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XVII. सत्य की वास्तविकता और बाइबल के ज्ञान और सिद्धांत के बीच में कैसे भेद करें, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए

1. सच्चाई क्या है? बाइबल का ज्ञान और सिद्धांत क्या है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था।" "और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, …" (युहन्ना 1:1, 14)।

"मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ" (युहन्ना 14:6)।

"सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है" (युहन्ना 17:17)।

"उसने उनसे कहा, 'यशायाह ने तुम कपटियों के विषय में बहुत ठीक भविष्यद्वाणी की; जैसा लिखा है: "ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।" क्योंकि तुम परमेश्‍वर की आज्ञा को टालकर मनुष्यों की रीतियों को मानते हो।' उसने उनसे कहा, 'तुम अपनी परम्पराओं को मानने के लिये परमेश्‍वर की आज्ञा कैसी अच्छी तरह टाल देते हो! … इस प्रकार तुम अपनी परम्पराओं से, जिन्हें तुम ने ठहराया है, परमेश्‍वर का वचन टाल देते हो; और ऐसे ऐसे बहुत से काम करते हो'" (मरकुस 7:6-9,13)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर ही मार्ग, सत्य और जीवन है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है" से

इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम अपने अनुभव के किस पड़ाव पर आ चुके हो, तुम परमेश्वर के वचनों और सच्चाई से अलग नहीं हो सकते हो, और तुम जो कुछ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और तुम जो परमेश्वर का स्वरूप है उसके बारे में समझते हो वे सब परमेश्वर के वचनों में प्रकट है; और वे सत्य से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है ये सभी अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उस का एक प्रमाणिक प्रकटीकरण है। यह जो परमेश्वर के पास है तथा जो वह है उसे ठोस करता है और खुलकर उनके बारे में बताता है; यह सीधे सीधे तुम्हें बताता है कि परमेश्वर को क्या पसंद है, और क्या पसंद नहीं है, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देना चाहता है, वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है और वह किस प्रकार के लोगों से प्रसन्न होता है। उन सच्चाईयों के पीछे जो परमेश्वर प्रकट करता है लोग उसके आनन्द, क्रोध, दुःख, और प्रसन्नता, साथ ही साथ उसके सार को देख सकते हैं-यह उसके स्वभाव का प्रकाशन है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से

कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए" से

सत्य जीवन की सर्वाधिक वास्तविक सूक्ति है, और मानवजाति के बीच इस तरह की सूक्तियों में सर्वोच्च है। क्योंकि यही वह अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्य से करता है, और परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया कार्य है, इस लिए इसे जीवन की सूक्ति कहा जाता है। यह कोई ऐसी सूक्ति नहीं है जिसे किसी चीज में से संक्षिप्त किया गया है, न ही यह किसी महान व्यक्ति के द्वारा कहा गया प्रसिद्ध उद्धरण है; इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी, तथा सभी चीजों के स्वामी का मानवजाति के लिए कथन है, न कि मनुष्य द्वारा सारांश किए गए कुछ वचन, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। इसलिए इसे समस्त जीवन की सूक्तियों का उच्चतम कहा जाता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से

सब कुछ जो परमेश्वर करता है वह सत्य और जीवन है। मानव जाति के लिए सत्य एक ऐसी चीज़ है जिस की कमी उन के जीवन में नहीं हो सकती है, जिसके बिना वे कभी कुछ नहीं कर सकते हैं; तुम यह भी कह सकते हो कि यह सब से बड़ी चीज़ है। यद्यपि तुम उसे नहीं देख सकते हो या उसे नहीं छू सकते हो, फिर भी तुम्हारे लिए उसके महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती है; यह ही वह एकमात्र चीज़ है जो तुम्हारे हृदय में शांति ला सकती है।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" से

यह सत्य सामान्य मानवता का जीवन स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था कि जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानि, सभी सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने का बुनियादी ज्ञान) है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" से

अंतिम दिनों का मसीह जीवन लेकर आता, और सत्य का स्थायी एवं अनन्त मार्ग प्रदान करता है। इसी सत्य के मार्ग के द्वारा मनुष्य जीवन को प्राप्त करेगा, और एक मात्र इसी मार्ग से मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करेगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से

कुछ लोग कार्य करते हैं और धर्मोपदेश का प्रचार करते हैं तथा, यद्यपि सतही तौर पर ऐसा लगता है जैसे वे परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता कर रहे हैं, तथापि वे जो कह रहे हैं वह सब परमेश्वर के वचन का शाब्दिक अर्थ है, जिसमें वचन का सार पूरी तरह से अव्यक्त छूट जाता है। उनके उपदेश किसी भाषा पाठ्य पुस्तक से पढ़ाने की तरह होते हैं, आइटम दर आइटम, पहलू दर पहलू व्यवस्थित, और जब वे समाप्त करते हैं तब सभी लोग उनका स्तुति गान करते हैं, कहते हैं: "ओह, यह उपदेशक बहुत व्यावहारिक है। उन्होंने कितनी अच्छी तरह और कितने विस्तार से उपदेश दिया।" उपदेश समाप्त कर लेने के बाद, वे अन्य लोगों से कहते हैं कि जो उपदेश दिया गया उसे एक साथ रख लें और इसे हर एक को वितरित कर दें। ऐसा करके, वे दूसरों को धोखा देते हैं और वे जो उपदेश देते हैं वे सब भ्रांतियाँ हैं। सतह पर, ऐसा लगता है मानो कि वे केवल परमेश्वर के वचन का उपदेश दे रहे हैं और उनके शब्द सत्य के अनुरूप हैं। लेकिन अगर आप अधिक ध्यान से देखें, आप देखेंगे कि वे केवल सिद्धांत के शब्द हैं और बस झूठे तर्क हैं। उनके शब्दों में कुछ कल्पनाएँ, अवधारणाएँ भी शामिल होती हैं और कुछ ऐसे शब्द होते हैं जो परमेश्वर का चित्रण करते हैं। क्या इस तरह से उपदेश देना परमेश्वर के कार्य को बाधित नहीं करता है? यह सेवा करने का ऐसा तरीका है जो परमेश्वर की उपेक्षा करता है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "केवल सत्य की खोज करके ही आप अपने स्वभाव में परिवर्तन ला सकते हैं" से

आप लोगों का "सत्य का सार प्रस्तुत करना" लोगों को सत्य से जीवन प्राप्त करने या अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त करने देने के लिए नहीं किया जाता है। इसके बजाय, ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि लोग सत्य के भीतर से कुछ ज्ञान और सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त कर सकें। वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो कि वे परमेश्वर के कार्य के पीछे के प्रयोजन को समझते हैं, जबकि वास्तव में उन्होंने केवल सिद्धांत के कुछ शब्दों में निपुणता हासिल की है। वे सत्य के मर्म को नहीं समझते हैं, और यह धर्मशास्त्र का अध्ययन करने या बाइबल पढ़ने से भिन्न नहीं है। आप हमेशा इन पुस्तकों या उन सामग्रियों को छाँट रहे हैं, और इसलिए सिद्धांत के इस पहलू या ज्ञान के उस पहलू को धारण करने वाले बन गए हैं। आप सिद्धांतों के प्रथम श्रेणी के वक्ता हैं - लेकिन जब आप बोल लेते हैं तो क्या होता है? तब लोग अनुभव करने में असमर्थ होते हैं, उन्हें परमेश्वर के कार्य की कोई समझ नहीं होती है और स्वयं की भी समझ नहीं होती है। अंत में, उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया होगा वे होंगे सूत्र और नियम। आप उन चीजों के बारे में बात कर सकते हैं लेकिन और कुछ नहीं, इसलिए यदि परमेश्वर ने कुछ नया किया, तो क्या आप लोगों को ज्ञात सभी सिद्धांत उस चीज से मेल खाने वाले हो सकते हैं जो परमेश्वर करता है? इसलिए, आप की ये बातें केवल नियम हैं और आप लोगों से केवल धर्मशास्त्र का अध्ययन करवा रहे हैं: आप उन्हें परमेश्वर के वचन का अनुभव या सत्य का अनुभव करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। तो वे पुस्तकें जिनके माध्यम से आप छाँटते हैं, लोगों को केवल धर्मशास्त्र और ज्ञान में, नए सूत्रों में और नियमों और प्रथाओं में ही ला सकती हैं। वे लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकती हैं, या लोगों को सत्य को समझने या परमेश्वर की इच्छा को समझने की अनुमति नहीं दे सकती हैं। उन वचनों के बारे में प्रश्न के बाद प्रश्न पूछ कर, फिर उत्तर दे कर, आप एक रूपरेखा या सारांश बनाते हैं, और आपको लगता है कि नीचे के लोग तब आसानी से उन्हें समझ सकते हैं। याद रखने में आसान होने के अलावा, एक नज़र में ये इन प्रश्नों के बारे में स्पष्ट हैं, और आपको लगता है कि इस तरह से कार्य करना बहुत अच्छा है। लेकिन वे जो समझ रहे हैं वह वास्तविक मर्म नहीं है; यह वास्तविकता से भिन्न है और सिर्फ सैद्धान्तिक शब्द हैं। ... आप लोगों को ज्ञान को समझने और ज्ञान में निपुणता प्राप्त करने की ओर ले जाने के लिए ये कार्य करते हैं। आप अन्य लोगों को सिद्धान्तों में, धर्म में लाते हैं, और उनसे परमेश्वर का अनुसरण और धार्मिक सिद्धांतों के भीतर परमेश्वर में विश्वास करवाते हैं। क्या तब आप बस पॉल के समान नहीं हैं? आपको लगता है कि सत्य के ज्ञान में निपुणता प्राप्त करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, और ऐसा ही परमेश्वर के वचनों के कई अंशों को कंठस्थ करना है। लेकिन लोग परमेश्वर के वचन को कैसे समझते हैं, यह बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। आपको लगता है कि लोगों के लिए परमेश्वर के कई वचनों को याद रख पाना, बहुत सारे सिद्धांतों को बोल पाना और परमेश्वर के कई वचनों के भीतर कई सूत्रों की खोज करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए, आप हमेशा इन चीजों को व्यवस्थित करना चाहते हैं ताकि हर कोई एक से भजन पत्र से गा रहा हो और एक सी बात कह रहा हो, ताकि हर कोई वही सिद्धांत बोलता हो, हर किसी के पास एक सा ज्ञान हो और हर कोई एक से नियम रखता हो - यह आपका उद्देश्य है। आप ऐसा करते हैं मानो कि लोगों को बेहतर समझाते हैं, जबकि इसके विपरीत आपको कोई अंदाज़ा नहीं है कि ऐसा करके आप लोगों को उन नियमों के बीच ला रहे हैं जो परमेश्वर के वचनों के सत्य के बाहर हैं।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "सत्य के बिना परमेश्वर को अपमानित करना आसान है" से

परमेश्वर के वचन के वास्तविक अर्थ की वास्तविक समझ पाना कोई आसान बात नहीं है। यह मत सोचो कि तुम परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या सकते हो, और हर कोई कह देगा कि तुम्हारी व्याख्या अच्छी है और तुम्हारी प्रशंसा करेगा, तो इसका मतलब है कि तुम परमेश्वर के वचन समझते हो। यह परमेश्वर के वचन को समझने के समान नहीं है। यदि तुमने परमेश्वर के वचन के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तुमने परमेश्वर के वचन का वास्तविक अर्थ जान लिया है, यदि तुम बता पाते हो कि परमेश्वर के वचन का क्या महत्व है और इसका अंतिम प्रभाव क्या होता है, केवल जब यह सब स्पष्ट हो जाता है, तब ही तुम परमेश्वर के वचनों की कुछ समझ प्राप्त कर पाते हो। तो, परमेश्वर के वचन समझना इतना आसान नहीं है। केवल इसलिए कि तुम परमेश्वर के वचन का एक सुंदर विवरण दे सकते हो, इसका मतलब यह नहीं है कि तुम इसे समझते हो। तुम परमेश्वर के वचन की व्याख्या जैसे भी करो, यह तब भी मनुष्य की कल्पना और सोच का तरीका है और बेकार है। … यदि तुम वचन की शब्दशः व्याख्या करते हो या अपनी सोच की कल्पना के माध्यम से व्याख्या करते हो, तो तुम्हारी समझ सही नहीं है, भले ही तुम अत्यंत वाक्पटुता के साथ क्यों न व्याख्या करो। यदि तुम इसे सही से नहीं करते हो, तो तुम संदर्भ से अलग अर्थ निकाल सकते हो और परमेश्वर के वचन को गलत समझ सकते हो, और यह इससे भी अधिक परेशानी की बात है। इसलिए, जैसे-जैसे तुम परमेश्वर के वचन को जानते हो, पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करने के माध्यम से मुख्य रूप से सत्य प्राप्त किया जाता है। उसके वचन की शब्दशः समझ प्राप्त करने का या व्याख्या करने का यह अर्थ नहीं है कि तुमने सत्य को प्राप्त कर लिया है। यदि तुम्हें केवल उसके वचनों की शब्दशः व्याख्या करनी हो, तो पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्धता का क्या मतलब है? उस स्थिति में शिक्षा का एक निश्चित स्तर काम करेगा, और अशिक्षित काफ़ी दुविधा में होंगे। परमेश्वर के काम को मानव मस्तिष्क द्वारा समझा नहीं जा सकता है। परमेश्वर के वचन की सही समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता पर निर्भर करती है; सत्य प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी होती है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से

यदि तुम सबों ने बहुतायत से परमेश्वर का वचन पढ़ा है किन्तु सिर्फ पाठ का अर्थ समझते हो और तुम लोगों के पास अपने अपने व्यावहारिक अनुभवों के जरिए परमेश्वर का अपने व्यावहारिक अनुभव से प्राप्त प्राथमिक ज्ञान नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचन को नहीं जान पाओगे। जहाँ तक यह बात तुम से सम्बंधित है, परमेश्वर का वचन तुम्हारे लिए जीवन नहीं है, किन्तु बस निर्जीव अक्षर हैं। और यदि तुम केवल निर्जीव अक्षरों को थामें रहोगे, तो तुम परमेश्वर के वचन का सार समझ नहीं सकते हो, न ही तुम उसकी इच्छा को समझोगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभवों में उसके वचन का अनुभव करते हो केवल तभी परमेश्वर के वचन का आध्यात्मिक अर्थ स्वयं को तुम्हारे लिए खोल देगा, और यह केवल अनुभव में होता है कि तुम बहुत सारे सत्य के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकते हो। और केवल अनुभव के जरिए तुम परमेश्वर के वचन के भेदों का खुलासा कर सकते हो। यदि तुम इसे अभ्यास में न लाओ, तो भले ही परमेश्वर के वचन कितने स्पष्ट हों, एकमात्र चीज़ जो तुम समझते हो वह है खोखले अक्षर एवं सिद्धांत, जो तुम्हारे लिए धार्मिक रीति विधियाँ बन चुकी हैं। क्या फरीसियों ने भी ऐसा ही नहीं किया था? यदि तुम लोग परमेश्वर के वचन का अभ्यास और उसका अनुभव करते हो, तो यह तुम लोगों के लिए व्यावहारिक बन जाता है; यदि तुम इसका अभ्यास करने की कोशिश नहीं करते हो, तो परमेश्वर का वचन तुम्हारे लिए तीसरे स्वर्ग की पौराणिक गाथा से बस कुछ अधिक होता है। …

… बहुत से लोग मात्र परमेश्वर के वचन के पाठ को समझकर ही संतुष्ट हो जाते हैं और उसकी गहराई के अनुभव का अभ्यास किये बगैर अपने आपको सिद्धान्तों से सुसज्जित करने की ओर ध्यान केन्द्रित करते हैं; क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तब, किस प्रकार यह वाक्यांश कि "परमेश्वर का वचन जीवन है" उनके लिए सही हो सकता है? जब मनुष्य परमेश्वर के वचन का अभ्यास करता है, केवल तभी उसका जीवन सचमुच में फूल के समान खिल सकता है; यह बस यूं ही उसके वचन को पढ़ने के द्वारा नहीं हो सकता है। यदि यह तुम्हारा विश्वास है कि केवल जीवन पाने और उच्चता पाने के लिए ही परमेश्वर के वचन को समझने की आवश्यकता है, तो तुम्हारी समझ विकृत हो गई है। जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो तभी परमेश्वर का वचन सही ढंग से समझ आता है, और तुझे यह समझना होगा कि "केवल सत्य का अभ्यास करने के द्वारा ही इसे समझा जा सकता है"।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "सत्य को समझ लेने के बाद उसका अभ्यास करो" से

पिछला:एक मात्र सच्चे परमेश्वर को "त्रिदेव या त्रिविध परमेश्वर" के रूप में वर्णित करना, परमेश्वर की अवहेलना और निंदा करना है।

अगला:बाइबल के धर्म-शास्त्रीय ज्ञान पर भरोसा करते हुए यदि कोई परमेश्वर पर विश्वास करता है तो इसका क्या अंजाम होगा?

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प्रश्न 8: अनुग्रह के युग में, परमेश्वर मानवजाति की पाप-बलि के रूप में सेवा करने के लिए देह बना, और पापों से उन्हें बचा लिया। अंतिम दिनों में परमेश्वर सच्चाई को प्रकट करने और न्याय के अपने कार्य को करने के लिए देह फिर से बन गया है, ताकि मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध किया जा सके और बचाया जा सके। तो मानव जाति को बचाने का कार्य करने के लिए परमेश्वर को दो बार देह-धारण की आवश्यकता क्यों पड़ती है? और परमेश्वर का दो बार देह-धारण करने का वास्तविक महत्व क्या है? सच्चाई को समझने और सिद्धांत को समझने में क्या अंतर है? प्रश्न 35: धार्मिक दुनिया के अधिकांश लोग मानते हैं कि पादरियों और प्राचीन लोगों को परमेश्वर के द्वारा चुना और प्रतिष्ठित किया गया है, और यह कि वे सभी धार्मिक कलीसियाओं में परमेश्वर की सेवा करते हैं; अगर हम पादरियों और प्राचीन लोगों का अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं, तो हम वास्तव में परमेश्वर का ही अनुसरण और आज्ञा-पालन करते हैं। यथार्थतः मनुष्य का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या मतलब है, और वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण और आज्ञा-पालन करने का क्या अर्थ है, ज्यादातर लोग सच्चाई के इस पहलू को नहीं समझते हैं, तो कृपया हमारे लिए यह सहभागिता करो। परमेश्वर को लोगों का न्याय और उनकी ताड़ना क्यों करनी पड़ती है?