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74 मानवजाति के लिए परमेश्वर के उद्धार का प्रेम

डैन्यी सिचुआन प्रांत

हर बार जब मैं परमेश्वर के इन वचनों को देखती हूँ मेरे हृदय में एक अपराध-बोध उमड़ने लगता है: "मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपनी नियति एवं अपने भविष्य की संभावनाओं के सिवाए और कुछ नहीं सोचता है, यह कि वह उनसे बहुत प्रेम करता है। मनुष्य अपनी नियति एवं अपने भविष्य की संभावनाओं की खातिर परमेश्वर का अनुसरण करता है; वह परमेश्वर के लिए अपने प्रेम के कारण उसकी आराधना नहीं करता है। और इस प्रकार, मनुष्य पर विजय पाने में, मनुष्य के स्वार्थीपन, लोभ एवं ऐसी चीज़ें को जो परमेश्वर के विषय में उसकी आराधना में सबसे अधिक व्यवधान डालती हैं उन सब को हटा दिया जाना चाहिए। ऐसे करने से, मनुष्य पर विजय पाने के प्रभावों को हासिल कर लिया जाएगा। परिणामस्वरुप, मनुष्य पर पाई गई प्रारम्भिक विजय में यह ज़रूरी था कि सबसे पहले मनुष्य की अनियन्त्रित महत्वाकांक्षाओं और भयंकर कमज़ोरियों को शुद्ध किया जाए, और, इसके माध्यम से, परमेश्वर के विषय में मनुष्य के प्रेम को प्रगट किया जाए, और मानवीय जीवन के विषय में उसके ज्ञान को, परमेश्वर के विषय में उसके दृष्टिकोण को, और मनुष्य के अस्तित्व के विषय में उस अर्थ को बदल दिया जाए। इस रीति से, परमेश्वर के विषय में मनुष्य के प्रेम को शुद्ध किया जाता है, कहने का तात्पर्य है, मनुष्य के हृदय को जीत लिया जाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से)। यह बार-बार परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के माध्यम से हुआ है कि मैं अंततः अपने विवेक में आ गई और मैंने जान लिया कि जिस बात की परमेश्वर अपेक्षा करता है वह मानवजाति का एकनिष्ठ और शुद्ध प्रेम है, और सभी रचनाओं के लिए परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश करना और अपने कर्तव्य को पूरा करना सही और उचित है। मैं यह भी जान गई कि जब लोग अपने भविष्य की नियति के द्वारा अब और लाचार नहीं होंगे और परमेश्वर के लिए जीने में समर्थ हो जाएँगे, तो उन पर जीत का कार्य सफल हो जाएगा। हालाँकि, जब मैं एक अगुवे के रूप में कार्य कर रही थी, तो मैं सत्य का अनुसरण करने में अपने प्रयास नहीं लगा रही थी; मैं सदैव अपने भविष्य की नियति के विचारों से शासित हो रही थी। इस कारण, मैं प्राय: इस हद तक शुद्धिकरण से हो कर गुजरा करती थी कि मैं नकारात्मक बन गई थी, और यह मात्र मेरे अपने जीवन के भीतर ही एक हानि नहीं थी, बल्कि इसने परमेश्वर के घर में भी मेरे कार्य को हानि पहुँचाई। हालाँकि परमेश्वर ने मेरे आज्ञालंघनों के आधार पर मेरा निपटारा नहीं किया। उसने मुझे पश्चाताप करने के अनेक अवसर दिए। परमेश्वर के वचनों से न्याय और ताड़ना और साथ ही पीड़ादायक शुद्धिकरण थे, उसके वचनों से जीवनाधार, आराम, सहारा और चरवाही थी, पवित्र आत्मा का मेरा मार्गदर्शन करना, मुझे प्रबुद्ध करना था, और बारम्बार मेरे लिए मार्ग को रोशन करना था—केवल इन चीज़ों के माध्यम से ही मैं कदम-दर-कदम शैतान के पाश को तोड़ कर मुक्त हो पाने, अपना मार्ग न गँवाने, और जीवन में उपयुक्त मार्ग पर जाने का साहस करने में समर्थ हुई थी। जब मैं अपने लिए परमेश्वर के उद्धार पर चिन्तन करती हूँ, तो अतीत बहुत ही जीवंत हो जाता है।

मेरा जन्म देहात में हुआ था। मेरी तीन बहनें थीं, और क्योंकि मेरे पिता वंशक्रम के पारम्परिक विचार को अविरत बनाए रखने के अधीन थे, इसलिए उसने कोई पुत्र न होने के बजाय कानून द्वारा अनुमत से अधिक बच्चे होने के कारण अर्थ-दण्ड दिए जाने को वरीयता दी। क्योंकि देहात में लडकियों से ऊपर लड़कों को वरीयता देना अधिक गम्भीर है, जिस घर में एक लड़का नहीं होता है, उस घर में उसका वंशक्रम समाप्त समझा जाता है। यही वह बात थी जिसने मेरे पिता को सबसे अधिक दुःखी किया था, और मेरे माता-पिता इस बारे में प्रायः झगड़ते रहते थे। कईं बार तलाक की आशंका आ जाती थी और मेरे पिता प्रायः चीज़ों को तोड़ देते थे। मैं हमेशा उस दिन की आशा करती थी जिस दिन मेरे माता-पिता में अब और झगड़ा नहीं होगा। मुझे याद है एक बार जब एक छोटे से मुद्दे के कारण मेरी चचेरी बहन मुझ पर चिल्लाई थी "तुम्हारा वंशक्रम टूट गया है!" जब मैंने उन हृदयविदारक वचनों को सुना, तो मैंने कुछ नहीं कहा। उसके बाद से शैतान के विषों जैसे कि "कौन कहता है लड़कियाँ लड़कों जितनी अच्छी नहीं हैं," "पारिवारिक प्रतिष्ठा" और "आगे बढ़ना" ने मेरी आत्मा की गहराइयों में गंभीर पकड़ प्राप्त कर ली थी । मुझमें एक गुप्त अभिलाषा विकसित हो गई थी: मैं परिवार में सबसे बड़ी बेटी हूँ और मैं अपने माता-पिता के लिए मान्यता प्राप्त करने का प्रयास करूँगी। एक दिन मैं दिखा दूँगी कि यद्यपि मेरे माता-पिता के कोई बेटा नहीं है, किन्तु एक बेटी होना उससे भी बेहतर है।

प्राथमिक विद्यालय में मैं एक मेहनती छात्रा थी और मैं विद्यालय की समस्त गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लेती थी। मेरे शिक्षकों के द्वारा अक्सर मेरी प्रशंसा की जाती थी और मैंने कुछ ईनाम भी जीते थे। अपनी कक्षा में मैं कला समिति की सदस्या, अध्ययन समिति की सदस्या, एक टीम की कप्तान और एक साम्यवादी युवा लीग की सदस्या थी। जब मैं माध्यमिक विद्यालय में गई, तो मैं चीनी भाषा की कक्षा की प्रतिनिधि थी और मैंने प्रत्येक वर्ष के खेल-कूद सम्मिलनों में ईनाम जीते थे। हमारे देश में, वे प्रत्येक शिक्षक दिवस पर एक वीडियो बनाते थे और विद्यालय अभिनयों के एक कार्यक्रम का आयोजन करता था। मेरे शिक्षकों ने विशेष रूप से अनुरोध किया कि मैं एक मुख्य भूमिका में भाग लूँ। उस समय मेरे शिक्षक मेरे लिए बहुत ऊँचे विचार रखते थे, और मेरे सहपाठी ईर्ष्यालु हो गए थे। जब मेरे पिता ने देखा कि मैं टेलीविजन पर हूँ तो वह बहुत अधिक प्रसन्न हुआ था और उसे मुझ पर बहुत गर्व हुआ था। जब मैंने उनकी प्रसन्नता भरी मुस्कुराहट को देखा, तो मैने रोमांचित महसूस किया कि मैं उसके लिए यह पहचान प्राप्त कर सकी थी।

1999 वर्ष के अन्तिम दिनों में, हमारे सम्पूर्ण परिवार ने परमेश्वर की ओर से एक नया कार्य स्वीकार कर लिया और क्योंकि मुझ पर आशिषित होने के विचार हावी थे, इसलिए अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए मैंने घर को छोड़ने का जीवन आरम्भ कर दिया। अगुवे की स्वीकृति और साथ ही अपने भाइयों और बहनों का सहयोग प्राप्त करने के लिए, मैंने अपने कर्तव्य को पूरा करने में कठिनाइयों को सहने के लिए अपनी ओर से यथासाध्य चेष्टा की, और ऐसे किसी भी कार्य को करने के लिए, जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के घर के द्वारा की जाती थी या जो अगुवे के द्वारा व्यवस्थित की जाती थी, मैं वह सब करती, जो मैं कर सकती थी। उस समय, सुसमाचार के कार्य में मैं अपने सहकर्मियों में श्रेष्ठ लोगों में से एक थी, और मेरी प्रत्येक परियोजना सफल हो रही थी। यद्यपि सत्य की मेरी समझ सतही थी, फिर भी जब भी मेरे भाइयों और बहनों के घर में कोई समस्या होती, उनके कार्य में समस्याएँ आतीं, या उनके जीवन-प्रवेश में कठिनाइयाँ आतीं, तो मैं सदैव परमेश्वर के वचनों की खोज करती और उनके साथ संगति करती। मेरे भाई-बहनों की मेरे साथ पटती थी और अगुवा मेरे बारे में उच्च विचार रखता था। मैंने धीरे-धीरे महसूस करना आरम्भ कर दिया था कि परमेश्वर के घर में मैं एक विलक्षण प्रतिभा हूँ।

2006 के आरंभ में, मुझे क्षेत्रीय अगुवा के रूप में पदोन्नत कर दिया गया, और जब मैंने देखा कि जिस क्षेत्र के लिए मैं उत्तरदायी थी उसका परिणाम अन्य क्षेत्रों की तुलना में कुछ अच्छा है, तो मैं स्वयं सोचती थी: यद्यपि मैंने इस प्रकार का कर्तव्य नहीं किया, था फिर भी मैंने प्रत्येक परियोजना को दूसरों की तुलना में पहले कार्यान्वित किया और मेरे कार्य के परिणाम भी बेहतर हैं। अगुवा भी मुझे प्रशिक्षित करना चाहती है; यदि मेरे माता-पिता जान लेते कि मैं इस कर्तव्य को पूरा कर सकती थी, तो मैं नहीं जानती कि वे कितने प्रसन्न होते। विशेष रूप से जब मैं कार्य करने के लिए अपने गृहनगर गई, तो गर्व के साथ घर लौटने का अहसास सर्वदा ही रहता था, और मैं आशा करती थी मैं और भाइयों और बहनों को देखूँगी, जो मुझे जानते थे ताकि वे जान सकें कि जो कर्तव्य मैं कर रही थी वे इस स्तर के थे। मैं आत्म-बधाई देने वाले की स्थिति में जी रही थी और यहाँ तक कि मेरे बोलने का ढंग भी बदल गया था। मैंने दूसरे लोगों की नज़र में अपनी छवि पर ध्यान केन्द्रित करना आरम्भ कर दिया था। तब तक, परमेश्वर के वचन पर पर अपने प्रयास लगाने पर मेरा अब और ध्यान केन्द्रित नहीं था और मैं जीवन में प्रवेश की अब और कोशिश नहीं करती थी। इसके बजाय, मैं अगुवे के दृष्टिकोण और अपने मूल्यांकन पर और इस बात पर ध्यान केन्द्रित करती थी कि जिन लोगों के लिए मैं कार्य करती थी क्या वे मेरा सहयोग करते हैं। समय बीतने के साथ, मैं कलीसिया के मामलों और जिन लोगों के साथ मैं काम करती थी उनके कार्य के विचलनों या चूकों को सुलझाने में अब और समर्थ नहीं थी। अपने सहकर्मियों के साथ सभा करते समय मैं उनके साथ अपनी संगति को अब और साझा नहीं कर सकती थी। यह मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था, और मुझे लगता था कि मैं एक चलती-फिरती लाश हूँ, जो अन्धकार में जी रही है। अन्त में, न केवल मेरी पदोन्नति नहीं की गई, बल्कि मुझे बदल दिया गया था। उस समय मैं बहुत आहत हुई थी और मैं स्वयं विचार करती थी: मेरे माता-पिता और भाई-बहन, जो मुझे जानते हैं, यदि वे यह जान लेते कि मुझे बदल दिया गया है, तो वे मेरे बारे मैं क्या सोचते? मैं पारिवारिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने या आगे बढ़ने में समर्थ नहीं हो पाऊँगी। ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे लिए सब कुछ समाप्त हो गया और मेरे पास बताने के लिए कोई भविष्य नहीं है। मैं निराशा से भरी हुई थी और परमेश्वर के वचन को पढ़ने, प्रार्थना करने के लिए अनिच्छुक थी, और मैं अपने भाइ-बहनों को देखने या उनसे सम्पर्क करने की तो बिल्कुल भी इच्छुक नहीं थी। मेरे हृदय की कमज़ोरी और नकारात्मकता एक निश्चित स्थिति पर पहुँच चुकी थी। बाद में, मैंने परमेश्वर के इन वचनों को देखा: "तुम लोगों के प्रयास में, तुम लोगों की बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत की[क] अभिलाषा, और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के उत्कृष्ट निरूपण हैं। लोगों के हृदयों में ये चीजें विद्यमान हैं इसका कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का विष हमेशा लोगों के विचारों को दूषित कर रहा है, और लोग शैतान के इन प्रलोभनों से पीछा छुड़ाने में हमेशा असमर्थ हैं। वे पाप के बीच में रहते हैं, मगर इसे पाप होना नहीं मानते हैं, और वे अभी भी विश्वास करते हैं: 'हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे अवश्य हमें आशीष प्रदान करने चाहिए और हमारे लिए सब कुछ उचित प्रकार से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर अवश्य होना चाहिए, और हमारे पास किसी और की तुलना में अधिक हैसियत और अधिक भविष्य अवश्य होना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीषें अवश्य देनी चाहिए। अन्यथा, इसे परमेश्वर पर विश्वास नहीं कहा जाएगा'" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम लोग एक विषमता होने के इच्छुक क्यों नहीं हो?" से)। परमेश्वर द्वारा दिए गए प्रकाशन के इन वचनों के प्रत्येक वाक्य ने मेरे हृदय को जकड़ लिया। मुझे जो बदल दिया गया था वह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव का मुझ पर आना था और यह मेरे हृदय में हैसियत की चिन्ता को निपटाने के लिए था। चूँकि मैं एक छोटी सी लड़की थी, इसलिए शैतान के, "कौन कहता है कि लड़कियाँ, लड़कों जितनी अच्छी नहीं होती हैं," "पारिवारिक प्रतिष्ठा" और "आगे बढ़ना" के विष निरन्तर मेरे विचारों को इस स्थिति तक भ्रष्ट कर रहे थे कि परमेश्वर पर मेरे विश्वास के दृष्टिकोण असहनीय रूप से कुरूप हो गए थे। इस प्रकार के विचारों की वर्चस्वता के अधीन, मैंने अपने कर्तव्यों को करने के लिए कड़ी मेहनत की थी, मैं वर्षों तक व्यस्तता में इधर-उधर भागी थी, परन्तु वास्तव में मैं आगे बढ़ने और पारिवारिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के मेरे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर का उपयोग करना चाहती थी। मैं बहुत तिरस्करणीय थी! बहुत कुरूप थी! तथ्यों और उसके न्याय के वचनों के द्वारा, परमेश्वर ने उजागर किया कि इस खोज के मेरे आंतरिक परिप्रेक्ष्य निश्चित रूप से शैतान के जैसे ही थे। मैं असफलता के मार्ग पर थी, और परमेश्वर के समयोचित न्याय और ताड़ना के बिना, मैं इस प्रकार की खोज का अनुसरण करना जारी रखती और अन्त में मैं केवल अपने विनाश में और पौलुस के जैसे अन्त में गिर सकती थी।

मैं सोचती थी कि मेरे इस समझ को प्राप्त करने के पश्चात कुछ परिवर्तन होने चाहिए, किन्तु 2008 में एक अन्य प्रकाशन हुआ जिसने मुझे यह देखने के लिए बाध्य किया कि स्वभाव में परिवर्तन इतना सरल नहीं था जितना मैं सोचती थी। मैं कुछ शुद्धिकरण से गुज़रने के पश्चात खोज के अपने दृष्टिकोण की थोड़ी सी समझ रखने मात्र से परिवर्तित नहीं हो सकती थी। केवल दीर्घकालिक न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही परिवर्तन सम्भव है। उस समय मुझे एक अन्य क्षेत्र में परमेश्वर के लिए सिंचाई का कर्तव्य करने के लिए नियुक्त किया गया था। जब उस बहन के साथ, जो उस कार्य की प्रभारी थी, एक बैठक समाप्त हुई, तो मैंने अपने हृदय में मूल्यांकन करना आरम्भ कर दिया कि संगति में हम में से कौन अच्छा था, और मेरा दर्ज़ा क्या था। मैंने कार्य की प्रभारी बहन के मेरे प्रति मतों और दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान दिया। जब मैंने देखा कि वह दूसरी बहन पर ध्यान दे रही है, तो मैंने वास्तव में स्वयं को डगमगाता हुआ महसूस किया। जब उसने मुझे कलीसिया के अगुआओ और उपयाजकों की सिंचाई करने के लिए जाने को कहा, तो मैंने सोचा कि यह केवल मेरी योग्यताओं की बर्बादी करना था और मैंने महसूस किया कि वह नहीं जानती थी कि लोगों का प्रबन्धन कैसे करते हैं। मैं कम से कम जिले के अगुवों और कार्यकर्ताओं की सिंचाई तो कर सकती थी। इसी कारण से मैं निराशावादी और हताश हो गई और मैंने खोज करने की अपनी इच्छा गँवा दी। मैं नकारात्मकता की एक स्थिति में जी रही थी। यद्यपि कई बार मेरे सामने बाधाएँ आईं, किन्तु मैंने इनके बारे में कुछ विचार नहीं किया था। बाद में परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव मुझ पर आया और मुझे आंत्रपुच्छ शोथ (अपेन्डिसाइटिस) की पुनरावृत्ति हो गई थी, किन्तु मैंने फिर भी अपने कठोर हृदय को नहीं मोड़ा। ऐसा तब तक रहा जब कि एक बार मैंने अपने मेज़बान परिवार के घर पर पाँवों के रूखेपन और फटे होने का उपचार करने की दवा की एक बोतल अपने पलंग के पास रखी एक छोटी मेज़ पर नहीं रख दी थी। वहाँ एक सात वर्षीय लड़की ने सोचा कि यह कोई अच्छी चीज़ है और वह चुपके से इसे पी गई, और उसके पश्चात वह पीड़ा में अपने पेट को पकड़ कर और चिल्लाते हुए जमीन पर थी। उस समय मैं इतना डर गई थी कि मुझे पता नहीं था कि क्या करूँ। मेजबान परिवार में मेरी बहन बच्ची को बचाने के लिए शीघ्रता से सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले गई, और चिकित्सक ने कहा: "बच्ची का पेट बहुत कमज़ोर है, किन्तु तुम उसे बच्चों के अस्पताल नहीं ले गई। तुम तो बस उसके मरने का इंतजार करना चाहती हो?" मेरी टाँगें प्राणहीन जैसी महसूस होती थी, और जब मैंने उस पर विचार किया जो चिकित्सक ने कहा था, तो मैं बहुत ही असहज हो गई। यहाँ तक कि मुझे यह भी नहीं पता कि मैं क्लिनिक से चलकर अपने मेज़बान परिवार तक कैसे लौटी। मैंने अपने आप में विचार किया: यदि बच्ची की वास्तव में ही मृत्यु हो जाती है, तो उसके माता-पिता निश्चित रूप से खोजबीन करेंगे कि हुआ क्या था।...मैं इसके बारे में जितना अधिक सोचती, मैं उतना ही अधिक भयभीत हो जाती। मैं रोना चाहती थी किन्तु आँसू नहीं आए। समय एक-एक क्षण और एक-एक मिनट करके निकलता गया। मैं स्वयं को शान्त नहीं कर सकती थी—मैं वास्तव में पीड़ित थी। मैंने परमेश्वर के वचनों को पलटा और निम्नलिखित को देखा: "मेरा मानना है कि हमारे लिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम उसे संतुष्ट करने का सबसे आसान तरीका, अर्थात, उसकी सभी व्यवस्थाओं का पालन करें, और यदि तुम वास्तव में इसे प्राप्त कर सकते हो तो तुम पूर्ण कर दिए जाओगे। क्या यह एक आसान, हर्षित बात नहीं है? … परमेश्वर के कार्य में आज, वह आसानी से क्रोधित नहीं होता, लेकिन अगर लोग उसकी योजना को बाधित करना चाहते हैं तो वह एक झटके में अपना स्वभाव बदल सकता है और उसे उज्ज्वल से बदली में परिवर्तित कर सकता है। इसलिए, मैं तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम शांत हो जाओ और परमेश्वर के उद्दश्यों के सामने झुक जाओ, ताकि वह तुम्हें पूरा कर सके। एक चतुर व्यक्ति बनने का यही एक तरीका है" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "मार्ग... (7)" से)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि परमेश्वर का स्वभाव लोगों के अपराधों को सहन नहीं करता है; मैंने जान लिया कि मेरे कृत्य परमेश्वर की अरुचि को ले आए थे और उसके क्रोध को भड़काते थे। मुझे मार्ग दिखाने के लिए उसने मुझे जानने दिया कि मुझे खोज में कैसे लगना चाहिए। जब मैं बीमार और पीड़ा में थी, तब मैंने कोई आत्मविश्लेषण नहीं किया था। परमेश्वर ने एक बार फिर से मुझे ताड़ना देने, मुझे पीड़ित करने, मुझे इन बातों को एक ओर करने में समर्थ बनाने, सत्य की खोज करने, और परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन के लिए छोटी बच्ची के दवा खाने की घटना का उपयोग किया था। परमेश्वर मुझे शैतान के द्वारा निरन्तर मूर्ख बनाए जाते रहने, इतना अधिक संघर्ष करते रहने और प्रतिष्ठा और हैसियत के इर्द-गिर्द भागते रहने की अनुमति दिए जाने को सहन नहीं कर सकता था। इस प्रकार की मेरी ताड़ना, मेरा न्याय और शुद्धिकरण मुझे हैसियत के उस गहरे गड्ढे को दिखाने का उसका अंतिम उपाय था जिसमें मैं फँसी हुई थी। ताड़ना के अनेक अनुभवों ने मेरे हृदय को नहीं जगाया था; मैं अभी भी अपने भीतर के शैतानी स्वभाव के नियन्त्रण और कष्ट से मुक्त नहीं हो सकी थी। बीती बातों की जाँच करने में, जब मैं पहली बार कार्य करने के लिए आई थी, तब मुझमें उत्कृष्ट होने की अकड़ थी, और पहले-पहल मैं विश्वास करती थी कि किसी महत्वपूर्ण उद्देश्य के लिए मुझे पदोन्नत कर दिया जाएगा; मैंने कल्पना नहीं की थी जमीनी-स्तर के कार्य को पूरा करने के लिए पदावनत कर दिया जाएगा। जिन लोगों को मैं अपने मुकाबले का नहीं सोचती थी, वे जिलों के लिए अगुआई के स्तर पर भाइयों और बहनों की सिंचाई कर रहे थे, और उनमें से कुछ को तो यहाँ तक कि पदोन्नत भी कर दिया गया था जबकि मेरी अपनी संभावनाएँ वीरान दिखाई देती थी। मैं सोचती थी कि: यहाँ अपने कर्तव्य को करने से बेहतर घर लौट जाना होगा। इसलिए जब मैं कलीसिया के अगुआओं मिली, तो मैंने बस प्रवृत्ति के अनुसार चलना आरम्भ कर दिया। मैंने उनके जीवन की कोई जिम्मेदारी नहीं ली, और मैंने कलीसिया के भीतर विभिन्न मामलों की सच्ची ज़िम्मेदारी का भी दायित्व नहीं लिया, परमेश्वर की इच्छा पर विचार करने का तो ज़िक्र ही नहीं। उस समय, जब मेरा सामना परमेश्वर के वचनों से हुआ, जो अत्यधिक करुणा और प्रेम से भरे हुए थे, तो मैंने उसके प्रति अत्यधिक कृतज्ञ महसूस किया। परमेश्वर के विचार मनुष्य के जीवन के लिए हैं, और वह मानवता के लिए सब कुछ अर्पित कर देता है; यह मनुष्य को शैतान के अधिकार क्षेत्र से पूरी तरह से बचाने के लिए है। परन्तु मैं अपने कार्य का कुछ भी परमेश्वर को अर्पित करने की अनिच्छुक थी। समस्या की जड़ यह थी कि मैं सदैव शैतान के विष द्वारा बँधी हुई और शासित हो रही थी । मैं एक भोली-भाली बच्ची के समान थी जिसे अपने माता-पिता की भली मंशाओं की कोई समझ नहीं होती है; मैं परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाने के अनेक अवसर खो चुकी थी। मात्र एक बार एक जागृति प्राप्त करने से ही चीज़ें इस स्थिति तक पहुँच गई थी—क्या इसमें बहुत देरी तो नहीं हो गई थी? मैं ग्लानि और आत्म-निंदा से भर कर भूमि पर गिर गई: "हे परमेश्वर! आज मुझ पर जो न्याय और ताड़ना आई है, यह सब तेरी धार्मिकता है। मैं आज्ञापालन करने इच्छुक हूँ। यदि अभी भी कोई मौका है, तो मैं स्वयं को बदलने, अपने भविष्य की नियति के वास्ते भागते-फिरते रहने की अब और इच्छुक नहीं हूँ। मैं तेरे हाथों में मात्र एक छोटी सी सृजित-वस्तु बनने, अपने सिंचाई के कर्तव्य को जितना अच्छी तरह से मैं कर सकती हूँ उतना करने और तेरे हृदय को आराम पहुँचाने की इच्छुक हूँ।" मेरे प्रार्थना करने के बाद मेरा हृदय शान्त हो गया था। मैं अपने-आप को पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित करने की इच्छुक और उससे भी अधिक उस छोटी सी बच्ची को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित करने की इच्छुक थी। थोड़ी ही देर में, मैंने दरवाज़ा खुलते हुए मेज़बान परिवार में से उस बहन की आवाज़ को, और उस छोटी बच्ची को चिल्लाते हुए सुना: "आंटी, क्या आप मुझे पक़ड़ लेंगी?" फिर उसने मुझे धीरे से कहा: "आंटी, आपको इसे पूरी तरह से एक राज़ रखना है; आप मेरी दादी को नहीं बता सकती कि मैंने आपका पानी पी लिया था!" उस क्षण अंततः मेरा हृदय यह देखकर मुक्त हो गया कि कौन जानता है कि परमेश्वर ने मुझे, इस "पत्थर" को बचाने के लिए कितने लोगों, घटनाओं और वस्तुओं का चतुराई से प्रबंध किया था। मैं महसूस करती थी कि मैं सर्वथा अयोग्य हूँ। तब से, मेरी आकांक्षाएँ अपने भविष्य की नियति के लिए अब और नहीं रह गईं थी। मैंने बस अपने पाँव भूमि पर रखे और परमेश्वर के हृदय को आराम पहुँचने के लिए अपने सिंचाई के कर्तव्य को पूरा करने के लिए अपने सर्वोत्तम प्रयास किए। मैं कोई भी कार्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार अब और नहीं कर रही थी और जब मुझे पता चलता था कि मेरे भाइयों और बहनों के कर्तव्यों में कोई भटकाव या चूक है, तो मैं धैर्यपूर्वक उनसे संवाद करती, उनकी सहायता करती और उन्हें सहारा देती थी। अपने भाइयों और बहनों के साथ मेरी संगति के माध्यम से मैंने कुछ सत्य प्राप्त किया और उसके साथ-साथ ही उनसे कुछ-कुछ सबक भी सीखे। उस समय मैं अब और विश्वास नहीं करती थी कि मेरी योग्यताएँ बर्बाद रही हैं। मैंने परमेश्वर के भले इरादों को और इस बात को समझ लिया था कि इस कर्तव्य को पूरा करना ही मेरे जीवन में आवश्यकता है। यह परमेश्वर ही था जो मेरी कमियों की क्षतिपूर्ति करने के लिए उनके अनुसार एक वातावरण तैयार कर रहा था। मैं परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ! तब से, मैं मन की शांति के साथ अपना कर्तव्य पूरा करने में समर्थ हो गई हूँ। मैंने कल्पना नहीं की थी कि अति शीघ्र ही, अगुवे ने मुझ से बात की और मुझे दो प्रान्तों के जिलों के अगुवों और कार्यकर्ताओं की सिंचाई के लिए कहा। तब मैंने परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को देखा, कि वह मनुष्य के हृदय की गहराइयों तक जाँच करता है और हर चीज़ का प्रभारी है। परमेश्वर को जो पसंद हैं वह है सरल व्यक्ति, जो अपने कर्तव्य को पूरा करता हो। मुझे अपना कर्तव्य करने देने का एक अवसर प्रदान करने के लिए मैं परमेश्वर को धन्यवाद देती हूँ। जिले के अगुवों के साथ मिलते समय मुझे कुछ मामले ज्ञात हुए और मैंने उन पर मेहनत से कार्य किया। मैं सभाओं में ज्ञात हुए मामलों को, वहाँ कौन सी समस्याएँ फैली हुई थी, मैं उन्हें हल कैसे कर रही थी, और मैंने किन समस्याओं का हल नहीं किया था, को अभिलिखित भी करती थी। कुछ समय के पश्चात मैंने महसूस किया कि मेरा इस प्रकार से कर्तव्य पूरा करना बहुत ही यथार्थवादी था। मेरा हृदय निश्चिन्त और शान्त था और मैं "आगे बढ़ने" के विष के शासन के अब और अधीन नहीं थी। मुझे महसूस होता था जैसे कि मैं कई पहलुओं की कुछ सच्चाई से सुसज्जित हो गई थी कुछ सच्चाई समझ गई थी, कि मैं भाइयों और बहनों के साथ प्रवेश कर सकती थी, कि मैं एक निम्न प्रोफाइल वाली व्यक्ति थी। मैं समझती थी कि एक सृजित प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करना एक अटल सिद्धान्त है और यह कि मुझे मेरे पवित्र कर्तव्य के रूप में आज्ञाओं का पालन करते हुए, अपने पर ध्यान न देते हुए या अपने लिए योजनाएँ न बनाते हुए, बल्कि हर चीज़ में परमेश्वर के घर के हितों को महत्वपूर्ण बनाते हुए, बस एक सैनिक के जैसा होना चाहिए। यही एक रचित प्राणी को करना चाहिए।

फरवरी 2012 के अन्तिम दिनों में, अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए मुझे अन्य प्रान्त में स्थानान्तरित कर दिया गया था। उस समय मेरा हृदय बहुत शान्त था और मैं घूर-घूर कर नहीं देख रही थी जैसा कि मैं अतीत में घूरती थी। जब मैं उस पद को शुरू करने गई ही थी तभी ऐसा समय आया कि परमेश्वर का घर कलीसिया की शुद्धि कर रहा था। ऊपर वाले ने कार्य व्यवस्था में कहा: "कलीसिया में पाँच प्रकार के लोगों की शुद्धि का कार्य 2012 के श्रम-दिवस के अवकाश से पहले अवश्य पूरा हो जानी चाहिए। क्योंकि शुद्धि का कार्य राज्य के सुसमाचार के कार्य को फैलाने हेतु मार्ग तैयार करने के लिए है, इसलिए इसे अवश्य सुसमाचार के कार्य को बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करना चाहिए" (कलीसिया की संगति और कार्य व्यवस्थाओं के वार्षिक-वृत्तान्त II में "केवल कलीसिया की पूरी तरह से शुद्धि करने और राज्य के सुसमाचार का निर्बाध प्रसार सुनिश्चित करने के द्वारा ही परमेश्वर महिमान्वित होता है")। कुछ अगुवों और कर्मचारियों को अविलंब बदलने की आवश्यकता थी; कार्य का प्रत्येक पहलू लगभग थम सा गया था। परमेश्वर की सुरक्षा के कारण उस समय कठिनाइयों ने मुझे नहीं निगला था। जब मैं अगुवों और कार्यकर्ताओं को व्यवस्थित कर रही थी, तो मैं उन लोगों की सामग्रियों एकत्रित करने के लिए उचित लोगों को संगठित कर रही थी जिन्हें पद से हटाया या निकाला जाना था। हालाँकि मार्च के अंत के दिन आ गए, मैंने देखा कि अभी तक किसी भी व्यक्ति को निकालने की एक भी अधिसूचना जारी नहीं की गई थी। मैं वास्तव में अपने हृदय के शुद्धिकरण से गुजरी थी। मैं तर्क और बहानों से भरी हुई थी; मैंने अपने आप विचार किया कि मैं इस कर्तव्य को करने का अभ्यास मात्र कर रही थी; और मैं सत्य के बारे में स्पष्ट नहीं थी, और मैं इस प्रयास के मार्गदर्शन के अपने कार्य को अब और जारी नहीं रख सकती थी। जब मैं शुद्धिकरण प्राप्त कर रही थी तभी, कार्य की प्रभारी बहन ने मेरा निपटारा करने के लिए मुझे बुलाया। उस समय मैं बहुत परेशान थी और इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। मैंने अपने हृदय में ग़लत किया गया महसूस किया। मैंने सोचा कि: मैं अभी-अभी यहाँ पहुँची हूँ, तुम अच्छी तरह से जानती हो कि मेरा कार्य किस तरह का है। सहयोग करने के लिए जो कुछ मैं कर सकती हूँ मैं वह सब करती रही हूँ, और तुम मुझे सान्त्वना नहीं देती हो, बल्कि इसके बजाय मेरा निपटारा करती हो। ठीक इसी तरह, मैं शुद्धिकरण के मध्य जी रही थी और "बदल दी गई" का शब्द मुझे बार-बार डरा रहा था। यद्यपि मैं कार्य कर रही थी, किन्तु मैं अपना आत्मविश्वास खो चुकी थी और मैं लगातार सोचती रहती थी: शायद इस बार मुझे बदल दिया जाएगा, क्योंकि कार्य व्यवस्था में ऐसा कहा गया है कि ऐसे अगुवे जो पाँच प्रकार के लोगों को पद से हटाने और निकालने का कार्य नहीं कर सकते हैं, उन्हें अवश्य बदल दिया जाना चाहिए। बाद में, मुझे परमेश्वर के वचन के एक भजन के बारे में विचार आया जिसे मैं प्रायः गाया करती थी: "परमेश्वर का शुद्धिकरण जितना बड़ा होगा, उतने ही अधिक लोगों के दिल परमेश्वर से प्रेम कर पाएंगे। उनके दिल की पीड़ा उनके जीवन के लिए लाभदायक है, वे परमेश्वर के सामने अधिक सुकून महसूस कर पाते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध अधिक करीबी होता है, वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को बेहतर देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शुद्धिकरण का अनुभव किया, अय्यूब कई परीक्षणों से गुज़रा। यदि तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण करे, तो तुम्हें भी सैकड़ों बार शुद्धिकरण से गुज़रना होगा; अगर तुम इस प्रक्रिया से गुज़रते हो, इस कदम पर निर्भर रहते हो, तभी तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर पाओगे, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण हो पाओगे। शुद्धिकरण सबसे अच्छा माध्यम है जिससे परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है; केवल शुद्धिकरण और कड़वे परीक्षण लोगों के दिल में परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार पैदा कर सकते हैं। कठिनाइयों के बिना, लोग परमेश्वर से सच्चा प्यार नहीं कर पाते हैं; अगर उनका परीक्षण नहीं किया जाता है, वास्तव में वे शुद्धिकरण से नहीं गुज़रते हैं, तो उनके दिल हमेशा बाहरी दुनिया में लिप्त रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शुद्धिकरण होने के बाद, तुम अपनी कमज़ोरियों और कठिनाइयों को देख पाओगे, तुम देख पाओगे कि तुम में कितनी कमी है और जिन समस्याओं का तुम सामना करते हो उनका हल निकालने में तुम असमर्थ हो, तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञा कितनी बड़ी है, तुम वास्तव में स्वयं को जान पाओगे। अगर तुम इस प्रक्रिया से गुज़रते हो, इस कदम पर निर्भर रहते हो, तभी तुम परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर पाओगे, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण हो पाओगे" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "शुद्धिकरण है सबसे अच्छा माध्यम जिससे परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है")। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के माध्यम से मैंने जान लिया कि शुद्धिकरण लोगों को सिद्ध करने का परमेश्वर का सर्वोत्तम उपाय है, और यदि मेरी बहन मेरा निपटारा न करती, तो मेरा हृदय अभी भी इधर-उधर भटक रहा होता। क्योंकि मेरा आलस्य और चापलूसीपन बहुत प्रबल थे, इसलिए केवल इस प्रकार के वातावरण के माध्यम से ही मैं अग्रसक्रिय हो सकी थी और अपने तर्कों और बहानों से बाहर आ सकी थी। केवल इस प्रकार के शुद्धिकरण के माध्यम से ही मैं यह स्पष्ट रूप से देख सकी थी कि मैं कुछ नहीं हूँ और यह कि मुझ में अनेक दोष हैं, परन्तु इसने यह भी उजागर किया कि मैं अभी भी अपनी भविष्य की नियति के विचारों के शासन के अधीन हूँ। इस तथ्य के बावजूद कि इन कुछ वर्षों के दौरान मुझे ताड़ना के अनेक अनुभव प्राप्त हुए थे, मैं किसी भी प्रकार की निरर्थक प्रतिष्ठा या हैसियत के पीछे भागने की और इच्छुक नहीं थी, और मैं बाहर से और अधिक ईमानदार बन गई थी, किन्तु मेरी आत्मा की गहराई में अभी भी शैतान का विष विद्यमान था। मैंने पीछे मुड़कर उन परिस्थितियों के बारे में सोचा जब मैं यहाँ आई ही थी: उन्होंने मुझ पर जाहिर किया कि पिछले अगुवे ने व्यावहारिक कार्य नहीं किया था, बल्कि मात्र सिद्धान्त की बात करता था, वह कलीसिया की शुद्धि का कार्य नहीं कर रहा था। मैंने स्वयं विचार किया: मैं कोई ऐसी व्यक्ति नहीं हो सकती हूँ जो मात्र सिद्धान्त की ही बात करती हो किन्तु व्यावहारिक कार्य नहीं करती हो। मुझे अपना कार्य अच्छी तरह से करना है और श्रम दिवस से पहले इन पाँच प्रकार के लोगों की पूरी तरह से बाहर निकालना है, ताकि जिन लोगों के लिए मैं कार्य कर रही हूँ, वे देख लेंगे कि मैं पिछले अगुवे से उत्तम हूँ, ताकि प्रभारी व्यक्ति मुझे मान्यता देगी। यह पता चला कि मैं उस इच्छा को पूरा करने लिए इधर-उधर भाग रही थी और कड़ी मेहनत कर रही थी। परमेश्वर बहुत धार्मिक है—उसे मेरे हृदय की गन्दगी की बहुत गहराई तक जानकारी है। मैं परमेश्वर के पक्ष में होने या परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखने या अपने भाइयों और बहनों की सुरक्षा करने के लिए कार्य नहीं कर रही थी, बल्कि मैं स्वयं को स्थापित करने का षड्यन्त्र रच रही थी। मसीह विरोधी परमेश्वर के घर के कार्य को अस्त-व्यस्त और नष्ट कर रहे हैं, किन्तु मैं इन दुष्टात्माओं को परमेश्वर के घर से बाहर निकालने और उसके हृदय को सान्त्वना देने में असमर्थ थी। मैं सच में मरने के लायक हूँ! कष्टों और आत्म-दोषारोपण के बीच मैं फर्श पर गिर पड़ी: "हे परमेश्वर! मैं इस कर्तव्य को पूरा कर सकी थी यह तेरी ओर से सबसे बड़ा उत्कर्ष था, किन्तु मैं कृतघ्न थी और मैंने तेरी इच्छा की परवाह नहीं की। मैं वास्तव में तिरस्कार के योग्य हूँ। आज, मैंने तेरे धार्मिक स्वभाव का अनुभव कर लिया है, और यद्यपि मेरी भ्रष्टताएँ अभी भी अनगिनत हैं, फिर भी मैं तेरे द्वारा सिद्ध बनाए जाना स्वीकार करने की इच्छुक हूँ। मैं इस वातावरण के भीतर शुद्ध किए जाने की इच्छुक हूँ, और तेरे साथ कार्य करने के लिए मैं अपना सर्वोत्तम प्रयास करने की इच्छुक हूँ, और सभी मसीह विरोधी दुष्टात्माओं से पीछा छुड़ाने के लिए अपने भाइयों और बहनों के साथ एकजुट होने की और अधिक इच्छुक हूँ।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा: "भविष्य में आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से ही लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं। सभी लोगों की यही अभिलाषा और आशा है। तथापि, मानव प्रकृति के भीतर भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में आप उत्तीर्ण नहीं होते हैं, इन पहलुओं में आपको परिष्कृत किया जाना चाहिए - यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर आपके लिए एक वातावरण बनाते है, जिससे आप अपने खुद के भ्रष्टाचार को जानने के लिए, परिष्कृत होने के लिए बाध्य हों। अंततः आप उस बिंदु पर पहुंच जाते हैं जहां आप मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देना और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करेंगे।

इसलिए यदि लोगों में कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं है, यदि उनके पास कुछ मात्रा में पीड़ा नहीं है, तो वे, देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने के लिए उनकी सोच में और उनके दिल में, सक्षम नहीं होंगे। जिन पहलुओं में आप अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हैं, जिन पहलुओं में आप अभी भी आपकी अपनी इच्छाएं रखते हैं, आपकी अपनी मांगें हैं – उन पहलुओं में ही आपको कष्ट उठाना होगा। केवल दुख में ही सबक सीखा जा सकता है, जिसका मतलब है कि सच्चाई प्राप्त करने में और परमेश्वर का इरादा समझने में सक्षम होना। वास्तव में, कई सच्चाइयों को दर्दनाक परीक्षणों के अनुभव के भीतर समझा जाता है। कोई भी नहीं कहता है कि परमेश्वर की इच्छा ज्ञात है, कि उनकी सर्वसमर्थता और उनका ज्ञान समझ लिए गए हैं, कि परमेश्वर के न्यायपरायण स्वभाव की सराहना आसानी के, या अनुकूल परिस्थितियों के, परिवेश में की जाती है। यह असंभव होगा!" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "कसौटियों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें" से)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जान लिया था कि मेरी भविष्य की नियति की मेरी चिन्ताएँ मेरी प्रकृति में सबसे घातक चीज़ें बन गई थी। क्योंकि इसके लिए मैं परमेश्वर के घर के कार्य को अस्त-व्यस्त कर सकती थी, और तब भी इसके द्वारा शासित रह सकती थी, इसलिए मुझे शुद्ध करने के लिए परमेश्वर ने एक बार फिर से एक वातावरण तैयार किया। इससे मैंने देखा कि परीक्षण और शुद्धिकरण सभी परमेश्वर की व्यवस्थाएँ थीं, और यदि इन कुछ वर्षों के दौरान मेरा निपटारा और शुदिधिकरण न किया गया होता, यदि मैंने इन अभागे वातावरणों का अनुभव न किया होता, तो देह के बारे में मेरी आत्मा और मन के विचार नहीं बदते। निपटाए जाने और शुद्धिकरण के कई दौरों के बाद मेरी कोशिशें अंततः एक रूपान्तरण से हो कर गुज़री। मैं आशीषों के उद्देश्य से या परमेश्वर के साथ लेन-देन करने के लिए, या प्रतिष्ठा और हैसियत या अपनी भविष्य की नियति को अधिक महत्व देने के लिए परमेश्वर पर अब और विश्वास करने की इच्छुक नहीं थी। मनुष्य को बचाने में परमेश्वर की इच्छा के विषय में भी मैं और अधिक स्पष्ट हो गई थी।

तब से, अपना कर्तव्य पूरा करते समय, इस बात की परवाह किए बिना कि भले ही मुझे बदल दिया जाता है या मेरे कर्तव्यों को समायोजित कर दिया जाता है, तब भी मैं अपने हृदय में अधिक शान्त रहती हूँ और इस बारे में पहले की तरह अब और चिंतित नहीं होती हूँ कि मुझे क्या प्राप्त हो सकता है या मैं क्या गँवा सकती हूँ। मुझे तो बस इतना ही महसूस होता है कि यह एक और उत्तरदायित्व और कर्तव्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मेरे लिए क्या कार्य व्यवस्थित किया गया है, मैं बस परमेश्वर की इच्छा का पालन करने और जो कुछ मैं करने के योग्य हूँ वह करने की इच्छुक हूँ। मैं जिन कर्तव्यों को पूरा करती हूँ वे सभी परमेश्वर के द्वारा आदेशित हैं, और मैं अपने पाँव भूमि पर रखने और सत्य की खोज करने, अतीत के अपने अपराधों और ऋणों की क्षतिपूर्ति करने, परमेश्वर के व्यावहारिक प्रेम को जीने में पतरस के उदाहरण का अनुसरण करने की इच्छुक हूँ। बस इस भजन में परमेश्वर के वचनों के समान: "हे परमेश्वर! हमने एक दूसरे से दूर समय बिताया है, एक दूसरे के साथ समय बिताया है। मैंने कुछ नहीं किया तुम्हारे लिए, फिर भी तुम करते हो सबसे ज़्यादा प्रेम मुझसे। मैंने बार-बार तुम्हारा विरोध किया है, बार-बार तुम्हें दुख पहुंचाया है। मैं कैसे भूल सकता हूं ऐसी बातों को? जो काम किया है तुमने मुझमें, जो सौंपा है तुमने मुझे, मैं रखता हूं हमेशा अपने ध्यान में, कभी नहीं भूलता हूं मैं। जो काम तुमने मुझ में किया है, मैंने की है अपनी पूरी कोशिश। तुम जानते हो मैं क्या कर सकता हूं, तुम यह भी जानते हो मैं कौन-सी भूमिका निभा सकता हूं। मेरे पास जो कुछ भी है, मैं तुम्हें समर्पित करूंगा। हालांकि शैतान ने मुझे बनाया है बहुत मूर्ख, और मैंने बार-बार किया है तुम्हारा विरोध, मुझे विश्वास है कि तुम मुझे उन पापों के लिए याद नहीं करते हो, तुम मेरे साथ उनके आधार पर व्यवहार नहीं करते हो। मैं तुम्हें अपना पूरा जीवन समर्पित करना चाहता हूं। मैं कुछ भी नहीं मांगता, और न ही हैं मेरी कोई अन्य आशाएं या योजनाएं; मैं केवल तुम्हारी मंशा के अनुसार कार्य करना चाहता हूं, और तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूं। मैं पीऊंगा तुम्हारे कड़वे प्याले से। मैं अपना दिल, शरीर और मेरा पूरा सच्चा प्यार तुम्हें समर्पित करने के लिए तैयार हूं, तुम्हारे सामने इन्हें रखने को तैयार हूं, पूरी तरह से तुम्हारी आज्ञा मानने को तैयार हूं, तुम्हारी इच्छा के प्रति पूरी तरह से विचारशील रहने को तैयार हूं। देह के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे काम के लिए" (मेमने का अनुसरण करना और नए गीत गाना में "पतरस की प्रार्थनाएं")।

अब, मैंने परमेश्वर पर 14 वर्षों से अधिक समय से विश्वास किया है। परमेश्वर के अनुग्रह की वजह से मैंने परमेश्वर के घर में सदैव अपने कर्तव्यों को पूरा किया है। इसमें अनेक उतार-चढ़ाव आए हैं; इसमें हँसी रही है, इसमें दुःख के आँसू रहे हैं, इसमें परमेश्वर की इच्छा को समझने की खुशी और परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से अपराध-बोध की अनुभूतियाँ रही है। इससे भी अधिक, इसमें सत्य को अभ्यास में लाने से आनन्द और शान्ति रही है। मैंने वास्तव में बहुत कुछ प्राप्त किया है। मैंने परमेश्वर के न्याय और ताड़ना की अच्छाई का अनुभव किया है—यह बहुत वास्तविक है! उसके न्याय और ताड़ना के बिना मुझ में वे बदलाव कभी नहीं आते, जो मुझ में आए हैं। अब से मेरे आने वाले दिनों में, मैं परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने की इच्छुक हूँ, उन कड़वे परीक्षणों को और अधिक स्वीकार करने की इच्छुक हूँ जो परमेश्वर मेरे लिए निर्धारित करता है, ताकि मैं परमेश्वर के न्यायों और ताड़नाओं से उसके द्वारा शुद्ध की जा सकूँ, बचाई जा सकूँ और सिद्ध की जा सकूँ। इसके माध्यम से मैं मूल्यवान सार्थक जीवन बिता सकती हूँ!

फुटनोट:

क. मूल पाठ "की इच्छा" को छोड़ देता है।

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