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अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब के द्वारा उस मूल्य का जीवन बिताया गया

अपनी परीक्षाओं के पश्चात् अय्यूब

(अय्यूब 42:7-9) ऐसा हुआ कि जब यहोवा ये बातें अय्यूब से कह चुका, तब उसने तेमानी एलीपज से कहा, "मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही। इसलिये अब तुम सात बैल और सात मेढ़े छाँटकर मेरे दास अय्यूब के पास जाकर अपने निमित्त होमबलि चढ़ाओ, तब मेरा दास अय्यूब तुम्हारे लिये प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसी की प्रार्थना मैं ग्रहण करूँगा; और नहीं, तो मैं तुम से तुम्हारी मूढ़ता के योग्य बर्ताव करूँगा, क्योंकि तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।" यह सुन तेमानी एलीपज, शूही बिलदद और नामाती सोपर ने जाकर यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया, और यहोवा ने अय्यूब की प्रार्थना ग्रहण की।

(अय्यूब 42:10) जब अय्यूब ने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तब यहोवा ने उसका सारा दुःख दूर किया, और जितना अय्यूब के पास पहले था, उसका दुगना यहोवा ने उसे दे दिया।

(अय्यूब 42:12) यहोवा ने अय्यूब के बाद के दिनों में उसके पहले के दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छः हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं।

(अय्यूब 42:17) अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया।

वे जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं उन्हें परमेश्वर के द्वारा स्नेह से देखा जाता है, जबकि ऐसे लोग जो मूर्ख हैं उन्हें परमेश्वर के द्वारा नीची दृष्टि से देखा जाता है

अय्यूब 42:7-9 में, परमेश्वर कहता है कि अय्यूब उसका दास है। उसके द्वारा "दास" शब्द का उपयोग करना अय्यूब की ओर संकेत करता है जो उसके हृदय में अय्यूब के महत्व को दर्शाता है; हालाँकि परमेश्वर ने अय्यूब को ऐसा कुछ कहकर नहीं पुकारा था जो और अधिक सम्मानीय होता, परमेश्वर के हृदय के भीतर अय्यूब के महत्व से इस उपाधि का कोई सम्बन्ध नहीं था। यहाँ पर "दास" शब्द अय्यूब के लिए परमेश्वर का दिया हुआ उपनाम है। "मेरे दास अय्यूब" की ओर परमेश्वर के अनगिनित संकेत यह दिखाते हैं कि वह अय्यूब से कितना प्रसन्न था, और हालाँकि परमेश्वर ने "दास" शब्द के पीछे छिपे अर्थ को नहीं बताया था, फिर भी दास शब्द की परमेश्वर की परिभाषा को पवित्र शास्त्र के इस अंश के इन वचनों में देखा जा सकता है। परमेश्वर ने सबसे पहले तेमानी एलीपज से कहा: "मेरा क्रोध तेरे और तेरे दोनों मित्रों पर भड़का है, क्योंकि जैसी ठीक बात मेरे दास अय्यूब ने मेरे विषय कही है, वैसी तुम लोगों ने नहीं कही।" ये शब्द पहली बार आए हैं जिनमें परमेश्वर ने लोगों से खुलकर कहा था कि उसने वह सब कुछ स्वीकार किया था जो अय्यूब के द्वारा परमेश्वर की परीक्षाओं के बाद कहा एवं किया गया था, और ये शब्द पहली बार आए हैं जिनमें उसने उन सब चीज़ों की सटीकता एवं सत्यता की पुष्टि की थी जिन्हें अयूब ने किया एवं कहा था। परमेश्वर उनके ग़लत, एवं बेतुके वार्तालाप के कारण एलीपज और अन्य से क्रोधित था, क्योंकि वे अय्यूब के समान परमेश्वर के प्रगटीकरण को नहीं देख सकते थे या उन वचनों को नहीं सुन सकते थे जो उसने उनके जीवन में कहा था, फिर भी अय्यूब के पास परमेश्वर का ऐसा सटीक ज्ञान था, जबकि वे केवल आंख मूंद कर परमेश्वर के विषय में अनुमान लगा सकते थे, और परमेश्वर की इच्छा का उल्लंघन कर सकते थे और वह सब जो वे करते थे उनमें उसके धीरज को परख सकते थे। परिणामस्वरूप, ठीक उसी समय सब कुछ स्वीकार करते हुए जिन्हें अय्यूब द्वारा किया एवं कहा गया था, परमेश्वर अन्य लोगों के प्रति क्रोधित हो गया था, क्योंकि उनमें परमेश्वर के भय की वास्तविकता को देखने में वह न केवल असमर्थ था, बल्कि उसने जो कुछ वे कहते थे उनमें परमेश्वर के भय के विषय में भी कुछ नहीं सुना था। और इस प्रकार इसके आगे परमेश्वर ने उनसे निम्नलिखित मांग की: "इसलिये अब तुम सात बैल और सात मेढ़े छाँटकर मेरे दास अय्यूब के पास जाकर अपने निमित्त होमबलि चढ़ाओ, तब मेरा दास अय्यूब तुम्हारे लिये प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसी की प्रार्थना मैं ग्रहण करूँगा; और नहीं, तो मैं तुम से तुम्हारी मूढ़ता के योग्य बर्ताव करूँगा।" इस अंश में परमेश्वर ऐलीपज एवं अन्य से कह रहा है कि कुछ ऐसा करें जो उन्हें पापों से छुटकारा देगा, क्योंकि उनकी मूर्खता परमेश्वर के विरुद्ध एक पाप था, और इस प्रकार उन्हें अपनी ग़लती का सुधार करने के लिए होमबलि चढ़ाना पड़ा। होमबलियों को अकसर परमेश्वर को चढ़ाया जाता था, परन्तु इन होमबलियों के विषय में असामान्य बात यह है कि उन्हें अय्यूब को चढ़ाया गया था। अय्यूब को परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था क्योंकि उसने अपनी परीक्षाओं के दौरान परमेश्वर के लिए गवाही दी थी। इसी बीच, अय्यूब के इन मित्रों को उसकी परीक्षाओं के दौरान प्रकट किया गया था; उनकी मूर्खता के कारण परमेश्वर के द्वारा उनकी भर्त्सना की गई थी, और उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को भड़काया था, और उन्हें परमेश्वर के द्वारा दण्ड दिया जाना चाहिए—अय्यूब के सामने होमबलि चढ़ाने के द्वारा दण्ड दिया गया—जिसके बाद अय्यूब ने उनके लिए प्रार्थना की कि उनके प्रति परमेश्वर का दण्ड एवं उसका क्रोध दूर हो जाए। परमेश्वर का अभिप्राय था कि उन्हें लज्जित किया जाए, क्योंकि वे ऐसे लोग नहीं थे जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते थे, और उन्होंने अय्यूब की खराई पर दोष लगाया था। एक लिहाज से, परमेश्वर उन्हें बता रहा था कि उसने उनके कार्यों को स्वीकार नहीं किया था परन्तु बड़े रूप में अय्यूब को स्वीकार किया और उस से प्रसन्न हुआ था; दूसरे लिहाज से, परमेश्वर उनसे कहा रहा था कि परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किए जाने के बाद परमेश्वर के सामने मनुष्य को ऊंचा किया जाता है, यह कि मनुष्य की मूर्खता के कारण परमेश्वर के द्वारा मनुष्य से घृणा की जाती है, और इसके कारण परमेश्वर को ठेस पहुंचती है, और वह परमेश्वर की नज़रों में नीच एवं बुरा है। दो प्रकार के लोगों के विषय में ये परमेश्वर के द्वारा दी गई परिभाषाएं हैं, इन दो प्रकार के लोगों के प्रति ये परमेश्वर की मनोवृत्तियां हैं, और इन दो प्रकार के लोगों के मूल्य एवं स्थिति के विषय में ये परमेश्वर के स्पष्ट कथन हैं। भले ही परमेश्वर ने अय्यूब को अपना दास कहा था, फिर भी परमेश्वर की दृष्टि में यह "दास" अति प्रिय था, और उसे दूसरों के लिए प्रार्थना करने और उनकी ग़लतियों को क्षमा करने का अधिकार प्रदान किया गया था। यह "दास" परमेश्वर से सीधे बातचीत कर सकता था और सीधे परमेश्वर के सामने आ सकता था, उसकी हैसियत दूसरों की अपेक्षा अधिक ऊंची थी। यह "दास" शब्द का असली अर्थ है जिसे परमेश्वर के द्वारा कहा गया था। अय्यूब को यह विशेष सम्मान परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के कारण दिया गया था, और दूसरों को परमेश्वर के द्वारा दास नहीं कहा गया था इसका कारण है क्योंकि वे परमेश्वर का भय नहीं मानते थे और बुराई से दूर नहीं रहते थे। परमेश्वर की ये दो स्पष्ट भिन्न मनोवृत्तियां ही दो प्रकार के लोगों के प्रति उसकी मनोवृत्तियां हैं: ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं उन्हें परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया जाता है, और उन्हें उसकी दृष्टि में बहुमूल्य माना जाता है, जबकि ऐसे लोग जो मूर्ख हैं वे परमेश्वर से नहीं डरते हैं, और वे बुराई से दूर रहने में असमर्थ हैं, और वे परमेश्वर की कृपा को पाने के योग्य नहीं हैं; अकसर परमेश्वर के द्वारा उनसे घृणा एवं उनकी निन्दा की जाती है, और वे परमेश्वर की दृष्टि में नीच हैं।

परमेश्वर अय्यूब को अधिकार प्रदान करता है

अय्यूब ने अपने मित्रों के लिए प्रार्थना की, और उसके बाद, अय्यूब की प्रार्थनाओं के कारण, परमेश्वर ने उनकी मूर्खता के अनुसार उनके साथ व्यवहार नहीं किया—उसने उन्हें दण्ड नहीं दिया या उनसे कोई बदला नहीं लिया। और ऐसा क्यों था? क्योंकि उनके लिए परमेश्वर के दास अय्यूब की प्रार्थनाएं परमेश्वर के कानों तक पहुंच गई थीं; परमेश्वर ने उन्हें क्षमा किया था क्योंकि उसने अय्यूब की प्रार्थनाओं को स्वीकार किया था। और हम इसमें क्या देखते हैं? जब परमेश्वर किसी को आशीष देता है, तो वह उन्हें बहुत सारे प्रतिफल देता है, सिर्फ भौतिक वस्तुएं ही नहीं, या फिर दोनों देता है: परमेश्वर उन्हें अधिकार भी देता है, और दूसरों के लिए प्रार्थना करने के लिए उन्हें समर्थ भी बनाता है, और परमेश्वर भूल जाता है, और उन लोगों के गुनाहों को अनदेखा करता है क्योंकि उसने इन प्रार्थनाओं को सुन लिया है। यह वही अधिकार है जिसे परमेश्वर ने अय्यूब को दिया था। अय्यूब की प्रार्थनाओं के माध्यम से उनकी निन्दा को रोकने के लिए यहोवा परमेश्वर ने उन मूर्ख लोगों को लज्जित किया था—जो वास्तव में एलीपज़ और दूसरों के लिए उसका विशेष दण्ड था।

अय्यूब को एक बार फिर से परमेश्वर के द्वारा आशीषित किया जाता है, और फिर कभी शैतान के द्वारा उस पर आरोप नहीं लगा गया

यहोवा परमेश्वर के कथनों के मध्य ऐसे शब्द हैं "तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।" वह क्या था जो अय्यूब ने कहा? यह वह था जिसके बारे में हमने पहले बातचीत की थी, साथ ही साथ यह वह था जो अय्यूब की पुस्तक के पन्नों के अनेक वचनों में है जिनमें अय्यूब को बोलते हुए दर्ज किया गया है। वचनों के इन सभी पन्नों में, अय्यूब के पास एक बार भी परमेश्वर के विषय में कोई शिकायत या ग़लतफहमी नहीं है। उसने सिर्फ परिणाम का इंतज़ार किया है। यह वह इंतज़ार है जो आज्ञाकारिता के विषय में उसकी मनोवृत्ति है, जिसके परिणामस्वरूप, और उन वचनों के परिणामस्वरूप जिन्हें उसने परमेश्वर से कहा था, अय्यूब को परमेश्वर के द्वारा स्वीकार किया गया था। जब उसने परीक्षाओं को सहा और कठिनाईयों को झेला, तब परमेश्वर उसके साथ था, और हालाँकि परमेश्वर की उपस्थिति के द्वारा उसकी कठिनाईयां कम नहीं हुईं, फिर भी परमेश्वर ने वह देखा जिसे उसने देखने की इच्छा की थी, और वह सुना जिसे उसने सुनने की चाहत की थी। अय्यूब के प्रत्येक कार्य एवं शब्द परमेश्वर की दृष्टि एवं कानों तक पहुंचे; परमेश्वर ने सुना, और उसने देखा—और यह तथ्य है। परमेश्वर के विषय में अय्यूब का ज्ञान, और उस समय एवं उस समयावधि के दौरान उसके हृदय में परमेश्वर के विषय में उसके विचार वास्तव में उन लोगों के लिए उतने विशिष्ट नहीं थे जितना आज के समय के लोगों के लिए हैं, परन्तु उस समय के सन्दर्भ में, परमेश्वर ने तब भी वह सब कुछ पहचाना था जो उसने कहा था, क्योंकि उसके हृदय में उसका व्यवहार एवं विचार, और जो कुछ उसने अभिव्यक्त एवं प्रकट किया था, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के लिए पर्याप्त थे। उस समय के दौरान जब अय्यूब को परीक्षाओं के हवाले किया गया था, तब जो कुछ उसने अपने हृदय में सोचा था और जो कुछ करने का दृढ़ निश्चय किया था उसने परमेश्वर को एक परिणाम दिखाया था, एक ऐसा परिणाम जो परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, और उसके बाद परमेश्वर ने अय्यूब की परीक्षाओं को दूर किया, अय्यूब अपनी मुसीबतों से उबरा, और उसकी परीक्षाएं पूरी हो गई थीं और फिर कभी दुबारा उस पर नहीं आईं। क्योंकि अय्यूब को पहले से ही परीक्षाओं के अधीन किया गया था, और वह इन परीक्षाओं के दौरान दृढ़ता से स्थिर खड़ा रहा, और उसने शैतान पर पूरी तरह से विजय प्राप्त किया, और परमेश्वर ने उसे आशीषें प्रदान कीं जिनका वह सही मायने में हकदार था। जैसा अय्यूब 42:10,12 में दर्ज है, अय्यूब को फिर से आशीषित किया गया था, और उसे पहले के मुकाबले कहीं अधिक आशीषें प्राप्त हुईं थीं। इस समय शैतान पीछे हट गया था, और फिर कभी कुछ नहीं कहा या कुछ नहीं किया, और उसके बाद से शैतान के द्वारा अय्यूब के साथ फिर कभी हस्तक्षेप नहीं किया गया या उस पर आक्रमण नहीं किया गया, और शैतान ने अय्यूब के विषय में परमेश्वर की आशीषों के विरुद्ध आगे से कोई दोषारोपण नहीं किया।

अय्यूब ने अपना बाकी का आधा जीवन परमेश्वर की आशीषों के मध्य बिताया

हालाँकि उस समय उसकी आशीषें केवल भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, ऊंटों, भौतिक सम्पत्तियों, इत्यादि तक ही सीमित थीं, फिर भी वे आशीषें जिन्हें परमेश्वर अपने हृदय में अय्यूब को प्रदान करना चाहता था वे इनसे कहीं बढ़कर थीं। उस समय क्या इस बात को दर्ज किया गया था कि परमेश्वर किस प्रकार की अनन्त प्रतिज्ञाएं अय्यूब को देना चाहता था? अय्यूब के विषय में परमेश्वर कि आशीषों में, परमेश्वर ने उसकी आशीषों का जिक्र नहीं किया या उसे स्पर्श नहीं किया, और इसके बावजूद कि अय्यूब परमेश्वर के हृदय में क्या महत्व एवं स्थान रखता था, कुल मिलाकर परमेश्वर अपनी आशीषों के विषय में विवेकशील था। परमेश्वर ने अय्यूब के अंत की घोषणा नहीं की। इसका क्या अर्थ है? उस समय, जब परमेश्वर की योजना मनुष्य के अंत की घोषणा के बिन्दु तक नहीं पहुंची थी, और उस योजना ने उसके कार्य के अंतिम चरण में प्रवेश नहीं किया था, तब तक परमेश्वर ने अंत का कोई जिक्र नहीं किया था, उसने महज मनुष्य को भौतिक आशीषें ही प्रदान की थीं। इसका अर्थ है कि अय्यूब का बाकी का आधा जीवन परमेश्वर की आशीषों के मध्य गुज़रा था, यही वह बात थी जिसने उसे दूसरों से अलग किया था—परन्तु उनके समान ही उसकी उम्र बढ़ने लगी, और किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही वह दिन भी आया जब उसने संसार को अलविदा कहा। इस प्रकार ऐसा लिखा हुआ है "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। यहाँ इसका क्या अर्थ है "वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर .... मर गया?" जब परमेश्वर ने अंत की घोषणा की थी उसके पहले के युग में, परमेश्वर ने अय्यूब के लिए एक अपेक्षित जीवन को निर्धारित किया था, और जब वह उस आयु तक पहुंच गया था तब उसने अय्यूब को प्राकृतिक रूप से इस संसार से जाने की अनुमति दी। अय्यूब की दूसरी आशीष से लेकर उसकी मृत्यु तक, परमेश्वर ने उसके जीवन में और किसी कठिनाई को नहीं जोड़ा था। परमेश्वर के लिए अय्यूब की मृत्यु सामान्य थी, और आवश्यक भी, यह कुछ ऐसा था जो बहुत ही साधारण था, और न तो यह कोई न्याय था और न ही कोई दण्डाज्ञा। जब वह जीवित था, तब अय्यूब ने परमेश्वर की आराधना की एवं उसका भय माना; इस लिहाज से कि अपनी मृत्यु की ओर बढ़ते हुए उसका अंत किस प्रकार हुआ, परमेश्वर ने इसके विषय में कुछ नहीं कहा, और न ही कोई टिप्पणी की थी। परमेश्वर जो करता है और कहता है उसमें वह न्यायसंगत है, और उसके वचनों एवं कार्यों की विषयवस्तु एवं सिद्धान्त उसके कार्य के चरण और उस समय अवधि के अनुसार हैं जिसमें वह कार्य कर रहा है। परमेश्वर के हृदय में किसी ऐसे व्यक्ति का अंत किस प्रकार होगा जो अय्यूब के समान है? क्या परमेश्वर अपने हृदय में किसी निर्णय पर पहुंच चुका था? हाँ वास्तव में वह पहुंच चुका था! यह बस ऐसा ही था कि मनुष्य के द्वारा इसे जाना नहीं गया था; परमेश्वर मनुष्य को नहीं बताना चाहता था, न ही उसके पास मनुष्य को बताने का कोई इरादा था। और इस प्रकार, सतही तौर पर कहें, तो अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया, और अय्यूब का जीवन ऐसा ही था।

अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब के द्वारा उस मूल्य का जीवन बिताया गया

क्या अय्यूब ने एक मूल्यवान जीवन बिताया था? वह मूल्य कहाँ था? ऐसा क्यों कहा गया है कि उसने एक मूल्यवान जीवन बिताया था? मनुष्य के लिए इसका मूल्य क्या था? मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसने मानवजाति का प्रतिनिधित्व किया था जिसे परमेश्वर शैतान एवं संसार के लोगों के सामने एक गूंजती हुई गवाही देने के लिए बचाना चाहता है। उसने उस कर्तव्य को निभाया जिसे परमेश्वर के एक जीवधारी के द्वारा निभाया जाना चाहिए था, और एक मिसाल कायम की, और उसने उन सभी लोगों के लिए एक आदर्श के रूप में कार्य किया जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है, और लोगों को अनुमति दी कि वे देखें कि परमेश्वर पर भरोसा रखने के द्वारा शैतान के ऊपर विजय प्राप्त करना पूरी तरह से सम्भव है। और परमेश्वर के लिए उसका मूल्य क्या था? परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर की आराधना करने, परमेश्वर के कार्यों की गवाही देने, और परमेश्वर के कार्यों की प्रशंसा करने, और परमेश्वर को सुकून एवं किसी चीज़ का आनन्द देने की उसकी योग्यता में निहित था; परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य इसमें भी निहित था कि, उसकी मृत्यु से पहले, अय्यूब ने किस प्रकार परीक्षाओं का अनुभव किया और शैतान पर विजयी हुआ, और शैतान एवं संसार के लोगों के सामने परमेश्वर के लिए गूंजती हुए गवाही दी, मानवजाति के मध्य परमेश्वर की महिमा की, परमेश्वर के हृदय को राहत दी, और परमेश्वर के उत्सुक हृदय को ऐसे परिणाम को निहारने, एवं ऐसी आशा को देखने की अनुमति दी। उसकी गवाही ने किसी व्यक्ति को परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर खड़े होने के लिए, और इस योग्य होने के लिए योग्यता की एक मिसाल कायम की ताकि परमेश्वर के बदले में, और मनुष्य के प्रबंधन के लिए परमेश्वर के कार्य में शैतान को लज्जित किया जाए। क्या यह अय्यूब के जीवन का मूल्य नहीं है? अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय को राहत पहुंचाया था, उसने परमेश्वर को महिमावान्वित होने की खुशी का पहले से ही स्वाद चखाया था, और उसने परमेश्वर की प्रबन्धकीय योजना के लिए एक बेहतरीन शुरुआत प्रदान की थी। इस बिन्दु के आगे से अय्यूब का नाम परमेश्वर की महिमा के लिए एक प्रतीक बन गया, और शैतान के ऊपर मानवजाति की विजय का एक चिन्ह बन गया। अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब ने जैसा जीवन जीया और शैतान के ऊपर उसकी असाधारण विजय को परमेश्वर के द्वारा हमेशा हृदय में संजोकर रखा जाएगा, और आनेवाली पीढ़ियों के द्वारा उसकी खराई, सीधाई, एवं परमेश्वर के भय का सम्मान एवं अनुसरण किया जाएगा। उसे एक बेदाग, चमकदार मोती, एवं इत्यादि के समान परमेश्वर के द्वारा हमेशा हृदय में संजोकर रखा जाएगा, और वह मनुष्य के द्वारा सहेजकर रखे जाने के भी योग्य है!

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