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X. परमेश्वर को कैसे जाना जाए, इससे सम्बंधित सच्चाई के पहलू पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए

2. परमेश्वर के स्वभाव और सार को कोई कैसे जान सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

लोग अकसर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना सरल बात नहीं है। फिर भी, मैं कहता हूं कि परमेश्वर को जानना बिलकुल भी कठिन विषय नहीं है, क्योंकि वह बार बार मनुष्य को अपने कामों का गवाह बनने देता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है; उसने कभी भी मनुष्य से अपने आपको गुप्त नहीं रखा है, न ही उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचारों, उसके उपायों, उसके वचनों और उसके कार्यों को मानवजाति के लिए पूरी तरह से प्रकाशित किया गया है। इसलिए, जब तक मनुष्य परमेश्वर को जानने की कामना करता है, वह सभी प्रकार के माध्यमों और पद्धतियों के जरिए उन्हें समझ और जान सकता है। मनुष्य क्यों आँख बंद करके सोचता है कि परमेश्वर ने जानबूझकर उससे परहेज किया है, कि परमेश्वर ने जानबूझकर स्वयं को मानवता से छिपाया है, कि परमेश्वर का मनुष्य को उन्हें समझने या जानने देने का कोई इरादा नहीं है, उसका कारण यह है कि मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझने की इच्छा करता है; उससे भी बढ़कर, वह सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कार्यों की परवाह नहीं करता है..... सच्चाई से कहता हूँ, यदि कोई सृष्टिकर्ता के वचनों या कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करने और समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे, और सृष्टिकर्ता के विचारों एवं उनके हृदय की आवाज़ पर थोड़ा सा ध्यान दे, तो उन्हें यह एहसास करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कार्य दृश्यमान और पारदर्शी हैं। उसी प्रकार, यह महसूस करने में उन्हें बस थोड़ा सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य में है, कि वह मनुष्य और सम्पूर्ण सृष्टि के साथ हमेशा से वार्तालाप में है, और यह कि वह प्रति दिन नए कार्य कर रहा है। उसकी हस्ती और स्वभाव को मनुष्य के साथ उनके संवाद में प्रकट किया गया; उसके विचारों और उपायों को उसके कार्यों में पूरी तरह से प्रकट किया गया है; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसे ध्यान से देखता है। वह ख़ामोशी से अपने शांत वचनों के साथ मानवजाति और समूची सृष्टि से बोलता है: मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर हूँ, और मैं अपनी सृष्टि के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ, मैं तुम्हारी तरफ हूँ.....

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" से

परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होना कोई खिलवाड़ की बात नहीं है। आपको उसके स्वभाव को समझना ही होगा। इस तरह से आप धीर धीरे परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होते जाएँगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" से

परमेश्वर का स्वभाव एक ऐसा विषय है जो बहुत गूढ़ दिखाई देता है और जिसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि उसका स्वभाव मनुष्यों के व्यक्तित्व के समान नहीं है। परमेश्वर के पास भी आनन्द, क्रोध, दुखः, और खुशी की भावनाएँ हैं, परन्तु ये भी भावनाएँ उन मनुष्यों की भावनाओं से जुदा हैं। परमेश्वर का अपना अस्तित्व और स्वत्वबोध है। जो कुछ वह प्रकट और उजागर करता है वह उसके सार और उसकी पहचान का प्रस्तुतिकरण है। उसकी हस्ती, उसका स्वत्वबोध , साथ ही उसके सार और पहचान को किसी मनुष्य के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। उसका स्वभाव मानव जाति के प्रति उसके प्रेम, मानव जाति के लिए उसकी दिलासा, मानव जाति के प्रति नफरत, और उस से भी बढ़कर, मानव जाति की सम्पूर्ण समझ के चारों ओर घूमता रहता है। … परमेश्वर का स्वभाव सब बातों में जीवित प्राणियों के शासक, और सारी सृष्टि के प्रभु है। उसका स्वभाव आदर, सामर्थ, कुलीनता, महानता, और सब से बढ़कर, सर्विच्चता का प्रतिनिधित्व करता है। उसका स्वभाव अधिकार और उन सब का प्रतीक है जो धर्मी, सुन्दर, और अच्छा है। इस के अतिरिक्त, यह इस का भी प्रतीक है कि परमेश्वर को अंधकार और शत्रु के बल के द्वारा दबाया या उस पर आक्रमण नहीं किया जा सकता है, साथ ही इस बात का प्रतीक भी है कि उसे किसी भी सृजे गए प्राणी के द्वारा ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती है। (और उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं है) उसका स्वभाव सब से ऊँची सामर्थ का प्रतीक है। कोई भी मनष्य उसके कार्य और उसके स्वभाव को अस्थिर नहीं कर सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" से

वह आनन्दित होता है क्योंकि वह मानव जाति के लिए ज्योति और अच्छा जीवन ले कर आया है; उसका आनन्द धार्मिकता का है, हर चीज़ के सकारात्मक होने का एक प्रतीक, और सब से बढ़कर कल्याण का प्रतीक। परमेश्वर का क्रोध अन्याय की मौजूदगी और उस अस्थिरता के कारण है जो इससे पैदा होती है जो उसकी मानव जाति को हानि पहुँचा रही है; बुराई और अँधकार की उपस्थिति के कारण, और ऐसी चीज़ों की उपस्थिति जो सत्य को बाहर धकेल देती है, और उस से भी बढ़कर ऐसी चीज़ों की उपस्थिति के कारण जो उनका विरोध करती हैं जो भला और सुन्दर है। उसका क्रोध एक चिन्ह है कि वे सभी चीज़ें जो नकारात्मक हैं आगे से अस्तित्व में न रहें, और इसके अतिरिक्त यह पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुखः मानव जाति के कारण है, जिसके लिए उस ने आशा की थी परन्तु वह अंधकार में गिर गई, क्योंकि जो कार्य वह मनष्यों के लिए करता है मनुष्य वह उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, और क्योंकि वह जिस मानव जाति से प्रेम करता है वह ज्योति में पूरी तरह जीवन नहीं जी पाती। वह अपनी भोलीभाली मानव जाति के लिए, ईमानदार किन्तु अनजान मनुष्य के लिए, और अच्छे और अनिश्चित भाव वाले मनुष्य के लिए दुखः की अनुभूति करता है। उसका दुखः उसकी भलाई और उसकी करूणा का चिन्ह है, और सुन्दरता और उदारता का चिन्ह है। उसकी प्रसन्नता, वास्तव में, अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों के भले विश्वास को प्राप्त करने से आती है। इसके अतिरिक्त, सभी शत्रु ताकतों को भगाने और हराने से और मनुष्यों के द्वारा भले और शांतिपूर्ण जीवन को प्राप्त करने से आती है। परमेश्वर की प्रसन्नता, मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; उसके बजाए, यह मनोहर फलों को प्राप्त करने का एहसास है, एक एहसास जो आनंद से बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता इस बात का चिन्ह है कि मानव जाति दुखः की जंज़ीरों को तोड़कर आज़ाद होकर ज्योति के संसार में प्रवेश करती है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" से

क्या परमेश्वर की सत्यता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ) क्या परमेश्वर की विश्वासयोग्यता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) क्या परमेश्वर की निःस्वार्थता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) क्या परमेश्वर की विनम्रता ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) क्या मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) परमेश्वर मनुष्य को मुफ्त में सत्य एवं जीवन प्रदान करता है-क्या यह ही उसकी पवित्रता है? (हाँ।) यह सब जिसे परमेश्वर प्रगट करता है वह अद्वितीय है; यह भ्रष्ट मानवता के भीतर मौजूद नहीं है, न ही इसे वहाँ देखा जा सकता है। मनुष्य के विषय में शैतान की भ्रष्टता की प्रक्रिया के दौरान, इसका थोड़ा सा भी नामों निशान नहीं देखा जा सकता है, न तो शैतान के भ्रष्ट स्वभाव में और न ही शैतान के सार या स्वभाव में। अतः जो कुछ परमेश्वर के पास है और जो वह है वह अद्वितीय है और केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही इस प्रकार का सार है, केवल स्वयं परमेश्वर ही इस प्रकार के सार को धारण करता है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "स्वयं परमेश्वर, अद्वितीय VI" से

परमेश्वर के वचन को पढ़ने और परमेश्वर के वचन को समझने के माध्यम से ही परमेश्वर को अवश्य जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं: "मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?" परमेश्वर का वचन वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव का एक प्रकटन है। आप परमेश्वर के वचन से मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति का उद्धार, और जिस तरह से वे उन्हें बचाते हैं उसे देख सकते हैं.....क्योंकि परमेश्वर का वचन, परमेश्वर के द्वारा उसे लिखने हेतु मनुष्य के उपयोग के विपरीत, परमेश्वर के द्वारा ही प्रकट होता है। यह व्यक्तिगत रूप में परमेश्वर के द्वारा प्रकट किया जाता है। यह स्वयं परमेश्वर है जो अपने स्वयं के वचनों और अपने भीतर की आवाज़ को प्रकट कर रहा है। हम उन्हें हार्दिक वचन क्यों कहते हैं? क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उनकी इच्छा, उनके विचारों, मानवजाति के लिए उनके प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति उद्धार, तथा मानवजाति से उनकी अपेक्षाओं को प्रकट कर रहे हैं। … कभी-कभी परमेश्वर शांत एवं करुणामयी दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग परमेश्वर के अपमान न किए जा सकने योग्य स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य विलापनीय ढंग से गंदा है और परमेश्वर के मुख को देखने के योग्य नहीं है, और परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। लोगों का परमेश्वर के सामने आना अब पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह से ही है। जिस तरह परमेश्वर कार्य करता है और उसके कार्य के अर्थ से परमेश्वर की बुद्धि को देखा जा सकता है। भले ही लोग परमेश्वर के सम्पर्क में न आएँ, तब भी वे परमेश्वर के वचनों में इन चीज़ों को देखने में सक्षम होंगे।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "देहधारण का ज्ञान" से

वे वचन एवं वह स्वभाव जिन्हें परमेश्वर के द्वारा जारी एवं प्रकट किया गया था वे उसकी इच्छा को दर्शाते हैं, और वे उस के सार को भी दर्शाते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य के साथ संलग्न होता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह क्या कहता है या करता है, या वह कौन सा स्वभाव प्रकट करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर के सार और उसके स्वरूप के विषय में क्या देखता है, क्योंकि वे सभी मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि मनुष्य कितना कुछ एहसास करने, बूझने या समझने के योग्य है, यह सब कुछ परमेश्वर की इच्छा को दर्शाता है-मनुष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा! यह सन्देह से परे है! मानवजाति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि जिस प्रकार वह लोगों से अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार हों, कि जो वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसे करें, कि जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार जीवन जीएं, और जिस प्रकार वह उनसे अपेक्षा करता है वे उसी प्रकार परमेश्वर की इच्छा की सम्पूर्णता को पूरा करने के योग्य बनें। क्या ये चीज़ें परमेश्वर के सार से अविभाज्य हैं? दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने स्वभाव और स्वरूप को जारी करता है और उसी समय वह मनुष्य से मांग कर रहा है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से

परमेश्वर की सम्पत्ति और परमेश्वरत्व, परमेश्वर का सत्व, परमेश्वर का स्वभाव- यह सब कुछ मानवजाति को उसके वचन के माध्यम से समझाया जा चुका है। जब इंसान परमेश्वर के वचन को अनुभव करेगा, तो परमेश्वर के कहे हुए वचन के पीछे छिपे हुए उद्देश्यों को समझेगा, तो उनके अनुपालन की प्रक्रिया में, परमेश्वर के वचन की पृष्ठभूमि तथा स्रोत और परमेश्वर के वचन के अभिप्रेरित प्रभाव को समझेगा तथा सराहना करेगा। मानवजाति के लिए, ये सभी वे बातें हैं जो मनुष्य को अवश्य ही अनुभव, समझना और जीवन और सत्य में प्रवेश करने के लिए सीखनी चाहिए, परमेश्वर के अभिप्राय को समझना चाहिए, अपने स्वभाव में परिवर्तित हो जाना चाहिये और परमेश्वर की सम्प्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पित हो जाना चाहिये। साथ ही साथ मनुष्य जो अनुभव, समझता और इन बातों में प्रवेश करता है, तो वह धीरे-धीरे परमेश्वर की समझ को प्राप्त करता है और साथ ही वह ज्ञान के विभिन्न स्तरों को भी प्राप्त करता है। यह समझ और ज्ञान मनुष्य के द्वारा कल्पना करने या मानने से नहीं आती है, परन्तु उसके द्वारा जिसे उसने समझा है, अनुभव किया है, महसूस किया है और अपने आप में पक्का किया। केवल इन बातों को समझने , अनुभव करने, महसूस करने और अपने आप में पक्का करने के बाद ही परमेश्वर के प्रति मनुष्य का ज्ञान संतोष प्राप्त करता है। केवल वही ज्ञान वास्तविक, असली और सही है जो वह इस समय प्राप्त करता है और उसके वचनों का मूल्यांकन, करने, महसूस करने और अपने आप में पक्का करने के द्वारा परमेश्वर के प्रति सही समझ और ज्ञान को प्राप्त करने की यह प्रक्रिया, और कुछ नहीं वरन् परमेश्वर और मनुष्य के मध्य सच्चा संवाद है। इस प्रकार के संवाद के मध्य, मनुष्य परमेश्वर की समझ और उसके उद्देश्यों को समझ सकता है, परमेश्वर की सम्पत्ति और परमेश्वरत्व को सही तौर पर जान सकता है, परमेश्वर की वास्तविक समझ और तत्व को ग्रहण कर सकता है, धीरे-धीरे परमेश्वर की प्रकृति और समझ को जा पाता है, एक पूरी निश्चितता के साथ परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व की सही परिभाषा और परमेश्वर की पहचान और स्थान के ज्ञान तथा उसकी मौलिक छवि प्राप्त करता है। इस प्रकार की सहभागिता के मध्य, मनुष्य थोड़ा-थोड़ा करके बदलता है, परमेश्वर के प्रति उसके विचार, अब वह खाली हवा में अपने विचारों को नहीं दौड़ाता या उसके बारे में अपनी गलतधारणों पर लगाम लगाता है या उसे गलत नहीं समझता या उसकी भर्त्सना नहीं करता या उस पर अपना निर्णय नहीं थोपता या उस पर संदेह नहीं करता। फलस्वरुप, परमेश्वर के साथ मनुष्य के विवाद कम होंगे, झड़प कम होगी, और ऐसे मौके कम आयेंगे जब वह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। इसके विपरीत, मनुष्य का परमेश्वर के प्रति सरोकार और समर्पण बढ़ता ही जाता है और परमेश्वर के प्रति उसका आदर और अधिक गम्भीर होने के साथ-साथ वास्तविक होता जाता है। इस प्रकार के संवाद के मध्य में, मनुष्य सत्य के प्रावधानऔर जीवन के बपतिस्मा को केवल प्राप्त नहीं करता, अपितु उसी समय वह परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान को भी प्राप्त करता है। इस प्रकार के संवाद के मध्य में न केवल मनुष्य की प्रकृति में परिवर्तन होता जाता है और वह उद्धार को प्राप्त करता है, अपितु उसी समय वास्तविक आदर को एकत्रित करता है और परमेश्वर के प्रति प्राणी के रूप में आराधना करता है। इस प्रकार की सहभागिता रखने के कारण, मनुष्य का परमेश्वर पर भरोसा एक खाली कागज की तरह नहीं रहता या सिर्फ़ मुख से उच्चारित प्रतिज्ञाओं के समान, या खाली हवा को पकड़ना और मूर्तिकरण का प्रारुप नहीं होता है; केवल इस प्रकार की सहभागिता में मनुष्य प्रतिदिन परिपक्वता की ओर धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और अब धीरे-धीरे उसकी प्रकृति परिवर्तित होती जाएगी और धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रति उसका अनिश्चित और संदेहयुक्त विश्वास एक सच्चे समर्पण और सरोकार, वास्तविक आदर में बदल जाता है; और मनुष्य परमेश्वर के अनुसरण में, धीरे-धीरे निष्क्रियता से सक्रियता में विकसित होता जाता है, एक ऐसे मनुष्य से जिसपर कार्य किया गया हो से सकारात्मक कार्यशील मनुष्य में विकसित हो जाता है; केवल इसी प्रकार की सहभागिता से ही मनुष्य में वास्तविक समझ आ सकती है और वह परमेश्वर की अवधारणा को, परमेश्वर के वास्तविक ज्ञान को समझ सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से

इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम अपने अनुभव के किस पड़ाव पर आ चुके हो, तुम परमेश्वर के वचनों और सच्चाई से अलग नहीं हो सकते हो, और तुम जो कुछ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और तुम जो परमेश्वर का स्वरूप है उसके बारे में समझते हो वे सब परमेश्वर के वचनों में प्रकट है; और वे सत्य से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है ये सभी अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उस का एक प्रमाणिक प्रकटीकरण है। यह जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे ठोस करता है और खुलकर उनके बारे में बताता है; यह सीधे सीधे तुम्हें बताता है कि परमेश्वर को क्या पसंद है, और क्या पसंद नहीं है, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देना चाहता है, वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है और वह किस प्रकार के लोगों से प्रसन्न होता है। उन सच्चाईयों के पीछे जो परमेश्वर प्रकट करता है लोग उसके आनन्द, क्रोध, दुःख, और प्रसन्नता, साथ ही साथ उसके सार को देख सकते हैं-यह उसके स्वभाव का प्रकाशन है। जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे जानने, और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अलावा, जो बात सब से ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि एक व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने तुम्हें वास्तविक जीवन से अलग कर दे, तो वे उसे हासिल नहीं कर पाएँगे। भले ही कुछ लोग हों जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर लें, फिर भी यह सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहता है, और वास्तव में परमेश्वर जैसा है यह उसके समान नहीं है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से

परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर को समझने के लिए हमें बहुत थोड़े से ही प्रारम्भ करना होगा। लेकिन उस थोड़े से हम क्या प्रारम्भ करेंगे? सबसे पहले, मैंने बाईबिल के कुछ अध्यायों को पढ़कर जानकारी एकत्र की है। नीचे दी गई जानकारी में बाईबिल के वचन सम्मिलित हैं, उनमें से सब परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर के विषय से सम्बन्धित हैं। मैं ने विशेष रूप से इन अंशों को सन्दर्भ की सामग्रियों के रूप में पाया है ताकि परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, एवं स्वयं परमेश्वर को समझने में आप सब की सहायता करूं। …

…………

… लेकिन आज इन अध्यायों को खोजने का मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि आप इन कहानियों और उनके पात्रों को समझने की कोशिश करें। इसके बजाए यह इसलिए है ताकि आप इन पात्रों की कहानियों के द्वारा परमेश्वर के कार्यों और उसके स्वभाव को देख सकें, इस प्रकार आप परमेश्वर को जानना एवं समझना, उसके वास्तविक पहलु को देखना, अपनी कल्पनाओं को विराम देना, उसके विषय में अपनी अवधारणाओं को रोकना, और अस्पष्टता में मध्य अपने विश्वास को समाप्त करना आसान बना देते हैं। बिना किसी आधार के परमेश्वर के स्वभाव का एहसास करने और स्वयं परमेश्वर को जानने की कोशिश करना अकसर आपको असहाय, एवं दुर्बल महसूस करा सकता है, और आप अनिश्चित होते हैं कि कहाँ से शुरूआत करें। इसी लिए मैंने एक ऐसे तरीके एवं पहुंच का उपयोग करने के उपाय के विषय में सोचा था कि आपको बेहतर ढंग से परमेश्वर को समझने, और अधिक प्रमाणिक रूप से परमेश्वर की इच्छा की सराहना करने और परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर को जानने की अनुमति दूँ, और सचमुच में आपको परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस करने और मानवजाति के प्रति उसकी इच्छा की सराहना करने की अनुमति दूँ।

(उत्पत्ति 2:15-17) जब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उस में काम करे और उसकी रक्षा करे, तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, कि तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है: पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना; क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाये उसी दिन अवश्य मर जायेगा।

…………

इन कुछ साधारण वचनों में, हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं। लेकिन हम किस प्रकार का हृदय देखते हैं? क्या परमेश्वर के हृदय में प्रेम है? क्या इसके पास कोई चिंता है? इन वचनों में परमेश्वर के प्रेम एवं चिंता को न केवल लोगों के द्वारा सराहा जा सकता, लेकिन इसे भली भांति एवं सचमुच में महसूस भी किया जा सकता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? अब मैं ने इन बातों को कहा है, क्या आप लोग अब भी सोचते हैं कि ये बस कुछ साधारण वचन हैं? इतने साधारण नहीं हैं, ठीक है? क्या आप लोग इसे पहले से देख सकते थे? यदि परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से आपसे इन थोड़े से साधारण वचनों को कहा होता, तो आप भीतर से कैसा महसूस करते? यदि आप एक दयालु व्यक्ति नहीं हैं, यदि आप का हृदय बर्फ के समान ठण्डा पड़ गया है, तो आप कुछ भी महसूस नहीं करेंगे, आप परमेश्वर के प्रेम की सराहना नहीं करेंगे, और आप परमेश्वर के हृदय को समझने की कोशिश नहीं करेंगे। लेकिन यदि आप ऐसे व्यक्ति हैं जिसके पास विवेक है, एवं मानवता है, तो आप कुछ अलग महसूस करेंगे। आप सुखद महसूस करेंगे, आप महसूस करेंगे कि आपकी परवाह की जाती है और आपसे प्रेम किया जाता है, और आप खुशी महसूस करेंगे। क्या यह सही नहीं है? जब आप इन चीज़ों को महसूस करते हैं, तो आप परमेश्वर के प्रति किस प्रकार कार्य करेंगे? क्या आप परमेश्वर से जुड़ा हुआ महसूस करेंगे? क्या आप अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर से प्रेम और उसका सम्मान करेंगे? क्या आपका हृदय परमेश्वर के और करीब जाएगा? आप इससे देख सकते हैं कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम कितना महत्वपूर्ण है? लेकिन जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है वह परमेश्वर के प्रेम के विषय में मनुष्य की सराहना एवं समझ है। वास्तव में, क्या परमेश्वर ने अपने कार्य के इस चरण के दौरान ऐसी बहुत सी चीज़ों को नहीं कहा था? लेकिन क्या आज के लोग परमेश्वर के हृदय की सराहना करते हैं? क्या आप लोग परमेश्वर की इच्छा का आभास कर सकते हैं जिसके बारे में मैं ने बस अभी अभी कहा था? आप लोग परमेश्वर की इच्छा को भी परख नहीं सकते हैं जब यह इतना ठोस, स्पर्शगम्य, एवं यथार्थवादी है। इसी लिए मैं कहता हूँ कि आप लोगों के पास परमेश्वर के विषय में वास्तविक ज्ञान एवं समझ नहीं है। क्या यह सत्य नहीं है?

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" से

अनुमान और कल्पना न करना ही सबसे उत्तम विकल्प होगा, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आती है, तो मनुष्य को कभी भी कल्पना पर भरोसा, और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं असल में यहाँ पर तुम सब से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ, परमेश्वर की स्वयं की पहचान, और परमेश्वर की हस्ती को तुम्हारी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो। तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के द्वारा, संगति के द्वारा, और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों के द्वारा, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़नेवाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया जाए, या तुम सबको कुछ करने से रोका जाए। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, परन्तु इसके बजाए प्रशंसा करना, जाँच करना, और प्रमाणित करना है कि वह परमेश्वर जिसमें तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है, प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता करता है, और यह कि उसकी सामर्थ ने सभी समयों में यह साबित किया है कि, परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सच्चाई के द्वारा, उन सब के द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही वह एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक सरल तरीके की खोज करना चाहते हैं, किन्तु क्या तुम लोग ऐसे किसी तरीके के बारे में सोच सकते हो? मैं तुम्हें बताता हूँ, सोचने की आवश्यकता ही नहीं हैः और कोई तरीके नहीं हैं! एकमात्र तरीका है कि हर एक वचन जिसे वह प्रकट करता है और हर एक चीज़ जिसे वह करता है उसके जरिए सचेतता और स्थिरता से जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसे जानें और प्रमाणित करें। क्या यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र तरीका है? क्योंकि जो परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर का सब कुछ, वह सब खोखला या खाली नहीं है - परन्तु वास्तविक है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से

पिछला:परमेश्वर को जानना वास्तव में क्या है? क्या बाइबल की जानकारी और धार्मिक सिद्धांत को समझना, परमेश्वर को जानना माना जा सकता है?

अगला:परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और ज्ञान मुख्यतः किन पहलुओं में प्रकट हैं?

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क्या वह हर व्यक्ति जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता है, वास्तव में विपत्ति में पड़ जाएगा? प्रश्न 10: तुम इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हो कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है और अंतिम दिनों में न्याय का अपना कार्य करता है। मुझे लगता है कि प्रभु यीशु में हमारा विश्वास और पवित्र आत्मा के कार्य की स्वीकृति का मतलब है कि हमने पहले से ही परमेश्वर के न्याय का अनुभव किया है। सबूत के तौर पर यहाँ प्रभु यीशु के वचन दिए गए हैं: "क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा; परन्तु यदि मैं जाऊँगा, तो उसे तुम्हारे पास भेजूँगा। वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा" (योहन 16:7-8)। हमारा मानना है कि, हालांकि प्रभु यीशु का कार्य छुटकारे का कार्य था, जब वह स्वर्ग तक पहुंच गया तो पेन्तेकोस्त के दिन, पवित्र आत्मा उतर आया और उसने मनुष्यों पर काम किया: "पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर या कायल करेगा"। यह आखिरी दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य होना चाहिए, इसलिए मैं जिस बात का अनुसरण करना चाहता हूँ, वो यह है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा अंतिम दिनों में किए गए न्याय के कार्य और प्रभु यीशु के कार्य के बीच वास्तव में क्या भिन्नताएँ हैं? बाइबल के साथ वास्तव में कैसे पेश आना चाहिए और उसका उपयोग किस तरह से करना चाहिए कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो? बाइबल का मूलभूत मूल्य क्या है? प्रश्न 31: बाइबल में जकर्याह की पुस्तक में, यह भविष्यवाणी की गई है: "यरूशलेम नगर के पूर्व में जैतून पहाड़ है। प्रभु उस दिन उस पहाड़ पर खड़ा होगा।…" परमेश्वर की वापसी निश्चित रूप से यहूदिया में जैतून के पहाड़ पर होगी, और फिर भी तुम गवाही देते हो कि प्रभु यीशु पहले ही वापस आ चुका है, चीन में प्रकट हुआ है और कार्यरत है। चीन एक नास्तिक देश है और यह सबसे अंधकारमय, सबसे पिछड़ा राष्ट्र है जो परमेश्वर को सबसे गंभीर रूप से नकारता है, तो प्रभु की वापसी चीन में कैसे हो सकती है? हम वास्तव में इसको समझ नहीं सकते, इसलिए कृपया हमारे लिए इसका उत्तर दो।