वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

परमेश्वर का अधिकार (II)    भाग सात

कोई भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मानव की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है

जो सब मैंने अभी कहा वह सुनने के बाद, क्या नियति के विषय में तुम लोगों का विचार बदला है? तुम सब मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को किस प्रकार समझते हो? इसे साधारण रूप से कहें, तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रियता से या निष्क्रियता से उसकी संप्रभुता एवं इंतज़ामों को स्वीकार करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार अपने जीवन के पथक्रम में संघर्ष करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कितने टेढ़े-मेढ़े पथों पर चलता है, क्योंकि अंत में वह नियति की परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा जिसे सृष्टिकर्ता ने उस पुरुष या स्त्री के लिए चिन्हित किया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह रीति है जिसके तहत उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण एवं शासन करता है। यह वही अजेयता है, एवं यह नियन्त्रण एवं शासन का वही रूप है, जो उन नियमों के लिए ज़िम्मेदार है जो सभी प्राणियों के जीवन को नियन्त्रित करते हैं, जो मनुष्यों को अनुमति देते हैं कि वे बिना किसी हस्तक्षेप के बार बार एक शरीर से दूसरे शरीर में जाएं, जो इस संसार को लगातार घुमाते रहते हैं और दिन ब दिन एवं साल दर साल आगे बढ़ते रहते हैं। तुमने इन सभी तथ्यों को देखा है और तुम उन्हें समझते हो, चाहे सतही तौर पर या गहराई से; तुम्हारी समझ की गहराई सत्य के विषय में तुम्हारे अनुभव एवं ज्ञान के ऊपर, और परमेश्वर के विषय में तुम्हारे ज्ञान पर निर्भर होती है। तुम सत्य की वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुमने परमेश्वर के वचन का कितना अनुभव किया है, तुम परमेश्वर की हस्ती एवं उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो - यह परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों के विषय में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करता है। क्या परमेश्वर की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ाम इस बात पर निर्भर हैं कि मानव प्राणी उसके अधीन होते हैं या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है उसे इस बात के द्वारा निर्धारित किया जाता है कि मानवता उसके अधीन होती है या नहीं? परिस्थितियों की परवाह किए बगैर परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में है; परमेश्वर सभी परिस्थितियों में अपने विचारों एवं अपनी इच्छाओं की अनुरूपता में प्रत्येक मानव की नियति एवं सभी प्राणियों का नियन्त्रण एवं इंतज़ाम करता है। मनुष्यों के बदलने के कारण यह नहीं बदलेगा, और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र है, और समय, अंतरिक्ष, एवं भूगोल में परिवर्तनों के द्वारा इसे बदला नहीं जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार ही उसकी हस्ती है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने एवं स्वीकार करने के योग्य है या नहीं, और चाहे मनुष्य इसके अधीन होने के योग्य है या नहीं, यह मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को ज़रा सा भी नहीं बदलता है। दूसरे शब्दों में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति क्या मनोवृत्ति अपनाता है, क्योंकि यह साधारण तौर पर इस तथ्य को बदल नहीं सकता है कि परमेश्वर मानव की नियति एवं सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है। भले ही तुम परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन नहीं हो, फिर भी वह अब भी तुम्हारी नियति को निर्धारित करता है; भले ही तुम उसकी संप्रभुता को नहीं जान सकते हो, फिर भी उसका अधिकार अब भी अस्तित्व में है। परमेश्वर का अधिकार और मानव की नियति के ऊपर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतन्त्र हैं, वे मनुष्य की इच्छा एवं चुनावों की अनुरूपता में बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर जगह, हर घण्टे, और हर एक क्षण है। स्वर्ग और पृथ्वी भले ही टल जाएँ, उसका अधिकार कभी नहीं टलता, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है, और उसके अधिकार को लोगों, घटनाओं या चीज़ों के द्वारा, एवं अंतरीक्ष के द्वारा या भूगोल के द्वारा प्रतिबन्धित या सीमित नहीं किया जाता है। सभी समयों पर परमेश्वर अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी सामर्थ्य को दिखाता है, और हमेशा की तरह अपने प्रबंधन के कार्य को लगातार करता रहता है; सभी समयों पर वह सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, सभी चीज़ों के लिए आपूर्ति करता है, और सभी चीज़ों का आयोजन करता है, जैसा उसने हमेशा से किया था। इसे कोई बदल नहीं सकता है। यह एक तथ्य है; यह अति प्राचीन काल से अपरिवर्तनीय सत्य है।

जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन होने की इच्छा रखता है उसके लिए उचित मनोवृत्ति एवं अभ्यास

किस मनोवृत्ति के साथ अब मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार, और मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य (सच्चाई) को जानना एवं मानना चाहिए? यह एक वास्तविक समस्या है जो प्रत्येक व्यक्ति के सामने खड़ी होती है। जब वास्तविक जीवन की समस्याओं का सामना किया जाता है, तब तुम्हें किस प्रकार परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता को जानना एवं समझना चाहिए? जब तुम नहीं जानते हो कि किस प्रकार इन समस्याओं को समझना, सम्भालना और अनुभव करना है, तो तुम्हारे इरादे, तुम्हारी इच्छा, और परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतज़ामों के अधीन होने की अपनी वास्तविकता को दिखाने के लिए तुम्हें किस प्रकार की मनोवृत्ति अपनानी चाहिए? पहले तुम्हें इंतज़ार करना सीखना होगा; फिर तुम्हें खोजना सीखना होगा; तब तुम्हें अधीन होना सीखना होगा। "इंतज़ार" का अर्थ है परमेश्वर के समय का इंतज़ार करना, तथा उन लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों का इंतज़ार करना जिन्हें उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित किया है, और उसकी इच्छा के लिए इंतज़ार करना कि वह आहिस्ता आहिस्ता अपनी इच्छा को आप पर प्रकट करे। "खोजने" का अर्थ है उन लोगों, घटना और चीज़ों के माध्यम से तुम्हारे लिए परमेश्वर के विचारशील इरादों का अवलोकन करना एवं समझना जिन्हें उसने बनाया है, उनके माध्यम से सत्य को समझना, जो मनुष्यों को पूरा करना होगा उसे और उन मार्गों को समझना जिनका उन्हें पालन करना होगा, इस बात को समझना कि परमेश्वर मनुष्यों में किन परिणामों को हासिल करने की इच्छा करता है और वह उनमें किन उपलब्धियों को देखने की इच्छा करता है। "समर्पण", वास्तव में, उन लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों को स्वीकार करने की ओर संकेत करता है जिन्हें परमेश्वर ने आयोजित किया है, उसकी संप्रभुता को स्वीकार करने की ओर संकेत करता है और, इसके माध्यम से, यह जानना है कि किस प्रकार सृष्टिकर्ता मानव की नियति को नियन्त्रित करता है, कि वह किस प्रकार अपने जीवन से मनुष्य की आपूर्ति करता है, कि वह किस प्रकार मनुष्यों के भीतर सच्चाई का काम करता है। सभी चीज़ें परमेश्वर के इंतज़ामों एवं संप्रभुता के अधीन प्राकृतिक नियमों का पालन करती हैं, और यदि तुमने ठान लिया है कि तुम परमेश्वर को अपने लिए हर एक चीज़ का इंतज़ाम करने एवं नियन्त्रण करने की अनुमति देते हो, तो तुम्हें इंतज़ार करना सीखना होगा, तुम्हें खोजना सीखना होगा, और तुम्हें अधीन होना सीखना होगा। यह वही मनोवृत्ति है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपनाना होगा जो परमेश्वर में अधिकार के अधीन होना चाहता है, और यह वही मूल योग्यता है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को धारण करना होगा जो परमेश्वर की संप्रभुता एवं इंतsज़ामों को स्वीकार करना चाहता है। इस प्रकार की मनोवृत्ति रखने के लिए, इस प्रकार की योग्यता धारण करने के लिए, तुम लोगों को और भी अधिक कठिन परिश्रम करना होगा; और केवल इस प्रकार से ही तुम लोग सच्ची वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो।

परमेश्वर को अपने अद्वितीय स्वामी के रूप में स्वीकार करना उद्धार हासिल करने का पहला कदम है

परमेश्वर के अधिकार से सम्बन्धित सच्चाईयाँ ऐसी सच्चाईयाँ हैं जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को गम्भीरता से लेना होगा, अपने हृदय से अनुभव करना एवं समझना होगा; क्योंकि ये सच्चाईयाँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित हैं, प्रत्येक व्यक्ति के अतीत, वर्तमान एवं भविष्य सेसम्बन्धित हैं, उन महत्वपूर्ण घटनाक्रमों से सम्बन्धित हैं जिनसे प्रत्येक व्यक्ति को गुज़रना है, और परमेश्वर की संप्रभुता एवं उस मनोवृत्ति से सम्बन्धित हैं जिनके तहत उसे परमेश्वर के अधिकार का सामना करना चाहिए, और स्वाभाविक रूप से, प्रत्येक व्यक्ति की आखिरी मंज़िल से सम्बन्धित हैं। अतः उन्हें जानने एवं समझने के लिए जीवन भर की ऊर्जा लगती है। जब तुम परमेश्वर के अधिकार को गम्भीरता से लेते हो, जब तुम परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करते हो, तब तुम धीरे-धीरे एहसास करोगे एवं समझोगे कि परमेश्वर का अधिकार सचमुच में अस्तित्व में है। परन्तु यदि तुम परमेश्वर के अधिकार को कभी नहीं समझते हो, उसकी संप्रभुता को कभी स्वीकार नहीं करते हो, तब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम कितने वर्ष जीवित रहते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के विषय में थोड़ी सी भी समझ हासिल नहीं करोगे। यदि तुम वाकई में परमेश्वर के अधिकार को जानते एवं समझते नहीं हो, तो जब तुम सड़क के अंत में पहुँचते हो, भले ही तुमने दशकों से परमेश्वर में विश्वास किया है, तो तुम्हारे पास अपने जीवन में कुछ भी दिखाने के लिए नहीं होगा, और मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के विषय में तुम्हारा ज्ञान अनिवार्य रूप से शून्य होगा। क्या यह बहुत ही दुखदायी बात नहीं है? अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम जीवन में कितनी दूर चले आए हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि अब तुम कितने वृद्ध हो गए हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारी बाकी बची हुई यात्रा कितनी लम्बी है, पहले तुम्हें परमेश्वर के अधिकार को पहचानना होगा और इसे गम्भीरतापूर्वक लेना होगा, और इस तथ्य (सच्चाई) को मानना होगा कि परमेश्वर तुम्हारा अद्वितीय स्वामी है। मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के सम्बन्ध में इन सच्चाईयों का स्पष्ट एवं सटीक ज्ञान एवं समझ हासिल करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक जरुरी सबक है, यह मानव जीवन को जानने एवं सत्य को हासिल करने की एक कुंजी है, परमेश्वर को जानने हेतु जीवन व बुनियादी सबक है जिसका हर कोई हर दिन सामना करता है, और जिससे कोई बच नहीं सकता है। यदि तुम में से कुछ लोग इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कोई छोटा मार्ग लेना चाहते हैं, तो मैं तुमसे कहता हूँ, कि यह असंभव है! यदि तुम में से कुछ लोग परमेश्वर की संप्रभुता से बचना चाहते हैं, तो यह और भी अधिक असंभव है! परमेश्वर ही मनुष्य का एकमात्र प्रभु है, परमेश्वर ही मानव की नियति का एकमात्र स्वामी है, और इस प्रकार मनुष्य के लिए अपनी स्वयं की नियति का नियन्त्रण करना असंभव है, और उससे बढ़कर होना असंभव है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किसी व्यक्ति की योग्यताएं कितनी ऊंची हैं, वह दूसरों की नियति को प्रभावित नहीं कर सकता है, आयोजित, व्यवस्थित, नियन्त्रित, या परिवर्तित तो बिलकुल नहीं कर सकता है। केवल स्वयं अद्वितीय परमेश्वर ही मनुष्य के लिए सभी हालातों को नियन्त्रित करता है, क्योंकि केवल वह ही अद्वितीय अधिकार धारण करता है जो मानव की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है; और इस प्रकार केवल सृष्टिकर्ता ही मनुष्य का अद्वितीय स्वामी है। परमेश्वर का अधिकार न केवल सृजे गए मानवता के ऊपर संप्रभुता रखता है, बल्कि न सृजी गई चीज़ों के ऊपर जिन्हें कोई मानव देख नहीं सकता है, तारों के ऊपर,एवं विश्व के ऊपर भी संप्रभुता रखता है। यह एक निर्विवादित तथ्य है, ऐसा तथ्य जो वाकई में अस्तित्व में है, जिसे कोई मनुष्य या चीज़ बदल नहीं सकता है। यदि तुम में से कुछ लोग अभी भी जीवन के हालातों से असंतुष्ट हैं जिस प्रकार वे हैं, यह विश्वास करते हुए कि तुम्हारे पास कुछ विशेष कौशल या योग्यता है, और अभी भी यह सोचते हो कि तुम भाग्यशाली हो सकते हो और अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल सकते हो या उससे बच सकते हो; यदि तुम मानवीय कोशिशों के माध्यम से अपनी नियति बदलने का प्रयास करते हो, और इसके द्वारा दूसरों से विशिष्ट दिखाई देते हो और प्रसिद्धि एवं सौभाग्य अर्जित करते हो, तब मैं तुमसे कहता हूँ, तुम जीवन के हालातों को अपने लिए कठिन बना रहे हैं, तुम केवल समस्याओं को ही मांग रहे हैं, तुम अपनी ही कब्र खोद रहे हैं! एक दिन, जल्दी या देर से ही सही, तुम यह जान जाओगे कि तुमने गलत चुनाव किया था, और यह कि तुम्हारी कोशिशें व्यर्थ थी। तुम्हारी महत्वाकांक्षाएं, नियति से लड़ने की तुम्हारी इच्छाएं, और तुम्हारा स्वयं का विचित्र स्वभाव, तुम्हें ऐसे मार्ग में ले जाएगा जहाँ से कोई वापसी नहीं है, और इसके लिए तुम एक कड़वी कीमत चुकाओगे। हालाँकि फिलहाल तुम परिणाम की भयंकरता को नहीं देख पा रहे हो, जब तुम और भी अधिक गहराई से उस सत्य का अनुभव एवं उसकी प्रशंसा करते हो कि परमेश्वर मानव की नियति का स्वामी है, तो तुम धीरे धीरे यह महसूस करने लगोगे कि आज मैं किसके विषय में बात कर रहा हूँ और इसके वास्तविक परिणाम क्या हैं। तुम्हारे पास सचमुच में हृदय एवं आत्मा है या नहीं तुम एक ऐसे व्यक्ति हो या नहीं जो सत्य से प्रेम करता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति एवं सत्य के प्रति किस प्रकार की मनोवृत्ति अपनाते हो। और स्वाभाविक रूप से, यह निर्धारित करता है कि तुम वाकई में परमेश्वर के अधिकार को जान एवं समझ सकते हो या नहीं। यदि तुमने अपने जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता एवं उसके इंतज़ामों का कभी भी आभास नहीं किया है, परमेश्वर के अधिकार को बिलकुल भी पहचाना एवं स्वीकारा नहीं है, तो उस मार्ग के कारण जिसे तुमने लिया है और उस चुनाव के कारण जो तुमने किया है, तुम पूरी तरह से निकम्मे हो जाओगे, तुम निःसन्देह परमेश्वर की घृणा एवं तिरस्कार के पात्र हो जाओगे। परन्तु ऐसे लोग जो, परमेश्वर के कार्य में, उसकी परीक्षाओं को स्वीकार कर सकते हैं, उसकी संप्रभुता को ग्रहण कर सकते हैं, उसके अधिकार के अधीन हो सकते हैं, और आहिस्ता आहिस्ता उसके वचनों का वास्तविक अनुभव हासिल कर सकते हैं, वे परमेश्वर के अधिकार के वास्तविक ज्ञान को, एवं उसकी संप्रभुता की वास्तविक समझ को अर्जित कर चुके होंगे, और वे सचमुच में सृष्टिकर्ता के अधीन हो गए होंगे। केवल इस प्रकार के लोगों को ही सचमुच में बचाया गया होगा। क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की संप्रभुता को जाना है, क्योंकि उन्होंने इसे स्वीकार किया है, तो मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य की उनकी समझ एवं उसके प्रति उनकी अधीनता वास्तविक एवं उचित है। जब वे मृत्यु को देखेंगे तो वे अय्यूब के समान इस योग्य होंगे कि उनके पास ऐसा मन है जो मृत्यु के द्वारा विचलित नहीं होता है, वे बिना किसी व्यक्तिगत चुनाव के साथ, एवं बिना किसी व्यक्तिगत इच्छा के साथसभी हालातों में परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों के अधीन रहते हैं। केवल ऐसा व्यक्ति ही एक वास्तविक सृजे गए मानव प्राणी के रूप में सृष्टिकर्ता की ओर लौटने के योग्य होगा।

26 मार्च 2015

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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