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राज्य का युग वचन का युग ह (भाग दो)

आगे बढ़ने पर, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करना वह सिद्धांत है जिसके द्वारा तुम बोलते हो। जब तुम लोग आपस में मिलते हो, तब तुम लोगों को परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करनी चाहिये, और उसी के विषय पर बातचीत करनी चाहिये; इस बारे में बात करो कि परमेश्वर के वचन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो, तुम सब उसके वचन को अभ्यास में कैसे लाते हो, और पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन के बारे में सहभागिता करते हो, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रकाशित करेगा। यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे आसपास परमेश्वर के वचन का संसार बने तो तुम्हें भी सहयोग करना चाहिये। यदि तुम इसमें प्रवेश नहीं करते हो, तो परमेश्वर तुम में अपना काम नहीं कर सकता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत नहीं करोगे, वह तुम्हें रोशन नहीं कर सकता है। जब भी तुम खाली हो, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करो। व्यर्थ बातें न करो! अपने जीवन को परमेश्वर के वचन से भर जाने दो; तभी तुम एक समर्पित विश्वासी होते हो। भले ही तुम्हारी सहभागिता सतही हो, सब ठीक है। यदि सतही नहीं होगी तो गहराई भी नहीं होगी। एक प्रक्रिया है जिससे अवश्य गुजरना होगा। तुम्हारे अभ्यास करने पर तुम पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें दी गई रोशनी को समझने की अंर्तदृष्टि प्राप्त करते हो। और यह भी सीखते हो कि परमेश्वर के वचन को प्रभावशाली रूप में कैसे खाएं-पीएं। इस प्रकार खोजबीन में कुछ समय देने के बाद तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे। केवल जब तुम सहयोग करने का संकल्प करते हो तभी पवित्र आत्मा का कार्य तुम में होगा।

परमेश्वर के वचन को खाने-पीने के सिद्धांत के दो पहलू हैं: एक का संबंध ज्ञान से है और दूसरे का संबंध प्रवेश करने से है। तुम्हें कौन से वचन जानना चाहिये? तुम्हें दर्शन से जुड़े वचन जानना चाहिये (अर्थात परमेश्वर अब किस युग में प्रवेश कर चुका है, अब परमेश्वर क्या प्राप्त करना चाहता है, देहधारण क्या है, और ऐसी अन्य बातें, ये सभी बातें दर्शन से संबंधित हैं)। वह कौन सा मार्ग है जिस पर मनुष्य को जाना चाहिये? यह परमेश्वर के उन वचनों का उल्लेख करता है जिन पर मनुष्य को अमल करना और चलना चाहिये। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने के ये दो पहलू हैं। अब से, तुम परमेश्वर के वचन को इसी तरह खाओ-पीओ। यदि तुम दर्शन के बारे में वचनों की स्पष्ट समझ है, तो अधिक पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। मुख्य बात है प्रवेश करने से संबंधित वचनों को अधिक खाना और पीना, जैसे कि किस प्रकार परमेश्वर की ओर अपने हृदय को मोड़ना है, किस प्रकार परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना है, और कैसे शरीर का परित्याग करना है। यही सब है जिस पर तुम्हें अमल करना है। परमेश्वर के वचन को कैसे खाये-पियें यह जाने बिना असली सहभागिता संभव नहीं है। जब एक बार तुम जान लेते हो कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाएं-पीएं, और तुम समझ जाते हो कि कुंजी क्या है, तो सहभागिता तुम्हारे लिये आसान होगी। जो भी मसले उठेंगे, तुम उनके बारे में सहभागिता कर पाओगे और वास्तविकता को समझ लोगे। बिना वास्तविकता के परमेश्वर के वचन से सहभागिता करने का अर्थ है, तुम यह समझ पाने में असमर्थ हो कि कुंजी क्या है, और यह बात दर्शाती है कि तुम परमेश्वर के वचन को खाना-पीना नहीं जानते। कुछ लोग परमेश्वर का वचन पढ़ते समय थकान का अनुभव करते हैं। यह दशा सामान्य नहीं है। वास्तव में सामान्य बात यह है कि परमेश्वर का वचन पढ़ते हुए तुम कभी थकते नहीं, सदैव उसकी भूख-प्यास बनी रहती है, और तुम सदैव सोचते हो कि परमेश्वर का वचन भला है। और वह व्यक्ति जो सचमुच प्रवेश कर चुका है वह परमेश्वर के वचन को ऐसे ही खाता-पीता है। जब तुम अनुभव करते हो कि परमेश्वर का वचन सचमुच व्यवहारिक है और मनुष्य को इसमें प्रवेश करना ही चाहिये; जब तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का वचन मनुष्य के लिये बहुत ही अधिक सहायक और लाभदायक है, और यह मनुष्य को जीवन देता है, यह भावना तुम्हें पवित्र आत्मा देता है, तुम्हारे पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किये जाने के माध्यम से। यह बात साबित करती है कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर रहा है और परमेश्वर ने तुमसे मुख नहीं मोड़ा है। यह जानकर कि परमेश्वर सदैव बातचीत करता है, कुछ लोग उसके वचनों से थक जाते हैं, और वे सोचते हैं कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने या न पढ़ने का कोई परिणाम नहीं होता। यह सामान्य दशा नहीं है। उनके हृदय वास्तविकता में प्रवेश करने की इच्छा नहीं करते, और ऐसे लोगों में पूर्ण बनाए जाने की भूख-प्यास नहीं होती और न ही वे इसे महत्वपूर्ण मानते हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुम में परमेश्वर के वचन की भूख-प्यास नहीं है, तो यह संकेत है कि तुम्हारी दशा सामान्य नहीं है। अतीत में, परमेश्वर तुमसे विमुख होगा या नहीं उसका पता इस बात से चलता था कि तुम्हारे भीतर शांति है या नहीं और तुम आनंद का अनुभव कर रहे हो या नहीं। अब यह इस बात से पता चलता है कि तुममें वचन की भूख-प्यास है या नहीं। क्या उसके वचन तुम्हारी वास्तविकता है, क्या तुम निष्ठावान हो, और क्या तुम वह करने योग्य हो जो तुम परमेश्वर के लिये कर सकते हो। दूसरे शब्दों में मनुष्य को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता के द्वारा जांचा-परखा जाता है। परमेश्वर अपने वचनों को सभी मनुष्यों की ओर भेजता है। यदि तुम उसे पढ़ने के लिये तैयार हो, वह तुम्हें रोशन करेगा, यदि तुम तैयार नहीं हो, वह तुम्हें रोशन नहीं करेगा। परमेश्वर उन्हें रोशनी देता है जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं, और परमेश्वर को खोजते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर ने वचन पढ़ने के बाद भी उन्हें रोशन नहीं किया। परमेश्वर के वचन कैसे पढ़े गये थे? यदि तुमने बीच-बीच में से पढ़ा और वास्तविकता को कोई महत्व नहीं दिया, तो परमेश्वर कैसे तुम्हें रोशन कर सकता है? कैसे वह व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को संजो कर नहीं रखता परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है? यदि तुम परमेश्वर के वचन को संजो कर नहीं रखते, तब तुम्हारे पास न तो सत्य और न ही वास्तविकता होगी। यदि तुम उसके वचन को संजो कर रखते हो, तब तुम सत्य का अभ्यास कर पाओगे; और तब ही तुम वास्तविकता को पाओगे। इसलिये स्थिति चाहे जो भी हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना और पीना चाहिये, तुम चाहे व्यस्त हो, या न हो, परिस्थितियां विपरीत हो या न हो, और चाहे तुम परखे जा रहे हो या नहीं परखे जा रहे हो। कुल मिलाकर परमेश्वर का वचन मनुष्य के अस्तित्व का आधार है। कोई भी उसके वचन से विमुख नहीं हो सकता, और उसके वचन को ऐसे खाना होगा मानों वे दिन के तीन बार के भोजन हों। क्या परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना और प्राप्त किया जाना इतना आसान हो सकता है? अभी तुम इसे समझो या न समझो, तुम्हारे भीतर परमेश्वर के कार्य को समझने की अंर्तदृष्टि हो या न हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को अधिक से अधिक खाना और पीना चाहिये। यह तत्परता और क्रियाशीलता के साथ प्रवेश करना है। परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, जिसमे प्रवेश कर सको उस पर अमल करने की तत्परता दिखाओ, तुम जो नहीं कर सकते, उसे कुछ समय के लिये दरकिनार रखो। आरंभ में हो सकता है, परमेश्वर के बहुत से वचन तुम समझ न पाओ, पर दो या तीन माह बाद, या फिर एक वर्ष के बाद तुम समझने लगोगे। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिये है क्योंकि परमेश्वर एक या दो दिन में मनुष्य को पूर्ण नहीं कर सकता। अधिकतर समय, जब तुम परमेश्वर का वचन पढ़ते हो, तुम उस समय उसे नहीं समझ पाओगे। उस समय वह तुम्हें लिखित पाठ से अधिक प्रतीत नहीं होगा; केवल कुछ समय के अनुभव के बाद तुम उसे समझने योग्य बन जाओगे। परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है इसलिए उसके वचन को खाने-पीने के लिये तुम्हें अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिये। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा, और तुम समझने लगोगे और पवित्र आत्मा तुम्हें रोशन करेगा। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को रोशन करता है, तब अक्सर मुनष्य को उसका ज्ञान नहीं होता। वह तुम्हें रोशन करता है और मार्गदर्शन देता है जब तुम भूखे-प्यासे होते हो, और उसे खोजते हो। पवित्र आत्मा जिस सिद्धांत पर कार्य करता है वह परमेश्वर के वचन पर केंद्रित होता है जिसे तुम खाते और पीते हो। वे सब जो परमेश्वर के वचन को महत्व नहीं देते, और उसके प्रति सदैव एक अलग तरह का दृष्टिकोण रखते हैं, लापरवाही का, और यह विश्वास करते हैं कि वे वचन को पढ़ें या न पढ़ें कुछ फर्क नहीं पड़ता, वे हैं जो वास्तविकता नहीं जानते। उन व्यक्तियों में न तो पवित्र आत्मा का कार्य और न ही उसके द्वारा की गई रोशनी दिखाई देती है। ऐसे व्यक्ति बस साथ-साथ चलते हैं, और वे बिना उचित योग्यताओं के मात्र दिखावा करने वाले लोग हैं, जैसे कि एक दृष्टांत में नैनगुओ थे।[क]

परमेश्वर के वचन को अपने जीवन की वास्तविकता बनाए बिना तुम्हारा कोई वास्तविक कद नहीं है। जब परीक्षा का समय आयेगा, तुम निश्चय ही असफल होगे, और तब तुम्हारा वास्तविक कद प्रकट हो जाएगा। परंतु उस समय वे जो नियमित रूप में वास्तविकता में प्रवेश करने की खोज में लगे होते हैं, वे परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझेंगे। वे जो सचेत हैं और परमेश्वर के लिये भूख-प्यास रखते हैं, उन्हें परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करने के लिये व्यवहारिक रूप में प्रयत्न करना चाहिये। वे जिनमें वास्तविकता नहीं है, वे छोटी-छोटी बातों का भी सामना नहीं कर सकते। जिनका कुछ वास्तविक कद है, उनमें और जिनका कोई कद नहीं है, उनमें एक अंतर है। क्यों दोनों ही परमेश्वर के वचन को खाते पीते हैं, परंतु कुछ परीक्षाओं के समय दृढ़ रहते हैं जबकि दूसरे उससे भाग जाते हैं? स्वाभाविक है कि जो भागते हैं, उनका वास्तव में कोई कद नहीं है; परमेश्वर का वचन उनकी वास्तविकता नहीं है; और परमेश्वर के वचन ने उनमें जड़ें नहीं जमाई हैं। जैसे ही उनकी परीक्षा होती है, उनके पास कोई मार्ग नहीं रहता। क्यों, तब दूसरे लोग इस बारे में दृढ़ बने रहते हैं? ऐसा इसलिये है क्योंकि उनका दर्शन बड़ा है, या फिर परमेश्वर का वचन उनके भीतर उनका अनुभव बन गया है, और उन्होंने वास्तव में जो देखा-समझा, वह उनके अस्तित्व का आधार बन गया है। इस कारण वे परीक्षाओं के बीच दृढ़ बने रह पाते हैं। यही वास्तविक कद है और जीवन भी यही है। कुछ लोग परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं परंतु उस पर कभी अमल नहीं करते या उसके प्रति ईमानदार भी नहीं हैं। वे जो ईमानदार या गंभीर नहीं हैं कभी अमल करने को महत्व नहीं देते। वे जो परमेश्वर के वचन को अपनी वास्तविकता नहीं बनाते वे बिना कद के हैं। ऐसे लोग परीक्षाओं के बीच स्थिर या दृढ़ नहीं रह सकते।

जब परमेश्वर बोलते हैं, तुम्हें तुरंत उसके वचनों को स्वीकार करना और उन्हें खाना चाहिये। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना समझे, इस विचार धारा को अपनाओ कि तुम वचन को खाने, उसे जानने और उसके वचन पर अमल करने पर अपना ध्यान केंद्रित करोगे। तुम्हें यही करना चाहिये। इस बात की चिंता न करो कि तुम्हारा कद कितना बड़ा हो जायेगा; केवल परमेश्वर के वचन को खाने पर ध्यान केंद्रित करो। इसी तरह से मनुष्यों को परमेश्वर का सहयोग करना चाहिये। तुम्हारा आत्मिक जीवन मुख्यतः उस वास्तविकता में प्रवेश करना है, जहां तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ पीओ और उन पर अमल करो। तुम्हें अन्य किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिये। कलीसिया के अगुवे को इस बारे में सभी भाई बहनों की अगुवाई करने में सक्षम होना चाहिए कि वे परमेश्वर के वचन को कैसे खाएं-पीएं। यह सभी कलीसियाई अगुवों की जिम्मेवारी है। वे चाहें युवा हों या वृद्ध, सभी को परमेश्वर के वचन को खाने पीने को महत्व देना चाहिये और उन वचनों को अपने-अपने हृदयों में रखना चाहिये। यदि तुम इस वास्तविकता में प्रवेश कर लेते हो-तो तुम राज्य के युग में प्रवेश कर लोगे। आजकल बहुत से हैं जो महसूस करते हैं कि वे परमेश्वर के वचन को खाए-पीए बिना नहीं रह सकते और समय चाहे जैसा भी हो, वे महसूस करते हैं कि परमेश्वर का वचन नया है। तब कहीं मनुष्य सही मार्ग पर चलना आरंभ करता है। परमेश्वर मनुष्यों में काम करने और उनकी आपूर्ति करने के लिये वचन का उपयोग करता है। जब सब लोग परमेश्वर के वचन की लालसा और भूख-प्यास रखते हैं, वे परमेश्वर के वचन के संसार में प्रवेश करेंगे।

परमेश्वर बहुत बातें कह चुका है। तुमने कितना ज्ञान पाया है? तुमने कितने में प्रवेश पाया है? यदि कलीसिया के अगुवे ने भाइयों और बहनों को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में अगुवाई नहीं की है, वे अपने कर्तव्य पालन में चूक गये हैं और अपनी जिम्मेवारियों को पूरा करने में असफल हुये हैं! परमेश्वर के वचन को खाने पीने में तुम्हारी कितनी भी गहराई है, या तुम कितना भी अधिक ग्रहण कर सकते हो, उसके बावजूद तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना-पीना आना चाहिये; तुम्हें परमेश्वर के वचन का महत्व मानना चाहिये और परमेश्वर के वचन को खाने-पीने की आवश्यकता को समझना चाहिये और उसका महत्व समझना चाहिये। परमेश्वर ने बहुत कुछ कह दिया है। यदि तुम उसके वचन को नहीं खाते-पीते, और उसे खोजते नहीं या उस पर अमल नहीं करते, यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो। क्योंकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिये, उसका अनुभव करना चाहिये, और उसे जीना चाहिये। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन को बोल नहीं सकते, या उन पर अमल नहीं कर सकते, तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना भूख शांत करने के लिये रोटी की खोज करने जैसा है। केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी मसले, और सतही मुद्दों के बारे में बातें करना, और उनमें लेशमात्र भी वास्तविकता न होना,परमेश्वर पर विश्वास नहीं है। उसी तरह,[ख] तुमने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक खाना-पीना चाहिये? क्या यह विश्वास माना जायेगा यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते पीते नहीं, और केवल स्वर्ग पर उठाये जाने की खोज में हो? परमेश्वर पर विश्वास करने वाले का पहला कदम क्या है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्यों को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पीए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाये, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तव में क्या है? परमेश्वर पर विश्वास करने वालों का कम से कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिये, और सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर का वचन रखना है। तब चाहे कुछ भी हो तुम उसके वचन से भी दूर नहीं जा सकते। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, भाग, कलीसियायें, और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जायेंगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, और सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएंगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जायेगा: लोगों का परमेश्वर के वचन को बोलना, और परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करना, जब हृदय में भीतर रखा जाए तब भी परमेश्वर का वचन है। भीतर और बाहर दोनों तरफ वे परमेश्वर के वचन से भरे हैं और इस प्रकार वे पूर्ण बनाए जाते हैं। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और वे जो उसकी गवाही देते हैं, वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता बनाया है।

वचन के युग अर्थात् सहस्राब्दिक राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से वचन की सहभागिता करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से तुम परमेश्वर के वचन को प्रदर्शित कर सकते हो। केवल तुम्हारे अनुभव के वचनों के द्वारा दूसरे लोग तुम्हारे कायल हो सकते हैं। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर का वचन नहीं है तो कोई भी कायल नहीं होगा! परमेश्वर द्वारा उपयोग किये जाने वाले सब लोग परमेश्वर का वचन बोलने में सक्षम होते हैं। यदि तुम परमेश्वर का वचन नहीं बोल सकते, यह दर्शाता है पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गये हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की भूख-प्यास रखता है? वे जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, वे सत्य के लिये प्यासे हैं, और केवल ऐेसे ही लोग परमेश्वर के द्वारा अशीषित हैं। भविष्य में, परमेश्वर सभी पंथों और संप्रदायों से बहुत सी अन्य बातें भी कहेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूरा करता है और उसके बाद अन्य बुतपरस्तों से बातें करेगा, उन तक अपनी वाणी पहुँचाएगा और उन्हें जीतेगा। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किये जायेंगे। परमेश्वर के वचन के द्वारा और उसके प्रकाशनों के द्वारा मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव कम प्रभावी हुआ है। सभी में मनुष्यों का स्वरूप है और मनुष्य का विद्रोही स्वभाव बहुत कम हो गया है। वचन मनुष्यों में अधिकार के साथ काम करता है, और परमेश्वर की ज्योति में मनुष्यों को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करेगा, और उसके कार्य का निर्णायक मोड़ सभी कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकता है। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते, तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने के द्वारा, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके, और तुम्हारे वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के वचन का तुम्हारा ज्ञान व्यापक हो जाएगा। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच वास्तविक जीवन में उसे जी सकते हो।

फुटनोट:

क.मूल पाठ में "दृष्टांत में" नहीं है।

ख. मूल पाठ में 'उसी तरह' नहीं हैं।