वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

अब क्या तू उस तरीके को समझता है जिसे परमेश्वर मनुष्य के परिणाम को निर्धारित करने के लिए उपयोग करता है? (हर दिन विभिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना।) विभिन्न परिस्थितियों को व्यवस्थित करना—यह वह है जिसे लोग महसूस एवं स्पर्श कर सकते हैं। तो इसके लिए परमेश्वर का उद्देश्य क्या है? वह उद्देश्य यह है कि परमेश्वर विभिन्न तरीकों से, विभिन्न समयों पर, और विभिन्न स्थानों में हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति को परीक्षाएं देना चाहता है। किसी परीक्षा में मनुष्य के किन पहलुओं को जांचा जाता है? चाहे तू उस प्रकार का व्यक्ति है या नहीं जो हर उस मामले में परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है जिसका तू सामना करता है, जिसके विषय में तू सुनना है, जिसे तू देखता है, और जिसका तू व्यक्तिगत रीति से अनुभव करता है। हर कोई इस प्रकार की परीक्षा का सामना करेगा, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष है। कुछ लोग कहते हैं: "मैं ने बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है; ऐसा क्यों है कि मैं ने किसी भी परीक्षा का सामना नहीं किया है?" तुझे लगता है कि तूने किसी परीक्षा का सामना नहीं किया है क्योंकि जब कभी परमेश्वर ने तेरे लिए परिस्थितियों को व्यवस्थित किया है, तो तूने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया है, और परमेश्वर के मार्ग पर चलना नहीं चाहा है। अतः तेरे पास परमेश्वर की परीक्षाओं का कोई एहसास ही नहीं है। कुछ लोग कहते हैं: "मैं ने कुछ परीक्षाओं का सामना किया है, किन्तु मैं अभ्यास करने के उचित तरीके को नहीं जानता हूँ। यद्यपि मैं ने अभ्यास किया था, फिर भी मैं अभी भी नहीं जानता हूँ कि मैं परीक्षाओं के दौरान स्थिर खड़ा था या नहीं।" ऐसे लोग जिनके पास इस प्रकार की स्थिति होती है वे निश्चित रूप से कम संख्या में नहीं हैं। अतः तब वह मानक क्या है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को मापता है? यह ठीक ऐसा ही है जैसा मैं ने कुछ क्षण पहले कहा था: जो कुछ भी तू करता है, जो कुछ भी तू सोचता है, और जो कुछ भी तू व्यक्त करता है—क्या यह परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है? इसी प्रकार यह निर्धारित होता है कि तू ऐसा व्यक्ति है या नहीं जो परमेश्वर का भय मानता है और बुराई से दूर रहता है? क्या यह एक सरल अवधारणा है? इसे कहना काफी आसान है, परन्तु क्या इसका अभ्यास करना आसान है? (यह इतना आसान नहीं है।) यह इतना आसान क्यों नहीं है? (क्योंकि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, नहीं जानते हैं कि परमेश्वर किस प्रकार मनुष्य को सिद्ध करता है, और इस प्रकार जब उनका सामना उन मामलों से होता है तब वे नहीं जानते हैं कि अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य की खोज कैसे करें; लोगों को विभिन्न परीक्षाओं, शुद्धिकरण, ताड़नाओं, एवं न्याय से होकर गुज़रना ही होगा, इससे पहले कि उनके पास परमेश्वर का भय मानने की वास्तविकता हो।) तुम लोग इसे इस प्रकार रखते हो, परन्तु जहाँ तक तुम सब की बात है, परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना इस वक्त आसानी से क्रियान्वित करने योग्य प्रतीत होता है। मैं क्यों ऐसा कहता हूँ? क्योंकि तुम लोगों ने बहुत सारे सन्देशों को सुना है, और सत्य की वास्तविकता के विषय में थोड़ी सी भी सिंचाई को प्राप्त नहीं किया है। इसने यह समझने में तुम सब की मदद की है कि किस प्रकार सिद्धान्त एवं सोच के सम्बन्ध में परमेश्वर का भय मानना है और बुराई से दूर रहना है। परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के विषय में तुम सब के अभ्यास के सम्बन्ध में, यह सब सहायक रहा है और तुम लोगों को ऐसी चीज़ का अनुभव कराता है जिसे आसानी से हासिल किया जा सकता है। तब क्यों वास्तविक तथ्य में लोग इसे कभी प्राप्त नहीं कर सकते हैं? यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य के स्वभाव का सार परमेश्वर का भय नहीं मानता है, और बुराई को पसन्द करता है। यही वास्तविक कारण है।

परमेश्वर का भय न मानना और बुराई से दूर न रहना परमेश्वर का विरोध करना है

आओ हम यह सम्बोधित करने के द्वारा आरम्भ करें कि यह कहावत "परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना" कहाँ से आया है। (अय्यूब की पुस्तक।) अब जबकि तुम लोगों ने अय्यूब का जिक्र किया है, तो आओ हम उसकी चर्चा करें। अय्यूब के समय में, क्या परमेश्वर मनुष्य को जीतने और उनका उद्धार करने के लिए कार्य कर रहा था? वह नहीं कर रहा था, क्या वह कर रहा था? और जहाँ तक अय्यूब की बात है, उस समय उसके पास परमेश्वर का कितना ज्ञान था? (बहुत अधिक ज्ञान नहीं।) और किस प्रकार परमेश्वर का वह ज्ञान उस ज्ञान से तुलना करता था जो इस वक्त तुम लोगों के पास है? ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम सब इसका उत्तर देने का साहस नहीं करते हो? क्या अय्यूब का ज्ञान उस ज्ञान की अपेक्षा ज़्यादा या कम था जो तुम लोगों के पास इस वक्त है? (कम।) यह उत्तर देने के लिए बड़ा आसान प्रश्न है। कम! यह निश्चित है! आज तुम सब परमेश्वर के आमने सामने हो, और परमेश्वर के वचन के आमने सामने हो। परमेश्वर के विषय में तुम सब का ज्ञान अय्यूब के ज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक है। मैं इसे सामने लेकर क्यों आया हूँ? मैं इस प्रकार क्यों बोलता हूँ? मैं तुम लोगों को एक तथ्य समझाना चाहूंगा, परन्तु इससे पहले कि मैं समझाऊं, मैं तुम सब से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ: अय्यूब परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानता था, फिर भी वह परमेश्वर का भय मान सकता था और बुराई से दूर रह सकता था। अतः ऐसा क्यों है कि इन दिनों लोग ऐसा करने में असफल हो जाते हैं? (अत्यधिक भ्रष्टता।) अत्यधिक भ्रष्टता—यह प्रश्न का ऊपरी भाग है, परन्तु मैं कभी इसे इस प्रकार नहीं देखूंगा। तुम लोग अकसर ऐसे सिद्धान्तों एवं पत्रियों को लेते हो जिनके विषय में तुम सब सामान्यतः बात करते हो, जैसे "अत्यधिक भ्रष्टता," "परमेश्वर के विरुद्ध बलवा करना," "परमेश्वर के प्रति विश्वासघात," "अनाज्ञाकारिता," "सत्य को पसन्द न करना," और तुम लोग हर एक प्रश्न के सार की व्याख्या करने के लिए इन वाक्यांशों का उपयोग करते हो। यह अभ्यास करने का एक त्रुटिपूर्ण तरीका है। विभिन्न स्वभावों के प्रश्नों को समझाने के लिए उसी उत्तर का उपयोग करना सत्य एवं परमेश्वर की निन्दा करने के विषय में अनिवार्य रूप से सन्देहों को उत्पन्न करता है। मुझे इस तरह का उत्तर सुनना पसन्द नहीं है। इसके बारे में सोचो! तुम लोगों में से किसी ने भी इस मुद्दे के विषय में नहीं सोचा है, परन्तु हर दिन मैं इसे देख सकता हूँ, और हर दिन मैं इसे महसूस कर सकता हूँ। इस प्रकार, तुम सब इसे कर रहे हो, और मैं देख रहा हूँ। जब तुम लोग इसे कर रहे हो, तब तुम सब इस मुद्दे के सार का एहसास नहीं कर सकते हो। परन्तु जब मैं इसे देखता हूँ, तो मैं इसके सार को देख सकता हूँ, और साथ ही मैं इसके सार को भी महसूस कर सकता हूँ। अतः फिर सार क्या है? इन दिनों लोग परमेश्वर का भय क्यों नहीं मान सकते है और बुराई से दूर क्यों नहीं रह सकते हैं? तुम लोगों के उत्तर इस प्रश्न के सार की व्याख्या करने के योग्य होने से बहुत दूर हैं, और वे इस प्रश्न के सार का समाधान नहीं कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यहाँ एक स्रोत है जिसके बारे में तू नहीं जानता है। यह स्रोत क्या है? मैं जानता हूँ कि तुम सब इसके बारे में सुनना चाहते हो, अतः मैं तुम लोगों को इस प्रश्न के स्रोत के बारे में बताऊंगा।

परमेश्वर के कार्य की बिलकुल शुरुआत में, वह मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर ने मनुष्यों को छुटकारा दिया था; वह मनुष्य को अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में मानता था, अपने कार्य के लक्ष्य के रूप में मानता था, उस रूप में मानता था जिसे वह जीतना चाहता था, जिसका उद्धार करना चाहता था, और उस रूप में मानता था जिसे वह सिद्ध बनाना चाहता था। अपने कार्य के आरम्भ में मनुष्य के प्रति यह परमेश्वर की मनोवृत्ति थी। परन्तु उस समय परमेश्वर के प्रति मनुष्य की मनोवृत्ति क्या थी? परमेश्वर मनुष्य के लिए अजीब था, और मनुष्य परमेश्वर को एक अजनबी मानता था। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की मनोवृत्ति सही नहीं थी, और मनुष्य इस विषय पर स्पष्ट नहीं था कि उसे किस प्रकार परमेश्वर से व्यवहार करना चाहिए। अतः उसने उससे वैसा व्यवहार किया जैसा वह चाहता था, और जो कुछ भी चाहता था वही किया। क्या मनुष्य के पास परमेश्वर के प्रति कोई दृष्टिकोण था? आरम्भ में, मनुष्य के पास परमेश्वर के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं था। मनुष्य का तथाकथित दृष्टिकोण परमेश्वर के सम्बन्ध में बस कुछ अवधारणाएं एवं कल्पनाएं ही थीं। जो कुछ लोगों की अवधारणाओं के अनुरूप था उसे स्वीकार किया गया; जो कुछ अनुरूप नहीं था उसका ऊपरी तौर पर पालन किया गया; परन्तु अपने अपने हृदय में लोग उसे कड़ाई से टक्कर देते थे और उसका विरोध करते थे। आरम्भ में यह मनुष्य एवं परमेश्वर का सम्बन्ध था: परमेश्वर मनुष्य को परिवार के एक सदस्य के रूप में देखता था, फिर भी मनुष्य परमेश्वर से एक अजनबी के रूप में व्यवहार करता था। परन्तु परमेश्वर के कार्य की एक समय अवधि के पश्चात्, मनुष्य यह समझने लगा कि परमेश्वर क्या हासिल करने का प्रयास कर रहा था। लोग जानने लगे थे कि परमेश्वर ही सच्चा परमेश्वर था, और वे जानने लगे थे कि मनुष्य परमेश्वर से क्या प्राप्त कर सकता था। इस समय मनुष्य परमेश्वर को किस रूप में मानता था? मनुष्य परमेश्वर को जीवनरेखा के रूप में मानता था, और अनुग्रह पाने, आशीषें पाने, एवं प्रतिज्ञाएं पाने की आशा करता था। और समय के इस मोड़ पर परमेश्वर मनुष्य को किस रूप में मानता था? परमेश्वर मनुष्य को अपने विजय के एक लक्ष्य के रूप में मानता था? परमेश्वर मनुष्य का न्याय करने के लिए, मनुष्य को परखने के लिए, मनुष्य को परीक्षाएं देने के लिए वचनों का उपयोग करना चाहता था। परन्तु समय के इस मुकाम पर जहाँ तक मानवजाति की बात थी, परमेश्वर एक विषय (साधन) था जिसे वह अपने स्वयं के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उपयोग कर सकता था। लोगों ने देखा कि वह सत्य जिसे परमेश्वर के द्वारा जारी किया गया था वह उन पर विजय पा सकता था और उनका उद्धार कर सकता था, और यह कि उनके पास उन चीज़ों को प्राप्त करने के लिए एक अवसर था जिन्हें वे परमेश्वर से चाहते थे, और ऐसी मंज़िल थी जिसे वे चाहते। इस कारण, उनके हृदयों में थोड़ी सी ईमानदारी ने आकार लिया था, और वे इस परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए तैयार थे। कुछ समय बीत गया, और लोगों के पास परमेश्वर के विषय में कुछ सतही एवं सैद्धान्तिक ज्ञान था। यह कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर के साथ और भी अधिक "परिचित" होने लगे थे। परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचनों, उसके प्रचार, वह सच्चाई जिसे उसने जारी किया था, और उसके कार्य के साथ—लोग और भी अधिक परिचित होने लगे थे। अतः, लोगों ने गलती से सोच लिया था कि परमेश्वर अब आगे से अनजान नहीं है, और यह कि वे पहले से ही परमेश्वर की अनुरूपता के पथ पर चल रहे थे। तब से लेकर अब तक, लोगों ने सत्य पर बहुत सारे सन्देशों को सुना है, और परमेश्वर के बहुत सारे कार्यों का अनुभव किया है। फिर भी विभिन्न कारकों एवं परिस्थितियों के हस्तक्षेपों एवं अवरोधों के अंतर्गत, अधिकांश लोग सत्य के अभ्यास को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की संतुष्टि को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। लोग बहुत ही आलसी हो गए हैं, और उनके आत्मविश्वास में बहुत ही कमी है। वे लगातार महसूस करते हैं कि उनका स्वयं का परिणाम अज्ञात है। वे साहस नहीं करते हैं कि उनके पास कोई असाधारण विचार हो, और प्रगति करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं; वे बस अनमने ढंग से साथ में अनुसरण करते है, और कदम दर कदम आगे बढ़ते जाते हैं। मनुष्य की वर्तमान दशा के लिहाज से, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है? परमेश्वर की एकमात्र इच्छा यह है कि वह मनुष्य को ये सच्चाईयां दे, और अपने मार्ग से मनुष्य को भरपूर कर दे, और तब वह अलग अलग तरीकों से मनुष्य को परखने के लिए विभिन्न परिस्थितियों का प्रबंध करता है। उसका लक्ष्य इन वचनों, इन सच्चाईयों, एवं अपने कार्य को लेना है, और ऐसे परिणाम को अंजाम देना है जहाँ मनुष्य परमेश्वर का भय मान सकता है और बुराई से दूर रह सकता है। मैं ने अधिकांश लोग को देखा है जो बस परमेश्वर के वचन को लेते हैं और उसे सिद्धान्त के रूप में मानते हैं, पत्रियों के रूप में मानते हैं, और उसे रीति विधियों के रूप में मानते हैं ताकि उनका पालन करें। जब वे कार्यों को करते हैं और बोलते हैं, या परीक्षाओं का सामना करते हैं, तब वे परमेश्वर के मार्ग को उस मार्ग के रूप में नहीं मानते हैं जिसका उनको पालन करना चाहिए। यह विशेष रूप से सत्य है जब लोगों का सामना बड़ी-बड़ी परीक्षाओं से होता है; मैं ने किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं देखा है जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने की दिशा में अभ्यास कर रहा था। इस कारण, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति अत्यधिक घृणा एवं अरुचि से भरी हुई है। जब परमेश्वर लोगों को बार-बार परीक्षाएं देता है उसके पश्चात्, यहाँ तक कि सैकड़ों बार, उनके पास तब भी अपने दृढ़ संकल्प को प्रदर्शित करने के लिए कोई स्पष्ट मनोवृत्ति नहीं होती है—मैं परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना चाहता हूँ! चूँकि लोगों के पास ऐसा दृढ़ संकल्प नहीं है, और वे इस प्रकार का प्रदर्शन नहीं करते हैं, तो उनके प्रति परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति अब आगे से वैसी नहीं है जैसी अतीत में थी, जब उसने दया प्रदान की थी, सहनशीलता प्रदान की थी, और सहिष्णुता एवं धीरज प्रदान किया था। इसके बजाय, वह मनुष्य में अत्यंत निराश हुआ है। किसने इस निराशा को पैदा किया था? जिस प्रकार की मनोवृत्ति परमेश्वर के पास मनुष्य के प्रति है, यह किस पर निर्भर है? यह हर उस व्यक्ति पर निर्भर है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। उसके अनेक वर्षों के कार्य के दौरान, परमेश्वर ने मनुष्य से अनेक मांग की है, और मनुष्य के लिए अनेक परिस्थितियों का प्रबंध किया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य ने कैसा प्रदर्शन किया है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की मनोवृत्ति क्या है, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के लक्ष्य की स्पष्ट अनुरूपता में अभ्यास नहीं कर सकता है। इस प्रकार, मैं एक कहावत में इसका सार प्रस्तुत करूंगा, और हर उस चीज़ की व्याख्या करने के लिए इस कहावत का उपयोग करूंगा जिसके विषय में हमने अभी अभी कहा था कि क्यों लोग परमेश्वर के मार्ग पर चल नहीं सकते हैं—परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। यह कहावत क्या है! यह कहावत है: परमेश्वर मनुष्य को अपने उद्धार के विषय के रूप में, अपने कार्य के विषय के रूप में मानता है; मनुष्य परमेश्वर को अपने शत्रु एवं विरोधी के रूप में मानता है। क्या अब तू इस विषय पर स्पष्ट है? मनुष्य की मनोवृत्ति क्या है; परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है; मनुष्य एवं परमेश्वर के बीच क्या रिश्ता है—ये सब बिलकुल स्पष्ट हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोगों ने कितना प्रचार सुना है, ऐसी चीज़ें जिनका सार तुम लोगों ने स्वयं के लिए निकला है—जैसे परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य होना, परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना, परमेश्वर की अनुरूपता के मार्ग को खोजना, परमेश्वर के लिए एक जीवनकाल बिताने की इच्छा करना, परमेश्वर के लिए जीवन जीना—मेरे विचार से ऐसी चीज़ें परमेश्वर के मार्ग पर चैतन्य रूप से चलना नहीं है, जो परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है! इसके बजाय, वे ऐसे माध्यम हैं जिनसे होकर तुम लोग कुछ लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हो। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, तुम सब अनमने ढंग से कुछ रीति विधियों का पालन करते हो। और ठीक-ठीक ये ऐसी रीति विधियां हैं जो लोगों को परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग से और भी अधिक दूर ले जाती हैं, और एक बार फिर से परमेश्वर को मनुष्य के विरोध में लाकर खड़ा कर देती हैं।

वह प्रश्न थोड़ा गंभीर है जिस पर आज हम चर्चा कर रहे हैं, परन्तु चाहे जो भी हो, मुझे अब भी आशा है कि जब तुम लोग आने वाले अनुभवों, और आने वाले समयों से होकर गुज़रते हो, तो जो कुछ मैं ने तुम लोगों को अभी अभी कहा है उसे तुम सब कर सकते हो। परमेश्वर की उपेक्षा न करो और उसे खाली हवा न मानो, यह महसूस करते हुए कि वह उन समयों में मौजूद है जब वह तुम लोगों के लिए उपयोगी है, परन्तु जब उसकी कोई उपयोगिता नहीं है तब यह महसूस करते हुए कि वह मौजूद नहीं है। जब तू अवचेतन रूप से इस प्रकार की समझ रखता है, तो तूने परमेश्वर को पहले से ही क्रोधित कर दिया है। कदाचित् ऐसे लोग है जो कहें: "मैं परमेश्वर को खाली हवा नहीं मानता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ, मैं सदैव परमेश्वर को संतुष्ट करता हूँ, और हर काम जो मैं करता हूँ वह उस दायरे एवं मानक एवं सिद्धान्तों के अंतर्गत आता है जिसकी मांग परमेश्वर के द्वारा की जाती है। मैं निश्चित रूप से अपने स्वयं के विचारों के अनुसार आगे नहीं बढ़ रहा हूँ।" जी हाँ, जिस रीति से तू काम कर रहा है वह सही है। परन्तु तू किस प्रकार सोचता है जब तू किसी मसले के आमने-सामने आता है? तू किस प्रकार अभ्यास करता है जब तेरा सामना किसी मसले से होता है! जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, और उससे निवेदन करते हैं तो कुछ लोग महसूस करते हैं कि वह मौजूद है, परन्तु जब उनका सामना किसी मसले से होता है, तो वे अपने स्वयं के विचारों के साथ सामने आते हैं और उनमें बने रहना चाहते हैं। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को खाली हवा मानता है। इस प्रकार की स्थिति परमेश्वर को अस्तित्वहीन ठहराती है। लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को तभी मौजूद होना चाहिए जब उन्हें उसकी ज़रूरत होती है, और जब उन्हें परमेश्वर की ज़रूरत नहीं होती है तब उसे मौजूद नहीं होना चाहिए। लोग सोचते हैं कि अभ्यास करने के लिए अपने स्वयं के विचारों के अनुसार चलना ही काफी है। वे विश्वास करते हैं कि जैसा उन्हें अच्छा लगता है वे वैसे कार्य कर सकते हैं। वे बस सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर के मार्ग को खोजने की कतई आवश्यकता नहीं है। ऐसे लोग जो वर्तमान में इस प्रकार की स्थिति में हैं, एवं इस प्रकार की दशा में हैं—क्या वे खतरे के कगार पर नहीं हैं? कुछ लोग कहते हैं: "इसकी परवाह किए बगैर कि मैं खतरे की कगार पर हूँ या नहीं, मैं ने इतने वर्षों तक विश्वास किया है, और मैं विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर मुझे नहीं छोड़ेगा क्योंकि वह मुझे छोड़ने की बात को सहन नहीं कर सकता है।" अन्य लोग कहते हैं: "यहाँ तक कि उस समय से जब मैं अपनी मां के गर्भ में था, तब से लेकर आज तक कुल मिलाकर 40 या 50 वर्ष मैं ने प्रभु पर विश्वास किया था। समय के सन्दर्भ में, मैं परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए अत्यंत योग्य हूँ; मैं ज़िन्दा बचे रहने के लिए अत्यंत योग्य हूँ। चार या पांच दशकों की इस समय अवधि में, मैं ने अपने परिवार एवं अपने रोजगार को छोड़ दिया था। जो कुछ मेरे पास था मैं ने वह सब छोड़ दिया, जैसे कि धन, रुतबा, आनन्द, एवं पारिवारिक समय; मैं ने बहुत से स्वादिष्ट व्यंजनों को नहीं खाया है; मैं ने बहुत सी सुखदायक चीज़ों का आनन्द नहीं लिया है, मैं ने बहुत से मज़ेदार स्थानों का दौरा नहीं किया हैं, मैं ने उस कष्ट का भी अनुभव किया है जिसे साधारण लोग नहीं सह सकते हैं। यदि इन सब के कारण परमेश्वर मेरा उद्धार नहीं कर सकता है, तो मेरे साथ अन्यायपूर्ण तरीके से व्यवहार किया जा रहा है और मैं इस प्रकार के ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकता हूँ।" क्या ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास इस प्रकार का दृष्टिकोण है? (हाँ उनमें से बहुत से हैं।) तो आज मैं एक तथ्य को समझने में तुम लोगों की सहायता करूंगा: उन में से हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति जो इस प्रकार का दृष्टिकोण रखता है वे अपने अपने पांव में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। यह इसलिए है क्योंकि वे अपनी आँखों को ढंकने के लिए अपनी स्वयं की कल्पनाओं का उपयोग कर रहे हैं। यह बिलकुल उनकी कल्पनाएं हैं, एवं उनके स्वयं के निष्कर्ष हैं जो उस मानक को बदलकर उसका स्थान ले लेते हैं जिसकी मांग परमेश्वर मनुष्य से करता है, परमेश्वर के सच्चे इरादों को स्वीकार करने से उन्हें रोकते हैं, और उसे ऐसा बना देते हैं कि वे परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का अनुभव नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर द्वारा सिद्ध किए जाने के अवसर को खोने के लिए उन्हें मजबूर कर देते हैं और परमेश्वर की प्रतिज्ञा में उनका कोई भाग या अंश नहीं है।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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