वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

परमेश्वर की पवित्रता (II)     भाग चार

(इ) शैतान सामाजिक चलन को मनुष्य को दूषित करने के लिए कैसे उपयोग करता है।

क्या सामाजिक चलन एक नई घटना है? (नहीं) तो फिर वे कब प्रारम्भ हुए? क्या यह कहा जा सकता है कि जब से शैतान ने मनुष्य को दूषित करना आरंभ किया तभी से सामाजिक चलन शुरु हुआ? (हां) सामाजिक चलन में क्या शामिल है? (कपड़ों की शैली और श्रृंगार) यह ऐसी कुछ चीज़ें हैं जिनसे लोगों का अक्सर सामना होता है। कपड़ों की शैली, फैशन, चलन यह एक छोटा पहलू है। क्या और भी कुछ है? क्या वह कहावत भी कुछ मायने रखती है जिसकी लोग अक्सर चर्चा करते हैं? क्या वह जीवनशैली भी मायने रखती है जिसकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत सितारे, विख्यात लोग, पत्रिकाएं और उपन्यास जिन्हें लोग पसंद करते हैं मायने रखती हैं? (हां) आपके विचार में इस चलन का कौन सा पहलू लोगों को दूषित करने के योग्य है? इन चलनों में से कौन सा आपके लिए बहुत मोहक है? कुछ लोग कहते हैं कि हम इतनी उम्र में पहुंच गए है। हम चालीस, पचास, साठ, सत्तर या अस्सी के हैं अब हम इस चलन में कहां जमते हैं और अब उन चीज़ों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। क्या यह सही है? (नहीं) दूसरे कहते हैं कि हम विख्यात लोगों के पीछे नहीं भागते, यह सबकुछ किशोरों और नौजवानों के लिए है; हम फैशनवाले कपड़े भी नहीं पहनते, यह उन लोगों के लिये है जो अपनी छवि को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। तो फिर इन में से कौन मनुष्य को दूषित करने के योग्य है? (मशहूर कहावत) क्या ये कहावतें लोगों को दूषित कर सकती हैं? मैं आपको एक बताता हूं आप देखिये कि यह लोगों को दूषित करती है या नहीं, "दाम संवारे सारे काम।" क्या यह चलन है? क्या यह चीज़ उस फैशन और स्वादिष्ट भोजन के चलन से भी ज़्यादा खराब नहीं है जिसका ज़िक्र आप कर चुके हैं? (हां।) "दाम संवारे सारे काम।" यह शैतान की विचारधारा है और यह हर मानव समाज के प्रचलन में है। आप कह सकते हैं कि यह एक चलन है क्योंकि यह प्रत्येक के अंदर डाला गया और अब उनके हृदय में पैठ गया है। लोगों ने आरंभ में इसे स्वीकार नहीं किया लेकिन फिर धीरे-धीरे इसके आदी होते चले गये और जब उनका वास्तविक जीवन से सम्पर्क हुआ, तब उन्होंने धीरे-धीरे इसे मौन सहमति दे दी, उसके अस्तित्व को माना और आखिरकार अपनी सहमति की भी मुहर लगा दी। क्या यह सही है? (हां) क्या यही तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को बर्बाद कर रहा है? शायद आप जो यहां बैठे हैं इस कहावत को उस परिमाण में नहीं समझते, लेकिन इस कहावत को देखने और समझने का प्रत्येक का अपना नज़रिया है, जो इस बात पर निर्भर है कि उनके आसपास किस प्रकार की चीज़े घटित हुई हैं और इस विषय में उनका अपना अनुभव क्या कहता है, सही है न? चाहे इस कहावत से किसी का कितना ही अनुभव रहा हो, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? (लोग सोचेंगे कि पैसा कुछ भी कर सकता है और वे पैसे का आदर करेंगे।) इस संसार में इंसानी स्वभाव के ज़रिये, इसमें यहां बैठे लोग भी शामिल हैं, लोगों की कुछ चीज़ें प्रकट होती हैं। इसकी व्याख्या कैसे की जायेगी? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के दिल में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा जान पड़ता है कि शैतान का मनुष्य को दूषित करना सचमुच व्यापक है। क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हां) तो जब शैतान मनुष्य को इस चलन के ज़रिये दूषित कर लेता है, यह चीज़ उनमें कैसे अभिव्यक्त होती है? क्या आपको नहीं लगता कि बिना पैसे के इस दुनिया में आप एक दिन भी जीवित नहीं रह सकते, एक दिन भी असम्भव होगा? (हां) लोगों की हैसियत और सम्मान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास कितना पैसा है, गरीब की कमर शर्म से झुकी हुई है जबकि धनी अपने उच्च स्तर का मजा लेते रहते हैं। वे ऊंचे पर घमंड से खड़े होकर, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और चलन लोगों को क्या देते हैं? क्या बहुत से लोग पैसा पाने को ही सबकुछ नहीं समझते? क्या बहुत से लोग और पैसा कमाने के पीछे अपनी प्रतिष्ठा और ईमानदारी का बलिदान नहीं कर देते? क्या और बहुत से लोग अपने काम को अंजाम देने और परमेश्वर को खोजने का अवसर पैसे के लिए नहीं खो देते हैं? क्या यह लोगों के लिए हानि नहीं है? (हां) क्या यह शैतान का अशुभ कार्य नहीं है कि इस तरीके से कहावत के उपयोग से मनुष्य को इस हद तक दूषित करे? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे आप इस कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः उसे सच स्वीकार करने तक बहते जाते हैं, आपका दिल पूरी तरह से शैतान की गिरफ्त में आ जाता है, और इस तरह आप अनजाने में उसी के साथ जीने लगते हैं। इस कहावत ने आप पर किस हद तक असर डाला है? हो सकता है कि आप सच्चा मार्ग जानते हों, हो सकता है आप सत्य को जानते हों, परन्तु आपमें इतनी शक्ति नहीं कि आप उसका पालन कर सको। हो सकता है आप परमेश्वर के वचन को स्पष्टता से जानते हैं, पर आप कीमत चुकाने को तैयार नहीं, कीमत चुकाने के लिये दुख उठाने को तैयार नहीं। बल्कि अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध जाने के लिये आप अपना भविष्य और नियति त्यागने को भी तैयार हो जाएँगे। परमेश्वर क्या कहता है इससे कोई मतलब नहीं, परमेश्वर क्या करता है, उससे कोई सरोकार नहीं, भले ही आपको इसका कितना भी अहसास हो कि परमेश्वर आपसे कितना गहरा और महान प्रेम करता है, आप अपने ही रास्ते चलते रहेंगे और इस कहावत की कीमत चुकाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह कहावत पहले से ही आप के विचारों और व्यवहारों पर नियंत्रण करती है और आप अपना भाग्य भी इसी कहावत से नियंत्रित कराते हैं और इस कहावत के लिए आप सब कुछ त्याग सकते हैं। लोग ऐसा करते हैं, वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं और इस के द्वारा चलाए जाते हैं। क्या यह शैतान का मनुष्यों को दूषित करने का प्रभाव नहीं है? क्या यह शैतान की अवधारणा और दूषित स्वभाव आपके हृदय में जड़ नहीं पकड‌ते जा रहे हैं? यदि आप ऐसा करते हैं, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हां) क्या आप देख सकते हैं कि शैतान ने मनुष्य को किस तरह से दूषित किया है? (नहीं) आपने यह नहीं देखा। क्या आप इसे महसूस कर सकते हैं? (नहीं) आपने इसे महसूस नहीं किया। क्या आप यहां शैतान की बुराई देखते हैं (हां) शैतान हर समय और हर जगह मनुष्यों को दूषित करता है। शैतान मनुष्य के लिए अपना विरोध करना, असम्भव बना देता है और इसके लिए मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान आपसे अपने विचार, अपने दृष्टिकोण, और उनसे जो बुरी बातें आती हैं, इन परिस्थितियों में जहां आप अज्ञानता में हैं, और जब आपको यह भी मालूम नहीं है कि आपके साथ क्या हो रहा है, उन्हें स्वीकार करवाता है। लोग बिना किसी अपवाद के इन बातों को पूरी तरह ग्रहण करते हैं। वे खुश होते हैं और उन बातों को धरोहर की तरह रखते हैं, वे उन चालाकियों में आ जाते हैं और उनके हाथों में खिलौनों की तरह खेलते हैं। और इस प्रकार शैतान का मनुष्य को दूषित करना और गहरा होता जाता है।

पूर्व में उल्लेखित वे तरीके, जो शैतान लोगों को दूषित करने के लिए उपयोग करता है, प्रत्यक्ष है और प्रत्येक ने उनका अनुभव किया है; शैतान उनका उपयोग करता है और उनसे बचना सम्भव नहीं। मनुष्य के पास ज्ञान और कुछ वैज्ञानिक सिद्धांत हैं, मनुष्य पारम्परिक संस्कृति के प्रभाव में जीता है, और प्रत्येक पारम्परिक संस्कृति का वारिस है। मनुष्य शैतान के द्वारा दी गई पारम्परिक संस्कृति को पालन करने के लिए बाध्य है, और इसके साथ ही उन सामाजिक रीति-रिवाज़ के साथ सामंजस्य बैठाकर कार्य करने के लिये बाध्य है जो शैतान ने मनुष्यों को उपलब्ध कराये हैं। शैतान से अभिन्न होने के बावजूद, जो कुछ शैतान हर समय करता है उसमें सहयोग देना, उसकी धूर्तता, हठ, दुर्भावना और बुराई को स्वीकारना - शैतान के इन स्वभावों को आत्मसात करने के बाद - क्या मनुष्यों के बीच में और संसार में रहते हुए मनुष्य खुश है या दुखी? (दुखी) आप ऐसा क्यों कहेंगे? (वह इन बातों से बंधा हुआ है और उसका जीवन एक कड़वा संघर्ष है।) है न? हो सकता है आपने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा हो जो चश्मा लगाए हुए है और दिखने में बहुत बुद्धिमान लगता हो; वह कभी चिल्लाता न हो, हमेशा बोलने में निपुण, बुद्धि सम्पन्न हो, और इसके अलावा, क्योंकि वह बहुत आयु का है, हर तरह के हालत से होकर गुजरा होगा और बहुत अनुभवी भी होगा, हो सकता है कि वह किसी भी मामले में, चाहे छोटा हो या बड़ा, विस्तार और अधिकार से बोल सकता हो, और जो कहता हो उसका उसके पास मजबूत आधार हो, हर बात की प्रमाणिकता और तर्क के लिये उसके पास सिद्धांत भी हों; लोग उसका व्यवहार, व्यक्तित्व, उसका आचरण, उसकी निष्ठा और उसका चरित्र देखकर सोचते हों कि उस व्यक्ति में तो कोई दोष नहीं है। ऐसे व्यक्ति मौजूदा सामाजिक रीतियों का विशेष ध्यान रखते हैं और कभी पुराने ढंग में नहीं देखे जाते; ऐसे व्यक्ति अग्रगण्य और आधुनिक शैली के होते हैं। ऐसा व्यक्ति वृद्ध होते हुये भी वक्त के साथ कदम मिलाकर चलता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। ऊपर से देखने पर ऐसे व्यक्ति में कोई दोष दिखाई नहीं देते, लेकिन अंदर से ऐसा व्यक्ति शैतान के द्वारा पूरी तरह से दूषित हो चुका होता है। ऊपर से कुछ भी गलत नहीं है, वह विनम्र है, सुसंस्कृत है, ज्ञानवान है और एक खास नैतिकता रखता है, वह निष्ठावान है और नौजवानों जितनी ही जानकारी रखता है। फिर भी, उसके स्वभाव और उसके तत्व के सम्बन्ध में, यह व्यक्ति शैतान का पूर्ण और जीवित नमूना है। वह शैतान का रूप और छवि है। यह शैतान के मनुष्य को दूषित करने का "फल" है। मैंने जो कहा हो सकता है कि वह आपके लिए दुखदायी हो, परन्तु यह सब सच है। जिस ज्ञान का मनुष्य अध्ययन करता है, जो विज्ञान वह समझता है और सामाजिक रीति में ठीक से व्यवस्थित होने के लिए वह जिस राह पर वह चलता है, बेशक ये शैतान के द्वारा दूषित करने वाले औजार हैं। यह बिल्कुल सच है। इसलिए मनुष्य एक दूषित स्वभाव में जीता है जो कि शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया गया है और मनुष्य के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है या परमेश्वर का तत्व क्या है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान मनुष्यों को जिस तरीके से दूषित करता है, उसमें ऊपरी सतह पर कोई दोष नहीं ढूंढ सकता, किसी के व्यवहार द्वारा कोई यह नहीं बता सकता कि उसमें कुछ कमी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य पर सामान्य तौर पर जाता है और सामान्य जीवन जीता है, वह सामान्य तौर से पुस्तकें और समाचार पत्र पढता है, सामान्य तौर पर अध्ययन करता और बोलता है, कुछ लोगों ने तो यहां तक सीख लिया है कि नैतिकता का मुखौटा कैसे पहनें, जिससे उनके अभिवादन नम्र हों, शिष्ट बनें, दूसरों को समझने वाले बनें, मित्रवत बनें, दूसरों के मददगार बनें, दानशील बनें, और दूसरों के साथ हड़बड़ी करने वाला बनने से बचें और दूसरों का फायदा उठाने से बचें। जबकि उनके मन का दूषित शैतानी स्वभाव उनमें गहरी जड़ पकड़ चुका है। यह तत्व बाहरी प्रयासों से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर के तत्व के कारण मनुष्य परमेश्वर की पवित्रता को समझ नहीं सकता, इस के बावजूद कि परमेश्वर की पवित्रता का तत्व मनुष्य के लिए सार्वजनिक कर दिया गया है, मनुष्य इसे गम्भीरता से नहीं लेता। ऐसा इसलिए है कि शैतान ने पहले से ही मनुष्य के एहसास, विचार, दृष्टिकोण और चिंतन को विभिन्न साधनों से अपने कब्जे में कर लिया है। यह कब्जा और भ्रष्टता अस्थायी या प्रासंगिक नहीं है; यह हर जगह और हर समय विद्यमान है। इसलिए बहुत से लोग जो 3 या 4 साल से या 5 या 6 साल से परमेश्वर पर विश्वास करते चले आ रहे हैं, वे अभी भी उन विचारों और दृष्टिकोण को, जो शैतान ने उनमें बैठा दिए हैं, ऐसे पकड़े हुए हैं जैसे कि कोई खज़ाना हो। क्योंकि मनुष्य ने बुरे, अहंकारी और शैतान के द्रोही स्वभाव को स्वीकार कर लिया है, और इस तरह मनुष्य अक्सर आपसी रिश्तों के अंतर्द्वंद्व में फंस जाता है, तर्क-वितर्क और असामंजस्यता की स्थिति में उलझ जाता है, और यह सब परिणाम है शैतान के अहंकारी स्वभाव का। यदि शैतान ने मानवजाति को सकारात्मक बातें दी होतीं - उदाहरण के लिए यदि मनुष्य द्वारा स्वीकृत पारम्परिक संस्कृति के कंफ्यूशीवाद और ताओवाद को अच्छा माना जाता तो उन्हें स्वीकार करने के बाद उसी प्रकार की मानसिकता वाले व्यक्तियों को आपस में मिलजुलकर रहना चाहिये था। जिन्होंने उन वादों को स्वीकार कर लिया था तो उनके बीच इतना विभाजन क्यों है? क्यों है ऐसा? यह इसलिए हुआ है क्योंकि ये बातें शैतान द्वारा दी गई हैं और शैतान लोगों में विभाजन उत्पन्न करता है। शैतान जो बातें देता है, वे धरातल पर कितनी भी प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण दिखाई पड़ें, पर कोई मतलब नहीं, वे मनुष्यों के जीवन में केवल घमण्ड़ और शैतान के बुरे स्वभाव की धूर्तता के अलावा और कुछ नहीं लातीं। क्या यह सही नहीं है? कुछ लोग जो अपने आप को छद्मरूप दे सकते हैं, ज्ञान का भंडार रखते हैं, जिनकी अच्छी परवरिश हुई है, उनके लिये अपने शैतानी स्वभाव को छुपा पाना बहुत कठिन होगा। कोई व्यक्ति अपने आपको कितना भी छिपाए, भले ही आप उसे संत समझें, या आप सोचें कि वह आदर्श व्यक्ति है, या आप सोचें कि वह फरिश्ता है, आप उसे कितना ही शुद्ध क्यों न मानें, उनका जीवन पर्दे के पीछे क्या होगा? उनके स्वभाव के प्रकाशन में आप किस तत्व को देखोगे? बिना किसी शक के आप शैतान का बुरा स्वभाव देखेंगे। क्या कोई ऐसा कह सकता है? (हां) उदाहरण के लिए ऐसा कोई व्यक्ति जो आप के निकट है जिसे आप सोचते हैं कि वह अच्छा व्यक्ति है, या आपका विचार उसके लिए अच्छा व्यक्ति होने का है, जिसे आप एक आदर्श व्यक्ति मानते हैं। अपनी वर्तमान हैसियत में आपके उसके बारे में क्या विचार हैं? पहले, आप यह देखोगे कि इस प्रकार के व्यक्ति में मानवता है या नहीं, क्या वे ईमानदार हैं, क्या उन्हें लोगों से सच्चा प्यार है, क्या उनके वचन और काम लाभप्रद हैं और दूसरों की मदद करते हैं। (नहीं) दिखावे की दयालुता, प्रेम या अच्छाई यहां प्रदर्शित होती है, आखिर यह है क्या? यह सब कुछ छलावा है, झूठ है। यह परदे के पीछे मुखौटे का एक गुप्त बुरा उद्देश्य है, उस व्यक्ति को प्रिय और पूजित बनाना है। क्या आप इसे स्पष्टता से देखते हैं? (हां)

जो विधियां शैतान लोगों को दूषित करने के लिए उपयोग में लाता है क्या वह मनुष्यता लाती हैं? क्या इसके विषय में कुछ भी सकारात्मक है? (नहीं) पहली बात, क्या मनुष्य अच्छे और बुरे में अंतर कर सकता है? (नहीं) देखिये, इस संसार में चाहे कोई बड़ा व्यक्ति हो, या कोई समाचार पत्र हो, या कोई रेडियो स्टेशन हो, वे सब यही कहते हैं कि यह या वह अच्छा या बुरा है, क्या वह सटीक है? (नहीं) क्या वह सही है? (नहीं) क्या घटनाओं और लोगों के बारे में उनका आकलन उचित है? (नहीं)। क्या इसमें कोई सच्चाई है? (नहीं) क्या यह संसार या मानवता, सकारात्मक और नकारात्मक बातों का आकलन सत्य के मानक के आधार पर करते हैं? (नहीं)। लोगों में वह योग्यता क्यों नहीं है? लोगों ने ज्ञान का इतना अधिक अध्ययन किया और विज्ञान के विषय में इतना जाना, तो क्या उनकी योग्यताएं इतनी महान नहीं हैं? वे सकारात्मक और नकारात्मक बातों में अंतर क्यों नहीं कर पाते? ऐसा क्यों है? (क्योंकि लोगों में सच्चाई नहीं है, विज्ञान और ज्ञान सत्य नहीं हैं।) प्रत्येक वस्तु जो शैतान मानवता के लिए लाता है उसमें बुराई और भ्रष्टाचार है, और उसमें सच, जीवन और सन्मार्ग का अभाव होता है। मनुष्य के लिये बुराई और भ्रष्टाचार लाने वाले शैतान क्या प्रेम हो सकता है? क्या आप कह सकते हैं कि मनुष्य के पास प्रेम है? कुछ लोग कह सकते हैं: "आप गलत हैं, इस सारे संसार में बहुत से लोग हैं जो गरीब और बेघर लोगों की मदद करते हैं, क्या वे अच्छे लोग नहीं हैं? कई धर्मार्थ संगठन भी हैं जो भले कार्य करते हैं, क्या उनके सब काम लोगों के भले के लिए नहीं हैं?" तो फिर इसके विषय में हम क्या कहें? शैतान मनुष्य को दूषित करने के लिए बहुत-सी अलग-अलग विधियों और सिद्धांतों का उपयोग करता है; क्या यह मनुष्य का दूषित होना अस्पष्ट धारणा है? नहीं यह अस्पष्ट नहीं है। शैतान कुछ व्यवहारिक बातें भी करता है जिनमें बहुत-सी बुरी बातों को ऐसा प्रस्तुत करता है जैसे अच्छी बात हो, और तो और, शैतान धोखेबाजी के कार्य भी, अपने निहित भाव और उद्देश्य के लिए करता है। दूषित लोग और शैतान एक जैसे हैं, वे भी इस संसार में हैं और समाज में एक दृष्टिकोण या सिद्धांत को बढ़ावा देते हैं। प्रत्येक राजवंश और प्रत्येक युग में वे एक सिद्धांत को बढ़ावा देते और मनुष्यों के भीतर कुछ विचार संस्थापित करते हैं। ये विचार और सिद्धांत धीरे-धीरे लोगों के दिमाग में जड़ पकड़ लेते हैं, और तब मनुष्य उन विचारों और सिद्धांतों के साथ जीना प्रारम्भ कर देते हैं; क्या वे अज्ञानतावश शैतान नहीं बन जाते हैं? क्या लोग शैतान के साथ एकाकार नहीं हो गये हैं? जब लोग शैतान के साथ एक हो जाते हैं, तब अंत में उनका व्यवहार परमेश्वर के प्रति क्या होता है, क्या वही आचरण नहीं हो जाता जो शैतान का परमेश्वर के प्रति है? कोई भी इसे मानने का साहस नहीं कर सकता, सही है न? यह बहुत भयानक है। मनुष्य शैतान हैं, और उनका स्वभाव ठीक शैतान के स्वभाव जैसा ही है। मैं क्यों कहता हूं कि शैतान का स्वभाव बुरा है? जो शैतान ने किया और जो बातें शैतान ने प्रकाशित की हैं, उनके आधार पर इसका निर्धारण और विश्लेषण किया गया है; यह कहना गलत नहीं होगा कि शैतान दुष्ट है| अगर मैं कहूं शैतान बुरा है, तो आप क्या सोचेंगे? आप सोचेंगे, "सही बात है, शैतान बुरा है।" फिर मैं आप से पूछूंगाः "शैतान का कौनसा पहलू बुरा है?" यदि आप कहें: "शैतान का परमेश्वर का विरोध करना बुरा है" आप अभी भी सफाई के साथ नहीं बोल रहे होंगे। अब हमने इस प्रकार से सुनिश्चित वर्णन किया; क्या आपको शैतान की बुराई के सार के विशिष्ट अंशों की समझ है? (हां) अब जबकि आप को शैतान के बुरे स्वभाव की समझ आ गई है, तो अपने स्वयं के बारे में आप कितना समझते हैं? क्या ये बातें जुड़ी हुई हैं? (हां) क्या यह जुड़ना आपको दुख देता है? (नहीं) क्या यह आपके लिए सहायक है? (हां) यह कितना सहायक है? (बहुत सहायक है) आइए सुस्पष्टता से बात करें, मैं अस्पष्ट शब्द नहीं सुनूंगा। यह "बहुत बड़ा" का क्या अभिप्राय है? (हम जानते हैं कि परमेश्वर किन बातों से घृणा करता है, कौन सी बातें परमेश्वर के विरोध में जाती हैं; हमारे दिल उन बातों को लेकर कुछ कुछ साफ हैं।) क्या और कुछ भी इसमें जोड़ने के लिए है? जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के तत्व के विषय में संगति करता हूं तो क्या यह भी आवश्यक है कि मैं शैतान की बुराई के तत्व के बारे में भी संगति करूं? आपकी क्या राय है? (हां यह आवश्यक है) क्यों? (शैतान की बुराई परमेश्वर की पवित्रता को ऊंचे पर स्थापित करती है।) क्या यह ऐसा ही है? यह आंशिक तौर पर सही है कि बिना शैतान की बुराई के, लोग परमेश्वर की पवित्रता को नहीं जान पाएंगे; यह सही है। फिर भी यदि आप कहते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता का अस्तित्व तभी है जब सामने शैतान की बुराई होती है। क्या यह सही है? यह तर्क गलत है। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर का अंतर्निहित तत्व है; यद्यपि परमेश्वर इसे प्रगट करता या कार्य करता है, यह अंतर्निहित तत्व उसमें विद्यमान है और यह स्वभाविक रूप से प्रकट होता है, यह परमेश्वर में अंतर्भूत है और सदा से अस्तित्व में है, परन्तु मनुष्य उसे देख नहीं सकता। मनुष्य शैतान के दूषित स्वभाव में और दूषित तत्व में रहता है, और मनुष्य पवित्रता को या परमेश्वर की पवित्रता के विशिष्ट अंश को नहीं जानता है। क्या यह सही है? तो फिर क्या आप सोचते हैं कि हमें पहले शैतान के बुरे तत्व के बारे में संगति करनी आवश्यक है? (हां, आवश्यक है।) देखिये, हमने परमेश्वर की विशिष्टताओं के कई पहलुओं पर संगति की है और हमने शैतान के तत्व की चर्चा भी नहीं की, सही? कुछ लोग अपना शक कुछ इस प्रकार जाहिर कर सकते हैं, "आप केवल परमेश्वर के विषय में बात करते हैं, आप हर समय शैतान लोगों को दूषित करता है, और शैतान का स्वभाव बुराई है, ऐसा क्यों कह रहे हैं?" क्या आपने इस संदेह का समाधान कर लिया है? (हां) कैसे आपने इस संदेह का समाधान किया? (परमेश्वर की संगति के द्वारा, अंतर कर लिया कि बुराई क्या है।) जब लोग बुराई पर विचार करते हैं और जब उनके पास उसकी एक सटीक परिभाषा होती है, जब लोग बुराई के विशिष्ट अंश और प्रकाशन को देख सकते हैं, बुराई के स्रोत और तत्व को देखते हैं - जब परमेश्वर की पवित्रता की अभी चर्चा होती है - तब लोग स्पष्ट रूप से जान पाएंगे और इसे परमेश्वर की सच्ची पवित्रता के रूप में पहचान पाएंगे। यदि मैं शैतान की बुराई की चर्चा नहीं करता, तो कुछ लोग गलतफहमी में यह विश्वास करेंगे कि लोग जो कुछ समाज में या लोगों के बीच में करते हैं - या इस संसार में करते हैं - वे पवित्रता से सम्बन्धित हो सकता है। क्या यह दृष्टिकोण गलत नहीं है? (हां) तभी तो मैंने शैतान के तत्व की चर्चा की है। आपने इतने वर्षों के अनुभव के द्वारा, परमेश्वर के वचन को देखने से और उसके कार्यों का अनुभव करने से अपने परमेश्वर की पवित्रता की कितनी समझ प्राप्त की है?। इस विषय में खुलकर बताइये। ऐसे शब्दों की आवश्यकता नहीं है जो कानों को अच्छे लगें, बल्कि अपने अनुभव से बोलें, क्या परमेश्वर की पवित्रता केवल उसका प्रेम है? क्या वह केवल परमेश्वर का प्रेम मात्र है जिसे हम उसकी पवित्रता कहते हैं? वह कुछ ज़्यादा ही एक तरफा होगा, सही? वह एक तरफा नहीं होगा क्या? (हां) इसलिए परमेश्वर के प्रेम के अलावा भी परमेश्वर के तत्व के दूसरे पहलू भी हैं जो आपने देखे हैं? (हां) आपने क्या देखा? (परमेश्वर की पवित्रता यह है कि परमेश्वर त्यौहारों और अवकाशों, रीतियों और अंधविश्वासों से घृणा करता है।) अभी आपने महज़ इतना कहा कि परमेश्वर कुछ बातों से घृणा करता है; परमेश्वर पवित्र है, तो इसीलिये वह घ्रणा करता है, क्या आपका यही मतलब है? (हां।) इसके मूल में, परमेश्वर की पवित्रता क्या है? परमेश्वर की पवित्रता में कोई ठोस तत्व ज्ञान नहीं है, वह केवल चीज़ों से घृणा करता है? क्या आप अपने दिमाग में यह सोच रहे हैं, "क्योंकि परमेश्वर इन बुरी बातों से घृणा करता है, इसलिए कह सकते हैं कि परमेश्वर पवित्र है?" क्या यह यहां केवल परिकल्पना नहीं है? क्या यह निष्कर्ष निकालने और न्याय का प्रकार नहीं है? जब परमेश्वर के तत्व को समझने की बात आती है तब सबसे बड़ा निषेध क्या है? (सच्चाई को पीछे छोड़ देना)। जब हम सिद्धांत की बात करने में वास्तविकता को पीछे छोड़ देते हैं, तो यह सर्वाधिक निषेध की बात होती है। और कुछ? (अटकलबाज़ी और कल्पना) अटकलबाज़ी और कल्पना, ये भी बहुत मजबूत निषेध हैं। अटकलबाज़ी और कल्पना उपयोगी क्यों नहीं हैं? क्या उन चीजों को जिनका आप अनुमान लगाते और कल्पना करते हैं उनको वास्तव में क्या देख सकते हैं? (नहीं) क्या वे परमेश्वर का सच्चा तत्व हैं? (नहीं) निषेध और क्या है? परमेश्वर के तत्व के विषय में कर्णप्रिय लगने वाले शब्दों के समूह को गिनना निषेध है क्या? (हां) क्या यह अहंकारी होना या बकवास करना नहीं है? कर्णप्रिय शब्दों के चयन की तरह ही धारणा और अटकलबाज़ी भी बकवास बातें हैं। क्या और कुछ भी है? खाली तारीफ भी बकवास है, सही? (हां) क्या परमेश्वर लोगों को ऐसी बकवास की बातें कहते हुए सुनना पसंद करता हैं? (नहीं, वह नहीं करता) किसी बात का "मजा नहीं लेना" का पर्याय क्या है? (परेशानी महसूस करना) यह सुनकर वह असुविधा महसूस करता है। परमेश्वर लोगों के एक समूह की अगुवाई करता है और उसे बचाता है। और बचाए जाने के बाद लोगों का यह समूह जब उसका शब्द सुनता है तो वह कभी भी यह नहीं समझता कि उसका अर्थ क्या है? कोई पूछ सकता हैः "क्या परमेश्वर अच्छा है?" और वे प्रत्युत्तर देंगे "अच्छा!" "कितना अच्छा?" "इतना अच्छा!" "क्या परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है?" "हां" "कितना?" "इतना"। "क्या आप परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या कर सकते हैं?" "वह सागर से भी ज्यादा गहरा है, आसामान से भी ऊंचा है!" क्या यह बकवास नहीं है? क्या यह वैसा ही निरर्थक नहीं है जैसा अभी आपने कहा, "परमेश्वर शैतान के दूषित स्वभाव से घृणा करता है, इसलिए परमेश्वर पवित्र है?" (हां) क्या अभी आपने जो कहा है वह बकवास नहीं है? ज्यादातर निरर्थक बातें जो कही जाती हैं वे कहाँ से आती हैं? (शैतान से)। वे शैतान से आती हैं। जो निरर्थक बातें कही जाती है, वे मूलत: लोगों की लापरवाही और परमेश्वर के प्रति अश्रद्धा होने के कारण आती है। क्या हम यह कह सकेंगे? (हां) अभी तक आपने समझ प्राप्त नहीं की अभी भी बकवास बातें करते हो, क्या यह गैरज़िम्मेदार होना नहीं है? क्या यह परमेश्वर के प्रति अशिष्ट होना नहीं है? आपने ज्ञान का कुछ अध्ययन किया है, कुछ कारणों को और कुछ तर्कों को समझा है, जिनका आपने यहां उपयोग किया और परमेश्वर को जानने का काम पूरा कर लिया। क्या आप सोचते हैं कि यह सुनकर परमेश्वर असुविधा महसूस करता है? इन विधियों का उपयोग कर आप परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? क्या यह विचित्र नहीं लगता? इसलिए, जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है, व्यक्ति को बहुत ही अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है; जहां आप परमेश्वर को जानते हैं, केवल उतना ही कहें। ईमानदारी से और व्यवहारिकता से बात करें और अपने शब्दों को रोज़मर्रा की सराहना से न सजाएं और चापलूसी न करें; परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं और इस प्रकार की बातें शैतान से आती हैं। शैतान का स्वभाव अंहकार है और शैतान चापलूसी और अच्छे शब्द सुनना पसंद करता है। यदि लोग कर्णप्रिय शब्दों की सूची बनाएं जो उन्होंने सीखे और उसे शैतान के लिए इस्तेमाल करें तो शैतान खुश और आनन्दित होगा। परन्तु परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं; परमेश्वर चाटुकारिता और चापलूसी पसंद नहीं करता। और उसे इसकी ज़रूरत नहीं कि लोग बकवास बात करें और आंख मूंदकर उसकी प्रशंसा करें। परमेश्वर ऐसी बातों से घृणा करता और उस प्रशंसा और चापलूसी को सुनेगा भी नहीं जो वास्तविकता की लीक से हटकर निकलती है। तो जब लोग आंख मूंदकर परमेश्वर की प्रशंसा करते हैं और जो वे कहते हैं वह उनके हृदय की बातों से मेल नहीं खाती, और वे बेकार में परमेश्वर की शपथ खाते हैं और लापरवाही से उससे प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं सुनता। आप जो कहते हैं आपको उसकी जवाबदारी लेनी चाहिए। यदि आप कुछ नहीं जानते, तो ऐसा कहिए, यदि आप कुछ जानते हैं तो उसे व्यवहारिक रूप से प्रगट कीजिए। अब परमेश्वर की पवित्रता के यथार्थ तत्व के विषय में, क्या आपको इसकी विशिष्ट समझ है? अब आप बकवास करने का साहस नहीं करेंगे, सही? आप निरर्थक बात नहीं कर रहे हैं पर बोलना बंद नहीं कर सकते, तो आप को कुछ समझदारी होना आवश्यक है, सही है? क्या आप इसके बारे में सोच रहे हैं? आप इसे निष्ठापूर्वक सम्भाल रहे हैं, सही? अब आप कुछ बातें कह सकते हैं। (अब मैंने बगावत की जब मैंने अतिक्रमण किया, मैंने परमेश्वर के न्याय और ताड‌‌ना को प्राप्त किया और उसमें मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा। जब मैं उन परिस्थितियों और वातावरण में पड़ गया जो मेरी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थी, तब मैंने इन बातों के लिए प्रार्थना की और मैंने परमेश्वर की इच्छा को पुकारा और परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा मुझे शिक्षा और अगुवाई दी, और मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा।) यह आपके स्वयं के अनुभव के द्वारा है, सही? (जब परमेश्वर सारे रास्ते में लोगों की अगुवाई करता है और जैसे वह लोगों के ऊपर प्रभुता करता है, उसमें मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं। वास्वत में, जैसा परमेश्वर ने कहा है कि कैसे शैतान मनुष्य को दूषित करता है, और मनुष्य शैतान के भ्रष्टाचार और प्रभाव में जीता आया है, तो मनुष्य का उस पर कोई नियंत्रण नहीं है, मैं सचमुच परमेश्वर की पवित्रता को मनुष्यों में परमेश्वर के कार्य के द्वारा देखता हूँ।) (परमेश्वर ने जो कहा उसमें मैंने देखा है कि मनुष्य शैतान द्वारा इस प्रकार दूषित किया जाता है और उसे नुकसान पहुंचाता है, फिर भी, परमेश्वर ने हमें बचाने के लिए सब कुछ दे दिया है, और इसमें मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं।) यह वास्तविक तरीका है और यह सच्चा ज्ञान है। क्या इसमें कोई अलग ख्याल है? (मेरी समझदारी सही है या नहीं, यह मैं नहीं जानता। उस संगति में जिसमें परमेश्वर हमारे साथ था, शैतान जो कहता और करता है, उसमें मैं शैतान की बुराई देखता हूं। पहली संगति में हमने देखा कि परमेश्वर ने मनुष्य को बताया कि वह क्या खा सकता और क्या नहीं खा सकता है, और परमेश्वर के वचन के स्वच्छता और सीधेपन को प्रकाशित किया; उसके द्वारा मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूं। मैं बस यही कह सकता हूं।) हूँ, आपने इन लोगों को जो कहते सुना है उनमें से अधिकांशतः किसके वचनों के लिए आप आमीन कहेंगे? किसका भाषण, किसकी संगति आज हमारी संगति के विषय के सबसे निकट था और सबसे अधिक वास्तविक था? अंतिम बहन की संगति कैसी थी? (अच्छी) जो उसने कहा उस पर आपने आमीन कहा, उसने जो कहा वह क्या सही लक्ष्य पर था? आप स्पष्टता से अपनी बात कहें, आप इस बात की चिंता न करें कि आप गलत हो सकते हैं। (उस बहन के अभी कहे हुए शब्दों में मैंने सुना कि परमेश्वर का वचन खरा और बहुत स्पष्ट है, वह शैतान के चक्करदार शब्दों के समान नहीं है। मैंने परमेश्वर की पवित्रता को इसमें देखा।) यह इसका भाग है। अभी क्या कहा गया आप सबने सुना था? (हां) क्या सही था? (हां) आइए हम ताली बजाकर बहन की प्रशंसा करें। बहुत अच्छा। मैं देखता हूं कि आपने हाल ही की इन दो संगतियों में कुछ प्राप्त किया है, परन्तु आपको लगातार कठिन परिश्रम करते रहना चाहिए। आपके कठिन परिश्रम करने का कारण यह है कि परमेश्वर के तत्व की समझदारी एक बहुत ही गहरा पाठ है; यह ऐसा नहीं है कि कोई आए और एक ही रात में समझ जाए या केवल कुछ ही शब्दों में स्पष्टता से बोल सके।

लोगों के दूषित शैतानी स्वभाव, ज्ञान, दर्शनशास्त्र का प्रत्येक पहलू, लोगों के विचार और दृष्टिकोण और व्यक्तिगत पहलू, उन्हें परमेश्वर के तत्व को पहचानने में सबसे बड़ी बाधा बनते हैं; तो जब आप ये विषय सुनते हैं, तो कुछ विषय आप की पहुंच से बाहर हो सकते हैं, कुछ विषयों को को आप समझ नहीं सकते हो, और कुछ विषयों को आप वास्तविकता के साथ आधारभूत रूप से मिला नहीं पायेंगे। इस सबसे अलग, मैंने आपकी परमेश्वर की पवित्रता की समझ के विषय में सुना है और मैं जानता हूं कि परमेश्वर की पवित्रता के विषय में जो मैंने कहा और संगति की है, अपने हृदय में उसे आपने मानना प्रारम्भ कर दिया है। मैं जानता हूं कि आपके हृदय में परमेश्वर की पवित्रता के तत्व को समझने की इच्छा अंकुरित होने लगी है। पर मुझे और भी आनन्दित क्या करता है? वह यह कि आप में से कुछ परमेश्वर की पवित्रता के ज्ञान को साधारण शब्दों में व्याख्या करने के योग्य हो गए हैं। यद्यपि यह कहने के लिए एक साधारण सी बात है और इसे मैंने पहले भी कहा है कि आप में से अधिकांश के मन में अभी भी यह बात को सहमति मिलना या इसका प्रभाव पड‌ना बाकी है। तथापि, आप में से कुछ ने इन शब्दों को अपने दिल में लिया है यह बहुत अच्छा है और यह एक अच्छी शुरूआत है। मैं आशा करता हूं कि वह विषय जो आपको गम्भीर लगते हैं - या जो विषय आपकी पहुंच से बाहर हैं - आप संगति कायम रखना जारी रखेंगे, और ज्यादा से ज्यादा संगति करेंगे। उन विषयों में जो आपकी पहुंच से बाहर हैं, कोई न कोई आपको और अधिक मार्गदर्शन देता रहेगा। यदि आप उन क्षेत्रों में अधिक संगति करते हैं जो अब आपकी पहुंच में हैं अभी, पवित्रात्मा आप में काम करेगा और आप महान समझदारी को प्राप्त करोगे। समझदारी, परमेश्वर का तत्व और परमेश्वर के तत्व को जानना लोगों के जीवन में अपार सहायता प्रदान करता है। मैं आशा करता हूं कि आप इसमें लापरवाही नहीं बरतेंगे इसे एक खेल की तरह नहीं लेंगे; क्योंकि परमेश्वर को जानना, परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है और मनुष्य की सत्य और मुक्ति की खोज की नींव है और एक ऐसी चीज़ है जिसे किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जा सकता। यदि मनुष्य परमेश्वर पर भरोसा रखता है फिर भी परमेश्वर को नहीं जानता, और यदि मनुष्य शब्दों और सिद्धांतों के बीच में जीता रहता है, तो आप कभी भी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते चाहे सत्य के आडम्बरपूर्ण शब्दों के अनुसार आप कार्य करें या जियें। तात्पर्य यह है कि, यदि आपका परमेश्वर पर विश्वास उसको जानने के आधार पर नहीं है, तो आपके विश्वास का कोई अर्थ नहीं है। आप समझ गये न? (हां, हम समझ गये) आज हमारी संगति यहां पर समाप्त होती है।

4 जनवरी 2014

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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