वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

13. अपने पुनरूत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्र शास्त्र को समझाता है

(लूका 24:30-32) जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से ओझल हो गया। उन्होंने आपस में कहा, "जब वह मार्ग में हमसे बातें करता था और पवित्रशास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हई?"

14. चेलों ने यीशु को खाने के लिए भूनी हुई मछली दी

(लूका 24:36-43) वे ये बातें कह ही रहे थे कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ, और उनसे कहा, "तुम्हें शांति मिले।" परन्तु वे घबरा गए, और डर गए, और समझे कि हम किसी आत्मा को देख रहे हैं। उसने उनसे कहा, "क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।" यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" उन्होंने उसे भुनी हुई मछली का टुकड़ा दिया और एक शहद का छत्ता दिया। उसे लेकर उनके सामने खाया।

इसके बाद, अब हम ऊपर दिए गए पवित्र शास्त्र के अंशों पर एक नज़र डालेंगे। पहला अंश पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के रोटी खाने और पवित्र शास्त्र को समझाने की पुनर्गणना है, और दूसरा अंश प्रभु यीशु के भूनी हुई मछली खाने की पुनर्गणना है। ये दोनों अंश परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए किस प्रकार की सहायता प्रदान करते हैं? प्रभु यीशु के रोटी और फिर भुनी हुई मछली खाने के इन विवरणों में तुम लोग जिस प्रकार के तस्वीरों को प्राप्त करते हो क्या तुम लोग इसकी कल्पना कर सकते हो? यदि प्रभु यीशु तुम लोगों के सामने रोटी खाता हुआ खड़ा हो जाए, तो तुम लोगों को कैसा महसूस होगा? या यदि वह तुम लोगों के साथ एक ही मेज पर भोजन कर रहा हो, और लोगों के साथ मछली और रोटी खा रहा हो, तो उस समय तुम्हें कैसा महसूस होगा? यदि तुम महसूस करते हो कि तुम प्रभु के बेहद करीब होगे, कि वह तुम्हारे बेहद अंतरंग है, और तब यह एहसास सही है। यह बिल्कुल वही फल है जिसे पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु रोटी और मछली खाने के द्वारा भीड़ के सामने उत्पन्न करना चाहता था। यदि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद सिर्फ लोगों से बात करता, यदि उन्होंने उसके शरीर और हड्डियों को महसूस नहीं किया होता, परन्तु यह एहसास करते कि उस आत्मा तक नहीं पहुँच सकते हैं, तो वे कैसा महसूस करेंगे? क्या वे निराश नहीं हो जाएँगे? जब लोग निराश हो जाते हैं, तो क्या वे परित्याग किये हुए महसूस नहीं करेंगे? क्या वे प्रभु यीशु मसीह से एक दूरी का एहसास नहीं करेंगे? परमेश्वर के साथ लोगों के रिश्ते में यह दूरी किस प्रकार का नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करेगा? लोग निश्चित तौर पर भयभीत हो जाऐंगे, और यह कि वे उसके करीब आने की हिम्मत नहीं करेंगे, और उनमें उसे एक सम्मानित दूरी पर रखने की मनोवृत्ति होगी। उसके बाद, वे प्रभु यीशु मसीह के साथ अपने घनिष्ठ रिश्ते से दूर हो जाएँगे, और मानव जाति और ऊपर स्वर्ग के परमेश्वर के बीच रिश्ते की ओर वापस लौट जाएँगे, जैसा अनुग्रह के युग के पहले था। वह आध्यात्मिक देह जिसे लोग छू और एहसास नहीं कर सकते थे उस से आगे चलकर परमेश्वर के साथ उनका घनिष्ठ रिश्ता जड़ से खत्म हो जाएगा, और यह उनके घनिष्ठ रिश्ते को—जो प्रभु यीशु मसीह के देह में रहने के दौरान बना था, जिस में मानवजाति और उसके मध्य कोई दूरी नहीं थी—खत्म कर देगा। आध्यात्मिक देह के प्रति लोगों के एहसास मात्र भय, टाल मटोल, और टकटकी लगाकर देखना है। वे करीब आने या उससे बात करने, अकेले उसका अनुसरण करने, उस पर भरोसा करने, या उस पर आशा करने की हिम्मत नहीं करते हैं। परमेश्वर इस प्रकार के एहसास को देखने में अनिच्छुक था जो मनुष्यों के मन में उसके लिए था। वह यह नहीं देखना चाहता था कि लोग उसे नज़रअंदाज़ करें या अपने आप को उससे दूर हटा दें; वह केवल इतना चाहता था कि लोग उसे समझें, उसके करीब आएँ, और उसका परिवार बन जाएँ। यदि तुम्हारे स्वयं के परिवार ने, तुम्हारे बच्चों ने तुम्हें देखा परन्तु तुम्हें नहीं पहचाना, और तुम्हारे करीब आने की हिम्मत नहीं की, पर हमेशा तुम्हें नज़रअंदाज़ किया, और जो कुछ भी तुमने उनके लिए किया उनके द्वारा तुम उनकी समझ को प्राप्त नहीं कर सकते थे, तो इससे तुम्हें कैसा लगेगा? क्या यह दर्दनाक नहीं होगा? क्या तुम्हारा हृदय चकनाचूर नहीं हो जाएगा? यह बिल्कुल वैसा है जैसा परमेश्वर महसूस करता है जब लोग उसे नज़रअंदाज करते हैं। अतः, अपने पुनरूत्थान के बाद, प्रभु यीशु तब भी लोगों के सामने देह और लहू के अपने रूप में प्रकट हुआ, और उनके साथ खाया और पीया। परमेश्वर लोगों को एक परिवार के रूप में देखता है और वह चाहता है कि मानव जाति भी उसे इसी तरह से देखे; केवल इसी तरह से परमेश्वर सचमुच में लोगों को हासिल कर सकता है, और लोग भी सचमुच में उससे प्रेम और उसकी आराधना कर सकते हैं। अब क्या तुम लोग पवित्र शास्त्र के इन दो अंशों से सार निकालने के लिए मेरे इरादे को समझ सकते हो जहाँ प्रभु यीशु रोटी खाता है और पवित्र शास्त्र को समझाता है, और उसके पुनरूत्थान के बाद चेलेे उसे खाने के लिए भूनी हुई मछली देते हैं?

ऐसा कहा जा सकता है कि चीज़ों की श्रृंखलाएँ जिन्हें प्रभु यीशु ने पुनरूत्थान के बाद कहा और किया वे विचारशील थे, और उन्हें भली मनसा से किया गया था। वे कृपा और स्नेह से भरे हुए थे जिसे परमेश्वर मानवता के लिए महसूस करता था, और वे प्रशंसा और अत्याधिक देखरेख से भरे हुए थे जो उस घनिष्ठ सम्बन्ध के लिए था जिसे उसने देह में रहने के दौरान मानवजाति के साथ स्थापित किया था। उससे भी अधिक, वे उस जीवन की याद में उदासी और उस आशा से भरे हुए थेजो उसके पास था जब उसने देह में रहने के समय के दौरान अपने अनुयायियों के साथ भोजन किया था और जीवन बिताया था। अतः, परमेश्वर नहीं चाहता था कि लोग परमेश्वर और मनुष्य के बीच दूरी का एहसास करें, और ना ही वह यह चाहता था कि मानवजाति अपने आपको परमेश्वर से दूर कर दे। उससे भी बढ़कर, वह यह नहीं चाहता था कि लोग यह एहसास करें कि प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद आगे से वह प्रभु नहीं रहा जो लोगों से इतना घनिष्ठ था, यह कि वह आगे से मानव जाति के साथ नहीं है क्योंकि वह आध्यात्मिक संसार में वापस लौट चुका है, और उस पिता के पास वापस लौट चुका है जिसे लोग कभी देख नहीं सकते थे और उस तक पहुँच नहीं सकते थे। वह नहीं चाहता था कि लोग यह महसूस करें कि उसके और मानवजाति के बीच पदस्थिति को लेकर कोई अंतर था। जब परमेश्वर उन लोगों को देखता है जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं परन्तु उसे एक सम्मानित दूरी पर रखते हैं, तो उसका हृदय दर्द से भर जाता है क्योंकि इसका मतलब है कि उनका हृदय उस से बहुत दूर है, इसका मतलब है कि उसके लिए उनके हृदयों को पाना बहुत ही कठिन होगा। इस प्रकार यदि वह लोगों के सामने एक आध्यात्मिक देह में प्रकट हो जाता जिसे वे छू और देख नहीं सकते थे, तो इस ने एक बार फिर मनुष्य को परमेश्वर से दूर कर दिया होता, और इस ने उसके पुनरूत्थान के बाद ग़लती से मसीह को अभिमानी, या मनुष्यों से अलग प्रकार का, और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखने में मानव जाति को अग्रसर किया होता,जो मनुष्य के साथ मेज पर बैठ नहीं सकता था और उनके साथ भोजन नहीं कर सकता है क्योंकि मनुष्य पापी एवं गन्दे हैं, और कभी भी परमेश्वर के करीब नहीं आ सकते हैं। मानव जाति की इस ग़लतफहमी को दूर करने के लिए, प्रभु यीशु ने असंख्य चीज़ों को किया जिन्हें वह देह में लगातार करता था, जैसा कि बाइबल में लिखित है, "उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया, और उसे तोड़कर उनको देने लगा।" साथ ही उसने उन्हें पवित्र शास्त्र भी समझाया, जैसा वह किया करता था। यह सब कुछ जो प्रभु यीशु ने किया इसने प्रत्येक व्यक्ति को जिसने उसे देखा था उसे यह एहसास दिलाया कि प्रभु नहीं बदला था, और यह कि वह अभी भी वही प्रभु यीशु था। भले ही उसे क्रूस पर ठोंक दिया गया था और उसने मृत्यु का अनुभव किया था, फिर भी वह मुर्दों में से जी उठा था, और उसने मानव जाति को कभी नही छोड़ा था। वह मनुष्यों के मध्य रहने के लिए वापस आ गया था, और उसमें कुछ भी नहीं बदला था। मनुष्य का पुत्र जो लोगों के सामने खड़ा था वह वही प्रभु यीशु था। लोगों के साथ उसका व्यवहार और उसकी बातचीत बिल्कुल चिर परिचित लगता था। वह तब भी करूणा, अनुग्रह और सहिष्णुता से इतना भरपूर था—वह तब भी वही प्रभु यीशु था जो लोगों से वैसा ही प्रेम करता था जैसा वह अपने आप से प्रेम करता था, जो मनुष्य को सात गुणे के सत्तर बार तक क्षमा कर सकता था। हमेशा की तरह, उसने लोगों के साथ भोजन किया, उनके साथ पवित्र शास्त्र से विचार विमर्श किया, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, वह पहले के समान ही था, जब उसे माँस और लहू से बनाया गया था और जिसे देखा और छुआ जा सकता था। इस प्रकार मनुष्य के पुत्र ने लोगों को अनुमति दी कि उस घनिष्ठता का एहसास करें, और उस सुकून का एहसास करें, और जो कुछ खो गया था उसके सम्बन्ध में आनन्द महसूस करें, और उन्होंने इतने सुकून का एहसास किया कि हिम्मत और दृढ़ विश्वास के साथ इस मनुष्य के पुत्र के ऊपर भरोसा करना और उस पर दृष्टि करना प्रारम्भ किया जो मनुष्यों को उनके पापों के लिए क्षमा कर सकता था। और साथ ही उन्होंने निःसंकोच प्रभु यीशु से प्रार्थना करना प्रारम्भ कर दिया था, वे उसके अनुग्रह, एवं उसकी आशीषों को प्राप्त करने के लिए, और उससे शांति एवं आनन्द पाने के लिए, और उससे देखरेख एवं सुरक्षा हासिल करने के लिए प्रार्थना करने लगे, तथा प्रभु यीशु के नाम से चंगाई करना और दुष्टात्माओं को निकालना शुरू कर दिया था।

उस समय के दौरान जब प्रभु यीशु देह में होकर काम करता था, उसके अधिकतर अनुयायी उसकी पहचान और उन चीज़ों को जो वह कहता था उनकी जाँच सम्पूर्ण रीति से नहीं कर सकते थे। जब वह क्रूस पर चढ़ गया, उनके चेलों की मानसिकता आशावान थी; जब उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था उस समय से लेकर क़ब्र में डाले जाने तक, उसके प्रति लोगों की मनोवृत्तियाँ निराशाजनक थी। इस समय के दौरान, लोगों ने पहले से ही अपने हृदय में उन चीज़ों को लेकर सन्देह से इन्कार की ओर जाना प्रारम्भ कर दिया था जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने देह में रहने के दिनों के दौरान कहा था। और जब वह क़ब्र से बाहर आया, और एक एक कर के लोगों के सामने प्रकट हुआ, तो वे अधिकांश लोग जिन्होंने उसे अपनी आँखों से देखा था या उसके पुनरूत्थान के समाचार को सुना था धीरे धीरे इन्कार से संशयवाद की ओर आने लगे थे। और पुनरूत्थान के बाद उस समय तक जब प्रभु यीशु ने थोमा से अपने हाथ को उसके पंजर में डालने को कहा, उस समय तक जब प्रभु यीशु ने भीड़ के सामने रोटी तोड़ी और खाया, और उसके बाद उनके सामने भूनी हुई मछली खाया, तब ही उन्होंने सचमुच में उस सत्य को समझा कि प्रभु यीशु ही देहधारी मसीहा है। तुम लोग ऐसा कह सकते हो कि यह आध्यात्मिक देह मानो मांस और लहू के साथ उन लोगों के सामने आ खड़ा हुआ था जिसने तुरन्त ही उन्हें एक स्वप्न से जगा दिया थाः वह मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था उस समय से अस्तित्व में था जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता था। उसका एक आकार, और माँस और हड्डी था, और वह पहले से ही मानव जाति के साथ लम्बे समय तक रह चुका था...। इस समय, लोगों ने यह महसूस किया कि उसका अस्तित्व इतना अधिक यथार्थ, और इतना अधिक अद्भुत है; वे बहुत ज़्यादा आनन्दित और प्रसन्न थे, और उसी समय भावनाओं से भी भरपूर थे। और उसकी पुनःउपस्थिति ने सचमुच में लोगों को उसकी विनम्रता को देखने, और उसकी नज़दीकी, एवं उसकी चाहत, और मानव जाति के प्रति उसके लगाव का एहसास करने की अनुमति दी। इस संक्षिप्त पुनर्मिलन ने उन लोगों को जिन्होंने प्रभु यीशु को देखा था यह एहसास कराया कि मानो एक पूरा जीवन गुज़र चुका था। उनके खोए हुए, भ्रमित, भयभीत, चिन्तित, लालायित और स्तब्ध हृदय को सुकून मिला। वे आगे से सन्देहास्पद या निराश नहीं रहे क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि अब उनके पास आशा थी और कुछ ऐसा था जिस पर वे भरोसा कर सकते थे। मनुष्य का पुत्र जो उनके सामने खड़ा था पूरी अनन्तता के लिए उनके संग रहेगा, वह उनका दृढ़ गढ़, और हमेशा के लिए उनका शरणस्थान होगा।

यद्यपि प्रभु यीशु पुनरूत्थित हो चुका था, फिर भी उसके हृदय और उसके कार्य ने मानव जाति को नहीं छोड़ा था। उसने अपने प्रकटीकरण से लोगों को बताया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस रूप में है, वह हर समय और हर जगह लोगों का साथ देगा, उनके साथ चलेगा, और उनके साथ रहेगा। और वह हर समय और हर जगह मानव जाति के लिए प्रबन्ध करेगा और उनकी चरवाही करेगा, उन्हें अपने आप को देखने और छूने की अनुमति देगा, और यह निश्चित करेगा कि वे कभी असहाय महसूस ना करें। साथ ही प्रभु यीशु यह भी चाहता है कि लोग यह जानें: वे इस संसार में अकेले नहीं हैं। मानव जाति के पास परमेश्वर की देखरेख है, परमेश्वर उनके साथ है; लोग हमेशा परमेश्वर पर आसरा रख सकते हैं; वह अपने प्रत्येक अनुयायी का परिवार है। परमेश्वर पर आसरा रखने के लिए, मानव जाति आगे से अकेला या असहाय नहीं होगा, और जो उसे अपने पापबलि के रूप में स्वीकार करते हैं वे आगे से पाप के बन्धन में नहीं रहेंगे। मनुष्य की नज़रों में, उसके कार्य के ये भाग जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया था बहुत ही छोटी चीज़ें थीं, परन्तु जिस रीति से मैं उन्हें देखता हूँ, प्रत्येक छोटी से छोटी चीज़ भी बहुत अधिक अर्थपूर्ण थी, एवं बहुत अधिक मूल्यवान थी, और वे बहुत अधिक महत्वपूर्ण और वज़नदार थे।

यद्यपि देह में काम करने का प्रभु यीशु का समय कठिनाईयों और दुःख से भरा हुआ था, फिर भी माँस और लहू के अपने आध्यात्मिक देह के प्रकटीकरण के जरिए, उसने मानव जाति को छुड़ाने के लिए उस समय देह में अपने कार्य को पूर्णता और सिद्धता से पूरा किया था। उसने देहधारी होकर अपनी सेवकाई की शुरूआत की थी, और मनुष्यों के सामने अपने शारीरिक रूप में उपस्थित होकर उसने अपनी सेवकाई की समाप्ति की थी। उसने अनुग्रह के युग की घोषणा की, उसने मसीह के रूप में अपनी पहचान के जरिए अनुग्रह के युग की शुरूआत की थी। मसीह के रूप में अपनी पहचान के जरिए, उसने अनुग्रह के युग में अपने कार्य को पूरा किया और उसने अनुग्रह के युग में अपने सभी अनुयायियों को बलवंत किया था और उनकी अगुवाई की थी। परमेश्वर के विषय में यह कहा जा सकता है कि जब वह किसी कार्य को प्रारम्भ करता है तो वास्तव में उसे पूरा भी करता है। एक योजना है और उसके अनेक चरण हैं, जो परमेश्वर की बुद्धि, उसकी सर्वसामर्थता, और उसके अद्भुत कार्यों से भरपूर हैं। यह परमेश्वर के प्रेम और दया से भरपूर हैं। हाँ वास्तव में, परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य की मुख्य डोर है मानव जाति के लिए उसकी देखभाल; यह उसकी चिन्ता के एहसासों से सराबोर है जिसे वह कभी अलग नहीं रख सकता है। बाइबल के इन वचनों में, अपने पुनरूत्थान के बाद हर एक चीज़ में जिसे प्रभु यीशु ने किया था, जो प्रकट हुआ था वह मानव जाति के लिए परमेश्वर का ना बदलने वाला प्रेम और चिन्ता थी, साथ ही मनुष्यों के लिए परमेश्वर का अत्याधिक प्रेम और उनका पालन पोषण था। अब तक, इसमें से कुछ भी नहीं बदला है—क्या तुम लोग इसे देख सकते हो? जब तुम लोग इसे देखते हो, तो क्या तुम लोगों का हृदय स्वतः ही परमेश्वर के करीब नहीं आ जाता है? यदि तुम लोग उस युग में रहते और प्रभु यीशु पुनरूत्थान के बाद तुम लोगों के सामने प्रकट होता, दृश्य रूप में ताकि तुम लोग देख सको, और यदि वह तुम लोगों के सामने बैठ जाता, रोटी और मछली खाता और पवित्र शास्त्र से तुम लोगों को समझाता, और तुम लोगों से बातचीत करता, तो तुम लोग कैसा महसूस करते? क्या तुम खुशी महसूस करते? दोष भावना के विषय में क्या? परमेश्वर के प्रति पिछली ग़लतफहमियाँ और उसकी अवहेलना, परमेश्वर से टकराव और उसके प्रति सन्देह—क्या वे सब ग़ायब नहीं हो जाते? क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच रिश्ता और अधिक उचित नहीं हो जाता?

बाइबल के इन सीमित अध्यायों की विवेचना के द्वारा, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव में किसी खोट का पता लगाया है? क्या तुम लोगों ने परमेश्वर के प्रेम में मिलावट की खोज की है! क्या तुम लोग परमेश्वर की सर्वशक्ति और बुद्धि में कोई धूर्तता या बुराई देखते हो? कदापि नहीं? अब क्या तुम लोग निश्चित तौर पर कह सकते हो कि परमेश्वर पवित्र है? क्या तुम लोग निश्चित तौर पर कह सकते हो कि परमेश्वर की भावनाएँ उसके सार और उसके स्वभाव का प्रकाशन हैं। मैं आशा करता हूँ कि इन वचनों को पढ़ने के बाद, जो कुछ तुम लोगों ने इससे समझा है उससे तुम लोगों की सहायता होगी और स्वभाव में परिवर्तन और परमेश्वर के स्वभाव का अनुसरण करने में लाभ पहुँचाएगा। मैं यह भी आशा करता हूँ कि ये वचन तुम लोगों के लिए फल उत्पन्न करेंगे जो दिन ब दिन बढ़ता ही जाएगा, इस प्रकार अनुसरण की यह प्रक्रिया तुम लोगों को परमेश्वर के और करीब ले आएगी, और उस ऊँचे स्तर के और करीब ले आएगी जिसकी आकांक्षा परमेश्वर करता है, ताकि तुम लोग आगे से सत्य के पीछे पीछे चलने में बोरियत महसूस ना करो और तुम लोग आगे से यह महसूस ना करो कि सत्य और स्वभाव में परिवर्तन का अनुसरण करना एक दुःखदायी या बेकार की चीज़ नहीं है। उसके बजाए, यह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और परमेश्वर के पवित्र सार की अभिव्यक्ति है जो तुम लोगों को ज्योति की लालसा करने, और न्याय की लालसा करने के लिए अभिप्रेरित करता है, और सत्य का अनुसरण करने, परमेश्वर की इच्छा की सन्तुष्टि का अनुसरण करने, और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण योग्य मनुष्य बनने, और एक वास्तविक मनुष्य बनने के लिए आकांक्षा करता है।

आज हमने कुछ चीज़ों के बारे में बातें की हैं जिन्हें परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में किया था जब उसने पहली बार देहधारण किया था। इन चीज़ों से, हमने उस स्वभाव को जिसे उसने देह में व्यक्त और प्रकाशित किया था, साथ ही साथ जो उसके पास है और जो वह है उसके प्रत्येक पहलू को देखा है। जो उसके पास है और जो वह है और उसके सभी पहलू बहुत ही मानवीय दिखाई देते हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि वह सब जो उसने प्रकाशित और व्यक्त किया उसके सार को उसके स्वयं के स्वभाव से अलग नहीं किया जा सकता है। देहधारी परमेश्वर का हर एक तरीका और उसका प्रत्येक पहलू मानवता में उसके स्वभाव को प्रकट करता है जो उसके सार से जटिल रूप से जुड़ा हुआ है। अतः, यह अति महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर मनुष्य के पास देहधारण कर के आया था और वह कार्य जो उसने देह में किया था वह भी अति महत्वपूर्ण है। और, वह स्वभाव जो उसने प्रकाशित किया था और वह इच्छा जिसे उसने अभिव्यक्त किया था वे देह में रहनेवाले प्रत्येक इंसान, और भ्रष्टता में रहनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। क्या यह कुछ ऐसा है जिसे तुम लोग समझने में समर्थ हो? परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह है को समझने के बाद, क्या तुम लोगों ने कोई निष्कर्ष निकाला है कि तुम लोगों को परमेश्वर के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए? इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में, निष्कर्ष के रूप में मैं तुम लोगों को तीन चेतावनी देना चाहूँगाः पहला, परमेश्वर की परीक्षा मत करो। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम परमेश्वर के बारे में कितना समझते हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम उसके स्वभाव के विषय में कितना जानते हो, उसकी परीक्षा बिल्कुल नहीं करो। दूसरा, पदस्थिति के लिए परमेश्वर से संघर्ष मत करो। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर तुम्हें किस प्रकार की पदस्थिति देता है या किस प्रकार का कार्य तुम्हें सौंपता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह तुम्हें किस प्रकार के कर्तव्य को करने के लिए बड़ा करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने परमेश्वर के लिए कितना व्यय और कितना बलिदान किया है, इसलिए पदस्थिति के लिए परमेश्वर से संघर्ष बिल्कुल मत करो। तीसरा, परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा मत करो? जो परमेश्वर तुम्हारे साथ करता है, जो वह तुम्हारे लिए व्यवस्थित करता है, और वे चीज़ें जो वह तुम पर लेकर आता है तुम उसे समझते या उसका पालन करते हो कि नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, किन्तु तुम बिल्कुल भी परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा मत करो। यदि तुम इन तीन चेतावनी को लेकर चलोगे, तो तुम अपेक्षाकृत सुरक्षित रहोगे, और तुम आसानी से परमेश्वर को क्रोधित नहीं करोगे। कहने के लिए आज बस इतना ही है!

23 जुलाई, 2014

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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