राज्य के सुसमाचार पर परमेश्वर के उत्कृष्ट वचन-संकलन

विषय-वस्तु

कई बुलाए जाते हैं, किन्तु कुछ ही चुने जाते हैं

पृथ्वी पर मेरे अनुयायी होने के लिए मैंने कई लोगों को खोजा है। उनमें ऐसे लोग हैं जो याजकों की तरह सेवा करते हैं, जो अगुआई करते हैं, जो बेटे बनते हैं, जो लोगों का गठन करते हैं और जो सेवा करते हैं। मैंने ये विभाजन उस वफादारी के अनुसार किए हैं जो मनुष्य की मेरे प्रति होती है। जब सभी मनुष्यों का उनके प्रकार के अनुसार विभेद कर दिया जाता है, अर्थात्, जब प्रत्येक मनुष्य के प्रकार की प्रकृति स्पष्ट कर दी जाती है, तब मैं उनके उचित प्रकार के बीच प्रत्येक मनुष्य की गिनती करूँगा और प्रत्येक प्रकार को उसके उपयुक्त स्थान पर रखूँगा ताकि मैं मानवजाति के उद्धार के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकूँ। बारी-बारी से, मैं उन लोगों के समूह को बुलाता हूँ जिन्हें मेरे घर पर वापस लौटाने के लिए मैं उन्हें बचाना चाहता हूँ, फिर मैं उन सब से अंत के दिनों के मेरे कार्यों को स्वीकार करने के लिए कहता हूँ। साथ ही साथ, मैं लोगों का उनके प्रकार के अनुसार विभेद करता हूँ, फिर उनके कर्मों के आधार पर प्रत्येक को प्रतिफल या सज़ा देता हूँ। इस प्रकार के कदम मेरे कार्यों में शामिल है।

मैं अब पृथ्वी पर रहता हूँ और मनुष्यों के बीच रहता हूँ। सभी मनुष्य मेरे कार्य का अनुभव कर रहे हैं और मेरे वचनों को देख रहे हैं, और इसके साथ मैं अपने प्रत्येक अनुयायी को सभी सच्चाईयाँ प्रदान करता हूँ ताकि वह मुझ से जीवन प्राप्त कर सके और इस प्रकार उसके पास अनुसरण करने के लिए से मार्ग होता है। क्योंकि मैं परमेश्वर हूँ, जीवन का दाता हूँ। मेरे कई सालों के कार्य के दौरान, मनुष्य ने काफी प्राप्त किया है और काफी त्याग किया है, मगर मैं तब भी दृढ़ता से कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं करता है। क्योंकि मनुष्य केवल सतही तौर पर स्वीकार करता है कि मैं परमेश्वर हूँ और मेरे द्वारा बोले गए सत्य से सहमत नहीं होता है, उस सत्य का तो बहुत ही कम अभ्यास करता है जो मैं उससे कहता हूँ। अर्थात्, मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है, लेकिन सत्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है, मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है परन्तु जीवन के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता है, मनुष्य केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करता है परन्तु उसके सार को स्वीकार नहीं करता है। उसके उत्साहीपन के कारण, मनुष्य मुझे घृणित है। क्योंकि मनुष्य मुझे धोखा देने के लिए बस कानों को अच्छे लगने वाले शब्दों को कहता है, और कोई भी सच्चे हृदय से मेरी आराधना नहीं करता है। तुम लोगों के शब्दों में साँप का प्रलोभन है। और तुम्हारे वचन चरम अभिमान से भरे हुए हैं, बस मानो उस महान स्वर्गदूत ने उन्हें व्यक्त किया हो। इसके अलावा, तुम लोगों के कर्म घिसे-पिटे हैं, तुम्हारी असंयमित अभिलाषाएँ और लोलुप अभिप्राय सुनने में अपमानजनक लगते हैं। तुम सब लोग मेरे घर में पतंगे बन गए हो और मेरी नफरत एवं अस्वीकृति की वस्तुएँ बन गए हो। क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी सत्य का प्रेमी नहीं है, तुम लोग केवल ऐसे मनुष्य हो जो आशीषों के पक्ष में हो, जो स्वर्ग में आरोहण करना चाहते हो, और जिन्हें मसीह की पृथ्वी पर अपनी सामर्थ्य का उपयोग करने की महिमा को देखकर प्रसन्नता होती है। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि तुम्हारे समान इतना भ्रष्ट कोई मनुष्य, जो बिल्कुल भी नहीं जानता हो कि परमेश्वर क्या है, कैसे परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य हो सकता है? तुम स्वर्ग में कैसे आरोहण कर सकते हो? तुम लोग कैसे उसकी महिमा की अभूतपूर्व सुन्दरता को देखने के योग्य बन सकते हो? तुम लोगों के मुँह में छल और गंदगी, विश्वासघात और अभिमान की बातें भरी पड़ी है। तुम लोगों ने मुझ से कभी भी ईमानदारी या पवित्रता की बातें नहीं कही, न ही मेरे वचनों का अनुभव करने और मेरी आज्ञा का पालन करने के बारे में वचन कहे हैं। यह कैसा विश्वास है? तुम लोगों के हृदयों में अभिलाषाएँ और धन भरा हुआ है; तुम्हारे दिमागों में संसारिक चीजें भरी हुई है। हर दिन, तुम लोग हिसाब लगाते हो कि मुझसे कैसे प्राप्त करें, आँकलन करते रहते हो कि तुम लोगों मुझ से कितना धन और कितनी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त कर ली हैं। हर दिन, तुम लोग और भी अधिक आशीषें अपने ऊपर बरसने का इंतज़ार करते हो ताकि तुम लोग और भी अधिक सुखदायक चीज़ों का आनन्द ले सकें। प्रत्येक क्षण तुम्हारे विचारों में जो रहता है वह मैं या वह मुझसे आने वाला सत्य नहीं है, बल्कि तुम लोगों के पति (पत्नी), पुत्र, पुत्रियाँ, या तुम क्या खाते या पहनते हो, और कैसे तुम लोग और भी अधिक बेहतर और बड़ी खुशी उठा सकते हो, आता है। भले ही तुम लोग अपने पेट को ऊपर तक भर लो, तब भी क्या तुम लोग एक लाश से जरा सा ही अधिक नहीं हो? भले ही तुम लोग अपने स्वरूप को भव्यता के साथ सजा लो, तब भी क्या तुम लोग एक चलती-फिरती लाश नहीं हो जिसमें कोई जीवन नहीं है? तुम लोग तब तक अपने पेट के लिए कठिन परिश्रम करते हो जब तक कि तुम लोगों के सिर के बाल सफेद नहीं हो जाते हैं, फिर भी कोई भी मेरे कार्य के लिए एक बाल तक बलिदान करने का इच्छुक नहीं होता है। तुम लोग अपने शरीर के लिए, और अपने पुत्रों और पुत्रियों के लिए प्रवास करते हो, परिश्रम करते हो, और अपने दिमाग को कष्ट देते हो, फिर भी कोई भी इस बात की चिंता या इसका विचार नहीं करता है कि मेरे हृदय और मन में क्या है। तुम लोग मुझ से क्या प्राप्त करने की आशा रखते हो?

मैं अपने कार्य में कभी भी जल्दबाज़ी नहीं करता हूँ। इस पर ध्यान दिए बिना कि मनुष्य कैसे मेरा अनुसरण करता है, मैं अपना कार्य प्रत्येक कदम के अनुसार करता हूँ, जैसा कि मेरी योजना में होता है। इसलिए, यद्यपि तुम लोग मेरे विरूद्ध बहुत अधिक विद्रोह कर सकते हो, किंतु मैं अपना कार्य नहीं रोकता हूँ और अपनी इच्छा के अनुसार वचन बोलता रहता हूँ। मैं अपने घर में उन सब को बुलाता हूँ जो मेरे वचनों को सुनने के लिए मेरे द्वारा पूर्वनिधारित किए गए हैं, फिर उन सब को अपने सिंहासन के सामने रखता हूँ जो मेरे वचन का पालन करते हैं और मेरे वचन की अभिलाषा करते हैं। जो मेरे वचनों के साथ विश्वासघात करते हैं, जो मेरी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं और मेरे प्रति समर्पण नहीं करते हैं, और जो खुलकर मेरी अवहेलना करते हैं, उन्हें उनके अंतिम दण्ड के लिए एक तरफ डाल दिया जाएगा। सभी मनुष्य भ्रष्टता में और दुष्टता के आधीन जीवन जीते हैं, इसलिए मेरा अनुसरण करने वालों में से बहुत से लोग वास्तव में सत्य की अभिलाषा नहीं करते हैं। अर्थात्, अधिकांश सच्चे हृदय से या सत्य के लिए मेरी आराधना नहीं करते हैं, बल्कि भ्रष्टाचार, विद्रोह और कपटपूर्ण उपायों से मेरा विश्वास जीतने की कोशिश करते हैं। इसी कारण से मैं कहता हूँ, "कई बुलाए जाते हैं, किन्तु कुछ ही चुने जाते हैं।" वे सब जो बुलाए जाते हैं वे अत्यंत भ्रष्ट होते हैं और उसी युग में रहते हैं, परन्तु वे जो चुने हुए हैं वे केवल वह हिस्सा होते हैं जो सत्य पर विश्वास करते हैं और इसे स्वीकार करते हैं और वे जो सत्य का अभ्यास करते हैं। ये लोग समष्टि का एक मामूली हिस्सा होते हैं, और इन लोगों के बीच में से मैं और भी अधिक महिमा को प्राप्त करूँगा। इन वचनों से मापने पर, क्या तुम लोग जानते हो कि क्या तुम लोग चुने हुए लोगों में से हो? तुम लोगों का अन्त क्या होगा?

मैं पहले ही कह चुका हूँ कि जो मेरा अनुसरण करते हैं वे बहुत हैं परन्तु जो मुझ से सच्चे दिल से प्रेम करते हैं वे बहुत ही कम हैं। हो सकता है कि कुछ लोग कह सकते हैं, "यदि मैं तुम से प्रेम नहीं करता तो क्या मैं इतना बलिदान करता? यदि मैं तुम से प्रेम नहीं करता तो क्या मैं तब भी तुम्हारा अनुसरण करता?" तुम्हारे पास वास्तव में कई कारण हैं। तुम्हारा प्रेम वास्तव में बहुत ही महान है, परन्तु मेरे लिए तुम्हारे प्रेम का क्या सार है? "प्रेम" जिस प्रकार से यह कहलाता है, निर्दोषता के साथ विशुद्ध भावना का संकेत करता है, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने, और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, अवरोध, या दूरी नहीं होती है। प्रेम में कोई संदेह, कपट या धूर्तता नहीं होती है। प्रेम में कोई दूरी नहीं होती और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता है। यदि तुम प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं देते हो, शिकायत नहीं करते हो, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करते हो, कोई भी चीज या कोई निश्चित राशि लेते या प्राप्त करने के लिए कहते नहीं हो। यदि तुम प्रेम करते हो, तो खुशी-खुशी बलिदान करते हो, विपत्ति को सहते हो, और मेरे अनुकूल रहते हो। तुम अपना सब कुछ मेरे लिए त्याग दोगेः अपना परिवार, अपना भविष्य, अपनी जवानी, और अपना विवाह इत्यादि। अन्यथा तुम्हारा प्रेम बिल्कुल भी प्रेम नहीं है, बल्कि केवल कपट और विश्वासघात है! तुम्हारा प्रेम किस प्रकार का है? क्या यह सच्चा प्रेम है? या यह झूठा है? तुमने कितना त्याग किया है? तुमने कितना बलिदान किया है? तुम्हें मैंने कितना प्रेम प्राप्त किया है? क्या तुम जानते हो? तुम लोगों का हृदय बुराई, विश्वासघात, और कपट से भरा हुआ है। तो फिर तुम लोगों का प्यार कितना अशुद्ध है? तुम लोग विश्वास करते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त त्याग किया है; तुम लोग विश्वास करते हो कि मेरे लिए तुम लोगों का प्रेम पहले से ही पर्याप्त है, फिर भी तुम लोगों के वचन और कार्य क्यों हमेशा अपने साथ विद्रोह और कपट लिए रहते हैं? तुमलोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे वचन को स्वीकृत नहीं करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी मेरे प्रति शंकाशील हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरा अनुसरण करते हो, फिर भी हर मामले में मुझे मूर्ख मान कर मेरे साथ व्यवहार करते हो और मुझे धोखा देते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग मेरी सेवा करते हो, फिर भी मुझसे डरते नहीं हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोग सर्वथा और सभी चीजों में मेरा विरोध करते हो। क्या इसे ही प्रेम माना जाता है? तुम लोगों ने मेरे लिये काफी बलिदान किए, यह सत्य है, फिर भी तुम लोगों ने कभी भी उसका अभ्यास नही किया जो मैं तुमसे करने के लिए कहता हूँ। क्या इसे प्रेम माना जा सकता है? सावधानी पूर्वक किया गया अनुमान दर्शाता है कि तुम लोगों के भीतर मेरे लिए प्रेम की ज़रा सी झलक भी नहीं है। इतने सालों के कार्य और इतने सारे वचनों के बाद जो मैंने तुम लोगों को प्रदान किए, तुम लोगों ने वास्तव में कितना प्राप्त किया? क्या अतीत में हुई बातें सावधानीपूर्वक विचार करने के योग्य नहीं हैं? मैं तुम लोगों की भर्त्सना करता हूँ: जिन्हें मैं बुलाता हूँ ये वे नहीं हैं जिन्हें भ्रष्ट नहीं किया गया है, बल्कि जिन्हें मैं चुनता हूँ ये वे हैं जो मुझसे वास्तव में प्रेम करते हैं। इसलिए, तुम्हें अपने वचनों और कर्मों में सतर्क रहना चाहिए और अपने अभिप्रायों और विचारों को जाँचना चाहिए ताकि वे अपनी सीमा रेखा को पार न करें। अंत के समय में, अपने प्रेम को मेरे सामने प्रस्तुत करने के लिए अधिकतम प्रयास करें, कहीं ऐसा न हो कि मेरा कोप तुम्हारे ऊपर से कभी भी न जाए!