोग बस स्वीकार नहीं करते हो कि वह परमेश्वर है। एक दिन, जब परमेश्वर कहेगा: "मैं मनुष्य से अब और प्रेम नहीं करता हूँ; मैं मनुष्य को अपनी दया अब और प्रदान नहीं करता हूँ; मनुष्य के प्रति मेरे पास अब और सहिष्णुता या धैर्य नहीं है; मैं मनुष्य के प्रति अत्यंत घृणा एवं चिढ़ से भर गया हूँ", तो लोग अपने हृदय की गहराईयों से इस प्रकार के कथन से असहमत होंगे। कुछ लोग तो यहाँ तक भी कहेंगे कि: "तू अब और मेरा परमेश्वर नहीं हो, तू अब और वह परमेश्वर नहीं है जिसका मैं अनुसरण करना चाहता हूँ। यदि तू यही कहता है, तो तू अब और मेरे परमेश्वर होने के योग्य नहीं है, और मुझे तेरा अनुसरण करते रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तू मुझे करुणा नहीं देता है, मुझे प्रेम नहीं देता है, मुझे सहिष्णुता नहीं देता है, तो मैं अब और तेरा अनुसरण नहीं करूँगा। यदि तू अनिश्चित काल तक मेरे प्रति सहिष्णु बना रहता है, और हमेशा मेरे साथ धैर्यवान रहता है, और मुझे यह देखने देता है कि तू प्रेम है, कि तू धैर्यवान है, कि तू सहिष्णु है, केवल तभी मैं तेरा अनुसरण कर सकता हूँ, और केवल तभी मेरे पास वह आत्मविश्वास हो सकता है कि अन्त तक अनुसरण करूँ। चूँकि मेरे पास तेरा धैर्य और करुणा है, मेरी अवज्ञा और मेरे अपराधों को अनिश्चित काल तक क्षमा किया जा सकता है, अनिश्चित काल तक माफ किया जा सकता है, और मैं किसी भी समय और कहीं पर भी पाप कर सकता हूँ, किसी भी समय और कहीं पर भी पाप अंगीकार कर सकता हूँ और माफ किया जा सकता हूँ, और किसी भी समय और कहीं पर भी तुझे क्रोधित कर सकता हूँ। तेरे पास मुझ से सम्बन्धित अपने स्वयं के कोई विचार और निष्कर्ष नहीं होने चाहिए।" यद्यपि हो सकता है कि तुम इस प्रकार के प्रश्न के बारे में ऐसे आत्मनिष्ठ रूप से और सचेतन रूप से नहीं सोच सको, फिर भी जब कभी भी परमेश्वर को तुम अपने पापों को क्षमा करने का एक यन्त्र और एक खूबसूरत मंज़िल पाने के लिए उपयोग की जाने वाली एक वस्तु होना विचार करते हो, तो तुमने पहले से ही अतिसूक्ष्म रूप से जीवित परमेश्वर को अपने शत्रु के रूप में, अपने विरोध में रख दिया है। यही है जो मैं देखता हूँ। हो सकता है कि तुम कहते रहो, "मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ" "मैं सत्य की खोज करता हूँ"; "मैं अपने स्वभाव को बदलना चाहता हूँ"; "मैं अंधकार के प्रभाव को तोड़कर स्वतन्त्र होना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर का आज्ञा पालन करना चाहता हूँ"; मैं परमेश्वर के प्रति वफ़ादार होना चाहता हूँ, और अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाना चाहता हूँ"; इत्यादि। हालाँकि, चाहे तुम जो कुछ भी कहते हो वह कितना अच्छा क्यों न सुनाई देता हो, चाहे तुम सिद्धान्त को कितना ही अधिक क्यों न जानते हो, चाहे वह सिद्धान्त कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, यह कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, मामले का तथ्य यह है कि तुम लोगों में से बहुत से लोग हैं जिन्होंने पहले से ही सीख लिया है कि किस प्रकार परमेश्वर के बारे में निष्कर्षों को निकालने के लिए उस विनियम, मत, और सिद्धान्त का उपयोग करें जिन पर तुम लोगों ने महारत हासिल कर ली है, और पूर्णतः स्वभाविक तरीके से उसे स्वयं के विरुद्ध रखें। यद्यपि तुमने पत्रों पर महारत हासिल कर ली है और मतों पर महारत हासिल कर ली है, फिर भी तुमने वास्तवम में सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, इसलिए तुम्हारे लिए परमेश्वर के करीब होना, परमेश्वर को जानना, और परमेश्वर को समझना बहुत कठिन है। यह दयनीय है!

मैंने एक वीडियो में यह दृश्य देखा था: कुछ बहनें वचन देह में प्रकट होता है पुस्तक को थामे हुए थीं, और वे उसे बहुत ऊँचा उठाए हुए थीं। वे उस पुस्तक को अपने बीच में थामे हुए थीं, अपने सिरों से ऊपर। यद्यपि यह मात्र एक छवि है, किन्तु यह मेरे भीतर जो जागृत करती है वह एक छवि नहीं है। इसके बजाय, यह मुझसे विचार करवाती कि जिसे प्रत्येक व्यक्ति अपने हृदय में ऊँचा उठाए रखता है वह परमेश्वर का वचन नहीं है, बल्कि परमेश्वर के वचन की पुस्तक है। यह बहुत ही निराशाजनक मामला है। अभ्यास करने का यह तरीका मात्र परमेश्वर को ऊँचा उठाने का नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग परमेश्वर को उस तरह से नहीं समझते हो जो एक स्पष्ट प्रश्न, बहुत छोटा सा प्रश्न, तुम लोगों की अपनी स्वयं की धारणाओं के साथ आता है। जब मैं तुम लोगों के बारे में चीज़ों को पूछता हूँ, जब मैं तुम लोगों के साथ गंभीर होता हूँ, तो तुम लोग अटकलबाजी और अपनी स्वयं की कल्पनाओं के साथ उत्तर देते हो, तुम लोगों में से कुछ तो सन्देहास्पद स्वर अपना लेते हैं और पलट कर प्रश्न करते हैं। यह इस बात की मुझे और भी अधिक स्पष्ट तरीके से पुष्टि करता है कि जिस परमेश्वर पर तुम लोग विश्वास करते हो वह सच्चा परमेश्वर नहीं है। इतने सालों तक परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, तुम लोग एक बार फिर से परमेश्वर के बारे में निष्कर्षों को निकालने के लिए परमेश्वर के वचन का उपयोग करते हो, परमेश्वर के कार्य का, तथा और अधिक मतों का उपयोग करते हो। इसके अतिरिक्त, तुम लोग परमेश्वर को समझने का कभी भी प्रयास नहीं करते हो; तुम लोग परमेश्वर के इरादों को समझने की कभी कोशिश नहीं करते हो; तुम लोग यह समझने का प्रयास नहीं करते हो कि मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है; या परमेश्वर किस प्रकार सोचता है, वह दुःखी क्यों है, वह क्रोधित क्यों है, और वह लोगों को क्यों ठुकराता है, और ऐसे ही अन्य प्रश्न। इससे अधिक और क्या, यहाँ तक कि अधिकतर लोग मानते हैं कि परमेश्वर हमेशा से खामोश रहा है क्योंकि वह बस मनुष्यजाति के कार्यकलापों को देख रहा है, क्योंकि उनके प्रति उसकी कोई प्रवृत्ति नहीं है, और न ही उसके अपने स्वयं के विचार हैं। एक अन्य समूह इसे और भी आगे ले जाता है। ये लोग मानते हैं कि परमेश्वर कोई आवाज़ नहीं करता है क्योंकि उसने मौन स्वीकृति दी है, परमेश्वर कोई आवाज़ नहीं करता है क्योंकि वह इन्तज़ार कर रहा है, परमेश्वर कोई आवाज़ नहीं करता है क्योंकि उसके पास कोई प्रवृत्ति नहीं है, क्योंकि परमेश्वर की प्रवृत्ति को पहले से ही पुस्तक में विस्तार से समझाया जा चुका है, उसे उसकी सम्पूर्णता में पहले से ही मनुष्यजाति के लिए अभिव्यक्त किया जा चुका है, और समय-समय पर लोगों को बार-बार बताने की आवश्यकता नहीं है। यद्यपि परमेश्वर खामोश है, तब भी उसकी एक प्रवृत्ति है, और उसका एक दृष्टिकोण है, और एक मानक है जिसकी माँग वह लोगों से करता है। यद्यपि लोग उसे समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं, और उसे खोजने का प्रयास नहीं करते हैं, फिर भी उसकी प्रवृत्ति बिलकुल साफ है। किसी ऐसे व्यक्ति का विचार करें जिसने किसी समय मनोभाव से परमेश्वर का अनुसरण किया था, परन्तु किसी स्थिति पर उसका परित्याग करके चला गया था। यदि अब यह व्यक्ति वापस आना चाहता है, तो अत्यंत आश्चर्यजनक रूप से, तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर का दृष्टिकोण क्या होगा, और परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या होगी। क्या यह दयनीय नहीं है? वास्तव में, यह असल में एक सतही मामला है। यदि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के हृदय को समझते हो, तो तुम लोग इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति को समझोगे, और तुम लोग एक अस्पष्ट उत्तर नहीं दोगे। चूँकि तुम लोग नहीं जानते हो, इसलिए मुझे मामले को पूरी तरह से तुम लोगों को बताने दो।

उन लोगों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

तुम इस प्रकार के व्यक्तियों को हर जगह पाओगे: जब वे परमेश्वर के मार्ग के बारे में सुनिश्चित हो जाते हैं उसके पश्चात्, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप और बिना कुछ कहे चले जाते हैं और जो कुछ उनका हृदय चाहता है वही करते हैं। फिलहाल, हम इस बात पर नहीं जाएँगे कि क्यों ऐसा व्यक्ति छोड़कर चला जाता है। पहले हम देखेंगे कि इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस क्षण ऐसे व्यक्ति छोड़कर चले जाते हैं, परमेश्वर की नज़रों में, उनके विश्वास की अवधि समाप्त हो जाती है। ये वे व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने इसे समाप्त किया है, बल्कि परमेश्वर ने समाप्त किया है। यह कि ऐसे व्यक्तियों ने परमेश्वर को छोड़ दिया था, इसका अर्थ है उन्होंने पहले से ही परमेश्वर को अस्वीकृत कर दिया है, कि वे पहले से ही परमेश्वर को नहीं चाहते हैं। इसका अर्थ है कि वे पहले से ही परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार नहीं करते हैं। चूँकि ऐसे व्यक्ति परमेश्वर को नहीं चाहते हैं, तो क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाहता है? इसके अतिरिक्त, जब ऐसे व्यक्तियों की ऐसी प्रवृत्ति, ऐसा दृष्टिकोण हैं, और वे परमेश्वर को छोड़ने पर दृढ़ हैं, तो उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। यद्यपि वे आवेश में नहीं आए थे और परमेश्वर को कोसते नहीं थे, यद्यपि वे किसी अधम या चरम व्यवहार में संलग्न नहीं हुए थे, और यद्यपि ऐसा व्यक्ति सोच रहा होता है: यदि ऐसा दिन आता है जब मैं बाह्य रुप से आनन्द से भर जाता हूँ, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है, तो मैं वापस आऊँगा। या यदि परमेश्वर मुझे बुलाता है, तो मैं वापस आऊँगा। या वे कहते हैं: जब मैं बाहर से चोट खाता हूँ, जब मैं देखता हूँ कि बाहरी संसार अत्यंत अंधकारमय और अत्यंत दुष्ट है और मैं बहाव के साथ अब और बहना नहीं चाहता हूँ, तो मैं परमेश्वर के पास वापस आऊँगा। यद्यपि ऐसे व्यक्तियों ने अपने मन में गणना कर ली होती है कि वे किस समय पर वापस लौट रहे हैं, यद्यपि वे अपनी वापसी के लिए द्वार को खुला छोड़ देते हैं, फिर भी वे अनुभव नहीं करते हैं कि चाहे वे किसी भी प्रकार से क्यों न सोचें और किसी भी प्रकार से योजना क्यों न बनाएँ, यह सब बस ख्याली पुलाव है। उनकी सबसे बड़ी ग़लती यह है कि वे इस बारे में अस्पष्ट हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा महसूस होता है। उस क्षण की शुरूआत से जब यह व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करता है, परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया है; परमेश्वर ने पहले से ही अपने हृदय में उनका परिणाम निर्धारित कर दिया है। वह परिणाम क्या है? कि यह व्यक्ति हैमस्टर (चूहे की एक प्रजाति) में से एक है, और वह उनके साथ ही नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार, लोग प्रायः इस प्रकार की स्थिति को देखते हैं: कोई परमेश्वर का परित्याग कर देता है, परन्तु वह दण्ड नहीं पाता है। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धान्तों के अनुसार संचालन करता है। लोग कुछ चीज़ों को ही देख पाते हैं, और कुछ चीज़ों का निष्कर्ष केवल परमेश्वर के हृदय में ही निकाला जाता है, इसलिए लोग परिणाम को नहीं देख सकते हैं। जिसे लोग देखते हैं वह आवश्यक रूप से चीज़ों का सच्चा पक्ष नहीं है; परन्तु अन्य पक्ष है, ऐसा पक्ष जिसे तुम नहीं देखते हो—यही परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार और निष्कर्ष हैं।

जो लोग परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग जाते हैं वे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग का परित्याग कर देते हैं

इसलिए परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को ऐसा गंभीर दण्ड क्यों दे सकता है? क्यों परमेश्वर उनके प्रति बहुत क्रोधित है? सबसे पहले हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव प्रताप है, कोप है। वह वध किए जाने की कोई भेड़ नहीं है; इससे भी अधिक, वह कोई कठपुतली नहीं है कि लोग जैसा चाहें वैसा उसे नियन्त्रित करें। वह कोई खाली हवा भी नहीं है कि लोगों के द्वारा धौंस दी जाए। यदि तुम वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, तो तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानता हो, और तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के सार को क्रोधित नहीं करना है। यह क्रोध कदाचित् किसी किसी शब्द; कदाचित् किसी विचार; कदाचित् किसी प्रकार के अधम व्यवहार; कदाचित् हल्के व्यवहार, ऐसे व्यवहार जो मनुष्य की नज़रों में और नैतिकता में कामचलाऊ हो, के द्वारा उत्पन्न हुआ हो; या कदाचित् किसी मत, किसी सिद्धान्त के द्वारा उत्पन्न हुआ हो। हालाँकि, जब एक बार तुम परमेश्वर को क्रोधित कर देते हो, तो तुम्हारा अवसर खो जाता है और तुम्हारे अन्त के दिन आ जाते हैं। यह एक भयानक बात है! यदि तुम नहीं समझते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तो हो सकता है तुम परमेश्वर से नहीं डरते हो, और हो सकता है तुम उसे हर समय अपमानित करते हो। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का भय कैसे मानें, तो तुम परमेश्वर का भय मानने में असमर्थ हो, और तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर के मार्ग में चलने के पथ—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना—पर स्वयं को कैसे रखना है। जब एक बार तुम जान जाते हो, तो तुम सचेत रह सकते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तब तुम जानोगे कि परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना क्या होता है।

परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग पर चलना आवश्यक रूप से इस बारे में नहीं है कि तुम कितनी अधिक सच्चाई को जानते हो, तुमने कितने अधिक परीक्षणों का अनुभव किया है, या तुम्हें कितना अधिक अनुशासित किया गया है। इसके बजाए, यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारे हृदय का सार क्या है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। लोगों का सार और उनकी आत्मनिष्ठ प्रवृत्तियाँ—ये अत्यंत महत्वपूर्ण, अत्यंत प्रमुख बाते हैं। उन लोगों के संबंध में जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गये हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी कुत्सित प्रवृत्ति ने और सत्य से घृणा करने वाले उनके हृदय ने परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित किया है, इसलिए जहाँ तक परमेश्वर की बात है उन्हें कभी भी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जाना है, उनके पास वह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का भी अनुभव किया है। उनका चला जाना भ्रमित होने का एक मामला नहीं है, और न ही ऐसा है कि वे इसके बारे में अस्पष्ट हैं। यह उन्हें इसमें जबरदस्ती इसमें धकेले जाने का मामला तो बिल्कुल नहीं है। बल्कि उन्होंने सचेत रूप से, और स्पष्ट मन से, परमेश्वर को छोड़कर जाना चुना है। उनका चले जाना अपने मार्ग को खोना नहीं है; यह उन्हें फेंक दिया जाना नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे ऐसा, मेम्ना नहीं हैं जो झुण्ड से भटक गया है, फजूल-खर्च पुत्र की तो बात ही छोड़ दो जिसने अपने मार्ग को गँवा दिया है। वे दण्डमुक्ति के साथ चले गए, और ऐसी दशा, ऐसी स्थिति परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और यह इस क्रोध के कारण ही है कि वह उन्हें एक आशाहीन परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? इसलिए यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो वे परमेश्वर को अपमानित कर सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि कोई परमेश्वर की प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेते हैं, और तब भी मानते हैं कि परमेश्वर उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है—क्योंकि वे परमेश्वर की खोई हुई भेड़ों में से एक हैं और परमेश्वर अभी भी उनका हृदय परिवर्तन होने की प्रतीक्षा कर रहा है—तो ऐसे व्यक्ति अपने दण्ड के दिन से बहुत दूर नहीं किए गए हैं। परमेश्वर उन्हें स्वीकार करने से यूँही मना नहीं करेगा। यह दूसरी बार है जब उन्होंने उसके स्वभाव को क्रोधित किया है; यह और भी अधिक भयानक बात है! इस व्यक्ति की श्रद्धाहीन प्रवृत्ति ने पहले से ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेश को अपमानित किया है। क्या परमेश्वर अब भी उसे स्वीकार करेगा? इस मामले के बारे में परमेश्वर के सिद्धान्त हैं: यदि कोई व्यक्ति सच्चे मार्ग के विषय में निश्चित है फिर भी वह जानबूझ कर और स्पष्ट मन से परमेश्वर को अस्वीकार कर सकता है, और स्वयं को परमेश्वर से दूर कर सकता है, तो परमेश्वर उसके उद्धार के मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, और इसके बाद राज्य के दरवाजे को उसके लिए बन्द कर दिया जाएगा। जब यह व्यक्ति एक बार फिर द्वार खटखटाते हुए आता है, तो परमेश्वर उसके लिए पुनः द्वार नहीं खोलेगा। इस व्यक्ति को सदा के लिए निकाल दिया जाएगा। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ने बाईबिल में मूसा की कहानी को पढ़ा हो। मूसा को परमेश्वर के द्वारा अभिषिक्त कर दिए जाने के पश्चात्, 250 अगुवे मूसा से उसके कार्यकलापों और अन्य विभिन्न कारणों की वजह से असंतुष्ट थे। उन्होंने किसका आज्ञापालन करने से मना किया था? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्थाओं को मानने से इनकार किया था; उन्होंने इस मामले पर परमेश्वर के कार्य को मानने से मना किया था। उन्होंने निम्नलिखित बातें कही थीं: "तुम ने बहुत किया, अब बस करो; क्योंकि सारी मण्डली का एक एक मनुष्य पवित्र है, और यहोवा उनके मध्य में रहता है ...।" मनुष्य की नज़रों में, क्या ये वचन बहुत गंभीर हैं? वे गंभीर नहीं हैं! कम से कम शब्दों का शाब्दिक अर्थ तो गंभीर नहीं है। वैधानिक अर्थ में, वे किसी नियम को नहीं तोड़ते हैं, क्योंकि बिल्कुल सतही तौर पर यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, और इसमें ईश निन्दा सम्बन्धी अर्थ तो बिल्कुल भी नहीं है। यहाँ केवल एक साधारण सा वाक्य है, इससे अधिक कुछ नहीं। फिर भी ऐसा क्यों है कि ये वचन परमेश्वर के इतने क्रोध को भड़का सकते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लोगों के लिए नहीं कहा गया है, बल्कि परमेश्वर के लिए कहा गया है। उनके द्वारा व्यक्त की गई प्रवृत्ति और स्वभाव निश्चित रूप से वही है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करता है, विशेषरूप से परमेश्वर के उस स्वभाव को क्रोधित करता है जिसे अपमानित नहीं किया जा सकता है। हम सब जानते हैं कि अन्त में उनका परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के बारे में जो परमेश्वर का परित्याग कर दिया है, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी प्रवृत्ति क्या है? और क्यों उनका दृष्टिकोण और प्रवृत्ति ऐसा कारण बनता है कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से निपटता है? कारण यह है कि वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि वह परमेश्वर है मगर तब भी वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चुनते हैं। इसीलिए उन्हें उद्धार के उनके अवसर से पूरी तरह से वंचित कर दिया जाता है। ठीक जैसे कि बाईबिल कहती है: "क्योंकि सच्चाई की पहचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जानबूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिए फिर कोई बलिदान बाकी नहीं रहा।" क्या अब तुम लोग इस विषय पर स्पष्ट हो?

मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के प्रति उसकी प्रवृत्ति के द्वारा निर्धारित होता है

परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और ठीक जैसे लोग भिन्न-भिन्न स्थितियों में भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही इन प्रदर्शनों के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति भी भिन्न-भिन्न होती है क्योंकि वह कोई कठपुतली नहीं है, और न ही वह खाली हवा है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानना मनुष्यजाति के लिए एक नेक खोज है। परमेश्वर की प्रवृत्ति को जानने के द्वारा लोगों को सीखना चाहिए कि कैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को जान सकते हैं और थोड़ा-थोड़ा करके उसके हृदय को समझ सकते हैं। जब तुम थोड़ा-थोड़ा करके परमेश्वर के हृदय को समझने लगोगे, तो तुम्हें नहीं लगेगा कि परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने को अंजाम देना कोई कठिन कार्य है। इससे अधिक, जब तुम परमेश्वर को समझते हो, तो उसके बारे में निष्कर्षों को बनाने की तुम्हारी संभावना नहीं रहती है। जब तुम परमेश्वर के बारे में निष्कर्षों को बनाना बन्द कर देते हो, तो उसे अपमानित करने की तुम्हारी संभावना नहीं रहती है, और अनजाने में परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करेगा कि तुम उसके बारे में ज्ञान को पाओ, और इसके द्वारा तुम अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानोगे। तुम उन मतों, पत्रों, एवं सिद्धान्तों का उपयोग करके परमेश्वर को परिभाषित करना बन्द करोगे जिनमें तुमने महारत हासिल की है। बल्कि, सभी चीज़ों में सदैव परमेश्वर के इरादों को खोजने के द्वारा, तुम अनजाने में ही ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार है।

परमेश्वर का कार्य मनुष्यजाति के द्वारा अदृष्ट और अस्पर्शनीय है, परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की बात है, हर एक व्यक्ति के कार्यकलाप, साथ में उसके प्रति उनकी प्रवृत्ति—परमेश्वर के द्वारा मात्र महसूस नहीं किए जाते हैं, बल्कि ये दृष्टिगोचर भी हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे हर किसी को पहचानना चाहिए और इसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए। हो सकता है कि तुम स्वयं से हमेशा पूछते रहते हो: "क्या परमेश्वर जानता है कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर जानता है कि मैं ठीक इस समय किस बारे में विचार कर रहा हूँ? हो सकता है कि वह जानता हो, हो सकता है कि वह नहीं जानता हो"। यदि तुम इस प्रकार के दृष्टिकोण को अपनाते हो, परमेश्वर का अनुसरण करना और उसमें विश्वास करना मगर उसके कार्य और उसके अस्तित्व पर सन्देह करना, तो देर-सवेर ऐसा दिन आएगा जब तुम परमेश्वर को क्रोधित करोगे, क्योंकि तुम पहले से ही एक खतरनाक खड़ी चट्टान के किनारे पर डगमगा रहे हो। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने बहुत वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, परन्तु उन्होंने अभी तक सत्य की वास्तविकता को प्राप्त नहीं किया है, और ना ही वे परमेश्वर की इच्छा को भी समझते हैं। केवल अत्यंत छिछले मतों के मुताबिक चलते हुए, उनके जीवन की कद-काठी कोई प्रगति नहीं करती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों ने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने स्वयं के जीवन के रूप में नहीं लिया है, और उन्होंने कभी भी परमेश्वर के अस्तित्व का सामना और उसे स्वीकार नहीं किया है। क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को देख कर आनन्द से भर जाता है? क्या वे उसे आराम पहुँचाते हैं? उस स्थिति में, यह परमेश्वर में विश्वास करने की लोगों की विधि है जो उनका भाग्य तय करती है। चाहे यह इस बारे में प्रश्न हो कि तुम किस प्रकार परमेश्वर की खोज करते हो या तुम परमेश्वर से किस प्रकार व्यवहार करते हो, यह तुम्हारी स्वयं की प्रवृत्ति है जो सबसे महत्वपूर्ण है। परमेश्वर की ऐसे उपेक्षा मत करो मानो कि वह तुम्हारे सिर के पीछे की खाली हवा हो। अपने विश्वास के परमेश्वर के बारे में हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एक वास्तविक परमेश्वर के रूप में सोचो। वह वहाँ ऊपर उस तीसरे स्वर्ग में नहीं है जहाँ उसके पास करने के लिए कुछ नहीं है। बल्कि, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करते हो, हर एक छोटे वचन और हर एक छोटे से कर्म को देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति क्या है। तुम स्वयं को परमेश्वर को अर्पित करने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे अंतर्तम सोच एवं विचार परमेश्वर के सामने हैं, और परमेश्वर के द्वारा देखे जा रहे हैं। यह तुम्हारे व्यवहार के अनुसार है, तुम्हारे कर्मों के अनुसार है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार है, कि तुम्हारे बारे में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं उन लोगों को कुछ परामर्श देना चाहूँगा जो अपने आपको छोटे शिशु के समान परमेश्वर के हाथों में देना चाहेंगे, मानो उसे तुम से लाड़-प्यार करना चाहिए, मानो कि वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता है, मानो तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर है और कभी नहीं बदल सकती है: सपने देखना छोड़ो! परमेश्वर हर एक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धार्मिक है। वह मनुष्यजाति को जीतने और उसके उद्धार के कार्य में ईमानदारी से बढ़ता है। यह उसका प्रबंधन है। वह हर एक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़ दुलार करने वाले या बिगाड़ने वाले प्रकार का प्रेम नहीं है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी करुणा और सहिष्णुता आसक्तिपूर्ण या बेपरवाह नहीं है। इसके विपरीत, मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम सँजोने के लिए, दया करने के लिए, और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी करुणा और सहिष्णुता मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं को सूचित करती है; उसकी करुणा और सहिष्णुता ऐसी चीज़ें हैं जिनकी ज़िन्दा बचे रहने के लिए मनुष्यजाति को आवश्यकता है। परमेश्वर जीवित है, और परमेश्वर वास्तव में अस्तित्व में है; मनुष्यजाति के प्रति उसकी प्रवृत्ति सैद्धान्तिक है, कट्टर नियम बिल्कुल भी नहीं है, और यह बदल सकती है। मनुष्यजाति के लिए उसकी इच्छा समय के साथ, परिस्थितियों के साथ, और प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित एवं रूपान्तरित हो रही है। इसलिए तुम्हें इस पर बिल्कुल स्पष्ट हो जाना चाहिए, और यह समझ जाना चाहिए कि परमेश्वर का सार अपरिवर्तनीय है, और उसका स्वभाव विभिन्न समयों पर, और विभिन्न सन्दर्भों में जारी होगा। हो सकता है कि तुम न सोचो कि यह एक गंभीर मुद्दा है, और तुम यह कल्पना करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करो कि परमेश्वर को किस प्रकार कार्यों को करना चाहिए। परन्तु ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारे दृष्टिकोण का बिल्कुल विपरीत सही होता है, और यह कि परमेश्वर का प्रयास करने और उसे मापने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करके, तुम पहले ही उसे क्रोधित कर देते हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर उस तरह संचालन नहीं करता है जैसा तुम सोचते हो कि वह करता है, और परमेश्वर इस मामले से उस तरह से व्यवहार नहीं करेगा जैसा तुम सोचते हो कि वह करेगा। और इसलिए मैं तुम्हें याद दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपनी पहुँच में सावधान एवं बुद्धिमान रहो, और सीखो कि किस प्रकार सभी चीज़ों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धान्त का अनुसरण करें—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की प्रवृत्ति के मामलों पर एक दृढ़ समझ अवश्य विकसित करनी चाहिए; तुम्हारे साथ इसका संवाद करने के लिए तुम्हें प्रबुद्ध लोगों को अवश्य खोजना चाहिए, और ईमानदारी से खोजना चाहिए। अपने विश्वास के परमेश्वर को एक कठपुतली के रूप में मत देखो—मनमाने ढंग से न्याय करना, मनमाने निष्कर्षों पर पहुँचना, उस सम्मान के साथ परमेश्वर से व्यवहार न करना जिसके वह योग्य है। परमेश्वर द्वारा उद्धार की प्रक्रिया में, जब वह तुम्हारे परिणाम को परिभाषित करता है, तो चाहे वह तुम्हें करुणा, या सहिष्णुता, या न्याय और ताड़ना क्यों न प्रदान करता हो, तुम्हारे प्रति उसकी प्रवृत्ति स्थिर नहीं है। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रवृत्ति पर, और परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर करता है। परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलू को परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित मत करने दो। एक मृत परमेश्वर में विश्वास मत करो; एक जीवित परमेश्वर में विश्वास करो। यह याद रखो! यद्यपि मैंने यहाँ पर कुछ सच्चाईयों पर चर्चा की है, ऐसी सच्चाईयाँ जिन्हें सुनने की तुम लोगों को आवश्यकता थी, फिर भी तुम लोगों की वर्तमान दशा और वर्तमान कद-काठी के आलोक में, मैं तुम्हारे उत्साह को ख़त्म करने के लिए कोई बड़ी माँग नहीं करूँगा। ऐसा करने से तुम लोगों का हृदय अत्यधिक उदासी से भर सकता है, और परमेश्वर के प्रति तुम लोगों को बहुत अधिक निराशा महसूस करवा सकता है। इसके बजाय मुझे आशा है कि तुम लोग अपने हृदय में परमेश्वर के प्रेम का उपयोग कर सकते हो, और ऐसी प्रवृत्ति का उपयोग कर सकते हो जो आगे के मार्ग पर चलते समय परमेश्वर के प्रति सम्मानजनक हो। परमेश्वर के बारे में विश्वास के साथ किस प्रकार से व्यवहार करें इस मामले में मत गडबड़ाओ। इसके साथ ऐसा व्यवहार करो मानो कि यह बहुत बड़े प्रश्नों में से एक है। इसे अपने हृदय में रखो, इसे अभ्यास में लाओ, और इसे वास्तविक जीवन के साथ जोड़ो—इसका केवल दिखावटी आदर मत करो। क्योंकि यह ज़िन्दगी और मौत का मामला है, और ऐसी बात है जो तुम्हारी नियति को निर्धारित करेगी। इसके साथ एक मजाक के रूप में, या किसी बच्चे के खेल के रूप में व्यवहार मत करो! आज तुम लोगों के साथ इन वचनों को साझा करने के बाद, मैं जानने का उत्सुक हूँ कि तुम लोगों के मन में समझ की फसल क्या है। आज जो कुछ मैंने यहाँ पर कहा है क्या उसके बारे में कोई प्रश्न है जिन्हें तुम लोग पूछना चाहते हो?

यद्यपि ये विषय थोड़े नए हैं, और तुम लोगों के दृष्टिकोण से और जिसकी तुम लोग सामान्यतः खोज करते हो और जिस पर ध्यान देते हो उससे थोड़ा हट गए हैं, फिर भी मैं सोचता हूँ कि एक समयावधि तक उनका संवाद किए जाने के पश्चात्, जो कुछ भी मैंने यहाँ कहा है उसके बारे में तुम लोग एक सामान्य समझ विकसित कर लोगे। चूँकि ये नए विषय हैं, ऐसे विषय हैं जिन पर तुम लोगों ने पहले कभी विचार नहीं किया था, इसलिए मुझे आशा है कि ये तुम लोगों के बोझ को और नहीं बढ़ाएँगे। मैं आज इन वचनों को तुम लोगों को भयभीत करने के लिए नहीं बोलता हूँ, और न ही मैं तुम लोगों से निपटते का प्रयास करता हूँ; इसके बजाए, मेरा लक्ष्य तथ्य की सच्चाई को समझने में तुम लोगों की सहायता करना है। आखिरकार, मनुष्यजाति और परमेश्वर के बीच एक दूरी हैः यद्यपि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसने परमेश्वर को कभी समझा नहीं है; उसने परमेश्वर की प्रवृत्ति को कभी नहीं जाना है। मनुष्य परमेश्वर की प्रवृत्ति के लिए अपनी दिलचस्पी में कभी भी उत्साही नहीं रहा है। इसके बजाए, उसने आँख मूँदकर विश्वास किया है, वह आँख मूँदकर आगे बढ़ा है, और वह परमेश्वर के बारे में अपने ज्ञान और अपनी समझ में लापरवाह रहा है। अतः मैं इन मामलों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट करने, और यह समझने में तुम लोगों की सहायता करने हेतु विवश महसूस करता हूँ कि वह परमेश्वर किस प्रकार का परमेश्वर है जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो; वह क्या सोच रहा है; विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ उसके व्यवहार में उसकी प्रवृत्ति क्या है; उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने से तुम लोग कितनी दूर हो; और तुम लोगों के कार्यकलापों और उस मानक के बीच की असमानता और वह मानक क्या है जिसकी वह माँग करता है। तुम लोगों के जानने का लक्ष्य तुम लोगों के हृदयों में मापने की एक मापदण्ड देना है जिससे मापा जाए और जाना जाए कि जिस मार्ग पर तुम लोग हो वह किस प्रकार की फसल की ओर ले गया है, तुम लोगों ने इस मार्ग पर क्या प्राप्त नहीं किया है, और तुम लोग किन क्षेत्रों में शामिल नहीं हुए हो। जब तुम लोग अपनों के बीच संवाद कर रहे होते हो, तो तुम लोग आम तौर पर कुछ सामान्य रूप से चर्चित विषयों पर ही बोलते हो; दायरा संकरा होता है, और विषयवस्तु बहुत सतही होती है। जिस पर तुम लोग चर्चा करते हो और परमेश्वर के इरादों के बीच में, तुम लोगों की चर्चाओं और परमेश्वर की माँगों के दायरे एवं मानक के बीच में एक दूरी, एक अंतर होता है। इस प्रकार से आगे बढ़ना समय के साथ तुम लोगों को परमेश्वर के मार्ग से दूर और दूर विचलित करता जाएगा। तुम लोग बस परमेश्वर के मौजूदा वचनों को अपना रहे हो और उन्हें आराधना की वस्तुओं में, विधि-विधान और नियमों में बदल रहे हो। यह बस इतना ही है! वास्तव में, परमेश्वर का तुम लोगों के हृदय में कोई स्थान ही नहीं है, और परमेश्वर ने तुम लोगों के हृदय को कभी प्राप्त नहीं किया है। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को जानना बहुत कठिन है—यही सत्य है। यह कठिन है! यदि लोगों से अपने कर्तव्य को निभाने के लिए कहा जाए और कार्यों को बाहरी तौर पर करने को कहा जाए, यदि उनसे कठिन परिश्रम करने के लिए कहा जाए, तो लोग सोचेंगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना बहुत आसान है, क्योंकि यह सब मनुष्य की योग्यताओं के दायरे के भीतर आता है। मगर जैसे ही यह विषय परमेश्वर के इरादों और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की प्रवृत्ति के क्षेत्रों की ओर जाता है, तो जहाँ तक हर एक व्यक्ति की बात है चीज़ें और भी अधिक कठिन हो जाती हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें सत्य के बारे में लोगों की समझ और वास्तविकता में उनका प्रवेश शामिल है; वास्तव में इसमें कठिनाई का अंश है! किन्तु जब तुम लोग पहले द्वार से निकल जाते हो तो उसके बाद, जब तुम इसके भीतर प्रवेश करना शुरू करते हो तो उसके बाद, यह धीरे-धीरे अधिक आसान होता जाता है।

परमेश्वर का भय मानने का आरम्भिक बिन्दु उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार करना है

किसी ने अभी-अभी एक प्रश्न उठाया था: ऐसा कैसे है कि जितना अय्यूब जानता था उसकी तुलना में हम परमेश्वर के बारे में अधिक जानते हैँ, फिर भी हम परमेश्वर का भय नहीं मान सकते हैं? हमने पहले ही इस मामले पर थोड़ी बहुत चर्चा की थी, सही है न? वास्तव में, इस प्रश्न के सार पर भी पहले चर्चा की जा चुकी है, कि यद्यपि तब बीते समय में अय्यूब परमेश्वर को नहीं जानता था, फिर भी उसने उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार किया था, और उसे स्वर्ग तथा पृथ्वी की सभी चीज़ों के मालिक के रूप में माना था। अय्यूब ने परमेश्वर को एक शत्रु नहीं माना था। इसके बजाय, उसने सभी चीज़ों के सृष्टिकर्ता के रूप में उसकी आराधना की थी। ऐसा क्यों है कि आजकल लोग परमेश्वर का इतना अधिक विरोध करते हैं? वे परमेश्वर का भय क्यों नहीं मान सकते हैं? एक कारण यह है कि उन्हें शैतान के द्वारा गहराई तक भ्रष्ट कर दिया गया है। गहराई से समायी हुई अपनी शैतानी प्रकृति के साथ, लोग परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं। इस प्रकार, यद्यपि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, तब भी वे परमेश्वर का विरोध कर सकते हैं और स्वयं को उसके विरोध में रख सकते हैं। यह मानव प्रकृति के द्वारा निर्धारित होता है। दूसरा कारण यह है कि यद्यपि लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, फिर भी वे उसके साथ बस परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे विचार करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य का विरोधी है, उसे मनुष्य के शत्रु के रूप में मानते हैं, और वे परमेश्वर के साथ अनमेल हैं। यह इतना आसान है। क्या इस मामले को पिछले सत्र में नहीं उठाया गया था? इसके बारे में सोचो: क्या यही वह कारण है? यद्यपि तुम्हें परमेश्वर का थोड़ा सा ज्ञान है, फिर भी यह ज्ञान क्या है? क्या यह ऐसी बात नहीं है जिसके बारे में हर कोई बात कर रहा है? क्या यह वह नहीं जो परमेश्वर ने तुम्हें बताया था? तुम केवल सिद्धान्त और मत सम्बन्धी पहलुओं को जानते हो; क्या तुमने कभी परमेश्वर के वास्तविक पहलू का अनुभव किया है? क्या तुम्हें आत्मगत ज्ञान है? क्या तुम्हें व्यावहारिक ज्ञान और अनुभव है? यदि परमेश्वर तुम्हें नहीं बताता, तो क्या तुम इसे जान सकते थे? सिद्धान्त का तुम्हारा ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं दर्शाता है। संक्षेप में, चाहे इसके बारे में तुम्हें कितना ही और कैसे ही क्यों न पता चला हो, तुम्हारे द्वारा परमेश्वर की वास्तविक समझ प्राप्त किए जाने से पहले, परमेश्वर तुम्हारा शत्रु है, और तुम्हारे द्वारा परमेश्वर से इस प्रकार व्यवहार किए जाने से पहले, उसे तुम्हारे विरुद्ध रखा जाता है, क्योंकि तुम शैतान के मूर्त रूप हो।

जब तुम मसीह के साथ होते हो, तो प्रकट रूप से मसीह के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार करते हुए, कदाचित् तुम उसे दिन में तीन बार भोजन परोस सकते हो। कदाचित् उसे चाय दे सकते हो, उसके जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हो। जब कभी भी कुछ होता है, तो लोगों के दृष्टिकोण हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण से विपरीत होते हैं। वे हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण को समझने में असफल रहते हैं, उसे स्वीकार करने में असफल रहते हैं। यद्यपि हो सकता है कि लोग ऊपरी तौर पर परमेश्वर के साथ हों, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वे परमेश्वर के सुसंगत हैं। जैसे ही कुछ होता है, तो उस शत्रुता की पुष्टि करते हुए जो मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच में मौजूद है, मुनष्य की अवज्ञा की असलियत प्रकट होती है। यह शत्रुता ऐसी नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य का विरोध करता है; यह परमेश्वर नहीं है जो मनुष्य का शत्रु होना चाहता है, और यह परमेश्वर नहीं है जो मनुष्य को विरोध में रखता है और इस तरह से मनुष्य से व्यवहार करता है। इसके बजाय, यह परमेश्वर के प्रति ऐसे विरोधात्मक सार का मामला है जो मनुष्य की आत्मगत इच्छा शक्ति में, और मनुष्य के अवचेतन मन में घात लगाता है। चूँकि मनुष्य उन सब को अपने अनुसंधान की वस्तु के रूप में मानता है जो परमेश्वर से आता है, किन्तु जो कुछ परमेश्वर से आता है और जो कुछ परमेश्वर को शामिल करता है उसके प्रति उसका उत्तर, सर्वोपरि, अन्दाज़ा लगाना, और सन्देह करना, और उसके बाद शीघ्रता से ऐसी प्रवृत्ति को अपनाना है जो परमेश्वर से संघर्ष करती है, और परमेश्वर का विरोध करती है। उसके बाद, मनुष्य इन शिथिल मनोदशाओं को अपनाएगा और परमेश्वर से विवाद करेगा या उससे स्पर्धा करेगा, यहाँ तक कि उस हद तक जहाँ वह सन्देह करेगा कि इस प्रकार का परमेश्वर उसके अनुसरण के योग्य है भी या नहीं। इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य की तर्कशक्ति उसे बताती है कि उसे इस तरह से आगे नहीं बढ़ना चाहिए, तब भी वह स्वयं की सुनने के बजाय ऐसा ही करना चुनेगा, इस तरह से कि वह अन्त तक बिना किसी संकोच के बढ़ता जाएगा। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों की प्रथम प्रतिक्रिया क्या होती है जब वे परमेश्वर के बारे में कोई अफवाह या निन्दात्मक बात सुनते हैं? उनकी पहली प्रतिक्रिया है: मुझे नहीं पता कि यह अफवाह सही है या नहीं, इसका अस्तित्व है या नहीं, इसलिए मैं प्रतीक्षा करूँगा और देखूँगा। तब वे विचार करना आरम्भ कर देते हैं: इसे सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं है, क्या इसका अस्तित्व है? क्या यह अफवाह सच है या नहीं? यद्यपि ऐसे व्यक्ति इसे ऊपरी तौर पर प्रदर्शित नहीं कर रहे हैं, फिर भी उसके हृदय ने पहले से ही सन्देह करना आरम्भ कर दिया है, पहले से ही परमेश्वर का इनकार करना शुरू कर दिया है। इस प्रकार की प्रवृत्ति, इस प्रकार के दृष्टिकोण का सार क्या है? क्या यह विश्वासघात नहीं है? उनका सामना किसी मामले से होने से पहले, तुम नहीं देख सकते हो कि इस व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है—ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वे परमेश्वर से संघर्ष नहीं करते हैं, मानो कि वे परमेश्वर को एक शत्रु के रूप में नहीं मानते हैं। हालाँकि, जैसे ही उनका सामना इससे होता है, वे तुरन्त शैतान के साथ खड़े हो जाते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। यह क्या बताता है? यह बताता है कि मनुष्य और परमेश्वर विरोधी हैं! ऐसा नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य को अपने शत्रु के रूप में मानता है, बल्कि मनुष्य का सार ही अपने आपमें परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है। इस बात की परवाह किए बिना कि कोई व्यक्ति कितने लम्बे समय से परमेश्वर का अनुसरण करता है, वह कितनी कीमत चुकाता है; इस बात की परवाह किए बिना कि कोई व्यक्ति किस प्रकार परमेश्वर की स्तुति करता है, किस प्रकार वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने से स्वयं को रोकता है, यहाँ तक कि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए अपने आपको उकसाता भी है, वह कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं कर सकता है। क्या यह मनुष्य के सार के द्वारा निर्धारित नहीं होता है? यदि तुम उसके साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार करते हो, तुम सचमुच में विश्वास करते हो कि वह परमेश्वर है, तो क्या तब भी तुम्हें उसके प्रति कोई सन्देह होता है? क्या तब भी तुम्हारे हृदय में उसके सम्बन्ध में कोई प्रश्न चिन्ह हो सकता है? नहीं हो सकता है। इस संसार के चलन बहुत ही दुष्टतापूर्ण हैं, यह मनुष्य जाति बहुत बुरी है—ऐसा कैसे है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई धारणाएँ नहीं हैं? तुम स्वयं ही बहुत दुष्ट हो—ऐसा कैसे है कि इस बारे में तुम्हारी कोई धारणा नहीं है? फिर भी थोड़ी सी अफवाहें और कुछ निन्दा, परमेश्वर के बारे में इतनी बड़ी धारणाएँ उत्पन्न कर सकती हैं, इतने सारे विचारों को उत्पन्न कर सकती हैं, जो दर्शाता है कि तुम्हारी कद-काठी कितनी अपरिपक्व है! बस थोड़े से मच्छरों की "भनभनाहट," और कुछ घिनौनी मक्खियाँ, बस इतना ही काफी है तुम्हें धोखा देने के लिए? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? क्या तुम जानते हो कि परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति के बारे में क्या सोचता है? परमेश्वर इन लोगों से किस प्रकार व्यवहार करता है इस बारे में उसकी प्रवृत्ति वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट है। यह केवल इतना ही है कि इन लोगों के प्रति परमेश्वर का बर्ताव उन पर जानबूझकर कोई ध्यान नहीं देना है—उसकी प्रवृत्ति उन पर कोई ध्यान नहीं देना है, और इन अज्ञानी लोगों के साथ गंभीर नहीं होना है। ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने हृदय में उसने ऐसे लोगों को प्राप्त करने की कभी योजना नहीं बनाई है जिन्होंने बिल्कुल अन्त तक उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होने की शपथ खाई है, और जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के सुसंगत होने के मार्ग की खोज करने की योजना नहीं बनाई है। कदाचित् ये वचन जो मैंने कहे हैं कुछ लोगों को ठेस पहुँचाते हों। अच्छा, क्या तुम लोग मुझे हमेशा इसी तरह से तुम लोगों को ठेस पहुँचाने देने के लिए तैयार हो? इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोग तैयार हो या नहीं, जो कुछ भी मैं कहता हूँ वह सत्य है! यदि मैं हमेशा इसी तरह से तुम लोगों को ठेस पहुँचाऊँ, हमेशा तुम लोगों के दागों को उजागर करूँ, तो क्या यह तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर की उत्कृष्ट तस्वीर को प्रभावित करेगा? (यह नहीं करेगा)। मैं सहमत हूँ कि यह प्रभावित नहीं करेगा। क्योंकि तुम लोगों के हृदय में कोई ईश्वर ही नहीं है। वह उत्कृष्ट परमेश्वर जो तुम लोगों के हृदय में निवास करता है, वह एक जिसका तुम लोग दृढ़ता से समर्थन करते हो और बचाते हो, वह परमेश्वर ही नहीं है। बल्कि यह मनुष्य की कल्पना की मनगढ़ंत बात है; इसका अस्तित्व ही नहीं है। अतः यह और भी बेहतर है कि मैं इस पहेली के उत्तर का खुलासा करूँ। क्या यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है? वास्तविक परमेश्वर मनुष्य की कल्पनाएँ नहीं है। मुझे आशा है कि तुम लोग इस वास्तविकता का सामना कर सकते हो, और यह परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान में सहायता करेगा।

परमेश्वर के द्वारा स्वीकार नहीं किए जाने वाले लोग

कुछ लोग हैं जिनके विश्वास को परमेश्वर के हृदय में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर यह नहीं मानता है कि ये लोग उसके अनुयायी हैं, क्योंकि परमेश्वर उनके विश्वास की प्रशंसा नहीं करता है। क्योंकि ये लोग, इस बात की परवाह किए बिना कि उन्होंने कितने वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, इनकी सोच और इनके विचार कभी नहीं बदले हैं। वे अविश्वासियों के समान हैं, अविश्वासियों के सिद्धान्तों और चीज़ों को करने के तरीके के मुताबिक चलते हैं, और ज़िन्दा बचे रहने के उनके नियम एवं विश्वास के मुताबिक चलते हैं। उन्होंने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने जीवन के रूप में ग्रहण नहीं किया, कभी भी विश्वास नहीं किया कि परमेश्वर का वचन सत्य है, परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कभी इरादा नहीं किया, और परमेश्वर को कभी भी अपने परमेश्वर के रूप में नहीं माना। वे परमेश्वर में विश्वास करने को किसी किस्म की शौकिया रुचि के रूप में मानते हैं, परमेश्वर के साथ महज एक आध्यात्मिक सहारे के रूप में व्यवहार करते हैं, इसलिए वे नहीं सोचते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव, या परमेश्वर का सार कोशिश किए जाने और समझे जाने लायक है। तुम कह सकते हो कि वह सब जो सच्चे परमेश्वर के अनुरूप है उसका इन लोगों से कोई लेना देना नहीं है। उनकी रूचि नहीं है, और वे उत्तर देने की परेशानी नहीं उठा सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके हृदय की गहराई में एक तीव्र आवाज़ है जो हमेशा उनसे कहती है: परमेश्वर अदृश्य एवं अस्पर्शनीय है, और परमेश्वर का अस्तित्व नहीं है। वे मानते हैं कि इस प्रकार के परमेश्वर को समझने की कोशिश करना उनके प्रयासों के लायक नहीं है; यह अपने आपको मूर्ख बनाना होगा। वे बस वचनों में परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, और कोई वास्तविक कदम नहीं उठाते हैं। साथ ही वे व्यावहारिक रूप से भी कुछ नहीं करते हैं, और सोचते हैं कि वे बहुत चतुर हैं। परमेश्वर इन लोगों को किस दृष्टि से देखता है? वह उन्हें अविश्वासियों के रूप में देखता है। कुछ लोग पूछते हैं: "क्या अविश्वासी लोग परमेश्वर के वचन को पढ़ सकते हैं? क्या वे अपने कर्तव्य को निभा सकते हैं? क्या वे इन वचनों को कह सकते हैं: "मैं परमेश्वर के लिए जीऊँगा?" जो कुछ मनुष्य प्रायः देखता है वे लोगों के सतही प्रदर्शन होते हैं, और उनका सार नहीं। फिर भी परमेश्वर इन सतही प्रदर्शनों को नहीं देखता है; वह केवल उनके भीतरी सार को देखता है। इस प्रकार, परमेश्वर की इन लोगों के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति है, और इस प्रकार की परिभाषा है। जो कुछ ये लोग कहते हैं उसके बारे में: "परमेश्वर ऐसा क्यों करता है? परमेश्वर वैसा क्यों करता है? मैं इसे समझ नहीं सकता हूँ; मैं उसे समझ नहीं सकता हूँ; यह मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है; तुम्हें इसे मुझे अवश्य समझाना चाहिए; ...।" मेरा उत्तर है: क्या तुम्हें यह मामला समझाना आवश्यक है? क्या इस मामले का तुमसे कुछ लेना देना है? तुम क्या सोचते हो कि तुम कौन हो? तुम कहाँ से आए हो? क्या तुम परमेश्वर के लिए इन संकेतकों को देने के योग्य हो? क्या तुम उसमें विश्वास करते हो? क्या वह तुम्हारे विश्वास को स्वीकार करता है? चूँकि तुम्हारे विश्वास का परमेश्वर से कोई लेना देना नहीं है, तो उसके कार्य का तुमसे क्या सरोकार है? तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर के हृदय में तुम कहाँ हो, फिर भी क्या तुम परमेश्वर से संवाद करने के योग्य हो?

चेतावनी के शब्द

क्या तुम लोग इन टिप्पणियों को सुनने के बाद असहज नहीं हो? यद्यपि हो सकता है कि तुम लोग इन वचनों को सुनने के अनिच्छुक हो, या उन्हें स्वीकार करने के अनिच्छुक हो, फिर भी वे सब तथ्य हैं। क्योंकि कार्य का यह चरण परमेश्वर के करने के लिए है, यदि तुम परमेश्वर के इरादों से सम्बन्धित नहीं हो, परमेश्वर की प्रवृत्ति से सम्बन्धित नहीं हो, और परमेश्वर के सार और स्वभाव को नहीं समझते हो, तो अन्त में तुम ऐसे व्यक्ति हो जो नष्ट हो जाएगा। मेरे शब्द सुनने में कठोर लगें तो उन्हें दोष मत दो, और तुम लोगों के उत्साह की हवा निकलने के लिए उन्हें दोष मत दो। मैं सत्य बोलता हूँ; मेरा अभिप्राय तुम लोगों को हतोत्साहित करना नहीं है। चाहे मैं तुम लोगों से कुछ भी क्यों न माँगू, और चाहे इसे कैसे भी करने की तुम लोगों को आवश्यकता क्यों न हो, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोग सही पथ पर चलते हो, और आशा करता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करते हो और इस पथ से विचलित नहीं होते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचन के अनुसार आगे नहीं बढ़ते हो, और उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करते हो, तो इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता है कि तुम परमेश्वर के विरुद्ध बलवा कर रहे हो और सही पथ से भटक चुके हो। इसलिए मुझे लगता है कि कुछ ऐसे मामले हैं जो मुझे तुम लोगों के लिए स्पष्ट अवश्य करने चाहिए, और तुम लोगों से स्पष्ट रूप से, साफ-साफ, और जरा सी भी अनिश्चितता के बिना विश्वास अवश्य करवाना चाहिए, और परमेश्वर की प्रवृत्ति, परमेश्वर के इरादों, किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य को सिद्ध करता है, और वह किस तरीके से मनुष्य के परिणाम को तय करता है, इसे स्पष्ट रूप से जानने में तुम लोगों की सहायता करनी चाहिए। यदि ऐसा दिन आता है जब तुम इस मार्ग पर चलना शुरु करने में असमर्थ होते हो, तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, क्योंकि इन वचनों को पहले ही तुम लोगों को बिल्कुल साफ-साफ बता दिया गया है। जहाँ तक यह बात है कि तुम अपने स्वयं के परिणाम से किस प्रकार व्यवहार करते हो—यह मामला पूरी तरह से तुम्हारे ऊपर है। भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के परिणामों के बारे में परमेश्वर की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ हैं। मनुष्य को मापने के लिए उसके अपने स्वयं के तरीके हैं, और अपेक्षाओं का अपना स्वयं का मानक है। लोगों को मापने का उसका मानक ऐसा है जो हर एक व्यक्ति के लिए निष्पक्ष है—इस बारे में कोई सन्देह नहीं है! इसलिए कुछ लोगों के भय अनावश्यक हैं। क्या अब तुम लोगों को तसल्ली मिली है? आज के लिए इतना ही। नमस्कार!

17 अक्टूबर, 2013

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