वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है (III)     भाग दो के क्रम में

1.परमेश्वर समस्त मानवजाति का पालन पोषण करने हेतु सभी चीज़ों के लिये सीमाएं तय करता है।

इन चीज़ों में से कुछ के विषय में बात करने के बाद, क्या अब तुम सबका मुख्य विषय के साथ कोई घनिष्ठ परिचय है जिस पर हमने बस अभी अभी चर्चा की थी? क्या तुम लोगों के पास इसकी कुछ समझ है? इसका एक कारण है कि मैंने उस बड़े विषय के अंतर्गत इन चीज़ों के बारे में कहा है-अब तुम सबको इसका मूल निरीक्षण करना चाहिए। तुम लोग मुझे बता सकते हो, कि तुम सबने कितना समझा है। (सम्पूर्ण मानवजाति का पालन पोषण सिर्फ उन नियमों के द्वारा किया जाता है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा सभी चीज़ों के लिए निर्धारित किया गया था। जब परमेश्वर इन नियमों को निर्धारित कर रहा था, तब उसने विभिन्न जातियों को विभिन्न वातावरण, विभिन्न जीवनशैलियां, विभिन्न आहार, विभिन्न जलवायु और तापमान प्रदान किया था। ऐसा इसलिए था ताकि पूरी मानवजाति पृथ्वी पर बस सके और जीवित बची रहे। इससे मैं परमेश्वर की प्रबन्धकीय योजना और पूरी बारीकी से किए गए उसके इन्तज़ामों के साथ ही साथ उसकी बुद्धि और सिद्धता को देख सकता हूँ।) (मानवजाति का पालन पोषण करने के लिए, परमेश्वर ने हमारे लिए इन नियमों को निर्धारित किया है और उसने भौगोलिक वातावरण के साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के आहार को निर्मित किया है। और इस प्रकार के वातावरण के भीतर बेहतर ढंग से जीवित रहने हेतु उसने हमारे रहने के लिए अलग अलग स्थानों को बनाया था। इससे मैं देख सकता हूँ कि परमेश्वर का कार्य और योजनाएं बिलकुल ठीक हैं, और हम मनुष्यों के लिए मैं उसके प्यार को देख सकता हूँ।) क्या किसी के पास कुछ जोड़ने के लिए है? (परमेश्वर के द्वारा निर्धारित नियमों और दायरों को किसी भी व्यक्ति, घटना, और प्राणी के द्वारा बिलकुल भी बदला नहीं जा सकता है। यह सब उसके शासन के अधीन हैं।) सभी चीज़ों की बढ़ोत्तरी के लिए परमेश्वर के द्वारा निर्धारित नियमों के दृष्टिकोण से देखने पर, क्या सम्पूर्ण मानवजाति, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वे किस प्रकार के हैं, परमेश्वर के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं जी रही है-क्या वे सभी उसके पोषण के अंतर्गत नहीं जी रहे हैं? यदि ये नियम नष्ट हो गए होते या यदि परमेश्वर मानवजाति के लिए इस प्रकार के नियमों को निर्धारित नहीं करता, तो उनके भविष्य की संभावनाएं क्या होतीं? मनुष्य जीवित रहने के लिए अपने मूल वातावरण को खो देते उसके बाद, क्या उनके पास भोजन का कोई स्रोत होता? यह संभव है कि भोजन के स्रोत एक समस्या बन जाते। यदि लोगों ने अपने भोजन के स्रोत को खो दिया होता, अर्थात्, उन्हें खाने के लिए कुछ नहीं मिला होता, तो सम्भवतः वे एक महीने के लिए भी बने रहने में सक्षम नहीं हो पाते। लोगों का जीवित बचे रहना एक समस्या बन जाता। अतः हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर लोगों के जीवित रहने के लिए, उनके लगातार अस्तित्व में बने रहने के लिए और बहुगुणित होने के लिए करता है वह अति महत्वपूर्ण है। हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर सभी चीज़ों के मध्य करता है वह लोगों के जीवित बचे रहने से नज़दीकी से सम्बद्ध और अविभाज्य है। यह उनके जीवित रहने से अविभाज्य है। यदि मानवजाति का जीवित रहना एक समस्या बन जाता, तो क्या परमेश्वर का प्रबंधन जारी रह पाता? क्या परमेश्वर का प्रबंधन तब भी अस्तित्व में बना रहता? अतः परमेश्वर का प्रबंधन सम्पूर्ण मानवजाति के जीवित रहने के साथ साथ मौज़ूद है जिसका वह पालन पोषण करता है, और जो कुछ परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए तैयार करता है और जो कुछ वह मनुष्यों के लिए करता है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि यह सब उसके लिए ज़रूरी है, और यह मानवजाति के जीवित रहने के लिए अति महत्वपूर्ण है। यदि ये नियम जिन्हें परमेश्वर ने सभी चीज़ों के लिए निर्धारित किया था यहां से चले जाते, यदि इन नियमों को तोड़ा या नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाता, तो सभी चीज़ें आगे से अस्तित्व में बने रहने में सक्षम नहीं होतीं, जीवित रहने के लिए मानवजाति का वातावरण निरन्तर अस्तित्व में नहीं रहता, और न ही उनका दैनिक जीवन आधार, और न ही वे स्वयं निरन्तर अस्तित्व में रहते। इस कारण से, मानवजाति के उद्धार हेतु परमेश्वर का प्रबंधन भी आगे से अस्तित्व में नहीं रहता। यह कुछ ऐसा है जिसे लोगों को स्पष्ट रूप से देखना होगा।

हर चीज़ जिसकी हमने चर्चा की, हर एक चीज़, और हर एक मद प्रत्येक व्यक्ति के जीवित रहने से घनिष्टता से जुड़ा हुआ है। शायद तुम लोग कह सकते हो, "जिसके विषय में तुम बात कर रहे हो वह बहुत ही बड़ी है, हम इसे नहीं देख सकते हैं," और कदाचित् ऐसे लोग हैं जो कहेंगे "जो कुछ तुम कह रहे हो उसका मेरे साथ कोई लेना-देना नहीं है।" फिर भी, यह न भूलो कि तुम सभी चीज़ों के बस एक भाग के रूप में जी रहे हो; तुम परमेश्वर के शासन के अंतर्गत सभी चीजों के एक सदस्य हो। सभी चीज़ों को परमेश्वर के शासन से अलग नहीं किया जा सकता है, और न ही एक अकेला व्यक्ति स्वयं को उसके शासन से अलग कर सकता है। उसके नियम को खोने और उसके प्रयोजनों को खोने का अर्थ होगा कि लोगों का जीवन, अर्थात् देह में लोगों का जीवन लुप्त हो जाएगा। यह मानवजाति के लिए जीवित रहने हेतु परमेश्वर द्वारा स्थापित विभिन्न वातावरण का महत्व है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस जाति के हो या तुम भूमि के किस हिस्से पर रहते हो, चाहे पश्चिम में हो या पूर्व में-तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्थापित किया है, और तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण के पोषण और प्रयोजनों से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे उसने मनुष्यों के लिए स्थापित किया है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी आजीविका क्या है, तुम जीने के लिए किस पर आश्रित हो, और देह में अपने जीवन को बनाए रखने के लिए तुम किस पर आश्रित हो, क्योंकि तुम स्वयं को परमेश्वर के शासन और प्रबंधन से अलग नहीं कर सकते हो। कुछ लोग कहते हैं: "मैं एक किसान नहीं हूं, मैं जीने के लिए फसल नहीं उगाता हूँ। मैं अपने भोजन के लिए आसमानों पर आश्रित नहीं हूँ, अतः मैं कह सकता हूँ कि मैं जीवित रहने के लिए परमेश्वर के द्वारा स्थापित उस वातावरण में नहीं जी रहा हूँ। उस प्रकार के वातावरण ने मुझे कुछ नहीं दिया है।" लेकिन यह सही नहीं है। और क्यों नहीं? तुम कहते हो कि तुम अपने जीने के लिए फसल नहीं उगाते हो, लेकिन क्या तुम अनाज नहीं खाते हो? क्या तुम मांस नहीं खाते हो? क्या तुम अण्डे नहीं खाते हो? क्या तुम सब्जियां और फल नहीं खाते हो? हर चीज़ जो तुम खाते हो, वे सभी चीज़ें जिनकी तुम्हें ज़रूरत है, वे जीवित रहने के लिए उस वातावरण से अविभाज्य हैं जिसे परमेश्वर के द्वारा मानवजाति के लिए स्थापित किया गया था। और हर चीज़ का स्रोत जिसकी ज़रूरत मानवजाति को है उसे परमेश्वर के द्वारा सृजी गई सभी चीज़ों से, और जीवित रहने के लिए इस प्रकार के विभिन्न वातावरण से अलग नहीं किया जा सकता है। वह जल जो तुम पीते हो, वे कपड़े जो तुम पहनते हो, और वे सभी चीज़ें जिन्हें तुम इस्तेमाल करते हो-इन में से किसे सभी चीज़ों के मध्य से प्राप्त नहीं किया जाता है? कुछ लोग कहते हैं: "कुछ ऐसे सामान हैं जिन्हें सभी चीज़ों से प्राप्त नहीं किया जाता है!" जैसे क्या? मुझे एक उदाहरण दो। कुछ कहते हैं: "तुम देखो, प्लास्टिक सभी चीज़ों से प्राप्त नहीं किया जाता है। यह एक रासायनिक चीज़, एवं मानव-निर्मित चीज़ है।" लेकिन यह सही नहीं है। क्यों नहीं? प्लास्टिक मानव-निर्मित है, यह एक रासायनिक चीज़ है, किन्तु प्लास्टिक के मूल तत्व कहां से आए थे? (वे परमेश्वर द्वारा निर्मित मूल चीज़ों से निकले थे।) मूल तत्वों को परमेश्वर द्वारा सृजी गई सामग्रियों से प्राप्त किया जाता है। वे चीज़ें जिनका तुम आनन्द उठाते हो, जो तुम देखते हो, हर एक चीज़ जिसका तुम उपयोग करते हो उन सब को सभी चीज़ों से प्राप्त किया जाता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा सृजा गया है। दूसरे शब्दों में, कोई फर्क नहीं पड़ता कि जाति क्या है, कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीविका कितनी है, या जीवित रहने के लिए लोग किस प्रकार के वातावरण में रहते हैं, क्योंकि वे अपने आपको परमेश्वर के प्रयोजनों से अलग नहीं कर सकते हैं। अतः क्या ये चीज़ें जिस पर हमने आज चर्चा की है हमारे विषय "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" से सम्बन्धित हैं? अतः क्या ये चीज़ें जिस पर हमने आज चर्चा की है इस बड़े विषय के अंतर्गत आती है? यह सिर्फ इस रिश्ते की वज़ह से है कि मैंने यह सब कुछ कहा है। कदाचित् जिसके विषय में मैंने आज बात की है वह थोड़ा संक्षिप्त है और चर्चा करना थोड़ा कठिन है। फिर भी, मुझे लगता है कि शायद तुम लोग इसे अब बेहतर ढंग से समझते हो।

पिछले कुछ समयों की संगति में, उन विषयों की सीमा कुछ व्यापक है जिस पर हमने संगति की है, और उनका दायरा चौड़ा है, अतः उन सभी को भीतर लेने के लिए तुम लोगों को कुछ प्रयास करने की आवश्यकता है। यह इसलिए है क्योंकि ये विषय परमेश्वर के प्रति लोगों के विश्वास में ऐसी चीज़ें हैं जिनका पहले सामना नहीं किया गया है। कुछ लोग इसे एक भेद के रूप सुनते हैं और कुछ लोग इसे एक कहानी के रूप में सुनते हैं-कौन सा दृष्टिकोण सही है? तुम सब किस दृष्टिकोण से ये सब सुनते हो? तुम लोगों ने इन सब से क्या पाया है? कोई तो मुझे बताए। (मैंने परमेश्वर के अधिकार के एक पहलू को पहचान लिया है और उसके सम्मान को भी देख लिया है, और उससे मैं मानवजाति के लिए उसके प्रेम को भी देख सकता हूँ। हर एक चीज़ जो वह करता है उसमें मानवजाति के लिए उसके बारीकी से किए गए इन्तज़ाम और योजनाएं शामिल हैं। वह हमसे बहुत अधिक प्यार और हमारा लालन पालन करता है कि उसने सोच विचार कर हमें हमारा भोजन भी प्रदान किया है।) (हमने परमेश्वर के कार्यों को देखा है, साथ ही साथ यह भी देखा है कि उसने किस प्रकार विधिपूर्वक सभी चीज़ों को व्यवस्थित किया है और यह कि सभी चीज़ों में ये नियम हैं, और इन वचनों के जरिए हम परमेश्वर के कार्यों और मानवजाति को बचाने के लिए उसके बारीकी से किए गए इन्तज़ामों को और भी अधिक समझ सकते हैं।) संगति में इन समयों के जरिए, क्या तुम लोगों ने देखा कि सभी चीज़ों में परमेश्वर के प्रबंधन का दायरा क्या है? (पूरी मानवजाति, हर एक चीज़!) क्या परमेश्वर एक ही जाति का परमेश्वर है? क्या वह एक ही तरह के लोगों का परमेश्वर है? क्या वह मानवजाति के एक छोटे से भाग का परमेश्वर है? (नहीं, वह नहीं है।) जबकि मामला यह नहीं है, परमेश्वर के विषय में लोगों के ज्ञान में, यदि वह सिर्फ मानवजाति के एक छोटे से भाग का परमेश्वर होता, या यदि तुम लोग विश्वास करते हो कि परमेश्वर केवल तुम सबका परमेश्वर है, तो क्या यह दृष्टिकोण सही है? जबकि परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रबन्ध और उन पर शासन करता है, तो लोगों को उसके कार्यों, उसकी बुद्धि, और उसकी सर्वसामर्थता को देखना चहिए जिन्हें सभी चीज़ों के ऊपर उसके शासन में प्रकट किया गया है। यह कुछ ऐसा है जिसे लोगों को जानना होगा। यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर सभी जीवों का प्रबन्ध करता है, सारे प्राणियों के ऊपर शासन करता है, और सारी मानवजाति के ऊपर शासन करता है, किन्तु यदि तुम्हारे पास मानवजाति के ऊपर उसके शासन की कोई समझ या उसमें कोई अन्तःदृष्टि नहीं है, तो क्या तुम वास्तव में यह स्वीकार कर सकते हो कि वह सब वस्तुओं के ऊपर शासन करता है? क्या तुम स्वीकार कर सकते हो? तुम शायद अपने हृदय में सोच सकते हो, "मैं कर सकता हूँ, क्योंकि मैं देख सकता हूँ कि मेरे सम्पूर्ण जीवन पर परमेश्वर के द्वारा शासन किया जाता है।" लेकिन क्या परमेश्वर वाकई में इतना छोटा है? वह छोटा नहीं! तुम सिर्फ अपने लिए ही परमेश्वर के उद्धार और स्वयं में उसके कार्य को देखते हो, और इन चीज़ों से तुम उसके शासन को देखते हो। वह दायरे के लिहाज से बहुत ही छोटा है और इसका परमेश्वर के विषय में तुम्हारे विशुद्ध ज्ञान के ऊपर एक प्रभाव है। साथ ही यह सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के शासन के तुम्हारे विशुद्ध ज्ञान को भी सीमित करता है। यदि तुम अपने ज्ञान को जो कुछ परमेश्वर तुम्हारे लिए प्रदान करता है और तुम्हारे लिए उसके उद्धार के दायरे तक सीमित करते हो तो तुम कभी भी यह पहचानने में सक्षम नहीं होगे कि वह हर चीज़ पर शासन करता है, कि वह सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सारी मानवजाति पर शासन करता है। जब तुम यह सब पहचानने में असफल हो जाते हो, तब क्या तुम सचमुच में उस तथ्य को पहचान सकते हो कि परमेश्वर तुम्हारी नियति के ऊपर शासन करता है? तुम नहीं पहचान सकते हो। तुम अपने हृदय में उस पहलु को पहचानने में कभी सक्षम नहीं होगे-तुम उस स्तर को पहचानने में कभी सक्षम नहीं होगे। तुम समझ गए, ठीक है? (हां।) वास्तव में, मैं जानता हूं कि तुम लोग किस हद तक इन विषयों, और इस विषय वस्तु को समझने में सक्षम हो जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूं, अतः क्यों मैं लगातार इसके बारे में बात कर रहा हूँ? यह इसलिए है क्योंकि ये विषय ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें परमेश्वर के प्रत्येक अनुयायी, और हर एक व्यक्ति के द्वारा समझा जाना चाहिए जो परमेश्वर के द्वारा उद्धार पाना चाहता है-उन्हें इन विषयों के बारे में जानना होगा। भले ही इस समय, और इस घड़ी तुम उन्हें नहीं समझते हो, किन्तु किसी दिन, जब तुम्हारा जीवन और सत्य के विषय में तुम्हारा अनुभव एक निश्चित स्तर तक पहुंच जाता है, जब तुम्हारे जीवन स्वभाव में तुम्हारा परिवर्तन एक निश्चित स्तर तक पहुंच जाता है और तुम्हारा डील-डौल एक निश्चित मात्रा तक बढ़ जाता है, केवल तभी ये वचन-ये विषय जिन्हें मैं तुम्हें संगति में बता रहा हूँ-सचमुच में परमेश्वर के ज्ञान के तुम्हारे अनुसरण के लिए आपूर्ति करेंगे और उसे संतुष्ट कर पाएंगे। अतः ये वचन एक नींव डालने के लिए, और तुम लोगों के भविष्य की समझ के लिए तुम सबको तैयार करने के लिए थे कि परमेश्वर सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है और स्वयं परमेश्वर के विषय में तुम सबकी समझ के लिए थे।

लोगों के हृदयों में परमेश्वर की समझ जितनी अधिक होती है वह यह निर्धारित करती है कि वह उनके हृदयों में कितनी जगह रखता है। उनके हृदयों में परमेश्वर का ज्ञान जितना विशाल होता है उनके हृदयों में उसकी हैसियत उतनी ही बड़ी होती है। यदि वह परमेश्वर जिसे तुम जानते हो खाली और अस्पष्ट है, तो तुम्हारे हृदय में वह परमेश्वर भी खाली और अस्पष्ट है। यदि वह परमेश्वर जिसे तुम जानते हो वह स्वयं के दायरे के भीतर ही सीमित है, तो वह बहुत ही छोटा परमेश्वर है-वह परमेश्वर सच्चे परमेश्वर से जुड़ा हुआ नहीं है और उसका उसके साथ कुछ लेना देना नहीं है। इस तरह, परमेश्वर के वास्तविक कार्यों को जानना, परमेश्वर की वास्तविकता और उसकी सर्वसामर्थता को जानना, स्वयं परमेश्वर की सच्ची पहचान को जानना, जो उसके पास है और जो वह है उसे जानना, जो कुछ उसने सभी चीज़ों के बीच प्रदर्शित किया है उसे जानना-ये हर एक व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण है जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करता है। ये प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से, और सत्य के अनुसरण के विषय में प्रत्येक व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन से अलग नहीं हो सकते हैं। यदि तुम परमेश्वर के विषय में अपनी समझ को केवल शब्दों तक ही सीमित रखते हो, यदि तुम इसे अपने स्वयं के छोटे छोटे अनुभवों, परमेश्वर के अनुग्रह जिसका तुम हिसाब रखते हो, या परमेश्वर के लिए अपनी छोटी छोटी गवाहियों तक ही सीमित रखते हो, तब मैं कहता हूँ कि तुम्हारा परमेश्वर बिलकुल भी सच्चा परमेश्वर नहीं है। यह बिलकुल भी स्वयं सच्चा परमेश्वर नहीं है, यह भी कहा जा सकता है कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह परमेश्वर नहीं है। यह इसलिए है क्योंकि जिस परमेश्वर के बारे में मैं बोल रहा हूँ यह वही है जो हर चीज़ के ऊपर शासन करता है, जो हर चीज़ के मध्य में चलता फिरता है, और हर चीज़ का प्रबन्ध करता है। यह वही है जो सारी मानवजाति की नियति को थामे रहता है-वही जो हर चीज़ की नियति को थामे रहता है। उस परमेश्वर का कार्य और क्रियाएं जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ वे मात्र लोगों के एक छोटे से भाग तक ही सीमित नहीं हैं। अर्थात्, यह बस उन लोगों तक ही सीमित नहीं है जो वर्तमान में उसका अनुसरण करते हैं। उसके कार्यों को सभी चीज़ों के मध्य, सभी चीज़ों के जीवित रहने में, और सभी वस्तुओं के परिवर्तन के नियमों में प्रदर्शित किया गया है। यदि तुम सभी चीज़ों के मध्य परमेश्वर के कार्यों में से किसी को देख या पहचान नहीं सकते हो, तो तुम उसके कार्यों में से किसी की गवाही नहीं रखते हो। यदि तुम परमेश्वर के लिए कोई गवाही नहीं रखते हो, यदि तुम निरन्तर उस छोटे तथाकथित परमेश्वर की बात करते हो जिसे तुम जानते हो, वह परमेश्वर जो तुम्हारे स्वयं के विचारों तक ही सीमित है, और तुम्हारे संकीर्ण मस्तिष्क के भीतर है, यदि तुम निरन्तर उस किस्म के परमेश्वर के बारे में बोलते हो, तो परमेश्वर कभी तुम्हारे विश्वास की प्रशंसा नहीं करेगा। जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, और यदि तुम सिर्फ इन शब्दों का उपयोग करते हो कि तुमने किस प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लिया, परमेश्वर के अनुशासन और उसकी ताड़ना को कैसे स्वीकार किया, और उसके लिए अपनी गवाही में उसकी आशीषों का आनन्द कैसे लिया, तो यह बिलकुल ही अपर्याप्त है, और यह उसको संतुष्ट करने से दूर है। यदि तुम परमेश्वर के लिए एक ऐसे तरीके से गवाही देना चाहते हो जो उसकी इच्छा के साथ एक मेल में है, और स्वयं सच्चे परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्यों से जो उसके पास है और जो वह है उसे देखना होगा। हर चीज़ पर उसके नियंत्रण से तुम्हें उसका अधिकार देखना होगा, और उस सच्चाई को देखना होगा कि कैसे वह समस्त मानवजाति की लिए आपूर्ति करता है। यदि तुम केवल यही स्वीकार करते हो कि तुम्हारा दैनिक भोजन और पेय और जीवन में तुम्हारी जरूरतें परमेश्वर से आती हैं, लेकिन तुम उस सच्चाई को नहीं देखते हो कि परमेश्वर सभी चीज़ों के माध्यम से सम्पूर्ण मानवजाति के लिए आपूर्ति करता है, कि वह सभी चीज़ों पर अपने शासन के माध्यम से सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाही देने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। अब तुम यह सब समझ गए, सही है? यह सब कहने में मेरा क्या उद्देश्य है? यह इसलिए है ताकि तुम सब इसे हल्के में न लो, ताकि तुम यह विश्वास न करो कि ये विषय जिनके बारे में मैंने कहा है वे जीवन में तुम लोगों के व्यक्तिगत प्रवेश से असम्बद्ध हैं, और ताकि तुम लोग इन विषयों को मात्र एक प्रकार के ज्ञान या सिद्धान्त के रूप में न लो। यदि तुम सब इसे उस तरह की मनोवृत्ति के साथ सुनते हो, तो तुम सब एक भी चीज़ प्राप्त नहीं करोगे। तुम लोग परमेश्वर को जानने के लिए इस महान अवसर खो दोगे। अतः अब तुम सब समझ गए?

इन सब चीज़ों के बारे में बात करने में मेरा लक्ष्य क्या है? मेरा लक्ष्य है कि लोग परमेश्वर को जानें, और लोग परमेश्वर के व्यावहारिक कार्यों को समझें। जब एक बार तुम परमेश्वर को समझ जाते हो और तुम उसके कार्यों को जान जाते हो, केवल तभी तुम्हारे पास उसे जानने के लिए अवसर या संभावना होती है। उदाहरण के लिए, यदि तुम एक व्यक्ति को समझना चाहते हो, तो तुम उसे कैसे समझोगे? क्या यह उसके बाहरी रूप को देखने के माध्यम से होगा? क्या यह जो वो पहनता है उसे देखने के माध्यम से होगा, वो कैसे कपड़े पहनता है? क्या यह कि वो कैसे चलता है उसे देखने के माध्यम से होगा? क्या यह उसके ज्ञान के दायरे को देखने के माध्यम से होगा? निश्चित रूप से यह नहीं होगा। अतः तुम एक व्यक्ति को कैसे समझते हो? तुम एक व्यक्ति के विचारों के माध्यम से, उसकी बोली और व्यवहार के माध्यम से, जो कुछ वो व्यक्त और प्रकट करता है उसके माध्यम से एक फैसला करते हो। इस तरह से तुम एक व्यक्ति को जानते हो, और इस तरह से तुम एक व्यक्ति को समझते हो। उसी प्रकार, यदि तुम लोग परमेश्वर को जानना चाहते हो, यदि तुम सभी उसके व्यावहारिक पक्ष को समझना चाहते हो, उसके सच्चे पक्ष को, तो तुम लोगों को उसे उसके कार्यों के माध्यम से और हर एक व्यावहारिक चीज़ के माध्यम से जानना होगा जो वह करता है। यह सबसे अच्छा तरीका है, और यह ही एकमात्र तरीका है। अतः क्या अब तुम लोग समझ गए? परमेश्वर सभी चीज़ों के मध्य अपने कार्यों को प्रगट करता है और सभी वस्तुओं के मध्य वह शासन करता और वह सभी चीज़ों के नियमों को थामे रहता है। यह लोगों के लिए पूर्णतया आवश्यक है कि वे परमेश्वर को समझें और जानें।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
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