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9. मैं परमेश्वर को जानने का मार्ग देखता हूँ

शिआओकाओ चांग्ज़ी सिटी, शांक्ज़ी प्रदेश

एक दिन, मैंने एक निबंध में परमेश्वर के वचन का निम्न अवतरण पढ़ा "पतरस ने यीशु को कैसे जाना": "यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज़ का अवलोकन किया और उसे हृदय से लगाया: उसके कार्यों को, वचनों को, गतिविधियों को, और अभिव्यक्तियों को। … यीशु के साथ सम्पर्क में उसके समय से, पतरस ने यह भी महसूस किया कि उसका चरित्र किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न था। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया, और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बताया, न ही कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में, यीशु शिष्ट और आकर्षक, स्पष्ट और हँसमुख, फिर भी शान्त था, और अपने कार्य के निष्पादन में कभी भी गरिमा को नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी-कभी अल्प-भाषी रहता था, फिर भी अन्य समयों में लगातार बात करता था। कई बार वह इतना प्रसन्न होता था कि वह कबूतर की तरह चुस्त और जीवंत बन जाता था, और फिर कभी-कभी इतना दुःखी होता था कि वह बिल्कुल भी बात नहीं करता था, मानो कि वह एक मौसम की मार खाई हुई माँ हो। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रुओं को मारने के लिए मुस्तैद हो, और कई बार यहाँ तक कि एक गर्जने वाले सिंह की तरह होता था। कभी-कभी वह हँसता था; फिर कभी वह प्रार्थना करता और रोता था। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि यीशु ने कैसे क्रिया की, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ाता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, उसकी दया, क्षमा, और सख़्ती, उसके भीतर एक सच्ची श्रद्धा और लालसा को बढ़ाते हुए, उसे सच्ची तरह से यीशु से प्यार करवाने लगते थे। वास्तव में, एक बार जब पतरस ने यीशु के साथ-साथ कुछ वर्षों तक जीवन बिता लिया था केवल तभी उसने यह सब धीरे-धीरे यह महसूस किया।" इस अवतरण को पढ़ने के बाद मैंने सोचा: कोई आश्चर्य नहीं कि पतरस परमेश्वर के ज्ञान को हासिल कर सका! ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि जब वह दिन और रात यीशु के साथ रहा करता था, उस दौरान वह व्यक्तिगत तौर पर यीशु के प्रत्येक वचन और प्रत्येक गतिविधि का गवाह बना था, और इस तरह से उसने परमेश्वर की पूजनीयता के बारे में और भी जाना था। अब भी वह काल है जब कार्य करने हेतु मनुष्य की दुनिया में व्यक्तिगत तौर पर अवतरित होने के लिए परमेश्वर देहधारी हुआ है। अगर मैं भी पतरस की ही तरह परमेश्वर के संपर्क में आने और उसके साथ समय बिताने में सक्षम होने जितना भाग्यशाली बन सकूं, तो क्या परमेश्वर को और भी बेहतर तरीके से नहीं जान जाउंगा? ओह! कितने शर्म की बात है कि अब मैं केवल परमेश्वर के वचन को पढ़ सकता हूं लेकिन मसीह के चेहरे को नहीं देख सकता हूं। तो कैसे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान पाने में सक्षम हो पाउंगा?

जब मैं इसे लेकर दुखी व निराश था और परमेश्वर में आत्मविश्वास खो रहा था, तो उसके वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया: "परमेश्वर के वचन को पढ़ने और परमेश्वर के वचन को समझने के माध्यम से ही परमेश्वर को अवश्य जानना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं: "मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मैं परमेश्वर को कैसे जान सकता हूँ?" परमेश्वर का वचन वास्तव में परमेश्वर के स्वभाव का एक प्रकटन है। आप परमेश्वर के वचन से मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति का उद्धार, और जिस तरह से वे उन्हें बचाते हैं उसे देख सकते हैं ... क्योंकि परमेश्वर का वचन, परमेश्वर के द्वारा उसे लिखने हेतु मनुष्य के उपयोग के विपरीत, परमेश्वर के द्वारा ही प्रकट होता है। यह व्यक्तिगत रूप में परमेश्वर के द्वारा प्रकट किया जाता है। यह स्वयं परमेश्वर है जो अपने स्वयं के वचनों और अपने भीतर की आवाज़ को प्रकट कर रहा है। ... परमेश्वर के स्वभाव, उनकी इच्छा, उनके विचारों, मानवजाति के लिए उनके प्रेम, उनके द्वारा मानवजाति उद्धार, तथा मानवजाति से उनकी अपेक्षाओं को प्रकट कर रहे हैं। ... कभी-कभी परमेश्वर शांत एवं करुणामयी दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग मानवजाति के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और लोग परमेश्वर के अपमान न किए जा सकने योग्य स्वभाव को देखते हैं। मनुष्य विलापनीय ढंग से गंदा है और परमेश्वर के मुख को देखने के योग्य नहीं है, और परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है। लोगों का परमेश्वर के सामने आना अब पूरी तरह परमेश्वर के अनुग्रह से ही है। जिस तरह परमेश्वर कार्य करता है और उसके कार्य के अर्थ से परमेश्वर की बुद्धि को देखा जा सकता है। भले ही लोग परमेश्वर के सम्पर्क में न आएँ, तब भी वे परमेश्वर के वचनों में इन चीज़ों को देखने में सक्षम होंगे" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "देहधारण का ज्ञान" से)। परमेश्वर के वचनों ने अचानक ही मुझे प्रकाश दिखा दिया। हां! अंत के दिनों की देह में परमेश्वर ने मनुष्य को अपना सारा स्वभाव व्यक्त करने के लिए पहले ही अपने वचन का प्रयोग किया है, और मनुष्य को परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसकी महान शक्ति, उसकी महत्ता, उसकी विनम्रता व दीनता, और उसकी पूजनीयता को देखने, एवं इसके साथ ही उसका आनंद व दुख समझने, और उसके पास क्या है एवं वह क्या है यह जानने देता है। वह दिखाने के लिए यह पर्याप्त है कि परमेश्वर के वचनों को पढ़ना और परमेश्वर के वचनों को अनुभव करना परमेश्वर को जानने का एकमात्र मार्ग है। अगर मैं परमेश्वर के वचनों से विमुख हो जाऊं, तो फिर चाहे मैं देह में परमेश्वर को देख भी लूं तो क्या हो? क्या तब फरसियों ने भी यीशु को नहीं देखा था? तो फिर उन लोगों ने यीशु को सलीब पर नहीं लटाकाया था? क्या ऐसा इसलिए नहीं हुआ था क्योंकि वे लोग यीशु के वचनों को नहीं सुनते थे, वे घमंडी थे और जिद्दी स्वभाव के साथ अपनी खुद की अवधारणाओं व कल्पनाओं के साथ चिपके हुए थे, और वे ग्रंथों को थोड़ी-बहुत जो समझते थे उसी के आधार पर उन्होंने यीशु का विरोध किया व निंदा की थी? दूसरी तरफ, पतरस यीशु को जानने में सक्षम हुआ था क्योंकि उसने अपनी खुद की अवधारणाओं व कल्पनाओं को त्याग सका था, प्रभु यीशु के वचनों को निकटता से सुनता था, और यीशु द्वारा दिए गए प्रत्येक वचन व वाक्य पर ध्यानपूर्वक विचार करने में अच्छा था। प्रभु यीशु के कथनों व कार्य के माध्यम से, उसने परमेश्वर का स्वभाव और उसके पास जो भी है एवं वह जो है, उसे जाना और अंतत: परमेश्वर के सच्चे ज्ञान को हासिल किया। क्या यह बख्तरबंद तथ्य इस बात की व्याख्या करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर के वचन के माध्यम से ही परमेश्वर को जान सकता है? इसके अलावा, यह जानते हुए कि अंत के दिनों की देह में परमेश्वर का मुख्य कार्य वचनों का कार्य है, तो क्या परमेश्वर को जानने में मुझे कोई फायदा नहीं मिलेगा?

मैं अपने तर्कसम्मत विचारों पर वापस जितना ज्यादा सोचता, उतना ही ज्यादा मुझे अपनी दयनीयता, मूर्खता और बचपने का अहसास होता था। हर रोज मैं परमेश्वर के वचनों को अपने हाथों में लेता था, परमेश्वर के वचनों को खाता व पीता, परमेश्वर के वचन को पढ़ता, और परमेश्वर के वचन को अनुभव करता था, लेकिन मैं पूरे दिल से परमेश्वर के वचनों को प्रेम नहीं करता था, यह सोचता था कि मैं केवल मसीह का चेहरा देखकर ही परमेश्वर को जान सकता हूं। मैं एक भाग्यवान जिंदगी जी रहा था, वह भी उसकी प्रशंसा किए बिना! हे परमेश्वर! जानने के मेरे गलत तरीके को उजागर करने व उसे बदलने और मुझे परमेश्वर को जानने का मार्ग दिखाने के लिए तुम्हारा धन्यवाद। अब से, मैं लगातार तुम्हारे वचन पढूंगा, तुम्हारे वचनों पर विचार करूंगा, तुम्हारे वचनों के माध्यम से तुम्हारे आनंद व दुखों को समझने की कोशिश करूंगा, और तुम्हारी पूजनीयता के बारे में और ज्यादा जानकर तुम्हें और भी गहराई से जानूंगा।

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