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49. तथाकथित अच्‍छे व्‍यक्ति का असली चेहरा

केमु, झ़ुमैडियन शहर, हेनन प्रांत

अपने मन में, मैं हमेशा स्वयं को एक अच्‍छी मानवता वाली व्‍यक्ति समझती थी। मुझे ऐसा इसलिए लगता था क्योंकि, मेरे पड़ोसी अक्सर मेरे माता-पिता के सामने मेरी समझदार और अपने परिवार की चिंता करने वाली होने के लिए तारीफ करते थे; कहते थे कि मैं अपने माता-पिता की आँखों का तारा हूँ। विवाह के बाद, मेरे ससुराल के लोग पड़ोसियों के सामने मेरे दयालु और संतानोचित होने के लिए प्रशंसा करते थे। मेरी इकाई में, मेरा अगुआ मेरे ईमानदार और सक्षम होने की वजह से मेरी सराहना करता था। और परमेश्वर के कार्य के इस चरण को स्‍वीकार करने के बाद से, मैं कलीसिया द्वारा मुझसे कही गई हर चीज़ को करने के लिए के प्रति आज्ञाकारी रही हूँ। अपने अगुआ द्वारा अच्‍छा काम न करने पर डाँटे जाने पर भी मैं उसका कभी भी विरोध नहीं करती थी और मैं प्रायः ज़रूरतमंद भाई-बहनों की मदद करती थी। वैसे तो, मैं अपने आप को समझदार, कृपालु और मानवता-युक्‍त सहृदय व्‍यक्ति समझती हूँ। मैंने अपने आप पर परमेश्वर के उन वचनों के संदर्भ में कभी भी विचार नहीं किया जिसमें परमेश्वर प्रकट करता है कि मनुष्य में मानवता की कमी है या कि मनुष्य में दुर्बल मानवता है। भाइयों और बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों की संगति करते समय, यद्यपि मैं जानती हूँ कि मुझे अपनी प्रकृति के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता है, तब भी मैं अपना स्वयं का दृष्टिकोण बनाए रखती और हृदय में सोचती कि: भले ही मुझमें अच्छी मानवता न हो, तब भी दूसरों की तुलना में मुझमें अधिक मानवता है। दूसरे शब्दों में, चाहे परमेश्‍वर के वचन कुछ भी कहें या भाई-बहन कुछ भी कहें, मैं स्वयं को अच्छी मानवता वाली व्यक्ति होने के विचार से अलग करने की इच्छुक नहीं हूँ।

एक दिन, जब मैं परमेश्‍वर के वचनों को खा और पी रही थी तब एक अंश ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। परमेश्वर कहता है, "कुछ लोग स्वाभाविक रूप से अच्छे होते हैं; वे सत्य का अभ्यास करने में समर्थ होते हैं। कुछ लोगों की मानवीयता कमज़ोर होती है, इस प्रकार उनके लिए सत्य का अभ्यास करना कठिन होता है… क्या आप लोग कहेंगे कि वह जो सत्य का अभ्यास नहीं करता है उसने कभी सत्य की खोज की है? उसने उसकी खोज बिल्कुल भी नहीं की है! उसकी स्वयं की सोच जागृत होती है: 'यह मार्ग अच्छा है, यह मेरे लाभ के लिए है।' अंत में, वह अभी भी अपने स्वयं के विचारों पर ही आधारित होकर काम करता है। वह सत्य का अभ्यास इसलिए नहीं करता है क्योंकि उसके ह्रदय में कुछ ग़लत है, और उसका ह्रदय सही नहीं है। वह खोजता नहीं है, वह जाँच नहीं करता है, और न ही वह परमेश्वर के सामने प्रार्थना करता है; वह बस ढिठाई से अपनी स्वयं की इच्छाओं के अनुसार ही कार्य करता है। इस प्रकार के व्यक्ति में साधारणतया सत्य के लिए कोई स्नेह नहीं होता है। …ऐसे लोग जिनमें सत्य के लिए प्रेम नहीं है वे न तो उसे उस समय खोजेंगे, और न ही उसके बाद वे अपने आपको जाँचेंगेl वे कभी बारीकी से नहीं जाँचते हैं कि अंत में वह कार्य सही रीति से किया गया था या ग़लत रीति से, इस प्रकार वे हमेशा सिद्धान्तों का उल्लंघन करते हैं, और सत्य का उल्लंघन करते हैं। …एक व्यक्ति जिसके पास हृदय है वह केवल एक बार ही ग़लती कर सकता है जब वह कार्यवाही का प्रारम्भ करता है, अधिक से अधिक दो बार- एक या दो बार, न कि तीन और चार बार, यह सामान्य भावना है। यदि वे उसी ग़लती को तीन या चार बार करते हैं, तो इससे साबित होता है कि उन्होंने सत्य के प्रति प्रेम नहीं है, और न ही वे सत्य की खोज करते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति निश्चित रूप में एक मानवीय व्यक्ति नहीं है" ("मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "स्वभाव का समाधान करना और सत्य का अभ्यास करना" से)। परमेश्‍वर के वचनों को इस अंश को पढने के बाद, मुझे एक आकस्मिक प्रकाशन हुआ। जैसा कि पता चलता है कि, अच्छी और बुरी मानवता सत्‍य के कार्यान्वयन से निकटता से संबंधित है। अच्छी मानवता वाला व्यक्ति सत्‍य की तलाश करेगा और हर चीज़ में सत्‍य का अभ्यास करेगा, और बाद में स्वयं की जाँच करेगा। मैंने अपने आप को हमेशा एक अच्छी मानवता वाली माना है, तो क्या मैं उनमें से एक हूँ जो हर चीज़ में सत्‍य की खोज और सत्‍य का अभ्यास करता है? विगत का सोचूँ तो, कई बातों के संबंध में जिनका मैंने सामना किया था मैं प्रार्थना या सत्‍य की खोज नहीं करती थी। उसके बाद मैं स्वयं की परीक्षा या स्वयं को समझने की कोशिश भी नहीं करती थी। यद्यपि मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव को व्यक्त कर दिया था, लेकिन मैंने सत्‍य की खोज करके अपने मसलों का समाधान नहीं किया था, बल्कि बार-बार उसी ग़लती को दोहराती रहती थी। कभी-कभी सत्‍य का कोई पहलू समझ आने पर भी मैं सत्‍यता का अभ्यास करती हुई दिखाई देना नहीं चाहती थी। मुझे ऐसे कई उदाहरण सजीव ढंग से याद हैं। एक बार, एक व्यक्ति जिसके साथ मैं सहभागी थी के बारे में अलगाव की भावना महसूस करना मुझे याद है। मुझे यह ज्ञात था कि यदि इस समस्या का हल नहीं निकाला गया तो यह सीधे कार्य की प्रभावशीलता को प्रभावित करेगा, लेकिन अपने ग़ुरूर और घमंड के कारण, मैंने अपने अहंकार को छोड़ने और उसके साथ स्पष्ट रूप से संवाद करने से इनकार कर दिया। इसके बजाय, मैंने मुश्किल अप्रिय फैसला लिया और कार्य को जारी रखा, जिसके परिणामस्वरूप बहुत अप्रभावी कार्य हुआ। कभी-कभी जब मैं भाई-बहनों को उनके किसी भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करते हुए देखती, तब मैं उन्‍हें उनको स्वयं को समझने में सहायता करने के लिए उनके साथ सत्य में संगति करने का प्रयास नहीं करती, बल्कि उनकी पीठ-पीछे उनकी आलोचना करती थी। कई बार निपटे जाने के बाद भी मैंने पश्चाताप किया नहीं किया या अपने तरीकों को नहीं बदला, बल्कि पुराने तरीकों पर ही डटी रही। मैं अपने कर्तव्यों में सबसे अच्छे परिणाम पाने की कोशिश नहीं करती थी, बल्कि हमेशा आलसी और डरपोक बनी रहती थी, चीज़ों से लापरवाही से निपटती रहती थी, और अपनी स्वयं की प्रतिष्‍ठा, सम्पत्ति और हैसियत को बनाए रखने के लिए परमेश्वर को धोखा देती रहती थी। इस बारे में मैं ज़्यादा नहीं सोचती थी या मुझे कोई अपराधबोध नहीं होता था। मेरे कार्य में घटनाओं के घटित होने पर मैं खोज या जाँच-पड़ताल नहीं करती थी, बल्कि अपनी मनमानी करती थी। भले ही इस कारण कलीसिया को भारी नुकसान उठाना पड़ता, तब भी मैं परमेश्‍वर की ऋणी महसूस नहीं करती थी और न ही अपने दुष्ट कर्मों से शर्मिंदा होती थी। यद्यपि परमेश्वर ने अपने वचनों के माध्यम से मुझे याद दिलाता था और निपटने और काँट-छाँट के माध्यम से मेरी भ्रष्टता को उजागर करता था, किन्तु मैं उसे अनदेखा करती रहती थी, और मैंने तीन-चार बार से भी ज्‍़यादा वही आज्ञालंघन किए थे। क्या ये कृत्य यह साबित नहीं करते कि मुझ में मानवता की कमी है और मैं परमेश्वर की नज़रों में सत्‍य को चाहने वाली नहीं हूँ? इसके बावजूद, मैंने अपनी प्रकृति के आधार पर स्वयं को जानने की कोशिश नहीं की है, बल्कि अपने मस्तिष्क में "अच्‍छी मानवता" की प्रतिष्ठा बनाए रखना जारी रखा। मैं कितनी बेशर्म रही हूँ!

इस पल, मेरा हृदय अपराध-बोध से भरा हूआ है, और साथ ही परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता से भी भरा हुआ है। मेरे पास अपने आप को परमेश्वर के सामने व्यक्त करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, "परमेश्वर, तेरा धन्यवाद कि तूने मुझे प्रबुद्धता दी, मुझे यह ज्ञात कराया कि मैं अच्छी मानवता वाली व्‍यक्ति नहीं हूँ, मुझे यह समझने में सहायता की कि सच्ची मानवता वाला व्यक्ति वह होता है जो सत्‍य से प्रेम करता है, वह होता है जो परमेश्वर की सुनता है और परमेश्वर का आज्ञा-पालन करता है, वह होता है जो सत्‍य का अभ्यास करने के लिए तैयार रहता और परमेश्वर के प्रेम को पाने की कोशिश करता है। मैं यह भी समझती हूँ कि स्वयं के बारे में मेरी समझ परमेश्वर के वचनों की सत्यता पर आधारित नहीं, बल्कि मेरी स्वयं की कल्पना और विचारों पर और साथ ही मेरे सांसारिक दृष्टिकोणों पर आधारित है। यह पूरी तरह से बेतुका है। परमेश्वर, अब से, मैं अपने आप को शैतान के दृष्टिकोण या मेरी स्वयं की कल्पना के अनुसार मापना नहीं चाहती हूँ। मैं अपने आप को तेरे वचनों के आधार पर जानना चाहती हूँ, और सत्‍य का अनुसरण करने में अपनी पूरी कोशिश करना चाहती हूँ, ताकि तेरे हृदय को सुखी करने के लिएशीघ्र ही सत्य और मानवता युक्त व्‍यक्ति बन सकूँ।

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