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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

परमेश्वर की पवित्रता (II)     भाग तीन

जहां तक परमेश्वर की पवित्रता का सवाल है, भले ही यह एक परिचित विषय हो, कुछ लोगों के लिए यह विचार-विमर्श में थोड़ा मुश्किल हो सकता है, और विषय वस्तु कुछ गहन हो सकती है। भूतकाल में लोग परमेश्वर की पवित्रता के विषय पर बहुत कम व्यवहार करते थे, इसलिए वे उसे नहीं समझते थे। परन्तु चिंता न करें, यह समझने में मैं तुम्हारी सहायता करूंगा कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है? मैं देखता हूं कि आपको यह ग्रहण करने में कुछ कठिन है, आइए पहले हम यह कहें: यदि आप किसी को जानना चाहते हैं तो केवल यह देखो कि वे क्या कहते हैं और उनके कार्यों का परिणाम क्या होता है, और उस व्यक्ति के तत्व को आप देखने के योग्य हो जाओगे। तो आइए, पहले हम इस दृष्टिकोण से परमेश्वर की पवित्रता को देखें। हमने कहा शैतान का तत्व बुरा और दुर्भावना पूर्ण है, इसलिए शैतान के कार्य निरंतर मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए किए गए। शैतान बुरा है इस कारण लोगों को बुरा बना दिया है, सही? क्या कोई कहेगा, "शैतान दुष्ट है, लेकिन जो इससे भ्रष्ट हुआ शायद वह पवित्र है?" क्या मज़ाक है, सही? क्या यह सम्भव है? (नहीं) इसलिए इसके बारे में इस प्रकार न सोचें, आइये हम इस बारे में इस पहलू से बात करें: शैतान बुरा है, यह उसका तत्व है और यह वास्तविक है, यह केवल ज़बानी बात नहीं है, हम शैतान पर अभियोग लाने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं, हम यहां सच और वास्तविकता और उसके आसपास के तथ्यों के बारे में संगति कर रहे हैं। यहां कुछ लोगों को या एक खास वर्ग को चोट पहुंच सकती है, परन्तु इसमें दुर्भावना की कोई मंशा नहीं है; आज शायद आप सुनकर थोड़ी असुविधा अनुभव करें, परन्तु जल्द कुछ दिन बाद जब आप उसे पहचानने के योग्य होंगे, तब आप अपने आपसे घ्रणा करोगे, और यह महसूस करोगे कि आज हमने जिसके विषय में बात की वह आपके लिए बहुत उपयोगी और मूल्यवान है।

शैतान का तत्व बुरा है, इसलिए शैतान के कार्यों का परिणाम बुरा होता ही है, या कम से कम बुरे से सम्बन्धित है, क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हां) तो शैतान कैसे लोगों को भ्रष्ट करता है? पहले हमें विशेषकर यह देखना है कि शैतान ने दुनिया में और लोगों में जो बुराई दिखती है, जो हम महसूस करते हैं, उसके बीज कैसे बोये; क्या आपने पहले इस पर विचार किया? आपने इस पर ज्यादा सोचा नहीं होगा, इसलिए मुझे उन मुख्य बिन्दुओं को सामने लाने दीजिए ताकि आप यह देख सकें कि शैतान कैसे मनुष्य को दूषित करता है। एक सिद्धांत है जो क्रमिक-विकास कहलाता है, हर कोई इसके विषय में जानता है, सही? क्रमिक-विकास और भौतिकवाद के विषय में लोगों ने अध्ययन किया है न? (हाँ) अतः शैतान ने मनुष्य को दूषित करने के लिए पहले ज्ञान का उपयोग किया, और फिर ज्ञान और रहस्यमयी बातें या चीज़ें जिनके विषय में मनुष्य खोज करना चाहते हैं, उनके विषय में मनुष्य की रूचि को उभारने के लिए विज्ञान का इस्तेमाल कियाः ऐसा कहा जा सकता है, कि शैतान ने मनुष्य को दूषित करने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग किया। मनुष्य को भ्रष्ट करने में दूसरी चीज़ उसने जो इस्तेमाल की वह है पारम्परिक संस्कृति और अंधविश्वास का उपयोग और उसके बाद उसने सामाजिक रीति-रिवाज का उपयोग किया। ये वे चीज़ें हैं जिनके संपर्क में लोग अपने दैनिक जीवन में आते हैं। और ये सभी उन चीज़ों से जुड़ी हैं जो लोगों के घनिष्ठ हैं, जो वे देखते हैं, जो वे सुनते हैं, जो स्पर्श करते हैं और जो वे अनुभव करते हैं। कह सकते हैं कि वे प्रत्येक को घेरे रहती हैं, इंसान उन्हीं में उलझा रहता है और उनसे पार नहीं पा सकता। मनुष्य जाति के पास इनसे अप्रभावित रहना, इनके नियंत्रण में न आना और इन सब चीज़ों के बंधन से बचे रहना सम्भव नहीं। इंसान में इतनी शक्ति नहीं कि वह उनसे दूर रह सके।

पहले हम ज्ञान के विषय में बात करेंगे। क्या प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान को सकारात्मक बात नहीं मानता? लोग, कम से कम ये तो सोचते ही हैं कि 'ज्ञान' शब्द का लक्ष्यार्थ नकारात्मक की अपेक्षा सकारात्मक है। तो हम क्यों कह रहे हैं कि शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करने में ज्ञान का उपयोग किया? क्या क्रमिक विकास का सिद्धांत ज्ञान का पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण का नियम ज्ञान का भाग है, सही? (हां) फिर शैतान ने ज्ञान को मनुष्य को भ्रष्ट करने में उपयोग में लाई जाने वाली साधन सूची में शामिल क्यों किया है? आपका इसमें क्या विचार है? क्या ज्ञान में लेश मात्र भी सच्चाई का अंश है? (नहीं) तब ज्ञान का तत्व क्या है? (यह सत्य के विरूद्ध जाता है।) किस आधार पर मनुष्य ज्ञान का अध्ययन करता है? क्या यह क्रमिक विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या यह ज्ञान नहीं है मनुष्य ने जिसका अनुसंधान किया, इस का योगफल, नास्तिकता पर आधारित है? (हां) इसलिए, क्या परमेश्वर का इस ज्ञान के साथ कोई सम्बन्ध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना के साथ जुड़ा हुआ है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा हुआ है? (नहीं) शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने में ज्ञान का कैसा उपयोग करता है? मैंने अभी यह कहा है कि इनमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना और सत्य से जुड़ा हुआ नहीं है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं: "हो सकता है इसका सच्चाई से कोई लेना-देना न हो, परन्तु यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता।" आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि लोगों की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों से क्या बनाया है? क्या कभी ज्ञान ने आपको यह सिखाया, कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथ में है? (हां) यह किस प्रकार की बात है? (यह बकवास है) ध्यान दें! यह बकवास है! विचार विमर्श के लिए ज्ञान एक जटिल विषय है। आप सरलता से यह कह सकते हैं कि ज्ञान का एक क्षेत्र ज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं है। यह ज्ञान का वह क्षेत्र है जो नास्तिकता के आधार पर और इस जानकारी की कमी के आधार पर है, कि परमेश्वर ने ही सब कुछ रचा है, सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो ऐसा नहीं मानते कि सब वस्तुओं पर परमेश्वर की प्रभुता है, वे नहीं मानते कि परमेश्वर ही हर चीज़ का प्रबंधन करता है। इसकी बजाय, वे ज्ञान के उस क्षेत्र में खोज करते हैं, अनुसंधान करते हैं उसका वैज्ञानिक उत्तर तलाश करते हैं। परन्तु यदि लोग ईश्वर पर विश्वास नहीं करते, इसके विपरीत शोध करते हैं, तो वे सही उत्तर नहीं पाएंगे, सही? ज्ञान आपको केवल जीवकोपार्जन ही देता है, यह केवल नौकरी देता है, वह केवल आमदनी देता है जिससे कि आप भूखे न मरें, पर वह परमेश्वर को जानने में आपकी सहायता कभी नहीं करेगा, यह कभी उस पर विश्वास करने में, उसकी आज्ञा मानने में आपकी मदद नहीं करेगा, और ज्ञान कभी भी आप को बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना ज्यादा आप ज्ञान का अध्ययन करोगे उतना ही आप परमेश्वर का विरोध करने, परमेश्वर पर शोध करने, परमेश्वर को परखने और परमेश्वर के विरूद्ध जाने की इच्छा करेंगे। अतः अब आप क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखाता है? यह सब कुछ शैतान का तत्व ज्ञान है। क्या शैतान का तत्वज्ञान और जीवित रहने के नियम जो भ्रष्ट मनुष्यों में पाए जाते हैं क्या उनका कोई सम्बन्ध सत्य से है? (नहीं)। उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है और वास्तव में वे सच के विपरीत हैं। लोग अक्सर कहते हैं, "जीवन गति है" यह कैसी बात है? (बकवास) लोग यह भी कहते हैं "मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, मनुष्य जब एक बार का भोजन चूक जाता है, तो भूख का अनुभव करता है" यह क्या है? (बकवास, शैतान के शब्द) यह उससे भी बद्तर छलावा है और यह सुनने में घृणित है। तो ज्ञान एक ऐसी चीज़ है जिसके बारे में शायद हर कोई जानता है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में शैतान ने अपने जीवन के तत्व ज्ञान और अपनी सोच का कितना रंग मिला दिया है, और जब शैतान यह करता है तब शैतान मनुष्य को उसकी सोच, तत्व ज्ञान, और दृष्टिकोण लेने की अनुमति देता है जिससे मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को इंकार सके, सब वस्तुओं पर परमेश्वर की प्रभुता और मनुष्य के भाग्य पर प्रभुत्व को नकार सके। तो जैसे-जैसे मनुष्य का अध्ययन प्रगति करता है उसका परमेश्वर के अस्तित्व में होने का एहसास धुंधला होता जाता है, जब वह और ज्ञान प्राप्त करता है, और मनुष्य यह भी सोच सकता कि परमेश्वर का अस्तित्व है ही नहीं, क्योंकि शैतान ने अपना दृष्टिकोण, अवधारणा और विचार मनुष्य के दिमाग में भर दिए हैं। जैसे ही शैतान ये विचार मनुष्य के दिमाग में भर देता है, तो क्या मनुष्य इसके द्वारा दूषित नहीं हो जाते? (हां) अब मनुष्य का जीवन किस पर आधारित है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर आधारित है? नहीं; मनुष्य अपना जीवन शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोण और तत्व ज्ञान पर आधारित है जो कि इस ज्ञान में छिपा हुआ है। यह वह सिरा है जहां मनुष्य में शैतान के भ्रष्टाचार का सार घटित होता है। यही शैतान का लक्ष्य और विधि है जिससे वह मनुष्य को दूषित करने के लिए करता है।

(अ) शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए किस प्रकार से ज्ञान का उपयोग करता है।

पहले हम इस विषय के सबसे सामान्य पहलू पर बात करेंगे। जब आप कक्षा में चीनी भाषा का पाठ पढ़ रहे थे, क्या भाषा और लिखावट लोगों को भ्रष्ट करने लायक थी, वे नहीं हो सकती हैं। क्या शब्द लोगों को दूषित कर सकते हैं? (नहीं)। शब्द लोगों को दूषित नहीं कर सकते हैं। वे एक माध्यम हैं जो लोगों को बोलने की अनुमति देते हैं और एक उपकरण है जिससे लोग परमेश्वर के साथ संवाद करते हैं। इसके अलावा भाषा और शब्द के ज़रिये अब परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है, वे साधन हैं, वे एक जरूरत हैं। एक और एक दो होते हैं, यह ज्ञान है, सही? दो और दो का गुणा चार होते हैं, यह ज्ञान है, सही? पर क्या यह आपको दूषित कर सकता है? यह एक सामान्य ज्ञान और नियम है इसलिए यह लोगों को दूषित नहीं कर सकता है। तो कैसा ज्ञान लोगों को दूषित करता है? वह ज्ञान जिसमें शैतान के दृष्टिकोण और विचार का मेल हो। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को मानवता में ज्ञान द्वारा प्रविष्ट करने के अवसर की ताक में रहता है। उदाहरण के लिए, एक निबंध में लिखित शब्दों में कुछ गलत है? (नहीं) तो फिर समस्या कहां होगी? लेखक का दृष्टिकोण और नीयत जब वह लिख रहा था तथा उस निबंध में उसके विचारों का तत्व - ये आत्मिक बातें हैं - और लोगों को दूषित करने के योग्य हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप टेलीविज़न पर शो देख रहे हैं, किस प्रकार की बातें आपके दृष्टिकोण को बदल सकती हैं? प्रस्तुतकर्ता ने क्या कहा, क्या शब्द स्वयं दूषित करने योग्य हो सकते हैं? (नहीं) कैसी बातें लोगों को दूषित करेंगी? यह शो के विचार और विषय-वस्तु होगी जो निर्देशक के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं या उन दृष्टिकोणों के द्वारा वे सूचनाएं जो लोगों तक पहुंची, जिन्होंने लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित किया, क्या यह सही है? (हां) क्या आप समझ रहे हैं कि मैं अपनी इस चर्चा में क्या इशारा कर रहा हूं कि कैसे शैतान ज्ञान का उपयोग लोगों को दूषित करने के लिए करता है? (हां, हम जानते हैं) आप गलत नहीं समझेंगे, सही? तो जब आप एक उपन्यास या निबंध दोबारा पढ़ते हैं, तो क्या आप मूल्यांकन कर सकते हैं कि निबंध में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को दूषित कर रहे हैं या मानवता की सेवा कर रहे हैं? (हम ऐसा थोड़ा सा ही कर सकते हैं।) यह वह है जहां एक धीमी गति से अध्ययन और अनुभव किया जाना चाहिए, यह कोई ऐसी बात नहीं है जो एकदम से समझी जाए। उदाहरण के लिए, जब ज्ञान के एक क्षेत्र में अध्ययन और शोध करते समय, उसे क्षेत्र को और लोगों को जो नकारना चाहिए उसे समझने में सहायक हो सकते हैं, और लोगों को क्या नकारना चाहिए। उदाहरण के लिए "विद्युत" को लीजिए, यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, सही? आप अनभिज्ञ रहोगे यदि आप यह नहीं जानते कि बिजली लोगों को झटका दे सकती है, सही? पर यदि एक बार आप ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ जाते हैं, तब आप बिजली की कोई चीज़ छूने में असावधानी नहीं बरतेंगे और आप विद्युत का उपयोग कैसे करें, यह भी जानेंगे। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं। क्या अब आप को स्पष्ट हुआ कि किस विषय में बात कर रहे हैं? ज्ञान कैसे लोगों को भ्रष्ट करता है? (हां, स्पष्ट हो गया) यदि आप समझ गये तो फिर हम इस के विषय में आगे बात करना जारी नहीं रखेंगे क्योंकि दुनिया में ज्ञान के कई प्रकारों का अध्ययन किया गया है और आपको स्वयं उनका अंतर करने में अपना समय देना चाहिए।

(ब) मनुष्य को भ्रष्ट करने में शैतान विज्ञान का कैसे उपयोग करता है

विज्ञान क्या है? क्या विज्ञान ने प्रत्येक के दिमाग में बड़ी प्रतिष्ठा और गहरा प्रभाव नहीं डाल रखा है? (हां, ऐसा है) जब विज्ञान की चर्चा की जाये तो क्या लोग महसूस नहीं करते, "यह कुछ ऐसी बात है जो आमतौर पर लोग नहीं ग्रहण कर पाते, यह एक ऐसा विषय है जिसे केवल कुछ वैज्ञानिक शोधकर्ता या माहिर ही छू सकते हैं, इसका सामान्य जनता से कोई सम्बन्ध नहीं है?" क्या इनका कोई सम्बन्ध है भी? (हां) शैतान लोगों को दूषित करने के लिये किस प्रकार विज्ञान को उपयोग में लाता है? हम अन्य चीजों के विषय में बात नहीं करेंगे केवल उन बातों की चर्चा करेंगे लोग अपने जीवन में लगातार जिनका सामना करते रहते हैं। क्या आपने वंशाणुओं की उत्पत्ति के विषय में सुना है? (हां) आप सब इस शब्द से परिचित हैं, सही? क्या वंशाणु विज्ञान द्वारा खोजे गए थे? वास्तव में वंशाणु लोगों के लिए क्या मायने रखते हैं? क्या यह लोगों को यह महसूस नहीं कराता कि शरीर एक रहस्यमयी वस्तु है? जब लोगों को इस विषय से परिचित कराया जाता है, तो क्या वहां ऐसे लोग न होंगे - विशेषकर जिज्ञासु, जो और अधिक जानना चाहते हैं या और विवरण चाहते हैं? जिज्ञासु लोग अपनी शक्ति इस विषय पर लगाएंगे और जब वे फुरसत में होंगे, वे और अधिक जानकारी के लिये पुस्तकें और इंटरनेट खोजेंगे। विज्ञान क्या है? स्पष्ट भाषा में, विज्ञान उस चीज़ों के विचार और सिद्धांत हैं जिनके विषय में मनुष्य जिज्ञासु है, बातें जो अज्ञात हैं, और परमेश्वर द्वारा उन्हें नहीं बताई गईं हैं; विज्ञान उन रहस्यों को जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है, का विचार और सिद्धांत है। आपको क्या लगता है, विज्ञान का दायरा कितना है? आप यह कह सकते हैं कि विज्ञान सब चीज़ों को संक्षेप में संग्रहित करता है, परन्तु मनुष्य कैसे विज्ञान का कार्य करता है? क्या यह शोध के द्वारा होता है? इसमें इन बातों का विवरण और नियमों पर शोध शामिल है और तब इन संदिग्ध, अनिश्चित सिद्धांतों को एकत्रित करके लाना कि प्रत्येक उनके बारे में क्या सोचते हैं, "ये वैज्ञानिक सचमुच कमाल के होते हैं। वे इन चीज़ों के बारे में बहुत जानते और समझते हैं!" उन लोगों के लिए उनके पास काफी सराहना होती है, सही? जो लोग विज्ञान की खोज करते हैं, वे किस प्रकार का दृष्टिकोण रखते हैं? क्या वे ब्रह्माण्ड पर शोध नहीं करना चाहते, अपनी रूचि के क्षेत्र में रहस्यमयी बातों पर शोध नहीं करना चाह्ते? और अंत में इसका परिणाम क्या आता है? कुछ विज्ञानों में लोगों ने अनुमान के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाला, अन्य विज्ञानों में लोगों ने अपने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए निष्कर्ष निकाले; और विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में लोगों ने अपने निष्कर्ष अनुभव या इतिहास और उनकी पृष्ठभूमि के अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकाले। क्या यह सही है? (हां) तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान यह करता है कि वह मनुष्यों को इस भौतिक जगत में चीजों को देखने और मनुष्य की उत्कंठा मात्र को सन्तुष्ट करता है; वह मनुष्य को उन नियमों को जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुता करता है, देखने की अनुमति नहीं देता। मनुष्य विज्ञान के द्वारा उत्तर पाने की चेष्टा करता प्रतीत होता है, परन्तु ये उत्तर उलझन और अस्थायी संतुष्टि देते हैं, एक ऐसी संतुष्टि जो मनुष्य के मन को केवल इस भौतिक संसार में सीमित रखती है। मनुष्य सोचता है कि विज्ञान ने हर चीज़ का उत्तर पहले ही दे दिया है, तो जो भी मामला उठ खड़ा हो वे उसे मानने या अस्वीकृत करने के लिये अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर ही अटल विश्वास रखते हैं। मनुष्य का हृदय इस हद तक विज्ञान का गुलाम हो जाता है कि उसकी मानसिक स्थिति ऐसी रहती ही नहीं कि वह परमेश्वर को जानें, उसकी उपासना करे, और यह विश्वास करे कि सब वस्तुएं परमेश्वर की ही ओर से आती हैं, और उसी से उत्तर पाने के लिए उसकी ओर निहारें। क्या यह सच नहीं है? आप देख सकते हैं कि मनुष्य जितना विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतना ही वे विवेकशून्य हो जाते हैं और यह विश्वास करते हैं कि हर एक बात का एक वैज्ञानिक हल है, और शोध हर बात को हल कर सकती है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और यह भी विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है, यहां तक कि कुछ लोग जो कई सालों से परमेश्वर को मान रहे थे, सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज में लग जाएंगे या उत्तर पाने के लिए जानकारी की खोजबीन करेंगे। ऐसे लोग चीज़ों को सच्चाई के नज़रिये से नहीं देखते और अधिकांश मामलों में ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान के भरोसे या वैज्ञानिक उत्तर से समस्या का हल पाना चाहते हैं। परन्तु वे न तो परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, न परमेश्वर की खोज करते हैं। क्या ऐसे लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं)। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर पर उसी तरह से शोध करना चाहते हैं जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म विशेषज्ञ उस स्थान पर गए जहां प्रलय के बाद जहाज़ टिका था। उन्होंने जहाज़ को देखा, परन्तु जहाज के दिखाई देने में उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखा। उन्होंने केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास किया। यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। यदि आप भौतिक वस्तु पर ही शोध करेंगे तो चाहे वे सूक्ष्म जीव विज्ञान हो, खगोलशास्त्र या भूगोल हो, आप कभी भी वह परिणाम नहीं पाएंगे जो कहता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या वह सब वस्तुओं पर प्रभुता रखता है। क्या यह सही है? (हां) इसलिए विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर का अध्ययन करने की अनुमति नहीं देता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व में संदेह पैदा नहीं करता है? (हां) तो शैतान मनुष्य को दूषित करने के लिये किस प्रकार विज्ञान का उपयोग करता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाशून्य कर देने के लिये वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग करता है? शैतान लोगों के दिलों पर आधिपत्य करने के लिये भ्रामक उत्तरों का उपयोग करता है ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज न करें। इस प्रकार वे प्रभु के विषय में संदेह करते रहेंगे, उससे इंकार करते रहेंगे और उससे दूरी बना लेंगे। इसलिए हम कहते हैं कि यह उन तरीकों में से एक है जिससे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नवीनतम कथन

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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