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9. ईमानदार व्यक्ति बनने में प्रवेश का अभ्यास कैसे करना चाहिए?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

सत्य का अनुसरण करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, और इस पर अमल करना सचमुच बहुत आसान है। आपको ईमानदार इन्सान बनने से शुरुआत करनी चाहिये, सच बोलना चाहिये, और परमेश्वर के आगे अपने दिल को खोल देना चाहिये। अगर ऐसी कोई बात है जिस पर अपने भाई-बहनों से चर्चा करते हुए आपको शर्म आती है, तो आपको परमेश्वर के आगे घुटनों के बल झुककर, प्रार्थना के माध्यम से उनसे अपनी बात कह देनी चाहिये। आपको उनसे उनके साथ ईमानदार बनने से शुरूआत करनी चाहिये। आप परमेश्वर से अपने दिल की बात कहें। आप उनसे ख़ुश करने वाली खोखली बातें न करें या उन्हें धोखा देने की कोशिश न करें। अगर आप दुर्बल हैं, तो उनसे कहें कि आप दुर्बल हैं; अगर आप दुष्ट हैं, तो कहें कि आप दुष्ट हैं; अगर आप कपटी हैं, तो कहें कि आप कपटी हैं; अगर आपके मन में गंदे और धोखेबाज़ी के विचार आते हैं, तो आप परमेश्वर से ऐसा कहें; अगर आप हमेशा पद के लिए प्रतिस्पर्द्धा करते रहते हैं, तो उन्हें यह बात बतायें; परमेश्वर को आपको अनुशासित करने दें; उन्हें आपके लिये परिवेश की व्यवस्था करने दें; परमेश्वर को अवसर दें कि वे आपको तमाम मुश्किलों और समस्याओं से निजात दिलाने में आपकी मदद करें। परमेश्वर के आगे आपको अपना दिल खोल देना चाहिये; उन्हें अपने से दूर न रखें। अगर आप उनके लिये अपने दिल के दरवाज़े बंद भी कर देंगे, तो भी वे आपके अंदर देख सकते हैं, लेकिन अगर आप उनके आगे खुलकर बात करेंगे, तो आप सत्य को प्राप्त कर सकते हैं। तो आप कौन-सा मार्ग चुनने की बात कहेंगे? अगर लोग सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें ईमानदार बनने से शुरुआत करनी चाहिये। निश्चय ही आपको किसी भी तरह से ढोंग नहीं करना चाहिए। ...उनके आगे आप अपना दिल तभी खोल पायेंगे, और केवल जब आपका दिल खुल जाता है, तो सत्य आपके अंदर प्रवेश कर सकता है जिससे आप उसे समझ और प्राप्त भी कर सकते हैं। अगर आपका हृदय हमेशा बंद रहता है, आप कभी किसी से सत्यतापूर्वक नहीं बोलते हैं, हमेशा टाल-मटोल करते हैं, तो आगे चलकर आप स्वयं को नष्ट कर लेंगे, फिर आप न तो किसी सत्य को समझ पायेंगे, नही ही उसे कभी हासिल कर पायेंगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "जीवन में प्रगति के छह संकेतक" से उद्धृत

ईमानदार होने के लिए ज़रूरी है कि आप अपना दिल खोलकर रख दें, ताकि हर कोई उसे देख सके, आपके विचारों को समझ सके, और आपका असली चेहरा देख सके; आप बहाने बनाने या खुद को छिपाने का प्रयास न करें। लोग तभी आप पर विश्वास करेंगे और आपको ईमानदार मानेंगे। यह ईमानदार होने का सबसे मूल अभ्यास और ईमानदार होने की शर्त है। तू हमेशा पवित्रता, सदाचार, महानता का दिखावा करताहै, नाटक करता है, और उच्च नैतिक गुणों के होने का नाटक करता है। तू लोगों को अपनी भ्रष्टता और विफलताओं को नहीं देखने देता है। तू लोगों के सामने एक झूठी छवि पेश करता है, ताकि वे मानें कि तू सच्चा, महान, आत्म-त्यागी, निष्पक्ष और निस्वार्थी है। यह धोखा है। दिखावा मत कर और खुद को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत मत कर; इसके बजाय, अपने आप को स्पष्ट कर और दूसरों के देखने के लिए अपने हृदय को पूरी तरह उजागर कर दे। यदि तू दूसरों के देखने के लिए अपने हृदय को उजागर कर सकता है, अर्थात्, यदि तू अपने हृदय में जो कुछ भी सोचता है और योजना बनाता है—चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक—उसे स्पष्ट कर सकता हैतो क्या तू ईमानदार नहीं बन रहा है? यदि तू दूसरों को समक्ष अपने आप को उजागर करने में सक्षम है, तो परमेश्वर भी तुझे देखेगा, और कहेगा: "तूने दूसरों के देखने के लिए स्वयं को खोल दिया है, और इसलिए मेरे सामने भी तू निश्चित रूप से ईमानदार है।" यदि तू दूसरों की नज़र से दूर केवल परमेश्वर के सामने अपने आप को उजागर करता है, और लोगों के सामने हमेशा महान और गुणी या न्यायी और निःस्वार्थ होने का दिखावा करता है, तो परमेश्वर क्या सोचेगा और परमेश्वर क्या कहेगा? परमेश्वर कहेगा: "तू वास्तव में धोखेबाज़ है, तू विशुद्ध रूप से पाखंडी और क्षुद्र है, और तू ईमानदार नहीं है।" परमेश्वर इस प्रकार से तेरी निंदा करेगा। यदि तू ईमानदार होना चाहता है, तो तू परमेश्वर या लोगों के सामने जो कुछ भी करता है उसकी परवाह किए बिना, तुझे अपने आप को उजागर करने में सक्षम होना चाहिए।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास" से उद्धृत

आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से बहुत डरते हैं और जबकि तू परमेश्वर की देह को धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को घोखा नहीं दे सकता। कोई भी बात, जो परमेश्वर के पर्यवेक्षण का सामना नहीं कर सकती, वे सत्य के अनुरूप नहीं है और उसे अलग कर देना चाहिए; अन्यथा यह परमेश्वर के विरूद्ध पाप होता है। इसलिए, इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तू किस समय प्रार्थना करता है, तू कब अपने भाई-बहनों से बातचीत और सहभागिता करता है, या कब तू अपना काम करता है और व्यवसाय का प्रबंधन करता है, तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख रखना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, परमेश्वर तेरे साथ है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, जो कुछ तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा, इसलिए तुझे अपने कार्य को पूरा करने के लिए अपने आपको ईमानदारी से समर्पित कर देना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, यदि तेरे हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम है, और यदि तू परमेश्वर की देखभाल, संरक्षण और पर्यवेक्षण की तलाश करता है, यदि ये तेरे इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएं प्रभावशाली होंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोल कर परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और बिना झूठ बोले परमेश्वर से बोल देता है कि तेरे हृदय में क्या है—तब तेरी प्रार्थना प्रभावशाली होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार चलते हैं" से उद्धृत

आज, जो कोई भी, जो परमेश्वर के पर्यवेक्षण को स्वीकार न कर सकता हो, उसे परमेश्वर नहीं स्वीकार कर सकता है, और कोई जो परमेश्वर के देहधारण को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने सभी कामों को देख और सोच, जो कुछ तू करता है वह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तू जो कुछ भी करता है, उसे तू परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकता, तो यह दर्शाता है कि तू एक पापी है। क्या पापी को पूर्ण बनाया जा सकता है? तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहां तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी—तेरी प्रार्थना, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता, कलीसिया का जीवन जीना, और साझेदारी में तेरी सेवा—परमेश्वर के सम्मुख और उसके द्वारा विचार के लिए लाई जानी चाहिए। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में परिपक्व होने में मदद करेगा। परमेश्वर के पर्यवेक्षण को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर के पर्यवेक्षण को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और उतना ही तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलता है, ताकि तू भ्रष्टता और अपव्यय की बुलाहट को नहीं सुनेगा, और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसके पर्यवेक्षण को ग्रहण करता है, तू शैतान को उतना ही लज्जित करता है और उतना अधिक देह को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर के पर्यवेक्षण को ग्रहण करना एक ऐसा मार्ग है जिसका एक व्यक्ति को अवश्य अभ्यास करना चाहिए। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तू क्या करता है, यहां तक कि तब भी जब तू अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करता है, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख लाता है और उसके पर्यवेक्षण को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, तो जो तू अभ्यास करता है वह बहुत सही होगा। केवल जब तू जो कुछ भी करता है, वो सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है और परमेश्वर के पर्यवेक्षण को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार चलते हैं" से उद्धृत

ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उससे ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना। ...कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने-मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपने महत्वहीन तर्कों से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें ऐसे बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के लिए तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सत्य का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन व्यतीत करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाला और काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व खर्च करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे लोगों में से हो जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तीन चेतावनियाँ" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

यदि तुम अपना कर्तव्य करने में पूरे योग्य बनना चाहते हो—न कि सिर्फ ऊपर-ऊपर से बातें कर परमेश्वर को धोखा देना चाहते हो—तो तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति होने के मुद्दे को शांत करना होगा। अपने कर्तव्य को पूरा करते समय तुम्हें कटाई-छंटाई और निपटान को स्वीकार करना होगा, तुम्हें पवित्र आत्मा के अवलोकन को स्वीकार करना होगा, और तुम्हें इन चीजों को कड़ाई से परमेश्वर की मांगों के अनुसार करना होगा। अगर तुम्हें पता चलता है कि तुम लापरवाह हो, तो परमेश्वर से प्रार्थना करो। यदि तुम्हें पता चलता है कि तुम परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हो, तो तुम्हें इस अपराध को स्वीकार करना चाहिए। तुम इस पर पर्दा नहीं डाल सकते हो, तुम्हें बहानेबाज़ी नहीं करनी है, और तथ्यों को बिगाड़ कर दूसरों पर दोष लगाना तो और भी अधिक बुरा है। उन चीज़ों के बारे में तुम्हें बहुत गंभीर होने की ज़रूरत है, और अपने प्रत्येक शब्द और कार्य को तुम्हें ईमानदारी से लेना होगा। अपने शब्दों को सच्चाई के अनुरूप बनाओ, तथ्यों से सत्य की तलाश करो, और अपनी बातों को छल से चिकनी-चुपड़ी मत बनाओ। यदि तुम अपने अपराध को खोज पाते हो, तो परमेश्वर से प्रार्थना करने के अलावा, तुम्हें इसे खुले तौर पर दूसरों के सामने स्वीकार भी करना चाहिए। अपनी प्रतिष्ठा की चिंता से पीछे न हट जाना। तुम्हें साहसपूर्वक तथ्यों का सामना करना चाहिए। इस तरह का अभ्यास सार्थक है, और यह निश्चित है कि यह तुम्हारे लिए इसका फ़ायदेमंद होगा। सबसे पहले, एक ईमानदार व्यक्ति होमें में तुम्हारे विश्वास को बढ़ा सकता है। दूसरा, यह तुम्हें अपमान के बारे में निडर होना और अपने घमंड और आत्म-चिंता को छोड़ना सिखा सकता है। तीसरा, यह तुम्हें तथ्यों का सामना करने और तथ्यों का सम्मान करने का साहस दे सकता है। चौथा, जिन चीज़ों को तुम करते हो, उनके प्रति गंभीर होने में यह तुम्हारी इच्छा-शक्ति को विकसित कर सकता है। कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करने के बाद लोग अपने कर्तव्य को पूरा करने में अधिक ईमानदार, काम करने में ज़्यादा व्यावहारिक और कम ढ़ोंगी होंगे। कुछ सालों से भी कम समय में, वे ऐसे ईमानदार व्यक्ति बन जाएँगे जो अपने हर काम को ईमानदारी से और गंभीर रूप से लेंगे और मामलों को संभालने में जिम्मेदार होंगे। ऐसे लोग अपने कर्तव्य को पूरा करने और अपने काम को करने में अपेक्षाकृत विश्वसनीय होते हैं। जब परमेश्वर का घर ऐसे लोगों का उपयोग करता है, तो यह आश्वासन दिया जा सकता है कि कुछ भी ग़लत नहीं होगा।

— ऊपर से संगति में से उद्धृत

अभी, तुम लोग ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए प्रशिक्षण की प्रक्रिया में हो। प्रशिक्षण की इस प्रक्रिया में तुम्हें किस ओर अधिक ध्यान देना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर को जानने पर ध्यान देना चाहिए और सच्चाई को समझने की ओर ध्यान देना चाहिए। तुम्हारी वास्तविक प्रविष्टि सकारात्मक पक्ष से अवश्य होनी चाहिए। यदि तुम सकारात्मक पक्ष से प्रवेश करते हो, तो नकारात्मक पक्ष की भ्रष्ट चीजें स्वाभाविक रूप से कम हो जाएँगी, और यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, एक ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए, तुम्हें सबसे पहले स्वयं को उस वास्तविकता और सत्य से सुसज्जित करने की ज़रूरत है जो कि एक ईमानदार व्यक्ति होने के लिए आवश्यक है। तुम्हारे ऐसा कर चुकने के बाद, तुम्हारा जो ईमानदार हिस्सा है वो बढ़ेगा और झूठ तथा धूर्तता स्वाभाविक रूप से कम हो जाएँगे, है ना? ठीक जैसे कि गंदे पानी से भरा एक प्याला होता है। तुम इसे बाहर नहीं उड़ेल सकते हो, इस गंदे पानी को बाहर करने के लिए तुम्हें किसी दूसरी विधि का उपयोग करने की आवश्यकता है। तो तुम क्या करोगे? तुम कहते हो कि तुम इसकी गंदगी हटाने के लिए इसमें कोई चीज़ मिलाओगे। यह सही नहीं है। तुम्हें प्याले में कुछ स्वच्छ, अच्छा पानी डालना चाहिए। अच्छा पानी स्वाभाविक रूप से गंदे पानी को धोकर बाहर कर देगा। क्या यह एक अच्छा तरीका नहीं है? अब तुम्हें स्वयं को सत्य से सुसज्जित करना चाहिए, और एक बार जब सत्य तुम्हारे भीतर प्रवेश कर लेता है, तो तुम्हारे अंदर की नकारात्मक चीजें स्वाभाविक रूप से गायब हो जाएँगी।

— जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति (I) में "झूठ बोलने की समस्या का जड़ से हल कैसे करें" से उद्धृत

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