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99. मानवजाति के गंतव्य और राज्य के सुंदर दृश्य वास्तव में कैसे होते हैं? परमेश्वर के कौन-से वचन इन्हें सत्यापित करते हैं?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

मेरे वचनों के पूर्ण होने के बाद, राज्य धीरे-धीरे पृथ्वी पर आकार लेने लगता है और मनुष्य धीरे-धीरे सामान्य हो जाता, और इस प्रकार पृथ्वी पर मेरे हृदय में राज्य स्थापित हो जाता है। उस राज्य में, परमेश्वर के सभी लोगों को सामान्य मनुष्य का जीवन वापस मिल जाता है। बर्फीली शीत ऋतु चली गई है, उसका स्थान बहारों के संसार ने ले लिया है, जहाँ साल भर बहार बनी रहती है। लोग आगे से मनुष्य के उदास और अभागे संसार का सामना नहीं करते हैं, और न ही वे आगे से मनुष्य के शांत ठण्डे संसार को सहते हैं। लोग एक दूसरे से लड़ाई नहीं करते हैं। एक दूसरे के विरूद्ध युद्ध नहीं करते हैं, वहाँ अब कोई नरसंहार नहीं होता है और न ही नरसंहार से लहू बहता है; पूरी ज़मीं प्रसन्नता से भर जाती है, और यह हर जगह मनुष्यों के बीच उत्साह को बढ़ाता है। मैं पूरे संसार में घूमता हूँ, मैं ऊपर सिंहासन से आनन्दित होता हूँ, और मैं सितारों के मध्य रहता हूँ। और स्वर्गदूत मेरे लिए नए नए गीत गाते और नए नए नृत्य करते हैं। अब उनके चेहरों से उनकी स्वयं की क्षणभंगुरता के कारण आँसू नहीं ढलकते हैं। मैं अब अपने सामने स्वर्गदूतों के रोने की आवाज़ नहीं सुनता हूँ, और अब कोई मुझ से किसी कठिनाई की शिकायत नहीं करता है। आज, तुम लोगमेरे सामने रहते हो; कल तुम लोग मेरे राज्य में बने रहोगे। क्या यह सब से बड़ा आशीष नहीं है जिसे मैं मनुष्य को देता हूँ?

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "अध्याय 20" से

जब मनुष्य पृथ्वी पर मनुष्य के असली जीवन को हासिल करता है, तो शैतान की सारी ताकतों को बांध दिया जाएगा, और मनुष्य आसानी से पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा। परिस्थितियां उतनी जटिल नहीं होंगी जितनी आज हैं: मानवीय रिश्ते, सामाजिक रिश्ते, जटिल पारिवारिक रिश्ते..., वे इस प्रकार परेशान करने वाले और कितने दुखदायी हैं! यहाँ पर मनुष्य का जीवन कितना दयनीय है! एक बार मनुष्य पर विजय प्राप्त कर ली जाए तो, उसका दिल और दिमाग बदल जाएगा: उसके पास ऐसा हृदय होगा जो परमेश्वर पर श्रद्धा रखता है और ऐसा हृदय होगा जो परमेश्वर से प्रेम करता है। जब एक बार ऐसे लोग जो इस विश्व में हैं जो परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखते हैं उन पर विजय पा ली जाती है, कहने का तात्पर्य है, जब एक बार शैतान को हरा दिया जाता है, और जब एक बार शैतान को—अंधकार की सारी शक्तियों को बांध लिया जाता है, तो फिर पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन कष्टरहित होगा, और वह पृथ्वी पर आज़ादी से जीवन जीने में सक्षम होगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

जब मनुष्यजाति को उसकी मूल समानता में पुनर्स्थापित कर दिया जाता है, जब मानवजाति अपने संबंधित कर्तव्यों को पूरा कर सकती है, अपने स्वयं के स्थान को सुरक्षित रख सकती है और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं का पालन कर सकती है, तो परमेश्वर पृथ्वी पर लोगों के एक समूह को प्राप्त कर चुका होगा जो उसकी आराधना करते हैं, वह पृथ्वी पर एक राज्य स्थापित कर चुका होगा जो उसकी आराधना करता है। उसके पास पृथ्वी पर अनंत विजय होगी, और जो उसके विरोध में है वे अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा; इससे सब चीजों के सृजन का उसका मूल अभिप्राय पुनर्स्थापित हो जाएगा, और इससे पृथ्वी पर उसका अधिकार, सभी चीजों के बीच उसका अधिकार और उसके शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी पुनर्स्थापित हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के प्रतीक हैं। इसके बाद से मानवजाति विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी जो सही मार्ग का अनुसरण करता है। मनुष्य के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा, और एक अनंत जीवन में प्रवेश करेगा जो परमेश्वर और मनुष्य द्वारा साझा किया जाता है। पृथ्वी पर से गंदगी और अवज्ञा ग़ायब हो जाएगी, वैसे ही पृथ्वी पर से विलाप ग़ायब हो जाएगा। उन सभी का अस्तित्व पृथ्वी पर नहीं रहेगा जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। केवल परमेश्वर और वे जिन्हें उसने बचाया है ही शेष बचेंगे; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

विश्राम में जीवन बिना युद्ध, बिना गंदगी और लगातार बनी रहने वाली अधार्मिकता के बिना है। कहने का अर्थ है कि इसमें शैतान के उत्पीड़न (यहाँ "शैतान" का संकेत शत्रुतापूर्ण शक्तियों से हैं), शैतान की भ्रष्टता, और साथ ही परमेश्वर की विरोधी किसी भी शक्ति के आक्रमण का अभाव है। हर चीज अपने मूल स्वभाव का अनुसरण करती है और सृष्टि के प्रभु की आराधना करती है। स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह से शांत हो जाते हैं। यह मानव जाति का विश्राम से भरा जीवन है। जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करेगा, तो पृथ्वी पर अब और कोई अधार्मिकता नहीं रहेगी, और शत्रुतापूर्ण शक्तियों का आक्रमण नहीं होगा। मानवजाति एक नये राज्य में भी प्रवेश करेगी, वह शैतान द्वारा भ्रष्ट की गयी मानव जाति अब और नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानव जाति होगी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद बचाया गया है। मानवजाति के विश्राम का दिन परमेश्वर के भी विश्राम का दिन है। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने की असमर्थता के कारण परमेश्वर ने अपना विश्राम खोया; ऐसा नहीं था कि वह मूलरूप में विश्राम करने में असमर्थ था। विश्राम में प्रवेश करने का यह अर्थ नहीं है कि सभी चीज़ों का चलना बंद हो जाएगा, या सभी चीजें विकसित होना बंद कर देंगी, न ही इसका यह अर्थ है कि परमेश्वर का कार्य होना बंद हो जाएगा, या मनुष्य का जीवित रहना बंद हो जाएगा। विश्राम में प्रवेश करने का चिन्ह इस प्रकार है: शैतान नष्ट कर दिया गया है; शैतान के साथ बुरे कामों में शामिल दुष्ट लोगों को दण्डित किया गया है और मिटा दिया गया है; परमेश्वर के प्रति सभी शत्रुतापूर्ण शक्तियों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि वह मानवजाति के उद्धार के अपने कार्य को अब और नहीं करेगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश के भीतर और उसके आशीषों के अधीन जीवन जीएगी; वहाँ शैतान की कुछ भी भ्रष्टता नहीं होगी, न ही कोई अधार्मिक बात होगी। मानवजाति सामान्य रूप से पृथ्वी पर रहेगी, वह परमेश्वर की देखभाल के अधीन रहेगी। जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो इसका अर्थ होगा कि मानवजाति को बचा लिया गया है और शैतान का विनाश हो चुका है, कि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया है। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और कार्य नहीं करता रहेगा, और मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र में अब और नहीं रहेगा। इसलिए, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा, और मनुष्य अब और जल्दबाजी नहीं करेगा; परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपनी मूल अवस्था में लौट जाएगा, और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्थान में लौट जाएगा। ये वे स्थान हैं जिनमें परमेश्वर के समस्त प्रबंधन के अंत के बाद परमेश्वर और मनुष्य अपने-अपने विश्राम करेंगे। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंज़िल है, और मनुष्य के पास मनुष्य की मंज़िल है। विश्राम करते हुए, परमेश्वर पृथ्वी पर समस्त मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करता रहेगा। जबकि परमेश्वर के प्रकाश में, मनुष्य स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेगा। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, और मनुष्य भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर की मंज़िल में रहने में असमर्थ होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही राज्य के भीतर नहीं रह सकते हैं; बल्कि दोनों के जीने के अपने स्वयं के तरीके हैं। परमेश्वर वह एक है जो समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करता है, जबकि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का ठोस स्वरूप है। यह मानवजाति है जिसकी अगुवाई की जाती है; सार के संबंध में, मानवजाति परमेश्वर के समान नहीं है। विश्राम करने का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। परमेश्वर पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, या मानवजाति के बीच होने के समय मानवजाति के आनंद या उसकी पीड़ाओं में सहभागी नहीं बनेगा। जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करती है, तो इसका अर्थ है कि मनुष्य एक सच्ची सृष्टि बन गया है; मानवजाति पृथ्वी पर से परमेश्वर की आराधना करेगी और सामान्य मानवीय जीवन जीएगी। लोग परमेश्वर के अब और अवज्ञाकारी और प्रतिरोध करने वाले नहीं होंगे; वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएँगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के संबंधित जीवन और उनकी मंज़िलें हैं। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इस तरह, परमेश्वर का अपने प्रबंधन का कार्य पूरा करने के बाद विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश इसी तरह से अपरिहार्य प्रवृत्ति बन जाता है। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी है, और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। मनुष्य विश्राम करते हुए परमेश्वर की आराधना करेगा और पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा, और जब परमेश्वर विश्राम करेगा, तो वह मानवजाति के बचे हुए हिस्से की अगुआई करेगा; वह उनकी स्वर्ग से अगुआई करेगा, पृथ्वी से नहीं। परमेश्वर तब भी पवित्रात्मा ही होगा, जबकि मनुष्य तब भी देह होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों के विश्राम करने के स्वयं के संबंधित भिन्न-भिन्न तरीके हैं। जिस समय परमेश्वर विश्राम करेगा, तो वह मनुष्यों के बीच आएगा और प्रकट होगा; जिस समय मनुष्य विश्राम करेगा, तो वह स्वर्ग आने में और स्वर्ग के जीवन का आनंद उठाने में भी परमेश्वर द्वारा अगुवाई किया जाएगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के बाद, शैतान का अस्तित्व अब और नहीं रहेगा। और शैतान की तरह, वे दुष्ट लोग भी अस्तित्व में अब और नहीं रहेंगे। परमेश्वर और मनुष्यों के विश्राम में जाने से पहले, वे दुष्ट व्यक्ति जिन्होंने कभी परमेश्वर को पृथ्वी पर उत्पीड़ित किया था और वे शत्रु जो पृथ्वी पर उसके प्रति अवज्ञाकारी थे, वे पहले ही नष्ट कर दिये गए होंगे; वे अंत के दिनों की बड़ी आपदा द्वारा नष्ट कर दिये गए होंगे। उन दुष्ट व्यक्तियों को पूरी तरह नष्ट कर दिए जाने के बाद, पृथ्वी पुनः कभी भी शैतान की पीडाओं को नहीं जानेगी। मानवजाति संपूर्ण उद्धार प्राप्त करेगी, और केवल तब कहीं जाकर परमेश्वर का कार्य पूर्णतः समाप्त होगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के लिए ये पूर्वापेक्षाएँ हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

पूरी धरती हँसी की आवाज़ से भरी है, पृथ्वी पर हर कहीं प्रशंसा का माहौल है, और कोई भी जगह मेरी महिमा के बिना नहीं है। पृथ्वी पर हर कहीं और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मेरी बुद्धि है। सभी चीजों के बीच मेरी बुद्धि के परिणाम ही हैं, सभी लोगों में मेरी बुद्धि की उत्कृष्ट कृतियाँ भरी है; सब कुछ मेरे राज्य की चीजों के समान है और सभी लोग मेरे आसमानों के नीचे मेरे चारागाहों पर भेड़ों के समान आराम में रहते हैं। मैं सभी मनुष्यों से ऊपर चलता हूँ और हर कहीं देख रहा हूँ। कोई भी चीज कभी भी पुरानी नहीं दिखाई देती है, और कोई भी व्यक्ति वैसा नहीं है जैसा वह हुआ करता था। मैं सिंहासन पर आराम करता हूँ, मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर आराम से पीठ टिकाए हुए हूँ और मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ, क्योंकि सभी चीजों ने अपनी पवित्रता को पुनः प्राप्त कर लिया है, और मैं एक बार फिर से सिय्योन में शान्तिपूर्वक निवास कर सकता हूँ, और पृथ्वी पर लोग मेरे मार्गदर्शन के अधीन शान्त, तृप्त जीवन बिता सकते हैं। सभी लोग सब कुछ मेरे हाथों में प्रबंधित कर रहे हैं, सभी लोगों ने अपनी पूर्व की बुद्धिमत्ता और मूल प्रकटन को पुनः-प्राप्त कर लिया है; वे धूल से अब और ढके हुए नहीं हैं, बल्कि, मेरे राज्य में, हरिताश्म के समान शुद्ध हैं, प्रत्येक ऐसे चेहरे वाला जैसा कि मनुष्य के हृदय के भीतर के एक पवित्र जन का हो, क्योंकि मनुष्यों के बीच मेरा राज्य स्थापित हो चुका है।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "अध्याय 16" से

ओह, वह सम्पूर्ण मानवजाति ने, जिसे मैंने रचा था, अंततः फिर से रोशनी में जीवन को प्राप्त कर लिया है, अपने अस्तित्व की नींव को पा लिया है, और कीचड़ में संघर्ष करना बंद कर दिया है! ओह, सृष्टि की असंख्य चीजें जो मैंने अपने हाथों में थामे रखी हैं! वे कैसे मेरे वचनों के माध्यम से नई नहीं की जा सकती हैं? वे कैसे, रोशनी में, अपने कार्यों को नहीं कर सकती हैं? पृथ्वी अब स्थिर और मूक नहीं है, स्वर्ग अब उजाड़ और दुःखी नहीं है। स्वर्ग और पृथ्वी, अब खालीपन द्वारा पृथक नहीं हैं, पुनः कभी भी पृथक नहीं किए जाने के लिए, अब एक ही बन गए हैं। इस आनन्द के अवसर पर, इस उत्साह के अवसर पर, मेरी धार्मिकता और मेरी पवित्रता, सम्पूर्ण बह्माण्ड में फैल गई है, और सम्पूर्ण मानवजाति बिना रुके उसकी प्रशंसा करती है। स्वर्ग के शहर खुशी से हँस रहे हैं, और पृथ्वी के राज्य खुशी से नाच रहे हैं। इस क्षण कौन आनन्द नहीं ले रहा है? और इस क्षण कौन रो नहीं रहा है? पृथ्वी अपनी मौलिक स्थिति में स्वर्ग से सम्बंध रखती है और स्वर्ग पृथ्वी के साथ एक हो जाता है। मनुष्य, स्वर्ग और पृथ्वी को बाँधे रखने वाली डोर है, और उसकी पवित्रता के कारण, उसके नवीनीकरण के कारण, स्वर्ग अब पृथ्वी से छुपा हुआ नहीं है, और पृथ्वी स्वर्ग के प्रति अब और मूक नहीं है। मानवजाति के चेहरों पर अब संतुष्टि की मुस्कान बिखरी हुई है और उनके हृदयों में मिठास बह रही है जिसकी कोई सीमा नहीं है। मनुष्य मनुष्य से झगड़ा नहीं करता है, न ही मनुष्य एक दूसरे से असहमति के साथ झगड़ता नहीं है। क्या कोई ऐसा है जो, मेरी रोशनी में, दूसरों के साथ शान्ति से नहीं रहता है? ...मनुष्य के हृदय में आनन्द की उमंग पृथ्वी की सतह पर हर स्थान को भर देती है, हवा तेज़ और ताज़ा हो जाती है, घना कोहरा मैदान को अब और आच्छादित नहीं करता है, और सूर्य प्रकाशमान होकर चमकता है।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिये परमेश्वर के कथन "वचन देह में प्रकट होता है" के "अध्याय 18" से लिया गया

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