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XV. परमेश्वर का विरोध करती धार्मिक दुनिया के सार को किस तरह पहचानें

5. किसी ऐसे व्यक्ति का क्या अंजाम होता है जो धर्म में परमेश्वर पर विश्वास करता है और फरीसियों और मसीह-विरोधियों के भ्रम और नियंत्रण से पीड़ित है? क्या इस तरह से परमेश्वर में विश्वास करने वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा बचाया जा सकता है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"वे अंधे मार्गदर्शक हैं और अंधा यदि अंधे को मार्ग दिखाए, तो दोनों ही गड़हे में गिर पड़ेंगे" (मत्ती 15:14)।

"क्योंकि जो इन लोगों की अगुवाई करते हैं वे इनको भटका देते हैं, और जिनकी अगुवाई होती है वे नष्‍ट हो जाते हैं" (यशायाह 9:16)।

"मेरे ज्ञान के न होने से मेरी प्रजा नष्‍ट हो गई...। जैसे वे बढ़ते गए, वैसे ही वे मेरे विरुद्ध पाप करते गए; मैं उनके वैभव के बदले उनका अनादर करूँगा। वे मेरी प्रजा के पापबलियों को खाते हैं, और प्रजा के पापी होने की लालसा करते हैं। इसलिये जो प्रजा की दशा होगी, वही याजक की भी होगी; मैं उनके चालचलन का दण्ड दूँगा, और उनके कामों के अनुकूल उन्हें बदला दूँगा" (होशे 4:6-9)।

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो कार्य मनुष्य के मन में होता है उसे बहुत ही आसानी से मनुष्य के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उदाहरण के लिए, धार्मिक संसार के पादरी और अगुवे अपने कार्य को करने के लिए अपनी प्रतिभाओं और पदों पर भरोसा रखते हैं। जो लोग लम्बे समय तक उनका अनुसरण करेंगे वे उनकी प्रतिभाओं के द्वारा संक्रमित हो जाएँगे और जो वे हैं उसमें से कुछ के द्वारा प्रभावित हो जाएँगे। वे लोगों की प्रतिभाओं, योग्यताओं और ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, और वे कुछ अलौकिक चीज़ों और अनेक गम्भीर अवास्तविक सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं (निस्संदेह, ये गम्भीर सिद्धान्त अप्राप्य हैं)। वे लोगों के स्वभाव में परिवर्तनों पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं, बल्कि इसके बजाए वे लोगों के उपदेश देने और कार्य करने की योग्यताओं को प्रशिक्षित करने, और लोगों के ज्ञान और समृद्ध धार्मिक सिद्धान्तों को बेहतर बनाने के ऊपर ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे इस बात पर ध्यान केन्द्रित नहीं करते हैं कि लोगों के स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है या लोग सत्य को कितना समझते हैं। वे लोगों के सार के साथ अपने आपको नहीं जोड़ते हैं, और वे लोगों की सामान्य और असामान्य दशाओं को जानने की कोशिश तो बिल्कुल भी नहीं करते हैं। वे लोगों की अवधारणाओं का विरोध नहीं करते हैं या अपनी अवधारणाओं को प्रकट नहीं करते हैं, और वे अपनी कमियों या भ्रष्टता में सुधार तो बिल्कुल भी नहीं करते हैं। अनुसरण करने वाले अधिकांश लोग अपनी प्राकृतिक प्रतिभाओं के द्वारा सेवा करते हैं, और जो कुछ वे व्यक्त करते हैं वह ज्ञान और अस्पष्ट धार्मिक सत्य है, जिनका वास्तविकता के साथ कोई नाता नहीं है और वे लोगों को जीवन प्रदान करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" से उद्धृत

जो लोग न्याय से होकर नहीं गुज़रे हैं वे मानवीय देह और विचारों के सिवाए और कुछ भी व्यक्त नहीं करते हैं, जिसमें बहुत सारी मानवीय बुद्धि और जन्मजात प्रतिभाएँ मिली हुई होती हैं। यह परमेश्वर के कार्य की मनुष्य की परिशुद्ध अभिव्यक्ति नहीं है। जो लोग उनका अनुसरण करते हैं उन्हें उनकी जन्मजात क्षमता के द्वारा उनके सामने लाया जाता है। क्योंकि वे मनुष्य के बहुत दृष्टि-बोधों और अनुभवों को व्यक्त करते हैं, जो परमेश्वर के मूल अर्थ से लगभग वियोजित हैं, और इससे बहुत दूर भटक जाते हैं, इसलिए इस प्रकार के व्यक्ति का कार्य लोगों को परमेश्वर के सम्मुख लाने में असमर्थ है, परन्तु अपने सामने लाने में समर्थ है। इसलिए जो लोग न्याय और ताड़ना से होकर नहीं गुज़रे हैं वे परमेश्वर के कार्य को कार्यान्वित करने में असमर्थ हैं। एक योग्य कार्यकर्ता का कार्य लोगों को सही मार्ग पर ला सकता है और उन्हें सत्य की गहराई में जाने दे सकता है। जो कार्य वह करता है वह लोगों को परमेश्वर के सम्मुख ला सकता है। इसके अतिरिक्त, जो कार्य वह करता है वह, लोगों को मुक्ति और स्वतंत्रता प्रदान करते हुए, भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न होता है और यह नियमों से बँधा हुआ नहीं होता है। इसके अतिरिक्त, वे धीरे-धीरे जीवन में आगे बढ़ सकते हैं, और वे उत्तरोत्तर सत्य में अधिक गहरे जा सकते हैं। एक अयोग्य कार्यकर्ता का कार्य कम पड़ता है; उसका कार्य मूर्खतापूर्ण होता है। वह लोगों को केवल नियमों में ला सकता है; वह लोगों से जो माँग करता है वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों पर भिन्न-भिन्न नहीं होती है; वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार कार्य नहीं करता है। इस प्रकार के कार्य में, बहुत से नियम और बहुत से सिद्धान्त होते हैं, और यह लोगों को वास्तविकता में या जीवन में बढ़ोत्तरी के सामान्य अभ्यास में नहीं ला सकता है। यह लोगों को केवल कुछ बेकार नियमों को निभाने में सक्षम बना सकता है। इस प्रकार का मार्गदर्शन लोगों को केवल भटका सकता है। वह तुम्हारी अगुवाई करता है ताकि तुम उसके समान बन जाओ; वह तुम्हें उसी में ला सकता है जो उसके पास है और जो वह है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" से उद्धृत

ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। और कोई कह सकता है कि उनमें विवेक नहीं है, लेकिन वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है; ऐसा एक भी नाज़ुक समय नहीं हुआ है जब पर वे कभी सत्य के पक्ष में खड़े हुए हों, एक बार भी उन्होंने सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं की—तो क्या वे वाकई विवेकहीन हैं? वे हमेशा शैतान के पक्ष में क्यों खड़े होते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना तरह यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तेरे मन में ऐसे लोगों के लिए सम्मान क्यों नहीं हो सकता है जो सत्य का अभ्यास करते हैं, तो फिर तू तुरंत ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो उनकी अभिव्यक्ति बदलने के क्षण भर में ही सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझ में विवेक है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ है। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह महज़ इसलिए है क्योंकि कि तेरे आस-पास बहुत से ऐसे हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो वह इसलिए है क्योंकि अभी निष्कासन का समय नहीं है; बल्कि अभी यह समय हटाने करने का है। तुझे निष्कासित करने की कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन के आने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब तुझे हटा देने के बाद, दंडित किया जायेगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, वह हटा दिया जायेगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का अभ्यास में नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी" से उद्धृत

हर पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, "हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।" देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं? ...

परमेश्वर पर लोगों के विश्वास में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने पहले किसी और का अनुसरण किया था या उन्होंने परमेश्वर की इच्छा पूरी नहीं की थी, अंततः उन्हें अंत के दिनों के कार्य के इस चरण में परमेश्वर के सामने आना ही होगा। यदि कार्य के इस चरण का अनुभव करने के आधार पर तुम किसी और का अनुसरण करते रहोगे, तो तुम्हें अक्षम्य माना जाएगा, और तुम्हारा अंत पौलुस की तरह ही होगा।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य का अनुसरण ही परमेश्वर में सच्चा विश्वास है" से उद्धृत

यदि कोई कलीसिया कई स्थानीय गुण्डों, और साथ ही कुछ छोटी-छोटी "मक्खियों" से युक्त जिनमें विवेक का पूर्णतः अभाव है जो उनके आसपास अनुसरण करती हैं, और यदि समागम के सदस्य, सत्य देख लेने के बाद भी, इन गुण्डों की जकड़न और हेरफेर से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, तो उन सभी मूर्खों का अंत में सफाया कर दिया जायेगा। यद्यपि इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कुछ खौफ़नाक न किया हो, लेकिन ये और ज़्यादा धूर्त, और ज़्यादा मक्कार और कपटी होती हैं, और इस तरह के हर एक को हटा दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान से संबंधित हैं, वे शैतान के पास लौट जाएँगे, जबकि जो परमेश्वर से संबंधित हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज में चले जाएँगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जायेगा। जो सत्य के खोजी हैं, उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदयों की तृप्ति तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; और वह किसी के प्रति भी पक्षपात नहीं करता है। यदि तू एक इब्लीस है, तो तो तू सत्य का अभ्यास करने में अक्षम है; और यदि तू कोई ऐसा है जो सत्य की खोज करता है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का अभ्यास में नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी" से उद्धृत

जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण दुष्ट लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर की अवमानना करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर की अवहेलना करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और सिद्ध बना दिया जागा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आणंत्रण देंगे। ये वे अंत हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जो सत्य का अभ्यास में नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी" से उद्धृत

पिछला:क्या धार्मिक पादरी और प्राचीन लोग सभी वास्तव में परमेश्वर द्वारा प्रतिष्ठित हैं? क्या धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों के प्रति स्वीकृति और आज्ञाकारिता, परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और उसके अनुसरण को दर्शा सकती हैं?

अगला:क्या धार्मिक दुनिया में सच्चाई और परमेश्वर की सत्ता होती है, या मसीह-शत्रु और शैतान की सत्ता है?

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