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9. ईमानदार व्यक्ति बनने में प्रवेश का अभ्यास कैसे करना चाहिए?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

तुम्हें ईमानदार होना आवश्यक है, और तुम्हें अपने हृदय की धूर्तता से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करना आवश्यक है। जब तुम जरुरत के समय स्वयं को शुद्ध करने के लिए प्रार्थना का प्रयोग करते हो, और परमेश्वर के आत्मा के द्वारा स्पर्श किए जाने के लिए इसका प्रयोग करते हो, तो तुम्हारा स्वभाव धीरे-धीरे बदलता जाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" से

परमेश्वर द्वारा लोगों से माँग किया जाने वाला सबसे निम्नतम स्तर यह है कि वे अपने हृदयों को परमेश्वर के प्रति खोल सकें। यदि मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को दे दे और परमेश्वर से वह कहे जो वास्तव में उसके हृदय में परमेश्वर के लिए है, तो परमेश्वर मनुष्य में कार्य करने के लिए तैयार है; परमेश्वर मनुष्य का विकृत हृदय नहीं चाहता, बल्कि उसका शुद्ध और खरा हृदय चाहता है। यदि मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय से नहीं बोलता है, तो परमेश्वर मनुष्य के हृदय को स्पर्श नहीं करता या उसके भीतर कार्य नहीं करता। इस प्रकार, प्रार्थना करने के विषय में सबसे महत्वपूर्ण बात अपने सच्चे हृदय के शब्दों को परमेश्वर से बोलना है, परमेश्वर को अपनी कमियों या विद्रोही स्वभाव के बारे में बताना है और संपूर्ण रीति से स्वयं को परमेश्वर के समक्ष खोल देना है। केवल तभी परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाओं में रूचि रखेगा; यदि नहीं, तो परमेश्वर अपने चेहरे को तुमसे छिपा लेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" से

एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करना सुसंगति से बोलना है। हाँ का अर्थ हाँ, नहीं का अर्थ नहीं है। तथ्यों के प्रति सच्चे रहें और उचित तरीके से बोलें। कपट मत करो, झूठ मत बोलो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "क्षमता को सुधारने का प्रयोजन परमेश्वर द्वारा उद्धार प्राप्त करना है" से

आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से बहुत डरते हैं और जबकि तू परमेश्वर की देह को धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को घोखा नहीं दे सकता। कोई भी बात, जो परमेश्वर के पर्यवेक्षण का सामना नहीं कर सकती, वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं और उसे अलग कर देना चाहिए; अन्यथा यह परमेश्वर के विरूद्ध पाप होता है। इसलिए, इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तू किस समय प्रार्थना करता है, तू कब अपने भाई-बहनों से बातचीत और सहभागिता करता है, या कब तू अपना काम करता है और व्यवसाय का प्रबंधन करता है, तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख रखना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, परमेश्वर तेरे साथ है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, जो कुछ तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा, इसलिए तुझे अपने कार्य को पूरा करने के लिए अपने आपको ईमानदारी से समर्पित कर देना चाहिए। …

… तू जो कुछ भी करता है, हर कार्य, हर इरादा, और हर प्रतिक्रया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। यहां तक कि, तेरे रोजाना का आध्यात्मिक जीवन भी - तेरी प्रार्थना, परमेश्वर के साथ तेरा सामीप्य, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता, कलीसिया का जीवन जीना, और तेरी साझेदारी में तेरी सेवा - परमेश्वर के सम्मुख और उसके द्वारा विचार के लिए लाई जानी चाहिए। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुझे जीवन में परिपक्व होने में मदद करेगा। परमेश्वर के पर्यवेक्षण को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। जितना तू परमेश्वर के पर्यवेक्षण को स्वीकार करता है, उतना ही तू शुद्ध होता जाता है और जितना तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलता है, इसलिए तू भ्रष्टता और अपव्यय की बुलाहट को नहीं सुनेगा, और तेरा हृदय उसकी उपस्थिति में रहेगा; जितना तू उसके पर्यवेक्षण को ग्रहण करता है, तू शैतान को उतना ही लज्जित करता है और उतना अधिक देह को त्यागने में सक्षम होता है। इसलिए, परमेश्वर के पर्यवेक्षण को ग्रहण करना एक ऐसा मार्ग है जिसका व्यक्ति को अवश्य अभ्यास करना चाहिए। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तू क्या करता है, यहां तक कि तब भी जब तू अपने भाई-बहनों के साथ सहभागिता करता है, यदि तू अपने कर्मों को परमेश्वर के सम्मुख लाता है और उसके पर्यवेक्षण को चाहता है और तेरा इरादा स्वयं परमेश्वर की आज्ञाकारिता का है, तो जो तू अभ्यास करता है वह बहुत सही होगा। यदि केवल तू, सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाता है जो तू करता है और परमेश्वर के पर्यवेक्षण को स्वीकार करता है, तो वास्तव में तू ऐसा कोई हो सकता है जो परमेश्वर की उपस्थिति में रहता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार चलते हैं" से

तुम लोगों के भाग्य के लिए, तुम लोगों को परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित किए जाने का प्रयास करना चाहिए। कहने का अर्थ है कि, चूँकि तुम लोग यह अभिस्वीकृत करते हो कि तुम लोग परमेश्वर के घर में गिने जाते हो, तो तुम लोगो को मन की शांति को परमेश्वर में ले जाना चाहिए और सभी बातों में उसे संतुष्ट करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, तुम लोगों को अपने कार्यों में सैद्धांतिक और उनमें सत्य के अनुरूप अवश्य होना चाहिए। यदि यह तुम्हारी क्षमता के परे है, तो तुम परमेश्वर के द्वारा घृणा और अस्वीकृत किए जाओगे और हर मनुष्य के द्वारा ठुकराए जाओगे। जब तुम एक बार ऐसी दुर्दशा में पड़ जाते हो, तो तुम परमेश्वर के घर में से नहीं गिने जा सकते हो। परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित नहीं किये जाने का यही अर्थ है।

… ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी चीज़ में उस से ढकोसला नहीं करना; सभी चीजों में उसके प्रति निष्कपट होना, सत्य को कभी भी नहीं छुपाना; कभी भी ऐसा कार्य नहीं करना जो उन लोगों को धोखा देता हो जो ऊँचे हैं और उन लोगों को भ्रम में डालता हो जो नीचे हैं; और कभी भी ऐसा काम नहीं करना जो केवल परमेश्वर की चापलूसी करने के लिए किया जाता है। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में अशुद्धता से परहेज करना, और न तो परमेश्वर को और न ही मनुष्य को धोखा देना। … कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपनी महत्वहीन तर्कसंगतताओं से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को-कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाईयों को-दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सच्चाई का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन निवास करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाले के रूप काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, तथा गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व व्यय करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ये लोग वे हैं जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तीन चेतावनियाँ" से

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कितने धर्मी लोग विपत्तिओं में परमेश्वर के पास वापस आ जाएँगे? देह-धारी परमेश्वर के कार्य और आत्मा के कार्य के बीच क्या अंतर है? प्रश्न 20: बाइबल में यह लिखा गया है: "यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है" (इब्रा 13:8)। तो परमेश्वर का नाम कभी नहीं बदलता है! लेकिन तुम कहते हो कि जब परमेश्वर अंतिम दिनों में फिर से आएगा तो वह एक नया नाम लेगा और उसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा। तुम इसे कैसे समझा सकते हो? प्रश्न 35: धार्मिक दुनिया के अधिकांश लोग मानते हैं कि पादरियों और प्राचीन लोगों को परमेश्वर के द्वारा चुना और प्रतिष्ठित किया गया है, और यह कि वे सभी धार्मिक कलीसियाओं में परमेश्वर की सेवा करते हैं; अगर हम पादरियों और प्राचीन लोगों का अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं, तो हम वास्तव में परमेश्वर का ही अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं। यथार्थतः मनुष्य का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या मतलब है, और वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या अर्थ है, ज्यादातर लोग सच्चाई के इस पहलू को नहीं समझते हैं, तो कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो।