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29. प्रभु यीशु ने हमें वचन दिया है कि, "जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नष्ट न हो, परंतु अनंत जीवन पाये।" परमेश्वर अपनी इस बात को कैसे पूरा करेंगे?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

6000 वर्षों के परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य को तीन चरणों में बांटा गया है: व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग, और राज्य का युग। इन तीन चरणों का सम्पूर्ण कार्य मानवजाति के उद्धार के लिए है, कहने का तात्पर्य है, वे ऐसी मानवजाति के उद्धार के लिए हैं जिसे शैतान के द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। फिर भी, ठीक उसी समय वे इसलिए भी हैं ताकि परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध कर सके। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बांटा गया है, वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बांटा गया है, और परमेश्वर के कार्य के इन दो चरणों को एक ही समय में संचालित किया जाता है। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानवजाति के उद्धार के लिए है, और इसलिए क्योंकि मानवजाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता है, शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों एवं अवधियों में विभाजित किया जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य के प्रति शैतान की भ्रष्टता की मात्रा के अनुसार ही शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। …मनुष्य के उद्धार के कार्य में, तीन चरणों को सम्पन्न किया जा चुका है, कहने का तात्पर्य है कि शैतान की सम्पूर्ण पराजय से पहले शैतान के साथ युद्ध को तीन चरणों में विभक्त किया गया है। फिर भी शैतान के साथ युद्ध के सम्पूर्ण कार्य की भीतरी सच्चाई यह है कि मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करने, और मनुष्य के लिए पापबलि बनने, मनुष्य के पापों को क्षमा करने, मनुष्य पर विजय पाने, और मनुष्यों को सिद्ध बनाने के माध्यम से इसके प्रभावों को हासिल किया जाता है। सच तो यह है कि शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि मनुष्य का उद्धार है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है, और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है ताकि वह परमेश्वर के लिए गवाही दे सके। इसी रीति से शैतान को पराजित किया जाता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलकर ही शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाता है, अर्थात्, जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाता है, तो लज्जित शैतान पूरी तरह से लाचार हो जाएगा, और इस रीति से, मनुष्य को पूरी तरह से बचाया लिया जाएगा। और इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का मूल-तत्व शैतान के साथ युद्ध है, और शैतान के साथ युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिम्बित होता है। अंतिम दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य पर विजय पानी है, शैतान के साथ युद्ध में अंतिम चरण है, और साथ ही शैतान के प्रभुत्व से मनुष्य के सम्पूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आन्तरिक अर्थ है मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप, इंसान का सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जिसके माध्यम से वह शैतान को छोड़ देगा और पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौटेगा। इस रीति से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इस प्रकार, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के लिए परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना, मनुष्य का सम्पूर्ण उद्धार अन्ततः असंभव होगा, शैतान की सम्पूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानवजाति कभी अपनी बेहतरीन मंज़िल में प्रवेश करने में, या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

जब एक बार विजय के कार्य को पूरा कर लिया जाता है, तब मनुष्य को एक सुन्दर संसार में पहुंचाया जाएगा। निश्चित रूप से, यह जीवन तब भी पृथ्वी पर ही होगा, परन्तु यह मनुष्य के आज के जीवन से पूरी तरह से भिन्न होगा। यह वह जीवन है जो मानवजाति के तब पास होगा जब सम्पूर्ण मानवजाति पर विजय प्राप्त कर लिया जाता है, यह पृथ्वी पर मनुष्य के लिए, और मानवजाति के लिए एक नई शुरुआत होगी कि उसके पास ऐसा जीवन हो जो इस बात का सबूत होगा कि मानवजाति ने एक नए एवं सुन्दर आयाम में प्रवेश कर लिया है। यह पृथ्वी पर मनुष्य एवं परमेश्वर के जीवन की शुरुआत होगी। ऐसे सुन्दर जीवन का आधार ऐसा ही होगा, जब मनुष्य को शुद्ध कर लिया जाता है और उस पर विजय पा लिया जाता है उसके पश्चात्, वह परमेश्वर के सम्मुख समर्पित हो जाता है। और इस प्रकार, इससे पहले कि मानवजाति उस बेहतरीन मंज़िल में प्रवेश करे विजय का कार्य परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। ऐसा जीवन ही पृथ्वी पर मनुष्य के भविष्य का जीवन है, यह पृथ्वी पर सबसे अधिक सुन्दर जीवन है, उस प्रकार का जीवन है जिसकी लालसा मनुष्य करता है, और उस प्रकार का जीवन है जिसे मनुष्य ने संसार के इतिहास में पहले कभी हासिल नहीं किया गया है। यह 6,000 वर्षों के प्रबधंकीय कार्य का अंतिम परिणाम है, यह वह है जिसकी मानवजाति ने अत्यंत अभिलाषा की है, और साथ ही यह मनुष्य के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा भी है। परन्तु यह प्रतिज्ञा तुरन्त ही पूरी नहीं हो सकती है: मनुष्य अपने भविष्य की मंज़िल में केवल तभी प्रवेश करेगा जब एक बार अंतिम दिनों के कार्य को पूरा कर लिया जाता है और उस पर पूरी तरह से विजय पा लिया जाता है, अर्थात्, जब एक बार शैतान को पूरी तरह से पराजित कर दिया जाता है। जब मनुष्य को परिष्कृत कर दिया जाता है उसके पश्चात् ही वह पापपूर्ण स्वभाव से रहित होगा, क्योंकि परमेश्वर ने शैतान को पराजित कर दिया होगा, जिसका अर्थ यह है कि विरोधी ताकतों के द्वारा कोई अतिक्रमण नहीं होगा, और कोई विरोधी ताकतें मनुष्य के शरीर पर आक्रमण नहीं कर सकती हैं। और इस प्रकार मनुष्य स्वतन्त्र एवं पवित्र होगा – वह अनन्तकाल में प्रवेश कर चुका होगा। जब अन्धकार की विरोधी ताकतों को बांध दिया जाता है केवल तभी मनुष्य जहाँ कहीं जाता है वहाँ वह स्वतन्त्र होगा, और विद्रोहीपन या विरोध से रहित होगा। मनुष्य की सलामती के लिए शैतान को बस बांधना है; आज, वह सही सलामत नहीं है क्योंकि[क] शैतान पृथ्वी पर अभी भी हर जगह समस्याएं खड़ी करता है, और क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन का समूचा कार्य अभी तक समाप्ति पर नहीं पहुंचा है। जब एक बार शैतान को पराजित कर दिया जाता है, तो मनुष्य पूरी तरह से स्वतन्त्र हो जाएगा; जब मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करता है और शैतान के प्रभुत्व से बाहर निकल आता है, तब वह धार्मिकता के सूर्य को देखेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

परमेश्वर स्वयं ही जीवन है, सत्य है, और उसका जीवन और सत्य साथ ही साथ रहते हैं। जो सत्य को प्राप्त करने में असफल रहते हैं वे कभी भी जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते। बिना मार्गदर्शन, सहायता और सत्य के प्रावधान के तुम केवल संदेश, सिद्धांत और मृत्यु को ही प्राप्त करोगे। परमेश्वर का जीवन सतत विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन एक साथ उपस्थित रहते हैं। यदि तुम सत्य के स्रोत को नहीं प्राप्त कर पाते, तो तुम जीवन के पोषण को प्राप्त नहीं कर पाओगे; यदि तुम जीवन के प्रावधान को प्राप्त नहीं कर सकते तो तुम्हारे जीवन में निश्चय ही सत्य नहीं होगा, और इसलिए कल्पनाओं और धारणाओं से दूरी होगी, तुम्हारी सम्पूर्ण देह केवल देह होगी, तुम्हारी घिनौनी देह। …

अंतिम दिनों का मसीह जीवन लेकर आता, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा। यदि तुम अंतिम दिनों के मसीह के द्वारा प्रदान किए गए जीवन के मार्ग को नहीं खोजते हो, तो तुम कभी भी यीशु के अनुमोदन को प्राप्त नहीं कर पाओगे और कभी भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम इतिहास के कठपुतली और कैदी दोनों हो। …

…अंतिम दिनों में मसीह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने का माध्यम है, जिसकी अवहेलना कोई भी नहीं कर सकता। मसीह के माध्यम बने बिना कोई भी परमेश्वर के द्वारा सिद्धता को प्राप्त नहीं कर सकता। परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास है, और इसलिए तुम उसके वचनों को स्वीकार करो और उसके मार्गों का पालन करो। बिना सत्य को प्राप्त किए या बिना जीवन के प्रावधान को स्वीकार किए तुमको सिर्फ़ अनुग्रह प्राप्त करने के बारे में सोचना नहीं है। मसीह अंतिम दिनों में आता है ताकि वे सभी जो सच्चाई से उस पर विश्वास करते हैं उन्हें जीवन प्रदान किया जाए। उसका कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है और यही वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वालों को अपनाना चाहिए। यदि तुम उसे पहचानने में असमर्थ हो, और उसकी भर्त्सना करते हो, निंदा करते हो और यहां तक कि उसे पीड़ा पहुंचाते हो, तो तुम अनन्त समय तक जलाए जाते रहने के लिए निर्धारित कर दिये गए हो और तुम कभी भी परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से

पदटिप्पणियां:

क. मूलपाठ कहता है "आज, यह इसलिए है।"

पिछला:प्रभु यीशु ने अपना छुटकारे का कार्य अनुग्रह के युग में पूरा किया और अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर अपना न्याय का कार्य करते हैं। हम यह कैसे पहचान सकते हैं कि अंत के दिनों का न्याय का कार्य और अनुग्रह के युग का छुटकारे का कार्य एक ही परमेश्वर के हैं?

अगला:अतीत में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य का बहुत अधिक विरोध और निंदा की है और मैंने तिरस्कारपूर्ण बातें कही हैं; क्या परमेश्वर फिर भी मुझे बचायेंगे?

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