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कैसे जियें आज्ञाकारी जीवन

I

तुम सबके आत्मिक कद जांचे जाते हैं,

यह जानने के लिए, क्या बन सकती है कलीसिया,

क्या एक दूसरे का कहना मान सकोगे तुम।

यों देखा जाए तो, तुम्हारी आज्ञाकारिता

ऐसी है जैसी तुम चुनते हो।

शायद तुम एक का कहना मान भी लो,

पर दूसरे का कहना न मान पाओ।

चिंतन करोआज्ञाकारिता पर

और सोचो अपने जीवन में इसे कैसे उतारें।

परमेश्वर की शरण लो, इस पर संवाद करो।

धीरे-धीरे तुम जान जाओगे।

तुम त्याग दोगे अपनी अवधारणाएं,

छोड़ दोगे अपने भीतर के विकल्पों को।

II

मानव धारणाओं के भरोसे रहकर,

आज्ञाकारी नहीं हुआ जा सकता।

मगर परमेश्वर के विचार हमेशा

इंसान के विचारों से ऊपर होंगे।

मसीह ने देहांत तक आज्ञा मानी

और क्रूस पर प्राण दे दिये,

बिना किसी शर्त, बिना किसी वजह के,

अपने पिता की इच्छा मानी।

तुम्हारी आज्ञाकारिता का दायरा है छोटा।

परमेश्वर कहता है कि आज्ञापालन

लोगों की बाहरी बात मानना नहीं,

बल्कि भीतर के जीवन की आज्ञा मानना है,

स्वयं परमेश्वर की आज्ञा मानना है।

परमेश्वर के वचन बदल देते हैं तुम्हें भीतर से।

वरना, कौन किसका कहना मानेगा?

तुम सभी तो एक-दूसरे की अवज्ञा करते रहते हो।

चिंतन करो आज्ञाकारिता पर

और सोचो अपने जीवन में इसे कैसे उतारें।

परमेश्वर की शरण लो, इस पर संवाद करो।

धीरे-धीरे तुम जान जाओगे।

तुम त्याग दोगे अपनी अवधारणाएं,

छोड़ दोगे अपने भीतर के विकल्पों को।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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