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64. यह सत्य को अभ्यास में लाना है

फैन ज़िंग झुमैडियन शहर, हेनान प्रान्त

अतीत में, कुछ कर्तव्यों पर कार्य करने के लिए मुझे एक बहन के साथ जोड़ा गया। क्योंकि मैं अहंकारी और घमण्डी थी और सत्य की खोज नहीं करती थी, इसलिए मुझमें इस बहन के प्रति कुछ पूर्वकल्पित विचार थे जिन्हें मैंने हमेशा अपने हृदय में रखा और उसके साथ खुलकर संवाद नहीं किया। जब हम अलग हुए, तो मैंने सामंजस्यपूर्ण कार्यकारी रिश्ते की सच्चाई में प्रवेश नहीं किया था। बाद में, कलीसिया ने किसी अन्य बहन के साथ कार्य करने की मेरे लिए व्यवस्था की और मैंने परमेश्वर के सामने एक दृढ़ संकल्प स्थित किया: अब से, मैं असफलता के मार्गों पर नहीं चलूँगी। मैंने अपना सबक सीख लिया है और इसलिए इस समय मैं इस बहन के साथ निश्चित रूप से खुलकर अधिक संवाद करूँगी और सामंजस्यपूर्ण कार्यकारी रिश्ते में पहुँचूँगी।

जब हम साथ मिलकर अपने कर्तव्यों को करते थे तो हर समय हमारे बीच संघर्ष या एक अंतराल होता था, मैं उस बहन के साथ बात करने के लिए पहला कदम उठाती और अपने दिल की बात कहती। मैं उससे पूछती कि किस पहलू पर मैं अनुचित रुप से कार्य कर रही थी। तब वह बहन इंगित करती कि मैं अहंकारी और घमण्डी थी और यह कि मैं हमारे संवाद में हमेशा उसके दृष्टिकोण को अस्वीकार करती थी। वह कहती थी कि कभी-कभी मैं उसकी परिस्थितियों की ओर इशारा करती थी और अन्यायपूर्ण ढंग से उसे वर्गीकृत करती थी, और यह कि सभाओं के दौरान, परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बारे में सभी निर्णयों को मैं ही लेती थी। मैं उन सभी बातों के लिए सहमति में सिर हिलाती थी जो वह बहन मेरे बारे में इंगित करती थी। मैं सोचती थी: "चूँकि तुम कहती हो कि मैं अहंकारी हूँ, तो मैं अब से और अधिक विनम्रता के साथ बोलूँगी और बुद्धि से और चतुराई से बात करने पर विशेष ध्यान दूँगी। यदि मुझे तुम्हारी किसी समस्या का पता चलता है, तो जब मैं उनका उल्लेख करूँगी तो मैं उन्हें कम करके बताऊँगी। यदि तुम उन्हें नहीं पहचानती हो, तो मैं उनके बारे में बात नहीं करूँगी। सभाओं के दौरान, जो कुछ तुम मुझे खाने और पीने के लिए कहोगी मैं वही खाऊँगी और पीऊँगी, और जो कुछ भी तुम कहोगी मैं उसे ध्यान से सुनूँगी। क्या इससे हर मामला नहीं सुलझ जाएगा?" इसके बाद, मैंने इसे अभ्यास में लाना शुरू कर दिया। बोलने से पहले, मैं सोचती कि मैं किस प्रकार बहन के विचार को नकारने से परहेज कर सकती हूँ। जब हमारे दृष्टिकोण एक दूसरे के साथ सहमत नहीं होते, तो मैं उसके दृष्टिकोण को मान लेती और उसके विचार को क्रियान्वित करती। जब मैं उस बहन को किसी चीज़ को गलत तरीके से करते हुए देखती, तो मैं उसके सामने स्पष्ट रूप से उसका वर्णन नहीं करती। किन्तु इस तरह से व्यवहार करते हुए एक अवधि के पश्चात्, मैंने महसूस किया कि मेरी "देह को त्यागने और सत्य को अभ्यास में लाने" की विचारधारा ने हमारे रिश्ते को बिलकुल भी नहीं बदला था। इसके बजाए, इसने मेरे बारे में उसके पूर्वकल्पित विचारों को और अधिक सुदृढ़ कर दिया। इन परिणामों को देखने पर, मुझे लगा कि मेरे साथ गलत हुआ। मैंने सोचा: "मैंने सत्य को अभ्यास में लाने के लिए पहले से ही अपना सर्वोत्तम प्रयास किया है, यह काम क्यों नहीं कर रहा है? इस बहन के साथ पटना आसान नहीं है, उसमें थोड़ी सी भी संवेदनशीलता की मात्रा नहीं है।" इसलिए, मैं नकारात्मकता में डूब गई और मेरा हृदय बहुत दुःखी हो गया।

एक दिन, हमारे कार्य का निरिक्षण करने और यह पूछने के लिए कि इस अवधि के दौरान हमारी स्थितियाँ कैसी थीं एक अगुवा हमारे पास आया। तब मैंने व्यक्त किया कि मेरी स्थिति कैसी थी। सुनने के बाद, अगुवे ने कहा: "तुम्हारा यह तरीका सत्य को अभ्यास में लाना नहीं है। तुम भीतर से अशुद्ध हो। तुम इसे अपने स्वयं के उद्देश्य के लिए कर रही हो और सत्य के अनुसार कार्य नहीं कर रही हो।" इसके बाद, हमने परमेश्वर के वचन के दो अंशों को पढ़ा। परमेश्वर ने कहा: "बाहर से ऐसा लगता है कि जैसे तुम सच्चाई को अभ्यास में डाल रहे हो, लेकिन वास्तव में, तुम्हारे कर्मों की प्रकृति को देखकर ऐसा नहीं लगता कि तुम सच्चाई को लागू कर रहे हो। कुछ बाहरी व्यवहार वाले ऐसे बहुत से लोग हैं, जो मानते हैं कि "मैं सच्चाई को अभ्यास में डाल रहा हूँ… लेकिन परमेश्वर कहता है: "मैं नहीं मानता कि तुम सच्चाई को अभ्यास में डाल रहे हो।" यह क्या है? यह एक प्रकार का व्यवहार है। गंभीरता से कहें तो, तुम्हें इसके लिए दोषी ठहराया जा सकता है; यह प्रशंसित नहीं होगा, इसको स्मरणीय नहीं माना जाएगा। इससे भी अधिक गंभीरता से कहें तो, इसका आगे विश्लेषण करने पर, तुम बुराई कर रहे हो, तुम्हारा व्यवहार परमेश्वर के विरोध में है। बाहर से, तुम दखल नहीं दे रहे हो, कोई परेशानी या हानि नहीं कर रहे हो, या किसी सच्चाई का उल्लंघन नहीं कर रहे हो। ऐसा लगता है कि तुम जो कर रहे हो वह तर्कसंगत और उचित है, लेकिन तुम बुरा कर रहे हो और परमेश्वर का विरोध कर रहे हो। इसलिए तुम्हें स्रोत की और देखना चाहिए जैसा कि परमेश्वर चाहता है, यह जानने के लिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन है, या क्या तुमने सच्चाई को अभ्यास में डाल रखा है। यह लोगों की कल्पनाओं और मतों के, या तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत पसंदों के, अनुरूप चलना नहीं है। बल्कि, यह परमेश्वर है जो कहता है कि तुम उसकी इच्छा के अनुरूप चल रहे हो या नहीं; यह परमेश्वर ही है जो कहता है कि तुम्हारे कर्मों में सच्चाई है या नहीं, और वे कर्म उसके मानकों के अनुसार हैं या नहीं। परमेश्वर की अपेक्षाओं के साथ खुद को मापना ही एकमात्र सही तरीका है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "तुम्हारे स्वभाव को बदलने के बारे में तुम्हें क्या पता होना चाहिए" से)। "लोगों को अपनी मानवीय सोच अच्छी और सही लगती है, और वे ऐसे दिखते हैं मानो वे सच का कोई खास उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। लोगों को लगता है कि इस तरह वे सच्चाई पर अमल कर रहे हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा करना परमेश्वर के अधीन होना है। दरअसल, लोग वास्तव में परमेश्वर की तलाश और इस बारे में परमेश्वर से प्रार्थना नहीं कर रहे हैं। वे परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए अच्छी तरह से प्रयास नहीं कर रहे हैं, न ही परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुसार इसे करने की कोशिश करते हैं। उनके पास यह सच्ची स्थिति नहीं है, और उनके पास ऐसी लगन नहीं है। यही सबसे बड़ी गलती है जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं, क्योंकि आप परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं, परन्तु परमेश्वर आपके दिल में नहीं हैं। यह पाप कैसे नहीं है? यह कैसे अपने आप को धोखा देना नहीं है? इस तरीके से विश्वास रखने से कौन सी बात बनेगी? परमेश्वर में विश्वास करने का व्यावहारिक महत्व कहाँ है?" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "परमेश्वर की इच्छा को खोजना और यथासंभव सत्य का अभ्यास करना)। मैंने परमेश्वर के वचनों को समझने का प्रयास किया और उनकी तुलना अपनी तथाकथित "सत्य को अभ्यास में लाने" की स्थिति से की। मेरा हृदय प्रकाशित हो गया। इसलिए, जिस तरीके से मैं चीज़ों को कर रही थी वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के अभिप्राय से नहीं था। यह मेरी स्वयं की खोखली प्रतिष्ठा की सुरक्षा के अभिप्राय से था। मुझे भय था कि अगुवा कहेगा कि मेरी प्रकृति दोषपूर्ण थी, कि मैंने सत्य की खोज नहीं की, और कि मैंने किसी के साथ भी अच्छे से काम नहीं किया। इसके अतिरिक्त, मैंने यह सोचा कि उस बहन के साथ अपने रिश्ते को आसान करने और उस झगड़े के द्वारा उत्पन्न शर्मिन्दगी और पीड़ा से अलग होने के लिए यह एक बहाना था। मैंने सोचा कि यह उस छवि को मुक्त करेगा जो अन्य लोगों में मेरे बारे में थी और उन्हें यह देखने की अनुमति देगा कि मैं बदल चुकी हूँ। यह देखा जा सकता है कि मेरा तथाकथित "सत्य को अभ्यास में लाना" मेरे स्वयं के उद्देश्यों के लिए ही था। यह सब अन्य लोगों के सामने किया गया था और इसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के प्रयास के आधार पर स्थापित नहीं किया गया था। मैंने अपने आप से घृणा नहीं की और ईमानदारी से देह को नहीं त्यागा क्योंकि मैं अपने घमण्डी और अहंकारी प्रकृति के प्रति जागरूक नहीं थी। उस बहन के साथ काम करने पर चिंतन करने में, यह इसलिए था क्योंकि मैंने अपने घमण्डी और अहंकारी प्रकृति को नहीं पहचाना था, और क्योंकि मैंने स्वयं के विषय में ऊँचा सोचती थी और हमेशा सोचती थी कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ कि जब मैं बोलती थी तो मैं अनजाने में ही दूसरों को छोटा समझते हुए किसी मंच पर खड़ी हो जाती थी। मामलों को सँभालते समय, मुझे प्रभारी होना पसन्द था; मैंने चीज़ों को अपने तरीके से किया, और कभी भी अन्य लोगों के विचारों से परामर्श नहीं लिया। जब उस बहन ने इन समस्याओं की ओर इशारा किया जो मुझे में थीं, तो मैंने अपनी प्रकृति के सार का विश्लेषण करने और उसे समझने के लिए तदनुरूपी सच्चाई की खोज नहीं की। इससे भी अधिक, मैंने खोज नहीं की कि परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार और सत्य के अनुसार मुझे इसे किस प्रकार अभ्यास में लाना चाहिए। मैंने सिर्फ कुछ बाहरी कार्यकलापों को ही बदला, यह सोचते हुए कि चूँकि मैंने उन चीज़ों को करना बन्द कर दिया है जो गलत थीं, इसलिए मैं सत्य को अभ्यास में ला रही थी। वास्तव में, हर एक चीज़ जिसका मैं अभ्यास कर रही थी वह मेरी स्वयं की अवधारणाओं पर आधारित सत्य था। ये सब बाह्य कार्यकलाप थे और इनका परमेश्वर के वचन के साथ कोई लेना-देना नहीं था। परमेश्वर यह स्वीकार नहीं करेगा कि मैं सत्य को अभ्यास में ला रही थी। क्योंकि मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं के समान अभ्यास नहीं कर रही थी, और सत्य के अनुसार अभ्यास नहीं कर रही थी, और जो कुछ भी मैंने किया वह अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को संतुष्ट करने और अपने उद्देश्यों तक पहुँचने के लिए किया गया था, इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में मेरे कार्यकलाप बुरे थे; यह परमेश्वर का प्रतिरोध करना था।

इसके बारे में जागरूक होने के बाद, मैंने जीवन में अपनी स्वयं की भ्रष्ट प्रकृति को समझने के लिए सतर्कता से परमेश्वर के वचन को संयुक्त किया। जब मैंने अपनी भ्रष्टता को व्यक्त किया या जब मैं अवगत हो गई कि मेरी स्थिति सही नहीं है, तो मैंने खुलकर अपनी स्थिति को प्रकट कर दिया और मैंने इसका विश्लेषण किया और परमेश्वर के वचन के अनुसार स्रोत की खोज की। जब मैंने ऐसा किया, तो मेरी बोली और मेरे कार्यकलाप प्राकृतिक रूप से वशीभूत हो गए, और मैंने उस स्थिति को जाना जिसमें मुझे खड़ा होना चाहिए। मुझमें लोगों के लिए आदर था और मैंने धैर्य के साथ समर्पण किया। देह को त्यागना बहुत कम कठिन हो गया और हमारा दिली संवाद भी हो सका था। हमारा जुड़ाव अतीत की अपेक्षा और भी अधिक सामंजस्यपूर्ण हो गया।

इन अनुभवों के माध्यम से, मुझे समझ में आने लगा कि सत्य को अभ्यास में लाना परमेश्वर के वचन पर आधारित होना चाहिए और सत्य के सिद्धान्तों पर स्थापित किया जाना चाहिए। यदि कोई परमेश्वर के वचन को छोड़ता है, तो हर चीज़ एक बाह्य कार्यकलाप बन जाती है, अर्थात्, अपनी स्वयं की अवधारणाओं की सच्चाई को अमल में लाना। भले ही मैं चीज़ों को अच्छी और सही तरीके से करती, तब भी इसे सत्य को अभ्यास में लाना नहीं माना जाता, और इससे भी अधिक यह मेरे जीवन स्वभाव में परिवर्तन नहीं लाता। अब से, जो कुछ मैं कर रही हूँ उसकी परवाह किए बिना, मैं चाहती हूँ कि परमेश्वर के वचन मेरे कार्यकलापों के सिद्धान्त बनें और परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से अभ्यास में लाऊँ ताकि मेरा आचरण सत्य के और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो और परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करे।

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